Irrigation Technique: ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ सिंचाई की खास तकनीक

Irrigation Technique : दुनिया-भर में दिनों-दिन पानी की कमी होती जा रही है. ऐसे में भारत भी इससे अछूता नहीं है. खासकर पारंपरिक तरीके से की गई खेती में पानी की अधिक बरबादी होती है. परंतु अब तकनीक का दौर है तो खेती की सिंचाई के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं. सरकार भी सिंचाई की अनेक आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएं चलाती है. ऐसी ही एक खास योजना ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ है. जानिए इस योजना के बारे में क्या है इसमें खास और किसान कैसे इस तकनीक का लाभ लें.

पानी की बचत और ज्यादा उत्पादन

इस सिंचाई पद्धति (Irrigation Technique) को अपनाकर किसान 40 से 50 फीसदी तक पानी की बचत कर सकते हैं, साथ ही 30 से 40 फीसदी तक उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है. खेती में सरकार की ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ माइकोइरीगेशन योजना के तहत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को प्रभावी ढंग से विभिन्न फसलों में अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया जा रहा है.

बूंद-बूंद का इस्तेमाल

इस खास तकनीक को बूंद-बूंद सिंचाई और फव्वारा सिंचाई भी कहा जाता है. इस तकनीक में बूंद-बूंद पानी सिंचाई के काम आता है और पानी की बिलकुल बर्बादी नहीं होती, इसलिए जहां पानी की कमी है, वहां के लिए तो यह तकनीक बहुत ही फायदेमंद है.

क्या है ड्रिप इरीगेशन पद्धति

फसल के अनुसार सिंचाई तकनीक का करें इस्तेमाल. इसमें मिनी, पोर्टेबल, सेमी परमानेंट एवं रेनगन स्प्रिंकलर अलग-अलग सिंचाई के तरीके हैं, लेकिन सभी पानी की बचत के साथ-साथ अच्छी फसल उत्पादन देने में मदद करते हैं.

Irrigation Technique

कौन-सी फसलों में अपनाएं यह तकनीक

बागबानी / फल उद्यान फसलें – आम, अमरूद, आंवला, नीबू, बेल, बेर, अनार, अंगूर, आड़ू, लोकाट, आलूबुखारा, नाशपाती, पपीता एवं केला आदि.

सब्जियां – टमाटर, बैगन, भिंडी, मिर्च, शिमला मिर्च, गोभीवर्गीय, कद्दूवर्गीय एवं अन्य इसी तरह की खेती में कारगर.

सुगंधित एवं औषधीय फसलें – रजनीगंधा, ग्लेडियोलस, गुलाब और औषधीय एवं सुगंधित अन्य फसलों में भी.

अन्य फसलें – आलू, गन्ना और भी कई फसलों में इस योजना के तहत लाभ उठाकर सिंचाई की जा सकती है.

कैसे ले सकते हैं योजना का लाभ

‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना का संचालन वेब बेस्ड UPMIP पोर्टल के माध्यम से किया जा रहा है. जो किसान इसका लाभ लेना चाहते हैं वे www.upmip.in पोर्टल पर पंजीकरण करवा सकते हैं और सूक्ष्म सिंचाई पद्धति (Irrigation Technique) का लाभ ले सकते हैं. इसके लिए 10 से 90 फीसदी तक अनुदान मिलता है, जो फसल के अनुसार अलग – अलग होता है.

आज के समय पानी खेती की सबसे बड़ी जरूरत है. अगर समय पर फसल को पानी नहीं मिला तो फसल बर्बाद होते समय नहीं लगता. ऐसे में सिंचाई योजनाओं को अपनाना किसानों के लिए फायदे की बात है.

Horticulture Crops : बागबानी फसलें किसानों को दे रही हैं लाभ

Horticulture Crops : किसान अपने खेतों में परंपरागत फसलें जैसे गेहूं, चना, मटर, सरसों, जौ, बाजरा, मक्का, ज्वार, धान आदि बो कर उत्पादन करते हैं, पर अगर वे अपने कुछ खेतों में बागबानी (Horticulture Crops) फसलें बोएं तो उन्हें अच्छाखासा लाभ होगा.

उत्तर प्रदेश की विविधतापूर्ण जलवायु सभी प्रकार की बागबानी फसलों के उत्पादन के लिए उपयुक्त है. बागबानी फसलों के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के फलों पपीता, अमरूद, केला, आम, अंगूर, और बेल आदि शाकभाजी में फूलगोभी, बंदगोभी, मटर, टमाटर, शलगम, आलू, प्याज, लौकी, कद्दू, गाजर आदि, मसालों में धनिया, हलदी, सौंफ, जीरा, मिर्च, लहसुन आदि, औषधीय खेती में एलोवेरा, अश्वगंधा, सर्पगंधा, पिपरमैंट, शतावरी, तुलसी, ब्राह्मी आदि फसलें बो कर किसान अच्छाखासा लाभ प्राप्त कर रहे हैं. बागबानी खेती के लिए सरकार अनुदान भी दे रही है, जिस का लाभ किसानों को मिल रहा है.

उत्तर प्रदेश के कृषि सैक्टर के विकास में लगभग 28 फीसदी औद्यानिक फसलों का योगदान होता है. प्रदेश में अधिकतर छोटे, लघु और मध्यम किसानों द्वारा परंपरागत खेती के स्थान पर बागबानी खेती को अपना कर फसलें उत्पादित कर आर्थिक लाभ लिया जा रहा है.

Horticulture Crops

बागबानी फसलों का कृषि एवं संवर्गीय क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पादन में महत्त्वपूर्ण योगदान है. बागबानी फसलें (Horticulture Crops) इकाई क्षेत्र से अधिक आय, रोजगार एवं पोषण उपलब्ध कराने में सक्षम है.

बागबानी फसलें (Horticulture Crops) विविधतापूर्ण होती हैं. बढ़ती मांग तथा कृषि में महत्त्वपूर्ण योगदान, फसलों के व्यावसायीकरण, विविधीकरण से प्रदेश सरकार बागबानी फसलों के क्षेत्रफल में विस्तार करते हुए किसानों को हर तरह की सुविधा दे रही है. प्रदेश सरकार पुराने आम, अमरूद, आंवला आदि के अनुत्पादक बागों का जीर्णाेद्वार करा कर उन के उत्पादन में बढ़ोतरी कर रही है, साथ ही गुणवत्तायुक्त रोपण सामग्री का उत्पादन कर पौधों को अधिक से अधिक रोपण हेतु किसानों, उत्पादकों को दे रही है, जिस से संबंधित फसल का वे अधिक से अधिक उत्पादन कर सकें. विभिन्न फलों/शाकभाजी/मसालों/औषधियों की फसलों के तुड़ाई/कटाई के बाद उन के रखरखाव के उचित प्रबंधन, वाजिब मूल्य पर विक्रय करा कर किसानों को उन की फसल का मूल्य दिलाने सहित बागबानी फसलों को बढ़ावा देते हुए सरकार प्राथमिकता से क्रियान्वयन करा रही है.

