Sesame : तिल की खेती को बढ़ावा 

Sesame : उत्तर प्रदेश में सरकार किसानों की उपज और आमदनी को बढ़ाने के लिए समयसमय पर कदम उठा रही है. इसी में से एक प्रदेश में तिल की खेती करने वाले किसानों को सरकार प्रोत्साहित करेगी. कृषि विभाग तिल के बीजों पर 95 रुपए प्रति किलोग्राम की दर पर अनुदान देगी. तिल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 9,846 रुपए प्रति क्विंटल है.

खरीफ मौसम में उत्तर प्रदेश में तकरीबन 5 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में तिल की खेती की जाती है. तिल की खेती में कृषि निवेश न के बराबर लगता है पर तिल का बाजार मूल अधिक होने के कारण प्रति इकाई क्षेत्रफल में लगभग होने की संभावना अधिक है तिल की प्रमुख प्रजातियां आरटी 346, आरटी 351, गुजरात तिल 6 आरटी, 372 आरटी, एमटी 2013-3 और बीयूएटी तिल-1 है. तिल के बीज बोने से पहले थीरम या कार्बेंडाजिम 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम से बीजोपचारित करने से मिट्टी और बीज जनित रोगों से बचाव किया जा सकता है.

Mango Festival : मिठास और प्रगति का संगम उत्तर प्रदेश का आम महोत्सव

Mango Festival : देश के कई राज्यों में ‘फलों का राजा’ कहे जाने वाले आम पर महोत्सव आयोजित किया जाता है. लेकिन देश के सब से बड़े आम उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश के अनूठे आम महोत्सव का लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता है. इस साल 3 दिवसीय उत्तर प्रदेश आम महोत्सव का आयोजन 4 से 6 जुलाई के बीच लखनऊ के अवध शिल्पग्राम में किया गया था, जिस में आम उत्पादक किसानों व बागबानों, आम के उत्पाद बनाने वालों के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित की गई थीं और सब से अच्छा प्रदर्शन करने वालों को अलगअलग वर्गों और श्रेणियों में पुरस्कृत भी किया गया था.

तीन दिनों तक चलने वाले इस यूपी आम महोत्सव में एक दिन पहले ही आम उत्पादक अपने आमों की किस्मों के साथ पहुंच जाते हैं. इस बार भी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले बागबान एक दिन पहले ही 3 जुलाई को पहुंच गए थे. इस दिन उद्यान महकमें के कर्मचारियों द्वारा किसानों के आम की अलग किस्मों के साथ पंजीकरण किया गया और बागबानों के आम को प्रदर्शनी हाल में प्रदर्शन व प्रतियोगता के लिए रखा गया.

आम की किस्मों नें मोहा सब का मन

इस बार के आम महोत्सव में आम की लगभग 800 प्रजातियों को शामिल किया गया था, जिस में अंगूर के आकार से ले कर कद्दू के आकर तक के आम देखने को मिले. प्रदर्शनी में रखे गए रंगीन, शंकर और विदेशी किस्मों में टौमी एटकिंस, सेंसेशन, पूसा प्रतिभा, पूसा लालिमा, पूसा श्रेष्ठ, अंबिका, अरुणिका, पूसा अरुणिमा सहित दर्जनों किस्में दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहीं. इस दौरान लोगों ने न केवल इसे अपने कैमरों में कैद किया बल्कि, हाथो में ले कर सैल्फियां भी लीं. इस के आलावा बड़े किस्मों साइज वाले आमों में हाथीझूल सब से ज्यादा आकर्षण का केंद्र रहा.

शामिल रहे इतने प्रतियोगी

इस साल के उत्तर प्रदेश आम महोत्सव में 58 वर्गों में 7 श्रेणियों की प्रतियोगिताओं में आम की लगभग 800 प्रजातियों के 2,853 नमूने प्रदर्शित किए गए, जिन में प्रसंस्कृत पदार्थ वर्ग में 108 प्रतिभागियों ने 351 नमूने प्रस्तुत किए. इस महोत्सव में 1,449 प्रतिभागियों की भागीदारी रही.

इस महोत्सव में विभिन्न संस्थानों जैसे केंद्रीय उपोष्ण बागबानी संस्थान, सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय, आचार्य नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय, सहारनपुर, बस्ती, झांसी और लखनऊ के औद्यानिक केंद्रों सहित उत्तराखंड, सिक्किम, मध्य प्रदेश के प्रतिभागियों ने भी भाग लिया.

इस महोत्सव में आम आइसक्रीम, आम जलेबी, आम पना, आम हलवा, आम रसगुल्ला आदि जैसे प्रसंस्कृत उत्पादों के स्टाल भी आकर्षण का केंद्र रहे. तीन दिवसीय महोत्सव में भारी संख्या में आए हुए नागरिकों, स्कूली बच्चों ने आम और आम के उत्पादों दीदार किया.

