Subsidy : गर्मी आते ही देश-भर में पानी की कमी होने लगती है. देश के कई राज्यों में पीने के पानी की समस्या होने लगती है, तो किसानों के सामने सिंचाई की समस्या होती है. खेत में लगे नलकूपों के पानी का स्तर नीचे चला जाता है. ऐसे में पानी की कमी होना लाजिमी है. ऐसे में किसान क्या करें?
ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई है समाधान
यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें बहुत ही कम पानी में खेत की सिंचाई होती है. लेकिन इस तकनीक को अपनाना थोड़ा महंगा होता है इसलिए जयादातर किसान इस से पीछे हट जाते हैं. इसी समस्या और किसानों की परेशानी देखते हुए बिहार के किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है.
सिंचाई प्रणाली लगाने पर 90 प्रतिशत तक सब्सिडी
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (सूक्ष्म) Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana (PMKSY) के तहत अब किसानों को ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली लगाने पर 90 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाएगी. इस योजना का लाभ किसान उठा सकते हैं.
योजना में किसे कितनी कितनी सब्सिडी मिलेगी, आइए जानते हैं :
-लघु और सीमांत किसानों को ड्रिप सिंचाई पर 80 प्रतिशत तक अनुदान मिलेगा.
-अन्य किसानों को 70 प्रतिशत तक सहायता दी जाएगी.
-पट्टाधारी किसानों को 90 प्रतिशत तक सब्सिडी का लाभ मिलेगा. वहीं पोर्टेबल स्प्रिंकलर योजना के तहत लघु और सीमांत किसानों को 55 प्रतिशत अनुदान और अन्य किसानों को 45 प्रतिशत अनुदान राशि दी जाएगी.
क्या है यूह तकनीक
इस तकनीक में पानी बूंद-बूंद करके सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे पानी की बर्बादी नहीं होती. वहीं स्प्रिंकलर प्रणाली में खेतों में फुहार के रूप में सिंचाई की जाती है. स्प्रिंकलर वाली तकनीक पहाड़ी क्षेत्रों के लिए काफी अच्छी मानी जाती हैं. पारंपरिक सिंचाई के मुकाबले ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीक से लगभग 60 प्रतिशत तक पानी बचाया जा सकता है, जबकि उत्पादन में अच्छी बढ़ोतरी होती है.
योजना के तहत कई लाभ
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (सूक्ष्म) के अंतर्गत किसानों को कई प्रकार की सुविधाएं दी जा रही हैं. इसमें ड्रिप सिंचाई, मिनी और माइक्रो स्प्रिंकलर, पोर्टेबल स्प्रिंकलर सिस्टम के साथ-साथ निजी नलकूप, कुआं और तालाब जैसे जल स्रोतों के विकास पर भी सहायता दी जाती है.
कितने रकबे वाला किसान लेगा लाभ
इस ड्रिप सिंचाई योजना का लाभ लेने के लिए न्यूनतम 0.5 एकड़ और अधिकतम 12.5 एकड़ वाले किसान लाभ उठा सकते हैं. इसके अलावा पोर्टेबल स्प्रिंकलर योजना के लिए न्यूनतम 1 एकड़ और अधिकतम 5 एकड़ तक आवेदन किया जा सकता है.
इस योजना का एक खास नियम यह भी है कि जो किसान पहले इस योजना का लाभ ले चुके हैं, वे 7 साल बाद ही दोबारा आवेदन कर सकेंगे.
योजना का लाभ लेने के लिए करें आवेदन
यह योजना बिहार के किसानों के लिए है. इस का लाभ लेने के लिए बिहार कृषि विभाग के ऐप या आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं. आवेदन के दौरान जरूरी दस्तावेज अपलोड करने होंगे.
Kisan Mitra Chhadi : पिछले कुछ समय पहले शाहजहांपुर में खेत पर काम कर रहे एक किसान की सांप के डसने से मौत हो गई थी. परिजन उसे इलाज के लिए ले जा रहे थे, तभी रास्ते में पानी पीने के बाद उसने दम तोड़ दिया. मृतक की पहचान बंडा थाना क्षेत्र के सैदापुर गांव निवासी 32 वर्षीय बागीश कुमार के रूप में हुई है.
इस तरह की खबरें आए दिन सुनने में आती रहती हैं. अक्सर खेत में लगे नलकूप के कुओं में भी कई बार सांप गिर जाते हैं जो कई बार बाहर नहीं निकल पाते और जब कभी किसान किसी कारणवश उसे कुएं में घुसता है तो भी सांप के डसने का खतरा बना रहता है.
किसान के लिए कदम-कदम पर खतरा
खेती में काम करते समय किसान के लिए कदम-कदम पर खतरा है. कहीं जंगली जानवर का, तो कहीं प्राकृतिक आपदा का या फिर अन्य खतरनाक जीव-जंतुओं का. लेकिन इन खतरों में सांप से सुरक्षा सबसे अहम है, क्योंकि कभी-कभी ‘सांप का काटा पानी भी नहीं मांगता’ ऐसी कहावत भी कही गई है. लेकिन हाल ही में सांप से सुरक्षा के लिए एक खास छड़ी विकसित की गई है, जो किसान को सांप से सुरक्षा देती है.
सरकार की नई पहल- ‘किसान मित्र छड़ी’
खेतों में सांप निकलने पर किसान सचेत हो सके और अपनी सुरक्षा कर सके इसी समस्या से निबटने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने ‘किसान मित्र छड़ी’ (Kisan Mitra Chhadi) तैयार की है. यह 100 मीटर के दायरे में मौजूद सांप या विषैले जीवों की पहचान बहुत आसानी से कर सकती है.
किसानों को सांप और जहरीले जीव-जंतुओं से बचाने के लिए ‘किसान मित्र छड़ी’ नामक आधुनिक उपकरण लॉन्च किया गया है. यह छड़ी 100 मीटर के दायरे में खतरे का पता लगाकर कंपन करती है, जिससे किसान सतर्क हो जाते हैं.
कैसे करती काम यह छड़ी
इस छड़ी में एक बटन लगा होता है और जब मौजूद बटन को दबाया जाता है, तो खतरा भांपते ही यह कंपन करने लगती है. यह कंपन या वाइब्रेशन किसान को सतर्क रहने के लिए अलर्ट कर देती है. यह छड़ी 100 मीटर के दायरे में सांप की मौजूदगी भांपकर वाइब्रेशन के जरिए अलर्ट करती है. यह छड़ी रात के समय खेत में पानी लगाते समय भी किसानों के काम आती है, क्योंकि इसमें सोलर टॉर्च लगी होती है जो अंधेरे में रोशनी देने का काम करती है.
किसान मित्र छड़ी की क्या हैं विशेषताएं
-इसमें आधुनिक सेंसर लगे हैं, जो जमीन के कंपन से सांप का पता लगाते हैं.
-यह छड़ी 100 मीटर तक के दायरे में जहरीले जीव-जंतुओं की पहचान कर सकती है.
-खतरा भांपते ही छड़ी में कंपन (vibration) शुरू हो जाता है, जिससे किसान सतर्क हो जाते हैं.
-अंधेरे में रोशनी के लिए इसमें सोलर टॉर्च भी लगी होती है.
-छड़ी को काम में लेने के लिए इसे जमीन पर रखकर इसका बटन ऑन करना जरूरी है.
