Jaggery Peda : गुड़ का स्वाद अलग अंदाज

Jaggery Peda : लजीज मिठाई खाने के शौकीन लोगों के लिए चीनी की मिठास किसी दुश्मन की तरह दिखती है. इस की वजह उन की डायबिटीज के प्रति बढ़ती चिंता होती है. ऐसे में मिठाई बनाने वालों ने चीनी को मिठाई से दूर करने के उपाय करने शुरू कर दिए हैं. उन की कोशिश यह रहती है कि वे ऐसी मिठाई तैयार करें, जिस में चीनी की मिठास न हो. इस के लिए वे नैचुरल मिठास बढ़ाने वाली चीजों का प्रयोग मिठाइयों में करने लगे हैं.

गुड़ पेड़ा (Jaggery Peda) एक ऐसी ही मिठाई है. इसे तैयार करने के लिए सब से पहले मैदे से तैयार होने वाले नमकपारे तैयार किए जाते हैं. इन को गुड़ में डाल कर पाग दिया जाता है. जब ये ठीक से आपस में मिल जाते हैं, तो इन को छोटेछोटे मनचाहे पीस के रूप में काट लिया जाता है.

नमकपारे या खुरमे राजस्थान में बहुत इस्तेमाल किए जाते हैं. खासकर मारवाड़ी लोग इन को खूब पसंद करते हैं. गुड़ के साथ मिला कर इन को नए अंदाज गुड़ पेड़ा के रूप में पेश किया गया है.

गुड़ पेड़ा (Jaggery Peda) तैयार करने वाले लखनऊ के हर्षल गुप्ता कहते हैं, ‘गुड़ पेड़ा सेहत के लिए अच्छा होता है. इस को लंबे समय तक रखा जा सकता है. इस को रखने के लिए किसी दूसरी तरह के साधन की जरूरत नहीं होती. इस को हवा से बचा कर रखना होता है. सीलने पर यह कुरकुरा नहीं रह पाता है.’

हर्षल गुप्ता देशी मिठाइयों को नए अंदाज में पेश करने की योजना पर काम कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘मिठाइयों के शौकीन केवल चीनी के डर से अपने शौक को पूरा करने से डरते हैं. ऐसे में हमारा यह प्रयास है कि हम हर मिठाई को नेचुरल स्वीट्स के साथ तैयार करें, जिस से डायबिटीज का खतरा कम हो जाए और लोगों को अपने वजन की चिंता में मिठाइयों से दूर न जाना पड़े. विदेशों में रहने वाले भारतीय ऐसी पुरानी मिठाइयों के नए अंदाज को खूब पसंद करते हैं.’

Jaggery Peda

कैसे तैयार करें गुड़ पेड़ा

गुड़ पेड़ा (Jaggery Peda) तैयार करने के लिए सब से पहले नमकपारे तैयार करने होंगे. नमकपारे तैयार करने के लिए 2 कप मैदा, चौथाई चम्मच नमक, 1 छोटा चम्मच अजवाइन, मोयन के लिए 4 बड़े चम्मच घी और नमकपारे तलने के लिए पर्याप्त घी की जरूरत होती है.

बनाने की विधि : सब से पहले एक बरतन में मैदा, घी, नमक और अजवाइन को डाल कर आपस में मिलाएं. इस को आटे की तरह गूंध लें और गीले कपड़े से ढक कर रख दें. कुछ समय बाद इस को 5 बराबर हिस्सों में बांट लें. इन की लोई बना कर 6-7 इंच व्यास वाली पूडि़यां बेलें. अब इन को चौकोर आकार में काटें और घी में फ्राई कर के अलग रख लें. इस तरह से नमकपारे तैयार हो जाते हैं.

तैयार नमकपारों के वजन का आधा गुड़ लें. इस को गरम करें और किसी बरतन में घी लगा कर उस में डाल दें. घी लगाने से गुड़ बरतन में चिपकेगा नहीं. अब इस में पहले से तैयार नमकपारे डाल दें. नमकपारे के ऊपर गुड़ की 2 बार मोटीमोटी परत चढ़ा दें.

जब तैयार सामग्री ठंडी हो जाए, तो चाकू की सहायता से चौकोर टुकड़ों में काट लें. तैयार गुड़ पेड़ों को ऐसी जगह रखें, जहां सीलन न पहुंच पाती हो. इन्हें लंबे समय तक रखा जा सकता है.

गुड़ पेड़ों (Jaggery Peda) का आकार सामान्य पेड़ों जैसा नहीं होता. इन का जायका भी अलग होता है. गुड़ और नमकपारे का मिलाजुला स्वाद अलग कुरकुरा मजा देता है. देशी घी से तैयार इस पेड़े की कीमत करीब 400 रुपए प्रति किलोग्राम होती है. गुड़ पेड़े को तैयार कर के नई मिठाई के रूप में बेचा जा सकता है.

Revdi : रेवड़ी स्वाद से बढ़ा कारोबार

Revdi : लखनऊ की गुलाब रेवड़ी (Revdi) दूरदूर तक मशहूर है और अब तो फेरी में बिकने वाली रेवड़ी बड़ीबड़ी मिठाई की दुकानों की शान बन गई है. जाड़ों के दिनों में यह बहुत बिकती है. गुड़, शक्कर व तिल से बनने वाली रेवड़ी सेहत के लिए बहुत अच्छी होती है.

