Ashwagandha : अश्वगंधा की खेती पर प्रशिक्षण

Ashwagandha : देवारण्य योजना के अंतर्गत आज मध्य प्रदेश राज्य औषधि पादप बोर्ड, भोपाल के निर्देशानुसार कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल व जिला आयुष अधिकारी डा. केएस गनावे के मार्गदर्शन में विकास खंड चांचौड़ा और आरोन के किसानों व स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को “एक जिला एक औषधीय पौधा” योजना के अंतर्गत अश्वगंधा की खेती संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किया गया.

इस प्रशिक्षण में मास्टर ट्रेनर द्वारा अश्वगंधा की कृषि के लिए खेत तैयार करना, पौध तैयार करना, बिजाई, जैविक खाद प्रयोग, कीटनाशक प्रयोग, निराईगुड़ाई, सिंचाई फसल कटाई, उपज भंडारण, प्रसंस्करण, विपणन, फसल चक्र, रासायनिक संगठन उच्च गुणवत्ता और उपयोग आदि विषयों पर विस्तार से जानकारी प्रदान की.

अश्वगंधा के औषधीय गुणों की जानकारी

आयुर्वेदिक यूनानी औषधीयों में अश्वगंधा के उपयोग और विभिन्न प्रकार के रोगों में अश्वगंधा के प्रयोग व आयुर्वेदिक योगों के बारे में जानकारी प्रदान की गई है. साथ ही, औषधीय पौधे अश्वगंधा की आर्थिक संभावनाओं के बारे में भी बताया गया है.

आयुष अधिकारी डा. केएस गनावे ने बताया कि देवारण्य योजना के अंतर्गत जिले में अश्वगंधा को “एक जिला एक औषधि पौधा” के रूप में चयनित किया गया है, जिस के तहत जिलेभर में अश्वगंधा की खेती को बढ़ावा देने का काम किया जा रहा है. इस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देना और स्थानीय समितियों को मजबूत बनाना है. विशेषज्ञों द्वारा यह भी बताया गया कि अश्वगंधा को मिरेकल प्लांट और इंडियन जिनसेंग भी कहते है. जिस की मांग घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में तेजी से बढ़ रही है.

विकास खंड चांचौड़ा में डा. पर्वत सिंह धाकड़, डा. जयराम यादव, डा. आकांक्षा गुप्ता,  अजब सिंह लोधा द्वारा और विकास खंड आरोन में डा. विजय कुमार वर्मा, डा. अंकेश अग्रवाल, डा. हुकुम सिंह धाकड़, शैलेंद्र श्रीवास्तव द्वारा प्रशिक्षण दिया गया. इस प्रशिक्षण में उपस्थित सभी सदस्यों को प्रशिक्षण किट एवं प्रमाण पत्र वितरित किए गए.

पशुपालन व कृषि में उन्नत तकनीकों (Advanced Techniques) को अपनाए

Advanced Techniques : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के संस्थान केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर तहसील मालपुरा, जिला टोंक (राजस्थान) की अनुसूचित जनजाति उपयोजना (टीएसपी) के माध्यम से सिकराय तहसील के ग्राम पंचायत घूमना की कड़ी की कोठी चौराहे पर किसान वैज्ञानिक संगोष्ठी एवं खरीफ की फसलों के गुणवत्ता बीज वितरण कार्यक्रम का आयोजन 9 जून, 2025 को किया गया.

‘विकसित कृषि संकल्प अभियान’ के अंतर्गत इस कार्यक्रम में अविकानगर संस्थान एवं कृषि विज्ञान केंद्र दौसा के वैज्ञानिक एवं कर्मचारीयों ने भी किसानों को उन्नत और नवीन कृषि तकनीक सहित पशुपालन की खास तकनीकियों के बारे में भी जानकारी दी.

केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान राजस्थान के टोंक जिले के मालपुरा तहसील में स्थित है, जो साल 1962 से राजस्थान राज्य के किसानों के साथ देश के किसानों को भेड़बकरी व खरगोश पालन पर प्रशिक्षण, उन्नत नस्ल के पशुओं का वितरण, उन का वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ विभिन्न सेवाएं प्रदान कर रहा है. इस 9 जून के किसान वैज्ञानिक संगोष्ठी कार्यक्रम में केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान के निदेशक व स्टेट कोऔर्डिनेटर विकसित कृषि संकल्प अभियान, डा. अरुण कुमार तोमर मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम मे शामिल हुए.

इस कार्यक्रम में उन के साथ कृषि विज्ञान केंद्र दौसा के प्रभारी डा. बनवारी लाल जाट एवं उन की टीम के सदस्य डा. अक्षय चितोड़ा, डा. देवेंद्र मीना अविकानगर के पशु कार्यिकी, जैव रसायन विभाग के अध्यक्ष डा. सत्यवीर सिंह डांगी, अविकानगर संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक टीएसपी नोडल अधिकारी डा. अमरसिंह मीना, डा. चंदन गुप्ता, पंचायत समिति सिकराय के सरपंच संघ के अध्यक्ष विपिन मीना, घूमना के साथ आसपास की पंचायतो के सरपंचों ने भी विशिष्ट अतिथि के रूप में भाग लिया.

इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डा. अरुण कुमार तोमर ने उपस्थित किसानों को वर्तमान मौसम की चुनौतियां व भविष्य की संभावनाओं के लिए कृषि एवं पशुपालन की नवीनतम तकनीकियों को अपनाने के लिए विस्तार से चर्चा की. साथ ही, रूरल इंडिया को रियल इंडिया बनाने के लिए विकसित कृषि की ओर लोगों को बढ़ने का आह्वान किया. इस के साथ ही, अपने संस्थान के पशु भेड़ एवं बकरी को वर्तमान समय के लिए सब से उपयुक्त पशु बताते हुए ऐसे पशुओं को किसानों का एटीएम बताया. जिस से किसी भी समय मांस एवं दूध बेच कर पैसा कमाया जा सकता है.

इस कार्यक्रम में उपस्थित किसानों को वैज्ञानिक भेड़बकरी पालन प्रशिक्षण ले कर पशुओं के विभिन्न पालन तकनीकियों को अपने उपलब्ध संसाधनों के अनुसार अपनाने के लिए प्रेरित किया गया. अविकानगर के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने उपस्थित किसानों को बताया कि संस्थान की टीएसपी उपयोजना में जनजाति भेड़पालक किसानों को प्राथमिकता देते हुए हमने आप के क्षेत्र के जनजाति भेड़पालकों को संस्थान की गतिविधियों के बारे में बताया है, और आगे भी हम जनजाति भेड़पालक किसानों को प्राथमिकता के आधार पर संस्थान से जोड़ रहे हैं, जो भी जनजाति किसान भेड़पालन से जुड़े हैं, वो मेरे संस्थान के अधिकारियों से संपर्क कर इस टीएसपी उपयोजना का लाभ उठा सकते हैं.

अंत में निदेशक द्वारा उपस्थित किसानों को भारत सरकार की राष्ट्रीय पशुधन मिशन योजना के बारे में बताया गया. साथ ही, इस को प्रोत्साहन के रूप में लेते हुए अपने छोटे पशुओं के पालन को उद्यमिता विकास की ओर ले जाने के लिए किसानों को जरूरी सुझाव दिए गए. इस कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डा. बनवारी लाल जाट द्वारा भी वर्तमान खेती की समस्या पर किसानो के सवाल का जवाब दिया गया.

Advanced Techniquesकेवीके की वैज्ञानिक टीम द्वारा नकली खाद बीज एवं दवाइयों के बारे में किसानों को जागरुक करते हुए कार्यक्रम के बाद वितरित की जाने वाली विभिन्न बारिश फसलों (मुंग, ज्वार, तिल, ग्वार एवं किचन गार्डन के लिए सब्जियों की किट) की किस्म के बारे अधिक उत्पादन के लिए के लिए आवश्यक सुझाव दिए.

इस कार्यक्रम में उपस्थित वैज्ञानिक और प्रगतिशील किसानों द्वारा कृषि एवं पशुपालन योजनाओं के बारे में मौजूद किसानों को जानकारी दी गई. अविकानगर संस्थान की टीएसपी उपयोजना के नोडल अधिकारी डा. अमर सिंह मीना ने बताया कि आज के कार्यक्रम में राष्ट्रीय बीज निगम लिमिटेड, नई दिल्ली की बारिश के मौसम की विभिन्न फसलों जैसे तिल (किस्म- GT-6 1.5 क्विंटल बीज), मूंग (किस्म MH-1142 15 क्विंटल बीज), ज्वार (किस्म CSV-41 4 क्विंटल बीज), ग्वार (किस्म HG-2-20 10 क्विंटल बीज) और बेहतर पोषण के लिए किचन गार्डन सब्जियों किट आदि का भी वितरण मौजूद अतिथियों द्वारा किया गया.

इस प्रकार कुल 30.5 क्विंटल (800 बीज पैकेट) गुणवत्ता युक्त बीज का प्रथम लाइन प्रदर्शन मौजूद किसानों के खेत पर लगेंगे. अविकानगर संस्थान द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में दौसा जिले की विभिन्न तहसील सिकराय, बहरावड़ा, बैजूपाड़ा, सिकंदरा आदि के विभिन्न गांवो (घूमना, जयसिंहपुरा, पाटन, बुजेट, गीजगढ़, गढ़ी, बनेपुरा, जयसिंहपुरा, नामनेर, सिकराय, कैलाई, गनीपुर, पिलोड़ी, खेड़ी रामला, निकटपुरी, दंड खेड़ा, मानपुर, लोटवाड़ा, नांदरी, गिरधारीपुरा, नाहरखोरा, लाखनपुरा, बसेड़ी, भावगढ़, गेरोटा, चांदपुर, आगवली, गेरोज, मोहलई, गडोरा आदि गांव ) के 600 से ज्यादा जनजाति किसानों ने कार्यक्रम मे पहुंच कर दी गई जानकारी से लाभान्वित हुए और  उन को गुणवत्ता बीज का वितरण भी किया गया.

इस कार्यक्रम के समापन पर सरपंच घूमना एवं सिकराय सरपंच संघ के अध्यक्ष श्रीमान विपिन मीना ने कार्यक्रम में पधारे सभी अतिथियों एवं गांव वासियों को धन्यवाद दिया और आगे भी इस तरह के कार्यक्रम किसानों के लिए उपयोगी बताते हुए आयोजित करने का निवेदन निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर से किया गया.

