Baby Corn Farming: किसानों की जिंदगी बदल सकती है बेबीकार्न की खेती

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Baby Corn Farming : भुट्टे व आटे वाले मक्के की खेती तो पुराने जमाने से हो रही है, मगर बेबीकार्न नए जमाने की लोकप्रिय फसल है. किसी बेबी डॉल जैसा असर रखने वाली बेबीकार्न की फसल वैज्ञानिक खेती (Baby Corn Farming) के जरीए किसानों की जिंदगी बदल सकती है.

देश-विदेश में है मांग, मिले रोजगार

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बेबीकार्न (Baby Corn) की बहुत मांग है, लिहाजा इसे तथा इससे बने उत्पादों का निर्यात करके विदेशी मुद्रा भी हासिल की जा सकती है. सही जलवायु मिलने पर 1 साल में बेबीकार्न की 2 से 4 फसलें ली जा सकती हैं. इसकी खेती से नकदीकरण तथा व्यवसायीकरण को बढ़ावा मिलता है, साथ ही इसके उत्पादन, विपणन, प्रसंस्करण और निर्यात की प्रक्रिया से रोजगार के अवसर मिलते हैं.

कैसे करें बेबीकार्न की खेती

भारत में इसकी काफी संभावनाएं हैं. भारत इसका बड़ा उत्पादक व निर्यातक देश बन सकता है. बेबीकार्न (Baby Corn)  को उगाने की विधि वैसे तो मक्के से मिलती-जुलती है, पर प्रति इकाई पौध संख्या, खाद प्रबंध, तोड़ाई का समय व तरीका और प्रजातियां मक्के से अलग हैं.

किस्मों का चुनाव

बेबीकार्न (Baby Corn) की अधिक पैदावार के लिए वीएल 42, वीएल 76, एमईएस 114, पूसा संकर 1, पूसा संकर 2, वीएल बेबीकार्न 1 वगैरह खास किस्में हैं. एचएम 4 व प्रकाश संकर किस्में उच्च क्वालिटी व अच्छी उपज के लिए लोकप्रिय हैं.

कैसे करें खेत तैयार

वैसे तो इसकी खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन बलुई दोमट से दोमट मिट्टी जिस में जल निकास का सही इंतजाम हो तथा कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त मात्रा में हों, अच्छी रहती है. बेबीकार्न (Baby Corn) की अच्छी बढ़वार के लिए फसल को बोने से पहले, खेत की 2-3 जुताई करके अच्छी तरह तैयार करना चाहिए तथा पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए. खेत की तैयारी के समय, खेत में पर्याप्त नमी की मात्रा होनी चाहिए. यदि खेत में नमी की कमी हो तो बोआई से पहले 1 बार सिंचाई करना ठीक रहता है.

कहां, कब, कैसे करें बोआई

दक्षिण भारत में बेबीकार्न की बोआई पूरे साल की जा सकती है, जबकि उत्तरी भारत में इसे फरवरी से नवंबर के बीच बोया जा सकता है. सिंचाई व अन्य उत्पादक कारकों की सही मौजूदगी होने पर, बेबीकार्न की 1 साल में 2 या 4 फसलें ली जा सकती हैं.

बेबीकार्न (Baby Corn) की बोआई समतल खेत में मेंड़ बनाकर की जा सकती है. बारिश के मौसम में जल भराव से बचने के लिए बोआई मेंड़ों पर ही करनी चाहिए.

सर्दियों में बोआई नालियों के अंदर करने पर सिंचाई के जल तथा पोषक तत्त्वों का फसल द्वारा अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जा सकता है.

यदि समतल भूमि में बोआई की गई है, तो बोआई के करीब 3 हफ्ते बाद पौधों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए जिस से तेज हवा व आंधी में पौधे गिर न सकें.

खाद व उर्वरक प्रबंधन

बेबीकार्न (Baby Corn) की अधिक उपज लेने के लिए खेत में गोबर की अच्छी तरह सड़ी-गली खाद डालनी चाहिए. गोबर की खाद को लगभग 8-10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से लगभग 12-15 दिनों पहले खेत की तैयारी के समय डाल देना ठीक रहता है. इसके साथ-साथ मिट्टी की जांच के आधार पर 150-180 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटैशियम प्रति हेक्टेयर की दर से डालनी चाहिए. मिट्टी में जिंक की पूर्ति के लिए 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक सल्फेट डालना न भूलें.

नाइट्रोजन की आधी मात्रा और पोटेशियम, फास्फोरस व जिंक सल्फेट की पूरी-पूरी मात्राएं बोआई से पहले अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें.

नाइट्रोजन की बची मात्रा को 2 भागों में बांटकर पहली बोआई से 20-22 दिनों बाद 1 भाग डालें. दूसरा भाग नर मंजरी निकलने से पहले खड़ी फसल में डालें. नाइट्रोजन की यह मात्रा देने के बाद इसे मिट्टी में मिला दें और साथ ही साथ पौधों को सहारा देने के लिए मिट्टी भी चढ़ाएं. इस प्रकार पौधे नाइट्रोजन का पूरा व सही इस्तेमाल कर सकते हैं.

खरपतवार नियंत्रण जरूरी

बेबीकार्न की फसल में खरपतवार नियंत्रण का ध्यान शुरू से ही रखें. खरपतवारों के निकलने से पहले एट्राजीन का 1.0-1.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. यह चौड़े पत्तीदार खरपतवारों तथा अधिकतर घासों को रोकने का एक प्रभावी तरीका है.

सिंचाई प्रबंधन

बेबीकार्न (Baby Corn) की फसल अगर बरसात के मौसम में लगाई है, तो बारिश न होने की स्थिति में 2-3 सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है. बसंत व शरद ऋतु में लगाई गई बेबीकार्न की फसल को मौसम के अनुसार अधिक सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है.

