Leafy Vegetable : पोई की खेती : पत्तेदार पौष्टिक सब्जी

Leafy Vegetable: पोई एक प्रकार का साग है, जो मालाबार स्पिनच के नाम से भी जाना जाता है. पोई को साग, सब्जी या अचार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. पोई में आयरन, कैल्शियम और विटामिन सी जैसे पोषक तत्व होते हैं, जो सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं. इस की वैज्ञानिक खेती के लिए कम तापमान पर सितंबर से जनवरी के बीच रोपाई करना सब से अच्छा होता है.

खेत की मिट्टी और तैयारी – पोई की खेती के लिए दोमट या बलुई मिट्टी अच्छी होती है. जिस का पीएच मान 6.0 से 6.8 तक हो. जैविक और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी आदर्श मानी जाती है. पोई की रोपाई, खेतों में करने से पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई करें और मिट्टी में सड़े गोबर की खाद, नाडेप या वर्मी कंपोस्ट मिलाएं.

खास प्रजातियां – पोई की दो मुख्य स्थानीय प्रजातियां होती हैं लाल पोई और हरी पोई.

लाल पोई – इसे लाल पोई या लाल पालक के नाम से भी जाना जाता है. इस के तने और पत्तियां लाल रंग की होती हैं और यह हरी पोई की तुलना में थोड़ी अधिक कठोर होती है.

हरी पोई – हरी पोई को हरी पालक के नाम से भी जाना जाता है. इस के तने और पत्तियां हरे रंग की होती हैं और यह लाल पोई की तुलना में थोड़ी अधिक नरम होती है. दोनों तरह की पोई पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं.

उन्नतशील प्रजातियां

काशी पोई –2 : यह एक उच्च उपज देने वाली झाड़ीनुमा जीनोटाइप है, जो 63.5 टन प्रति हेक्टेयर की उपज प्रदान करती है. इस की पहली तुड़ाई, रोपाई के 38-40 दिन बाद शुरू होती है और 20-30 दिनों के अंतराल पर 140-150 दिनों तक जारी रहती है.

काशी पोई-3: यह भी एक उच्च उपज देने वाली किस्म है, जो 61.3 टन प्रति हेक्टेयर की उपज प्रदान करती है. इस की पहली तुड़ाई, रोपाई के 40 दिन बाद शुरू होती है और 20-25 दिनों के अंतराल पर 240-250 दिनों तक जारी रहती है. काशी पोई-3 की बोआई, रोपाई से तकरीबन 40 दिन पहले प्लग ट्रे में करनी चाहिए.

बोआई का समय

पोई की बोआई सितंबर से जनवरी माह के बीच करनी चाहिए.

बीज की मात्रा व बोआई

पोई को बीज या कटिंग से उगाया जा सकता है. प्रति हेक्टेयर के लिए 6-8 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. पोई के बीजों को पानी में भिगोकर रखने से अंकुरण में तेजी आती है, यदि कटिंग से उगाते हैं, तो 40 से 50 हजार कटिंग की जरूरत होती है. इस के पौधों को लगाने के लिए, पौधे से पौधे की दूरी कम से कम 15-20 सैंटीमीटर और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-40 सैंटीमीटर होनी चाहिए.

अगर बीज से बोआई करनी है, तो बीज को 1-2 सैंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए. इस से पौधे को पर्याप्त धूप और हवा मिलेगी और उन की अच्छी तरह से बढ़वार होगी. छोटे पौधों को अधिक जगह चाहिए ताकि, वे अच्छी तरह से बढ़ सकें. अधिक दूरी से पौधे एकदूसरे को छाया नहीं करेंगे और उन्हें पर्याप्त सूर्य प्रकाश मिलेगा. पंक्ति से पंक्ति की दूरी पौधे की वृद्धि के लिए पर्याप्त जगह सुनिश्चित करती है. इस से निराईगुड़ाई और खाद देना भी आसान हो जाता है.

खाद व उर्वरक का प्रयोग

पोई (मालाबार स्पिनच) की खेती में, मिट्टी को स्वस्थ रखने और फसल को पोषक तत्व देने के लिए उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है. आमतौर पर, जैविक खाद, जैसे गोबर की खाद, और रासायनिक उर्वरक (जैसे यूरिया, डीएपी, और पोटाश) का उपयोग किया जाता है.

उर्वरकों के प्रकार और उपयोग:

जैविक खाद

पोई की खेती के लिए 25-30 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर खेत की तैयारी के समय मिलाई जाती है. यह मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है.

रासायनिक उर्वरक

नाइट्रोजन : यूरिया का उपयोग किया जा सकता है. बोआई के पहले 50 ग्राम यूरिया प्रति गड्ढे में और फिर मई से जुलाई में 80 ग्राम यूरिया प्रति पौधा डाला जा सकता है.

फास्फोरस :  डीएपी (डाई अमोनियम फास्फेट) का उपयोग किया जा सकता है. बोआई के पहले 100 ग्राम डीएपी प्रति गड्ढे में डाला जा सकता है.

पोटाश: म्यूरेट औफ पोटाश का उपयोग किया जा सकता है. बोआई के पहले 80 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश प्रति गड्ढे में डाला जा सकता है.