मुख्यमंत्री ने किया आम महोत्सव का आगाज

लखनऊ के अवध शिल्पग्राम में लगने वाले इस 3 दिवसीय आम महोत्सव का आगाज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया था. इस मौके पर उन्होंने स्टालों का भ्रमण भी किया और बड़ेबड़े आमों को देख कर अचंभित भी हुए. उन्होंने एक स्टाल पर अवलोकन के दौरान अपने नाम के आम की किस्म देखी तो उसे हाथों में उठा कर खिलखिला कर हंस पड़े.

Mango Festival

इस के बाद दूरदराज से आए किसानों से बात करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उत्तर प्रदेश आम महोत्सव किसानों के लिए आमों की विभिन्न प्रजातियों के उत्पादन, बाजार व निर्यात की उत्तम व्यवस्था, औद्यानिक फसलों और तकनीक के विषय में जागरूकता उत्पन्न करने का माध्यम बनता जा रहा है. उन्होंने आगे कहा कि प्रदेश के किसान नवाचार व कृषि आधुनिकीकरण का प्रयोग कर कई गुना मुनाफा कमा रहे हैं. आम महोत्सव व प्रदर्शनी के माध्यम से किसानों की मेहनत को भलीभांति देखा जा सकता है.

इस अवसर पर उन्होंने लंदन और दुबई के लिए आम निर्यात हेतु कंटेनर को झंडी दिखा कर रवाना किया और उद्यान व खाद्य प्रसंस्करण विभाग की आम महोत्सव-2025 पर आधारित स्मारिका का विमोचन भी किया गया. साथ ही उन्होंने प्रदेश के प्रगतिशील किसानों, बागबानों और निर्यातकों को सम्मानित भी किया.

उद्यान राज्यमंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने कार्यक्रम में किसानों से कहा कि लखनऊ के आम की महक देश व विदेश के कोनेकोने तक पहुंच रही है. ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, रूस, इटली, ओमान आदि देशों में भी हमारे देश का आम निर्यात किया जा रहा है.

अजब गजब नाम वाले आम

इस बार उत्तर प्रदेश आम महोत्सव में केंद्रीय उपोष्ण बागबानी संस्थान लखनऊ के स्टाल पर कई अजब गजब नाम वाले आम की किस्में को देखने को मिली, जिस में अलिफ लैला, अफीम, अंडा, मुसरत शास्त्री, हैदर साहब, खरबूजा, फकीर वाला, आर्य समाज, पत्थर, नबाब उस आमदी जैसी दर्जनों किस्में शामिल रहीं.

इस के अलावा संस्थान द्वारा हाल ही में विकसित की गई 2 रंगीन नवीन किस्मों के साथ दर्जनों, किस्में ऐसी भी देखने को मिलीं जिन पर नई किस्म ईजाद करने के लिए शोध चल रहा है. ऐसे आमों को एक विशेष कोड से पहचाना जाता है.

मोदीयोगी के नाम की किस्में रहीं आकर्षण का केंद्र

‘मैंगो मैन’ हाजी कलीमुल्ला द्वारा ईजाद किए गए सीएम योगी का जब ‘योगी आम’ से सामना हुआ तो चेहरे पर मुस्कान आ गई. ‘मैंगो मैन’ हाजी कलीमुल्ला ने बताया कि ‘योगी आम’ तकरीबन 1 किलोग्राम वजनी होता है, गूदा मुलायम और स्वाद बेहद लाजवाब. इस की गुठली काफी छोटी होती है.

वहीं ‘मोदी मैंगो’ के जनक बागबान मलीहाबाद के नवी पनाह के नवाचारी बागबान उपेंद्र कुमार द्वारा विकसित किए गए मोदी आम की खूबियों के बारे बताया कि मोदी आम लंबा आकार, 500 ग्राम वजन और पके हुए पर पीला रंग का होता है. यह जायके और खुशबू में बेहद संपन्न है.

2 छिलकों वाला अनोखा आम
इस प्रदर्शनी में ‘अनारकली’ नामक आम भी खूब आकर्षण का केंद्र बना था. हाजी कलीमुल्लाह ने बताया कि यह ऐसा आम है जिस में दो छिलके होते हैं, ऊपरी और भीतरी गूदा अलगअलग स्वाद लिए होता है.