पाले से बचाव

सर्दियों के दौरान विशेषरूप में मध्य दिसंबर से मध्य फरवरी के बीच में फसल को पाले से बचाने के लिए खेत में पर्याप्त नमी बनाकर रखनी चाहिए. बारिश ऋतु में अधिक बारिश होने पर खेत से जल निकास का भी ध्यान रखें. विशेषरूप से शुरू की अवस्था में जल भराव के प्रति सजग रहना जरूरी है.

नर मंजरी निकालना

बेबीकार्न (Baby Corn) की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए, नर मंजरी निकालना एक जरूरी काम है. पौधों में नर मंजरी निकलते ही तुरंत उसे हाथ द्वारा खींच कर निकाल देना चाहिए तथा उन को पशुओं को खिलाने के काम में लाना चाहिए.

कैसे करें फसल प्रबंधन

बसंत व सर्दियों में उगाई गई फसलों में बारिश के मौसम के मुकाबले न के बराबर ही बीमारियां आती हैं. बारिश के मौसम में लीफ ब्लाइट नामक बीमारी का प्रकोप दिखाई दे तो डाइथेन एम 45 नामक दवा की 2.5 किलोग्राम मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

बेबीकार्न (Baby Corn) किसी भी मौसम में उगाने पर पाए जाने वाले कीड़ों में तनाभेदक (काइलोपारटिलस), गुलाबी तनाभेदक (सीसेमिया इफरेस) तथा सोरधम मक्खी (एथेरिगोना स्पेसिज) खास कीट हैं. बीज जमने के 10 और 20 दिनों बाद कार्बोरिल या इंडोसल्फान का छिड़काव तनाभेदक की रोकथाम के लिए जरूरी है.

कब करें भुट्टों की तोड़ाई

भुट्टों की तोड़ाई बाल निकलने (सिल्क इमरजेंस) के बाद 1 से 3 दिनों के अंदर कर लेनी चाहिए. तोड़ाई सुबह या शाम के वक्त करें तथा भुट्टे तोड़ते समय ऊपर की पत्तियां न हटाएं. पत्तियां हटाने से भुट्टे जल्दी खराब होते हैं. खरीफ के मौसम में तोड़ाई 10-12 दिनों तथा सर्दियों में 20 दिनों के बीच होनी चाहिए.

बसंत में मीठा मक्का (Sweet Corn) उगा कर लाभ कमाएं

मक्के को दाने, पापकार्न, बेबीकार्न, मीठा मक्का आदि के लिए उगाया जाता है. आजकल मीठे मक्के के भुट्टों की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है. खासतौर पर बारिश का मौसम शुरू होने पर लोग भुट्टों को भून कर खाते हैं, लेकिन उस समय भुट्टों की कमी होती है. यदि मक्के को बंसत के मौसम में बोया जाए, तो इस की तोड़ाई बारिश का मौसम शुरू होने से पहले कर सकते हैं.

उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों में जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो, वहां बसंत के मौसम में मक्के की बोआई की जा सकती है. इन इलाकों में आलू, मटर, तोरिया व गन्ने की फसल के बाद मक्के को आसानी से उगाया जा सकता है. किसान इस से प्राप्त भुट्टों से ज्यादा आय हासिल कर सकते हैं. बसंत के मौसम में 7-9 घंटे तक धूप होने के कारण पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया अच्छी होती है. खरपतवार, कीट, रोग आदि की समस्या भी बसंत के मौसम में कम होती है. बसंत के मौसम में बोए गए मक्के का एक लाभ यह भी है कि कटाई के बाद पौधों से हरा चारा हासिल हो जाता है.

प्रजातियों का चुनाव व बोआई का समय

बसंत के मौसम में मीठे मक्के की प्रजाति का चुनाव बहुत खास है. मीठे मक्के की प्रजातियां प्रिया, माधुरी व शुगर 75 हैं.

इन प्रजातियों में शुक्रोस की मात्रा बहुत अधिक होती है और ये खाने में बहुत मीठी होती हैं.

संकुल प्रजातियों जैसे प्रगति, कंचन, श्वेता को भी हरे भुट्टे के लिए उगा सकते हैं, पर इन में मिठास की मात्रा कम होती है.

बसंत के मौसम में बोआई देर से करने पर तापमान ज्यादा होने के कारण अंकुरण कम होता है और पौधों की बढ़वार रुक जाती है, जिस से उपज घट जाती है. जल्दी बोआई करने पर तापमान कम होता है, जिस कारण अंकुरण कम होता है और पौधों की वृद्धि भी कम होती है. लिहाजा बसंत के मौसम में बोआई सही समय पर करनी चाहिए. बसंत के मौसम में मक्के की बोआई का सही समय फरवरी के दूसरे पखवारे से ले कर मार्च के पहले हफ्ते तक होता है.

  बीज की मात्रा, उपचार व बोआई की विधि

मीठे मक्के का बीज छोटा व सिकुड़ा होता है, जिस कारण इस का भार भी कम होता है. लिहाजा मीठे मक्के की बीज दर सामान्य मक्के की तुलना में काफी कम होती है. 1 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 10 से 12 किलोग्राम बीज काफी होता है. यदि संकुल प्रजातियों को हरे भुट्टे के लिए उगाया जा रहा हो तो 18 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से लगता है.

मिट्टी से होने वाले रोगों से बचाव के लिए बीजों को थीरम या कारर्बेंडाजिम से 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करना चाहिए. ज्वार की प्ररोह मक्खी के प्रकोप से बचाने के लिए बीजों को 5 मिलीलीटर इमेडाक्लोप्रिड से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोएं.

किसान मक्के की बोआई बिखेर कर करते हैं, पर इस से कम उपज हासिल होती है. लिहाजा बोआई लाइनों में ही करनी चाहिए. लाइनों के बीच की दूरी 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 20 से 25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. इस तरह बोआई करने से 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल से 66000 से 83000 पौधे प्राप्त हो जाते हैं. बीजों को 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए.