इस किसान वैज्ञानिक संगोष्ठी कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए अविकानगर संस्थान के वैज्ञानिक डा. चंदन गुप्ता, सहायक कर्मचारी छुट्टन लाल मीना, नरेश बिश्नोई, विष्णु भटनागर समेत  घूमना गांववासियों ने अपना पूरा सहयोग दिया.

विकसित कृषि संकल्प अभियान के तहत किसानों को मिले फ्री धान बीज

विकसित कृषि संकल्प अभियान: राष्ट्रीय बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, कुश्मौर, कृषि विज्ञान केंद्र, पिलखी, मऊ और  कृषि विभाग, मऊ के संयुक्त तत्वाधान में विकसित कृषि संकल्प अभियान के 9 वें दिन कृषि विषेशज्ञों एवं कृषि विभाग के अधिकारियों की गठित तीनों टीमों ने 15 ब्लौक के तीन गांवों सलाहाबाद, हरपुर और पिजरा में किसानों से सीधा संवाद किया.

इस अभियान के माध्यम से अनुसूचित जाति उप योजना के अंतर्गत लगभग 1000 किसानों को धान (BPT 5204) के 5 – 5 किलोग्राम के  बीज मुफ्त में बांटे गए. भारतीय बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, कुश्मौर के प्रधान वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार सिंह ने गुणवत्ता युक्त बीज उत्पादन और प्रजातियों के बारे में बताया. जिला अपर कृषि अधिकारी डा. सौरभ सिंह ने कार्यक्रम में सरकारी योजनाओं जैसे पीएम किसान सम्मान निधि योजना, पीएम कुसुम योजना, पीएम फसल सुरक्षा बीमा योजना आदि के बारे में बताया.

कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि विशेषज्ञों डा. विनय कुमार सिंह, डा. आकांक्षा सिंह और डा. अंगद कुमार सिंह ने अपनेअपने विषयवस्तु से नवीनतम जानकारी किसानों के साथ साझा की. साथ ही, संबंधित अधिकारियों ने किसानों को फसल बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के बारे में बताया.

Conference : ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान’ के अतंर्गत किसान सम्मेलन

Conference : कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के निर्देशानुसार, 29 मई से 12 जून, 2025 तक देशभर में विकसित कृषि संकल्प अभियान-2025 चल रहा है. इस अभियान का मकसद देश भर के गांवों में अनेक कार्यक्रमों के जरीए कृषि की नवीनतम तकनीकों एवं सरकारी योजनाओं की जानकारी को किसानों तक सीधा पहुंचाना है. साथ ही, आधुनिक तकनीकों से खरीफ फसल प्रबंधन और उत्पादकता वृद्धि के बारे में जागरूकता बढ़ाना है. इस के साथ ही, खेती व किसानों को समृद्ध करने के लिए “लैब टू लैंड” विजन के साथ विज्ञान एवं वैज्ञानिक किसानों के खेत में पहुंच रहे हैं.

इस अभियान के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, दिल्ली, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली एवं कृषि इकाई, विकास विभाग, दिल्ली सरकार भी दिल्ली देहात में 29 मई से 12 जून, 2025 तक विशेष अभियान का आयोजन कर रही है.

दिल्ली क्षेत्र में विकसित कृषि संकल्प अभियान

इस कड़ी में, 02 जून, 2025 को कृषि विज्ञान केंद्र, दिल्ली भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली एवं कृषि इकाई, विकास विभाग, दिल्ली सरकार ने नजफगढ ब्लौक के जाफरपुर कलां, सुरेरहा एवं खेरा डाबर गांव में किसान सम्मेलन का आयोजन किया, जिस में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली के प्रधान वैज्ञानिक डा. हर्षवर्धन ने दिल्ली के आसपास क्षेत्र के लिए सब्जियों की विभिन्न प्रजातियां, जो दिल्ली क्षेत्र में अच्छा उत्पादन दे सके, साथ ही साथ पोषण से संबंधित जितनी भी तकनीकियां है जैसे किचन गार्डन की स्थापना करना और उस में लगने वाले मौसम के अनुसार सब्जियां और मानव पोषण के लिए संतुलित आहार आदि के साथ संरक्षित खेती की विस्तृत जानकारी दी.

डा. रामस्वरूप बाना, प्रधान वैज्ञानिक ने जल संरक्षण की तकनीकियों पर विशेष ध्यान देते हुए जानकारी साझा की. साथ ही, उन्होंने बताया कि जिन क्षेत्रों में पानी की कमी है उन क्षेत्र में किसान अपने खेत में एक छोटा सा तालाब बना कर बारिश के पानी को संरक्षित कर उस का सही इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस के अलावा उन्होंने मल्चिंग, ड्रिप सिंचाई पद्धति, कम समय में अधिक आय के साथसाथ बाजरा एवं दलहनी फसलों के बारे में विस्तार से जानकारी दी. इसी क्रम में डा. इंदु चोपड़ा ने फसल उत्पादन के लिए मिट्टी एवं पानी एवं उर्वरकों के प्रबंधन एवं महत्व को समझाया और उन्होंने यह भी बताया कि हर फसल लेने के बाद मिट्टी और पानी की जांच करें और उस के अनुसार ही मिट्टी के पोषण के लिए खाद का प्रबंध करें.

डा. हेमलता ने संरक्षित खेती पर विशेष जोर दिया और उन्होंने बताया कि छोटे से छोटे जगह में भी आप हाईटेक नर्सरी बना कर अच्छा उत्पादन कर सकते और युवा किसान इस में अच्छी आय प्राप्त सकते हैं.