प्रदेश के उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग द्वारा प्रदेश में फल, शाकभाजी, आलू, पुष्प, मसाले, औषधीय एवं सगंधपौधों, पान विकास के साथसाथ सहायक उद्यम के रूप से मौनपालन, मशरूम उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण, पान की खेती आदि के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की हैं, जिन का लाभ किसानों को दिया जा रहा है. प्रदेश में एकीकृत बागबानी विकास मिशन, ड्रिप/स्प्रिंकलर सिंचाई की स्थापना, औषधीय पौध मिशन, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति बाहुल्य क्षेत्र में बागबानी विकास के माध्यम से कृषकों को अनुदान देते हुए उन के उत्पादन में वृद्धि की जा रही है.

Horticulture Crops

प्रदेश में विभिन्न फसलों को खाद्य प्रसंस्करण करने के लिए स्थापित इकाइयों में आवश्यक मानव संसाधन की दृष्टि से भी बागबानी फसलों के किसानों, कृषि मजदूरों को रोजगार प्राप्त हो रहा है.

प्रदेश सरकार द्वारा संचालित विभिन्न योजना के तहत प्रदेश में एक लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में नवीन उद्यान रोपण, शाकभाजी बीज, पुष्प, मसाला औषधीय फसलों का विस्तार किया गया है. औफ सीजन हाई वैल्यू सब्जी व पुष्प उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ग्रीन हाउस एवं शेडनैट हाउस का निर्माण कराते हुए किसानों को लाभान्वित किया गया.

कृषि कल्याण अभियान के अंतर्गत गांवों में किसानों को तकनीकी जानकारी व पौधे तथा बीज वितरित किएजा रहे हैं. प्रदेश के किसानों को उच्चगुणवत्ता के फल व सब्जी के पौधों की उपलब्धता तथा नवीन तकनीकी हस्तांतरण के उद्देश्य से इजराइल सरकार के तकनीकी सहयोग से जनपद बस्ती में फल एवं कन्नौज में शाकभाजी, कौशांबी में फल तथा चंदौली में सब्जी, सहारनपुर में फल तथा लखनऊ में और्नामैंटल सैंटर औफ ऐक्सीलैंस की स्थापना की गई है. कई जिलों में मिनी सैंटर स्थापित किए जा चुके हैं.

Horticulture Crops

प्रदेश सरकार बुंदेलखंड तथा विंध्य क्षेत्र में विभिन्न संचालित योजनाओं के लाभार्थी कृषकों को नए बागों को उन के खेतों पर स्थापना हेतु प्रोत्साहित करने के लिए लाभार्थियों को एक हेक्टेयर तक के बाग स्वयं फैंसिंग सुविधा के साथ लगाने पर प्रोत्साहन धनराशि भी उपलब्ध कराती है. बुंदेलखंड विशेष पैकेज के अंतर्गत भी कार्यक्रम संचालित करते हुए किसानों को सुविधा दी जा रही है. विभाग द्वारा उत्पादन इकाइयों पर उत्पादित छोटे पौधे, कलमी, बीज शोभाकर पौधे आदि बिना लाभहानि के लागत मूल्य पर जनसाधारण को सुलभ कराए जाते हैं. विभाग द्वारा मशरूम, पान, मधुमक्खी पालन सहित अन्य बागबानी फसलों की पूर्ण जानकारी के लिए किसानों/उत्पादकों को प्रशिक्षण भी दिया जाता है. प्रदेश सरकार द्वारा बागबानी विकास हेतु किसानों की दी जा रही सुविधाओं से किसान फसलों का उत्पादन करते हुए अपनी आय दोगुना कर रहे हैं.

Shubhavari Chauhan : एक युवा किसान की प्रेरणादायक कहानी

Shubhavari Chauhan : भारत की कृषि परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन आधुनिक समय में इसे वैज्ञानिक और व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ अपनाने वाले किसान कम ही हैं, खासकर युवा और महिलाएं. ऐसे ही एक प्रेरणास्रोत का नाम है शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan). उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की इस युवा महिला किसान ने न केवल कम उम्र में जैविक खेती को अपनाया, बल्कि गाय के घी और अन्य कृषि उत्पादों के माध्यम से देशविदेश में अपनी पहचान बनाई है.

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) का जन्म 4 अप्रैल, 2005 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के कोठड़ी गांव में हुआ था. उन का पालनपोषण एक शिक्षित एवं कृषि प्रेमी परिवार में हुआ. उन के पिता संजय चौहान कृषि के विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने एम.एस.सी के बाद भी खेती को अपने जीवन का ध्येय बनाया. उन की माता ममता चौहान संस्कृत में स्नातकोत्तर हैं और परिवार में भारतीय संस्कृति व पारंपरिक ज्ञान का गहरा प्रभाव है.

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय से हुई. फिलहाल वह सहारनपुर के मुन्ना लाल गर्ल्स डिग्री कालेज से बी.ए. फाइनल ईयर की छात्र हैं. पढ़ाई के साथसाथ उन्होंने बचपन से ही खेतखलिहान और पशुपालन में गहरी रुचि ली.

कृषि में प्रवेश और नवाचार

शुभावरी चौहान(Shubhavari Chauhan) ने मात्र 10 साल की आयु में अपने पिता के साथ खेती करना शुरू किया था. शुरुआत गन्ने की पारंपरिक खेती से हुई, लेकिन जल्द ही उन्होंने रासायनिक खाद और कीटनाशकों से दूर रहते हुए जैविक खेती को अपनाने का निश्चय किया.

उन्होंने गन्ने की जैविक खेती के साथसाथ पारंपरिक कोल्हू से गुड़ और शक्कर बनाने का काम  शुरू किया. इस के लिए उन्होंने स्थानीय मजदूरों को रोजगार दिया और पुराने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विपणन तकनीकों के साथ जोड़ा.

कुछ ही सालों में शुभावरी चौहान ने आम (दशहरी, लंगड़ा, मल्लिका) की. इस के साथ ही,  बागबानी में टमाटर, मिर्च, धनिया, हल्दी और अन्य सब्जियों की खेती को भी जैविक पद्धति से अपनाया. उन्होंने ड्रिप सिंचाई और वर्मी कंपोस्ट जैसी नवीन तकनीकों को अपना कर जल और मृदा संरक्षण में भी योगदान दिया.

Shubhavari Chauhan

पशुपालन और देसी गाय का घी

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) की सब से बड़ी पहचान ‘देसी गाय के घी’ के उत्पादन और निर्यात के क्षेत्र में बनी. उन्होंने 20–30 देशी नस्ल की गायें पाल रखी हैं, जिन्हें केवल जैविक चारा और आयुर्वेदिक उपचार दिया जाता है. उन के द्वारा उत्पादित ‘बिलौनी घी’ की मांग केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पेरिस, दुबई, लंदन और सिंगापुर तक फैली हुई है.

बिलौनी घी की कीमत 1800 से 2000 रुपए प्रति किलो तक होती है, और हर साल वे 70 से 80 किलो घी औनलाइन बेचती हैं. यह घी ‘शुद्धता’ और ‘स्वदेशी तकनीक’ के कारण ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय है.

