FNF Awards : पटना में संपन्न हुआ फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड

“मेहनत उगी जब खेतों में , तो फसल बनकर लहराई है,
किसानों का हुआ सम्मान तो , धरती भी मुस्काई है……”

बिहार और झारखण्ड के सुदूर क्षेत्रों से सुबह निकले किसान, जब ज्ञान भवन, गाँधी मैदान पहुंचे तो कृषि सम्मान अवार्ड (FNF Awards) के भव्य आयोजन का हिस्सा बनें. किसानों ने जीते अवार्ड, सहकारिता मंत्री, कृषि और बागवानी निदेशकों का हुआ उद्बोधन और किसानों को मिला तकनीकों और योजनाओं का ज्ञान, यह नज़ारा 17 मार्च को दिखा फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड समारोह (FNF Awards) में. यह कार्यक्रम बिहार की राजधानी पटना में आयोजित हुआ.

अतिथियों का हुआ स्वागत 

दिल्ली प्रेस के संपादक और प्रकाशक परेश नाथ ने स्वागत भाषण में कहा कि, दिल्ली प्रेस की पत्रिका फार्म एन फूड का ध्येय है कि किसानों को आसान भाषा में कृषि की नवीनतम जानकारी दी जाए, जिसमें नवाचारों, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि यंत्रों आदि पर विशेष जोर दिया जाता है. किसान देश की रीढ़ हैं, जिन्हें और ज्यादा मजबूत करने की जरूरत है और अब कृषि को रोजगार बनाने का समय आ गया है.

FNF Award
दिल्ली प्रेस के संपादक और प्रकाशक परेश नाथ और बिहार के सहकारिता मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार चंद्रवंशी

सहकारिता मंत्री ने किया संबोधित

“बिहार के किसान मखाने की खेती में आगे बढ़ रहें हैं. तेल उत्पादन में भी बिहार के किसानों को आगे आना चाहिए. आप सभी का साथ देने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता है. सहकार से ही समृद्धि संभव है इसलिए सहकारी समितियों को किसानों के साथ मिलकर कार्य करते रहना चाहिए” यह बात डॉ. प्रमोद कुमार चंद्रवंशी सहकारिता, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री, बिहार ने किसानों को संबोधित करते हुए कही.

कृषि योजनाओं का लाभ लेते रहें किसान

सौरभ सुमन यादव IAS, निदेशक, कृषि विभाग, बिहार ने किसानों की उपलब्धियों के लिए उनको बधाई दी. उन्होंने कहा कि – “बिहार के किसान आगे बढ रहें हैं पर साथ ही खेती में नवीन तकनीकों का प्रयोग करें. और कृषि विभाग की योजनाओं का लाभ लेते रहें.”

अधिक आमदनी के लिए बागवानी की ओर रुख करें

अभिषेक कुमार IFS, निदेशक, बागवानी निदेशालय, बिहार ने किसानों को बताया कि- “पारंपरिक खेती करते किसान, बागवानी फसलों जैसे ड्रैगन फ्रूट, स्ट्राबेरी आदि फलों के साथ ही सब्जियों की खेती करें. इससे भी नियमित और अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है. बागवानी विभाग किसानों को योजनाओं की जानकारी पहुँचाने के लिए हर जिले, हर प्रखंड में ओर बेहतर कार्य करने का प्रयास कर रहा है. हमारे अधिकारी आप सबको आगामी प्रयासों की जानकारी देने हर गाँव तक आएंगे.”

प्रगतिशील किसानों को मिला राज्य स्तरीय सम्मान

बिहार और झारखंड के किसानों, वैज्ञानिकों और कृषि से जुड़ी संस्थाओं को 16 श्रेणियों में 38 पुरस्कार प्रदान किए गए. खेती में नवाचार, तकनीक और सतत कृषि मॉडल के माध्यम से मिसाल कायम करने और कृषि से जुड़े दूसरे लोगों को भी प्रेरित किया है ऐसे कृषि क्षेत्र में विशेष योगदान देने वाले किसानों , वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया. पूरी लिस्ट इस तरह है-

पश्चिमी चंपारण (बिहार) के आर्यन कुमार और बांका (बिहार) की बिनीता कुमारी को बेस्ट यंग फार्मर अवार्ड, नालंदा (बिहार) की मधु पटेल और लोहरदगा (झारखंड) की एम्लेन कंदुलना को बेस्ट फीमेल फार्मर अवार्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के सोनू निगम कुमार, पश्चिमी चंपारण (बिहार) के परशुराम सिंह और नालंदा (बिहार) की अनीता कुमारी को बेस्ट फार्मर इन इनोवेटिव फार्मिंग अवार्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के राजेश रंजन कुमार और कटिहार (बिहार) के पंचलाल मंडल को बेस्ट फार्मर इन आर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग अवार्ड दिया गया.

भागलपुर (बिहार) के राकेश कुमार सिंह और कटिहार (बिहार) की कुमारी प्रीति को बेस्ट फार्मर इन हार्वेस्टिंग एंड प्रोसेसिंग अवार्ड, गोपालगंज (बिहार) के मनीष कुमार तिवारी को बेस्ट फार्मर इन इंटीग्रेटेड फार्मिंग अवार्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के राकेश कुमार और पटना (बिहार) के सुधांशु कुमार को बेस्ट फार्मर इन मैकेनाइजेशन अवार्ड, बांका (बिहार) की वंदना कुमारी को बेस्ट डेयरी/एनिमल कीपर अवार्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के अभिषेक रंजन को बेस्ट बी कीपर फार्मर अवार्ड, रांची (झारखंड) के विकाश कुमार चौधरी और बांका (बिहार) की कुमारी राखी सिन्हा को बेस्ट पोल्ट्री/हेचरी फार्मर अवार्ड (FNF Awards) प्रदान किया गया.

बक्सर (बिहार) के विनोद कुमार सिंह और रोहतास (बिहार) के अर्जुन सिंह को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मार्केटिंग अवार्ड, समस्तीपुर (बिहार) की डा. सुनीता कुशवाह, मुजफ्फरपुर (बिहार) के डा. तरुण कुमार, बक्सर (बिहार) के डा. रघुबर साहू, समस्तीपुर (बिहार ) की डा. संचिता घोष, समस्तीपुर (बिहार) के डा. रविंद्र कुमार तिवारी, भागलपुर (बिहार) के डा. प्रदीप कुमार और रांची (झारखंड) के डा. महेश कुमार धाकड़ को बेस्ट रिसर्च अवार्ड इन फार्मिंग सिस्टम अवार्ड, मधुबनी (बिहार) के डा. बसंत कुमार को बेस्ट इंटरप्रेन्योरियल स्किल्स इन लाइवस्टाक फार्मिंग अवार्ड, समस्तीपुर (बिहार), पश्चिमी चंपारण (बिहार) और नालंदा (बिहार) को बेस्ट कृषि विज्ञान केंद्र अवार्ड, नालंदा (बिहार) की माधोपुर फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, घाघरा (झारखंड) की घाघरा वुमन फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड और रोहतास (बिहार) की मुंडेश्वरी फेड फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड को बेस्ट एफपीओ अवार्ड दिया गया.

