अनार की आधुनिक खेती

कहावत है  ‘एक अनार सौ बीमार’. इस कहावत का सीधा सा मतलब तो यही है कि किसी एक चीज के दावेदार कई लोग हैं. लेकिन अनार को बीमारी से जोड़ने का कोई न कोई मकसद तो जरूर रहा होगा.

अनार में ताकत का भरपूर खजाना है. अनार की कोई चीज ऐसी नहीं है, जो बेकार जाती है. इस के दाने, छिलके और जड़ वगैरह सभी चीजें काम में आती हैं. अनार सेहत और ज्यादा आमदनी देने वाला फल है.

भारत में इस की खेती बहुत कम रकबे में होती है. देश के ज्यादातर हिस्सों में यह किचन गार्डन में ही उगाया जाता है. इस के फूल सुंदर, लाल रंग के होते हैं, इसलिए इसे सजावटी पौधे के रूप में भी उगाया जाता है.

अनार पौष्टिक और औषधीय गुणों से भरपूर जायकेदार फल है. इस का रस खट्टामीठा, ठंडक देने वाला होता है. गरमियों में अनार का शरबत बहुत ही जायकेदार और ताजगीभरा होता है.

इस के अलावा अनार से जैली भी बनाई जाती है और इस के रस को भी महफूज रखा जा सकता है. इस के छिलकों का इस्तेमाल कपड़ों की रंगाई में भी किया जाता है. जंगली अनार के बीजों को सुखा कर मसाले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इन सूखे बीजों को अनारदाना कहते हैं.

माकूल आबोहवा

अनार का बाग सभी जगहों पर आसानी से तैयार किया जा सकता है. बढि़या क्वालिटी वाले फलों के लिए ठंडे और गरम दोनों मौसमों की जरूरत होती है. जाड़े के मौसम में सामान्य ठंडक व गरमियों के दिनों में गरम व सूखी आबोहवा इस की बागबानी के लिए बढि़या मानी गई है. इसी वजह से राजस्थान, गुजरात व महाराष्ट्र के अनार बढि़या क्वालिटी वाले होते हैं.

फलों के विकास के लिए 38 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान अच्छा होता है. मीठे और जायकेदार फल के लिए गरम आबोहवा अच्छी होती है. फलों के पकने के समय बरसात या आबोहवा में नमी होने से फलों की क्वालिटी में कमी आती है. नम आबोहवा वाले इलाकों में पौधों की बढ़वार ज्यादा और फल कुछ कम मीठे होते हैं.

अनार की अच्छी बढ़वार व ज्यादा पैदावार के लिए जल निकास वाली बलुई दोमट व गहरी दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है. हलकी मिट्टी में फलों का रंग, क्वालिटी और मिठास अच्छी होती है.

अनार के पेड़ जमीन के नमकीनपन के प्रति सहनशील होते हैं. खार वाली मिट्टी में भी इस की बागबानी की जा सकती है. अच्छी देखरेख के साथ इस की बागबानी पहाडि़यों की तलहटी में भी की जा सकती है. लेकिन मिट्टी में एक मीटर की गहराई तक कोई सख्त परत न हो, नहीं तो जड़ों पर बुरा असर पड़ता है.

Anarगूटी से पौध  तैयार करना

अनार की पौध कलम व गूटी से तैयार की जाती है. कलम व गूटी से तैयार पौध बीज द्वारा तैयार पौधों के मुकाबले जल्दी फल देने लगती है. किसानों को चाहिए कि जिस टहनी से कलम तैयार करें, उस की उम्र 6 महीने से ज्यादा हो, लेकिन 18 महीने से कम हो. अगर टहनियों की कमी है तो पौधों के तनों से निकलने वाली जड़ों यानी छोटे फुटाव को भी कलम बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

दक्षिण भारत में तकरीबन 20-25 सैंटीमीटर लंबी कलम मानसून के मौसम में और उत्तरी भारत में मानसून या फरवरीमार्च महीने में नर्सरी में लगा दी जाती है. कलम में लगी पत्तियों को काट कर अलग कर लें. कलम के अच्छे जमाव के लिए इंडोल ब्यूटारिक अम्ल के 5,000 पीपीएम के घोल में डुबो कर लगाएं. इस से जड़ें आसानी से निकलती हैं. तकरीबन 2 हफ्तों के बाद कलमों से जडें़ निकलनी शुरू हो जाती हैं और 9 महीने में कलमें रोपाई के लायक हो जाती हैं. लेकिन 1-2 साल पुरानी कलमें रोपाई के लिए ज्यादा अच्छी मानी जाती हैं.

भारत के ज्यादातर हिस्सों में बीज द्वारा पौधे तैयार किए जाते हैं, लेकिन इन पौधों से बढि़या क्वालिटी वाले फल हासिल नहीं होते हैं और कम पैदावार मिलती है. इस के लिए अगस्तसितंबर महीने में पके हुए फलों से बीज निकाल कर क्यारियों में बोए जाते हैं. जब पौधे 8-10 महीने के हो जाएं, तो वे रोपने लायक हो जाते हैं.

अनार की पौध गूटी से भी तैयार करते हैं. इस में गूटी बांधने की जगह पर लैनोलिन पेस्ट के साथ आईबीए के 10,000 पीपीएम वाले घोल से पौध तैयार करते हैं. गूटी बांधने का काम बरसात के मौसम में किया जाता है.

पौध लगाने का समय

तैयार की गई पौध को लगाने का सही समय बरसात का मौसम है. लेकिन सिंचाई की सहूलियत होने पर फरवरी महीने में भी पौधे लगाए जा सकते हैं.

पौधे लगाने से एक महीने पहले 3-4 मीटर की दूरी पर गड्ढे खोदें, जिन की लंबाई, चौड़ाई व गहराई 60 सैंटीमीटर हो. इन गड्ढों को 15-20 दिन धूप में खुला छोड़ने के बाद मिट्टी में 15-20 किलोग्राम गोबर की खाद और 100 ग्राम क्विनालफास मिला कर गड्ढे को भर देना चाहिए. बारिश शुरू होने पर जुलाई महीने में खोदे गए गड्ढों में पौधे लगा कर सिंचाई कर देनी चाहिए. रोपाई के 10-15 दिन बाद हर 3 दिन के अंतर पर सिंचाई करें.

