रासायनिक दवाओं के ज्यादा इस्तेमाल से खेत की मिट्टी खराब हो रही है और लागत भी बढ़ रही है. ऐसे में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा नई दिल्ली के पादप रोग विज्ञान विभाग ने पादप रोगों के लिए ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) आधारित जैविक तकनीक विकसित की है. यह तकनीक सस्ती भी है और मिट्टी के लिए सुरक्षित भी.
क्या है ट्राइकोडर्मा
ट्राइकोडर्मा एक लाभकारी फफूंद है जो हानिकारक फफूंद को खत्म कर देती है. यह पाउडर और तरल दोनों रूप में आता है. इसे पूसा डी रूप 3 के नाम से जाना जाता है.
किनकिन रोगों में काम करता है
यह कई तरह के कवक और जीवाणु रोगों को नियंत्रित करने में कारगर पाया गया है, जैसे :
-आर्द्रपतन.
-तना विगलन.
-पर्ण ब्लौच, काला पर्णधब्बा, झुलसा रोग.
-मूल विगलन और जीवाणु झुलसा.
यह अलगअलग जलवायु वाले क्षेत्रों में भी अच्छे से काम करता है और लंबे समय तक मिट्टी में बना रहता है. इस की खास बात यह है कि यह कई रासायनिक कीटनाशकों को भी सहन कर लेता है.
किसान कैसे करें इस्तेमाल
इसका प्रयोग 3 तरह से किया जा सकता है :
बीज उपचार : 5 से 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर को 1 किलो बीज की दर से बीज को उपचारित करें. उस के बाद उस की बोआई करें.
मिट्टी उपचार : 1 किलो ट्राइकोडर्मा को 100 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाएं. इसे 10 से 12 दिन तक नम जगह पर ढक कर रखें, फिर खेत में नम मिट्टी में मिला दें.
पत्तियों पर छिड़काव : 4 से 5 मिलीलीटर तरल ट्राइकोडर्मा को 1 लीटर पानी में मिला कर फसल पर छिड़काव करें.
यह तकनीक जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए बहुत उपयोगी है. इस से न सिर्फ रोग कम होंगे, बल्कि मिट्टी की सेहत भी सुधरेगी और पैदावार बढ़ेगी. Trichoderma