पवन सिंह और कुमार विश्वास ने बांधा समां

आम महोत्सव के पहले दिन भोजपुरी स्टार पवन सिंह ने महोत्सव की शाम में समा बांध दिया. दर्शकों और उन के फैन ने लाइट बुझा कर अपने मोबाईल की लाईट से उन का उत्साह बढाया. दूसरे दिन कवि कुमार विश्वास, पद्मिनी शर्मा जैसे नामचीन कवियों नें अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं तो लोग वाहवाह कर उठे.

उन्नत और रंगीन किस्मों के पौधों की रही डिमांड

आम महोत्सव के दौरान कई नर्सरियों द्वारा पौधे भी बेचे जा रहे थे, जिस में सब से ज्यादा मांग बौनी रंगीन, विदेशी और व्यावसायिक किस्मों की रही. इस दौरान दूर दराज के जिले सेआए किसानों नें जम कर पौधों की खरीदारियां की.

सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए किया गया सम्मानित

इस महोत्सव के समापन समारोह में आम की विभिन्न प्रजातियों की 7 श्रेणियों के 46 वर्गों की प्रतियोगिता में 45 विजेताओं को प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान हेतु कुल 122 पुरस्कार और संरक्षित आम उत्पादों की 11 वर्गों के 22 विजेताओं द्वारा प्रथम, द्वितीय व तृतीय श्रेणी के कुल 29 पुरस्कार और आम के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के विजेता मोहम्मद अब्दुल सलीम को अंबिका प्रजाति का प्रदर्शन करने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्श पुरस्कार प्रदान किया गया.

Mango Festival

सर्वाधिक पुरस्कार पाने वालों में अब्दुल सलीम को 21, इकबाल अहमद को 15 और एससी शुक्ला को 11 पुरस्कार प्राप्त हुए. इन 121 प्रजातियों के प्रदर्श प्रदर्शन हेतु एससी शुक्ला को प्रथम, 72 प्रजातियों के लिए हाजी कलीमुल्ला खान को द्वितीय, और 63 प्रजातियों के लिए अवध आम उत्पादक एवं बागबानी समिति को तृतीय पुरस्कार मिला. वहीं 5 से 12 साल के आयु वर्ग की आम खाने की प्रतियोगिता में अरिक्ता सिंह पहले, अनिका मिश्रा दूसरे और अभिश्रेष्ठ तीसरे स्थान पर रहे.

इस महोत्सव पुरस्कार वितरण के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के उद्यान, कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार व कृषि निर्यात राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विजेताओं को सम्मानित किया.

इस दौरान उन्होंने कहा कि किसानों का सम्मान एवं स्वाभिमान हमारी सरकार की प्राथमिकता है. इस महोत्सव में आम उत्पादकों की मेहनत से 15 गांव से 5 किलोग्राम तक के आम प्रदेश के लोगों को देखने को मिले. उत्तर प्रदेश आम महोत्सव मिठास एवं प्रगति का संगम बना है.

मंत्रियो और अधिकारीयों ने किया आम की किस्मों का दीदार

महोत्सव के दौरान उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, नगर विकास एवं ऊर्जा मंत्री ए०के शर्मा, कृषि राज्यमंत्री बलदेव सिंह औलख, अन्य वरिष्ठ मंत्रियों, वन एवं पर्यावरण, जन्तु उद्यान एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डा. अरुण कुमार सक्सेना, क्सेना, आबकारी एवं मद्य निषेध राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नितिन अग्रवाल, विधान परिषद सदस्य जितेन्द्र सिंघल, राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव, जिला पंचायत, रायबरेली की अध्यक्ष रंजना चौधरी, उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के अपर मुख्य सचिव बी.एल. मीणा, निदेशक मानु प्रकाश राम संयुक्त निदेशक श्री सर्वेश कुमार व राजीव वर्मा सहित वरिष्ठ विभागीय नें महोत्सव का दीदार किया और बागबानों को पुरस्कृत भी किया.

सफल आयोजन में रही इन की भूमिका

उत्तर प्रदेश आम महोत्सव के सफल आयोजन में महकमें के मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने दिन रात एक कर दिया. जिस का परिणाम भी दिखा. आम महोत्सव में आने वालों की भीड़ बता रही थी कि पूरे महकमें नें जम कर मेहनत की है. निदेशक मानु प्रकाश राम के मार्गदर्शन में सभी जिलों के जिला उद्यान अधिकारी और कमर्चारी दिए गए जिम्मेदारियों को निभाते दिखे. सब से ज्यादा मेहनत करते हुए बस्ती जिले के संयुक्त निदेशक डा. वीरेंद्र सिंह यादव नें प्रदर्शनी के इंचार्ज के रूप में पूरे पारदर्शी प्रक्रिया से महोत्सव के आयोजन में भूमिका निभाई.