रोपाई की वैज्ञानिक तकनीकों को अपना कर ज्यादा पैदावार हासिल कर सकते हैं. इस में पौधे की शुरू में 5×2 मीटर की दूरी को निकाल कर 4 मीटर कर ली जाती है. जैसेजैसे पौधों की तादाद बढ़ाई जाती है, वैसेवैसे पैदावार भी बढ़ती जाती है, जबकि फल की क्वालिटी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता.

सिंचाई व निराईगुड़ाई

पौध लगाने के बाद सिंचाई करनी चाहिए. अनार सूखे के प्रति सहनशील होते हैं, फिर भी पौधों को हर रोज पानी देने की जरूरत होती है, जब तक वे अच्छी तरह जड़ न पकड़ लें. फूल लगने पर सिंचाई नहीं करनी चाहिए. फल के लगने से ले कर पकने तक नियमित सिंचाई की जरूरत होती है, इसलिए बरसात के मौसम को छोड़ बाकी समय 10-12 दिन के अंतर से सिंचाई करनी चाहिए, नहीं तो फल ?ाड़ने, फल छोटे रहने और फल फटने की समस्या पैदा हो जाती है.

अनार के बाग को खरपतवार से मुक्त रखने के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई करना जरूरी है. निराईगुड़ाई उथली करनी चाहिए, जिस से पौधों की जड़ों को नुकसान न हो.

खाद की मात्रा मिट्टी, आबोहवा, किस्म व पौधे की उम्र पर निर्भर करती है. एक साल के पौधे में तकरीबन 10 किलोग्राम गोबर की खाद, 100 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश दें. पौधे के फैलाव के नीचे एकडेढ़ मीटर के दायरे में 15 सैंटीमीटर की गहराई पर खाद को अच्छी तरह से मिट्टी में मिलाना चाहिए.

सधाई व काटछांट

अनार के पौधे झाड़ी की तरह बढ़ते हैं. पुराने समय में एक तने वाला पौधा होता था, लेकिन आजकल बहुतनीय तकनीक का चलन ज्यादा है, क्योंकि किसी वजह से एक तना खत्म हो जाए तो दूसरे तने से फल मिलते रहते हैं.

अनार में तना छेदक कीट का हमला होता है. एक तना होने की दशा में कीड़े के हमले से कभीकभी पूरा पेड़ ही खत्म हो जाता है. इसलिए एक पौधे में 4-5 तने रखते हुए सधाई करना फायदेमंद होता है. इन तनों पर चारों तरफ फैली हुई 3-4 टहनी प्रति तना छोड़ कर बाकी को हटा देना चाहिए. पहली टहनी जमीन से 60 सैंटीमीटर की ऊंचाई पर होनी चाहिए.

Anarबहार और तुड़ाई

अनार के पेड़ों में साल में 3 बार फूल आते हैं. कारोबारी नजरिए से केवल एक बार फल लेना ठीक होता है. जूनजुलाई महीने में आने वाले फल को लेना चाहिए, क्योंकि यह बारिश के पानी पर आधारित होती है, इसलिए ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं होती. इसे मृग बहार कहते हैं. इस बहार को लेने के लिए पेड़ों की दिसंबर से ले कर अप्रैल महीने तक सिंचाई नहीं करनी चाहिए. इस से मार्च महीने तक पत्तियां झड़ जाती हैं और पौधा मई महीने तक सुषुप्तावस्था में पड़ा रहता है. इस के बाद बगीचे की जुताई कर खाद दी जाती है.

इस के बाद भी अगर बारिश नहीं होती है, तो तब 1-2 हलकी सिंचाई करनी चाहिए. ऐसा करने से पौधों में जूनजुलाई महीने में फूल आते हैं. जिस महीने बहार लेनी है, उस के लिए 2-3 महीने पहले सिंचाई बंद कर देते हैं.

पौधे लगाने के 3 साल बाद पेड़ फल देता है. फूल आने के 5-6 महीने बाद फल तोड़ने लायक हो जाते हैं. जब फल पकने लगते हैं, तब उन का छिलका भूरे रंग या हलके पीले रंग और कभीकभी गुलाबी लाल रंग का हो जाता है. उस समय फल को तोड़ना चाहिए.

10 साल की उम्र के पेड़ से तकरीबन 10-20 किलोग्राम फल मिलते हैं. 25-30 साल तक पेड़ों से फल मिलते हैं. तुड़ाई के बाद खराब फलों को हटा कर अच्छे फलों को बांस की टोकरी या लकड़ी के बौक्स में रखते हैं. इन डब्बों में 10-20 फल पुआल या सूखी घास बिछा कर रखते हैं.

अनार की स्टोरेज कूवत अच्छी होती है. फलों को 0 से 4 सैंटीग्रेड तापमान और 80-85 फीसदी नमी पर 2 महीने तक महफूज रखा जा सकता है.

फलों का फटना

अनार के फलों का फटना एक आम बात है. इस से फलों पर फंगस और बैक्टीरिया का हमला बढ़ता है. यह शिकायत मिट्टी में नमी, हवा के तापमान, नमी में बदलाव और सूखे के बाद अचानक भारी सिंचाई के चलते होती है. जब फल छोटे होते हैं तो बोरोन या कैल्शियम वगैरह की कमी के चलते, अनियमित सिंचाई या अनियमित बारिश और तापमान के उतारचढ़ाव होने पर फल फटते हैं. इस को रोकने के लिए 0.2 फीसदी बोरैक्स का छिड़काव करना चाहिए.

जिबे्रलिक एसिड के 250 पीपीएम के घोल का छिड़काव जून महीने में करने से फल नहीं फटते. फटने से प्रतिरोधी किस्मों जैसे बेदाना, जालोर बेदाना किस्म का चुनाव करें. बाग के चारों ओर हवा रोकने के लिए लकड़ी वाले पेड़ लगाएं.

कीट व रोगों की रोकथाम

Anarमक्खी या फल छेदक: अनार का यह कीट फूल आने पर नुकसान करना शुरू करता है. मादा तितली छोटे फलों पर अंडे देती है. इस के बाद इल्ली अंडों से निकल कर फलों में घुस जाती है और बीजों को खाती है. फिर छोटा सा छेद कर यह कीट बाहर निकल जाता है. इस से फलों में बैक्टीरिया व फफूंदी का हमला हो जाता है. फल सड़ने लगते हैं और गिर जाते हैं या पकने से पहले सूखने लगते हैं.

इस की रोकथाम के लिए बीमार फलों को खत्म कर दें और फूल बनते समय कार्बोरिल या फास्फामिडार दवा का छिड़काव करें. विकसित या बड़े फलों को पन्नी या कपड़े की थैली से ढकने से कीटों से बचाया जा सकता है.