बीज उपचार : बीज उपचार के लिए राइजोबियम कल्चर का उपयोग किया जा सकता है, जिस से पौधों को नाइट्रोजन प्राप्त करने में मदद मिलती है.

उर्वरक देने का तरीका :

मिट्टी की तैयारी के समय खाद को खेत में मिलाया जाता है. उर्वरक को बीजों के पास या पौधों के पास डाला जाता है, ताकि पौधे को पोषक तत्त्व आसानी से मिल सकें . आवश्यकतानुसार, टौपड्रेसिंग के रूप में उर्वरक को बाद में भी दिया जा सकता है.

सिंचाई : पोई की फसल को 15 दिनों में एक बार पानी देना चाहिए, लेकिन गर्मियों में यह अंतराल 5 से 10 दिन का हो सकता है.

कीटप्रबंधन : जरूरत पड़ने पर जैविक कीटनाशकों का उपयोग करें. नीम औयल का प्रयोग लाभकारी है.

फसल चक्र :

पोई की खेती को अन्य फसलों के साथ फसल चक्र में शामिल करने से मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है.

गमलें में पोई उगाने का तरीका

गमलें या बगीचे में पोई उगाने के लिए गोबर की खाद मिला कर मिट्टी को गमले में भर दें. इस के पौधे की रोपाई के लिए मिट्टी में नमी रहनी चाहिए. पोई को गमले में उगाना आसान है. इस के लिए, गमले में दोमट या बलुई मिट्टी का प्रयोग करें, जिस में गोबर की खाद या कंपोस्ट मिलाया गया हो. सितंबर से जनवरी के बीच रोपाई करें, और नियमित रूप से पानी दें.

गमले को ऐसी जगह रखें जहां उसे धूप मिल सके, लेकिन सीधे धूप से बचाएं.

कटाई : पोई को 2-3 महीने में काटा जा सकता है. पत्तों को धीरेधीरे काट लें और तने को छोड़ दें. उपज 500-600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

लेखक- सेवानिवृत्त प्रोफैसर/वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष हैं. वर्तमान में निदेशक/अध्यक्ष, प्रोफैसर रवि सुमन कृषि एवं ग्रामीण विकास (प्रसार्ड)ट्रस्ट मल्हनी भाटपार रानी देवरिया, उत्तर प्रदेश में कार्यरत.

Millets : मिलेट्स की खेती 

Millets : भारत में सांवा कोदो, कुटकी, रागी, मक्का, बाजरा, ज्वार आदि फसलें पुराने समय से ही उगाई जाती रही हैं. आजकल इसे मोटे अनाज, श्री अन्न या मिलेटस् भी कहते है. मोटा अनाज बहुत पोषक और गुणवत्ता के साथ जलवायु के लिए अनुकूल है और कम पानी में पैदा होने वाली प्रमुख फसलें हैं. 20वीं सदी तक अधिकतर क्षेत्रों में इस की खेती अरहर के साथ मिश्रित रुप से की जाती रही है.

हरित क्रांति के दौर में धीरेधीरे मोटे अनाज की खेती के तरफ से लोगों का रूझान कम होने लगा. ग्रामीण क्षेत्रों में एक कहावत प्रसिद्ध है पूस का रिन्हा, माघ में खाए. अर्थात लाई पूस माह (15 जनवरी) में बनती थी, जो माघ माह (फरवरी )तक खाई जाती थी. ग्रामीण क्षेत्रों में कहावतें प्रसिद्ध हैं – कहावत है जैसा खाओ अन्न, वैसे रहेगा मन. मडुवा मीन, चीना संग दही. कोदो भात दुध संग लही. सब अंनन में मडुवा राजा, जब जब सेको तब तब ताजा. सब अनन में सांवा जेठ, से बसे धाने के हेठ.

मोटे अनाज में सभी तरह के पोषक तत्व मिलते है, इस के खाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है, क्योंकि इस में ज्यादा उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती, कीटनाशकों का प्रयोग भी नाममात्र का होता था. जब से धान गेहूं का दौर चला, उर्वरक, पेस्टीसाइड का अंधाधुंध प्रयोग होने लगा. जिस कारण तरह तरह की बीमारियां भी मानव और पशुओं में होने लगी. जमीन से केंचुआ और मेंढकों की संख्या कम हो गई, पंक्षियों में चिल ,कौवै, गौरैयां और गिद्धों की संख्या में कमी आई है. अब हमें श्री अन्न की खेती पर ध्यान देना होगा. इस की खेती विशेष कर खरीफ मौसम में की जाती है.

जमीन की तैयारी और बोआई : मोटे अनाज की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट भूमि सही रहती है. भूमि को अच्छी तरह से जोत कर समतल बनाना चाहिए. स्वस्थ और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना चाहिए. बीजों को बोआई से पहले उपचारित करना चाहिए ताकि, रोगों और कीटों से बचाव हो सके.

फसल प्रबंधन : उचित मात्रा में खाद और उर्वरकों का उपयोग, समयसमय पर निराईगुड़ाई, और सिंचाई महत्वपूर्ण हैं. श्री अन्न की फसलें ज्यादातर कम पानी में भी अच्छी होती हैं, लेकिन सूखे के समय सिंचाई की आवश्यकता होती है. यह पर्यावरण के अनुकूल फसलें हैं जिन्हें कम पानी और कम उर्वरकों में भी उगाया जा सकता है. मोटे अनाज की खेती में उत्पादन लागत कम लगती है और यह किसानों के लिए आर्थिक दृष्टि से लाभकारी फसलें हैं.