पर्यावरण और जल संरक्षण में योगदान

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) ने कृषि को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं माना, बल्कि इसे एक सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के रूप में भी अपनाया. उन्होंने अपने खेतों में नीम, सहजन, कनेर जैसे पौधे लगाए जो वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक हैं. जल संकट से निबटने के लिए उन्होंने अपने खेतों में छोटे बांध बनाए, वर्षा जल संचयन और ड्रिप सिंचाई के माध्यम से जल संरक्षण की दिशा में शुभावारी चौहान (Shubhavari Chauhan) ने महत्वपूर्ण काम किया है.

तकनीक और सोशल मीडिया का उपयोग

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) ने डिजिटल तकनीकों को भी अपनाया है. वह सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स जैसे इंस्टाग्राम और यूट्यूब के माध्यम से खेती के टिप्स, वीडियो ब्लौग, घी निर्माण प्रक्रिया, आम की पैकिंग आदि से जुड़े वीडियो पोस्ट करती हैं, उन के हजारों फौलोवर्स हैं, जो उन के काम से प्रेरणा लेते हैं. उन का एकमात्र उद्देश्य है “युवा किसानों को जोड़ो, मिट्टी से जोड़ो.”

सम्मान और पुरस्कार

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) को उन के उल्लेखनीय कार्यों के लिए कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त हुए हैं. कुछ प्रमुख सम्मानों में शामिल हैं:

  • कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही द्वारा सम्मानित किया गया

– “बेस्ट यंग फार्मर अवार्ड” (2024) – फार्म एंड फूड पत्रिका द्वारा, लखनऊ में.

– “वानी पुरस्कार” (2024) – मृदा संरक्षण और जैविक खेती के लिए.

– किसान दिवस (2023) पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा राज्य स्तरीय किसान सम्मान.

– कृषि विज्ञान केंद्र और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) से विशेष प्रशस्ति पत्र.

इन पुरस्कारों के साथसाथ वे कृषि संगोष्ठियों, वेबिनार और महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों में भी वक्ता के रूप में शामिल होती हैं.

Shubhavari Chauhan

आर्थिक प्रभाव और रोजगार

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) का सालाना टर्नओवर लगभग 25 लाख रुपए है. वह अपने गांव और आसपास के क्षेत्र में 25 से 30 लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार देती हैं. उन का यह मौडल “गांव में रहो, गांव को समृद्ध करो” – आज अन्य युवाओं के लिए उदाहरण बन चुका है.

उनका मानना है कि “अगर सही मार्गदर्शन और ईमानदारी से मेहनत की जाए तो खेती भी करोड़ों का व्यवसाय बन सकता है.”

भविष्य की योजनाएं

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) अब खेती को और बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रही हैं. उन की योजनाएं हैं:

– औनलाइन ब्रांड बनाना – “Shubhavari Organic”

– डेयरी यूनिट का विस्तार

– फार्म टूरिज्म की शुरुआत – जहां लोग जैविक खेती, पशुपालन, घी निर्माण की प्रक्रिया को सीधे देख सकें.

– ग्राम महिला स्वावलंबन केंद्र – महिलाओं को स्वरोजगार और प्रशिक्षण देने हेतु.

शुभावरी चौहान (Shubhavari Chauhan) की कहानी आज के युवाओं, विशेष रूप से लड़कियों के लिए एक प्रेरणा है. जहां अधिकांश युवा शहरी जीवन और नौकरी की ओर भागते हैं, वहीं शुभावरी चौहान ने गांव में रह कर ही अपनी पहचान बनाई है. उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि यदि लगन और सच्ची मेहनत हो, तो खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि सम्मान और समृद्धि का मार्ग बन सकती है.

उन की यात्रा भारत की नई कृषि क्रांति का उदाहरण है जो ज्ञान, परंपरा, नवाचार और स्वदेशी सोच से प्रेरित है. शुभावरी चौहान न केवल एक किसान हैं, बल्कि एक आंदोलन की शुरुआत हैं.

Crop Diversification : फसल विविधीकरण खेती से ज्यादा मुनाफा

Crop Diversification : आज कल दिनोदिन खेती के तौरतरीकों में बदलाव आ रहा है. किसान कम समय में अधिक मुनाफा लेना चाहते हैं. फसल विविधीकरण ऐसी ही एक तकनीक है जो कम समय में अधिक मुनाफा दे सकती है. इन दिनों किसान परंपरागत खेती से अलग फसल विविधीकरण खेती की ओर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं. विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसान फसल विविधीकरण खेती को अपना कर अपनी आय बढ़ा सकते हैं.

अब फसल विविधीकरण के फायदों को देखते हुए सरकार भी 2 हेक्टेयर या उस से कम जमीन वाले छोटे किसानों को इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है. ताकि, कम रकबे वाले किसान भी कम जमीन में ही अलगअलग फसल लगा कर अधिक पैदावार ले कर अपनी आमदनी बढ़ा सकें.

क्या है फसल विविधीकरण?

फसल विविधीकरण खेती की एक ऐसी तकनीक है, जिस में विभिन्न तरह की फसल अथवा एक ही फसल की अनेक किस्में लगा कर खेती की जाती है. इस पद्धति में किसान कुछ अंतराल के बाद एक फसल को किसी अन्य फसल से बदल कर फसल विविधता के चक्र को बनाए रखने का काम करते हैं. सरल शब्दों में कहा जाए तो खेती की इस खास विधि से किसान एक ही खेत में अलगअलग फसलों की खेती कर सकते हैं.

फसल विविधीकरण से बढ़ेगी आमदनी

एक ही खेत में एक साथ कई फसलों को बोने से पानी, श्रम और पैसों की बचत तो होती ही है. साथ ही, एक ही खेत में कम जगह में ही अलगअलग फसलों से अच्छी पैदावार भी मिल जाती है.

फसल विविधीकरण से बढ़ती है मिट्टी की उर्वरता क्षमता

फसल विविधीकरण तकनीक से खेती करना किसानों के लिए मुनाफे का सौदा है. क्योंकि, यह तकनीक मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी कारगर है. एक ही खेत में लगातार हर साल एक ही फसल बोने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है. इसलिए फसल बदलबदल कर खेती करने से मिट्टी के उपजाऊपन में सुधार होता है. ऐसे में मिट्टी की सेहत को सुधारने के लिए फसल विविधीकरण अपना कर कम लागत में अधिक उत्पादन लिया जा सकता है. अगर मिट्टी की सेहत सुधरती है, तो इस से खेत जल्दी बंजर नहीं होंगे और उस भूमि पर लंबे समय तक खेती की जा सकेगी और फसल से पैदावार भी अधिक मिलेगी.

इस के साथ ही, फसल विविधीकरण खेती से पर्यावरण में सुधार के साथ पानी की भी बचत होती है. इसलिए कम जोत वाले किसानों के लिए यह एक मुनाफा देने वाली तकनीक है और किसान कम जगह में भी अच्छा मुनाफा ले सकते हैं.

Crop Management : फसल विविधीकरण खेती में फसल प्रबंधन?

Crop Management: फसल विविधीकरण से खेती करना, परंपरागत खेती करने की अपेक्षा बेहतर कृषि प्रणाली साबित हो रही है. आज बहुत से किसान इस तकनीक को अपना कर अच्छा मुनाफा ले रहे हैं. फसल विविधीकरण खेती में मौसमी सब्जियों की खेती करना ज्यादा मुनाफे का सौदा है.