FNF Awards भागलपुर (बिहार) के मनीष मिश्रा को बेस्ट एग्री एंड डवलपमेंट जर्नलिस्ट अवार्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के रोशन कुमार को बेस्ट एग्री जर्नलिस्ट अवार्ड दिया गया. पटना के अमरजीत कुमार सिन्हा  को बेस्ट फार्मर इन  वेजिटेबल सीड प्रोडक्शन अवार्ड और रामजीत शर्मा को बेस्ट फार्मर इन  क्रॉप सीड प्रोडक्शन अवार्ड प्रदान किया गया.

कृषि नवाचार को मिल रही नई पहचान

फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड 2026 ने यह साबित किया है कि, देश के किसान आधुनिक तकनीक, प्राकृतिक खेती, मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण और मार्केटिंग के जरिए कृषि को लाभकारी बना रहे हैं. यह सम्मान न केवल किसानों के मनोबल को बढ़ाता है, बल्कि अन्य किसानों को भी नवाचार के लिए प्रेरित करता है.

फार्म एन फूड मीडिया, दिल्ली प्रेस हैं किसानों का विश्वसनीय 

दिल्ली प्रेस आठ दशक से ज्यादा समय से 9 भाषाओं में 30 पत्रिकाएं प्रकाशित कर रहा है. जिनमें फार्म एन फ़ूड , गृहशोभा, सरस सलिल, चम्पक, सरिता, कारवां, मोटरिंग आदि प्रमुख है, जो पाठकों की पसंदीदा पत्रिकाएँ है. वेबसाइट, सोशल मीडिया और इवेंट्स के माध्यम से दिल्ली प्रेस देशभर के मीडिया में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवा रहा हैं.

दिल्ली प्रेस के फार्म एन फूड मीडिया का ध्येय है कि किसानों को आसान भाषा में कृषि की नवीनतम जानकारी दी जाए, जिस में नवाचारों, फूड प्रोसेसिंग, मशीनरी आदि पर फोकस किया जाता है. किसान देश की रीढ़ हैं, जिन्हें और ज्यादा मजबूत करने की जरूरत है. फार्म एन फ़ूड कृषि सम्मान अवार्ड (FNF Awards) उत्तर प्रदेश – उतराखंड, मध्य प्रदेश – छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में आयोजित हुआ है. इसी क्रम में बिहार, झारखण्ड में यह कार्यक्रम आयोजित किया गया.  इस वर्ष यह अवार्ड उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में द्वितीय संस्करण के साथ ही, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी आयोजित होगा.

कंपनियों ने की सहभागिता

यह अवार्ड कार्यक्रम इफको एम.सी.- क्रॉप साइंस प्राइवेट लिमिटेड के द्वारा पावर्ड बाय रहा और  इस कार्यक्रम के एसोसिएट स्पांसर एपीडा और एन.सी.डी.सी. रहे. इनके बिहार प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम में शिरकत की.

इस अवसर पर ICARIARI पूसा, दिल्ली के वैज्ञानिक नफीस अहमद और अनंत नाथ, कार्यकारी प्रकाशक , दिल्ली प्रेस ने भी किसानों को संबोधित किया. 200 से अधिक किसानों, कृषि वैज्ञानिकों आदि की उपस्थिति रही. फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड ने बिहार और झारखण्ड के किसानों के दिल में जगह बनाई और किसानों की मेहनत को ऊंचाईयां प्रदान की.

Krishi Samman Award 2026: प्रगतिशील किसानों को राज्य स्तरीय सम्मान

 

Krishi Samman Award : फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड 2026 में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के उन किसानों, वैज्ञानिकों और संस्थाओं को सम्मानित किया गया, जिन्होंने खेती में नवाचार, तकनीक और सतत कृषि मॉडल के माध्यम से मिसाल कायम की है. यह कार्यक्रम मोहाली, पंजाब में आयोजित किया गया. दिल्ली प्रेस के फार्म एन फ़ूड मीडिया द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में कौन रहें विजेता,जानें –

हरियाणा के विजेता किसान

विगत दिनों आयोजित इस कार्यक्रम में हरियाणा से सम्मानित प्रमुख किसान और संस्थाएं-

• नरेश कुमार – बेस्ट फार्मर (हार्वेस्टिंग एंड प्रोसेसिंग)
• अरुणा देवी – बेस्ट डेयरी/एनिमल कीपर
• रामप्रताप – बेस्ट हॉर्टिकल्चर फार्मर
• कपिल भाटिया – बेस्ट इनोवेटिव फार्मिंग
• राजेंद्र सिंह रावल – बेस्ट शुगरकेन प्रोडक्शन
• नीरज त्यागी – बेस्ट इंटीग्रेटेड फार्मिंग
• लेखराम यादव – बेस्ट ऑर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग
• मानसिंह यादव – बेस्ट फार्मर अवार्ड
• प्रह्लाद सिंह – बेस्ट मशरूम प्रोडक्शन
• अभय चौहान – बेस्ट यंग फार्मर
• कृषि विज्ञान केंद्र, हिसार – बेस्ट कृषि विज्ञान केंद्र

पंजाब के विजेता किसान

पंजाब से सम्मानित किसानों और संस्थाओं में शामिल हैं:

• सुखतार सिंह – ऑर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग
• नवराज सिंह – बेस्ट बी कीपर
• रोहभाश सिंह जाखड़ – फील्ड क्रॉप फार्मर
• सुरजीत सिंह चग्गर – मैकेनाइजेशन
• परमजीत सिंह – एग्री इंफ्लुएंसर
• वीरपाल कौर – बेस्ट फीमेल फार्मर
• नवदीप सिंह – हार्वेस्टिंग एंड प्रोसेसिंग
• अमरजीत सिंह ढिल्लों – मार्केटिंग
• कृषि विज्ञान केंद्र, अमृतसर – बेस्ट केवीके
• भूपिंदर सिंह – डेयरी/एनिमल कीपर
• सुरिंदर सिंह – हाईटेक डेयरी फार्मर
• लखवीर सिंह – यंग फार्मर
• तीर्थ सिंह – इनोवेटिव फार्मिंग
• हरप्रीत सिंह – शुगरकेन प्रोडक्शन
• गुरमेल सिंह – मार्केटिंग
• गांव सरसिनी – बेस्ट टूरिज्म विलेज
• हंसाली ऑर्गेनिक फार्म – विलेज टूरिज्म
• मंडेर फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी – बेस्ट एफपीओ
• चंदनदीप सिंह – इनोवेटिव फार्मिंग
• निर्मल सिंह – पोल्ट्री/हेचरी
• दीदार सिंह – बेस्ट एफपीओ
• मंजू बाला – एनिमल कीपर
• सुरजीत सिंह राय – ऑर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग
• बलविंदर सिंह – शुगरकेन प्रोडक्शन