हालांकि, आजकल मोटे अनाज की काफी मांग है फिर भी किसानों को उन की उपज के लिए उचित बाजार उपलब्ध नहीं हैं और उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता. जिस से अनेक किसान चाह कर भी इस की खेती बड़े पैमाने पर नहीं कर रहे हैं.

प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी : इन अनाजों के प्रसंस्करण के लिए आधुनिक सुविधाओं की कमी है. इस के लिए प्रसंस्करण यंत्रों की जरूरत है. जो किसानों की पहुंच में नहीं हैं. भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं और सब्सिडी प्रदान कर रही हैं. किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों के बारे में प्रशिक्षण दिया जा रहा है और विपणन सुविधाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है. फिर भी अभी अनेकों किसानों तक इन सब की पहुंच नहीं है.

पशुओं के लिए लाभकारी : मोटे अनाज का सेवन इंसानों के अलावा पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी है क्योंकि इस में उच्च मात्रा में फाइबर, प्रोटीन और विटामिन होते हैं. आमतौर पर किसानों का रुझान मुख्य रूप से अपनी दैनिक जरूरतों और पशु चारे के लिए ही मोटे अनाज को उगाने की ओर होता है. इस के विपरीत, अगर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर श्री अन्न की खरीद सुनिश्चित करें तो इस का रकबा बढ़ सकता है.

बनाए जा रहे हैं विभिन्न व्यंजन : मोटे अनाज से रोटी, चावल, खीर, पूड़ी, बिस्किट, मिठाई, कौर्न फलेक्स, दलिया, नमकीन, टिक्की, मटरी, केक आदि विभिन्न व्यंजन बनाएं जा रहे हैं जो स्वादिष्ट होने के साथसाथ सेहत के लिए भी लाभदायक है. जो लोग मोटे अनाज की प्रोसैसिंग कर रहे हैं, वह अतिरिक्त कमाई भी कर रहे हैं.

Animal Health : सरसों के तेल से बढ़ेगा पशुओं में दूध उत्पादन

Animal Health : आज देशभर में खाद्यान्न तेल अनेक तिलहनी फसलों से निकाला जाता है और ढेरों ब्रांड इस क्षेत्र में मौजूद हैं. लेकिन सरसों के तेल की आज भी अपनी बादशाहत कायम है. डाक्टर भी सरसों के तेल को अन्य तेलों के मुकाबले अच्छा बताते हैं. इसलिए सरसों के तेल को औषधीय तेल भी कहा जाए तो कोई बुराई नहीं है.

सरसों का तेल मनुष्य स्वास्थ्य के साथसाथ पशुओं के लिए भी बेहद लाभदायक माना जाता है. सरसों का तेल शरीर में दर्द को कम करता है, साथ में रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है. सदियों से हमारे किसान और पशुपालक सरसों के तेल की खासियत जानते हैं और वह अपने पशुओं को सेहतमंद रखने के लिए या कोई हल्कीफुल्की पशु बीमारी होने पर नाल के जरीए पशुओं को सरसों का तेल पिलाने का काम करते थे.

आप को बता दें कि सरसों का तेल पशुओं को बीमारियों से बचाता है. सरसों के तेल में अच्छी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट होता है, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है. ऐसे में जब गाय भैंस का जन्म हो, तो उन्हें तब भी सरसों का तेल दिया जा सकता है.

पशु का दूध बढ़ाने में है कारगर

इस के लिए दुधारू पशुओं के लिए गेहूं के आटे में सरसों का तेल मिला कर खिलाएं. यह मिश्रण पशुओं में दूध बढ़ाने की दवा के तौर पर काम करता है. ध्यान रहे कि मिश्रण के लिए आटे व सरसों के तेल की मात्रा समान होनी चाहिए. मिश्रण को अपने दुधारू पशुओं को शाम को चारा खिलाने के बाद ही खिलाएं और इस के साथ पानी न पिलाएं. ऐसा करने से आप का पशु पहले की तुलना में अधिक दूध देगा.

सरसों का तेल दर्द में भी देता राहत

यदि आप का पशु किसी कारण से दर्द से पीड़ित है, तो आप अपने पशु को सरसों के तेल का सेवन करवाएं, सरसों के तेल से पशु को दर्द से राहत मिलेगी. इस के साथ ही, सरसों के तेल से पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी बढ़ोतरी होती है और आप का पशु बारबार बीमार नहीं होगा.

इन दिनों मानसून भी देश भर में सक्रिय है और मानसून बारिश के साथ कई बीमारियां भी ले कर आता है. ऐसे में आप को अपने पशुओं का पहले से ही ध्यान रखना चाहिए. क्योंकि, बरसाती मौसम में पशुओं को अनेक बीमारी होने का अंदेशा रहता है. इसलिए आप भी अगर पहले से ही अपने पशु के प्रति सावधानी बरतेंगे, तो आप का पशु बीमार नहीं होगा. जिस के लिए आप अपने पशुओं को सरसों के तेल का सेवन करवाएं, जिस से की पशु में रोग से लड़ने की क्षमता बनी रहेगी और आप का पशु बीमार नहीं पड़ेगा.