हर साल खेत में काम करने वाले लाखों किसानों को सांप द्वारा काटा जाना और हजारों किसानों की मौत हर साल होना आम बात है. लेकिन अब सांपों से सुरक्षा के लिए बनी खास छड़ी किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच है जो सांप जैसे जहरीले जीव-जंतु से किसानों को बचाएगी और वे सुरक्षित खेत में काम कर सकेंगे.
Mango Diseases: आम नम व सूखी दोनों प्रकार की जलवायु में उगता है. लेकिन जिन इलाकों में जून से सितंबर तक अच्छी बारिश होती है व बाकी महीने सूखे रहते हैं वहां आम की फसल अच्छी होती है. गरम व सूखी आबोहवा में उगने वाले आम के पेड़ों व फलों को रोगों से बचाना बहुत जरूरी है. आम में लगने वाली खास बीमारियों व उन की रोकथाम के बारे में यहां बताया जा रहा है:
सफेद चूर्णिल आसिता : गरम व नम आबोहवा और ठंडी रातों में यह बीमारी ज्यादा लगती है. बौरों और नई पत्तियों पर सफेद या सफेद चूर्णिल वृद्धि दिखाई पड़ती है. बीमारी पेड़ के ऊपर से शुरू हो कर नीचे की ओर फूल, नई पत्तियों और पतली शाखाओं पर फैल जाती है. इस से पेड़ की बढ़वार रुक जाती है. फूल और पत्तियां गिर जाती हैं. यदि बीमारी लगने से पहले फल लग गए हों तो वे कच्ची अवस्था में ही गिर जाते हैं.
रोकथाम
* रोकथाम के लिए 0.05 से 0.1 फीसदी कैराथेन/ 0.1 फीसदी बाविस्टीन/ 0.1 फीसदी बेनोमिल/ 0.1 फीसदी कैलेक्जीन का छिड़काव करना फायदेमंद होता है.
* घुलनशील गंधक (0.2 फीसदी) नामक कवकनाशक दवाओं का घोल बना कर पहला छिड़काव जनवरी में, दूसरा फरवरी के शुरू में और तीसरा छिड़काव फरवरी के अंत में करना चाहिए.
काला धब्बा या एंथ्रेकनोज : यह बीमारी पेड़ों की कोमल टहनियों, फलों और फूलों पर देखी जा सकती है. इस की वजह से पत्तियों पर भूरे या काले रंग के गोल आकार के धब्बे पड़ जाते हैं, जिस से पत्तियों की बढ़वार रुक जाती है और वे सिकुड़ जाती हैं. कभीकभी रोगग्रस्त ऊतक सूख कर गिर जाते हैं, जिस से पत्तियों में छेद दिखाई पड़ते हैं. बीमारी ज्यादा लग गई हो तो पत्तियां गिर जाती हैं. कच्चे फलों पर काले धब्बे बनते हैं. धब्बे के नीचे का गूदा सख्त हो कर फट जाता है और फल गिर जाते हैं. इस बीमारी से फल सड़ जाते हैं.
रोकथाम
* बीमार टहनियों की छंटाई कर के उन्हें गिरी हुई पत्तियों के साथ जला देना चाहिए.
* छंटाई के बाद पेड़ पर कवकनाशी रसायनों जैसे कापर आक्सीक्लोराइड 0.3 फीसदी का छिड़काव 15 दिनों के अंतर पर करना चाहिए.
* रोगी पेड़ों पर 0.2 फीसदी ब्लाइटाक्स 50, फाइटलोन या बोर्डो मिश्रण (0.8 फीसदी) नामक दवाओं के घोल का फरवरी से मई के बीच तक 2-3 बार छिड़काव करना चाहिए. बाविस्टीन (0.1 फीसदी) रोग को कम करने में बहुत फायदेमंद होता है.
* फल को 0.05 फीसदी कार्बेंडाजिम के घोल में डुबो कर भंडारित करें.
काली फफूंदी चोटी मोल्ड : भारत में फलों व बगीचों की यह एक सामान्य बीमारी है. यह आम पर हमला करने वाले कीटों से होती है. ये कीट पेड़ की पत्तियों व हरी टहनियों पर मीठा रस छोड़ते हैं. इस रस पर काली फफूंद तेजी से बढ़ती है और कवक काले रंग के बीजाणु बनाता है. इस से पत्तियां और टहनियां काली व भद्दी दिखती हैं. पौधा या पेड़ खाना बनाने के लायक नहीं रह जाता है. पत्तियां कमजोर हो कर गिर जाती हैं.
रोकथाम
* स्केल कीट गुजिया व भुनका कीटों की रोकथाम मुनासिब कीटनाशक से करने पर उन से निकलने वाले पदार्थ की कमी के कारण फफूंद भी लग जाती है.
* इलोसाल (900 ग्राम प्रति 450 लीटर पानी) का 10-15 दिनों के अंतर पर छिड़काव बहुत फायदेमंद होता है.
* इस के अलावा वेटासुल (विलनशील गंधक)+मेटासिड (मिथाइल पैराथियान)+गोंद (0.2 फीसदी-0.1 फीसदी-0.3 फीसदी) का छिड़काव फायदेमंद होता है.
* इस रोग से बचाव के लिए सब से पहले कीटनाशक जैसे मैलाथियान, पेराथियान या निकाटिन सल्फेट (0.05 फीसदी) का छिड़काव करना चाहिए. इस के बाद ब्लाइटाक्स 50 (0.2 फीसदी) का छिड़काव 2 बार करना चाहिए.
पत्ती अंगमारी : यह बीमारी आम की पूरी पत्तियों पर अकसर देखी जाती है. पत्तियों पर गोल, हलके भूरे धब्बे दिखाई देने लगते हैं. ये धब्बे गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं. इन का घेरा चौड़ा कुछ उठा हुआ और गहरे बैगनी रंग का होता है. पुराने धब्बों का रंग राख के समान हो जाता है.
रोकथाम
* इस रोग को कम करने के लिए रोगी पत्तियों को इकट्ठा कर के जला देना चाहिए.
* बेनोमिल (0.2 फीसदी) या कापर आक्सीक्लोराइड (0.3 फीसदी) का छिड़काव करना कारगर होगा.
चोटी सुखन : इसे उल्टा सूखा रोग या शीर्ष मरण रोग कहते हैं, यह रोग बाट्रीयोडिप्लोडिया थियोब्रोमी नामक फफूंद के कारण होता है. यह रोग साल में कभी भी देखा जा सकता है. लेकिन इसे अक्तूबर और नवंबर में ज्यादा देखा जा सकता है. इस में सब से पहले पत्तियों पर गहरे धब्बे बनते हैं, जिस की वजह से पत्तियां पीली हो कर गिर जाती हैं व टहनी नंगी हो कर ऊपर से नीचे की तरफ सूखने लगती है. इस रोग के कारण अकसर पीले रंग का गाढ़ा स्राव भी निकलते देखा गया है.
रोकथाम
* टहनी जहां तक सूख गई हो, उस के 10 सेंटीमीटर नीचे से पेड़ के स्वस्थ भाग के साथ काट कर अलग करने के बाद कौपर आक्सीक्लोराइड (0.3 फीसदी) का 15 दिनों के अंतर पर 2 बार छिड़काव करना चाहिए.
* कलम के लिए उपयोग की जाने वाली शाखा का निरोग होना जरूरी है. साल में 2 बार बोर्डो पेस्ट मुख्य तने पर लगाएं.