तिल व गुड़ शरीर में जाड़ों में होने वाली तेल की कमी को भी पूरा करते हैं. इन से शरीर में जाड़े से बचाने वाली उर्जा बनती है. यही वजह है कि जाड़ों में गुड़ और तिल से तैयार होने वाली रेवड़ी (Revdi) सभी को पसंद आती है. पहले यह छोटे कारोबारियों के द्वारा बनाई और बेची जाती थी. अब समय बदला तो यही रेवड़ी पूरे विश्व के बाजार पर छा गई है. ज्यादा समय तक चलने वाली मिठाई होने के कारण लोग इस को खूब पंसद करते हैं.

रेवड़ी (Revdi) की अब आनलाइन शापिंग भी होने लगी है. विदेशों में रह रहे लोग इस को पंसद कर रहे हैं और देश में रहने वाले लोग अपने दोस्तों व रिश्तेदारों को उपहार में रेवड़ी देने लगे हैं. अपने देश की माटी की खुशबू लिए रेवड़ी सात समुद्र पार भी खूब पंसद की जा रही है.

यही वजह है कि अब यह रेवड़ी (Revdi) देश के हर बड़े शहर में मिलने लगी है. दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों से लगे छोटेछोटे शहरों में रेवड़ी और गजक बनाने का काम जोरशोर से अक्तूबर से मार्च महीने के बीच होने लगता है.

लखनऊ की गुलाब रेवड़ी

एक समय तक लखनऊ की गुलाब रेवड़ी पूरे देश में मशहूर थी. अब लखनऊ में रेवड़ी की तमाम तरह की किस्में बनने लगी हैं. ये सभी तिल, गुड़ और चीनी से बनती हैं. मधुरिमा स्वीट्स में अलगअलग तरह की रेवडि़यां बनती हैं, जो स्वाद, खुशबू और आकार में अलगअलग होती हैं.

अब रेवडि़यां कारपोरेट लुक वाली पैकिंग में आ गई हैं, जिन को देशविदेश में भेजा जा सकता है. इस के लिए पैकिंग से ले कर इन्हें बनाने के तौरतरीकों में बदलाव किया गया. बाजार और मांग के हिसाब से हुए ये बदलाव लोगों को इतने पंसद आए कि हर जगह रेवड़ी हाथोंहाथ बिकने लगी.

मधुरिमा स्वीट्स के मालिक मनीष गुप्ता कहते हैं कि रेवड़ी अब कारपोरेट स्वीट बन गई है. दीवाली, नए साल और होली के अवसर पर इस को उपहार में दिया जाने लगा है. अब इस की अच्छी क्वालिटी के साथ ही साथ अलगअलग तरह की रेवडि़यां बनाने का काम भी शुरू किया गया है.

रेवड़ी (Revdi) की सब से खास बात इस का कुरकुरापन होता है. इस को बनाए रखने के लिए अलग किस्म की पैकिंग की गई. लखनऊ के अलावा यह कारोबार उत्तर प्रदेश के मेरठ, हरियाणा के रोहतक और राजस्थान के जयपुर व अलवर जैसे शहरों में भी बड़े पैमाने पर होने लगा है. अपने खास स्वाद के कारण जयपुर और मेरठ की रेवडि़यां भी खूब पसंद की जा रही हैं.

रेवड़ी बनाएं घर में

रेवड़ी बनाने के लिए भी तिल, गुड़ व चीनी का इस्तेमाल किया जाता है.

चीनी और गुड़ की चाशनी को मिला कर खूंटी में गरमगरम लटका कर खींचा जाता है. जब इस में से सफेदसफेद तार निकलने लगे तो गरमगरम हालत में ही मनचाहे आकार में काट कर छोटीछोटी रेवडि़यां तैयार की जाती हैं. इन को मशीन से दबा कर ऊपर से तिल चिपका दिए जाते हैं. रेवड़ी बनाने में सब से अधिक सावधानी चाशनी को तैयार करने में बरतनी होती है. सभी काम गरमगरम हालत में करना पड़ता है. चाशनी के ठंडा पड़ते ही रेवड़ी नहीं बन पाती है.

पंजाबी चिक्की तिल, गुड़ और मूंगफली से भरपूर

चिक्की : जड़ों में खानपान के जरीए सर्दी के असर को दूर किया जा सकता है. गुड़ और मूंगफली का इस में सब से अहम रोल होता है. ये चीजें खाने से शरीर गरम रहता है. गुड़ और मूंगफली को मिला कर चिक्की तैयार की जाती है.  चिक्की पहले आम लोगों की मिठाई ही मानी जाती थी. अब यह बड़ी मिठाई की दुकानों पर भी मिलने लगी है.

स्वाद में लाजवाब चिक्की को गुड़, चीनी और मूंगफली मिला कर तैयार किया जाता है. अब इस के स्वाद को और बढ़ाने के लिए इस में तिल और गुलाब की सूखी पंखुडि़यों को भी मिलाया जाता है. इसे पंजाबी चिक्की के नाम से जानते हैं. जाड़ों में पंजाब का मशहूर त्योहार लोहड़ी आता है, इस में पंजाबी चिक्की का अलग महत्व होता है. कई जगहों पर इसे गुड़ की पट्टी भी कहते हैं.

लखनऊ में राधेलाल पंरपरा के कृष्ण कुमार गुप्ता कहते हैं, ‘पंजाबी चिक्की का स्वाद प्रचलित चिक्की से अलग होता है. इस में तिल और गुलाब की पंखुडि़यां डालने से स्वाद और अंदाज दोनों में अंतर आता है.’ बिजनेस वूमेन टीना नरूला कहती हैं, ‘पंजाबी चिक्की पूरी तरह से लोहड़ी को ध्यान में रख कर बनाई गई है.’