लुट लिए गए आम

आम महोत्सव के अंतिम दिन अफरातफरी मच गई और प्रदर्शनी में रखे आमों की लूट शुरू हो गई. महोत्सव समाप्ति घोषणा के पहले ही भीड़ बेकाबू हो गई. लोग प्रदर्शनी के आम उठा कर ले जाने लगे, जबकि प्रदर्शनी के आम केवल प्रदर्शन के लिए थे. विभाग द्वारा लगाई गई आमों की प्रदर्शनी को लोगों ने मुफ्त का माल समझ कर लूटा. इस मौके पर औरतें दुपट्टे, साड़ी के आंचल बैग इत्यादि में आम भर कर ले भागी.

आम लूट का वीडियो भी खूब वायरल हुआ, जिस में यह देखा जा सकता की प्रदर्शनी में लगाए गए आमों को कोई झोले में भर रहा है, कोई दुपट्टे में बांध रहा है और कुछ तो ऐसे जेब में घुसा रहे हैं जैसे मोबाइल नहीं, आम रख रहे हों. इस वायरल वीडियो ने यह साफ कर दिया है कि आम भले ही फल हो, पर हिंदुस्तान में वह भावना है और जब भावनाएं उफान पर हों, तो कानूनकायदे भी ठेले के पीछे छूट जाते हैं.

Dairy Industry : डेरी खोल कर बने युवाओं के रोल मौडल

Dairy Industry : उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की हरैया तहसील का परशुरामपुर ब्लाक खेती के लिहाज से धनी इलाका माना जाता है. इसी ब्लाक के परशुरामपुरलकड़मंडी मार्ग पर पड़ने वाले गांव वेदीपुर के युवा किसान ध्रुवनारायन ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई के बाद नौकरी न करने की ठानी और वे अपनी पारिवारिक खेतीबारी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी ले कर आगे बढ़े.

उन्होंने खेतों में काम करते हुए पाया कि फसलों में उत्पादन बढ़ाने के लिए अंधाधुंध रासायनिक खादों व कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिस की वजह से पैदावार सही नहीं मिल पा रही है.

कृषि के उत्पादन को बढ़ाने के लिए उन्होंने अपने खेतों में जैविक खादों व जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल करने की ठानी. इस के लिए उन्हें जरूरत थी पशुओं के गोबर की. लेकिन उन के पास केवल 2 गायें और 1 भैंस होने की वजह से यह मंशा पूरी होती नहीं दिख रही थी. फिर उन्होंने सोचा कि क्यों न खेती के साथसाथ डेरी का कारोबार भी किया जाए. इस से न केवल जैविक खेती के लिए गोबर की व्यवस्था होगी, बल्कि दूध से आमदनी भी बढ़ेगी.

सब से पहले उन्होंने 5 गायों से डेरी उद्योग शुरू करने की ठानी. उन्होंने पशुपालन विभाग व उस से जुड़े दूसरे विभागों से जानकारी इकट्ठा करने के बाद डेरी के लिए जरूरी टीनशेड, पशुशाला व रखरखाव का इंतजाम किया. फिर उन्होंने 5 गायों से अपनी डेरी की शुरुआत की.

शुरू में हर गाय से करीब 14 से 16 लीटर दूध मिल रहा था. इस तरह उन्होंने रोजाना करीब 80 लीटर दूध का उत्पादन करना शुरू किया. लेकिन जितनी लागत आती थी, उतना मूल्य नहीं मिल पाता था. इसलिए उन्होंने अपनी डेरी के दूध से डेरी उत्पाद बनाने की सोची. उन की डेरी से मिलने वाला दूध डेरी कारोबार शुरू करने के लिए काफी नहीं था. इस के लिए उन्हें और अधिक दूध की जरूरत थी, जिस से वे डेरी उत्पाद बनाने की शुरुआत कर सकें. उन्होंने सरकार द्वारा चलाए जा रहे डेरी उद्योगों में जा कर वहां की मशीनों और उत्पादन तकनीकी की जानकारी ली और फिर घर वापस आने के बाद आसपास के दूसरे दूध उत्पादकों से दूध की खरीदारी कर बड़े स्तर पर डेरी उद्योग की शुरुआत करने का मन बनाया.

ध्रुवनारायण ने गांवगांव जा कर दूध उत्पादकों से मुलाकात की. उन्होंने दूध उत्पादकों को यकीन दिलाया कि वे सरकार द्वारा तय दूध की कीमत से ज्यादा पर उन के दूध को खरीदेंगे, जिस से उन्हें अच्छा मुनाफा मिलेगा. इस के बाद जब लोगों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि उन के द्वारा शुरू किए जा रहे डेरी कारोबार के लिए बड़ी मात्रा में दूध उपलब्ध हो जाएगा, तो उन्होंने 5 लाख रुपए की लागत से चिलिंग प्लांट व प्रेस मशीन की खरीदारी की और डेरी उत्पादों को बनाने का काम शुरू किया.