* ऐसे बाग जहां पर यह रोग अधिक व बारबार होता हो वहां नेप्थलीन एसिटिक एसिड का छिड़काव अक्तूबर व नवंबर में करना चाहिए.
तने से गोंद निकलना : इसे गमोसिस रोग कहते हैं. यह एक फफूंद जनित रोग है. यह रोग बरसात के आखिर में ज्यादा दिखाई देता है. इस में मुख्य तने, शाखा और पेड़ों की छाल पर गोंद का रिसाव देखा गया है व दरार जैसा फटा हुआ दिखाई देता है. कुछ समय के बाद पौधा सूख जाता है.
रोकथाम
* तेज चाकू से छाल हटा कर बोर्डो पेस्ट का लेप लगाएं. पेड़ को निरोगी बनाए रखने के लिए समयसमय पर कवकनाशक रसायनों का छिड़काव करते रहना चाहिए.
* बाग में पत्तियों पर धब्बों की रोकथाम के लिए कापर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव करते रहना चाहिए जिस से यह रोग कम होता है.
* कापर सल्फेट को 500 ग्राम प्रति पेड़ की दर से पेड़ों के चारों तरफ डालना फायदेमंद होता है.
जीवाणु कैंकर : यह रोग पत्तियों और फलों पर काले धब्बे के रूप में देखा जा सकता है. फलों में फटने के लक्षण भी दिखाई देते हैं. पहले रोग लगी सतह पर गीले धब्बे बनते हैं, जो बाद में उभरे से कैंकर बन जाते हैं. 1 से 4 मिलीमीटर के ये धब्बे पत्तियों पर बनते हैं, जो बाद में गहरे भूरे कैंकर में बदल जाते हैं. रोग के बढ़ने पर पत्तियां पीली पड़ कर गिर जाती हैं.
रोकथाम
* बाग की बराबर निगरानी और साफसफाई रखना जरूरी है. रोग लगे फलों, पत्तियों और टहनियों को जला कर नष्ट कर देना चाहिए.
* रोग ज्यादा लगने पर स्ट्रोप्टोमाइक्लीन (300 पीपीएम) और साथ में कापर आक्सीक्लोराइड (.03 फीसदी) का छिड़काव करें.
गुच्छा रोग : इस रोग में पेड़ों की शाखाओं व फूलों की बनावट खराब हो जाती है. नई शाखाएं व फूल गुच्छों के रूप में बदल जाते हैं. शाखा गुच्छा रोग अधिकतर नर्सरी के छोटे पौधों में पाया जाता है. लेकिन बड़े पेड़ों पर भी यह रोग देखा जा सकता है. पुष्प गुच्छा रोग में सारे फूल गुच्छों का रूप धारण कर लेते हैं. बाद में कभीकभी इन गुच्छों में से छोटीछोटी पत्तियां ठीक तरह से निकल आती हैं. इन गुच्छों में फल नहीं आते हैं.
रोकथाम
* पौध हमेशा स्वस्थ पौधों से ही तैयार करनी चाहिए. रोग लगे भागों को काट कर नष्ट कर देना चाहिए. अक्तूबर के महीने में 2 ग्राम अल्फा नेफ्थलीन एसिटिक एसिड प्रति 10 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करने से उपज बढ़ाई जा सकती है.
* सब से पहले निकलने वाले पुष्प गुच्छों को हाथ से तोड़ देना चाहिए.
काला सिरा या कोयली रोग : यह रोग विषैली गैस के कारण होता है. इसे कोयली या सिरा विगलन रोग के नाम से भी जाना जाता है. ईंट के भट्ठों के पास लगे पेड़ों के फल इस रोग से प्रभावित होते हैं. फल के आगे के सिरे पर काला धब्बा बनता है, जो पूरे सिरे को ढक लेता है. बाद में चपटा हो जाता है. रोग लगी त्वचा सख्त व कुछ दबी होती है. अंदर का ऊतक मीठा हो जाता है.
रोकथाम
* रोकथाम के लिए आम के बाग को ईंट के भट्टों से दूर लगाना चाहिए. भट्ठों में ऊंची चिमनियों का इस्तेमाल करने से भी रोग के फैलाव को रोका जा सकता है.
* अप्रैलमई के दौरान रोग शुरू होने से पहले सोडियम बाईकार्बोनेट या बोरेक्स के 0.6 फीसदी घोल का 10 दिनों के अंतर पर 2-3 बार छिड़काव करना चाहिए.
लाल जंग : यह रोग एक एलगी द्वारा पैदा होता है. इस में ईंट जैसे लाल रंग का उठा हुआ धब्बा पत्तियों पर बनता है. यह धब्बा वेलवेटी होता है. यह एलगी टहनियों पर भी दिखाई देती है.
रोकथाम
* बरसात शुरू होने से पहले कापर आक्सीक्लोराइड की 3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.
“मेहनत उगी जब खेतों में , तो फसल बनकर लहराई है, किसानों का हुआ सम्मान तो , धरती भी मुस्काई है……”
बिहार और झारखण्ड के सुदूर क्षेत्रों से सुबह निकले किसान, जब ज्ञान भवन, गाँधी मैदान पहुंचे तो कृषि सम्मान अवार्ड (FNF Awards) के भव्य आयोजन का हिस्सा बनें. किसानों ने जीते अवार्ड, सहकारिता मंत्री, कृषि और बागवानी निदेशकों का हुआ उद्बोधन और किसानों को मिला तकनीकों और योजनाओं का ज्ञान, यह नज़ारा 17 मार्च को दिखा फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड समारोह (FNF Awards) में. यह कार्यक्रम बिहार की राजधानी पटना में आयोजित हुआ.
अतिथियों का हुआ स्वागत
दिल्ली प्रेस के संपादक और प्रकाशक परेश नाथ ने स्वागत भाषण में कहा कि, दिल्ली प्रेस की पत्रिका फार्म एन फूड का ध्येय है कि किसानों को आसान भाषा में कृषि की नवीनतम जानकारी दी जाए, जिसमें नवाचारों, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि यंत्रों आदि पर विशेष जोर दिया जाता है. किसान देश की रीढ़ हैं, जिन्हें और ज्यादा मजबूत करने की जरूरत है और अब कृषि को रोजगार बनाने का समय आ गया है.
दिल्ली प्रेस के संपादक और प्रकाशक परेश नाथ और बिहार के सहकारिता मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार चंद्रवंशी
सहकारिता मंत्री ने किया संबोधित
“बिहार के किसान मखाने की खेती में आगे बढ़ रहें हैं. तेल उत्पादन में भी बिहार के किसानों को आगे आना चाहिए. आप सभी का साथ देने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता है. सहकार से ही समृद्धि संभव है इसलिए सहकारी समितियों को किसानों के साथ मिलकर कार्य करते रहना चाहिए” यह बात डॉ. प्रमोद कुमार चंद्रवंशी सहकारिता, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री, बिहार ने किसानों को संबोधित करते हुए कही.
कृषि योजनाओं का लाभ लेते रहें किसान
सौरभ सुमन यादव IAS, निदेशक, कृषि विभाग, बिहार ने किसानों की उपलब्धियों के लिए उनको बधाई दी. उन्होंने कहा कि – “बिहार के किसान आगे बढ रहें हैं पर साथ ही खेती में नवीन तकनीकों का प्रयोग करें. और कृषि विभाग की योजनाओं का लाभ लेते रहें.”