सरसों का तेल पशुओं का पाचन भी ठीक करता है और उन का पेट संबंधी बीमारियों से बचाव भी होता है. उन का पाचन तंत्र मजबूत होता है. इस के अलावा जिन पशुओं को भूख नहीं लगती या किसी बीमारी से पीड़ित है, चारा नहीं खा रहा है, उस पशु को भी सरसों का तेल देने से फायदा होता है.

पशुओं को गरमी के दिनों में लू से बचाने में भी सरसों के तेल का सेवन फायदेमंद है. इस के विपरीत सर्दियों में भी सरसों का तेल पशुओं के लिए लाभकारी है. यह पशुओं का ठंड से बचाव करता है. मानसून बारिश के मौसम में भी सरसों का तेल पशुओं को बीमारियों से बचाता है.

कुल मिला कर देखा जाए तो सरसों का तेल पशुओं के लिए हर मौसम में लाभकारी है, जो उन की सेहत बनाए रखता है और दुधारू पशुओं के दूध उत्पादन में भी बढ़ोतरी करता है.

World Food Safety Day : जहर बोएंगे तो मौत की फसल ही काटेंगे

World Food Safety Day : 7 जून को ‘विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस’ ऐसे समय में आया है. जब यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा है कि क्या हम सचमुच खुद को और अपनी संतानों को सुरक्षित भोजन देने की स्थिति में हैं ?

आज दुनिया की आबादी तकरीबन 8 अरब के पार पहुंच चुकी है, और संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2050 तक यह आबादी तकरीबन 10 अरब तक पहुंचने वाली है. परंतु इसी के समानांतर, खेती की जमीन घट रही है, उपजाऊ मिट्टी हर साल करोड़ों टन कटाव में बह रही है, खेतों पर लगातार सीमेंट के जंगल उग रहे हैं, और जो थोड़ी बची हुई है, वह भी रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से बंजर होने की कगार पर खड़ी है.

खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की 33 फीसदी  उपजाऊ भूमि की उत्पादकता या तो समाप्त हो चुकी है या समाप्ति की ओर है. भारत के कई  किसानों ने बिना जहरीली रासायनिक खाद और दवाइयों के रिकौर्ड उत्पादन ले कर सफलतापूर्वक यह सिद्ध कर दिखाया है इन सब के बिना भी सफल कृषि पर्यावरण हितैषी मौडल तैयार किया जा सकता है. यह कार्य असंभव नहीं है.

अब लगे हाथ “खाद्य सुरक्षा” के नाम पर किए जा रहे जैनेटिकली मोडिफाइड बीजों के महाअभियान की बात भी हो जाए. वैज्ञानिक बारंबार यह बता चुके हैं कि जीएम फसलों में प्रयुक्त ट्रांसजीन मानव डीएनए को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. इस के स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक दुष्परिणाम अभी पूरी तरह सिद्ध नहीं हुए हैं, परंतु शुरूआती अध्ययन कैंसर, बांझपन, हार्मोनल गड़बड़ियों और प्रतिरोधक क्षमता में कमी की ओर इशारा कर चुके हैं.

भारत में हर व्यक्ति के थाली में जो रोटी, चावल, सब्जी, दाल सज रही है, उस में औसतन 32 प्रकार के रसायनिक अवशेष  पाए गए हैं. यह भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के ही आंकड़े कहते हैं. ये अवशेष कीटनाशकों, रासायनिक खादों और भंडारण में इस्तेमाल कीटनाशकों से आते हैं. क्या ये वही “खाद्य सुरक्षा” है जिस का जश्न हम 7 जून को मनाने जा रहे हैं?

खेती अब धरती से जीवन उपजाने की प्रक्रिया नहीं रही, यह एक उद्योग है, और उद्योग का मतलब है उत्पादन, मुनाफा और प्रकृति की कीमत पर विकास.

अगर जलवायु परिवर्तन की बात करें तो इंटरनेशनल पैनल औन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी)  की रिपोर्ट साफ कहती है कि कृषि सेक्टर कुल ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में लगभग 23 फीसदी का योगदान करता है. यह आंकड़ा केवल जलवायु को नहीं, बल्कि कृषि को भी नुकसान पहुंचा रहा है. बदलते तापमान, अनियमित बारिश, बाढ़ और सूखे की घटनाएं, फसलों की उत्पादकता में भारी गिरावट ला रही हैं.

खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के चलते साल 2030 तक विश्व में 1.22 करोड़ टन खाद्यान्न की कमी संभावित है. कभी कृषि आत्मनिर्भरता की मिसाल रहा भारत अब अमेरिका, कनाडा, ब्राजील जैसे देशों से दलहन, तिलहन और खाद्य तेल मंगाने पर मजबूर है. दूसरी ओर, “हरित क्रांति” के गर्व से लबरेज पंजाब और हरियाणा की मिट्टी की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि वहां के किसान खुद कह रहे हैं “अब मिट्टी में दम नहीं रहा”. भू जल का स्तर गिर रहा है, और नदियों का पानी दूषित हो रहा है. परंतु आज की कृषि नीति और वैज्ञानिक संस्थाएं ऐसी योजनाएं बना रही हैं जो विपत्ति को और भी जल्दी ला रही हैं.