सर्दियों में जो लोग मेवे नहीं खा सकते, उन के लिए मूंगफली किसी मेवे से कम नहीं होती है. रात में खाने के बाद चिक्की का सेवन करने से शरीर गरम रहता है. इस से खाने को पचाने में भी मदद मिलती है. गुड़ में खास तरह का एक तत्त्व होता है, जो खाने को पचाने में मदद करता है. सही पाचन से शरीर में एंटी आक्सिडेंट्स बनते हैं. इस से शरीर में बने टाक्सिंस को बाहर निकलने में आसानी रहती है. इसे खाने से मिठाई के खाने जैसा नुकसान नहीं होता है. मूंगफली में प्रोटीन होता है, जो शरीर को मजबूत बनाने का काम करता है. शरीर में खून की कमी के शिकार लोगों के लिए चिक्की का सेवन करना लाभदायक होता है. इस में तिल मिले होने से शरीर को मजबूती मिलती है और गुलाब की पंखुडि़यों से इस में ताजगी आती है.

कैसे बनती है पंजाबी चिक्की

पंजाबी चिक्की बनाने के लिए अच्छे किस्म का गुड़ लेना चाहिए ़ चिक्की का रंग काला न हो कर पारदर्शी दिखे इस के लिए गुड़ की बराबर मात्रा में इस में चीनी मिलाई जाती है. अगर चिक्की के रंग को ज्यादा साफ दिखाना हो तो गुड़ में चीनी की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए. वैसे सब से अच्छी चिक्की वही मानी जाती है, जिस में गुड़ और चीनी की मात्रा बराबर होती है. गुड़ को पानी में डाल कर उबाला जाता है. इस दौरान गुड़ से कुछ झाग सा निकलता है, इस को छन्नी से छान कर बाहर कर दिया जाता है. इस के बाद इस में चीनी डाल दी जाती है. इस में से अगर कोई गंदगी निकले तो उसे भी छान का बाहर कर दिया जाता है.

2 तार की चाशनी बना लेनी चाहिए.  इस में जरूरत के हिसाब से मूंगफली और तिल के दाने साफ कर के और भून कर डाल देने चाहिए. आमतौर पर 1 किलोग्राम तैयार चाशनी में 500 ग्राम मूंगफली और 100 ग्राम तिल के दाने डाले जाते हैं. जिन लोगों को गुड़ कम खाना हो, वे 750 ग्राम तक मूंगफली के दाने डाल सकते हैं. इस तैयार सामाग्री को एक बड़ी, चौड़ी और साफसुथरी जगह पर फैला लिया जाता है. जब पूरी सामाग्री सेट हो जाती है, तो उसे कटर से इच्छानुसार टुकड़ों में काट लिया जाता है. चिक्की ज्यादातर छोटेछोटे टुकड़ों में काटी जाती है.  चिक्की को कुछ लोग प्लेट में सजा कर जमा देते हैं. जिस जगह पर यह सामग्री डाली जाती है, वहां पर पहले से चिकनाई लगा दी जाती है, जिस से ठंडी होने के बाद इस को निकालने में आसानी रहे.

रोजगार का साधन

गुड़पट्टी या चिक्की को बना कर बेचना एक अच्छा रोजगार होता है. मिठाई की दुकानों के साथ ही साथ सड़कों व मेलों में ठेला लगा कर इसे बेचा जाता है. गुड़पट्टी 140 रुपए से ले कर 600 रुपए प्रति किलोग्राम तक मिलती है. महंगी वाली गुड़पट्टी चिक्की कहलाती है, क्योंकि उसे तैयार करने मेें देशी घी का इस्तेमाल किया जाता है.

कारीगर रमाकांत कहते हैं, ‘चिक्की  बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री की क्वालिटी बहुत ही अच्छी होनी चाहिए. इसे बनाते समय साफसफाई का पूरा खयाल रखना चाहिए. इसे ऐसे रखना चाहिए, जिस से इस में हवा न लगे. हवा लगने से चिक्की कुरकुरी नहीं रहती और सील जाती है.’

Gujiya : केसरकाजू गुझिया स्वाद से भरपूर

Gujiya : घरेलू पकवान गुझिया का नाम लेते ही मैदे और मावा से तैयार गुझिया याद आ जाती है. होली के त्योहार पर यह पूरे देश में खाई और पसंद की जाती है. अब इस को चाशनी में डुबा कर खाने का रिवाज भी बढ़ता जा रहा है.  पूरे साल बिकने वाली गुझिया में केसरकाजू गुझिया (Gujiya) का नाम सब से खास है. केसरकाजू गुझिया काजू, चीनी और केसर से तैयार की जाती है. सब से अच्छी बात यह है कि यह केसरकाजू गुझिया साल भर मिठाई की दुकानों में मिल जाती है.

600 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से शुरू होने वाली यह गुझिया (Gujiya) जाड़े के त्योहारी सीजन में बहुत पसंद की जाती है. इस का कारण यह है कि इस में पड़ा मेवा जाड़ों में शरीर को ताकत देता है. इस से शरीर मजबूत होता है. मैदे और मावे से तैयार होने वाली गुझिया ज्यादा मीठी होती है, लिहाजा बहुत लोग इस को पसंद नहीं करते. केसरकाजू गुझिया में चीनी की मात्रा बहुत कम होती है, लिहाजा इसे सभी पसंद करते हैं. यह ज्यादा दिनों तक चलती है. ऐसे में इस को बहुत पसंद किया जाता है.

मिठाई कारोबार से जुड़े  प्रशांत कुमार कहते हैं कि केसरकाजू गुझिया (Gujiya) देखने में गुझिया के आकार की होती है. इस कारण इस को गुझिया नाम से जाना जाता है. यह साधारण गुझिया से पूरी तरह से अलग मेवे की मिठाई है.