अधिक आमदनी के लिए बागवानी की ओर रुख करें
अभिषेक कुमार IFS, निदेशक, बागवानी निदेशालय, बिहार ने किसानों को बताया कि- “पारंपरिक खेती करते किसान, बागवानी फसलों जैसे ड्रैगन फ्रूट, स्ट्राबेरी आदि फलों के साथ ही सब्जियों की खेती करें. इससे भी नियमित और अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है. बागवानी विभाग किसानों को योजनाओं की जानकारी पहुँचाने के लिए हर जिले, हर प्रखंड में ओर बेहतर कार्य करने का प्रयास कर रहा है. हमारे अधिकारी आप सबको आगामी प्रयासों की जानकारी देने हर गाँव तक आएंगे.”
प्रगतिशील किसानों को मिला राज्य स्तरीय सम्मान
बिहार और झारखंड के किसानों, वैज्ञानिकों और कृषि से जुड़ी संस्थाओं को 16 श्रेणियों में 38 पुरस्कार प्रदान किए गए. खेती में नवाचार, तकनीक और सतत कृषि मॉडल के माध्यम से मिसाल कायम करने और कृषि से जुड़े दूसरे लोगों को भी प्रेरित किया है ऐसे कृषि क्षेत्र में विशेष योगदान देने वाले किसानों , वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया. पूरी लिस्ट इस तरह है-
पश्चिमी चंपारण (बिहार) के आर्यन कुमार और बांका (बिहार) की बिनीता कुमारी को बेस्ट यंग फार्मर अवार्ड, नालंदा (बिहार) की मधु पटेल और लोहरदगा (झारखंड) की एम्लेन कंदुलना को बेस्ट फीमेल फार्मर अवार्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के सोनू निगम कुमार, पश्चिमी चंपारण (बिहार) के परशुराम सिंह और नालंदा (बिहार) की अनीता कुमारी को बेस्ट फार्मर इन इनोवेटिव फार्मिंग अवार्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के राजेश रंजन कुमार और कटिहार (बिहार) के पंचलाल मंडल को बेस्ट फार्मर इन आर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग अवार्ड दिया गया.
भागलपुर (बिहार) के राकेश कुमार सिंह और कटिहार (बिहार) की कुमारी प्रीति को बेस्ट फार्मर इन हार्वेस्टिंग एंड प्रोसेसिंग अवार्ड, गोपालगंज (बिहार) के मनीष कुमार तिवारी को बेस्ट फार्मर इन इंटीग्रेटेड फार्मिंग अवार्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के राकेश कुमार और पटना (बिहार) के सुधांशु कुमार को बेस्ट फार्मर इन मैकेनाइजेशन अवार्ड, बांका (बिहार) की वंदना कुमारी को बेस्ट डेयरी/एनिमल कीपर अवार्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के अभिषेक रंजन को बेस्ट बी कीपर फार्मर अवार्ड, रांची (झारखंड) के विकाश कुमार चौधरी और बांका (बिहार) की कुमारी राखी सिन्हा को बेस्ट पोल्ट्री/हेचरी फार्मर अवार्ड (FNF Awards) प्रदान किया गया.
बक्सर (बिहार) के विनोद कुमार सिंह और रोहतास (बिहार) के अर्जुन सिंह को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मार्केटिंग अवार्ड, समस्तीपुर (बिहार) की डा. सुनीता कुशवाह, मुजफ्फरपुर (बिहार) के डा. तरुण कुमार, बक्सर (बिहार) के डा. रघुबर साहू, समस्तीपुर (बिहार ) की डा. संचिता घोष, समस्तीपुर (बिहार) के डा. रविंद्र कुमार तिवारी, भागलपुर (बिहार) के डा. प्रदीप कुमार और रांची (झारखंड) के डा. महेश कुमार धाकड़ को बेस्ट रिसर्च अवार्ड इन फार्मिंग सिस्टम अवार्ड, मधुबनी (बिहार) के डा. बसंत कुमार को बेस्ट इंटरप्रेन्योरियल स्किल्स इन लाइवस्टाक फार्मिंग अवार्ड, समस्तीपुर (बिहार), पश्चिमी चंपारण (बिहार) और नालंदा (बिहार) को बेस्ट कृषि विज्ञान केंद्र अवार्ड, नालंदा (बिहार) की माधोपुर फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, घाघरा (झारखंड) की घाघरा वुमन फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड और रोहतास (बिहार) की मुंडेश्वरी फेड फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड को बेस्ट एफपीओ अवार्ड दिया गया.
FNF Awards भागलपुर (बिहार) के मनीष मिश्रा को बेस्ट एग्री एंड डवलपमेंट जर्नलिस्ट अवार्ड, मुजफ्फरपुर (बिहार) के रोशन कुमार को बेस्ट एग्री जर्नलिस्ट अवार्ड दिया गया. पटना के अमरजीत कुमार सिन्हा को बेस्ट फार्मर इन वेजिटेबल सीड प्रोडक्शन अवार्ड और रामजीत शर्मा को बेस्ट फार्मर इन क्रॉप सीड प्रोडक्शन अवार्ड प्रदान किया गया.
कृषि नवाचार को मिल रही नई पहचान
फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड 2026 ने यह साबित किया है कि, देश के किसान आधुनिक तकनीक, प्राकृतिक खेती, मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण और मार्केटिंग के जरिए कृषि को लाभकारी बना रहे हैं. यह सम्मान न केवल किसानों के मनोबल को बढ़ाता है, बल्कि अन्य किसानों को भी नवाचार के लिए प्रेरित करता है.
फार्म एन फूड मीडिया, दिल्ली प्रेस हैं किसानों का विश्वसनीय
दिल्ली प्रेस आठ दशक से ज्यादा समय से 9 भाषाओं में 30 पत्रिकाएं प्रकाशित कर रहा है. जिनमें फार्म एन फ़ूड , गृहशोभा, सरस सलिल, चम्पक, सरिता, कारवां, मोटरिंग आदि प्रमुख है, जो पाठकों की पसंदीदा पत्रिकाएँ है. वेबसाइट, सोशल मीडिया और इवेंट्स के माध्यम से दिल्ली प्रेस देशभर के मीडिया में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवा रहा हैं.
दिल्ली प्रेस के फार्म एन फूड मीडिया का ध्येय है कि किसानों को आसान भाषा में कृषि की नवीनतम जानकारी दी जाए, जिस में नवाचारों, फूड प्रोसेसिंग, मशीनरी आदि पर फोकस किया जाता है. किसान देश की रीढ़ हैं, जिन्हें और ज्यादा मजबूत करने की जरूरत है. फार्म एन फ़ूड कृषि सम्मान अवार्ड (FNF Awards) उत्तर प्रदेश – उतराखंड, मध्य प्रदेश – छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में आयोजित हुआ है. इसी क्रम में बिहार, झारखण्ड में यह कार्यक्रम आयोजित किया गया. इस वर्ष यह अवार्ड उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में द्वितीय संस्करण के साथ ही, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी आयोजित होगा.
कंपनियों ने की सहभागिता
यह अवार्ड कार्यक्रम इफको एम.सी.- क्रॉप साइंस प्राइवेट लिमिटेड के द्वारा पावर्ड बाय रहा और इस कार्यक्रम के एसोसिएट स्पांसर एपीडा और एन.सी.डी.सी. रहे. इनके बिहार प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम में शिरकत की.