World Food Day

“स्मार्ट एग्रीकल्चर”, “डिजिटल फार्मिंग”, “प्रिसिशन ड्रोन स्प्रेइंग”, “जीएम बीज”, “सिंथैटिक बायोफर्टिलाइजर” जैसे चमकदार शब्द असल में एक ऐसा कृत्रिम खाद्य तंत्र बना रहे हैं जो पोषण नहीं, केवल पेट भरने का भ्रम देता है और इस संकट का यही विकल्प है कि हमें प्रकृति की ओर जाना होगा.

हमें पारंपरिक जैविक कृषि, मिश्रित खेती, आदिवासी ज्ञान प्रणाली, फौरेस्ट फूड्स, स्थानीय बीजों का संरक्षण आदि करना होगा. ये सभी न केवल मिट्टी को पुनर्जीवित करते हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से लड़ने में भी सक्षम हैं.

बस्तर की एक बूढ़ी किसान से जब पूछा गया कि रासायनिक खाद क्यों नहीं डालतीं, तो उन्होंने बस इतना कहा “माटी माटे संग तो जीती है, जहर संग माटी मर जाती है.”
उस की बात में ‘पीएचडी’ नहीं है, पर धरती की पीड़ा की पीएच वैल्यू जरूर है.

अब सवाल यह उठता है कि क्या हम “खाद्य सुरक्षा” के नाम पर “जीवन की असुरक्षा” की इबारत लिख रहे हैं?

अगर हां, तो फिर यह दिवस, यह आंकड़े, यह घोषणाएं केवल भूख की राजनीति कर सत्ता पर काबिज रहने और कंपनियों के कभी ना भरने वाले पेट को भरने की कवायद के लिए हैं, धरती और इंसानियत के लिए नहीं.

अब समय आ गया है कि हम रसायनों की चकाचौंध से आंखें मूंदे खेतों से बाहर निकलें और फिर से परंपरागत बीज, मिट्टी, जल और जंगल से सच्चा रिश्ता जोड़ें और खेती मैं प्राकृतिक तौर तरीके अपनाएं. अन्यथा, यह “नीला ग्रह” हमारे लिए केवल ब्लैक एंड व्हाइट इतिहास बन जाएगा, जिसे पढ़ने और पढ़ाने वाला कोई नहीं होगा.

(लेखक ग्रामीण अर्थशास्त्र एवं कृषि मामलों के विशेषज्ञ और राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ ‘आईफा’)

Brinjal: अब बैगन खाने से नहीं होगी एलर्जी

Vegetables : बैगन (Brinjal) एक ऐसी भारतीय सब्जी जो हमेशा अपने लाजवाब स्वाद के लिए जानी जाती है. किसी को बैगन (Brinjal) का भरता पसंद है, तो किसी को भरवां बैगन (Brinjal) पसंद है.खास कर बिहार में तो बैगन (Brinjal) की खासी मांग है, क्योंकि वहां का एक खास व्यंजन है, लिट्टी चोखा. जिस का स्वाद बैगन के बिना अधूरा है.

पिछले दोनों बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम ने 7 साल के शोध के बाद इस नए किस्म के बैगन (Brinjal) की खोज की है, जिस का नाम ‘सबौर कृष्णकली’ रखा गया है. बैगन की इस प्रजाति का बड़ा ही सुंदर नाम है. जैसा नाम से ही पता चलता है कि यह कोई बड़ी ही गुणकारी और स्वादिष्ट चीज होगी. जी हां, यहां ऐसी ही है. बैगन (Brinjal) की इस ‘कृष्णकली’ वैरायटी में नुकसान पहुंचाने वाले बीटी के लक्षण नहीं हैं.

इस के अलावा बैगन (Brinjal) को सड़ाने वाली फिमोसिस बीमारी भी इस में कम होती है. इस की खास बात यह है कि बीजों की संख्या कम होने के कारण बैगन (Brinjal) से एलर्जी वाले व्यक्ति भी इस का सेवन कर सकते हैं. हम लोगों की ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा बीज वाले बैगन को अकसर बिजारे बैगन भी कह देते हैं, जिसे लोग कम पसंद करते हैं. लेकिन ये वैरायटी सभी को पसंद आएगी, क्योंकि इस में गुण ही ऐसे हैं.

‘सबौर कृष्णकली’ बैगन न सिर्फ स्वाद और गुणवत्ता में बेहतर है बल्कि, इस की उत्पादकता भी अब तक प्रचलित बैगन की प्रजातियों से काफी अधिक है.

मिलेगी अधिक उपज

अगर इस की खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो इस की उत्पादकता 430 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होगी. आमतौर पर सामान्य किस्म के बैगन की उत्पादकता 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर ही होती है. इस किस्म की खासियत यह है कि इस के 170 से 180 ग्राम साइज के फल में बीजों की अधिकतम संख्या 50 से 60 ही होती है. वहीं दूसरी प्रजाति के बैगनों में 200 से 500 की संख्या तक बीज होते हैं.

वैज्ञानिकों के अनुसार बैगन से आमतौर पर कई लोगों को एलर्जी होती है. क्योंकि कुछ लोगों को यह एलर्जी बैगन के बीजों के कारण ही होती है. ऐसे में यह कम बीज वाला बैगन उन के लिए भी उपयुक्त होगा, जिन को बैगन खाने से एलर्जी होती है.