बाजार में मैदे और मावे की गुझिया केवल होली के मौके पर बिकती है. केसरकाजू गुझिया पूरे साल बिकने लगी है. खाने की शौकीन स्वाति दीक्षित कहती हैं, ‘मुझे सामान्य गुझिया की जगह पर केसरकाजू गुझिया ज्यादा पसंद आती है. यह नए जमाने के लोगों को खूब पसंद आ रही है.’

Jaggery : बेहद गुणी होता है गुड़

Jaggery : आमतौर पर मिठास के लिए लोग चीनी यानी शक्कर की ओर भागते हैं. कोई भी मिठाई या मीठी चीज बनाने के लिए ज्यादातर शक्कर को ही तरजीह दी जाती है. मगर वैज्ञानिकों व डाक्टरों के मुताबिक चीनी सेहत के लिए ज्यादा मुनासिब नहीं होती. इसीलिए खानपान के विशेषज्ञ मिठास के लिए हमेशा गुड़ के इस्तेमाल पर जोर देते हैं. इस मामले में गांवों में रहने वाले लोग ज्यादा समझदार होते हैं, वे ज्यादातर मीठी चीजें बनाने के लिए गुड़ का ही इस्तेमाल करते हैं. गांव के लोग तो चाय भी चीनी की बजाय गुड़ से बनाना पसंद करते हैं.

इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि गुड़ बेहद गुणकारी होता है. अपनी गरम तासीर और सोंधे मीठे जायके के लिए जाना जाने वाला गुड़ आयरन से भरपूर होता है.

बुंदेलखंड जैसे इलाकों में गुड़ को गोलगोल बड़े लड्डुओं के आकार में बना कर बेचा जाता है, तो तमाम इलाकों में इसे 10 और 5 किलोग्राम के बड़ेबड़े आकारों में ढाल कर मार्केट में पेश किया जाता है. साधारण चौकोर बट्टियों या गोल भेलियों के आकार में भी गुड़ बाजार में मौजूद रहता है. आजकल तो तमाम बड़ी कंपनियां हाईजीनिक तरीके से (यानी बगैर हाथ के इस्तेमाल के) मशीनों के जरीए पैक कर के गुड़ पेश कर रही हैं. हाईजीन यानी सफाई का खास खयाल रखने वालों के लिए यह महंगा गुड़ अच्छा रहता है.

बहरहाल, कुछ कत्थई और पीला सा नजर आने वाला गुड़ किसी भी आकार और प्रकार में मिले, मगर होता है गुणों से भरपूर. सेहत के लिहाज से इस के फायदे बेशुमार हैं. आइए डालते हैं एक नजर गुड़ के खास फायदों पर:

* गुड़ का सब से ज्यादा इस्तेमाल सर्दीजुकाम की तकलीफ होने पर किया जाता है. इस की गरम तासीर सर्दीजुकाम में बहुत राहत पहुंचाती है. इसे पानी में डालने के बाद अच्छी तरह खौला कर पीने पर यह दवा जैसा असर करता है. गुड़ का पानी पीना अच्छा न लगे तो गुड़ की चाय अदरक डाल कर बनाएं. यह जायकेदार चाय सर्दीजुकाम में बहुत राहत पहुंचाती है गुड़ की चाय में दूध हमेशा चाय आंच से उतारने के कुछ देर बाद डालना चाहिए. ऐसा करने से दूध फटता नहीं है.

* गुड़ का रोजाना इस्तेमाल करने वालों का हाजमा हमेशा दुरुस्त रहता है. दरअसल गुड़ शरीर में मौजूद पाचन संबंधी एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ा देता है. यह आंतों को सही तरीके से काम करने में मदद पहुंचाता है. जब आतें सही तरीके से काम करती हैं, तो कब्ज की तकलीफ नहीं होती है, यानी पेट कायदे से साफ हो जाता है.

* गुड़ के रोजाना इस्तेमाल से शरीर में खून की कमी की शिकायत नहीं होती है,क्योंकि इस में भरपूर मात्रा में आयरन मौजूद होता है. इस के नियमित इस्तेमाल से खून में हिमोग्लोबिन की मात्रा भी सही बनी रहती है, जो कि अच्छी सेहत के लिए बहुत जरूरी है.

* शरीर के जोड़ों में दर्द व तकलीफ होने पर गुड़ को गिलास भर दूध या अदरक के साथ खाने से बहुत आराम मिलता है.

* गुड़ के भरपूर इस्तेमाल से बदन की तमाम हड्डियां मजबूत होती हैं, नतीजतन आर्थराइटिस की शिकायत भी नहीं होती. इस के अलावा हड्डियों संबंधी तमाम छोटीमोटी तकलीफों से नजात मिल जाती है.

* गुड़ खून बढ़ाता ही नहीं, बल्कि खून साफ भी करता है. इस के रोजाना इस्तेमाल से खून साफ होता रहता है. खून साफ रहने से सेहत भी सही बनी रहती है.

* यह महज खून की सफाई ही नहीं करता, बल्कि अहम अंग लीवर कीभी सफाई करता है. गुड़ खाने से शरीर में मौजूद हानिकारक आक्सिंस बाहर निकल जाते हैं और लीवर की सफाई हो जाती है. लीवर शरीर का अहम अंग होता है और अच्छी सेहत के लिए इस का सहीसलामत रहना जरूरी है. गुड़ को लीवर का रक्षक कह सकते हैं.

* गुड़ में अच्छीखासी मात्रा में एंटीआक्सीडेंट्स व मिनरल पाए जाते हैं, जो अच्छी सेहत के लिए जरूरी होते हैं. इस में पाए जाने वाले सेलेनियम व जिंक जैसे मिनरल स्वस्थ शरीर के लिए बहुत जरूरी होते हैं.