हिमाचल प्रदेश के विजेता किसान

• डॉ. पंकज सूद – बेस्ट रिसर्च (फार्मिंग सिस्टम)
• सुंदरनगर नेचुरल्स एफपीओ – बेस्ट एफपीओ
• कृषि विज्ञान केंद्र, किन्नौर – बेस्ट केवीके (द्वितीय पुरस्कार)
• डॉ. बुधि राम – बेस्ट यंग रिसर्चर
• आशीष नेगी – मार्केटिंग
• बिंद्रा देवी – फीमेल फार्मर
• अंकित कुमार – यंग फार्मर
• लीना शर्मा – ऑर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग
• सुनीता देवी – हॉर्टिकल्चर क्रॉप
• प्रेमलता – इंटीग्रेटेड फार्मिंग
• कृषि विज्ञान केंद्र, मंडी – बेस्ट केवीके (प्रथम पुरस्कार)

कृषि नवाचार को मिल रही नई पहचान

Krishi Samman Award ने यह साबित किया कि देश के किसान आधुनिक तकनीक, प्राकृतिक खेती, वैल्यू एडिशन, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग के जरिए कृषि को लाभकारी बना रहे हैं. यह सम्मान न केवल किसानों के मनोबल को बढ़ाता है, बल्कि अन्य किसानों को भी नवाचार के लिए प्रेरित करता है.

Maize Hybrid Seed : किसानों की आमदनी दोगुनी करने की नई राह

Maize Hybrid Seed: भाकृअनुप-भारतीय मक्का अनुसंधान केंद्र, लुधियाना, ने पंजाब में एक किसान के खेत में पहली बार मक्का हाईब्रिड बीज (Maize Hybrid Seed) उत्पादन का सफल ट्रायल किया. यह ट्रायल देर से खरीफ के मौसम (अगस्त में बोआई) के दौरान शरणवीर सिंह, गांव गजियाना, जिला मोगा, के खेत में मक्का हाईब्रिड डीएमआरएच 1308 का उपयोग करके किया गया था, जिसके शानदार परिणाम मिले.

पंजाब के किसानों को होगा फायदा

पंजाब में इस्तेमाल होने वाला लगभग 100 फीसदी मक्का हाईब्रिड बीज, (Maize Hybrid Seed)  जिसकी कीमत पीक सीजन में लगभग 700-1000 रुपए प्रति किलोग्राम होती है, वह दक्षिण भारत, मुख्य रूप से तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश में पैदा होता है और उत्तरी राज्यों में ट्रांसपोर्ट किया जाता है. मक्का हाईब्रिड बीज उत्पादन से पंजाब में मक्का की खेती करने वाले किसानों को फायदा होगा, क्योंकि उन्हें कहीं और से बीज नहीं मंगाना होगा. लंबी दूरी के ट्रांसपोर्ट से किसानों के लिए बीज और खेती की लागत काफी बढ़ जाती है. इससे काफी खर्च बचाया जा सकता है, जिससे किसानों की आमदनी बढ़ाने और उनकी आजीविका में सुधार करने में महत्त्वपूर्ण योगदान मिलेगा.

पंजाब की कृषि जलवायु के अनुकूल है हाईब्रिड बीज

पंजाब की कृषि जलवायु परिस्थितियों में हाईब्रिड बीज उत्पादन के सफल प्रदर्शन से यह साबित हुआ है कि अच्छी क्वालिटी का मक्का हाईब्रिड बीज (Maize Hybrid Seed) स्थानीय स्तर पर, यहां तक कि खरीफ के आखिर मौसम में भी पैदा किया जा सकता है. इन उत्साहजनक नतीजों के आधार पर, इस प्रयोग को बसंत के मौसम में भी बढ़ाया जाएगा.

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि खरीफ के आखिर में काटा गया बीज सीधे बसंत में मक्का की खेती के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे लंबे समय तक स्टोरेज और उससे जुड़े खर्चों की जरूरत खत्म हो जाती है.

किसानों को होगा दोगुना फायदा

पंजाब के किसानों को आमदनी को बढ़ाने के लिए खरीफ के आखिर में बीज उत्पादन के लिए बोआई का सबसे अच्छा समय अगस्त का पहला पखवारा है. बीज उत्पादन के तहत, किसान प्रति हेक्टेयर लगभग 2500 किलोग्राम बीज की औसत उपज प्राप्त कर सकते हैं, जिसे 200 रुपए प्रति किलोग्राम की औसत कीमत पर बेचा जा सकता है. भाकृअनुप-भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना के आंकड़े बताते हैं कि उत्पादन लागत घटाने के बाद, किसानों को प्रति हेक्टेयर 3.75-4.0 लाख रुपए का शुद्ध लाभ हो सकता है, जो कमर्शियल अनाज मक्का की खेती से होने वाले रिटर्न से लगभग दोगुना से भी ज्यादा है.

अधिक कमाई के लिए हैं कई विकल्प

खरीफ मक्का कटाई के बाद किसान कोई भी उपयुक्त रबी की सब्जियां या दालें उगा सकते हैं. इसके बाद बसंत की खेती के लिए कम से मध्यम अवधि के मक्का हाईब्रिड बो सकते हैं और जून के मध्य तक कमाई की जा सकती है. इसके बाद फिर से खरीफ के आखिर में बीज उत्पादन का विकल्प चुनने से पहले, किसान खरीफ की 40-45 दिन की कम अवधि की सब्जी की फसल ले सकते हैं.

वैकल्पिक रूप से, खरीफ के आखिर में बीज उत्पादन की कटाई के बाद, किसान फरवरी के पहले सप्ताह में बोआई करके, मई के मध्य तक कटाई करके और फिर मई के मध्य से जुलाई के अंत तक खरीफ की सब्जियां उगाकर ब्रीडर-टू-फाउंडेशन बीज या हाईब्रिड बीज उत्पादन कर सकते हैं और फिर से खरीफ के आखिर में बीज उत्पादन के लिए जा सकते हैं.

खेतों में रिसर्च से मिले शानदार नतीजे

यह प्रयोग लुधियाना में भाकृअनुप-आईआईएमआर के रिसर्च खेतों में 2 साल तक भी किया गया था और फिर इसे अन्य किसानों के खेतों में किया गया, जिसके अच्छे नतीजे मिले. कमर्शियल बीज उत्पादन के लिए, उचित बीज भंडारण, सुखाने और प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की आवश्यकता है. इसके साथ ही, भाकृअनुप-आईआईएमआर, अपने पार्टनर के सहयोग से, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में भी इसी तरह के हाईब्रिड बीज उत्पादन प्रयोग कर रहा है, जिससे मक्का बीज उत्पादन में विविधता आएगी और राष्ट्रीय बीज आपूर्ति प्रणाली को मजबूती भी मिलेगी.

मक्का हाईब्रिड बीज उत्पादन महत्त्वपूर्ण कदम

यह पहल पंजाब में मक्का हाईब्रिड बीज (Maize Hybrid Seed) उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है, जिसमें बीज की लागत कम करने, खेती का खर्च कम करने, उत्पादकता बढ़ाने तथा किसानों की आय बढ़ाने की काफी संभावना है. यह पंजाब एवं पड़ोसी राज्यों में गुणवत्ता वाले बीज की बढ़ती मांग को पूरा करने में भी मदद करेगा.