इस अवसर पर ICAR – IARI पूसा, दिल्ली के वैज्ञानिक नफीस अहमद और अनंत नाथ, कार्यकारी प्रकाशक , दिल्ली प्रेस ने भी किसानों को संबोधित किया. 200 से अधिक किसानों, कृषि वैज्ञानिकों आदि की उपस्थिति रही. फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड ने बिहार और झारखण्ड के किसानों के दिल में जगह बनाई और किसानों की मेहनत को ऊंचाईयां प्रदान की.
Krishi Samman Award : फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड 2026 में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के उन किसानों, वैज्ञानिकों और संस्थाओं को सम्मानित किया गया, जिन्होंने खेती में नवाचार, तकनीक और सतत कृषि मॉडल के माध्यम से मिसाल कायम की है. यह कार्यक्रम मोहाली, पंजाब में आयोजित किया गया. दिल्ली प्रेस के फार्म एन फ़ूड मीडिया द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में कौन रहें विजेता,जानें –
हरियाणा के विजेता किसान
विगत दिनों आयोजित इस कार्यक्रम में हरियाणा से सम्मानित प्रमुख किसान और संस्थाएं-
• नरेश कुमार – बेस्ट फार्मर (हार्वेस्टिंग एंड प्रोसेसिंग)
• अरुणा देवी – बेस्ट डेयरी/एनिमल कीपर
• रामप्रताप – बेस्ट हॉर्टिकल्चर फार्मर
• कपिल भाटिया – बेस्ट इनोवेटिव फार्मिंग
• राजेंद्र सिंह रावल – बेस्ट शुगरकेन प्रोडक्शन
• नीरज त्यागी – बेस्ट इंटीग्रेटेड फार्मिंग
• लेखराम यादव – बेस्ट ऑर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग
• मानसिंह यादव – बेस्ट फार्मर अवार्ड
• प्रह्लाद सिंह – बेस्ट मशरूम प्रोडक्शन
• अभय चौहान – बेस्ट यंग फार्मर
• कृषि विज्ञान केंद्र, हिसार – बेस्ट कृषि विज्ञान केंद्र
पंजाब के विजेता किसान
पंजाब से सम्मानित किसानों और संस्थाओं में शामिल हैं:
• सुखतार सिंह – ऑर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग
• नवराज सिंह – बेस्ट बी कीपर
• रोहभाश सिंह जाखड़ – फील्ड क्रॉप फार्मर
• सुरजीत सिंह चग्गर – मैकेनाइजेशन
• परमजीत सिंह – एग्री इंफ्लुएंसर
• वीरपाल कौर – बेस्ट फीमेल फार्मर
• नवदीप सिंह – हार्वेस्टिंग एंड प्रोसेसिंग
• अमरजीत सिंह ढिल्लों – मार्केटिंग
• कृषि विज्ञान केंद्र, अमृतसर – बेस्ट केवीके
• भूपिंदर सिंह – डेयरी/एनिमल कीपर
• सुरिंदर सिंह – हाईटेक डेयरी फार्मर
• लखवीर सिंह – यंग फार्मर
• तीर्थ सिंह – इनोवेटिव फार्मिंग
• हरप्रीत सिंह – शुगरकेन प्रोडक्शन
• गुरमेल सिंह – मार्केटिंग
• गांव सरसिनी – बेस्ट टूरिज्म विलेज
• हंसाली ऑर्गेनिक फार्म – विलेज टूरिज्म
• मंडेर फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी – बेस्ट एफपीओ
• चंदनदीप सिंह – इनोवेटिव फार्मिंग
• निर्मल सिंह – पोल्ट्री/हेचरी
• दीदार सिंह – बेस्ट एफपीओ
• मंजू बाला – एनिमल कीपर
• सुरजीत सिंह राय – ऑर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग
• बलविंदर सिंह – शुगरकेन प्रोडक्शन
हिमाचल प्रदेश के विजेता किसान
• डॉ. पंकज सूद – बेस्ट रिसर्च (फार्मिंग सिस्टम)
• सुंदरनगर नेचुरल्स एफपीओ – बेस्ट एफपीओ
• कृषि विज्ञान केंद्र, किन्नौर – बेस्ट केवीके (द्वितीय पुरस्कार)
• डॉ. बुधि राम – बेस्ट यंग रिसर्चर
• आशीष नेगी – मार्केटिंग
• बिंद्रा देवी – फीमेल फार्मर
• अंकित कुमार – यंग फार्मर
• लीना शर्मा – ऑर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग
• सुनीता देवी – हॉर्टिकल्चर क्रॉप
• प्रेमलता – इंटीग्रेटेड फार्मिंग
• कृषि विज्ञान केंद्र, मंडी – बेस्ट केवीके (प्रथम पुरस्कार)
कृषि नवाचार को मिल रही नई पहचान
Krishi Samman Award ने यह साबित किया कि देश के किसान आधुनिक तकनीक, प्राकृतिक खेती, वैल्यू एडिशन, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग के जरिए कृषि को लाभकारी बना रहे हैं. यह सम्मान न केवल किसानों के मनोबल को बढ़ाता है, बल्कि अन्य किसानों को भी नवाचार के लिए प्रेरित करता है.
Maize Hybrid Seed: भाकृअनुप-भारतीय मक्का अनुसंधान केंद्र, लुधियाना, ने पंजाब में एक किसान के खेत में पहली बार मक्का हाईब्रिड बीज (Maize Hybrid Seed) उत्पादन का सफल ट्रायल किया. यह ट्रायल देर से खरीफ के मौसम (अगस्त में बोआई) के दौरान शरणवीर सिंह, गांव गजियाना, जिला मोगा, के खेत में मक्का हाईब्रिड डीएमआरएच 1308 का उपयोग करके किया गया था, जिसके शानदार परिणाम मिले.
पंजाब के किसानों को होगा फायदा
पंजाब में इस्तेमाल होने वाला लगभग 100 फीसदी मक्का हाईब्रिड बीज, (Maize Hybrid Seed) जिसकी कीमत पीक सीजन में लगभग 700-1000 रुपए प्रति किलोग्राम होती है, वह दक्षिण भारत, मुख्य रूप से तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश में पैदा होता है और उत्तरी राज्यों में ट्रांसपोर्ट किया जाता है. मक्का हाईब्रिड बीज उत्पादन से पंजाब में मक्का की खेती करने वाले किसानों को फायदा होगा, क्योंकि उन्हें कहीं और से बीज नहीं मंगाना होगा. लंबी दूरी के ट्रांसपोर्ट से किसानों के लिए बीज और खेती की लागत काफी बढ़ जाती है. इससे काफी खर्च बचाया जा सकता है, जिससे किसानों की आमदनी बढ़ाने और उनकी आजीविका में सुधार करने में महत्त्वपूर्ण योगदान मिलेगा.
पंजाब की कृषि जलवायु के अनुकूल है हाईब्रिड बीज
पंजाब की कृषि जलवायु परिस्थितियों में हाईब्रिड बीज उत्पादन के सफल प्रदर्शन से यह साबित हुआ है कि अच्छी क्वालिटी का मक्का हाईब्रिड बीज (Maize Hybrid Seed) स्थानीय स्तर पर, यहां तक कि खरीफ के आखिर मौसम में भी पैदा किया जा सकता है. इन उत्साहजनक नतीजों के आधार पर, इस प्रयोग को बसंत के मौसम में भी बढ़ाया जाएगा.