* मोटे और वजनी लोगों के लिए भी गुड़ कारगर साबित होता है. ज्यादा वजन वालों को गुड़ का नियमित इस्तेमाल करना चाहिए. यह शरीर में पानी की मात्रा सही कर के वजन को काबू में रखता है.

* वैज्ञानिकों के मुताबिक गुड़ खाने से इनसान का मिजाज अच्छा हो जाता है, नतीजतन वह मन लगा कर कोई भी काम करता है.

* गुड़ खाने वालों को सिरदर्द जैसी तकलीफों से नजात मिल जाती है. माइग्रेन की तकलीफ में भी गुड़ कारगर किरदार निभाता है और राहत पहुंचाता है.

* रोजाना गुड़ खाने वालों की याददास्त बेहतर होती है और भूलने की शिकायत कम हो जाती है. इस के इस्तेमाल से दिमाग लंबे अरसे तक चौकस बना रहता है.

* गुड़ एक उम्दा काम्पलेक्स कार्बोहाइड्रेट होता है. इस के इस्तेमाल से शरीर लंबे अरसे के लिए मजबूत बना रहता है. यह शरीर को धीरेधीरे ऊर्जा पहुंचाता है. इस के इस्तेमाल से शुगर का लेवल जल्दी से नहीं बढ़ता है.

* गुड़ के इस्तेमाल से सांस से जुड़ी तकलीफें भी दूर होती हैं. अस्थमा या ब्रोनकाइटिस जैसी सांस संबंधी दिक्कतें गुड़ खाने वालों को कम होती हैं.

* गुड़ में तिल मिला कर बनाए गए लड्डू खाने से सांस संबंधी दिक्कतें नहीं होती हैं. बगैर लड्डू बनाए गुड़ व तिल खाने से भी फायदा होता है.

* मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द और क्रैंप्स जैसी तकलीफों में भी गुड़ खाने से आराम मिलता है. गुड़ खाने से इनसान का मूड भी अच्छा हो जाता है.

* अगर गला बैठ जाए और आवाज ढंग से न निकले, तो पके हुए चावलों के साथ गुड़ मिला कर खाने से बहुत फायदा होता है और गला बहुत जल्दी ठीक हो जाता है. कुछ ही देर में आवाज ठीक से निकलने लगती है.

* गुड़ खाने से टाक्सिन दूर होते हैं, नतीजतन त्वचा खिल जाती है. इस के इस्तेमाल से कीलमुहासों से भी नजात मिल जाती है. गुड़ का इस्तेमाल एक्ने की दिक्कत भी दूर करता है.

* बच्चा होने के बाद औरत के पेट की सफाई व पोषण के लिहाज से भी गुड़ बेहद कारगर व फायदेमंद रहता है. इसीलिए डिलीवरी के बाद महिलाओं को गुड़ के सिठौरे (मेवे वाले खास लड्डू) वगैरह बना कर काफी समय तक खिलाए जाते हैं.

* रोजाना खाना खाने के बाद मिठाई के तौर पर थोड़ा सा गुड़ खाना स्वाद, सेहत व हाजमे के लिहाज से काफी कारगर होता है.

* गुड़ में तिल व मूंगफली मिला कर बनाए गए लड्डू या चिक्की (पट्टी) स्वाद व स्वास्थ्य के लिए उम्दा होते हैं.

* गुड़ व लाई (मुरमुरा) मिला कर बनाए गए लड्डू या पट्टी भी हलके नाश्ते के लिहाज से बेहतर होते हैं.

* गुड़ मिला कर बनाए गए बाजरे के पुए (तिल भी मिला सकते हैं) और गुड़, देशी घी व बाजरे की रोटी से बनाया गया मलीदा भी सेहत व स्वाद के लिहाज से लाजवाब होते हैं.

यानी कुल मिला कर गुड़ हमारे स्वाद व सेहत की कसौटी पर खरा सोना साबित होता है, लिहाजा इस का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए. अलबत्ता शुगर के मरीज इसे अपने डाक्टर से पूछ कर ही इस्तेमाल करें.

डोडा बरफी दलिया और दूध का कमाल

डोडा बरफी पंजाब की सब से खास मिठाई है. अब यह पंजाब के बाहर भी मिठाई की दुकानों में बिकने लगी है. यह खोए और पनीर की बनी मिठाई से अलग है. यह खोए और पनीर की मिठाई से ज्यादा दिनों तक चल सकती है. इसीलिए लोग इसे पसंद कर रहे हैं. पंजाब में दूध और गेहूं की पैदावार ज्यादा होती है. गेहूं से बनने वाले दलिए से डोडा बरफी तैयार करने से किसानों को भी मदद मिलने लगी है. अब दलिए की ज्यादा खपत होने लगी है. दूध और दलिया दोनों ही पौष्टिक होते हैं.

इस में मेवे मिला कर बरफी को और भी अच्छा बना लिया जाता है. डोडा बरफी अपने नाम की ही तरह बहुत अलग है. ऐसे में इस का स्वाद हर किसी को पसंद आता है. करीब 500 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिकने वाली डोडा बरफी तेजी से मिठाई कारोबार में अपना असर छोड़ रही है.

मुंबई की रहने वाली दीपिका सिंह कहती हैं, ‘इस का रंग देख कर यह चाकलेट की तरह लगती है. इस का स्वाद बहुत मजेदार होता है. यह खोए की बरफी और चाकलेट दोनों से अलग होती है. मेवे और कोको पाउडर इस के स्वाद को दूसरी मिठाइयों से अलग कर देते हैं.