मीठा मक्का (Sweet Corn)

खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार नियंत्रण न करने की स्थिति में उपज में काफी कमी हो जाती है. खरपतवार  नियंत्रण के लिए फसल में कम से कम 2 बार निराईगुड़ाई (पहली बोआई के 25 से 30 दिनों बाद व दूसरी 45-50 दिनों बाद) करनी चाहिए. रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए बोआई के 2-3 दिनों के अंदर एट्राजीन 1.0-1.5 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लीटर पानी में मिला कर खेत में छिड़कना चाहिए. एट्राजीन दवा न होने पर पैंडीमैथालीन को 3.33 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के 2-3 दिनों में छिड़कें. छिड़काव के समय मिट्टी में सही नमी होनी चाहिए. संभव हो तो छिड़काव शाम के वक्त करना चाहिए. छिड़काव के बाद खेत में आनाजाना नहीं चाहिए वरना दवा का असर कम हो जाता है. रसायनों का इस्तेमाल करने के बाद मक्के में निराई की जरूरत नहीं होती है, क्योंकि इन रसायनों का असर काफी समय तक रहता है. यदि खेत में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का प्रकोप ज्यादा हो तो 2, 4 डी ईथाइल एस्टर की 2.65 किलोग्राम मात्रा या 2, 4 डी एमिन साल्ट की 860 ग्राम मात्रा को बोआई के 30-35 दिनों बाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. लेकिन इन दवाओं का इस्तेमाल लाइनों के बीच में करें. मक्के के पौधों पर इन दवाओं का उलटा असर पड़ता है, लिहाजा इन के छिड़काव के समय स्प्रेयर में हुड लगाएं और सावधानी बरतें वरना लाभ के बजाय नुकसान हो सकता है.

सिंचाई

बसंत के मौसम में मक्के की सफलता काफी हद तक सिंचाई पर निर्भर करती है. उस दौरान 5-6 सिंचाई की जरूरत होती है. यदि समयसमय पर बारिश हो जाए तो सिंचाई की जरूरत कम होती है. लेकिन फसल के दौरान बारिश कम हो तो सिंचाई करनी पड़ती है. सिंचाई पूरे खेत में समान रूप से हो, इस के लिए खेत को बोआई से पहले समतल करना जरूरी है वरना सिंचाई के समय खेत के कुछ भाग सूखे रह जाते हैं और कुछ भागों में पानी भर जाता है. खेत को समतल बनाने से सिंचाई पूरे खेत में अच्छे ढंग से होती है और फसल पानी को बेहतर ढंग से इस्तेमाल करती है.

बोआई के 20-25 दिनों बाद, फिर 20-25 दिनों के अंतराल पर, पौधों के घुटने तक पहुंचने की अवस्था में, फिर नर मंजरी निकलते समय, फिर भुट्टा निकलते समय और दानों में दूध पड़ते समय सिंचाई करनी चाहिए. अगर बोआई के समय मिट्टी में नमी कम हो तो पलेवा कर के बोआई करनी चाहिए वरना बीजों के अंकुरण पर असर पड़ता है.

यदि बोआई मेंड़ों पर की जाए तो सिंचाई करने में सुविधा होती है और पानी भी कम लगता है. लिहाजा कोशिश यही करनी चाहिए कि बोआई मेंड़ों पर करें. मेंड़ों के बीच बनी नालियों का इस्तेमाल सिंचाई के साथसाथ जल निकासी के लिए भी कर सकते हैं.

यदि बोआई मेंड़ बना कर करना मुमकिन न हो तो समतल खेत में लाइनों में बोआई करने के 25-30 दिनों बाद पौधों पर दोनों ओर से मिट्टी चढ़ा दें. इस से बीच में नालियां बन जाएंगी. इन नालियों में सिंचाई करने से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है, साथ ही साथ पानी का भी पूरा इस्तेमाल होता है. सिंचाई के समय खेत में 5-6 सेंटीमीटर (करीब 2 इंच) की गहराई तक पानी लगाएं. ज्यादा गहराई तक पानी लगाने से खेत में पानी भरने का खतरा रहता है, जिस का फसल की बढ़वार व उपज पर उलटा असर पड़ता है. यदि बोआई मेंड़ों पर की गई है, तब सिंचाई करते समय लाइनों के बीच बनी नालियों को पूरा भरने की जरूरत नहीं होती है. पानी मेंड़ की ऊंचाई के 2 तिहाई भाग तक लगाएं. सिंचाई समय से न करने से मिट्टी में नमी की कमी आ जाती है और पत्तियां मुरझा कर मुड़ने लगती है. अकसर पानी की कमी होने पर पूरा पौधा सूख जाता है.

जलनिकास

जल भराव की हालत में मक्के की फसल तबाह हो जाती है, लिहाजा खेत में जल निकास का सही इंतजाम होना चाहिए. इस के लिए खेत को ठीक से समतल कर लेना चाहिए और खेत के बीचबीच में नालियां बनानी चाहिए ताकि फालतू पानी को बाहर निकाला जा सके.

मक्के को मेंड़ों पर बोना चाहिए और मेंड़ों के बीच बनी नालियों का इस्तेमाल जल निकास के लिए करना चाहिए. मक्के को कभी भी निचले खेतों में जहां जल भराव की समस्या हो नहीं बोना चाहिए.

मीठा मक्का (Sweet Corn)

उर्वरकों की मात्रा

उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी की जांच के आधार पर करना चाहिए. वैसे बसंत के मक्के के लिए आमतौर पर 5 से 10 टन गोबर की खाद, 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश व 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. सड़ी हुई गोबर की खाद को बोआई से 10 से 15 दिन पहले खेत में डाल कर मिट्टी में मिला देना चाहिए.