लेकिन मौसमी सब्जियों की खेती करते समय कई बार फसल में कीट और बीमारी की वजह से फसल खराब भी हो जाती है. जिस से फसल पैदावार पर असर पड़ता है और किसानों को उपज की गुणवत्ता अच्छी नहीं होने पर उस के दाम भी कम मिलते हैं .

कुछ ऐसे तौरतरीके हैं जिन्हें अपना कर किसान अपने नुकसान को कम कर सकते हैं:

– अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुसार फसलों का चयन करें.

– फसलों की उन्नत किस्मों का चयन करें और प्रमाणित सैंटर से ही बीज खरीदें.

– समय पर खेत की मिट्टी की जांच कराएं और जांच की गुणवत्ता के आधार पर फसलों का चयन करें.

– फसल विविधीकरण खेती करते समय ये जरूर ध्यान रखें कि एक फसल की समस्या साथ वाले खेत या फसल तक ना पहुंचे. इस के लिए खेती करते समय मेड़ या फेंसिंग के जरीए अलगअलग फसलों के बीच में विभाजन कर सकते हैं. ऐसा करने से एक फसल की समस्या हवा या पानी के जरीए दूसरी फसलों तक नहीं पहुंच पाएगी.

– फसल विविधीकरण विधि से खेती कर अधिक मुनाफा कमाने के लिए किसान कम मूल्य की अपेक्षा अधिक मूल्य वाली फसलों जैसे सब्जियां, फल, फूलों आदि की खेती कर अधिक मुनाफा ले सकते हैं.

इस के तहत किसान अधिक पानी वाली फसलों के स्थान पर कम पानी वाली फसलों की खास किस्मों को लगाएं. इस के अलावा फसल विविधीकरण तकनीक अपनाते समय किसान समयसमय पर कृषि वैज्ञानिकों से सलाह जरूर लेते रहें. जिस से फसल में कोई भी समस्या आने पर उस का समाधान समय रहते किया जा सके.

Aquaponics : खेती का भविष्य है ‘एक्वापौनिक्स’ तकनीक

Aquaponics : हमारे देश की 60 फीसदी आबादी का हिस्सा किसी न किसी रूप से खेती से जुड़ा है. यही वजह है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है. अगर हम इस क्षेत्र में दूर तक नजर दौड़ाएं तो खेती में नवाचार की खासी कमी है. आज भी अनेक किसान पारंपरिक तरीके से खेती कर रहे हैं. खेती में हमें आज बहुतकुछ नए प्रयोग करने की जरूरत है. इन्हें इस्तेमाल कर के अच्छी पैदावार ली जा सकती है.

ऐसी ही एक आधुनिक तकनीक है एक्वापौनिक्स (Aquaponics). इस तकनीक में मछलियां और पौधे आपस में एकदूसरे की मदद करते हैं यानी इस सिस्टम का इस्तेमाल कर मछलियों को सब्जियों के उत्पादन के एक्वाकल्चर और हाइड्रोपौनिक्स (पानी में पौधे उगाना) सिस्टम का एकसाथ इस्तेमाल किया जाता है. इस तकनीक को हम कम जगह में भी अपना सकते हैं. इस में मिट्टी या जमीन की जरूरत नहीं होती है.

Aquaponics

एक्वापौनिक्स (Aquaponics) की शुरुआत शायद एशिया से हुई. यहां के किसानों ने देखा कि ज्यादा बरसात या बाढ़ आने के बाद खेतों में पानी भर जाता है जिस में मछलियां भी होती हैं. उन खेतों में उगाई गई धान की फसलों से अच्छी पैदावार मिलती है. मछलियों से निकलने वाली गंदगी धान या दूसरी फसल के लिए पोषक तत्त्वों का काम करती है.

अगर आसान तरीके से बताया जाए तो जिस पानी का इस्तेमाल इस तकनीक में किया जाता है उस पानी में मछली छोड़ दी जाती हैं, जो उस पानी में रह कर अपना मल वगैरह छोड़ती हैं, वही पानी पौधों के लिए जैविक उर्वरक का काम करता है. इस के उलट हाइड्रोपौनिक्स सिस्टम में हमें पानी में जैविक उर्वरक के रूप में कुछ रसायन डालने होते हैं.

Aquaponics

इसी तकनीक को आज विकसित कर एक्वापौनिक्स (Aquaponics) सिस्टम का नाम दिया है. पारंपरिक खेती, एक्वाकल्चर या हाइड्रोपौनिक्स की तुलना में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) तकनीक के कई फायदे हैं.

इस तकनीक में पौधे पानी से अमोनिया और नाइट्रोजन लेते हैं जिस से मछलियां शुद्ध और आक्सिजनयुक्त बेहतर माहौल में पलतीबढ़ती हैं.

माहिरों का मानना है कि जमीन में खेती करने की तुलना में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) सिस्टम के तहत सलाद और सब्जियां, जिस में टमाटर, बैगन, शलगम वगैरह पैदा की जा सकती हैं. इस तरह के पौधों में पानी की बहुत ही कम जरूरत होती है. साथ ही, इस सिस्टम के लिए ऊर्जा भी कम लगती है.

Aquaponicsआने वाले समय में इस तकनीक को इस्तेमाल किया जाएगा तो इस से मछलियों के साथसाथ रसायनमुक्त सब्जियां भी मिलेंगी.

दुनियाभर में प्राकृतिक रूप से मछलियों का उत्पादन घटा है और अब माहिर भी मछली उत्पादन के लिए नए समाधान तलाश रहे हैं. फार्म में मछलीपालन करने वालों के लिए भी एक्वापौनिक्स (Aquaponics) सिस्टम बेहतर विकल्प साबित हो सकता है.

इस बारे में हमारी बात अनुभव दास से हुई. वे एक्वापौनिक्स (Aquaponics) के क्षेत्र में काम कर रही कंपनी ‘रैड ओटर फार्म्स’ के संस्थापक हैं. उन का कहना है कि पैदावार के मामले में हम दुनियाभर में कुछ उत्पादों में ऊंचाई पर हो सकते हैं, लेकिन हमारी फसल पैदावार प्रति हेक्टेयर के हिसाब से कम है. पिछले 5 सालों में हमारे कृषि उत्पादन की वृद्धि दर 0.2 फीसदी से 4.2 फीसदी के आसपास रही है.

टमाटर का उदाहरण लें. साल 2017 में भारत चीन के बाद दुनिया में सब से ज्यादा टमाटर पैदा करने वाला देश था. चीन ने तकरीबन 110,000 हेक्टेयर जमीन पर 56.8 मिलियन टन टमाटर का उत्पादन किया, वहीं भारत ने तकरीबन 10 फीसदी कम जमीन पर 18.7 मिलियन टन का उत्पादन किया. टमाटर की यह प्रति हेक्टेयर उत्पादकता अतुलनीय है.