डोडा बरफी में खोए की मिठाई जितनी कैलोरी नहीं होती है. इसी वजह से इसे हर कोई खा सकता है. दूध और लस्सी वाले पंजाब की अब नई पहचान डोडा बरफी बनती जा रही है.

सामग्री : 4 कप दूध, डेढ़ कप ताजी क्रीम, 3 चम्मच दलिया, 2 कप चीनी, 1 बड़ा चम्मच घी, 1 कप काजू (बारीक कुटे हुए), 1 कप बादाम (बारीक कटे हुए), 2 बड़े चम्मच कोको पाउडर, 2 बड़े चम्मच पिस्ता (लंबे कटे हुए).

बरफी बनाने की विधि : सब से पहले एक पैन में घी डाल कर गरम करें. फिर इस में दलिया डाल कर मध्यम आंच पर हलका भूरा होने तक भूनें. इसे निकाल कर अलग रख लें. अब एक भारी तले की कड़ाही में दूध डाल कर मध्यम आंच पर उबालें. जब दूध उबल जाए तब उस में क्रीम डालें और दूध गाढ़ा होने तक उबालें. इस में करीब 40 मिनट लगेंगे. अगर दूध कड़ाही में लगे, तो चम्मच से छुड़ाते रहें.

अब दूध में दलिया और चीनी डाल कर मिलाएं और 20 मिनट तक पकाएं. चम्मच से चलाते रहें ताकि दूध कड़ाही के किनारों पर न चिपके. अब उस में कोको पाउडर, काजू और बादाम डालें और तब तक पकाएं जब तक कि यह मिश्रण बड़ी लोई जैसा नहीं हो जाता. इस में करीब 15 मिनट लगेंगे. अब एक थाली में घी लगा लें और तैयार मिश्रण को उस में फैला लें. इस के बरफी के आकार के पीस काट लें और पिस्ता डाल कर हलके हाथ से चम्मच से दबा दें. डोडा बरफी तैयार है. ठंडा होने के बाद इसे पेश करें. इस मिठाई को बनाने के बाद 15 दिनों तक फ्रिज में रखा जा सकता है.

मिल्क पुडिंग: दूध और मिठाई का एहसास

लजीज मिल्क पुडिंग एक तरह की दूध की बरफी होती है. यह दूध और छेने से तैयार की जाती है. इस को रंग देने के लिए केसर का हलका सा इस्तेमाल किया जाता है. यह खाने में ताजगी का एहसास कराती है. छेने से बनने के कारण यह दानेदार बरफी सी दिखती है. जो किसान पशुपालन और दूध उत्पादन का काम करते हैं, वे इस को बना कर रोजगार कर सकते हैं. मिल्क पुडिंग को बनाना बेहद आसान होता है. यह 5-6 दिनों तक ही रुक सकती है, इसलिए बनाने के बाद इस की जल्द से जल्द खपत का हिसाब लगा लें. स्वाद में अलग होने के कारण इस को लोग खूब पसंद करते हैं.

लखनऊ के परंपरा स्वीट शौप के मालिक कृष्ण कुमार गुप्ता उर्फ बबलू गुप्ता कहते हैं कि इसे बनाने में थोड़ी सी असावधानी होने से दूध के लगने या जलने का खतरा बना रहता है, जो मिल्क पुडिंग के स्वाद को खराब कर सकता है. इस में दूध और चीनी की मात्रा ऐसी होनी चाहिए, जो मिल्क पुडिंग के स्वाद को बनाए रखते हुए मिठास का एहसास कराए. केसर और इलायची पाउडर डालने से इस की खुशबू अच्छी हो जाती है. पिस्ता व बादाम का इस्तेमाल इस को स्वादिष्ठ बनाने के लिए किया जाता है. मिल्क पुडिंग जब तैयार हो जाती है, तो इस को मनचाहे आकार में काट लिया जाता है.

कैसे बनाएं

मिल्क पुडिंग बरफी बनाने के कारीगर राजकुमार बताते हैं कि इस को बनाने के लिए फुलक्रीम दूध लेना चाहिए. दूध को 2 हिस्सों में बांट लेना चाहिए. पहले हिस्से को गरम करने के बाद उस का छेना बनाना चाहिए. छेना बनाने के लिए दूध को पहले गरम करें. दूध उबलने लगे तो उसे नीचे उतार लें. इस में नीबू के रस की 2-3 बूंदे डालें. इस से छेना और दूध का पानी अलगअलग हो जाते हैं. छेना अलग करने के लिए मोटे कपड़े से छान लें. छेना एक जगह पर रख लें.

अब बचा हुआ दूध गरम करें. इस को तब तक उबालें, जब तक यह गाढ़ा हो कर आधा न हो जाए. इस के बाद इस में छेना मिला दें. यह करीबकरीब खोया जैसा दिखने लगे तो इस में चीनी भी मिला दें. जब यह गाढ़ा हो कर बरफी जमने लायक हो जाए, तो इस में केसर और इलायची पाउडर मिला दें. अब तैयार मिल्क पुडिंग को एक बड़े थाल में ठंडा होने के लिए रख दें. इस के ऊपर से पिस्ता और बादाम डाल दें. जब यह जम जाए तो इस को अलगअलग आकार में काट लें. इस को बनाने के 4-5 दिनों में खत्म कर दें. ज्यादा दिनों तक इस को रखना अच्छा नहीं रहता.

बड़ा है बाजार

मिल्क पुडिंग का बाजार बहुत बड़ा है. यह छोटी और बड़ी हर मिठाई की दुकान में मिल जाती है. लखनऊ की रहने वाली साक्षी शिवानंद कहती हैं कि मिल्क पुडिंग दूसरी बरफियों के मुकाबले ज्यादा टेस्टी लगती है. मिल्क पुडिंग जब फ्रेश होती है, तो ज्यादा अच्छी लगती है.