इसी क्रम में कृषि विज्ञान केंद्र, दिल्ली के वैज्ञानिकों ने आगामी खरीफ फसलों से जुड़ी आधुनिक तकनीकों की जानकारी के साथ मृदा स्वास्थ्य कार्ड के अनुसार विभिन्न फसलों के चयन और संतुलित खादों के प्रयोग, पशुओं का रखरखाव, बागबानी एवं फलों की खेती मृदा स्वास्थ्य कार्ड, धान की सीधी बोआई, हरि खाद का प्रयोग, पशुपालन के लिए आहार एवं रोग प्रबंधन आदि की विस्तृत जानकारी दी.

इस अभियान के तहत कृषि इकाई, दिल्ली सरकार के अधिकारियों ने दिल्ली में संचालित हो रही प्राकृतिक खेती, प्राकृतिक खेती के घटक, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की विस्तृत जानकारी किसानों के साथ साझा की. कार्यक्रम के शुरुआत में डा. डीके राणा, अध्यक्ष, कृषि विज्ञान केंद्र, दिल्ली ने बताया कि तकनीकों एवं अनुसंधान को किसानों के खेत में ले जाने में यह अभियान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जिस में दिल्ली के किसान उत्साहित हो कर भागीदारी कर रहे हैं.

Conference : “बागबानी में तेजी से कैसे हो विकास” पर राष्ट्रीय सम्मेलन

Conference : कृषि क्षेत्र में आजीविका सुधार के लिए “बागबानी के तीव्र विकास” विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन 28 से 31 मई, 2025 तक बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में किया जा रहा है. इस सम्मेलन में देशभर से प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, नीतिनिर्माताओं और शिक्षाविदों ने भाग लिया. इस का उद्देश्य भारत में बागबानी क्षेत्र की वृद्धि के लिए नवाचार पूर्ण रणनीतियों और कार्य योजना पर विचार करना था.

इस कार्यक्रम में डा. संजय कुमार, अध्यक्ष, एएसआरबी, नई दिल्ली (मुख्य अतिथि), डा. एचपी सिंह, पूर्व उप महानिदेशक (बागबानी), नई दिल्ली, डा. एआर पाठक, पूर्व कुलपति, जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय, डा. एसएन झा, उप महानिदेशक, कृषि अभियांत्रिकी, आईसीएआर, नई दिल्ली, डा. आलोक के सिक्का, भारत प्रतिनिधि, आईडब्लूएमआई, नई दिल्ली, डा. बबिता सिंह, न्यासी, एएसएम फाउंडेशन, डा. फिजा अहमद, निदेशक, बीज एवं फार्म, बीएयू सबौर एवं आयोजन सचिव मौजूद थे.

इस कार्यक्रम में डा. संजय कुमार ने कहा कि बागबानी राष्ट्र निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. उन्होंने बताया कि बागबानी क्षेत्र प्रति इकाई क्षेत्रफल पर सब से अधिक लाभ देता है, और यह स्वागत योग्य परिवर्तन है कि किसान पारंपरिक खाद्यान्न फसलों से हट कर उच्च मूल्य वाली बागबानी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं.

डा. संजय कुमार ने पारंपरिक पद्धतियों से आगे बढ़ कर विपणन, ब्रांडिंग और प्रसंस्करण के बाद की प्रक्रिया पर जोर दिया. उन्होंने क्षेत्रीय विशेषताओं को बढ़ावा देने और उपज के नुकसान को कम करने के लिए जीआई विशिष्ट मौल और खुदरा स्टोर स्थापित करने का सुझाव दिया. कुपोषण की समस्या पर भी उन्होंने बागबानी के विविधीकृत उपायों के माध्यम से एकीकृत समाधान की आवश्यकता पर बल दिया.

मौके पर मौजूद

डा. एचपी सिंह ने ‘विकसित भारत’ पहल के अंतर्गत सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता बताई और लचीली, अधिक उपज देने वाली, संसाधन कुशल तकनीकों को अपनाने की बात कही. डा. एआर पाठक ने एएसएम फाउंडेशन के सदस्यों के योगदान की सराहना की और उन के देशभक्ति भाव को इस पावन अवसर पर याद किया. साथ ही, उत्कृष्ट योगदान के लिए उन को सम्मान भी प्रदान किए गए.

डा. एसएन झा ने मखाना और लीची जैसी फसलों पर केंद्रित अनुसंधान की आवश्यकता को रेखांकित किया और विश्वविद्यालय आधारित अनुसंधान को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कार्यात्मक प्रजनन की सिफारिश की.

डा. आलोक के सिक्का ने 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया. उन्होंने आर्थिक विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के संतुलन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि बागबानी कृषि जीडीपी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. डा. फिजा अहमद, आयोजन सचिव ने विश्वविद्यालय की प्रमुख उपलब्धियों को साझा किया, जिन में 19 पेटेंट, 1 ट्रेडमार्क, 56 किसान किस्मों का पंजीकरण और जीआई डाक टिकटों का जारी होना शामिल है.