छाल खाने वाला कीट: यह कीट पेड़ की छाल में छेद कर अंदर टहनियों में घुस जाता है और टहनी में सुरंग बना लेता है, जिस से पेड़ कमजोर हो जाता है और उस पर फल नहीं लगते. इस की रोकथाम के लिए सूखी व छेद वाली टहनियों को काट कर जला दें और किसी कारगर कीटनाशी दवा का इस्तेमाल करें.

फल धब्बा रोग : इस रोग में फलों पर हरेपीले धब्बे पैदा हो जाते हैं, जो अंदर टिश्यू तक पहुंच कर फल को खराब करते हैं. इस की रोकथाम के लिए डायथेन या कैप्टान दवा का छिड़काव 15-20 दिन के अंदर करना चाहिए.

फल सड़न: यह अंबे बहार पर फूल आने के समय की बीमारी है. बरसात के मौसम में ज्यादा नमी होने पर फल व कलियों पर काले धब्बे बन जाते हैं और धीरेधीरे फल सड़ने लगते हैं. इस की रोकथाम के लिए बीमार टहनियों व फलों को काट कर जला दें.

जिनेब दवा की 2 ग्राम मात्रा प्रति लिटर पानी के हिसाब से 15 दिन के अंतर पर छिड़कें या बावस्टीन आधा फीसदी का छिड़काव फल की बढ़वार शुरू होने से पकने तक 15 दिन के अंतर पर छिड़कें.

अनार की कुछ बढि़या किस्में

Anarगणेश : इस किस्म के फल बड़े, गूदा गुलाबी रसदार मीठा और खाने में जायकेदार होता है. बीज छोटे व मुलायम होते हैं. इस किस्म की खेती महाराष्ट्र में की जाती है.

मृदुला : अनार की यह एक संकर किस्म है, जो महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, महाराष्ट्र द्वारा तैयार की गई है. इस के बीज मुलायम व मीठे होते हैं. फल का रंग गहरा लाल व साइज बड़ा होता है.

ज्योति : इस किस्म में खूबसूरत पीलापन लिए लाल रंग का छिलका, मध्यम आकार, गूदा लाल व बीज मुलायम होता है.

रूबी: यह भी अनार की एक संकर किस्म है, जो बैंगलुरू में तैयार की गई है. यह प्रोसैसिंग के लिए अच्छी मानी गई है. इस के बीज मुलायम, मिठास वाले और टेनिन की कम मात्रा होती है.

ढोलका : यह किस्म अहमदाबाद के आसपास के इलाकों में ज्यादा उगाई जाती है. इस के फल बड़े, छिलके का रंग कुछ हरापन लिए हुए भूरा होता है. गूदा रसदार, मीठा, खटास कम वाला गुलाबीभूरा होता है. बीज छोटे और खाने में मुलायम होते हैं.

मस्कट लाल : यह किस्म कारोबारी तौर पर अहमदनगर, कोल्हार इलाके में उगाई जाती है. इस के फल बड़े, बीज मुलायम और रस लाल व हलका गुलाबी मीठा होता है.

कंधारी : इस किस्म का अनार बड़ा, छिलका लाल, बीज सख्त गुलाबी और रस खटास लिए होता है. महाराष्ट्र व गुजरात इलाके के लिए यह अच्छी किस्म है, जो अफगानिस्तान से लाई गई है.

जी-137 : यह गणेश किस्म के क्लोन द्वारा तैयार की गई है, जो कई मामलों में बेहतर है. इस में रस की मात्रा 86.6 फीसदी तक पाई जाती है.

बेदाना : यह राजस्थान की सूखी आबोहवा के लिए अच्छी किस्म है. फल मध्यम, बीज नरम, मीठा रस व छिलका सख्त होता है.

जालौर बेदाना : यह मुलायम बीजों वाली किस्म सूखे इलाकों के लिए अच्छी है. इस का छिलका लाल से गहरा लाल होता है. फल गोल, रस मीठा लाल होता है. इस से 25 किलोग्राम फल प्रति पेड़ मिलता है.

अलांदी वेदकी : फल का साइज मीडियम, छिलका गुलाबी पीला होता है. बीज सख्त व रस मीठा लाल या गहरा गुलाबी खटास लिए होता है. यह किस्म पूना के आसपास उगाई जाती है.

स्पेनिश रूबी : फल छोटे से मध्यम आकार के, छिलका पतला, गूदा लाल रंग का, मीठा व जायकेदार होता है. बीज का आकार छोटा व खाने में मुलायम होता है.

पेपर शैल : इस के फल मध्यम आकार के, छिलका मोटा, गूदा रसदार मीठा, खुशबूदार व रंग गुलाबी होता है. बीज मध्यम से बड़े साइज के और खाने में मुलायम होते हैं.

अनार: मैदानी इलाकों में भी लें अच्छी पैदावार

भारत में अनार का कुल रकबा 2018-19 में 2,46,000 हेक्टेयर है और उत्पादन 28,65,000 मीट्रिक टन है, वहीं अगर एक हेक्टेयर की बात करें तो अनार का कुल उत्पादन तकरीबन 11.69 टन प्रति हेक्टेयर है. अनार गरम और गरम व ठंडी जलवायु वाले देशों का काफी लोकप्रिय फल है.

भारत में इस की खेती खासतौर से महाराष्ट्र में की जाती है. राजस्थान, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, गुजरात में छोटे लैवल पर इस के बगीचे देखे जा सकते हैं. इस का रस जायकेदार और औषधीय गुणों की वजह से फायदेमंद होता है.

अनार की खेती के लिए कम लागत, लगातार उच्च तापमान, लंबी भंडारण अवधि जैसी खूबियों के चलते इस का क्षेत्रफल लगातार बढ़ रहा है.

आबोहवा : यह हलकी सूखी जलवायु में बढि़या तरह से उगाया जा सकता है. फलों के बढ़ने व पकने के समय गरम और शुष्क जलवायु की जरूरत होती है. लंबे समय तक ज्यादा तापमान बने रहने से फलों में मिठास बढ़ती है, वहीं नम जलवायु रहने से फलों की क्वालिटी पर बुरा असर होता है.