Traditional Indian sweet : दूध बर्फी- जो हर मन को भाए

Traditional Indian sweet: दूध बर्फी  अन्य बर्फियों से अलग होती है. यह दूध में चीनी को मिलाकर धीमी-धीमी आंच पर गरम करते हुए गाढ़ा करके तैयार की जाती है. इसकी सबसे खास बात यह होती है कि यह खाने में दूध और खोए दोनों के मिले-जुले स्वाद का एहसास कराती है. दानेदार बरफी (Traditional Indian sweet) होने के कारण यह दूसरी बरफियों से अलग होती है. जो किसान पशुपालन और दूध उत्पादन का काम करते हैं, वे इसे बनाकर रोजगार कर सकते हैं.
दूध बर्फी  को बनाना बेहद आसान होता है. दूध बर्फी  को ज्यादा लंबे समय तक संभाल कर नहीं रखा जा सकता है. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि इसे केवल उतना ही तैयार करें, जितने की खपत हो.
दूध बर्फी  बनाने में किन बातों का रखें ध्यान
लखनऊ के कालीजी बाजार चौक में पुत्तनबाबा की दूध की दुकान पर बैठने वाले अर्जुन सिंह यादव कहते हैं कि, दूध बर्फी को जल्दी से जल्दी खा लेना चाहिए. ताजी दूध बर्फी (Traditional Indian sweet)  का स्वाद बहुत ही अच्छा होता है.
अर्जुन सिंह यादव कहते हैं कि दूध बर्फी को बनाना भले ही आसान होता हो, पर थोड़ी सी असावधानी होने से दूध के लगने या जलने का खतरा बना रहता है, जो दूध बर्फी के स्वाद को खराब कर सकता है. इसमें दूध और चीनी की मात्रा ऐसी होनी चाहिए, जो दूध बर्फी के स्वाद को बनाए रखते हुए मिठास का एहसास कराए. जब दूध बर्फी तैयार हो जाती है तो इसे मनचाहे आकार में काट लिया जाता है. फ्रिज में दूध बर्फी को थोड़े लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.
बड़ा है बाजार
वैसे तो तमाम किस्म की मिठाइयां (Traditional Indian sweet) दूध और चीनी से बनती हैं, मगर दूध बर्फी का बाजार काफी बड़ा है. अमूमन यह हर मिठाई की दुकान में मिल जाती है. इटावा की रहने वाली हर्षिता वर्मा कहती हैं, ‘वैसे तो दूध बर्फी को ठंडा होने पर खाया जाता है, पर मुझे तो गरम-गरम दूध बर्फी खाने में मजा देती है. गरम होने पर यह और भी ज्यादा टेस्टी और फ्रेश लगती है.’
दूध बर्फी  का भाव अलग-अलग होता है. यह बाजार में 280 रुपए प्रति किलोग्राम से लेकर 450 रुपए प्रति किलोग्राम तक में बिकती है. रबड़ी के बाद फ्रेश मिठाई में दूध बर्फी की मांग सबसे ज्यादा होती है.
शौकीन लोग दूध बर्फी की खूब खरीदारी करते हैं. कुछ लोग घरों में इससे खोए वाली गुझिया भी बना लेते हैं.
कैसे बनाएं दूध बर्फी
दूध बर्फी  बनाने के कारीगर संतोष गुप्ता बताते हैं कि, इसे बनाने के लिए फुल क्रीम दूध लेना चाहिए. दूध को पहले गरम करें. जब दूध उबलने लगे तो उसमें चीनी डालें. चीनी की मात्रा दूध की एक चौथाई रखें यानि अगर 1 लीटर दूध है, तो चीनी 250 ग्राम लें. दूध को धीरे-धीरे गरम करते हुए गाढ़ा करें. दूध को तब तक उबालें, जब तक वह गाढ़ा होकर खोए जैसा न हो जाए. फिर इसको ठंडा होने के लिए थाल में रख दें. जब यह जम जाए तो इसे मनचाहे आकार में काट लें.

Farming Tips: दलहनी फसलों (Pulse Crops) की देखभाल कैसे करें

Pulse Crops: भारत की ज्यादातर जनसंख्या दाल प्रोटीन पर निर्भर है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर इंसान को रोजाना दाल की 80 ग्राम मात्रा मिलनी चाहिए, जबकि 1951-56 के बीच महज 64 ग्राम, 1999-2000 में महज 36 ग्राम, 2003-04 में महज 30 ग्राम तथा वर्तमान में महज 18-20 ग्राम दाल प्रति व्यक्ति रोजाना का औसत है.

क्षेत्रफल में इजाफा

फसल चक्रों में मामूली फेरबदल करके फसल विविधीकरण तथा बहुफसली प्रणाली से दलहन के क्षेत्रफल में इजाफा किया जा सकता है. इसके लिए बेकार पड़ी हुई जमीन, सुधरी बंजर जमीन और अन्य खाली जमीनों में कम लाभकारी फसलों की जगह दलहनी फसलें उगाकर दलहनी फसलों (Pulse Crops) के क्षेत्रफल में इजाफा किया जा सकता है.

सहफसली खेती है मुनाफेदार

गन्ने के साथ उड़द व मूंग की सहफसली खेती करके उत्पादन में इजाफा किया जा सकता है.

करें प्रसंस्करण

गांवों में सस्ती दरों पर छोटी-छोटी दाल की चक्कियां लगाकर प्रसंस्करण लागत कम करके दालों को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराया जा सकता है. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान द्वारा मिनी दाल चक्की विकसित की गई है.

सही प्रजाति का चयन जरूरी

दलहनी फसलों (Pulse Crops) की खेती में खास इलाके के लिए मुनासिब उन्नतशील बीजों की समय पर बोआई करने भर से पैदावार में करीब 20-30 फीसदी तक का इजाफा हो जाता है. किसानों को सलाह दी जाती है कि वे बीजों का परंपरागत विधि से परीक्षण करने के बाद ही बोआई करें.

बीज उपचार

उड़द के 15-20 किलोग्राम व मूंग के भी 15-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से लेकर उन्हें बोने से पहले 2.5 ग्राम थीरम व 1.0 ग्राम कार्बंडाजिम से उपचारित करें. दीमक तथा अन्य जमीन के कीटों से बचाव हेतु बीजों को 4 मिलीलीटर क्लोरोपाइरीफास या 2 मिलीलीटर एमिडाक्लोराइड से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए. इसके अलावा 250 ग्राम राइजोबियम व 250 ग्राम पीएसबी प्रति 10 किलोग्राम बीज की दर से लेकर उसे गुड़ के घोल में मिलाकर (10 किलोग्राम बीजों के लिए 200 ग्राम गुड़ को आधा लीटर पानी में घोलें) उससे भी बीजों को उपचारित करें.

Pulse Cropsसमय पर करें बोआई

उड़द की बोआई जुलाई के अंतिम हफ्ते से अगस्त के दूसरे हफ्ते तक और मूंग की बोआई मार्च के पहले हफ्ते से मार्च के आखिरी हफ्ते
तक सीड बेड प्लांटर की सहायता से मेंड़ों पर करनी चाहिए.