वैज्ञानिकों को किया सम्मानित :

इस सम्मेलन के दौरान महत्वपूर्ण शोध पत्रिकाओं एवं प्रकाशनों का विमोचन किया गया और बागबानी क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया. इस कार्यकम के उद्घाटन सत्र का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि बागबानी के क्षेत्र में नवाचार, सततता एवं समावेशिता को बढ़ावा दे कर ग्रामीण आजीविका को मजबूत किया जाएगा.

42.4 करोड़ रुपए की लागत से बनेगा जल पार्क, मत्स्यपालकों को होगा फायदा

अगरतला: केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी और पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह ने पिछले दिनों 18 मई, 2025 को अगरतला, त्रिपुरा में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत कैलाशहर, त्रिपुरा में 42.4 करोड़ रुपए की लागत से एक एकीकृत जल पार्क की शुरुआत की.

इस के अलावा, इस कार्यक्रम में राज्य की समृद्ध संस्कृति की प्रदर्शनी और विविध मछलियों पर एक मछली महोत्सव का उद्घाटन भी किया गया. इस कार्यक्रम में जौर्ज कुरियन, राज्य मंत्री, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के साथसाथ सुधांशु दास, मत्स्यपालन मंत्री, त्रिपुरा सरकार और टिंकू राय, खेल और युवा मामलों के मंत्री, त्रिपुरा सरकार भी शामिल हुए.

केंद्रीय मंत्री, राजीव रंजन सिंह ने भारत की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में बताते हुए कहा कि मत्स्यपालन क्षेत्र ने 2014-15 से 9.08 फीसदी  की वृद्धि हो रही है जो भारत में कृषि से संबंधित क्षेत्रों में सबसे अधिक है. मत्स्यपालन क्षेत्र में त्रिपुरा की विशाल संभावना को पहचानते हुए, उन्होंने आधुनिक तकनीक, एकीकृत खेती और नवाचार के उपयोग के माध्यम से मांग और आपूर्ति के बीच की कमी को पूरा करने की आवश्यकता पर बल दिया.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन ने कहा कि देश के 11 एकीकृत जल पार्कों में से 4 पूर्वोत्तर क्षेत्र में बनाए जा रहे हैं. इन में से एक त्रिपुरा में बनाया जा रहा है. केंद्रीय मंत्री ने हितधारकों से त्रिपुरा को एक ‘‘मछली आधिक्‍य राज्य’’ में बदलने और त्रिपुरा की 1.5 लाख टन की मांग से अधिक 2 लाख टन मछली उत्‍पादन के लक्ष्‍य की दिशा में लगन से काम करने का आग्रह किया ताकि यह मछली का निर्यात करने में सक्षम हो सके.

उन्‍होंने आगे कहा कि शीघ्र ही त्रिपुरा में भी सिक्किम की तरह ही जैविक मछली क्लस्‍टर विकसित किया जाएगा. एकीकृत जल पार्क को समयबद्ध तरीके से पूरा करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए, केंद्रीय मंत्री ने मछली पालकों को संस्थागत प्रशिक्षण प्रदान करने के महत्व पर भी जोर दिया. मछुआरों को मत्स्यपालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि और पीएमएमएसवाई जैसी सरकारी योजनाओं का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए, उन्होंने एनएफडीबी के माध्यम से प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण में सहयोग की केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने झींगा उत्पादन को बढ़ावा देने, सजावटी मत्स्यपालन को विकसित करने, बुनियादी ढांचे में सुधार करने, आसान बाजार पहुंच सुनिश्चित करने और क्षेत्र में नवाचार और स्थिरता को बढ़ावा देने जैसे मुद्दों के बारे में भी बात की. इस अवसर पर, केंद्रीय मंत्री ने विभिन्न लाभार्थियों को प्रमाण पत्र और स्वीकृति आदेश वितरित किए.

मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी और अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के राज्य मंत्री जौर्ज कुरियन ने त्रिपुरा में मछली उत्पादकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि राज्य की लगभग 98 फीसदी आबादी मछली खाती है. उन्होंने राज्य की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में मत्स्यपालन की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया.

त्रिपुरा सरकार के मत्स्यपालन, एआरडीडी और एससी कल्याण मंत्री सुधांशु दास ने लक्षित उपायों के माध्यम से मछुआरों और मछली किसानों के उत्थान के लिए राज्य की प्रतिबद्धता पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि मत्स्य सहायता योजना के तहत पहचाने गए मछुआरों और मछली किसानों को उन की आजीविका में सहयोग करने के लिए 6,000 रुपए की सालाना आर्थिक सहायता मिल रही है.

इस के साथ ही, रोजगार के एक साधन के रूप में मत्स्यपालन को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने कहा कि त्रिपुरा में इस क्षेत्र में अत्‍यधिक संभावनाएं हैं जिन का अभी तक उपयोग नहीं किया गया है. जबकि त्रिपुरा सरकार के खेल और युवा मामलों के मंत्री टिंकू राय ने मत्स्यपालन क्षेत्र के उत्थान और त्रिपुरा में मछुआरों की आजीविका को बढ़ाने के लिए निरंतर सहयोग और सामूहिक प्रयास को प्रोत्साहित किया.

केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने विभाग की प्रमुख योजनाओं और पहलों – प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, कृषि अवसंरचना विकास निधि और प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सहयोजना के बारे में बताया. इन का संयुक्त निवेश परिव्यय लगभग 38,000 करोड़ रुपए है. यह उल्‍लेखनीय है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए 2,114 करोड़ रुपए की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है जिस में विशेष रूप से त्रिपुरा के लिए 319 करोड़ रुपए शामिल हैं.