जमीन  : अनार अनेक तरह की मिट्टी में उगाया जा सकता है, पर बढि़या जल निकास के इंतजाम वाली रेतीली दोमट मिट्टी सब से बढि़या होती है. फलों की गुणवत्ता व रंग भारी

मिट्टी के मुकाबले हलकी मिट्टियों में अच्छा होता है. अनार के लिए मिट्टी लवणीयता 9.00 ईसी प्रति मिलीलिटर और क्षारीयता 6.78 ईएसपी तक सहन कर सकता है.

खास प्रजाति

भारतीय प्रजाति : अर्कता, भगवा, ढोकला, जी 137, गणेश, जलोर सीडलैस, ज्योति, कंधारी, मृदुला, फूले फगवा, रूबी के 1 वगैरह.

प्रजाति इगजोटिक : अगेती वंडरफुल, ग्रांड वंडरफुल वगैरह.

खास किस्म और खूबियां 

गणेश : इस किस्म के फल मध्यम आकार के, बीज मुलायम और गुलाबी रंग के होते हैं. यह महाराष्ट्र की खास किस्म है.

ज्योति : फल मध्यम से बड़े आकार के, चिकनी सतह व पीलापन लिए हुए लाल रंग के होते हैं. एरिल गुलाबी रंग के बीज काफी मुलायम, बहुत मीठे होते हैं. प्रति पौधा 8-10 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

मृदुला : फल मध्यम आकार के, चिकनी सतह वाले लाल रंग के होते हैं. एरिल गहरे लाल रंग का बीज मुलायम, रसदार और मीठे होते हैं. प्रति पौधा 8-10 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

भगवा : इस किस्म के फल बड़े आकार के भगवा रंग के, चिकने चमकदार होते हैं. एरिल मनमोहक लाल रंग की और बीज मुलायम होते हैं. बढि़या देखरेख करने पर प्रति पौधा 30-38 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

अर्कता : यह एक अधिक उपज देने वाली किस्म है. फल बड़े आकार के, मीठे और मुलायम बीजों वाले होते हैं. एरिल लाल रंग की व छिलका मनमोहक लाल रंग का होता है. बढि़या देखरेख करने पर प्रति पौधा 25-30 किलोग्राम उपज ली जा सकती है.

प्रवर्धन

कलम द्वारा : एक साल पुरानी शाखाओं से 20-30 सैंटीमीटर लंबी कलमें काट कर पौधशाला में लगा दी जाती हैं और इंडोल ब्यूटारिक अम्ल (आईबीए) 3,000 पीपीएम से कलमों को उपचारित करने से जड़ें जल्दी व ज्यादा तादाद में निकलती हैं.

गूटी द्वारा : अनार का व्यावसायिक प्रवर्धन गूटी द्वारा किया जाता है. इस विधि में जुलाईअगस्त माह में एक साल पुरानी पैंसिल समान मोटाई वाली स्वस्थ पकी 45-60 सैंटीमीटर लंबाई की शाखाओं को छांटें.

छांटी गई शाखाओं से कलिका के नीचे 3 सैंटीमीटर चौड़ी गोलाई में छाल पूरी तरह से निकाल दें. छाल निकाली गई शाखा के ऊपरी भाग में आईबीए 10,000 पीपीएम का लेप लगा कर नमी वाला स्फेगनम मास चारों ओर लगा कर पौलीथिन की शीट से ढक कर सुतली से बांध दें. जब पौलीथिन से जड़ें दिखाई देने लगें, उस समय शाखा को स्केटियर काट कर क्यारी या गमलों में लगा दें.

पौध की रोपाई : आमतौर पर पौध रोपण की आपसी दूरी मिट्टी की क्वालिटी व जलवायु पर निर्भर करती है. आमतौर पर 4-5 मीटर की दूरी पर अनार को रोप दिया जाता है.

सघन रोपण विधि में 5×2 मीटर (1,000 पौधे प्रति हेक्टेयर), 5×3 मीटर (666 पौधे प्रति हेक्टेयर) 4.5×3 (740 पौधे प्रति हेक्टेयर) की आपसी दूरी पर रोपण किया जा सकता है.

पौध रोपने के तकरीबन एक महीने पहले 60×60×60 सैंटीमीटर (लंबाई × चौड़ाई × गहराई) आकार के गड्ढे खोद कर 15 दिनों के लिए खुला छोड़ दें. इस के बाद गड्ढे की ऊपरी मिट्टी में 20 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद, 1 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 50 ग्राम क्लोरोपाइरीफास चूर्ण मिट्टी में मिला कर गड्ढों को सतह से 15 सैंटीमीटर की ऊंचाई तक भर दें.

खाद व उर्वरक : पौधों की उम्र के मुताबिक कार्बनिक खाद व नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का इस्तेमाल करें. नाइट्रोजन व पोटाशयुक्त उर्वरकों को 3 हिस्सों में बांट कर पहली खुराक सिंचाई के समय बहार प्रबंधन के बाद और दूसरी खुराक 3-4 हफ्ते बाद दें, फास्फोरस की पूरी खाद को पहली सिंचाई के समय दें. जिंक, आयरन, मैगनीज और बोरोन की 25 ग्राम की मात्रा प्रति पौधे डालें.

जब पौधों पर फूल आना शुरू हो जाएं, तो उस में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश 12:61:00 को 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से एक दिन के फासले पर एक महीने तक दें.

जब पौधों में फल लगने शुरू हो जाएं तो नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश 19:19:19 को ड्रिप की मदद से 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से एक दिन के अंतराल पर एक महीने तक दें.

जब पौधों पर पूरी तरह से फल आ जाएं तो नाइट्रोजन और फास्फोरस 00:52:34 या मोनोपोटैशियम फास्फेट 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा को एक दिन के अंतराल पर एक महीने तक दें.

फल की तुड़ाई के एक महीने पहले कैल्शियम नाइट्रेट की 12.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा को ड्रिप की सहायता से 15 दिनों पर 2 बार दें.

ऐसे करें सिंचाई 

अनार के पौधे सूखा सह लेते हैं, पर अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई का खास फायदा है. मृग बहार की फसल लेने के लिए सिंचाई मई माह के मध्य से शुरू कर के मानसून आने तक नियमित रूप से करनी चाहिए.

बारिश आने के बाद फलों के अच्छे विकास के लिए लगातार सिंचाई 10-12 दिन के फासले पर करनी चाहिए. ड्रिप सिंचाई अनार के लिए उपयोगी साबित हुई है. इस में 43 फीसदी पानी की बचत और 30-35 फीसदी उपज में इजाफा हुआ है.