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि खरीफ के आखिर में काटा गया बीज सीधे बसंत में मक्का की खेती के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे लंबे समय तक स्टोरेज और उससे जुड़े खर्चों की जरूरत खत्म हो जाती है.
किसानों को होगा दोगुना फायदा
पंजाब के किसानों को आमदनी को बढ़ाने के लिए खरीफ के आखिर में बीज उत्पादन के लिए बोआई का सबसे अच्छा समय अगस्त का पहला पखवारा है. बीज उत्पादन के तहत, किसान प्रति हेक्टेयर लगभग 2500 किलोग्राम बीज की औसत उपज प्राप्त कर सकते हैं, जिसे 200 रुपए प्रति किलोग्राम की औसत कीमत पर बेचा जा सकता है. भाकृअनुप-भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना के आंकड़े बताते हैं कि उत्पादन लागत घटाने के बाद, किसानों को प्रति हेक्टेयर 3.75-4.0 लाख रुपए का शुद्ध लाभ हो सकता है, जो कमर्शियल अनाज मक्का की खेती से होने वाले रिटर्न से लगभग दोगुना से भी ज्यादा है.
अधिक कमाई के लिए हैं कई विकल्प
खरीफ मक्का कटाई के बाद किसान कोई भी उपयुक्त रबी की सब्जियां या दालें उगा सकते हैं. इसके बाद बसंत की खेती के लिए कम से मध्यम अवधि के मक्का हाईब्रिड बो सकते हैं और जून के मध्य तक कमाई की जा सकती है. इसके बाद फिर से खरीफ के आखिर में बीज उत्पादन का विकल्प चुनने से पहले, किसान खरीफ की 40-45 दिन की कम अवधि की सब्जी की फसल ले सकते हैं.
वैकल्पिक रूप से, खरीफ के आखिर में बीज उत्पादन की कटाई के बाद, किसान फरवरी के पहले सप्ताह में बोआई करके, मई के मध्य तक कटाई करके और फिर मई के मध्य से जुलाई के अंत तक खरीफ की सब्जियां उगाकर ब्रीडर-टू-फाउंडेशन बीज या हाईब्रिड बीज उत्पादन कर सकते हैं और फिर से खरीफ के आखिर में बीज उत्पादन के लिए जा सकते हैं.
खेतों में रिसर्च से मिले शानदार नतीजे
यह प्रयोग लुधियाना में भाकृअनुप-आईआईएमआर के रिसर्च खेतों में 2 साल तक भी किया गया था और फिर इसे अन्य किसानों के खेतों में किया गया, जिसके अच्छे नतीजे मिले. कमर्शियल बीज उत्पादन के लिए, उचित बीज भंडारण, सुखाने और प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की आवश्यकता है. इसके साथ ही, भाकृअनुप-आईआईएमआर, अपने पार्टनर के सहयोग से, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में भी इसी तरह के हाईब्रिड बीज उत्पादन प्रयोग कर रहा है, जिससे मक्का बीज उत्पादन में विविधता आएगी और राष्ट्रीय बीज आपूर्ति प्रणाली को मजबूती भी मिलेगी.
मक्का हाईब्रिड बीज उत्पादन महत्त्वपूर्ण कदम
यह पहल पंजाब में मक्का हाईब्रिड बीज (Maize Hybrid Seed) उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है, जिसमें बीज की लागत कम करने, खेती का खर्च कम करने, उत्पादकता बढ़ाने तथा किसानों की आय बढ़ाने की काफी संभावना है. यह पंजाब एवं पड़ोसी राज्यों में गुणवत्ता वाले बीज की बढ़ती मांग को पूरा करने में भी मदद करेगा.
Traditional Indian sweet: दूध बर्फी अन्य बर्फियों से अलग होती है. यह दूध में चीनी को मिलाकर धीमी-धीमी आंच पर गरम करते हुए गाढ़ा करके तैयार की जाती है. इसकी सबसे खास बात यह होती है कि यह खाने में दूध और खोए दोनों के मिले-जुले स्वाद का एहसास कराती है. दानेदार बरफी (Traditional Indian sweet) होने के कारण यह दूसरी बरफियों से अलग होती है. जो किसान पशुपालन और दूध उत्पादन का काम करते हैं, वे इसे बनाकर रोजगार कर सकते हैं.
दूध बर्फी को बनाना बेहद आसान होता है. दूध बर्फी को ज्यादा लंबे समय तक संभाल कर नहीं रखा जा सकता है. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि इसे केवल उतना ही तैयार करें, जितने की खपत हो.
दूध बर्फी बनाने में किन बातों का रखें ध्यान
लखनऊ के कालीजी बाजार चौक में पुत्तनबाबा की दूध की दुकान पर बैठने वाले अर्जुन सिंह यादव कहते हैं कि, दूध बर्फी को जल्दी से जल्दी खा लेना चाहिए. ताजी दूध बर्फी (Traditional Indian sweet) का स्वाद बहुत ही अच्छा होता है.
अर्जुन सिंह यादव कहते हैं कि दूध बर्फी को बनाना भले ही आसान होता हो, पर थोड़ी सी असावधानी होने से दूध के लगने या जलने का खतरा बना रहता है, जो दूध बर्फी के स्वाद को खराब कर सकता है. इसमें दूध और चीनी की मात्रा ऐसी होनी चाहिए, जो दूध बर्फी के स्वाद को बनाए रखते हुए मिठास का एहसास कराए. जब दूध बर्फी तैयार हो जाती है तो इसे मनचाहे आकार में काट लिया जाता है. फ्रिज में दूध बर्फी को थोड़े लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.
बड़ा है बाजार
वैसे तो तमाम किस्म की मिठाइयां (Traditional Indian sweet) दूध और चीनी से बनती हैं, मगर दूध बर्फी का बाजार काफी बड़ा है. अमूमन यह हर मिठाई की दुकान में मिल जाती है. इटावा की रहने वाली हर्षिता वर्मा कहती हैं, ‘वैसे तो दूध बर्फी को ठंडा होने पर खाया जाता है, पर मुझे तो गरम-गरम दूध बर्फी खाने में मजा देती है. गरम होने पर यह और भी ज्यादा टेस्टी और फ्रेश लगती है.’
दूध बर्फी का भाव अलग-अलग होता है. यह बाजार में 280 रुपए प्रति किलोग्राम से लेकर 450 रुपए प्रति किलोग्राम तक में बिकती है. रबड़ी के बाद फ्रेश मिठाई में दूध बर्फी की मांग सबसे ज्यादा होती है.
शौकीन लोग दूध बर्फी की खूब खरीदारी करते हैं. कुछ लोग घरों में इससे खोए वाली गुझिया भी बना लेते हैं.
कैसे बनाएं दूध बर्फी
दूध बर्फी बनाने के कारीगर संतोष गुप्ता बताते हैं कि, इसे बनाने के लिए फुल क्रीम दूध लेना चाहिए. दूध को पहले गरम करें. जब दूध उबलने लगे तो उसमें चीनी डालें. चीनी की मात्रा दूध की एक चौथाई रखें यानि अगर 1 लीटर दूध है, तो चीनी 250 ग्राम लें. दूध को धीरे-धीरे गरम करते हुए गाढ़ा करें. दूध को तब तक उबालें, जब तक वह गाढ़ा होकर खोए जैसा न हो जाए. फिर इसको ठंडा होने के लिए थाल में रख दें. जब यह जम जाए तो इसे मनचाहे आकार में काट लें.