ऐसे करें कीटों की रोकथाम

कमला कीट

ये कीट पत्तियों के ऊपर शुरुआती अवस्था में झुंड में होते हैं. प्रभावित पत्तियों को काटकर जमीन में दबा दें. इस के अलावा कमला कीट से बचाव के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी की 1.5 लीटर मात्रा 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.
मिथाइल पैराथियान धूल (2 फीसदी) की 25 किलोग्राम मात्रा व फेनवलेट धूल (4 फीसदी) की 0.25 किलोग्राम मात्रा को करीब 1 क्विंटल चूल्हे की राख में मिलाकर सुबह के वक्त बुरकाव करें.

फलीभेदक

फलीभेदक कीट से बचाव के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी की 1.25 लीटर मात्रा या क्यूनालफास 25 ईसी की 1.25 लीटर मात्रा 500-600 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

बीमारियों की रोकथाम जरूरी

इसमें ज्यादातर पीला या चित्तवर्ण (यलोमोजेक) रोग का प्रकोप होता है. इससे पत्तियों पर पीले-सुनहरे चकत्ते पड़ जाते हैं. इस रोग के विषाणु सफेद मक्खी द्वारा फैलते हैं. इस की रोकथाम के लिए डाइमिलोएट 30 ईसी या एमिडाक्लोप्रिड की 250 मिलीलीटर मात्रा 1 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से 4-5 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए.

Women Farmers : जागरूकता की मिसाल, महिला किसान पुष्पा और मनीषा

Women Farmers : दिल्ली के पूसा संस्थान में किसान मेला लगा था. उस में देशभर के किसान, कृषि वैज्ञानिक, मशीन बनाने वाले और दर्शक आए थे. वहां के एक पांडाल में एक बैनर टंगा था, जिसमें महात्मा गांधी की किसानों को लेकर कही एक बात कुछ यों लिखी थी, ‘हमारे कार्यक्षेत्र में पधारने वालों में कृषक एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है.

वह हम पर निर्भर नहीं, वरन हम उस पर निर्भर हैं. वह हमारे कार्य में बाधक नहीं, अपितु वह हमारे कार्य का उद्देश्य है. वह हमारे कार्यकलापों से असंबंधित नहीं, वरन उसका एक भाग है. उसकी सेवा कर हम अनुग्रह नहीं करते, वरन वह सेवा का अवसर प्रदान कर हम को उपकृत करता है.’

किसानों की तरक्की, समाज की तरक्की

महात्मा गांधी ने यह बात कई साल पहले कही थी और यह उनकी दूर की सोच ही थी कि, भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसानों की अनदेखी करना समाज की तरक्की में सबसे बड़ी बाधा है. यह अनदेखी किसानों को भी समझ लेनी चाहिए, क्योंकि आज के दौर में खेती के माने बदल गए हैं.

फसल उगाकर मंडी में बेच देना ही खेती-किसानी नहीं रह गया है, बल्कि अपनी उपज की सही कीमत मिलना भी किसानों के लिए बेहद जरूरी है. अब पूसा संस्थान के उस किसान मेले के एक और पांडाल की बात करते हैं. वहां कुछ औरतें अचार, आर्गेनिक दालें, शहद, कचरी, पापड़ वगैरह बेच रही थीं.

तरक्की करती महिलाएं

पुष्पा कौशिक और मनीषा सिंह जैसी जागरूक और कामयाब महिला किसानों (Women Farmers) ने साबित कर दिया है कि खेती-किसानी महज मर्दों की जागीर नहीं है. अब किसान महिलाएं भी किसी से कम नहीं हैं. जिज्ञासा बढ़ी तो वहां बैठी एक महिला किसान पुष्पा कौशिक से बातचीत की. वे उत्तर प्रदेश के हापुड़ इलाके के लालपुर गांव से आई थीं. उन्होंने अपना एक स्वयं सहायता समूह महिला किसान विकास संस्थान बना रखा है.

दरअसल, एग्री बिजनेस सिस्टम के हिमांशु मंगल पांडे ने उन्हें ऐसे समूह बनाने के लिए सलाह दी थी और इस बात से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने गांव के आसपास के 7 गांवों में 7-7 समूह बनाए,जिनसे 1500 महिला किसान (Women Farmers) जुड़ी हुई हैं.

कैसे कार्य करता है स्वयं सहायता समूह

ऐसे समूहों में औरतों को सिलाई-कढ़ाई की ट्रेनिंग दी जाती है. अचार बनाना, आर्गेनिक दालें उगाना और दलिया वगैरह की प्रोससिंग का काम भी वहां होता है. पुष्पा कौशिक अपने समूह की सचिव हैं. उन्होंने आगे बताया कि, उनके इलाके में सब्जियां खूब उगाई जाती हैं, इसलिए उन्होंने सब्जियों के अचार बनाने की ट्रेनिंग पूसा से ली थी.

इससे उन्हें अपनी मेहनत के दाम काफी अच्छे मिलने लगे थे. उन्हें आज भी पूसा की वरिष्ठ वैज्ञानिक रश्मि सिंह की कही बात याद है कि, थोड़ा सा दिमाग लगाने और सही दिशा में मेहनत करने से किसान अपने सामान की उचित कीमत पा सकते हैं.

कैसे की सब्जियों की प्रोसेसिंग

पुष्पा कौशिक को पहले मंडी में अपनी सब्जियों के दाम कम मिलते थे, लेकिन सब्जियों की ग्रेडिंग करने से अच्छे दाम मिलने लगे. उन्होंने यह भी बताया कि, वे अपनी उपज में रासायनिक खाद नहीं डालती हैं. दालों व दलिया वगैरह की प्रोसेसिंग हाथ की चक्की से की जाती है. मसाले भी इमामदस्ते में कूटे जाते हैं. बिल्कुल घरेलू तरीके से कार्य किया जाता है.

समूह के जरिए अच्छी कमाई

क्या अपने बनाए सामान की मार्केटिंग करने की समस्या नहीं आती है? इस सवाल पर पुष्पा कौशिक ने कहा कि, बिल्कुल आती है. ज्यादातर समूह सामान तो बना लेते हैं, लेकिन उस सामान को उचित कीमत पर बेचने की समस्या तो बनी रहती है. हमें पूसा के बिक्री केंद्र में दुकान मिली हुई है, जहां हमारे समूहों का बनाया सामान अच्छी कीमत पर बिकता है.

मनीषा सिंह ने भी बनाया समूह

जब कचरी व पापड़ बनाने के बारे में जानकारी लेनी चाही, तो पुष्पा कौशिक ने एक और महिला किसान मनीषा सिंह से हमें मिलवाया. वे हापुड़ के नजदीक कुचेसर रोड चोपला गांव से आई थीं. उन्होंने भी एक स्वयं सहायता समूह ‘सोसाइटी फॉर रूरल एंड एग्रीकल्चर डेवलपमेंट’ बनाया हुआ है, जो 3 साल पुरानी संस्था है.