फास्फोरस, पोटाश व जिंक की पूरी मात्रा बोआई के समय कूड़ों में इस्तेमाल करनी चाहिए. नाइट्रोजन की 10 फीसदी मात्रा बोआई के समय, 20 फीसदी मात्रा जब पौधों में 4 पत्तियां आ जाएं, 30 फीसदी मात्रा जब पौधे में 8 पत्तियां आ जाएं, 30 फीसदी मात्रा नरमंजरी निकलते समय और 10 फीसदी मात्रा दानों के भरने की अवस्था में इस्तेमाल करनी चाहिए. ऐसा करने से उपज में काफी इजाफा होता है.

कीट नियंत्रण

बसंत के मौसम में कीटों का प्रकोप कम होता है, फिर भी निम्नलिखित कीट फसल को नुकसान पहुंचाते हैं:

ज्वार की प्ररोह मक्खी : इस कीट का प्रकोप बसंत के मौसम में बहुत ज्यादा होता है. इस कीट की सूंडि़यां फसल की शुरुआती अवस्था में हमला करती हैं, इस कारण पौधे सूख जाते हैं. इस कीट से बचाव के लिए बोआई के समय मिट्टी में कार्बोफ्यूरान 3 जी को 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाएं. बीजों को इमिडाक्लोप्रिड से 5 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज दर से उपचारित कर के बोएं.

तना भेदक : इस कीट की सूंडि़यां तनों में छेद कर के उन्हें अंदर ही अंदर खाती रहती हैं, जिस के कारण पूरा पौधा सूख जाता है. इस की रोकथाम के लिए जमाव के 2 से 3 हफ्ते बाद क्वीनालफास 25 ईसी का 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें या प्रभावित पौधों में कार्बोफ्यूरान 3 जी की कणिकाएं गोफ में डालें जिस से कीट की आने वाली पीढ़ी को रोक कर अन्य स्वस्थ्य पौधों को बचाया जा सके.

गुलाबी तना बेधक : इस का लारवा गुलाबी रंग का होता है. यह तना बेधक की तरह नुकसान पहुंचाता है. इस की रोकथाम भी तना बेधक की तरह ही जाती है.

कटुआ : इस का लारवा मटमैले रंग का होता है. दिन के समय यह मिट्टी में छिपा रहता है और रात में पौधों को जड़ के पास से काट देता है. इस की रोकथाम के लिए कार्बाक्यूरान 3 फीसदी की कणिकाओं को 15-20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए.

रोग नियंत्रण

बसंत के मौसम में रोगों का प्रकोप कम होता है. कभीकभी पत्ती झुलसा और रतुआ रोग फसल में लग जाते हैं. इन रोगों की रोकथाम के लिए मैंकोजेब की 2 किलोग्राम मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से 3-4 बार 15-20 दिनों के अंतर पर छिड़काव करने चाहिए.

तोड़ाई

हरे भुट्टे की तोड़ाई भुट्टे निकलने के 20 से 25 दिनों बाद करनी चाहिए. इस अवस्था में दानों में दूध भरा रहता है और दाने खाने में मुलायम रहते हैं. कभी भी पके हुए दानों की अवस्था में तोड़ाई नहीं करनी चाहिए, ऐसे दाने कठोर हो जाते हैं और खाने में स्वादिष्ठ नहीं होते हैं.

उपज

आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों को अपना कर बसंत के मौसम में भुट्टों की 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज हासिल की जा सकती है. बाजार में प्रचलित मूल्य के आधार पर प्रति हेक्टेयर 1 लाख रुपए तक का फायदा हासिल किया जा सकता है.

मक्का है मेवाड़ के लिए खास 

उदयपुर : कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि मेवाड़ के लिए मक्का बहुत खास फसल है. वैसे भी यहां कहावत है, ’गेहूं छोड़ ’न मक्का खाणो – मेवाड़ छोड़ न कठैई नी जाणों’. मक्का कभी अनाज और चारे के लिए बोया जाता था, लेकिन अनुसंधान और कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों की बदौलत मक्का से पोपकौर्न, बेबीकौर्न, जर्म औयल (मक्का का तेल), जिस में एंटीऔक्सीडेंट भरपूर मात्रा उपलब्ध है. यही नहीं, मक्का से स्टार्च के बाद इथेनाल उत्पादन भी संभव है, जिसे भविष्य में पैट्रोल के विकल्प के रूप में अपनाया जा सकता है.

उन्होंने आश्वस्त किया कि ग्रीन फ्यूल की दिशा में एपपीयूएटी हर संभव मदद करेगा. कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि साल 1955 में स्थापित राजस्थान कृषि महाविद्यालय कोई छोटामोटा कालेज नहीं है, बल्कि देश का दूसरा कृषि विश्वविद्यालय है.

उन्होंने आगे कहा कि एमपीयूएटी ने हाल ही प्रताप-6 संकर मक्का बीज पैदा किया है, जिस का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 65 क्विंटल है. कृषि राज्यमंत्री भागीरथ चौधरी की मंशानुरूप इस बीज के प्रयोग से मक्का का क्षेत्रफल बढ़ाने की जरूरत नहीं है, बल्कि उत्पादन दोगुना हो सकता है.

देश का पहला प्राकृतिक खेती का सैंटर भी इस विश्वविद्यालय के अधीन भीलवाड़ा में कार्यरत है. डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि एमपीयूएटी के अंतर्गत 8 कृषि विज्ञान केंद्र हैं, जबकि 9वां कृषि विज्ञान केंद्र विद्याभवन में चल रहा है, लेकिन वह भी इसी विश्वविद्यालय का अहम हिस्सा है.

उन्होंने बताया कि एमपीयूएटी ने वर्ष 2024 में 24 पेटेंट प्राप्त किए. यह पेटेंट किसी सिफारिश से नहीं, बल्कि भारत सरकार के कठिन नियमशर्तों पर खरे उतरने पर मिले. मिलेट्स की दिशा में भी एमपीयूएटी ने सराहनीय काम किए. अब जरूरत है तकनीक को विश्वविद्यालय हित में मोनीटाइजेशन किया जाए.