मिल्क पुडिंग का भाव अलगअलग होता है. यह बाजार में करीब 500 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मिलती है. रबड़ी के बाद फ्रेश मिठाइयों में मिल्क पुडिंग की मांग सब से ज्यादा होती है. मिठाई के बाजार में मिल्क पुडिंग का नाम पुराना है. अब इस की मार्केटिंग नए तरीके से हो रही है. ऐसे में लोग मिल्क पुडिंग की खूब खरीदारी करने लगे हैं. कुछ लोग इस को खरीद कर ले जाते हैं और फिर घरों में इस से गुझिया भी बना लेते हैं. ऐसे में मिल्क पुडिंग की खपत बढ़ जाती है.

Laddu : आटा गोंद मखाना लड्डू

Laddu: यह एक जल्दी बनने वाली मिठाई है. इस को किसी भी मौसम में बनाया जा सकता है. बच्चों के लिए यह बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक है. साथ ही गर्भवती महिलाओं के लिए ये लड्डू खाना काफी लाभदायक होता है. घर में आए मेहमानों को भी आप ये लड्डू बना कर खिला सकते हैं. उत्तरी भारत के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में ये लड्डू काफी लोकप्रिय हैं. इन के बनाने की विधि भी काफी सरल है. कोई भी इन को आसानी से तैयार कर सकता है.

जरूरी सामग्री

2 कप गेहूं का आटा, आधा कप पिसी हुई चीनी, आधा कप गुड़ की शक्कर, 1 कप देशी घी, 2 चम्मच बादाम गिरी, 2 चम्मच काजू गिरी, आधा कप गोंद (भुना और दरदरा), आधा कप मखाने (भुने और दरदरे), 1 चम्मच पिस्ता, 1 चांदी का वर्क, 2 चम्मच नारियल का चूरा, 1 चम्मच सोंठ.

बनाने की विधि

कड़ाही में घी गरम करें. घी में धीमी आंच पर आटे को छान कर भून लें.

अब फ्राई पैन में पिसी हुई चीनी, भुना आटा, बादाम गिरी, काजू गिरी, गोंद, मखाना, सोंठ और नारियल का चूरा मिलाएं.

तैयार मिश्रण को ठंडा होने दें और फिर हाथ से गोल और मध्यम आकार के लड्डू बनाएं. लड्डुओं को पिस्ते और चांदी वर्क से सजाएं. प्लेट में रखें और पेश करें.

Sweets : रसीली और कुरकुरी इमरती (Imarti)

Imarti: इमरती और जलेबी का रंग करीबकरीब एक जैसा ही होता है. दोनों के स्वाद और डिजाइन में फर्क होता है. इमरती सब से पुरानी मिठाइयों में शुमार की जाती है. देश के हर छोटेबडे़ बाजार में यह मिलती है. उड़द की दाल से तैयार होने के कारण यह खोए और दूध की मिठाइयों की तरह जल्द खराब नहीं होती है. इस का रसीला कुरकुरा स्वाद खाने वालों को बहुत पसंद आता है. इमरती का डिजाइन दूसरी मिठाइयों से पूरी तरह अलग होता है. इस का आकार अलग होने के साथ एकदम गोल होता है. इस के आकार को बनाना कुशल कारीगर का ही काम होता है. भारतीय समाज में इमरती कुछ इस तरह से रचबस गई है कि तमाम लोग अपनी लड़कियों के नाम तक इमरती देवी रखते रहे हैं.

उड़द की दाल से बनी होने की वजह से यह चीनी की चाशनी को इतना अंदर तक सोख लेती है कि इसे खाते ही इस का लाजवाब स्वाद मुंह में घुल जाता है. कुछ लोग इमरती को जलेबी घराने की मिठाई मानते हैं. यह सच बात नहीं है. इमरती और जलेबी दोनों ही अलगअलग हैं. इमरती उड़द की दाल से बनती है, जबकि जलेबी मैदे से तैयार होती है. डिजाइन के हिसाब से देखें तो भी जलेबी और इमरती अलगअलग होती हैं. इमरती भारत की मिठाई नहीं है. यह अरब और ईरान देशों से भारत आई है.

अलगअलग नाम

भारत में यह मिठाई अवध क्षेत्र में आ कर प्रचलित हुई. वहां यह नवाबी मिठाई के रूप में मशहूर हुई. नवाबों की रसोई से निकल कर यह रजवाड़ों तक पहुंच गई. राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली व पंजाब के अलावा पूर्व और दक्षिण भारत के शहरों में भी इमरती खूब प्रचलित है. पश्चिम बंगाल में इसे ‘ओम्रीती’ और केरल में ‘जांगिरीग’ कहते हैं. इमरती को गरमागरम खाना पंसद किया जाता है. जलेबी को जहां दही के साथ खाया जाता है, वहीं इमरती को रबड़ी के साथ खाना पसंद किया जाता है.

उत्तर प्रदेश के जौनपुर में खास किस्म की इमरती बनती है. यह बिना किसी रंग की होती है. यह कुरकुरी नहीं होती है. इसे मिट्टी की मटकी में रख कर बेचा जाता है. जौनपुर की इमरती ‘बेनी की इमरती’ के नाम से मशहूर है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी इमरती बहुत मशहूर है. यहां करीबकरीब हर मिठाई की दुकान में यह मिल जाती है. लखनऊ में शाम के 4 बजते ही इमरती की बिक्री शुरू हो जाती है. देर रात तक लोग इस का स्वाद लेते हैं. शादीविवाह के मौकों पर भी खाने के साथ इमरतीरबड़ी खाने का रिवाज है. फैशन डिजाइनर जस चंदोक कहती हैं, ‘इमरती अपने स्वाद और आकार के कारण सब को पसंद आती है. सब से पुरानी मिठाई होने के कारण इसे नई और पुरानी दोनों पीढि़यां खूब पंसद करती हैं.’