उनके समूह में मूंग दाल, उड़द दाल, चावल, आलू वगैरह से पापड़ व कचरी बनाई जाती है. ऐसा करके महिला किसानों (Women Farmers) को अच्छा मुनाफा होता है और उनकी साथी औरतें इतनी मेहनत व लगन से ये सब चीजें बनाती हैं कि आज तक किसी ग्राहक ने कोई शिकायत नहीं की है.

अपनी संस्था की अध्यक्ष मनीषा सिंह ने आगे बताया कि, वे ज्यादातर चीजें खुद ही उगाती हैं. कुछ सामान बाजार से भी खरीदती हैं. यह सब करने के लिए ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं होती है. बस, अपने काम के प्रति ईमानदार होना चाहिए.

इन दोनों महिला किसानों (Women Farmers) से बातचीत करके यह अनुभव हुआ कि, जागरूकता व तकनीक का सही इस्तेमाल ही तरक्की का रास्ता है. दोनों महिला किसान (Women Farmers) किसी मंझे हुए मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव की तरह बात कर रही थीं. उनका पहनावा भी सलीके वाला था.

मनीषा सिंह के तो पति भी उन के काम में मदद करते हैं, जो एक प्राइवेट कंपनी में सिविल इंजीनियर हैं. इस तरह की महिला किसानों (Women Farmers) के बारे में जानकर यह लगता है कि, अगर किसान सही दिशा में अपना दिमाग लगाएं तो खेती-किसानी से अच्छी कमाई कर सकते हैं.

Irrigation Technique: ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ सिंचाई की खास तकनीक

Irrigation Technique : दुनिया-भर में दिनों-दिन पानी की कमी होती जा रही है. ऐसे में भारत भी इससे अछूता नहीं है. खासकर पारंपरिक तरीके से की गई खेती में पानी की अधिक बरबादी होती है. परंतु अब तकनीक का दौर है तो खेती की सिंचाई के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं. सरकार भी सिंचाई की अनेक आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएं चलाती है. ऐसी ही एक खास योजना ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ है. जानिए इस योजना के बारे में क्या है इसमें खास और किसान कैसे इस तकनीक का लाभ लें.

पानी की बचत और ज्यादा उत्पादन

इस सिंचाई पद्धति (Irrigation Technique) को अपनाकर किसान 40 से 50 फीसदी तक पानी की बचत कर सकते हैं, साथ ही 30 से 40 फीसदी तक उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है. खेती में सरकार की ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ माइकोइरीगेशन योजना के तहत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को प्रभावी ढंग से विभिन्न फसलों में अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है.

बूंद-बूंद का इस्तेमाल

इस खास तकनीक को बूंद-बूंद सिंचाई और फव्वारा सिंचाई भी कहा जाता है. इस तकनीक में बूंद-बूंद पानी सिंचाई के काम आता है और पानी की बिलकुल बर्बादी नहीं होती, इसलिए जहां पानी की कमी है, वहां के लिए तो यह तकनीक बहुत ही फायदेमंद है.

क्या है ड्रिप इरीगेशन पद्धति

फसल के अनुसार सिंचाई तकनीक का करें इस्तेमाल. इसमें मिनी, पोर्टेबल, सेमी परमानेंट एवं रेनगन स्प्रिंकलर अलग-अलग सिंचाई के तरीके हैं, लेकिन सभी पानी की बचत के साथ-साथ अच्छी फसल उत्पादन देने में मदद करते हैं.

Irrigation Technique

कौन-सी फसलों में अपनाएं यह तकनीक

बागबानी / फल उद्यान फसलें – आम, अमरूद, आंवला, नीबू, बेल, बेर, अनार, अंगूर, आड़ू, लोकाट, आलूबुखारा, नाशपाती, पपीता एवं केला आदि.

सब्जियां – टमाटर, बैगन, भिंडी, मिर्च, शिमला मिर्च, गोभीवर्गीय, कद्दूवर्गीय एवं अन्य इसी तरह की खेती में कारगर.

सुगंधित एवं औषधीय फसलें – रजनीगंधा, ग्लेडियोलस, गुलाब और औषधीय एवं सुगंधित अन्य फसलों में भी.

अन्य फसलें – आलू, गन्ना और भी कई फसलों में इस योजना के तहत लाभ उठाकर सिंचाई की जा सकती है.

कैसे ले सकते हैं योजना का लाभ

‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना का संचालन वेब बेस्ड UPMIP पोर्टल के माध्यम से किया जा रहा है. जो किसान इसका लाभ लेना चाहते हैं वे www.upmip.in पोर्टल पर पंजीकरण करवा सकते हैं और सूक्ष्म सिंचाई पद्धति (Irrigation Technique) का लाभ ले सकते हैं. इसके लिए 10 से 90 फीसदी तक अनुदान मिलता है, जो फसल के अनुसार अलग – अलग होता है.

आज के समय पानी खेती की सबसे बड़ी जरूरत है. अगर समय पर फसल को पानी नहीं मिला तो फसल बर्बाद होते समय नहीं लगता. ऐसे में सिंचाई योजनाओं को अपनाना किसानों के लिए फायदे की बात है.

Organic Farming : ‘कृषि मित्र’ किसान विज्ञान शुक्ला की सफलता की कहानी, जानिएं

खेती में रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्ट‌ी की घटती उर्वराशक्ति और आमजन की बिगड़ती सेहत का जज्बा समझते हुए बांदा जिले के अतर्रा गांव के युवा किसान विज्ञान शुक्ला ने एक ऐसी राह चुनी जो खुद के लिए तो मील का पत्थर साबित हुई और अन्य किसानों के लिए भी खेती में नई राह दिखाने का काम कर रही है. विज्ञान शुक्ला बांदा जिले के ऐसे प्रगतिशील किसान हैं, जिनके साथ आज बुंदेलखंड क्षेत्र के लगभग 15 हजार से अधिक किसान जुड़े हुए हैं और उन के बताए रास्ते पर चल कर सफल खेती कर रहे हैं.

जैविक खेती को अपना कर लाखों की कमाई :

विज्ञान शुक्ल ने बताया कि स्नातक की पढ़ाई के दौरान परिजनों को रासायनिक खादों से जूझते देख कर उन का मन दुखी हो गया था. उन्होंने बताया कि ज्यादातर किसान खेती में रासायनिक खादों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं, जिस से खेत की मिट्टी खराब होने के साथ ही लोगों की सेहत के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है.

ऐसे में मैं ने एक नई शुरुआत की और कंपोस्ट खाद के निर्माण में जुट गया और खेती में मित्र कीट कहे जाने वाले केंचुओं से बनने वर्मी कंपोस्ट और गोबर की खाद को अपनाया. इस की शुरुआत करने के लिए चार चरही में गोबर भर कर कन्नौज से लाए और उस में केंचुए ला कर छोड़े तो अच्छी वर्मी कंपोस्ट खाद बनने की शुरुआत हुई.

अच्छे नतीजों से उत्साहित हो कर कृषि एवं उद्यान विभाग से अनुदान ले कर काम को आगे बढ़ाया. कुछ समय बाद खेतों में पैदावार बढ़ने लगी, जिस से खाद में अच्छा उत्पादन होने लगा, तो आमदनी भी बढ़ने लगी. 3 वर्षों के बाद इस काम से फसल पैदावार के अलावा खाद बिक्री से लाख रुपया प्रतिवर्ष आय के रूप आने लगा.