आंरभ में पूर्व छात्र परिषद के संरक्षक डा. आरबी दुबे ने बताया कि जुलाई, 1955 में स्थापित राजस्थान कृषि महाविद्यालय से अब तक 4,441 छात्रछात्राएं स्नातकोत्तर, 3013 स्नातक, जबकि 883 विद्यार्थी पीएचडी डिगरी प्राप्त कर चुके हैं. विगत 5 सालों में 915 विद्यार्थियों का देशविदेश में विभिन्न सेवाओं में चयन हुआ है.

पूर्व छात्र डा. लक्ष्मण सिंह राठौड़, पूर्व कुलपति उमाशंकर शर्मा के अलावा पूर्व छात्र परिषद के पदाधिकारी डा. आरबी दुबे, डा. एनस बारहट, डा. जेएल चौधरी, डा. दीपांकर चक्रवर्ती, डा. सिद्धार्थ मिश्रा आदि ने अतिथियों को साफा, पुष्पगुच्छ, स्मृति चिन्ह दे कर सम्मानित किया.

समारोह में पूर्व छात्र परिषद की ओर से 30 से ज्यादा छात्रछात्राओं, शिक्षकों, किसानों को सम्मानित किया गया. सम्मानित होने वाले प्रमुख नाम किसान राधेश्याम कीर, रमेश कुमार डामोर, डा. केडी आमेटा, डा. एस. रमेश बाबू, रजनीकांत शर्मा, डा. भावेंद्र तिवारी, वर्षा मेनारिया व अमीषा बेसरवाल आदि हैं.

कालेज के गलियारों में खूब की हंसीठिठोली, राष्ट्रीय सम्मेलन में शरीक हुए 500 से ज्यादा विद्यार्थी

जीवन के उत्तरार्द्ध में डग भर रहे सैकड़ों पूर्व कृषि छात्रों ने पिछले दिनों एकदूसरे को गले लगा कर न केवल पुरानी यादों को ताजा किया, बल्कि भूलेबिसरे किस्सों को याद करते हुए खूब अट्ट़हास किए. मौका था- राजस्थान कृषि महाविद्यालय पूर्व छात्र परिषद के 23वें राष्ट्रीय सम्मेलन का. पूर्व छात्रों के सम्मेलन में देशविदेश के 500 से ज्यादा छात्र शामिल हुए.

पूर्व छात्रों ने महाविद्यालय के गलियारों में घूमते हुए कालेज के दिनों की यादों को ताजा किया. साथ ही, एकदूसरे से जुड़ने, मोबाइल नंबर लेतेदेते हुए भविष्य में नित्य एकदूसरे से बतियाने का वादा किया.

उल्लेखनीय है कि इस महाविद्यालय ने विश्वस्तरीय वैज्ञानिक दिए हैं. पद्मश्री डा. आरएस परोदा, डा. एसएल मेहता, डा. पीके दशोरा, डा. लक्ष्मण सिंह राठौड़, डा. भागीरथ चौधरी जैसे अनेकानेक नाम हैं, जिन्होंने देशविदेश में नाम किया.

इस मौके पर पूर्व छात्र परिषद के अध्यक्ष डा. नरेंद्र सिंह बारहठ ने कहा कि परिषद की ओर से अगले वर्ष से प्रतिभावन छात्रछात्राओं को 6 स्कौलरशिप प्रदान की जाएगी. उन्होंने बताया कि पूर्व छात्र परिषद को निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) वाला बनाने के प्रयास होंगे. इस के अलावा परिषद के तत्वावधान में प्रति वर्ष पूर्व छात्रों की क्रिकेट प्रतियोगिता आयोजित होगी.

इस मौके पर परिषद की ओर से पूर्व छात्रों के लिए अतिथिगृह बनाने की पेशकश की गई. साथ ही, इस के लिए कुलपति से जमीन उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया. अतिथिगृह बनाने के लिए प्रयोग पूर्व छात्र ने अपने जन्मदिन पर एक हजार रुपए देने की घोषणा की.

कालेज के पूर्व छात्र रहे डा. डीपी शर्मा की स्मृति में उन की बहन हेमलता ने परिषद को 2 लाख रुपए भेंट किए. स्वर्ण जयंती की दहलीज पर पहुंच चुके राजस्थान कृषि महाविद्यालय की नींव जुलाई, 1955 में डा. ए. राठौड़ ने रखी. आरंभ में अतिथियों ने पूर्व छात्र परिषद की स्मारिका का विमोचन भी किया गया.

मक्का (Maize) के पौष्टिक लाजवाब स्वाद

मक्का की खेती मोटे अनाज के रूप में की जाती है. पैदावार के मामले में गेहूं और धान के बाद मक्का विश्व में तीसरे नंबर पर है. हमारे यहां मक्का का ज्यादातर इस्तेमाल रोटी बनाने, भुट्टा, सत्तू, दलिया आदि के रूप में किया जाता है. अब मक्का की कुछ प्रजातियों को विकसित कर के बेबीकौर्न का रूप दे दिया गया है. इस का इस्तेमाल बड़े शहरों में अनेक व्यंजनों में किया जाने लगा है.

वैज्ञानिकों द्वारा विकसित क्वालिटी प्रोटीन मक्का में कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिन और खनिज होते हैं जो सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं.

कुछ लोग तो मक्का को किसी न किसी रूप में बड़े चाव से खाते हैं लेकिन कुछ शहरी लोग ऐसे भी हैं जो इसे खाना कम पसंद करते हैं. परंतु मक्का के बने व्यंजनों को बड़े ही चाव से खाते हैं.

जिस तरह से ज्वारबाजरे से अनेक व्यंजन बनाए जाते हैं उसी तरह मक्का से भी अनेक तरह के पौष्टिक उम्दा क्वालिटी के व्यंजन बनाए जा सकते हैं.

मक्का की मट्ठी

मट्ठी को आमतौर पर गेहूं की मैदा से बनाया जाता है लेकिन यहां हम मक्का के आटे से मट्ठी बनाने के बारे में जानकारी दे रहे हैं.