डा. अभिलक्ष लिखी ने आगे मछुआरों और मत्स्य किसानों से अनुसंधान और विकास में प्रगति का पूरा लाभ उठाते हुए रिसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम, बायोफ्लोक और ड्रोन आधारित अनुप्रयोगों जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाने का अनुरोध किया. आजीविका सुरक्षा के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने मछुआरों के लिए बीमा कवरेज प्रदान करने के लाभों के बारे में भी बताया. इस के अलावा, विविध किस्‍मों की प्रजातियों विशेष रूप से उच्‍च मूल्‍य की देशी प्रजातियों जैसे पाबदा और सिंघी का उत्‍पादन बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया गया.

इस कार्यक्रम में मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के संयुक्त सचिव सागर मेहरा, एनएफडीबी के मुख्य कार्यकारी डा. बिजय कुमार बेहरा के साथसाथ केंद्र और राज्य मत्स्य विभाग के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे.

Placement Drive : पशुपालकों के लिए प्लेसमेंट ड्राइव

Placement Drive : कैंपस प्लेसमेंट ड्राइव का आयोजन सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डा. केके सिंह के दिशानिर्देशन में किया गया. इस अवसर पर माई एनिमल कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट संदीप दत्ता ने कहा कि भारत में माई एनिमल कंपनी द्वारा कुत्तों, ऊंटों, घोड़ों और अन्य जानवरों के लिए स्वास्थ्यवर्धक एवं गुणकारी प्रोडक्ट बनाया जा रहा है, जिस से भारत के पशुपालक लाभान्वित हो सकें.

माई एनिमल कंपनी जूनियर के वाइस प्रेसिडेंट आदित्य पांडे ने कहा कि आज राष्ट्रीय स्तर पर कई कंपनियां हैं, जो अपने विभिन्न उत्पादों को बना कर मार्केटिंग कर रही हैं, लेकिन पशुपालन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए पहली कंपनी माई एनिमल है, जो पशुपालन क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काम कर रही है.

उन्होंने कहा कि उन का प्रयास है कि गुणवत्तायुक्त उत्पादों से हर गांव के पशुपालक परिचित हों और पशुओं की सुरक्षा को ध्यान में रख कर पशुपालन का एक अच्छा व्यवसाय कर सकें, इस के लिए कंपनी पेरावेट और वेटरनरी डाक्टर के सहयोग से भारत के ग्रामीण इलाकों तक पहुंच कर पशुपालकों का सहयोग कर रही है. इसी को विस्तार देने के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के छात्रछात्राओं का इंटरव्यू लिया गया. इस के बाद  उन को प्लेसमेंट दे कर कंपनी के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन को विभिन्न जिलों में पोस्टिंग दी जाएगी, जिस से पशुपालक नए उत्पाद और तकनीक की सहायता से अपने पशुओं की जिंदगी को एक नई दिशा दे सकें.

इस अवसर पर 38 छात्रछात्राओं ने कंपनी के प्लेसमेंट ड्राइव में हिस्सा लिया और इन में से कंपनी ने 15 छात्रों का चयन किया. कंपनी इन छात्रों को देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी काम करने का मौका देगी, क्योंकि यह कंपनी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार बढ़ती जा रही है.

इस कार्यक्रम में निदेशक ट्रेनिंग औफ प्लेसमेंट प्रो. आरएस सेंगर ने कहा कि कुलपति प्रो. केके सिंह के मार्गदर्शन में कृषि विश्वविद्यालय के छात्रों का प्लेसमेंट सौ फीसदी हो सके, इस के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. उन्होंने आगे कहा कि आने वाले दिनों में कृषि विश्वविद्यालय में रोजगार मेला भी लगाया जाएगा, जिस से छात्र रोजगार पा सकें. इस कार्यक्रम का संचालन जौइंट डायरेक्टर प्रो. सत्य प्रकाश ने किया.

Lac Insect : ‘राष्ट्रीय लाख कीट दिवस’ का आयोजन

Lac Insect : राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर के कीट विज्ञान विभाग में लाख कीट आनुवंशिक संरक्षण पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा प्रायोजित नेटवर्क परियोजना के तहत चौथा ‘राष्ट्रीय लाख कीट दिवस’ मनाया गया. इस मौके पर लाख संसाधन उत्पादन पर ‘एकदिवसीय छात्र संवाद सहप्रशिक्षण कार्यशाला’ का आयोजन किया गया और इस में कृषि संकाय के स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी के 125 से अधिक छात्रों ने हिस्सा लिया.

इस मौके पर परियोजना अधिकारी डा. हेमंत स्वामी ने लाख कीट के जीवनचक्र एवं उन के पोषक वृक्ष लाख की खेती कैसे की जाए व किसान अपनी आय को कैसे बढ़ा सकते हैं, के बारे में जानकारी दी.

इस कार्यशाला में डा.एमके महला, प्रोफैसर, कीट विज्ञान ने सौंदर्य प्रसाधन, भोजन, फार्मास्यूटिकल्स, इत्र, वार्निश, पेंट, पौलिश, आभूषण और कपड़ा रंगाई जैसे उद्योगों में लाख और इस के उपउत्पादों यानी राल, मोम और डाई के उपयोग के बारे में बताया. साथ ही, उन्होंने विभिन्न मेजबान पौधों पर लाख कीट की वैज्ञानिक खेती के लिए उन्नत तकनीकों के बारे में भी जानकारी दी.