शुद्धता बनी पहचान : शुरू में ध्रुवनारायन ने अपने डेरी उद्योग में पनीर, दही, खोआ, पेड़ा आदि बनाने की शुरुआत की और वे खुद अपनी बनाई हुई चीजों को मार्केट में बेचते थे. धीरेधीरे उन के द्वारा बनाए गए डेरी उत्पादों की शुद्धता की वजह से दूरदराज के ग्राहक उन के यहां से खरीदारी करने लगे, जिस की वजह से लोगों को उन के दूध का अच्छा दाम भी मिलना शुरू हो गया.

इस समय ध्रुवनारायन के डेरी उत्पाद भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण द्वारा प्रमाणित और लाइसेंसशुदा हैं, जिस की वजह से उन के डेरी उत्पादों की मांग पूर्वी उत्तर प्रदेश के फैजाबाद, गोंडा, अंबेडकरनगर, सिद्धार्थनगर, बस्ती, संतकबीरनगर सहित तमाम जिलों में है.

बेरोजगारों को रोजगार से जोड़ने में सफलता :  उन के यहां डेरी उत्पादों को तैयार करने के लिए आईटीआई डिगरी धारक तकनीकी रूप से जानकार कर्मचारी की देखरेख में कई लोग इस व्यवसाय से जुड़े हैं, जो उत्पादों को तैयार करने, पैकेजिंग व गुणवत्ता निर्धारण की जिम्मेदारी निभाते हैं, जिस से उन्हें अच्छी आमदनी हो रही है.

जैविक खादों की बिक्री से दोगुना फायदा : अपनी खेती को जैविक तरीके से करने के लिए शुरू किए गए इस डेरी कारोबार से ध्रुवनारायन इस मुकाम तक पहुंचेंगे, उन्होंने कभी सोचा भी न था.

उन के द्वारा बनाई गई जैविक खाद डी कंपोस्ट को गोबर, राख, लकड़ी का बुरादा, सुपर फास्फेट व माइक्रोबायो कंट्रोल एजेंट मिला कर बनाया जाता है. इस के प्रयोग से फसल की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी हुई है, साथ ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति में भी इजाफा हुआ है. इस के अलावा उन के यहां फसलों को कीटों व बीमारियों से बचाने के लिए तंबाकू, लहसुन, नीम की पत्ती, धतूरा, मदार की जड़, गोमूत्र वगैरह मिला कर तमाम तरह के जैविक कीटनाशक व दवाएं बनाई जाती हैं, जिन की किसानों में भारी मांग है.

अगर कोई भी किसान डेरी उत्पाद तैयार करने के लिए जानकारी हासिल करना चाहता है, तो धु्रवनारायन के मोबाइल नंबरों 09565163909, 9984407515 या 9918616970 पर संपर्क कर सकता है.

Price Support Scheme : सरकार करेगी मूंग और उड़द की खरीद

Price Support Scheme : केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 24 जून, 2025 को नई दिल्ली में बैठक कर मध्य प्रदेश में मूंग और उड़द व उत्तर प्रदेश में उड़द को मूल्य समर्थन योजना (Price Support Scheme) के तहत खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. साथ ही, खरीद से संबंधित व्यवस्थाओं को ले कर राज्य के कृषि मंत्रियों के साथ संवाद भी किया और नाफेड, एन.सी.सी.एफ. व राज्य के संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशानिर्देश भी दिए.

मध्य प्रदेश के लिए राज्य सरकार से प्राप्त प्रस्ताव पर मंत्रालय द्वारा विचार करने और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह द्वारा राज्य सरकार व अन्य हितधारकों के साथ बैठक के बाद मूल्य समर्थन योजना के तहत राज्य में ग्रीष्मकालीन मूंग और ग्रीष्मकालीन उड़द खरीद करने की मंजूरी प्रदान की गई है.

उत्तर प्रदेश में मूल्य समर्थन योजना के तहत राज्य में ग्रीष्मकालीन उड़द खरीद करने की मंजूरी प्रदान की गई है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बैठक में कहा कि मूंग और उड़द की खरीद के फैसले से केंद्र सरकार को बड़ा वित्तीय भार उठाना पड़ेगा, लेकिन इस के बावजूद किसान हित के लिए सरकार किसानों तक लाभ पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है.