इस की खेती सामान्य बैगन की तरह खरीफ से ठंड के मौसम तक यानी 8 महीने तक की जा सकती है. ‘कृष्णकली बैगन’ स्वाद में मजेदार और अधिक पैदावार देने वाली फसल के साथ ही गुणवत्ता के साथ एक बार लगाने पर लंबे समय तक उपज भी देती है.

Crop Diversification : फसल विविधीकरण खेती से ज्यादा मुनाफा

Crop Diversification : आज कल दिनोदिन खेती के तौरतरीकों में बदलाव आ रहा है. किसान कम समय में अधिक मुनाफा लेना चाहते हैं. फसल विविधीकरण ऐसी ही एक तकनीक है जो कम समय में अधिक मुनाफा दे सकती है. इन दिनों किसान परंपरागत खेती से अलग फसल विविधीकरण खेती की ओर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं. विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसान फसल विविधीकरण खेती को अपना कर अपनी आय बढ़ा सकते हैं.

अब फसल विविधीकरण के फायदों को देखते हुए सरकार भी 2 हेक्टेयर या उस से कम जमीन वाले छोटे किसानों को इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है. ताकि, कम रकबे वाले किसान भी कम जमीन में ही अलगअलग फसल लगा कर अधिक पैदावार ले कर अपनी आमदनी बढ़ा सकें.

क्या है फसल विविधीकरण?

फसल विविधीकरण खेती की एक ऐसी तकनीक है, जिस में विभिन्न तरह की फसल अथवा एक ही फसल की अनेक किस्में लगा कर खेती की जाती है. इस पद्धति में किसान कुछ अंतराल के बाद एक फसल को किसी अन्य फसल से बदल कर फसल विविधता के चक्र को बनाए रखने का काम करते हैं. सरल शब्दों में कहा जाए तो खेती की इस खास विधि से किसान एक ही खेत में अलगअलग फसलों की खेती कर सकते हैं.

फसल विविधीकरण से बढ़ेगी आमदनी

एक ही खेत में एक साथ कई फसलों को बोने से पानी, श्रम और पैसों की बचत तो होती ही है. साथ ही, एक ही खेत में कम जगह में ही अलगअलग फसलों से अच्छी पैदावार भी मिल जाती है.

फसल विविधीकरण से बढ़ती है मिट्टी की उर्वरता क्षमता

फसल विविधीकरण तकनीक से खेती करना किसानों के लिए मुनाफे का सौदा है. क्योंकि, यह तकनीक मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी कारगर है. एक ही खेत में लगातार हर साल एक ही फसल बोने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है. इसलिए फसल बदलबदल कर खेती करने से मिट्टी के उपजाऊपन में सुधार होता है. ऐसे में मिट्टी की सेहत को सुधारने के लिए फसल विविधीकरण अपना कर कम लागत में अधिक उत्पादन लिया जा सकता है. अगर मिट्टी की सेहत सुधरती है, तो इस से खेत जल्दी बंजर नहीं होंगे और उस भूमि पर लंबे समय तक खेती की जा सकेगी और फसल से पैदावार भी अधिक मिलेगी.

इस के साथ ही, फसल विविधीकरण खेती से पर्यावरण में सुधार के साथ पानी की भी बचत होती है. इसलिए कम जोत वाले किसानों के लिए यह एक मुनाफा देने वाली तकनीक है और किसान कम जगह में भी अच्छा मुनाफा ले सकते हैं.

Crop Management : फसल विविधीकरण खेती में फसल प्रबंधन?

Crop Management: फसल विविधीकरण से खेती करना, परंपरागत खेती करने की अपेक्षा बेहतर कृषि प्रणाली साबित हो रही है. आज बहुत से किसान इस तकनीक को अपना कर अच्छा मुनाफा ले रहे हैं. फसल विविधीकरण खेती में मौसमी सब्जियों की खेती करना ज्यादा मुनाफे का सौदा है.

लेकिन मौसमी सब्जियों की खेती करते समय कई बार फसल में कीट और बीमारी की वजह से फसल खराब भी हो जाती है. जिस से फसल पैदावार पर असर पड़ता है और किसानों को उपज की गुणवत्ता अच्छी नहीं होने पर उस के दाम भी कम मिलते हैं .

कुछ ऐसे तौरतरीके हैं जिन्हें अपना कर किसान अपने नुकसान को कम कर सकते हैं:

– अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुसार फसलों का चयन करें.

– फसलों की उन्नत किस्मों का चयन करें और प्रमाणित सैंटर से ही बीज खरीदें.

– समय पर खेत की मिट्टी की जांच कराएं और जांच की गुणवत्ता के आधार पर फसलों का चयन करें.

– फसल विविधीकरण खेती करते समय ये जरूर ध्यान रखें कि एक फसल की समस्या साथ वाले खेत या फसल तक ना पहुंचे. इस के लिए खेती करते समय मेड़ या फेंसिंग के जरीए अलगअलग फसलों के बीच में विभाजन कर सकते हैं. ऐसा करने से एक फसल की समस्या हवा या पानी के जरीए दूसरी फसलों तक नहीं पहुंच पाएगी.