संधाई व काटछांट : अनार की 2 तरह से संधाई की जा सकती है. एक, तना विधि द्वारा. इस विधि में एक तने को छोड़ कर बाकी सभी बाहरी टहनियों को काट दिया जाता है. दूसरी, बहु तना विधि द्वारा. इस विधि में 3 से 4 तने छूटे हों, बाकी टहनियों को काट दिया जाता है.

इस तरह साधे हुए तने में रोशनी बढि़या मिलती है. रोगग्रस्त हिस्से के 2 इंच नीचे तक छंटाई करें और तनों पर बने सभी कैंकर को गहराई से छील कर निकाल देना चाहिए. छंटाई के बाद 10 फीसदी बोर्डो पेस्ट को कटे हुए हिस्से पर लगाएं. बारिश के समय में छंटाई के बाद तेल वाला कौपर औक्सीक्लोराइड और 1 लिटर अलसी का तेल का इस्तेमाल करें.

बहार नियंत्रण : अनार में साल में 3 बार जूनजुलाई (मृग बहार), सितंबरअक्तूबर (हस्त बहार) व जनवरीफरवरी (अंबे बहार) में फूल आते हैं. व्यावसायिक तौर पर केवल एक बार ही फसल ली जाती है और इस का निर्धारण पानी की मौजूदगी व बाजार की मांग के मुताबिक किया जाता है.

जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा नहीं होती है, वहां मृग बहार से फल लिए जाते हैं. जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा है, वहां अंबे बहार से फल लिए जाते हैं. बहार नियंत्रण के लिए जिस बहार से फल लेने हों, उस के फूल आने से 2 माह पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए. रासायनिक बहार नियमन के लिए इथ्रेल की उच्च सांध्रता (1 से 2 मिलीलिटर प्रति लिटर) का इस्तेमाल किया जाता है.

तुड़ाई : अनार बेमौसम वाला फल है. जब फल पूरी तरह से पक जाएं, तभी पौधों से तोड़ना चाहिए. पौधों में फल सेट होने के बाद 120-130 दिन बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं. पके फल पीलापन लिए लाल हो जाते हैं.

उपज : पौध रोपण के 2-3 साल बाद फलना शुरू कर देते हैं, लेकिन व्यावसायिक रूप से उत्पादन रोपण के तकरीबन 4-5 साल बाद ही लेना चाहिए. अच्छी तरह से विकसित पौधा 60-80 फल हर साल 25-30 साल तक देता है.

अनार की खेती : कीटरोगों से बचाव व प्रबंधन

अनार की खेती से अच्छी पैदावार लेने के लिए उन्नत किस्मों को इस्तेमाल करने के साथसाथ अनार के बागों को कीट व बीमारी से बचाना भी जरूरी है. अनार में कीट बीमारी लगने पर फल का विकास रुक जाता है. जिस से फल का बाजार भाव भी ठीक नहीं मिलता. इसलिए समय रहते अनार के बागों में कीट बीमारी न पनपने दें, समय रहते उन का निदान करें.

कीट से नुकसान

अनार की तितली या फल छेदक: यह अनार का एक प्रमुख कीट है, जो अनार के विकासशील फलों में छेद कर देता है और अंदर से खाता रहता है. इस वजह से फल फफूंद और जीवाणु संक्रमण के प्रति अतिसंवेदनशील हो जाते हैं.

नियंत्रण : शुरुआती अवस्था में फलों को पौलीथिन बैग से बैगिंग कर के या ढक कर नियंत्रित किया जा सकता है. फास्फोमिडान का 0.03 फीसदी या सेविन का 4 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव कर के भी इस कीट से छुटकारा पाया जा सकता है.

छाल भक्षक : यह कीट रात को तने की छाल खाता है. कीट द्वारा बनाए गए छेद इस के मलमूत्र से भरते जाते हैं, जिस के कारण इस के लक्षणों को भी पहचान पाना बहुत मुश्किल होता है. यह कीट मुख्य तने पर छेद बनाता है और तने के अंदर सुरंगों का एक जाल बना लेता है, जिस के कारण पौधे की शाखाएं तेज हवा चलने पर टूट जाती हैं.

नियंत्रण : इस कीट के प्रभावी नियंत्रण के लिए कीट द्वारा बनाए गए छेदों को डीजल या केरोसिन में रूई भिगो कर बंद कर देते हैं. कीट द्वारा बनाए हुए छेदों में केरोसिन का तेल भर देते हैं. आजकल किसानों द्वारा फलों की बैगिंग की जाती है, जो फलों की गुणवत्ता में सुधार करती है.

रोग

जीवाणु पत्ती धब्बा रोग या औयली धब्बा रोग : यह रोग जेंथोमोनास औक्सोनोपोडिस पीवी पुनिका नामक रोगकारक के द्वारा फैलता है. इस रोग की सब से अधिक समस्या बारिश के मौसम में आती है. इस रोग में पादप के तने, पत्तियां व फलों पर छोटे गहरे भूरे रंग के पानी से लथपथ धब्बे बनते हैं. जब संक्रमण अधिक हो जाता है, तो फल फटने लग जाते हैं.

नियंत्रण : इस के प्रभावी नियंत्रण के लिए स्ट्रेप्टोमाइसीन 0.5 ग्राम प्रति लिटर और कौपर औक्सीक्लोराइड 2.0 ग्राम प्रति लिटर के हिसाब से मिश्रण कर के छिड़काव करें.

फल फटना या फल फूटना : यह अनार में एक गंभीर दैहिक विकार है, जो आमतौर पर अनियमित सिंचाई, बोरोन की कमी और दिन या रात के तापमान में अचानक उतारचढ़ाव के कारण होता है. इस विकार में फल फट जाते हैं, जिस के कारण फलों का बाजार मूल्य कम हो जाता है. इस का सीधा नुकसान उत्पादक को होता है.

नियंत्रण : इस के नियंत्रण के लिए बोरोन का 0.1 फीसदी की दर से और जीए3 का 250 पीपीएम की दर से पर्णीय छिड़काव करें. इस के अलावा मिट्टी में सही नमी बनाए रखें. प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें.

सनबर्न : यदि फलों की उचित अवस्था में तुड़ाई नहीं की जाए, तो यह विकार भी एक समस्या के तौर पर उभरता है. इस विकार में फलों की ऊपरी सतह पर काले रंग का गोल स्थान दिखाई देता है. यह फलों की सुंदरता व गुणवत्ता दोनों में कमी करता है, जिस के कारण फलों का बाजार मूल्य कम हो जाता हैं.