उन्होंने आगे बताया कि आज बड़े पैमाने पर सरकार द्वारा खेती से जुड़े कामों के लिए मदद भी की जाती है. इस के बाद भी भारत का कृषि उत्पादन कमजोर है. तो क्या आने वाले कृषि उत्पादन बढ़ती आबादी की मांगों को पूरा करेगा  क्या हमारे खेत की पैदावार और उस की क्वालिटी बेहतर होगी जो स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी है? क्या खेती कभी मौडर्न होगी? वगैरह.

इस पर अनुभव दास ने कहा कि आने वाले कल को बेहतर बना सकें, इस के लिए हमें कृषि क्षेत्र की मौडर्न तकनीकों की तरफ जाना होगा. बदलाव बहुत जरूरी है. एक बेहतर राष्ट्र के लिए खेती के विकास पर ध्यान देना ही होगा. दिनोंदिन हमारी खेत की जोत घट रही है जबकि आबादी बढ़ रही है. हमारे 65 फीसदी खेत फसल विकास के लिए मानूसन पर निर्भर हैं. इसलिए अगर हम प्रकृति के भरोसे रहे तो हम प्रगति की राह नहीं चल सकते. सामाजिक नवाचारकों के रूप में हम एक बदलाव लाना चाहते थे. हमें कृषि के क्षेत्र में एक अलग और नई सोच पैदा करने की जरूरत है. मानसून के भरोसे रह कर खेती नहीं की जा सकती. इस के अलावा हमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल को भी कम करने की जरूरत है.

Aquaponics

हमारा मानना है कि एक्वापौनिक्स (Aquaponics) हमें यह यह मौका देता है. इसे हमें अपनाना चाहिए. एक्वापौनिक्स चक्र पारंपरिक मिट्टी आधारित कृषि की तुलना में 90 फीसदी से ज्यादा बढ़ने वाली फसलों के लिए पानी की जरूरत को कम करता है.

एक्वापौनिक्स (Aquaponics) तकनीक खेती की जमीन पर निर्भर नहीं है. यह बिना मिट्टी के होने वाली इस तकनीक को दुर्गम इलाकों, यहां तक कि शहरी जगहों में ले जाया जा सकता है. इस से बड़ी मात्रा में पानी की बचत होती है और खेती की पैदावार रासायनिक मुक्त होती है. पारंपरिक खेती के मुकाबले पैदावार भी 10-12 गुना ज्यादा है और क्वालिटी बेहतर है. एक लाइन में अगर कहा जाए तो एक्वापौनिक्स जिम्मेदार और टिकाऊ कृषि प्रणाली है और आने वाले समय में यह खेती का भविष्य है.

इंटरनैशनल लैवल पर एक्वापौनिक्स (Aquaponics) ने खेती के विकल्प के रूप में अच्छा कदम बढ़ाया है. खासतौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका और आस्ट्रेलिया में. भारत में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) अभी शुरुआती दौर में है. लेकिन अगर हम मिल कर कदम बढ़ाएंगे तो आने वाले समय में एक्वापौनिक्स (Aquaponics) एक प्रभावी तकनीक साबित होगी और अपनेआप में कृषि क्षेत्र में एक लीडर का काम करेगी.

किसानों की तकदीर बदलने में लगे हामिद को मिले कई सम्मान

बिहार में औषधीय व सुगंधित पौधों की खेती की ओर किसानों का झुकाव ज्यादा हुआ है, जिस का मुख्य कारण है लागत कम और मुनाफा ज्यादा. हालांकि राज्य स्तर पर इन पौधों या इन के बीजों के साथ इन की खेती से होने वाले उत्पादन की खरीदबिक्री की सुविधा न के बराबर ही है, पर किसानों में कुछ कर गुजरने की ललक ने उन्हें इन की खेती की जानकारी व इन के उत्पादों की बिक्री के लिए दूसरे प्रदेशों तक पहुंचा दिया. इसी का नतीजा है कि अब राज्य के प्रगतिशील किसान नई ऊंचाइयां छूने की ओर बढ़ रहे हैं.

परंपरागत खेती जैसे दलहन, तिलहन, धान व गेहूं आदि से इतनी कम आय होती है कि किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा बन कर रह गई है. परंतु कुछ प्रयोगधर्मी किसान हैं, जो खेती में नफानुकसान की ज्यादा चिंता न कर के नित नए प्रयोग करते रहते हैं. इन्हीं में से एक किसान हैं राज्य के सीवान जिले के हसनपुर प्रखंड के लहेजी गांव निवासी मोहम्द हामिद खां. वे जिला व राज्य स्तरीय कई पुरस्कार हासिल कर चुके हैं. हामिद का कहना है कि किसान वैसी खेती करना चाहते हैं, जिस में समय कम व मुनाफा अधिक हो. जिले के अधिकतर किसान मेंथा, घृतकुमारी, पोपुलर व पेपट्रा की खेती कर रहे हैं. इन का बाजार देश के अलावा विदेशों में भी है. कीमत भी अच्छी मिल जाती है. पेपट्रा 1500 रुपए प्रति किलोग्राम और मेंथा 900 रुपए प्रति किलोग्राम बिकता है, इसलिए किसान इन की खेती ज्यादा कर के मुनाफा कर रहे हैं.

किसानों को कम लागत  में हो रही लाखों की आय : आज से करीब 3 साल पहले खस की खेती की शुरुआत करने वाले हामिद खां सीवान, छपरा व गोपालगंज आदि जिलों के दर्जनों किसानों को प्रशिक्षण दे कर खस के अलावा मेंथा, पेपट्रा, घृतकुमारी व पोपुलर की खेती करा रहे हैं, जिस से इन किसानों के जीवन की तसवीर बदल गई है. इन की खेती से किसानों को कम लागत में हर साल लाखों रुपए की आय हो रही है.

खस, सतावर, कालमेघ, मेंथा, पामारोजा, सेट्रोनेला, लेमनग्रास, आर्टीमीसिया व कोलियस आदि की खेती से किसानों में कामयाबी की उम्मीद जगी है. बिहार के सीवान, छपरा व गोपालगंज जिलों में अभी लगभग 10 एकड़ में खस की खेती कर के तेल का उत्पादन किया जा रहा है. यह फसल 1 साल में तैयार हो जाती है. यदि अच्छी फसल हुई तो प्रति कट्ठा (1350 वर्ग फुट) 400 से 700 ग्राम तक तेल निकलता है, जिस की कीमत 15000 से 18000 रुपए प्रति लीटर होती है. फरवरी में इस फसल की खुदाई कर के आसवन विधि द्वारा तेल निकाला जाता है. इस मौसम में तेल की मात्रा ज्यादा मिलती है. जड़ निकाल कर बचे हुए पौधों को फिर से नई फसल के लिए खेत में लगाया जा सकता है.

इत्र बनाने वाली कंपनियां खरीदार : खस की खेती करने वाले ऐसे किसान जिन  के पास तेल निकालने का साधन नहीं है, उन के द्वारा उत्पादित जड़ें मोहम्द हामिद लगभग 6000 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीदने के साथ ही 1000 से ले कर, 1500 रुपए प्रति कट्ठे की दर से खेत में लगी फसल खरीदने के बाद जड़ों की खुदाई कर के खुद तेल निकालते हैं. इस का तेल लखनऊ व बाराबंकी आदि स्थानों पर इत्र बनाने वाली कंपनियां और व्यापारी 10000 से 12000 रुपए प्रति लीटर खरीद कर ले जाते हैं.