16 मई से 22 मई तक ‘उत्पादक कीट संरक्षण सप्ताह’ और ‘राष्ट्रीय लाख कीट दिवस’ के अवसर पर डा. अमित त्रिवेदी, क्षेत्रीय निदेशक अनुसंधान, डा. वीरेंद्र सिंह, प्रोफैसर, उद्यान विभाग और डा. रमेश बाबू, विभागाध्यक्ष, कीट विज्ञान विभाग ने इन उत्पादक कीड़ों के संरक्षण, परागणकों, भौतिक डीकंपोजर, जैव नियंत्रण एजेंटों आदि के रूप में प्राकृतिक जैव विविधता की सुरक्षा में उन की भूमिका पर प्रकाश डाला. साथ ही, यह भी बताया कि कैसे स्थानीय किसानों के बीच लाख की खेती को लोकप्रिय बनाना है और प्रोत्साहित करना है, क्योंकि जहां लाख की खेती छोड़ दी गई है, वहां निवास स्थान नष्ट हो गए हैं, वहां लाख के कीट और संबंधित जीवजंतु लुप्त हो गए हैं.

इस आयोजन के दौरान कीट पर निबंध प्रतियोगिता व प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया व विजेताओं को प्रमाणपत्र वितरित किए गए.

Natural Farming: 1,500 क्लस्टर में लाखों किसानों तक प्राकृतिक खेती

Natural Farming : प्राकृतिक खेती के संदर्भ में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि हम कई क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. मुझे यह कहते हुए गर्व है कि एक समय था, जब हम अपनी जनता का पेट भरने के लिए अमेरिका से निम्न स्तर का गेहूं लेने के लिए मजबूर थे, लेकिन आज देश में अन्न के भंडार भरे हुए हैं.

हमारा शरबती गेहूं आज दुनिया में धूम मचा रहा है. हमारे खाद्यान्न का उत्पादन लगातार बढ़ता जा रहा है. जलवायु परिवर्तन के खतरों के बावजूद बढ़ते हुए तापमान और अनिश्चित मौसम के बावजूद भी हम ने देश के खाद्यान्न को ही नहीं बढ़ाया है, बल्कि अपनी जनता का पेट भी भरा है, साथ ही कई देशों को अन्न का निर्यात भी किया है.

हम गेहूं के साथसाथ दलहन और तिलहन का उत्पादन भी बढ़ा रहे हैं. कृषि के लिए हमारी 6 सूत्रीय रणनीति है, पहला उत्पादन बढ़ाना और उत्पादन बढ़ाने के लिए अच्छे बीज, कृषि पद्धतियां आदि, दूसरा उत्पादन की लागत घटाना, तीसरा फसलों के ठीक दाम, चौथा नुकसान की भरपाई, पांचवां खेती का विविधीकरण और छठा प्राकृतिक खेती.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि एक करोड़ किसानों को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है. हमारा लक्ष्य है कि हम लगभग 15 सौ क्लस्टर में साढ़े 7 लाख किसानों तक प्राकृतिक खेती को ले जाना है, ताकि ये किसान अपने खेत के एक हिस्से में प्राकृतिक खेती को शुरू कर सकें. हम सभी को धरती भी कीटनाशकों से बचानी होगी. आज कीटनाशकों के कारण कई पक्षियों का नामोनिशान ही मिट गया है और नदियां भी प्रदूषित हो रही हैं.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आगे कहा कि शहरों के विकास से ही काम नहीं चलेगा, स्वावलंबी व विकसित गांव कैसे बने, सड़कों का नैटवर्क, गांव में बुनियादी सुविधाएं, पक्का मकान, साफ पीने का पानी, पंचायत भवन, सामुदायिक भवन, स्थानीय बाजार और गांव के लिए जरूरी चीजें गांव में ही कैसे उत्पादित कर पाएं, उस पर काम करने का प्रयास किया जाए.

उन्होंने आगे कहा कि यह सब हमें करना पड़ेगा, तभी गांव विकसित होगा. गांव का हर परिवार किसी न किसी रोजगार से जुड़ा हो, उस दृष्टि से भी प्रयास करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि मानवीय गुणों के साथ ही सब का विकास हो. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पर्यावरण की भी चिंता की जाए. प्रकृति का दोहन करें, न कि शोषण करें.

उन्होंने कहा कि आज भारत विकसित देशों की तुलना में केवल 7 फीसदी कार्बन उर्त्सजन करता है. हमें प्रकृति का संरक्षण करते हुए ही विकास करना है. भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की 5वीं सब से बड़ी अर्थव्यवस्था है और तीसरी जल्दी ही बनने वाली है. हम अपना विकास भी करेंगे और दुनिया को भी राह दिखाएंगे.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संबोधन के अंत में कहा कि जिस दिशा में हम बढ़ रहे हैं, विश्व शांति का कोई दर्शन अगर कराएगा तो वह भारत ही कराएगा. ऐसे भारत के निर्माण में हम सब सहयोगी बनें.