उन्होंने कहा कि यह बहुत जरूरी है कि खरीद सही तरीके से हो. किसानों से सीधे खरीद से ही बिचौलियों की सक्रियता कम होगी और सही मायनों में लाभ किसान तक पहुंच पाएगा. अधिकारियों को दिशानिर्देश देते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिकतम व कारगर प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल के साथ किसानों के पंजीकरण की उचित व्यवस्थाएं की जाएं. अगर जरूरत पड़े तो खरीद केंद्रों की संख्या में भी इजाफा करें व उचित और पारदर्शी व्यवस्था के साथ खरीद फसलों की खरीद सुनिश्चित करें.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भंडारण को ले कर मिल रही अव्यवस्था की शिकायत को ले कर भी चिंता जाहिर की और अधिकारियों व राज्यों के कृषि मंत्रियों को इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए प्रयास करने की बात कही. उन्होंने उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री से कहा कि केंद्र सरकार किसानों के हित में हरसंभव काम करेगी.

इस बैठक में मध्य प्रदेश के किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री एदल सिंह कंषाना, उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही, केंद्रीय कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी व अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे.

Awards : उन्नत खेती करने वालों को मिला ‘फार्म एन फूड अवार्ड’

Awards : उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिले के बांसी में 25 जून 2024 को किसान सम्मान समारोह का आयोजन किया गया, जिस में उन्नत खेती करने वाले किसानों को ‘फार्म एन फूड अवार्ड’ से सम्मानित किया गया.

इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला परियोजना निदेशक प्रदीप पांडेय व विशिष्ठ अतिथि उप कृषि निदेशक डा. राजीव कुमार थे.

समारोह के मुख्य अतिथि प्रदीप पांडेय ने कहा कि जिले में किसानों के प्रति ऐसा कार्यक्रम सुखद अनुभूति पैदा कर रहा है. आने वाले समय में इस तरह के आयोजन समयसमय पर होते रहने चाहिए. इन से किसानों में नया जोश और नई क्रांति का संचार होगा.

विशिष्ठ अतिथि डा. राजीव कुमार ने कहा कि किसान देश की सवा अरब आबादी के पेट भरने का जिम्मा अपने कंधे पर ले कर चल रहे हैं. ऐसे में उन का सम्मान करना बहुत जरूरी है. उन्होंने कृषि से संबंधित अनेक जानकारियां भी किसानों को दीं.

Awards

कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिक डा. एसके तोमर, डा. एके पांडेय, एसके मिश्रा और कार्यक्रम संयोजक मंगेश दुबे के अलावा पूर्व विधायक ईश्वर चंद्र शुक्ला, श्रीधर मिश्र, मृत्युंजय मिश्र व सचिंद्र शुक्ला आदि भी मौजूद थे.

दिल्ली प्रेस पत्र प्रकाशन समूह की नामीगिरामी कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ एक लंबे अरसे से किसानों के हितों के लिए काम कर रही है. इस पत्रिका के जरीए देश के मशूहर कृषि वैज्ञानिक किसानों को खेती की नई से नई जानकारियां मुहैया कराते रहते हैं.

अपने जानकारी भरे लेखों के जरीए कृषि वैज्ञानिक किसानों की कदमकदम पर मदद करते हैं. इस के अलावा वे किसानों के तमाम सवालों के जवाब भी ‘फार्म एन फूड’ के जरीए देते हैं. पत्रिका द्वारा किसानों को दिए जाने वाले अवार्ड काफी मशहूर हो रहे हैं.

Inspiring Personalities : वर्मी कंपोस्ट की राह दिखा रहे विज्ञान शुक्ला

Inspiring Personalities : खेती में रासायनिक खादों के अधाधुंध इस्तेमाल से मिट्ट‌ी की घटती उर्वरशक्ति और आमजन की बिगड़ती सेहत को समझते हुए बांदा जिले के अतर्रा गांव के किसान विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) ने एक ऐसी राह चुनी जो खुद के लिए तो मील का पत्थर साबित हुई. साथ ही, अन्य किसानों के लिए भी खेती में नई राह दिखाने का काम कर रही है. विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) ने अब से 14 साल पहले अकेले जैविक खेती की शुरुआत की और कंपोस्ट खाद बनाने का काम अपने घर से शुरू किया और आज के समय उन से प्रेरणा ले कर जिले के लगभग 300 किसान जैविक खेती को अपना रहे हैं.

विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) बांदा जिले के ऐसे प्रगतिशील किसान हैं जिन के साथ आज बुंदेलखंड क्षेत्र के लगभग 15 हजार किसान जुड़े हुए हैं, जो लगातार उन के संपर्क में रह कर जैविक खेती से अच्छा फसल उत्पादन ले रहे हैं और पशुपालन भी कर रहे हैं. विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) ने बताया कि उन के खेत पर स्थापित वर्मी कंपोस्ट यूनिट, पशुपालन यूनिट, जैविक आउटलेट पर अभी तक लगभग 4 हजार किसान भ्रमण कर चुके हैं.