जरूरी सामान : मट्ठी बनाने के लिए मक्का का आटा 300 ग्राम, गेहूं की मैदा 200 ग्राम, देशी घी 100 ग्राम. अजवायन 1 से 2 चम्मच और नमक स्वादानुसार रखें.

तरीका : आटा व मैदा छान लें. उस में नमक, घी, अजवायन मिला कर सख्त गूंदें, उस के बाद उस आटे की छोटीछोटी लोइयां बना कर मट्ठी के आकार में बेल लें और सुनहरा होने तक घी में तल लें. इन्हें आप कई दिनों तक इस्तेमाल कर सकते हैं.

 

नमकीन सेव

मक्का के आटे से नमकीन सेव बनाने के लिए मक्का का आटा 300 ग्राम, बेसन 200 ग्राम, अजवायन 1 से 2 चम्मच,  लाल मिर्च पाउडर, नमक स्वादानुसार और तेल.

तरीका : मक्का का आटा, बेसन, नमक, मिर्च, अजवायन और थोड़ा तेल मिला कर आटा गूंद लें और फिर मशीन की सहायता से सेव बनाते हुए सीधा गरम तेल में डालें. फिर उन्हें तल लें. आप का नमकीन सेव तैयार है.

मक्का (Maize)

इसी तरह से मक्का के आटे से दूसरे व्यंजन भी बनाए जा सकते हैं जैसे लड्डू बनाना. इस के लिए मक्का के आटे में उस की आधी मात्रा में बेसन भी लें और दोनों को हलकी आंच पर भून लें. लड्डू में अन्य सामग्री जैसे मूंगफली, तिल, नारियल आदि डालना चाहें तो डाल सकते हैं. इन सब सामान को थोड़ा दरदरा पीसें या मोटा रखें. सभी को अच्छी तरह मिला लें और अंत में बूरा व देशी घी मिला कर लड्डू बना लें.

मक्का से इसी तरह अनेक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं. मक्का या अन्य अनाजों से व्यंजन बनाने की ट्रेनिंग आप चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के खाद्य एवं पोषक विभाग, गृह विज्ञान महाविद्यालय, हिसार से ले सकते हैं. ट्रेनिंग ले कर आप अपने इस काम को रोजगार का जरीया भी बना सकते हैं.

किसानों को मालामाल करेगी बेबीकौर्न (Babycorn) की खेती

मक्के की एक ऐसी किस्म है जिसे बेबीकौर्न नाम से जाना जा रहा है. इस की खूबी यह है कि यह कम समय में तैयार हो जाती है इसलिए पिछले कुछ सालों से किसानों का रुझान बेबीकौर्न की खेती की तरफ तेजी से बढ़ा है.

बेबीकौर्न की बोआई पूरे साल किसी भी महीने में की जा सकती है. इस समय रबी फसल कट चुकी है. अगर किसान बेबीकौर्न बोएं तो कम समय में ही इस से मुनाफा कमा कर दूसरी फसलें भी बो सकते हैं.

ध्यान दें कि इस की एकसाथ पूरे खेत में बोआई नहीं करनी चाहिए. इसे 10-10 दिन के अंतराल में खेत के कुछ हिस्सों में बोना चाहिए, क्योंकि अगर किसान एकसाथ पूरे खेत में बोआई करता है तो पूरी फसल एकसाथ तैयार हो जाती है.

एक तरफ जहां इस की फसल से किसानों की भुट्टे बेच कर आमदनी होगी, वहीं बेबीकौर्न के डंठल और पत्ते से किसान आमदनी कर सकते हैं, क्योंकि इन के पत्ते और डंठलों में भरपूर मात्रा में पोषक तत्त्व मौजूद होते हैं, जो जानवरों के लिए फायदेमंद होते हैं. जानवरों के लिए सालभर चारा मुहैया हो सकेगा.

बेबीकौर्न की खेती के बारे में भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान के कृषि वैज्ञानिक डाक्टर योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘‘यह एक ऐसी फसल है जो हर मौसम में उगाई जा सकती है. इसे साल में 3 बार उगा सकते हैं. एक हेक्टेयर में 40 से 50 हजार रुपए तक का मुनाफा होता है.’’

बेबीकौर्न उत्पादन का शोध सब से पहले साल 1993 में मक्का अनुसंधान निदेशालय द्वारा हिमाचल प्रदेश, कृषि विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, बजौरा (कुल्लू घाटी) में शुरू हुआ था. तभी से बेबीकौर्न के रूप में मक्के की खेती का प्रचलन बढ़ता जा रहा है. उत्तर भारत में दिसंबर, जनवरी को छोड़ कर पूरे साल बेबीकौर्न की खेती की जा सकती है.

उन्नत बीज

बीज जितना उन्नत किस्म का होगा, उत्पादन भी उसी अनुपात में होगा इसलिए बोआई से पहले इस बात पर ध्यान दें कि कौन सी किस्म से कम समय में ज्यादा उत्पादन होगा.

किसानों को मध्यम ऊंचाई की जल्दी तैयार होने वाली किस्म और एकल क्रौस संकर को चुनना चाहिए. संकर बीएल, संकर एमईएच 133, संकर एमईएच 114 और अर्ली कंपोजिट बेबीकौर्न की उन्नत किस्में होती हैं.

खेत तैयार करना

चूंकि बेबीकौर्न की बोआई एकसाथ पूरे खेत में नहीं करनी चाहिए, वरना बाजार में सही कीमत नहीं मिल पाती इसलिए खेत के कुछ हिस्सों को एक मेंड़ बना कर अलग कर लें और इस की चौड़ाई एक फुट रखें.

बोने से पहले खेतों में 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस व 40 किलोग्राम पोटाश का छिड़काव करें. मेंड़ पर बोने से पानी कम लगता है और पैदावार अच्छी होती है.