Pulse Crops: भारत की ज्यादातर जनसंख्या दाल प्रोटीन पर निर्भर है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर इंसान को रोजाना दाल की 80 ग्राम मात्रा मिलनी चाहिए, जबकि 1951-56 के बीच महज 64 ग्राम, 1999-2000 में महज 36 ग्राम, 2003-04 में महज 30 ग्राम तथा वर्तमान में महज 18-20 ग्राम दाल प्रति व्यक्ति रोजाना का औसत है.
क्षेत्रफल में इजाफा
फसल चक्रों में मामूली फेरबदल करके फसल विविधीकरण तथा बहुफसली प्रणाली से दलहन के क्षेत्रफल में इजाफा किया जा सकता है. इसके लिए बेकार पड़ी हुई जमीन, सुधरी बंजर जमीन और अन्य खाली जमीनों में कम लाभकारी फसलों की जगह दलहनी फसलें उगाकर दलहनी फसलों (Pulse Crops) के क्षेत्रफल में इजाफा किया जा सकता है.
सहफसली खेती है मुनाफेदार
गन्ने के साथ उड़द व मूंग की सहफसली खेती करके उत्पादन में इजाफा किया जा सकता है.
करें प्रसंस्करण
गांवों में सस्ती दरों पर छोटी-छोटी दाल की चक्कियां लगाकर प्रसंस्करण लागत कम करके दालों को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराया जा सकता है. भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान द्वारा मिनी दाल चक्की विकसित की गई है.
सही प्रजाति का चयन जरूरी
दलहनी फसलों (Pulse Crops) की खेती में खास इलाके के लिए मुनासिब उन्नतशील बीजों की समय पर बोआई करने भर से पैदावार में करीब 20-30 फीसदी तक का इजाफा हो जाता है. किसानों को सलाह दी जाती है कि वे बीजों का परंपरागत विधि से परीक्षण करने के बाद ही बोआई करें.
बीज उपचार
उड़द के 15-20 किलोग्राम व मूंग के भी 15-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से लेकर उन्हें बोने से पहले 2.5 ग्राम थीरम व 1.0 ग्राम कार्बंडाजिम से उपचारित करें. दीमक तथा अन्य जमीन के कीटों से बचाव हेतु बीजों को 4 मिलीलीटर क्लोरोपाइरीफास या 2 मिलीलीटर एमिडाक्लोराइड से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए. इसके अलावा 250 ग्राम राइजोबियम व 250 ग्राम पीएसबी प्रति 10 किलोग्राम बीज की दर से लेकर उसे गुड़ के घोल में मिलाकर (10 किलोग्राम बीजों के लिए 200 ग्राम गुड़ को आधा लीटर पानी में घोलें) उससे भी बीजों को उपचारित करें.
समय पर करें बोआई
उड़द की बोआई जुलाई के अंतिम हफ्ते से अगस्त के दूसरे हफ्ते तक और मूंग की बोआई मार्च के पहले हफ्ते से मार्च के आखिरी हफ्ते
तक सीड बेड प्लांटर की सहायता से मेंड़ों पर करनी चाहिए.
ऐसे करें कीटों की रोकथाम
कमला कीट
ये कीट पत्तियों के ऊपर शुरुआती अवस्था में झुंड में होते हैं. प्रभावित पत्तियों को काटकर जमीन में दबा दें. इस के अलावा कमला कीट से बचाव के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी की 1.5 लीटर मात्रा 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.
मिथाइल पैराथियान धूल (2 फीसदी) की 25 किलोग्राम मात्रा व फेनवलेट धूल (4 फीसदी) की 0.25 किलोग्राम मात्रा को करीब 1 क्विंटल चूल्हे की राख में मिलाकर सुबह के वक्त बुरकाव करें.
फलीभेदक
फलीभेदक कीट से बचाव के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी की 1.25 लीटर मात्रा या क्यूनालफास 25 ईसी की 1.25 लीटर मात्रा 500-600 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.
बीमारियों की रोकथाम जरूरी
इसमें ज्यादातर पीला या चित्तवर्ण (यलोमोजेक) रोग का प्रकोप होता है. इससे पत्तियों पर पीले-सुनहरे चकत्ते पड़ जाते हैं. इस रोग के विषाणु सफेद मक्खी द्वारा फैलते हैं. इस की रोकथाम के लिए डाइमिलोएट 30 ईसी या एमिडाक्लोप्रिड की 250 मिलीलीटर मात्रा 1 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से 4-5 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए.
Women Farmers : दिल्ली के पूसा संस्थान में किसान मेला लगा था. उस में देशभर के किसान, कृषि वैज्ञानिक, मशीन बनाने वाले और दर्शक आए थे. वहां के एक पांडाल में एक बैनर टंगा था, जिसमें महात्मा गांधी की किसानों को लेकर कही एक बात कुछ यों लिखी थी, ‘हमारे कार्यक्षेत्र में पधारने वालों में कृषक एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है.
वह हम पर निर्भर नहीं, वरन हम उस पर निर्भर हैं. वह हमारे कार्य में बाधक नहीं, अपितु वह हमारे कार्य का उद्देश्य है. वह हमारे कार्यकलापों से असंबंधित नहीं, वरन उसका एक भाग है. उसकी सेवा कर हम अनुग्रह नहीं करते, वरन वह सेवा का अवसर प्रदान कर हम को उपकृत करता है.’
किसानों की तरक्की, समाज की तरक्की
महात्मा गांधी ने यह बात कई साल पहले कही थी और यह उनकी दूर की सोच ही थी कि, भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसानों की अनदेखी करना समाज की तरक्की में सबसे बड़ी बाधा है. यह अनदेखी किसानों को भी समझ लेनी चाहिए, क्योंकि आज के दौर में खेती के माने बदल गए हैं.
फसल उगाकर मंडी में बेच देना ही खेती-किसानी नहीं रह गया है, बल्कि अपनी उपज की सही कीमत मिलना भी किसानों के लिए बेहद जरूरी है. अब पूसा संस्थान के उस किसान मेले के एक और पांडाल की बात करते हैं. वहां कुछ औरतें अचार, आर्गेनिक दालें, शहद, कचरी, पापड़ वगैरह बेच रही थीं.
तरक्की करती महिलाएं
पुष्पा कौशिक और मनीषा सिंह जैसी जागरूक और कामयाब महिला किसानों (Women Farmers) ने साबित कर दिया है कि खेती-किसानी महज मर्दों की जागीर नहीं है. अब किसान महिलाएं भी किसी से कम नहीं हैं. जिज्ञासा बढ़ी तो वहां बैठी एक महिला किसान पुष्पा कौशिक से बातचीत की. वे उत्तर प्रदेश के हापुड़ इलाके के लालपुर गांव से आई थीं. उन्होंने अपना एक स्वयं सहायता समूह महिला किसान विकास संस्थान बना रखा है.
दरअसल, एग्री बिजनेस सिस्टम के हिमांशु मंगल पांडे ने उन्हें ऐसे समूह बनाने के लिए सलाह दी थी और इस बात से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने गांव के आसपास के 7 गांवों में 7-7 समूह बनाए,जिनसे 1500 महिला किसान (Women Farmers) जुड़ी हुई हैं.