नियंत्रण : फलों की बैगिंग करें.

फलों की तुड़ाई

अनार के फलों की तुड़ाई फूल आने से ले कर फल के पकने तक 150 से 180 दिनों के बाद शुरू होती है. लेकिन यह जीनोटाइप, जलवायु हालात और उगाने के क्षेत्र पर निर्भर करता है. फलों की तुड़ाई इष्टतम परिपक्व अवस्था पर करनी चाहिए, क्योंकि जल्दी तुड़ाई करने से फल अधपके और अनुचित पकने लगते हैं, जबकि देरी से तुड़ाई करने पर विकारों का प्रकोप अधिक होने लगता है. इस प्रकार से अनार एक नौनक्लाईमैट्रिक फल (ऐसे फल, जिन्हें तोड़ कर नहीं पकाया जा सकता) है. लिहाजा, फलों को पकने के बाद एक उचित अवस्था में तोड़ना चाहिए.

फलों के पकने और तुड़ाई का आकलन करने के लिए अनेक प्रकार के संकेतों का उपयोग किया जाता है, जैसे गहरा गुलाबी रंग फल की सतह पर विकसित होना. गहरे गुलाबी रंग का निशान ज्यादातर उपभोक्ताओं द्वारा पसंद किया जाता है. अनार के फलों के तल में स्थित कैलिक्स का अंदर की तरफ मुड़ जाना. एरिल का गहरे लाल या गुलाबी रंग में बदलना.

इन निशानों के अलावा फल ज्यादा नहीं पकने चाहिए. फलों की तुड़ाई स्केटर्स या क्लिपर की मदद से करनी चाहिए, क्योंकि फलों को मरोड़ कर खींचने से नुकसान हो जाता है.

उपज

एक स्वस्थ अनार का पेड़ पहले साल में 12 से 15 किलोग्राम प्रति पौधा उपज दे सकता है. दूसरे साल से प्रति पौधे से उपज तकरीबन 15 से 20 किलोग्राम हासिल होती है.

तुड़ाई के बाद प्रबंधन

सफाई और धुलाई : इस विधि में कटाई के बाद फलों को छांट लिया जाता है और रोगग्रस्त और फटे हुए फलों को हटा दिया जाता है. शेष बचे हुए स्वस्थ फलों को आगे के उपचार के लिए चुन लिया जाता है.

छंटाई के बाद फलों को सोडियम हाइपोक्लोराइट के 100 पीपीएम पानी के घोल से धोना चाहिए. यह उपचार माइक्रोबियल संदूषण को कम करने और लंबे शैल्फ जीवन को बनाए रखने में मदद करता है.

पूर्व ठंडा : यह फलों के भंडारण से पहले एक आवश्यक आपरेशन है, इसलिए यह फलों से प्रक्षेत्र ऊष्मा व महत्त्वपूर्ण गरमी को हटाने में मदद करता है, जिस के चलते फलों की शेल्फलाइफ में वृद्धि होती है.

अनार के फलों के लिए मजबूत हवा शीतलन प्रणाली को पूर्व शीतलन के लिए उपयोग किया जाता है, इसलिए इसे 90 फीसदी सापेक्ष आर्द्रता के साथ 5 डिगरी सैल्सियस तापमान के आसपास बनाए रखा जाना चाहिए.

फलों की ग्रेडिंग : फलों को उन के वजन, आकार और रंग के आधार पर बांटा जाता है. विभिन्न ग्रेड फल सुपर, किंग, क्वीन और प्रिंस आकार में बांटें जाते हैं. इस के अलावा अनार को और भी 2 ग्रेडों में बांटा जाता है- 12ए और 12बी. 12ए ग्रेड के फल आमतौर पर दक्षिणी और उत्तरी क्षेत्र में पसंद किए जाते हैं.

ग्रेडेड फल उपभोक्ताओं को आकर्षित करते हैं, जो घरेलू बाजार के साथसाथ अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अधिक कीमत पाने में मददगार साबित होते हैं.

अनार के फल आमतौर पर उन के आकार और वजन के अनुसार बांट दिए जाते हैं. हालांकि, ग्रेडिंग मानक देश दर देश भिन्न होते हैं. निर्यात के उद्देश्य के लिए राष्ट्रीय बागबानी बोर्ड के अनुसार ग्रेड विनिर्देश निम्नानुसार हैं :

Anarअनार की पैकेजिंग : अनार के फल घरेलू और स्थानीय बाजारों के लिए लकड़ी के या प्लास्टिक के बक्से में पैक किए जाते हैं. अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए मुख्य रूप से नालीदार फाइबरबोर्ड बक्से का उपयोग किया जाता है और बक्से की क्षमता 4 किलोग्राम या 5 किलोग्राम होनी चाहिए. एगमार्क के विनिर्देशों के अनुसार 4 किलोग्राम क्षमता वाले बक्से का आयाम 375×275×100 मिलीमीटर 3 है और 5 किलोग्राम के लिए बक्से 480×300×100 मिलीमीटर 3 है.

भंडारण : अनार की शैल्फलाइफ के लिए तापमान सब से महत्त्वपूर्ण कारक है, क्योंकि अनार जल्दी खराब होने लग जाते हैं, इसलिए दीर्घकालिक भंडारण के लिए एक इष्टतम तापमान की आवश्यकता होती है.

बहुत कम तापमान फलों में ठंड लगने की चोट को प्रेरित कर सकता है, इसलिए ताजा अनार के फल को भंडारण के लिए एक आदर्श तापमान 5 डिगरी से 6 डिगरी सैल्सियस और 90 से 95 फीसदी सापेक्ष आर्द्रता में भंडारित किया जाता है. इस तापमान पर अनार के फल 3 महीने तक रखे जा सकते हैं.

विपणन

घरेलू बाजारों में अनार के फल 60 से 80 रुपए प्रति किलोग्राम फलों की थोक दर पर बिक्री कर सकते हैं, जबकि दूर के बाजार में इस की कीमत 90 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम तक होती है.

अनार की उन्नत उत्पादन तकनीक और किस्में

भारत में प्रमुख अनार उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और राजस्थान हैं. राजस्थान में अनार को जोधपुर, बाड़मेर बीकानेर, चुरू और झुंझुनूं में व्यावसायिक स्तर पर उगाया जाता है. अनार का इस्तेमाल सिरप, स्क्वैश, जैली, रस केंद्रित कार्बोनेटेड कोल्ड ड्रिंक्स, अनारदाना की गोलियां, अम्ल आदि जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों के तैयार के लिए भी किया जाता है.