हामिद सीमैप लखनऊ से 2 रुपए प्रति पौधे की दर से पौधे ला कर नर्सरी तैयार करने के बाद 1 रुपए प्रति पौधे की दर से किसानों को बेचते हैं. वैसे तो इस की रोपाई पूरे साल की जा सकती है, परंतु दिसंबर से मार्च तक का समय इस की रोपाई के लिए ज्यादा अच्छा होता है. इस की खेती 6 महीने तक जलजमाव वाले खेत में भी की जा सकती है. कई विशेषज्ञों का ऐसा भी मानना है कि खस के पौधे यदि 2-3 महीने तक पानी में पूरी तरह से डूबे रह जाते हैं, तब भी इस की फसल पर कोई खराब असर नहीं पड़ता है.

जुलाई में रोपाई

सीमैप लखनऊ के वैज्ञानिक वीरेंद्र कुमार सिंह तोमर का कहना है कि राज्य की मिट्टी, विशेष रूप से दियारा की मिट्टी के लिए यह फसल ज्यादा लाभकारी है.

जलजमाव वाली जमीन में फरवरी व मार्च और सामान्य जमीन में जुलाई में बारिश होने पर खस की रोपाई कर के अच्छी फसल तैयार की जा सकती है. यदि खस की नर्सरी तैयार करनी हो तो फरवरी या मार्च में पौधे लगाने के 1 महीने बाद डीएपी खाद की एक सीमति मात्रा डाल कर नर्सरी की गुड़ाई व सिंचाई के साथ 3 महीने में 1 पौधे में 18 से 20 कल्ले तक निकल आते हैं, जिन्हें बाद में दूसरे खेतों में फसल के रूप में लगाया जाना चाहिए. राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा, समस्तीपुर के वैज्ञानिक डा. हांडू का कहना है कि बिहार की मिट्टी व जलवायु खस की खेती के लिए सही है. यहां के किसान इस की खेती कर के अपनी माली हालत सुधार सकते हैं. साथ ही उन का यह भी मानना है कि खस की खेती पर बाढ़ व सूखे का ज्यादा असर नहीं होता है. इस की खेती बंजर जमीन में भी की जा सकती है. पशु इस के कड़े डंठलों को नहीं खाते हैं, इसलिए इस की फसल की ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती है.

वैज्ञानिकों का मिलता रहा सहयोग : अपनी इस सफलता का श्रेय सीमैप लखनऊ के वैज्ञानिक डा. कलीम अहमद, वैज्ञानिक वीरेंद्र कुमार सिंह तोमर व डा. एचपी सिंह आदि को देते हुए हामिद कहते हैं कि यदि आज के प्रगतिशील किसान वैज्ञानिकों के सहयोग व अपनी सूझबूझ के साथ औषधीय खेती करें, तो अच्छी कमाई कर सकते हैं.

प्रति एकड़ 40000 रुपए की आय : हामिद खां ने बताया कि खस, पोपुलर, घृतकुमारी, मेंथा व पेपट्रा की औषधीय खेती से 1 साल में प्रति एकड़ तकरीबन 40000 रुपए की आमदनी होती है. किसान यदि फरवरी में खस को काट कर मेंथा की सह फसल लेते हैं, तो प्रति एकड़ 15000 से 20000 रुपए की अलग से आमदनी की जा सकती है.

प्रयोग के तौर पर हामिद पापुलर के साथ पामारोजा, सेट्रोनेला व खस की खेती कर रहे हैं.

हामिद द्वारा 4 एकड़ में 6 से 14 फुट की दूरी पर पापुलर लगाया गया है, जिस के बीच में सह फसल ली जाती है. उन का मानना है कि पापुलर के 400 पौधे प्रति एकड़ लगा कर 7 सालों में 3000 रुपए प्रति पेड़ की दर से लाखों रुपए की आय हासिल की जा सकती है.

खस के पौधों में दीमक लगती है, जिस से बचाव के लिए ट्राइसेल 20 ईसी 200 ग्राम प्रति एकड़ डाल कर खेत की अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए. खस के पौधे से पौधे की दूरी डेढ़ फुट व लाइन से लाइन की दूरी 2 फुट की होनी चाहिए.

केंद्रीय औषिध एवं सगंध पौधा संस्थान, लखनऊ द्वारा आयोजित औषधीय एवं सुगंध पौधों के उत्पादन हेतु उन्नत प्रौद्योगिकी पर प्रशिक्षण कार्यक्रम लहेली गांव में किया गया था, जिस से यहां के किसानों को काफी जानकारी मिली.

हामिद द्वारा ढाई लाख की लागत से स्टील डिस्टलेशन प्लांट भी लगाया गया है. 1 टन की कूवत वाले इस प्लांट में 8 क्विंटल खस की जड़ें भर कर 72 घंटे में तेल निकाला जाता है. इसी प्लांट से लेमनग्रास, पामारोजा, सिट्रोनेला व मेंथा का भी तेल निकाला जाता है.

खेती में पशुपालन फायदेमंद, गौ संरक्षण भी जरूरी

उदयपुर : रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से जमीन की सेहत और पौलीथिन व अन्य डिस्पोजेबल के इस्तेमाल से गायों की सेहत इतनी बिगड़ चुकी है कि वह एक दिन स्वच्छ दूध देना भी बंद कर देंगी. ये बात स्कूल शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने कही.

मंत्री मदन दिलावर राजस्थान कृषि महाविद्यालय के नूतन सभागार में ’कृषि दक्षता और पशु कल्याण को सुदृढ़ बनाने की दिशा में सटीक पशुधन प्रबंधन तकनीक’ विषयक तीनदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे.

सम्मेलन में देशभर के 29 प्रांतों के लगभग 400 वैज्ञानिक, पशुधन के जानकार व किसानों ने भाग लिया. उन्होंने गिर, साहीवाल, थारपारकर गायों का जिक्र करते हुए कहा कि जिन का कंधा ऊंचा हो, सही मायने में उन्हीं गायों का दूध लाभप्रद है.

उन्होंने विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि वे इस रणनीति पर काम करें कि हमारी पारंपरिक देसी गायों का संरक्षण किया जा सके. पुराने समय से हमारे पूर्वजों ने खेती करना शुरू किया होगा तो कितने संकट आए होंगे. खुदाई कर मिट्टी तैयार करना, खेत का आकार देना. तब खेती में बैलों का ही इस्तेमाल होता था. हल के माध्यम से खेतीकिसानी का काम होता था. आज के तकनीकी दौर में मशीनीकरण का बोलबाला है. हमें बैलों की महत्ता को भी नहीं भूलना चाहिए.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि उन के दो वर्ष तीन माह के कार्यकाल में एमपीयूएटी ने 44 पेटेंट हासिल किए. इस तरह कुल 55 पेटेंट विश्वविद्यालय के नाम हैं.