सिंचाई

पहली सिंचाई बेबीकौर्न बोने से पहले करें, क्योंकि बीज अंकुरण के लिए सही नमी होना जरूरी होता है. बोआई के 15-20 दिन बाद मौसम के मुताबिक जब पौधे 10-12 सैंटीमीटर के हो जाएं तो दूसरी सिंचाई करनी चाहिए. उस के बाद 8-10 दिन के अंतराल पर ग्रीष्मकालीन फसल में पानी देते रहना चाहिए.

खरपतवार पर नियंत्रण

इस मौसम में बोई गई फसल में खरपतवार या जंगली घास उग जाती हैं, इन्हें निकालना जरूरी होता है. इन्हें निकालने के लिए खुरपी से 2-3 गुड़ाई करें. साथ ही, हलकीहलकी मिट्टी भी पौधों पर चढ़ा दें, जिस से पौधे हवा से गिरें नहीं.

बेबीकौर्न के साथ किसान दूसरी फसलें भी लगा सकते हैं. इस से एकसाथ उन्हें दोगुना फायदा हो जाता है. अभी किसान बेबीकौर्न के साथ लोबिया, उड़द, मूंग जैसी फसलें लगा सकते हैं.

तुड़ाई : बेबीकौर्न के भुट्टे को 1 से 3 सैंटीमीटर सिल्क आने पर तोड़ लेना चाहिए. भुट्टा तोड़ते समय उस के ऊपर की पत्तियों को नहीं हटाना चाहिए, क्योंकि ज्यादा गरमी की वजह से भुट्टे जल्दी खराब हो सकते हैं. अगर वे पत्तियों से ढके रहेंगे तो भुट्टे ज्यादा दिनों तक अच्छे बने रहेंगे.

मक्के (Maize) की आधुनिक खेती

मक्का दुनिया की खास खाद्यान्न फसल है. विश्व में सकल खाद्यान्न उत्पादन में इस का 25 फीसदी योगदान है और खाद्यान्न फसलों में मक्के का तीसरा स्थान है. संसार की तकरीबन सभी तरह की जलवायु में मक्के की खेती की जा सकती है. हर जलवायु की अपनी खासीयतें हैं, जो मक्के की विभिन्न प्रकार की किस्मों के लिए मुनासिब हैं.

मक्के की अहमियत

* मुरगी व पशुओं के आहार का करीब 60-65 फीसदी भाग मक्का होता है. इसे पौष्टिक हरे चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है.

* मक्के की स्वादिष्ठ रोटी बनती है और इस का भुट्टा भून कर खाया जाता है. इसे पौपकार्न व कार्नफ्लैक्स के रूप में भी खाया जाता है.

* प्रोटीनेक्स, चाकलेट, पेंट, स्याही, लोशन व कार्न सिरप वगैरह बनाने में मक्के का इस्तेमाल किया जाता है.

* इसे बेबीकार्न के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है.

मक्के (Maize)

बीज की मात्रा व बोआई

संकुल मक्के की खेती के लिए 20-25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. संकर मक्के की खेती के लिए 18-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. मक्के की बोआई देशी हल के जरीए 3-4 सैंटीमीटर गहराई पर लाइन से लाइन की दूरी 60 सैंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 30 सैंटीमीटर रखते हुए करें. मक्के की बोआई जून के अंत तक या जुलाई के पहले पखवाड़े तक कर लेनी चाहिए.

बोआई से पहले बीजों को 2.5 ग्राम थीरम व 2 ग्राम कार्बंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें.

दीमक से बचाव के लिए बीजों को 15-20 मिलिलीटर क्लोरोपाइरीफास से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. इस के अलावा बीजों को एजोटोवेक्टर व पीएसवी की 250 ग्राम मात्रा से प्रति 10 किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें.

उर्वरकों का इस्तेमाल

मक्के की भरपूर पैदावार के लिए जीवांश खादों के साथसाथ संतुलित उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी की जांच के आधार पर करना चाहिए. यदि किसी वजह से मिट्टी की जांच न हुई हो तो दी गई तालिका के मुताबिक उर्वरकों की मात्रा देनी चाहिए.

नाइट्रोजन की आधा मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा कूंड़ों में बीजों के नीचे डालनी चाहिए. जिंक की पूरी मात्रा अंतिम जुताई के समय खेत में मिला देनी चाहिए. बची नाइट्रोजन की आधी मात्रा टापड्रेसिंग के रूप में बोआई के 30-35 दिनों बाद (जब पौधे तकरीबन घुटने की ऊंचाई तक हो जाएं) दें और बाकी आधी मात्रा टापड्रेसिंग नरमंजरी निकलते समय करें.

सिंचाई

पौधों की शुरुआती अवस्था और दाना पड़ने की अवस्था में सही नमी होना जरूरी है. लिहाजा, उस दौरान सिंचाई का पूरा खयाल रखें. साथ ही साथ जल निकासी का इंतजाम होना भी जरूरी है.

खरपतवारों की रोकथाम

खरपतवारों की वजह से उपज में 40-45 फीसदी की कमी हो जाती है. इस के अलावा कीटों व बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है. लिहाजा, जमाव के 35-40 दिनों बाद निराईगुड़ाई करना जरूरी है. मक्के में एट्राजीन 1.5 किलोग्राम घुलनशील पाउडर को 800-1000 लिटर पानी में घोल कर बोआई के दूसरे दिन तक अंकुरण से पहले छिड़काव करने से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार नष्ट हो जाते हैं.

इस के अलावा एलाक्लोर 50 ईसी का 4.5 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से अंकुरण से पहले छिड़काव करना चाहिए. यदि मक्के के बाद आलू की खेती करनी हो तो एट्राजीन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. सहफसली मक्के में खरपतवारों की रोकथाम के लिए पेंडीमिथेलीन 30 ईसी की 3 लिटर मात्रा 800-1000 लिटर पानी में घोल कर बोआई के तुरंत बाद छिड़काव करना चाहिए.