कभी अकेले चले थे अब हजारों कदम हैं साथ :

विज्ञान शुक्ला ने अब से लगभग 15 साल पहले अकेले ही जैविक खेती की शुरुआत की और कंपोस्ट बनाने का काम अपने घर से शुरू किया और आज उन से प्रेरणा ले कर जिले के लगभग हजारों किसान जैविक खेती को अपना रहे हैं, जो लगातार उन के संपर्क में रह कर जैविक खेती के अच्छा फसल उत्पादन ले रहे हैं. उन्होंने बताया कि जैविक खेती की शुरुआत के 2 सालों में फसल उत्पादन में 10 से 12 फीसदी तक की कमी आई थी, जो बाद में पूरी हो गई. अब तो रासायनिक खेती की तुलना में 20 से 25 फीसदी अधिक पैदावार मिलती है और कम लागत में गुणवत्तायुक्त फसल उत्पादन मिलता है, जिस के बाजार दाम भी अच्छे मिलते हैं.

विज्ञान शुक्ला ने बताया कि उन के प्रक्षेत्र पर स्थापित वर्मी कंपोस्ट यूनिट, पशुपालन यूनिट, जैविक आउटलेट पर अभी तक लगभग 10 हजार किसान भ्रमण कर चुके हैं.

पशुपालन (Dairy Farming) बना मददगार :

विज्ञान शुक्ला ने बताया कि वे पशुपालन भी कर रहे हैं, जो उन के लिए खेती में खासा मददगार बन रहा है. पशुओं से मिलने वाले गोबर से खाद बनाने का काम तो आसान होता ही है, बल्कि पैसे की भी बचत होती है. डेयरी फार्मिंग के कारोबार से दूध की प्रोसैसिंग कर अनेक उत्पादों से भी खासी कमाई हो जाती है.

कैसे करते हैं खेती :

विज्ञान शुक्ला धान, गेहूं, ज्वार, हाईब्रिड ज्वार, मूंग आदि की खेती करते हैं और खेत की एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करते हैं और 3 जुताई कल्टीवेटर से कर मिट्टी की संतुति के अनुसार बीज तय करते हैं. जुताई के समय गोबर की खाद 6 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालते हैं. खरपतवार की रोकथाम के लिए समय पर निराईगुड़ाई का काम करते हैं और पहली निराई के समय पौधों में विरलीकरण का काम करते हैं. पहली सिंचाई खेती में पुष्पावस्था के समय और दूसरी सिंचाई पुष्प आने के बाद करते हैं.

जैविक तरीके से फसल सुरक्षा :

फसल सुरक्षा के लिए रस चूसने वाले कीटों और छोटी सूंड़ी, इल्लियों की रोकथाम के लिए नीमशास्त्र का इस्तेमाल और कीटों और बड़ी सूंड़ी के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं. छिड़काव के लिए 100 लिटर पानी में 2.5 मिलीलिटर नीमास्त्र/ ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं और फसल तैयार होने के बाद फसल काटने पर उसे धूप में सुखा कर 10 से 12 फीसदी नमी पर उस का भंडारण करते हैं. सुरक्षित भंडारण के लिए नीम की सूखी पत्तियों का इस्तेमाल करते हैं. बीज बोने से पहले उस का बीजशोधन ट्राइकोग्रामा 4 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर के बाद राइजोबियम कल्चर 200 ग्राम प्रति 10 किलोग्राम बीज की दर से करते हैं.

लोगों को दे रहे हैं रोजगार :

विज्ञान शुक्ला का कहना है कि उन के प्रक्षेत्र पर 30 वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगी हैं और 13 पशुपालन यूनिट हैं. जैविक आउटलेट हैं जिन के जरीए लगभग सैकड़ों लोगों को रोजगार मिल रहा है.

राष्ट्रीय स्तर के कृषि पुरस्कार से सम्मानित :

विज्ञान शुक्ला को उन के द्वारा खेती में किए जा रहे उत्कृष्ट कार्य के लिए अनेक राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिल चुके हैं, जिस में राष्ट्रीय स्तर का ‘जगजीवनराम अभिनव पुरस्कार’ भी शामिल है. इस के अलावा पिछले साल दिल्ली प्रैस द्वारा ‘फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड’ के अलावा उन्हें ढेरों सम्मान मिल चुके हैं.

विज्ञान शुक्ला ने अनुसार वर्मी कंपोस्ट तकनीक में 15 फुट लंबी, 3 फुट चौड़ी, 2 फुट ऊंची चरही में 15 क्विंटल गोबर और 4 क्विंटल केंचुआ की जरूरत पड़ती है, जिस में 11 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार हो जाती है.

यह खाद 2 एकड़ खेत के लिए पर्याप्त है. इस में सभी 16 पोषक तत्त्व होते हैं. इस के प्रयोग से यूरिया, डीएपी जैसी रासायनिक खादों की जरूरत नहीं पड़ती है. छोटा से छोटा किसान भी वर्मी कंपोस्ट खाद का उत्पादन कर सकता है.

Frost : सर्दी के मौसम में फसलों को पाले से कैसे बचाएं

Frost: बारिश में ओले और गरमियों में सूखे से जो नुकसान फसलों को होता है, वही जाड़ों में पाले से होता है. कुदरत के इस मौसमी कहर के आगे भी किसान बेबस रहते हैं और फटी आंखों से पाले से हुए नुकसान को देखते रहते हैं.

लेकिन पाले से होने वाले नुकसान को एक हद तक काबू में किया जा सकता है. जब तेज ठंड पड़ती है तो पाले का डर भी बढ़ता है, जिस का ठीकठीक अंदाजा किसान नहीं लगा पाते. कई दफा जब सुबह वे खेत पर जाते हैं, तो सूखे पेड़ देख सिर ठोक लेते हैं कि पाला (Frost) पड़ गया और पैदावार पर ताला जड़ गया.

पाला (Frost) कम से कम नुकसान पहुंचाए, इस के लिए किसान क्या करें? इस बाबत जब कृषि  के माहिर आशीष त्रिपाठी से बात की तो उन्होंने तफसील से जानकारी दी कि जाड़े के दिनों में जब वायु मंडल का तापमान हिमांक से नीचे गिरता है यानी पानी बर्फ की शक्ल में जमने लगता है, तब हवा में मौजूद नमी ओस में तब्दील न हो कर बर्फ के छोटेछोटे कणों में बदल जाती है, जिस से पौधों की पत्तियों का पानी जम जाता है. इस से कोशिकाएं फट जाती हैं और पत्तियां सूख जाती हैं. इसे ही पाला पड़ना कहते हैं. पेश हैं पाला पड़ने के कारणों वगैरह पर आशीष त्रिपाठी से हुई लंबी बातचीत के खास अंश:

क्या पाला पड़ने का अंदाजा पहले से लगाया जा सकता है?