Agriculture : खेतीकिसानी की उन्नति में केवीके की खास भूमिका

नई दिल्ली : केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान बीते दिनों 28 अप्रैल को नई दिल्ली में देशभर के सभी 731 कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) से वर्चुअल संवाद किया. केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहल पर आयोजित इस अभिनव संवाद कार्यक्रम में सभी केवीके के चल रहे प्रयासों, उन की भूमिका और भावी कार्यक्रमों के कार्यान्वयन को ले कर चर्चा हुई. इस दौरान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभी केवीके से किसान उन्मुख प्रयासों में तेजी लाने की बात कही, साथ ही कहा कि खेतीकिसानी की उन्नति में केवीके सशक्त माध्यम के रूप में भूमिका निभाए.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि केवीके कृषि में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं. साथ ही, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि खरीफ बोआई से पहले सभी केवीके और आईसीएआर, राज्य सरकारों के साथ मिल कर किसान जागरूकता अभियान चलाएं.

उन्होंने आगे प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण और किसानों के हितों के मद्देनजर उत्पादकता बढ़ाने पर भी जोर दिया. साथ ही, उत्कृष्ट कार्य करने वाले केवीके को पुरस्कृत किए जाने के प्रस्ताव पर भी विचार हुआ.

इस चर्चा में देशभर के विभिन्न कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रमुखों के साथ ही कृषि वैज्ञानिक शामिल हुए, जिन में से कुछ ने केवीके की उपलब्धियां बताईं, वहीं अपने सुझाव भी दिए. आईसीएआर कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, अटारी, जोधपुर (राजस्थान), अटारी, हैदराबाद (आंध्र प्रदेश), अटारी, पटना (बिहार), अटारी, जबलपुर (मध्य प्रदेश) के अलावा मंडी (हिमाचल प्रदेश), नंदूरबार (महाराष्ट्र), खुर्दा (ओडिशा), मोरीगांव (असम) और लक्षद्वीप के केवीके प्रमुखों ने अपनेअपने क्षेत्र विशेष के अनुसार अपने कामकाज, उपलब्धियों और भावी कार्य योजनाओं के बारे में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान को जानकारी दी. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डा. एमएल जाट और उपमहानिदेशक (प्रसार) डा. राजबीर सिंह ने प्रारंभ में केवीके के संबंध में रूपरेखा बताई.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कृषि क्षेत्र के विकास के लिए अभियान स्वरूप कार्य करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि कृषि व्यापक क्षेत्र है. प्रत्यक्ष रूप से लगभग 45 फीसदी आबादी कृषि से जुड़ी है और हमारी जीडीपी का लगभग 18 फीसदी हिस्सा कृषि क्षेत्र से ही आता है, इसलिए इस व्यापक भूमिका को और अधिक मजबूत करने के लिए हमें लगातार प्रभावशाली प्रयास करने होंगे.

केवीके प्रमुखों को संबोधित करते हुए उन्होंने किसानों के क्षमता निर्माण प्रशिक्षण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कृषि से जुड़े अच्छे प्रशिक्षण और जागरुकता के माध्यम से हम किसानों को आत्मनिर्भर और सशक्त बना सकते हैं. साथ ही, उन्होंने मृदा स्वास्थ्य कार्ड और किसान जागरूकता को जोड़ते हुए काम करने की नई पहल करने संबंधी विचार भी साझा किए और किसानों को मिट्टी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए उवर्रक के संतुलित इस्तेमाल की मात्रा के अनुसार उचित सलाह देते हुए खेती करने की दिशा में आगे काम करने के लिए भी कहा.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कृषि के लिए 6 सूत्रीय रणनीति, जिस में उत्पादन बढ़ाना, लागत घटाना, फसलों के ठीक दाम, नुकसान की भरपाई, खेती का विविधीकरण और प्राकृतिक खेती पर भी मार्गदर्शन दिया. उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती में हमें उच्च मापदंड स्थापित कर के दिखाना है.

उन्होंने आगे कहा कि खाद्यान उत्पादन के लिए बेहतर बीजों, नए शोध, नई तकनीकों के प्रयोग पर बल दिया और इसी क्रम में और अधिक मौडल फार्म बनाने और नए किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) के माध्यम से भी किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए प्रयास करने को कहा.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जल संरक्षण के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ के लिए और अधिक प्रभावशाली रूप से भूमिका निभाने की जरूरत है. कम से कम पानी में अधिक से अधिक खेती की कोशिश होनी चाहिए.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि कृषि विज्ञान केंद्रों पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है और सभी को कार्य प्रदर्शन के पायदान पर ऊपर बने रहने के लक्ष्य के साथ काम करना चाहिए. उन्होंने कहा कि अच्छा काम करने वाले केवीके को अगले साल से पुरस्कृत करने की व्यवस्था पर भी विचार की आवश्यकता है.

इस बैठक के अंत में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने केवीके प्रमुखों से काम को पूजा के रूप में स्वीकारते हुए परिणाम उन्मुख हो कर काम करने की बात कही. एक अभिनव पहल के रूप में इस साल 15 जून, 2025 को खरीफ फसल की बोआई से पहले किसानों की जागरुकता के लिए व्यापक जन अभियान चलाए जाने संबंधी प्रस्ताव पर भी विचार किया गया और विभिन्न कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से खरीफ बोआई संबंधित जानकारी देने के लिए सूचना प्रवाह माध्यम से अधिक से अधिक किसानों को जोड़ने संबंधी रूपरेखा पर चर्चा हुई.