जलवायु

अनार फल की सफलतापूर्वक खेती के लिए शुष्क और अर्धशुष्क मौसम जरूरी होता है. ऐसे क्षेत्र, जहां ठंडी सर्दियां और उच्च शुष्क गरमी होती है, उन क्षेत्रों में गुणवत्तायुक्त अनार के फलों का उत्पादन होता है.

अनार का पौधा कुछ हद तक ठंड को सहन कर सकता है. इसे सूखासहिष्णु फल भी माना जा सकता है, क्योंकि एक निश्चित सीमा तक सूखा और क्षारीयता व लवणता को सहन कर सकता है, परंतु यह पाले के प्रति संवेदनशील होता है.

इस के फलों के विकास के लिए अधिकतम तापमान 35-38 डिगरी सैल्सियस जरूरी होता है. इस के फल के विकास व परिपक्वता के दौरान गरम व शुष्क जलवायुवीय दशाएं जरूरी होती हैं.

मिट्टी

जल निकास वाली गहरी, भारी दोमट भूमि इस की खेती के लिए उपयुक्त रहती है. मिट्टी की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इसे कम उपजाऊ मिट्टी से ले कर उच्च उपजाऊ मिट्टी तक विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है. हालांकि, गहरी दोमट मिट्टी में यह बहुत अच्छी उपज देता है. यह कुछ हद तक मिट्टी में लवणता और क्षारीयता को सहन कर सकता है.

अनार की खेती के लिए मृदा का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच उपयुक्त रहता है. अनार के पौधे 6.0 डेसी साइमंस प्रति मीटर तक की लवणता और 6.78 फीसदी विनिमयशील सोडियम को सहन कर सकते हैं.

प्रवर्धन विधि

अनार के पौधे को व्यावसायिक रूप से कलम, गूटी और टिश्यू कल्चर के माध्यम से प्रसारित किया जा सकता है.

कलम विधि

यह आसान तरीका है, लेकिन इस की सफलता दर कम है, इसलिए यह विधि किसानों के बीच लोकप्रिय नहीं है. कटिंग या कलम के लिए 9 से 12 इंच (25 से 30 सैंटीमीटर) लंबी एक साल पुरानी शाखा, जिस में 4-5 कलियां हों, का चयन कर लें. कलम लगाने के लिए सब से उपयुक्त समय फरवरी माह होता है.

गूटी या एयर लेयरिंग विधि

एयर लेयरिंग विधि में बेहतर रूटिंग के लिए 2 से 3 साल पुराने स्वस्थ पौधों का चयन करें. इस के बाद पैंसिल आकार की शाखा का चुनाव करें. इस के बाद चुनी गई शाखा में से 2.5-3.0 सैंटीमीटर छाल को उतार लें. इस के बाद जड़ फुटान हार्मोन से 1.5-2.5 ग्राम की दर से उपचारित कर के नम मास घास या फिर कोकोपिट से छिली हुई शाखा को लपेट दें. इस के बाद 300 गेज की पौलीथिन शीट से घास या फिर कोकोपिट से लपेट दें.

पौलीथिन सीट पारदर्शी होनी चाहिए, इस का फायदा यह है कि जड़ें आसानी से दिख जाती हैं. एयर लेयर या गूटी बांधने के बाद आईबीए और सेराडैक्स बी (1,500 से 2,500 पीपीएम) से उपचार करें. इस प्रकार अच्छी रूटिंग 25-30 दिन में पूरी हो जाती है. एकल पौधे से लगभग 150 से 200 गूटी पौधे हासिल किए जा सकते हैं. बारिश का मौसम गूटी के लिए सब से सही है. जड़ों के लिए लगभग 30 दिन का समय लगता है.

45 दिनों के बाद गूटी किए गए पौधों को मातृ पौधे से अलग कर देना चाहिए. जब गूटी किए गए भाग की जड़ें भूरे रंग की होने लग जाएं, तब गूटी किए भाग से तुरंत नीचे के भाग से कट लगा कर मातृ पौधे से अलग कर लेना चाहिए. इस के बाद इन्हें पौलीबैग में उगाया जाता है और शैड नैट या ग्रीनहाउस के तहत 90 दिनों तक सख्त करने के लिए रख दिया जाता है.

Anarउन्नत किस्में

नरम बीज वाली किस्में : गणेश, जालौर सीडलेस, मृदुला, जोधपुर रैड, जी-137 के साथसाथ वर्तमान में गहरे लाल बीजावरण वाली भागवा (सिंदूरी) किस्म पूरे भारत में उगाई जा रही हैं. गणेश किस्म के फल गुलाबी पीले रंग से लालपीले रंग के होते हैं. इस किस्म में नरम बीज होते हैं.

एनआरसी हाईब्रिड-6 और एनआरसी हाईब्रिड-14 दोनों ही अनार की किस्में वर्तमान में प्रचलित किस्म भागवा से उपज व गुणवत्ता में बेहतरीन हैं.

एनआरसी हाईब्रिड-6 : इस किस्म में फल के छिलके और एरिल का रंग लाल, नरम बीज, फल का स्वाद मीठा, न्यूनतम अम्लता (0.44 फीसदी) और अधिक उपज 22.52 किलोग्राम प्रति पौधा व प्रति हेक्टेयर उपज 15.18 टन तक होती है.

एनआरसी हाईब्रिड-14 : इस किस्म में फल के छिलके का रंग गुलाबी व एरिल का रंग लाल, नरम बीज, फल का स्वाद मीठा, न्यूनतम अम्लता (0.45 फीसदी) और अधिक उपज 22.62 किलोग्राम प्रति पौधा व प्रति हेक्टेयर उपज 16.76 टन तक होती है.

भागवा : अनार की भागवा किस्म उपज में बाकी अन्य किस्मों से उत्तम है. यह किस्म 180-190 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस के फल आकार में बड़े, स्वाद में मीठे, बोल्ड, आकर्षक, चमकदार और केसरिया रंग के उच्च गुणवत्ता वाले होते हैं. फल के एरिल का रंग गहरा लाल और बोल्ड आर्टिल वाले आकर्षक बीज होते हैं, जो टेबल और प्रोसैसिंग दोनों उद्देश्यों के लिए उपयुक्त होते हैं.