– फसल विविधीकरण विधि से खेती कर अधिक मुनाफा कमाने के लिए किसान कम मूल्य की अपेक्षा अधिक मूल्य वाली फसलों जैसे सब्जियां, फल, फूलों आदि की खेती कर अधिक मुनाफा ले सकते हैं.

इस के तहत किसान अधिक पानी वाली फसलों के स्थान पर कम पानी वाली फसलों की खास किस्मों को लगाएं. इस के अलावा फसल विविधीकरण तकनीक अपनाते समय किसान समयसमय पर कृषि वैज्ञानिकों से सलाह जरूर लेते रहें. जिस से फसल में कोई भी समस्या आने पर उस का समाधान समय रहते किया जा सके.

Agricultural Equipment : कोनो वीडर – निराईगुड़ाई का खास कृषि यंत्र

Agricultural Equment: ipफसल से अधिक उत्पादन लेने के लिए खरपतवारों पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी होता है. अगर समय रहते इन को खत्म नहीं किया गया तो ये मुख्य फसल को उपजने नहीं देते. नतीजा फसल की पैदावार में कमी आती है. खरपतवार रोकथाम के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई बहुत जरूरी है. इस के लिए किसानों को बहुत मेहनत करनी पड़ती है. अगर यही काम कृषि यंत्र से किया जाए तो किसानों को काफी सहूलियत हो जाती है.

इस के लिए कई अच्छे उपकरण आज बाजार में मौजूद हैं. इन्हीं उपकरणों में से एक कोनो वीडर कृषि यंत्र है, जो अत्यंत उपयोगी कृषि मशीन है. यह मशीन खेत में अच्छे से निराईगुड़ाई के साथ कई अन्य कार्यों को भी सरलता से कर लेती है. खास कर छोटे और मंझले किसानों के लिए कोनो वीडर यंत्र काफी अच्छा कृषि यंत्र है. इस यंत्र में दो रोटर, फ्लोट, फ्रेम और हैंडल दिए गए हैं, जिस की मदद से इसे चलाना काफी आसान हो जाता है.

यह कृषि यंत्र निश्चित गहराई तक निराईगुड़ाई का काम करता है. इसे चलाना बहुत ही आसान होता है. इसे महिला हो या पुरुष कोई भी आसानी से चला सकता हैं. क्योंकि, यह मशीन साइकिल की तरह हाथ से चलाई जाती है और इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरलता से ले जाया जा सकता है. इस कोनो वीडर यंत्र की कीमत आम छोटे किसान की पहुंच में है. इस यंत्र को अनेक कृषि यंत्र निर्माता बना रहे हैं. लोकल स्तर पर भी यह यंत्र बहुत आसानी से मिल जाता है.

कोनो वीडर के फायदे

इस यंत्र के इस्तेमाल से फसलों के बीच में से खरपतवारों को निकालना आसान हो जाता है.

लाइनों में लगाई गई फसलों के लिए यह कृषि यंत्र बहुत ही सरलता से काम करता है. साथ ही, निराईगुड़ाई का काम कम समय में निपट जाता है. किसानों की मजदूरी भी कम लगती है और  कोनो वीडर का उपयोग खेत में करने से फसल की पैदावार भी बढ़ती है. कम कीमत में आने वाला यह कोनो वीडर यंत्र किसानों के लिए बड़े ही काम का कृषि यंत्र है. इस को चलाना आसान, रखरखाव आसान और कम दाम अच्छा काम इस के मुख्य गुण हैं.

Agricultural Work : जून माह के कृषि कार्य

Agricultural Work :  जून महीने में गरमी अपने चरम पर होती है. इस महीने किसानों को अपने खेतों की गहरी जुताई करनी चाहिए. जुताई से खेतों में नुकसान पहुंचाने वाले कीट और रोगाणु ऊपरी सतह पर आ जाते हैं, जो तपती धूप में नष्ट हो जाते हैं. इस से अगली फसल उगाने के लिए खेत संरक्षित हो जाता है और आने वाले समय में फसलों में कीट व रोग होने की संभावना कम हो जाती है.

इन दिनों बरसात का समय होता है. इसलिए जो किसान जल संरक्षण कर सकें तो अच्छा है. किसान द्वारा अधिक बारिश के पानी का संरक्षण कर उस का उपयोग जब पानी की कमी हो तो सिंचाई के लिए किया जा सकता है.

इस माह में खाली खेतों में खरीफ फसलों की बोआई के लिए तैयारी शुरू हो जाती है. जून माह में अधिक बारिश वाले क्षेत्रों के साथ सिंचाई की समुचित व्यवस्था वाले क्षेत्रों में धान की रोपाई के लिए पौध तैयार की जाती है और पौध तैयार होने पर धान की रोपाई भी खेतों में करने का समय होता है.

धान रोपाई के लिए मजदूरों द्वारा या कृषि यंत्र पैडी प्लांटर की सहायता से धान की रोपाई की जाती है. कुछ लोग धान की सीधी बोआई भी करते हैं. सीधी बोआई के लिए अंकुरित धान को ड्रम सीडर यंत्र से बोया जाता है.