उन्होंने बताया कि जैविक खेती की शुरुआत के 2 सालों में फसल उत्पादन में 10 से 12 फीसदी तक की कमी आई थी जो बाद में पूरी हो गई. अब तो रासायनिक खेती की तुलना में 20 से 25 फीसदी अधिक पैदावार मिलती है और कम लागत में गुणवत्ता युक्त फसल उत्पादन भी  मिलता है. जिस के बाजार दाम भी अच्छे मिलते हैं.

Vigyan Shukla

कैसे करते हैं खेती ?

विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) धान,गेहूं, ज्वार, हाइब्रिड ज्वार, मूंग आदि की खेती करते हैं और खेत की एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करते हैं और 3 जुताई कल्टीवेटर से कर मिट्टी की संतुति के अनुसार बीज तय करते हैं.

जुताई के समय गोबर की खाद 6 टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालते हैं. खरपतवार की रोकथाम के लिए समय पर निराईगुड़ाई का काम करते हैं और पहली निराई के समय पौधों में विरलीकरण का काम करते हैं. पहली सिंचाई खेती में पुष्पास्था के समय ओर दूसरी सिंचाई पुष्प आने के बाद करते हैं.

फसल सुरक्षा के लिए रस चूसने वाले कीटों और छोटी सुंडी , इल्लियों की रोकथाम के लिए  नीमास्त्र का इस्तेमाल और कीटों और बड़ी सुंडियों के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं. छिड़काव के लिए 100 लीटर पानी में 2.5 मिलीलिटर नीमास्त्र या ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं.

फसल तैयार होने के बाद फसल काटने पर उसे धूप में सुखाकर 10 से12 फीसदी नमी पर उस का भंडारण करते हैं. सुरक्षित भंडारण के लिए सूखी नीम की पतियों का इस्तेमाल करते हैं.

बीज बोने से पहले उस का बीजशोधन ट्राइकोग्रामा ट्राईकोडर्मा 4 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर के बाद राइजोबियम कल्चर 200 ग्राम प्रति 10 किलोग्राम बीज की दर से करते हैं.

लोगों को मिल रहा रोजगार

विज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) का कहना है कि उन के प्रक्षेत्र पर 30 वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगी हैं. 13 पशुपालन यूनिट हैं, जैविक आउटलेट हैं जिन के जरिए लगभग 25 से 30 लोगों को रोजगार मिल रहा है.

Vigyan Shuklaविज्ञान शुक्ला (Vigyan Shukla) को उन के द्वारा खेती में किए जा रहे उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय स्तर का जगजीवनराम अभिनव पुरस्कार के अलावा ढेरों सम्मान से नवाजा जा चूका है.

विज्ञान शुक्ल (Vigyan Shukla) ने बताया कि स्नातक की पढ़ाई के दौरान परिजनों को रासायनिक खादों से जूझते देखा तो मन दुखी हो गया तभी से मैं कंपोस्ट खाद के निर्माण में जुट गया. इस की शुरूआत के लिए 15×3×2 फीट की चार चरही में गोबर भर कन्नौज से लाए और उस में केंचुआ ला छोड़ा तो अच्छी वर्मी कंपोस्ट खाद बनने की शुरुआत हुई.

फिर कुछ समय बाद खेतों में पैदावार बढ़ने लगी और अच्छे नतीजों से उत्साहित हो कर कृषि एवं उद्यान विभाग से अनुदान ले कर काम को आगे बढ़ाया. जिस से खाद में अच्छा उत्पादन होने लगा तो आमदनी बढ़ने लगी. फिर तीन सालों के बाद इस काम से फसल पैदावार के अलावा खाद बिक्री से सालाना 1 लाख रुपए की आय होने लगी. जिस से मेरी आगे की राह और आसान बन गई. आज विज्ञान शुक्ला के प्रयास से बांदा और चित्रकूट जनपद के 100 से अधिक किसानों को इस तकनीक से जोड़ा गया है.

वर्मी कंपोस्ट तकनीक के बारे में उन्होंने बताया कि 15 फीट लंबी, 3 फीट चौड़ी और 2 फीट ऊंची, चरही में 15 क्विंटल गोबर और 4 क्विंटल केंचुआ की जरूरत पड़ती है. जिस में 11 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार हो जाता है. यह 2 एकड़ खेत के लिए पर्याप्त है. इन में सभी 16 पोषक तत्वों का जमावड़ा होता है. इस के प्रयोग से यूरिया, डीएपी जैसी रासायनिक खादों की आवश्यकता नहीं पड़ती है. छोटे से छोटा किसान भी वर्मी कंपोस्ट खाद का उत्पादन कर सकता है.