कैसे बनती है इमरती

मिठाई के पुराने कारीगर राम कुमार गुप्ता कहते हैं, ‘इमरती को बनाने के लिए उड़द की दाल को पीस कर गूंधा जाता है. इसे रगंने के लिए खाने वाला केसरिया रंग मिलाया जाता है.  इस के बाद इसे कपडे़ में लिया जाता है. इस कपडे़ में नीचे छेद होता है. यह छेद काफी छोटा होता है.  हाथ के दबाव से गूंधी हुई उड़द की दाल को पतली डोरी की तरह नीचे कढ़ाई के गरम तेल में गिराया जाता है. इसे घुमावदार डिजाइन में तैयार किया जाता है.

‘गोलगोल घुमावदार आकार वाली इमरती जब तेल में ठीक ढंग से फ्राई हो जाती है, तो उसे निकाल कर चीनी से बनी चाशनी में डाल दिया जाता है. चाशनी को पहले ही बना कर रख लिया जाता है. उड़द की दाल से बनी होने के कारण यह चाशनी को अंदर तक सोख लेती है, जिस से मिठास अंदर तक पहुंच जाती है. इस के स्वाद का कुरकुरापन लोगों को खूब पसंद आता है.’

Sweets : संतरा बरफी – स्वाद रहेगा याद

Sweets : खानपान के कारोबार में नएनए प्रयोग हो रहे हैं, जिन से खाने वालों को नएनए स्वाद मिल रहे हैं. जरूरत इस बात की है कि खाने की चीजों को लंबे समय तक खराब होने से कैसे बचाया जा सके. इस के लिए मिठाइयों में दूध या दूध से बनी चीजों का इस्तेमाल कम से कम किया जा रहा है.

खोए के मुकाबले मेवों से बनने वाली मिठाइयां लंबे समय तक चलती हैं. मेवे महंगे होने के कारण उन से तैयार होने वाली मिठाइयां भी महंगी हो जाती हैं. मेवों से तैयार होने वाली मिठाइयों की कीमत 8 सौ रुपए प्रति किलोग्राम के करीब होती है. खोए से तैयार होने वाली मिठाइयां भी 6 सौ रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच रही हैं.

ऐसे में संतरा बरफी को इस तरह से तैयार किया गया है कि यह 5 सौ रुपए प्रति किलोग्राम से कम में ही खाने को मिल जाती है. यह सेहत के लिए भी खोए की मिठाइयों से बेहतर होती है.

लखनऊ के छप्पन भोग मिठाई शौप के मालिक विनोद गुप्ता कहते हैं, ‘हमारे देश में तमाम तरह के फलों की पैदावार होती है. इन फलों में सेहत और स्वाद का खजाना छिपा होता है. इन फलों का स्वाद लोग हमेशा लेना चाहते हैं. ऐसे में हम ने कुछ मिठाइयों को फलों के स्वाद वाली बनाने की शुरुआत की है. संतरा बरफी उन में से एक है. पहले यह बेसन से तैयार होती थी. उसे संतरे का रंग और स्वाद दिया जाता था. पर वह खाने में बहुत अच्छी नहीं लगती थी. ऐसे में संतरा बरफी को नए तरीके से पेठे की तरह से तैयार किया जाने लगा है. यह बेसन से तैयार बरफी से अलग होती है. इसे पेठे की तरह तैयार कर के इस में संतरे के पल्प से तैयार रस मिलाया जाता है. इस वजह से इस में संतरे के स्वाद और ताजगी का एहसास होता है.’

कैसे बनती है संतरा बरफी

सामग्री : डेढ़ किलोग्राम सफेद कद्दू, 1 किलोग्राम चीनी, 10 ग्राम चूना और 2 बड़े चम्मच गुलाबजल, 250 ग्राम संतरा पल्प, दूध और चांदी का बरक.

विधि : कद्दू का छिलका व बीज अलग कर लें. इस के 2 इंच के टुकड़े काट लें. इन टुकड़ों को चूने के पानी में डाल दें. 8 से 10 घंटे बाद इन को कई बार साफ पानी से धोएं और उबलते पानी में डाल कर हलका सा नरम कर लें. कद्दू के टुकड़ों को घिस कर लच्छे तैयार कर लें. चीनी में पानी मिला कर चाशनी तैयार करें. थोड़ा सा दूध डाल कर चाशनी का मैल अलग कर लें. चाशनी में कद्दू के टुकड़ों से तैयार लच्छे डाल कर 15 मिनट धीमी आंच पर पकाएं. अगले दिन लच्छे निकाल कर चाशनी गाढ़ी करें. फिर उस में लच्छे डाल कर फिर से पकाएं. इसे रात भर रखा रहने दें. तीसरे दिन इस में संतरा पल्प डाल कर इस तरह से पकाएं कि चाशनी नीचे से जले नहीं, पर लच्छे पूरी तरह से सूख जाएं.

अब इन को किसी बड़ी प्लेट में रख कर बरफी की तरह से छोटेछोटे टुकड़े काट लें. अलगअलग टुकड़े को कागज की छोटीछोटी कटोरियों में रखें. सजावट के लिए चांदी के बरक का इस्तेमाल करें. इस से बरफी की ताजगी लंबे समय तक बनी रहेगी. संतरा बरफी में संतरे के स्वाद को पूरे साल लिया जा सकता है.