बारानी क्षेत्रों में या कम पानी की खेती में ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, मंडुआ के साथसाथ तिलहनी फसलें जैसे- मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन, तिल, कुसुम व अरंडी, रेशेदार फसलें जैसे- कपास एवं जूट के साथसाथ चारा फसलें जैसे- ज्वार, बाजरा, मक्का, लोबिया और ग्वार आदि प्रमुख फसलों की बोआई के लिए प्रबंध किए जाते हैं.

मानसून आने के बाद तैयार पौध की रोपाई जुलाई में की जाती है. धान की नर्सरी एवं सस्य प्रबंधन में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई उन्नत सस्य क्रियाओं को किसानों द्वारा अपनाना चाहिए. जिस से अधिक व गुणवत्ता से भरपूर उत्पादन मिल सके.

इस महीने में मौसम में होने वाले बदलाव, खास कर मानसून के समय में खरीफ फसलों में होने वाले नुकसान को कम करने के लिए जरुरी संसाधनों जैसे- बीज का प्रबंध आदि कर लेना चाहिए. प्राकृतिक आपदा से फसल खराब होने की स्थिति में फसल बीमा योजना का भी लाभ लिया जा सकता है.

मानसून के मौसम में पशुओं की भी खास देखभाल करनी चाहिए. खास कर दुधारू पशुओं का अधिक ध्यान रखना होता है. इन दिनों हरे चारे की भी कमी नहीं होती.

रबी फसल का काम समाप्त हो चुका होता है. इसलिए जिन किसानों के पास कृषि यंत्र जैसे- थ्रेशर आदि हैं, वो उन्हें साफ कर के सुरक्षित रखने का काम करें.

Animal Health : क्या आप का पशु बीमार है ?

Animal Health : आज के समय पशुपालन बड़े पैमाने पर किया जाता है और अनेक लोग डेयरी फार्मिंग के जरीए अपना रोजगार कर रहे हैं, बल्कि अन्य लोगों को भी रोजगार मुहैया करा रहे हैं. बड़े पैमाने पर पशुपालन करने वाले या डेयरी फार्मिंग से जुड़े लोग ज्यादातर पशु विशेषज्ञ के संपर्क में रह कर ये काम करते हैं परंतु, जो कम दुधारू पशुओं को ले कर अपना काम कर रहे हैं या कुछ नए लोग हैं, जिन्होंने पशुपालन का काम शुरू किया है, उन को कई बार पशुओं के बीमार होने का पता नहीं चलता और जब तक उन को अपने पशु की बीमारी का पता चलता है, तब तक देरी हो चुकी होती है और कई बार उसे अपने पशु से भी हाथ धोना पड़ता है. ऐसे में  पशुपालकों के लिए यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि उन के पशु सुरक्षित और स्वस्थ है या नहीं? कई बार पशुपालकों को पशुओं की बीमारी के बारे में बहुत देर से पता चलता है, जिस से पशुओं में बीमारी इतनी ज्यादा फैल जाती है कि पशुपालकों को नुकसान झेलना पड़ता है. ऐसे में पशुपालकों को अपने पशुओं के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी होनी चाहिए.

कैसे पहचाने कि पशु बीमार है?

आप अपने पशुओं पर नजर रखे अगर आप के पशु की दिनचर्या में उस के रहनसहन में कुछ बदलाव दिखे, आप का पशु ठीक से नहीं चल पा रहा है या चलते वक्त पूरे पैरों का इस्तेमाल नहीं कर रहा है, तो समझ जाइए कि वो स्वस्थ नहीं है. क्योंकि, स्वस्थ पशु पैरों से अच्छी तरह चलते हैं. स्वस्थ पशु की पहचान है कि अकसर वो अपनी जीभ से अपनी नाक को चाटा करते हैं, यह भी ध्यान देने वाली बात है.

इस के साथ ही, यदि आप पशु के पास से गुजरते हैं, जो बैठा हुआ है, लेकिन इस के बाद भी पशु में कोई हलचल नहीं होती वह सुस्त हो, तो समझ जाइए कि पशु को कोई स्वास्थ्य समस्या हो सकती है. पशु सुस्त दिखे तो पशुपालक को अपने पशु के तापमान की जांच करनी चाहिए. कहीं उसे बुखार तो नहीं है.

अगर आप के पशु का स्वास्थ बेहतर होगा, तो उस का खानपान सही रहेगा, और वो चारा भी खाएगा. स्वस्थ पशु को अच्छी भूख लगती है. अगर आप के पशु ने अचानक से कम खाना शुरु कर दिया है तो, ये उस के बीमार होने के लक्षण हैं. इस के साथ ही, पशुओं में इन बातों का भी ख्याल रखें कि पशु की नाक साफ होनी चाहिए. पशुओं का थूथन यानी मुंह सूखा नहीं होना चाहिए.

अगर पशु अच्छे से खाना चबा नहीं रहा या धीरे चबा रहा है, तो भी दिक्कत हो सकती है. इसलिए पशु बीमारी के ये कुछ सामान्य लक्षण हैं. इन्हें नजर अंदाज न करें.

अगर पशुपालक ऊपर दिए गए किसी भी लक्षण को अपने पशुओं में देखता है, तो उसे जल्द ही किसी पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. समय पर बीमारी का पता चलने पर पशु का इलाज आसान है. जिस से आप अपने पशुधन को बचा सकते हैं.