खास कीड़े

तना छेदक : इस कीट की सूंडि़यां तनों में छेद कर के उन्हें अंदर से खाती रहती हैं, जिस से वे कमजोर हो जाते हैं और हवा चलने पर पौधे टूट जाते हैं.

इस की रोकथाम के लिए बोआई के 20-25 दिन बाद कार्बोफ्यूरान 3 फीसदी दानेदार की 20-25 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें और बोआई के 3 व 7 हफ्ते बाद कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर की 2.5 किलोग्राम मात्रा या इंडोसल्फान 35 ईसी की 1.5 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

पत्ती लपेटक : इस कीट की सूंडि़यां पत्ती के दोनों किनारों को रेशम जैसे सूत से लपेट कर अंदर से खाती हैं. इस की रोकथाम के लिए क्यूनालफास 25 ईसी की 2 लिटर मात्रा या इंडोसल्फान 35 ईसी की 1.5 लिटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

टिड्डा : इस कीट के शिशु व वयस्क दोनों पत्तियों को खा कर हानि पहुंचाते हैं. इन की रोकथाम के लिए मिथाइल पैराथियान 2 फीसदी की 20-25 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करना चाहिए.

कमला कीट : इस कीट की गिड़ारें पत्तियों को बहुत तेजी से खाती हैं और फसल को काफी नुकसान पहुंचाती हैं. इस की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान 4 फीसदी पाउडर की 20 किलोग्राम मात्रा या डाईक्कोटोवास 70 ईसी की 650 मिलीलिटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करनी चाहिए.

खास बीमारियां

पत्तियों का झुलसा रोग : इस रोग से पत्तियों पर लंबे नाव के आकार के भूरे धब्बे बन जाते हैं. रोग नीचे की पत्तियों से बढ़ कर ऊपर की पत्तियों तक पहुंच जाता है. इस की रोकथाम के लिए मैंकोजेब व कार्बंडाजिम के 2:1 के अनुपात में बनाए गए मिश्रण की 2 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. जरूरत के मुताबिक 15-20 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें.

तना सड़न : पौधे की निचली गांठ से इस रोग का संक्रमण शुरू होता है और तना सड़ने लगता है. पौधे के सड़े भाग से बदबू आने लगती है. पौधे की पत्तियां पीली हो कर सूख जाती हैं. बाद में पौधा कमजोर हो कर गिर जाता है. इस की रोकथाम के लिए 12 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन व 500 ग्राम कापर आक्साइड क्लोराइड का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

मक्का के पौष्टिक लाजवाब स्वाद

हमारे यहां मक्का का ज्यादातर इस्तेमाल रोटी बनाने, भुट्टा, सत्तू, दलिया आदि के रूप में किया जाता है. अब मक्का की कुछ प्रजातियों को विकसित कर के बेबीकौर्न का रूप दे दिया गया है. इस का इस्तेमाल बड़े शहरों में अनेक व्यंजनों में किया जाने लगा है.

वैज्ञानिकों द्वारा विकसित क्वालिटी प्रोटीन मक्का में कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिन और खनिज होते हैं, जो सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं.

कुछ लोग तो मक्का को किसी न किसी रूप में बड़े चाव से खाते हैं, लेकिन कुछ शहरी लोग ऐसे भी हैं, जो इसे खाना कम पसंद करते हैं. पर मक्का के बने व्यंजनों को बड़े ही चाव से खाते हैं.

मक्का की मट्ठी

मट्ठी को आमतौर पर गेहूं की मैदा से बनाया जाता है लेकिन यहां हम मक्का के आटे से मट्ठी बनाने के बारे में जानकारी दे रहे हैं.

जरूरी सामान : मट्ठी बनाने के लिए मक्का का आटा 300 ग्राम, गेहूं की मैदा 200 ग्राम, देशी घी 100 ग्राम, अजवायन 1 से 2 चम्मच और नमक स्वादानुसार रखें.

बनाने का तरीका : आटा व मैदा छान लें. उस में नमक, घी, अजवायन मिला कर सख्त गूंदें, उस के बाद उस आटे की छोटीछोटी लोइयां बना कर मट्ठी के आकार में बेल लें और सुनहरा होने तक घी में तल लें. इन्हें आप कई दिनों तक इस्तेमाल कर सकते हैं.

नमकीन सेव

मक्का के आटे से नमकीन सेव बनाने के लिए

मक्का का आटा  – 300 ग्राम
बेसन  – 200 ग्राम
अजवायन – 1 से 2 चम्मच
लाल मिर्च पाउडर – स्वादानुसार
नमक स्वादानुसार – स्वादानुसार
तेल – स्वादानुसार

बनाने का तरीका : मक्का का आटा, बेसन, नमक, मिर्च, अजवायन और थोड़ा तेल मिला कर आटा गूंद लें और फिर मशीन की मदद से सेव बनाते हुए सीधा गरम तेल में डालें, फिर उन्हें तल लें. आप के नमकीन सेव तैयार हैं.

इसी तरह से मक्का के आटे से दूसरे व्यंजन भी बनाए जा सकते हैं जैसे लड्डू बनाना. इस के लिए मक्का के आटे में उस की आधी मात्रा में बेसन भी लें और दोनों को हलकी आंच पर भून लें.

इसी तरह से लड्डू में दूसरी सामग्री जैसे मूंगफली, तिल, नारियल आदि डालना चाहें तो डाल सकते हैं. इन सब सामान को थोड़ा दरदरा पीसें या मोटा रखें. सभी को अच्छी तरह मिला लें और आखिर में बूरा व देशी घी मिला कर लड्डू बना लें.

मक्का से इसी तरह के अनेक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं. मक्का या दूसरे अनाजों से व्यंजन बनाने की ट्रेनिंग आप चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के खाद्य एवं पोषक विभाग, गृह विज्ञान महाविद्यालय, हिसार से ले सकते हैं. ट्रेनिंग ले कर आप इस काम को अपने रोजगार का जरीया भी बना सकते हैं.