उन्होंने विश्वविद्यालय के पशुधन वैज्ञानिकों आह्वान किया कि मंत्री मदन दिलावर की मंशा के अनुसार अपनी गायों की ब्रीड को संरक्षित करने की दिशा में सारगर्भित शोध करने की जरूरत है. देश को ऐसी कृषि प्रणाली की जरूरत है, जो न केवल पशु हितैषी हो, बल्कि वातावरण और पर्यावरण को बचाने वाली भी हो. 21वीं पशुगणना के परिणाम भी इस में मददगार साबित होंगे.

विशिष्ट अतिथि अमूल आणंद (गुजरात) के महाप्रबंधक डा. अमित व्यास ने कहा कि विश्व में 240 मीट्रिक टन दूध उत्पादन में हमारे देश की भागीदारी 23 फीसदी है. देश में सर्वाधिक दूध उत्पादन में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान राजस्थान का है.

डा. अमित व्यास ने कहा कि गाय का दूध कैसे बढ़े और खर्च कम कैसे हो. इस पर अमूल बड़े पैमाने पर काम कर रहा है और सफलता भी मिली है. अमूल प्रतिष्ठान में 400 पशु चिकित्सकों की टीम में नित्य गायों की देखभाल में लगी है और लक्षण दिखाई देते ही इलाज आरंभ कर दिया जाता है. खास बात यह है कि आयुर्वेदिक व होमियोपैथिक दवाओं से गायों का इलाज किया जा रहा है. ऐसी तकनीक किसानों तक भी पहुंचनी चाहिए. साथ ही, अमूल बायोगैस, गायों की खुराक, कृत्रिम गर्माधान, ड्रोन तकनीक पर भी लगातार काम कर रहा है.

कार्यक्रम में राज्यसभा चुन्नी लाल गरासिया, एमबीएस विश्वविद्यालय जोधपुर के कुलपति डा. अजय शर्मा, भारतीय पशु उत्पादन एवं प्रबंधन सोसायटी सरदार कृषि नगर दांतीवाड़ा (गुजरात) के अध्यक्ष डा. एपी चौधरी ने भी संबोधित किया.

आयोजन सचिव सिद्धार्थ मिश्रा ने बताया कि राजस्थान कृषि महाविद्यालय के पशु उत्पादन विभाग और भारतीय पशु उत्पादन एवं प्रबंधन सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीनदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में कुल 7 तकनीकी सत्रों में वैज्ञानिकों ने उपरोक्त विषय पर गहन मंथन किया. आरंभ में सम्मेलन समन्वयक डा. जेएल चौधरी ने स्वागत भाषण दिया. संचालन डा. गायत्री तिवारी ने किया.

लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड व सम्मान

समारोह में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड तमिलनाडु के डा. त्यागराज शिवकुमार को दिया गया, जबकि पशु उत्पादन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर डा. बालूस्वामी (तमिलनाडु), डा. बीएस खद्दा (मोहली), डा. बी. सतीशचंद्र (कर्नाटक), डा. बी. रमेश (तमिलनाडु) को शील्ड व सम्मानपत्र दे कर सम्मानित किया गया. साथ ही, इफको के प्रबंधक सुधीर मान व शिक्षा मंत्री के विशेषाधिकारी डा. सुनील दाधीच को भी स्मृति चिन्ह दे कर सम्मानित किया गया.

गाय का दूध पिलाओ – बच्चा चंचल व तेज दिमाग का होगा
‘पाडा तो पाडा ही रहेगा’

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कहा कि गाय का दूध पीने वाला बच्चा सदैव चंचल, तेज दिमाग वाला होता है, जबकि भैंस का दूध पीने वाला बच्चा ऊंगणिया (आलसी) होता है. गाय के बछड़े को छोड़ते ही वह उछलताकूदता सीधे अपनी मां के पास पंहुच जाता है.

उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि गाय का बछड़ा थोड़ा बड़ा होने पर केरड़ा, नारकिया और अंत में बैल बनता है, जबकि भैंस का बच्चा जन्म से अंत तक पाडा ही रहता है.

कृषि दक्षता व पशु कल्याण विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में मंत्री मदन दिलावर ने स्पष्ट किया कि हर पशु का अपना महत्व है. यदि चेतक घोड़ा नहीं होता तो महाराणा प्रताप का नाम इतना आगे नहीं होता.

उन्होंने आगे कहा कि ऊंट को राज्य पशु का दर्जा दिया गया है. यह प्रजाति भी विलुप्त होने के कगार पर है. वैज्ञानिकों को इसे बचाने के उपाय ईजाद करने होंगे. सीमा सुरक्षा मामले में भी ऊंट की अपनी अहमियत है. ‘रेगिस्तान के जहाज’ के नाम से परिचित ऊंट बीएसएफ के लिए वरदान है, जो बिना पानी पीए 8-10 दिन निकाल लेता है. लेकिन गाय की अपनी विशेष महत्ता है. गाय का गोबर व मूत्र से कई बीमारियां स्वतः भाग जाती हैं. कोई भी पवित्र कार्य करने से पूर्व गोबर से लिपाई का चलन है, ताकि शुद्धता बरकरार रहे.

उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान में कितना भी संकट आए, यहां का किसान आत्महत्या नहीं करता है. अकेली गाय ही अपने दूध से किसान का पेट भर सकती है. हमें दूध, पनीर, मिठाई, चाय तो भाती है, लेकिन गाय नहीं सुहाती. इसलिए हम ने उसे निकाल दिया और वह सड़कों पर, खेतों में या फिर बूचड़खाने ही उन के लिए बचे हैं.

Crop diversification: फूलों और मशरूम की खेती से बढ़ेगी आय

उदयपुर: तुरगढ़ गांव, झाड़ोल तहसील, उदयपुर में महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशालय के अंतर्गत फसल विविधीकरण (Crop diversification) परियोजना के तहत दोदिवसीय किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन हुआ. इस कार्यक्रम का उद्देश्य फसल विविधीकरण (Crop diversification)  को प्रोत्साहित करते हुए किसानों की आय और कृषि स्थिरता को बढ़ाना था.

कार्यक्रम के शुरू में परियोजना अधिकारी डा. हरि सिंह ने फसल विविधीकरण (Crop diversification) की परिभाषा और इस की आवश्यकता व आर्थिक महत्व पर चर्चा की. उन्होंने बताया कि पारंपरिक फसलों के साथ अन्य फसलों को अपनाने से न केवल मुनाफा बढ़ता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और जल संरक्षण भी होता है.

एकल फसल प्रणाली के विपरीत विविध फसलें बाजार के उतारचढ़ाव और मूल्य अस्थिरता से सुरक्षा प्रदान करती हैं. इस के अलावा डा. हरि सिंह ने किसानो को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, ई-नाम व न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी केंद्र द्वारा चलाई जा रही परियोजनाओं की जानकारी प्रदान की.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. लक्ष्मी नारायण महावर ने कहा कि फसल विविधीकरण (Crop diversification) दक्षिणी राजस्थान के किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव ले कर आया है. उन्होंने दक्षिण राजस्थान में फूलों की खेती के महत्व के बारे में बताया कि यहां की जलवायु फूलों की खेती के लिए अनुकूल है, जिस से किसानों को पारंपरिक खेती की तुलना में अधिक लाभ मिल सकता है.