कैसे कार्य करता है स्वयं सहायता समूह
ऐसे समूहों में औरतों को सिलाई-कढ़ाई की ट्रेनिंग दी जाती है. अचार बनाना, आर्गेनिक दालें उगाना और दलिया वगैरह की प्रोससिंग का काम भी वहां होता है. पुष्पा कौशिक अपने समूह की सचिव हैं. उन्होंने आगे बताया कि, उनके इलाके में सब्जियां खूब उगाई जाती हैं, इसलिए उन्होंने सब्जियों के अचार बनाने की ट्रेनिंग पूसा से ली थी.
इससे उन्हें अपनी मेहनत के दाम काफी अच्छे मिलने लगे थे. उन्हें आज भी पूसा की वरिष्ठ वैज्ञानिक रश्मि सिंह की कही बात याद है कि, थोड़ा सा दिमाग लगाने और सही दिशा में मेहनत करने से किसान अपने सामान की उचित कीमत पा सकते हैं.
कैसे की सब्जियों की प्रोसेसिंग
पुष्पा कौशिक को पहले मंडी में अपनी सब्जियों के दाम कम मिलते थे, लेकिन सब्जियों की ग्रेडिंग करने से अच्छे दाम मिलने लगे. उन्होंने यह भी बताया कि, वे अपनी उपज में रासायनिक खाद नहीं डालती हैं. दालों व दलिया वगैरह की प्रोसेसिंग हाथ की चक्की से की जाती है. मसाले भी इमामदस्ते में कूटे जाते हैं. बिल्कुल घरेलू तरीके से कार्य किया जाता है.
समूह के जरिए अच्छी कमाई
क्या अपने बनाए सामान की मार्केटिंग करने की समस्या नहीं आती है? इस सवाल पर पुष्पा कौशिक ने कहा कि, बिल्कुल आती है. ज्यादातर समूह सामान तो बना लेते हैं, लेकिन उस सामान को उचित कीमत पर बेचने की समस्या तो बनी रहती है. हमें पूसा के बिक्री केंद्र में दुकान मिली हुई है, जहां हमारे समूहों का बनाया सामान अच्छी कीमत पर बिकता है.
मनीषा सिंह ने भी बनाया समूह
जब कचरी व पापड़ बनाने के बारे में जानकारी लेनी चाही, तो पुष्पा कौशिक ने एक और महिला किसान मनीषा सिंह से हमें मिलवाया. वे हापुड़ के नजदीक कुचेसर रोड चोपला गांव से आई थीं. उन्होंने भी एक स्वयं सहायता समूह ‘सोसाइटी फॉर रूरल एंड एग्रीकल्चर डेवलपमेंट’ बनाया हुआ है, जो 3 साल पुरानी संस्था है.
उनके समूह में मूंग दाल, उड़द दाल, चावल, आलू वगैरह से पापड़ व कचरी बनाई जाती है. ऐसा करके महिला किसानों (Women Farmers) को अच्छा मुनाफा होता है और उनकी साथी औरतें इतनी मेहनत व लगन से ये सब चीजें बनाती हैं कि आज तक किसी ग्राहक ने कोई शिकायत नहीं की है.
अपनी संस्था की अध्यक्ष मनीषा सिंह ने आगे बताया कि, वे ज्यादातर चीजें खुद ही उगाती हैं. कुछ सामान बाजार से भी खरीदती हैं. यह सब करने के लिए ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं होती है. बस, अपने काम के प्रति ईमानदार होना चाहिए.
इन दोनों महिला किसानों (Women Farmers) से बातचीत करके यह अनुभव हुआ कि, जागरूकता व तकनीक का सही इस्तेमाल ही तरक्की का रास्ता है. दोनों महिला किसान (Women Farmers) किसी मंझे हुए मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव की तरह बात कर रही थीं. उनका पहनावा भी सलीके वाला था.
मनीषा सिंह के तो पति भी उन के काम में मदद करते हैं, जो एक प्राइवेट कंपनी में सिविल इंजीनियर हैं. इस तरह की महिला किसानों (Women Farmers) के बारे में जानकर यह लगता है कि, अगर किसान सही दिशा में अपना दिमाग लगाएं तो खेती-किसानी से अच्छी कमाई कर सकते हैं.
Irrigation Technique : दुनिया-भर में दिनों-दिन पानी की कमी होती जा रही है. ऐसे में भारत भी इससे अछूता नहीं है. खासकर पारंपरिक तरीके से की गई खेती में पानी की अधिक बरबादी होती है. परंतु अब तकनीक का दौर है तो खेती की सिंचाई के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं. सरकार भी सिंचाई की अनेक आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएं चलाती है. ऐसी ही एक खास योजना ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ है. जानिए इस योजना के बारे में क्या है इसमें खास और किसान कैसे इस तकनीक का लाभ लें.
पानी की बचत और ज्यादा उत्पादन
इस सिंचाई पद्धति (Irrigation Technique) को अपनाकर किसान 40 से 50 फीसदी तक पानी की बचत कर सकते हैं, साथ ही 30 से 40 फीसदी तक उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है. खेती में सरकार की ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ माइकोइरीगेशन योजना के तहत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को प्रभावी ढंग से विभिन्न फसलों में अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है.
बूंद-बूंद का इस्तेमाल
इस खास तकनीक को बूंद-बूंद सिंचाई और फव्वारा सिंचाई भी कहा जाता है. इस तकनीक में बूंद-बूंद पानी सिंचाई के काम आता है और पानी की बिलकुल बर्बादी नहीं होती, इसलिए जहां पानी की कमी है, वहां के लिए तो यह तकनीक बहुत ही फायदेमंद है.
क्या है ड्रिप इरीगेशन पद्धति
फसल के अनुसार सिंचाई तकनीक का करें इस्तेमाल. इसमें मिनी, पोर्टेबल, सेमी परमानेंट एवं रेनगन स्प्रिंकलर अलग-अलग सिंचाई के तरीके हैं, लेकिन सभी पानी की बचत के साथ-साथ अच्छी फसल उत्पादन देने में मदद करते हैं.
कौन-सी फसलों में अपनाएं यह तकनीक
बागबानी / फल उद्यान फसलें – आम, अमरूद, आंवला, नीबू, बेल, बेर, अनार, अंगूर, आड़ू, लोकाट, आलूबुखारा, नाशपाती, पपीता एवं केला आदि.
सब्जियां – टमाटर, बैगन, भिंडी, मिर्च, शिमला मिर्च, गोभीवर्गीय, कद्दूवर्गीय एवं अन्य इसी तरह की खेती में कारगर.
सुगंधित एवं औषधीय फसलें – रजनीगंधा, ग्लेडियोलस, गुलाब और औषधीय एवं सुगंधित अन्य फसलों में भी.
अन्य फसलें – आलू, गन्ना और भी कई फसलों में इस योजना के तहत लाभ उठाकर सिंचाई की जा सकती है.
कैसे ले सकते हैं योजना का लाभ
‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना का संचालन वेब बेस्ड UPMIP पोर्टल के माध्यम से किया जा रहा है. जो किसान इसका लाभ लेना चाहते हैं वे www.upmip.in पोर्टल पर पंजीकरण करवा सकते हैं और सूक्ष्म सिंचाई पद्धति (Irrigation Technique) का लाभ ले सकते हैं. इसके लिए 10 से 90 फीसदी तक अनुदान मिलता है, जो फसल के अनुसार अलग – अलग होता है.
आज के समय पानी खेती की सबसे बड़ी जरूरत है. अगर समय पर फसल को पानी नहीं मिला तो फसल बर्बाद होते समय नहीं लगता. ऐसे में सिंचाई योजनाओं को अपनाना किसानों के लिए फायदे की बात है.