जी हां, किसानों को रोजान मौसम का हाल पता करते रहना चाहिए. यह अखबारों, रेडियो और टीवी के जरीए पता किया जा सकता है. इन्हीं के जरीए जाना जा सकता है कि कब पाला पड़ने वाला है. इस के अलावा तेज जाड़े के मौसम में जब दिन में आसमान साफ रहे और तेज हवाएं न चलें, तो सुबह और शाम के तापमान में गिरावट आती है, ऐसे में पाला (Frost) गिरने का डर ज्यादा रहता है.

इसी तरह जब हवा में आर्द्रता यानी गीलापन कम हो और खेत के नजदीक का तापमान बर्फ जमने के तापमान से कम हो तो पाला गिर सकता है. इस के अलावा जब आसामन के बादल छंटते नजर आएं और हवा की रफ्तार कम हो तो यह भी पाला गिरने का इशारा है.

पाला कैसे नुकसान पहुंचाता है?

पाला (Frost) गिरने से पौधों में खाना बनना रुक जाता है और वे सांस भी नहीं ले पाते. इस से जरूरी पोषक तत्त्व पौधों को नहीं मिल पाते, नतीजतन वे सूखने लगते हैं.

पाले का असर कबकब ज्यादा होता है?

अकसर जाड़े की शुरुआत व आखिर में पाले का कहर ज्यादा देखने में आता है.

पाले से बचाव के लिए किसानों को क्या करना चाहिए?

अगर पाले का डर या अंदेशा हो, तो दिन के वक्त जब धूप खिली हो तब खेत में सिंचाई करने से पाला (Frost) असर नहीं डाल पाता. इस के अलावा शाम के वक्त खेत के चारों तरफ घासफूस में आग लगा कर धुंआ करने से भी पाले का असर कम होता है, पर इस दौरान ध्यान रखना चाहिए कि आग फैल कर नुकसान न पहुंचाए. पानी में घुलनशील सल्फर 80 फीसदी की 2 ग्राम मात्रा 1 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कने से भी फायदा होता है. छोटे पौधों और नर्सरी के ऊपर छांव कर देने से पाले का असर कम होता है.

फलदार पेड़ों में डालियों के नीचे पेपर, कपड़ा या टाटपट्टी बांधने से पाले का नुकसान कम किया जा सकता है. पपीता और आम जैसे पेड़ों में इसे आसानी से किया जा सकता है. फल वाले नए लगाए पौधों के चारों तरफ घासफूस डाल कर उन्हें पाले से बचाया जा सकता है.

सब्जियों को पाले से बचाने के लिए क्या मशवरा देंगे?

सिर्फ सब्जियों को ही नहीं, बल्कि फूल वाली फसलों को भी पाले से नुकसान होता है. इन में गंधक वाले रसायनों का इस्तेमाल आधार खाद के रूप में करना चाहिए.

पाले का अंदाजा हो तो सब्जियों और फूल वाले खेतों में 2 ग्राम सल्फर प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करने से नुकसान काफी कम किया जा सकता है.

क्या तमाम फसलों की पाला रोधी किस्में मौजूद हैं?

सभी फसलों की तो नहीं हैं, लेकिन सब्जियों की कुछ किस्में हैं, जिन पर पाले का असर कम होता है. मसलन टमाटर की पूसा शीतल और मटर की पीएमएम 3 पाला (Frost) रोधी किस्में हैं.

Makhana Revolution : ‘मखाना क्रांति’ का नया रोडमैप

Makhana Revolution : 10 सितंबर 2025. बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर ने मखाना को वैश्विक सुपरफूड ब्रांड बनाने हेतु एक नई कार्ययोजना जारी की है. यह कार्ययोजना मखाना विकास योजना (एमडीएस) की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में जारी की गई, जिस की अध्यक्षता बीएयू सबौर के अनुसंधान निदेशक और एमडीएस के सीईओ डा. अनिल कुमार सिंह ने की, जहां वैज्ञानिकों और संस्थागत प्रतिनिधियों ने किसान आय बढ़ाने, बीज गुणवत्ता सुधारने और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में विस्तार की रणनीतियों पर विस्तृत विचारविमर्श किया.

बैठक में डा. शैलबाला डे (उप निदेशक अनुसंधान), प्रो. डा. दिलीप कुमार महतो (सह डीन सह प्राचार्य, बीपीएसएसी पूर्णिया और नोडल, एमडीएस), डा. अनिल कुमार (प्रधान अन्वेषक, एमडीएस), डा. तपन गोराई (सह-अन्वेषक), डा. अभिनव कुमार, डा. बालकृष्ण और डा. प्रीति सुंदरम सहित अन्य समिति सदस्य और हितधारक उपस्थित रहे.

नवाचार, किसान प्रशिक्षण और और्गेनिक पहल

बैठक में पायलट प्रोजैक्ट की समीक्षा, किस्म सुधार, कीट प्रबंधन और ‘नो योर क्रॉप’ (केवाईसी) पहल के तहत और्गेनिक मखाना के संवर्धन पर विशेष चर्चा हुई. समिति ने प्रत्येक पखवाड़े ‘मखाना चौपाल’ आयोजित करने पर बल दिया, जिस से किसानों को वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध हो सके. साथ ही प्रशिक्षण मौड्यूल, क्षेत्र विशिष्ट कृषि पैकेज और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के माध्यम से व्यापक प्रसार की योजनाओं को अंतिम रूप दिया गया.

मखाना की महत्ता पर बल देते हुए डा. अनिल कुमार सिंह, अनुसंधान निदेशक और सीईओ, एमडीएस ने कहा, “मखाना केवल मिथिला की फसल नहीं, बल्कि भारत का गौरव है. जलवायु के अनुरूप लचीले सुपरफूड के रूप में इस में अपार पोषण और आर्थिक संभावनाएं हैं. यह किसानों की आय बढ़ाने के साथसाथ भारत के निर्यात टोकरे को भी सशक्त बनाएगा. बीएयू सबौर, एमडीएस के माध्यम से तकनीक को खेतखेत तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है.”

पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की दिशा में कदम

बीएयू सबौर और आईटीसी लिमिटेड के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर विचार किया जा रहा है, जिस के तहत मखाना की खेती का विस्तार और किसानों को बेहतर बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में काम होगा. यह सहयोग तालाब से थाली तक पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करेगा.

प्रगति की सराहना करते हुए बीएयू सबौर के कुलपति डा. डीआर सिंह ने कहा, “बीएयू सबौर मखाना अनुसंधान एवं विकास का राष्ट्रीय केंद्र बन कर उभरा है. मखाना विकास योजना के माध्यम से हम न केवल उत्पादन बढ़ा रहे हैं, बल्कि मिथिला मखाना की वैश्विक पहचान भी गढ़ रहे हैं. विज्ञान, नवाचार और किसान सहभागिता की यह संगति भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में नया अध्याय लिखेगी.”

निष्कर्ष

बैठक का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि बिहार को भारत की मखाना क्रांति (Makhana Revolution) का केंद्र बनाया जाएगा. बीएयू सबौर ने सतत कृषि नवाचार और किसान केंद्रित विकास में अपनी अग्रणी भूमिका को एक बार फिर पुष्ट किया.