वहीँ प्रोफैसर नारायण लाल मीना ने मशरूम की खेती पर ध्यान केंद्रित करते हुए इस के आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी लाभों के बारे में बताया और यह भी बताया कि किस प्रकार हम कम निवेश में अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं. साथ ही, उन्होंने मशरूम पाउडर के पोषण मूल्य और बाजार मूल्य के बारे में भी बताया.

Crop diversification

प्रशिक्षण के दौरान मदन लाल मरमट, नारायण सिंह झाला और नरेंद्र यादव ने किसानों के साथ सूखे और एकल फसल से होने वाले नुकसान और उन की चुनौतियों पर चर्चा की और बताया कि कैसे हम फसल विविधीकरण (Crop diversification) के माध्यम से ऐसी समस्याओं पर काबू पा सकते हैं, जिस से कृषि स्थिरता और किसानों की आय में वृद्धि होगी.

कार्यक्रम के अंत में परियोजना अधिकारी डा. हरि सिंह ने खरीफ और रबी फसलों की उन्नत किस्मों की विस्तृत जानकारी दी. उन्होंने किसानों को बताया कि उन्नत किस्में न केवल अधिक उत्पादकता देती हैं, बल्कि कीट और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी रखती हैं.

उन्होंने आगे कहा कि फसलों की उन्नत किस्मों का चयन और सही समय पर बोआई किसानों की उत्पादकता में वृद्धि कर सकता है. साथ ही, संतुलित उर्वरक और सिंचाई प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है. उन्होंने खेती के नवीनतम तरीकों जैसे बीजोपचार, समय पर खरपतवार नियंत्रण और फसल चक्र अपनाने पर जोर दिया.

इस कार्यक्रम में 40 से अधिक किसानों ने भाग लिया और प्रशिक्षण को काफी लाभदायक बताया. प्रतिभागियों ने इस जानकारी को अपने खेतों में लागू करने का संकल्प लिया, ताकि फसल विविधीकरण (Crop diversification) के माध्यम से उन की कृषि आय और स्थिरता में सुधार हो सके.

Natural farming : प्रकृति के साथ तालमेल ही प्राकृतिक खेती

उदयपुर : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के तत्वावधान में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित जैविक खेती (Natural farming) पर अग्रिम संकाय प्रशिक्षण केंद्र के अंतर्गत 21 दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘‘प्रकृति के साथ सामंजस्यः प्राकृतिक खेती में अनुसंधान और नवाचार’’ पर अनुसंधान निदेशालय, उदयपुर में पूर्व कुलपति डा. उमाशंकर शर्मा की अध्यक्षता में 19 फरवरी, 2025 को शुभारंभ हुआ.

इस अवसर पर पूर्व कुलपति डा. उमाशंकर शर्मा ने कहा कि प्राकृतिक खेती ही पर्यावरण के लिए अनुकूल है. प्राकृतिक खेती (Natural farming) द्वारा पर्यावरण को दूषित होने से बचाने के साथसाथ मृदा स्वास्थ्य यानी मिट्टी की सेहत में भी बढ़ोतरी होगी. प्राकृतिक खेती (Natural farming) में प्रयोग कर रहे घटकों से मिट्टी में लाभदायक जीवाणुओं की बढ़ोतरी होगी, जिस से फसलों के उत्पादन में स्थायित्व आएगा.

Natural farmingडा. उमाशंकर शर्मा ने सभी प्रतिभागियों को 21 दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान सभी वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि अपनेअपने क्षेत्र में जा कर ब्रांड अंबेसडर की भूमिका निभाएं. इस प्रशिक्षण में 5 राज्यों के 26 वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया. डा. एसके शर्मा, सहायक महानिदेशक, मानव संसाधन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने बताया कि प्राकृतिक कृषि (Natural farming) एक तकनीक ही नहीं, अपितु पारिस्थितिकी दृष्टिकोण है, जिस के द्वारा प्रकृति के साथ तालमेल बिठाया जाता है.

डा. उमाशंकर शर्मा ने 5 राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे प्राकृतिक कृषि पर प्रशिक्षण ले रहे वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कहा कि ज्ञान की सघनता एवं प्रशिक्षणों से दक्षता में वृद्धि द्वारा इस कृषि को बढ़ावा दिया जा सकता है. साथ ही, उन्होंने प्राकृतिक खेती (Natural farming) के घटक जीवामृत, बीजामृत, धनजीवामृत, आच्छादन एवं वाष्प के साथ जैविक कीटनाशियों पर जोर  दिया.

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि डा. एसके शर्मा ने कहा कि प्राकृतिक खेती (Natural farming) के महत्व को देखते हुए स्नातक छात्रों के लिए विशेष पाठ्यक्रम पूरे देश में शुरू किया जा रहा है. इस के लिए सभी विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों, शिक्षकों, विषय विशेषज्ञों एवं विद्यार्थियों के लिए प्रशिक्षण आयोजित किए जा रहे हैं.

उन्होंने आगे बताया कि महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय का प्राकृतिक खेती में वृहद अनुसंधान कार्य एवं अनुभव होने के कारण यह विशेष दायित्व विश्वविद्यालय को दिया गया है. प्राकृतिक खेती (Natural farming) के विषय में पूरे विश्व की दृष्टि भारत की ओर है. ऐसे में पूरे विश्व भर से वैज्ञानिक एवं शिक्षक प्रशिक्षण लेने के लिए भारत आ रहे हैं. ऐसे में हमारा नैतिक दायित्व बनता है कि हम उत्कृष्ट श्रेणी के प्रशिक्षण आयोजित करें.

Natural farming

डा. अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान एवं कोर्स डायरेक्टर ने अतिथियों का स्वागत किया एवं प्रशिक्षणार्थियों को दिए गए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के बारे में विस्तृत रूप से बताया. डा. अरविंद वर्मा ने बताया कि पूरे प्रशिक्षण में 49 सैद्धांतिक व्याख्यान, 9 प्रयोग प्रशिक्षण एवं 4 प्रशिक्षण भ्रमणों द्वारा प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया गया.

उन्होंने प्राकृतिक खेती पर सुदृढ़ साहित्य विकसित करने की आवश्यकता बताई. साथ ही, इस ट्रेनिंग के रिकौर्ड वीडियो यूट्यूब व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से प्रसारित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया, जिस से कि वैज्ञानिक समुदाय एवं जनसामान्य में प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूकता बढ़े एवं इस की जानकारी सुलभ हो सके.

कार्यक्रम में डा. आरएल सोनी, निदेशक, प्रसार शिक्षा निदेशालय, डा. सुनील जोशी, निदेशक, डीपीएम एवं अधिष्ठाता सीटीएआई, डा. मनोज महला, छात्र कल्याण अधिकारी, डा. अमित त्रिवेदी, क्षेत्रीय निदेशक अनुसंधान, उदयपुर, डा. रविकांत शर्मा, सहनिदेशक अनुसंधान एवं डा. एससी मीणा, आहरण वितरण अधिकारी एवं राजस्थान कृषि महाविद्यालय के सभी विभागाध्यक्ष और  तमाम वैज्ञानिक आदि उपस्थित थे. कार्यक्रम का संचालन डा. लतिका शर्मा, आचार्य ने किया.