यह किस्म दूर के बाजारों के लिए भी सही है. यह किस्म अनार की अन्य किस्मों की तुलना में फलों के धब्बों और थ्रिप्स के प्रति कम संवेदनशील पाई गई. इन सभी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए, महाराष्ट्र के क्षेत्रों में बढ़ते अनार में इस की खेती के लिए ‘भागवा’ किस्म की सिफारिश की जाती है.

अन्य किस्में : रूबी, फुले अरकता, बेदाना, मस्कट, ज्योति, दारू, वंडर और जोधपुर लोकल. यह कुछ महत्त्वपूर्ण किस्में हैं, जिन को व्यावसायिक स्तर पर रोपण सामग्री के रूप में काम में लिया जाता है.

गड्ढे की तैयारी व रोपण

90 दिन पुराने अनार के पौधे मुख्य खेत में रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं. पौधों को लगाने के लिए गड्ढे का उपयुक्त आकार 60 सैंटीमीटर लंबा, 60 सैंटीमीटर चौड़ा, 60 सैंटीमीटर गहरा रखा जाता है.

अनार को लगाने के लिए सब से अधिक वर्गाकार विधि काम में ली जाती है. आमतौर पर रोपण दूरी मिट्टी के प्रकार और जलवायु के आधार पर निश्चित की जाती है.

किसानों द्वारा सब से ज्यादा काम में ली जाने वाली सब से आदर्श रोपण दूरी पौधों के बीच 10 से 12 फुट (3.0 से 4.0 मीटर) और पंक्तियों के बीच 13-15 फुट (4.0 से 5.0 मीटर) है. गड्ढों की खुदाई के बाद इन्हें 10-15 दिन तक धूप में खुला छोड़ दिया जाता है, ताकि गड्ढों में हानिकारक कीडे़मकोडे़ व कवक आदि मर जाएं.

मानसून के दौरान गड्ढों को गोबर की खाद या कंपोस्ट या वर्मी कंपोस्ट (10 किलोग्राम), सिंगल सुपर फास्फेट (500 ग्राम), नीम की खली (1 किलोग्राम) और क्विनालफास 50-100 ग्राम से भर दिया जाता है.

अनार रोपण के लिए इष्टतम समय बारिश का मौसम (जुलाईअगस्त माह) होता है. इस समय पौधों की इष्टतम वृद्धि के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी उपलब्ध होती है.

यद्यपि, अनार को कम उपजाऊ मिट्टी में भी उगाया जा सकता है, परंतु अच्छे उत्पादन व गुणवत्ता वाले फलों के लिए कार्बनिक और रासायनिक खाद का प्रयोग किया जाता है.

अंतरासस्यन : अनार का बगीचा लगाने के बाद 1 से 2 साल अफलन अवस्था में रहता है, इसलिए किसान को इस अवधि के दौरान कोई भी अतिरिक्त आय प्राप्त नहीं होती है. इस फसल प्रणाली में कम या धीरे उगने वाली सब्जियों, दालों या हरी खाद वाली फसलों को इंटरक्रौप के रूप में लेना फायदेमंद रहता है.

शुष्क क्षेत्रों में, बारिश के मौसम में ही अंतरफसल संभव है, जबकि सिंचित क्षेत्रों में सर्दियों की सब्जियां भी अंतरासस्यन के रूप में ली जा सकती हैं. इस प्रकार किसान अंतरासस्यन को अपना कर बगीचे की अफलन अवस्था पर अतिरिक्त आय कमा सकते हैं.

खाद व उर्वरक

खाद व उर्वरक की संस्तुत खुराक के तौर पर 600-700 ग्राम नाइट्रोजन, 200-250 ग्राम फास्फोरस और 200-250 ग्राम पोटाश प्रति पौधे के हिसाब से प्रत्येक वर्ष देनी चाहिए. इस के पश्चात खाद की मात्रा को तालिका के अनुसार दें और 5 वर्ष के बाद खाद की मात्रा को स्थिर कर दें. (बाक्स देखें)

देशी खाद, सुपर फास्फेट व पोटाश की पूरी मात्रा व यूरिया की आधी मात्रा फूल आने के करीब 6 हफ्ते पहले दें. यूरिया की शेष मात्रा फल बनने पर दें. अंबे बहार के लिए उर्वरक दिसंबर माह में देना चाहिए और मृगबहार के फलों के लिए उर्वरक मई माह में देना चाहिए.

सिंचाई

अनार एक सूखा सहनशील फसल है, जो कुछ सीमा तक पानी की कमी में भी पनप सकती है. इस फसल में फल फटने की एक प्रमुख समस्या है, इसलिए इस से बचने के लिए नियमित सिंचाई आवश्यक होती है.

सर्दियों के दौरान 10-12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें, जबकि गरमियों के मौसम में 4-5 दिन के अंतराल में सिंचाई जरूर करें. सिंचाई के लिए ड्रिप पद्धति का प्रयोग करें. इस से 40 से 80 फीसदी तक पानी की बचत कर सकते हैं और पानी के साथ उर्वरक का भी प्रयोग कर सकते हैं, जिसे फर्टिगेशन के नाम से जाना जाता है. अगर पानी की सुविधा हो, तो अंबे बहार से उत्पादन लें, क्योंकि इस बहार के फल अधिक गुणवत्ता वाले होते हैं, वरना मृगबाहर से ही काम लें.

कटाई और छंटाई

यह वानस्पतिक वृद्धि को नियंत्रित करने व पौधे के आकार और ढांचे को बनाए रखने की एक आशाजनक तकनीक है. इस विधि का सब से मुख्य फायदा यह है कि सूर्य का प्रकाश पौधे के सभी भागों अथवा पौधे के केंद्र तक आसानी से पहुंचता है और खेती किसानी के काम जैसे पादप रसायनों का छिड़काव व फलों की तुड़ाई भी आसान हो जाती है.

अनार में संधाई ट्रेनिंग की मुख्य रूप से 2 विधियां काम में ली जाती हैं :

एकल तना विधि : इस विधि में अनार के पौधे से अन्य शूट यानी तना हटा कर केवल एक शूट रखा जाता है.

बहुतना विधि : इस विधि में पौधे के आधार में 3-4 शूट रख कर पौधे को झाड़ीनुमा आकार में बनाए रखा जाता है. यह विधि बहुत लोकप्रिय और किसानों द्वारा व्यावसायिक खेती के लिए अपनाई जाती है, क्योंकि इस में शूट भेदक के आक्रमण का असर कम होता है और बराबर उपज प्राप्त हो जाती है.