Mango Farming : आम की सघन बागबानी

Mango Farming : भारत में आम की औसत उत्पादकता 8.11 टन प्रति हेक्टेयर है. उत्तर प्रदेश में आम की पैदावार सब से ज्यादा 34 फीसदी होती है. विश्व बाजार में भारत का आम बहुत पसंद किया जाता है. दूसरे देशों को आम भेजने के लिए हमें इस की उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाना बहुत जरूरी है.

आम की कम उत्पादकता का खास कारण बाग लगाने के 8-10 सालों तक कम उपज प्राप्त होना है, क्योंकि शुरुआती साल में बौर कम आते हैं और फसल कम होती है. इस तरह शुरू के कई सालों तक फायदेमंद उपज नहीं मिलती है और बाग में पेड़ों के बीच की जमीन पर दूसरी फसल उगा कर घाटा पूरा करना पड़ता है. आम की खास किस्मों जैसे कि दशहरी, लंगड़ा, बंबई हरा, चौसा, अल्फांसो, हिमसागर, बैगनपल्ली, केसर व मलगोवा वगैरह में हर साल अच्छी उपज नहीं होती है. इन में हर दूसरे साल में अच्छी उपज होती है. लिहाजा देर से लाभकारी मूल्य प्राप्त होने के कारण आम की बागबानी बड़े किसान ही करते हैं, जो शुरू के 10-15  सालों तक आम के बाग की लाभकारी उपज की कमी को सहन करने की कूवत रखते हैं. छोटे किसान आम की बागबानी में कम रुचि रखते हैं.

पेड़ों की आपसी दूरी कम कर के इन पेड़ों से शुरू के सालों से ही अच्छी उपज ले सकते हैं.

आम में हर साल फल के लिए यह जरूरी है कि फल तोड़ने के बाद हर साल नए प्ररोह आएं. हर साल पुष्पन वाले पेड़ों पर 6 महीने तक पुष्पन व फलन होता है और हर 6 महीने तक प्ररोहों की वृद्धि का समय होता है. इस से पेड़ों पर हर साल फलन होता है. आम में वृद्धि और पुष्पन साथसाथ नहीं होता है. सघन बागबानी में दशहरी किस्म के पेड़ों की आपस में दूरी 3.0×3.0 मीटर रख कर बागबानी की जा सकती है. आम की सघन बागबानी के लिए 1111 कलमी पौधे प्रति हेक्टेयर लगाए जाते हैं, जिस में पौधों की आपस की दूरी 3.0×3.0 मीटर होती है. सघन बागबानी में साधारण बागबानी की तरह गड्ढे खोदने की जरूरत नहीं होती है. आम के कलमी पौधों को सामान्य रूप से रोपा जाता है. पौध लगाने के बाद तुरंत सिंचाई की जाती है.

पोषण व सिंचाई

सघन बागबानी के खेत में प्रति हेक्टेयर 100 क्विंटल कंपोस्ट खाद जरूर डालनी चाहिए. साथ ही 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 75 किलोग्राम फास्फोरस व 75 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बाग लगाने से पहले मिट्टी में मिला देते हैं. दोबारा अगले साल फास्फोरस और पोटाश के उर्वरकों का प्रयोग नवंबरदिसंबर में खेत की जुताई के साथ करते हैं, लेकिन नाइट्रोजन उर्वरक को जनवरीफरवरी व जुलाई में 2 बार बराबर मात्रा में डालते हैं. जनवरीफरवरी में नाइट्रोजन फलों के विकास के लिए और जुलाई में नए प्ररोह निकलने व बढ़वार के लिए जरूरी है. गरमी के मौसम में 1 हफ्ते के अंतर पर और सर्दी के मौसम में 15-20 दिनों के अंतर पर सिंचाई करना जरूरी है.

निराईगुड़ाई

सघन बाग में गुड़ाई 15-18 सेंटीमीटर से ज्यादा गहरी नहीं करते हैं. इस के लिए फावड़ा या पावर टिलर का प्रयोग किया जाता है. पहले 2-3 सालों में छोटे ट्रैक्टर द्वारा उथला हैरो चलाया जा सकता है. गुड़ाई का काम अक्तूबरनवंबर में जरूरी है. इस से बरसात में उगी बहुवर्षीय घासें आसानी से खत्म हो जाती हैं. बरसात के समय या पुष्पन और फलन के समय बाग की गुड़ाई नहीं करते हैं. इस से पौधे की बढ़वार व फलन पर असर पड़ता है. शुरू के सालों में जब तक पेड़ों की डालियां आपस में छूने के करीब नहीं आ जातीं और सूरज की रोशनी जमीन पर 50 फीसदी से अधिक पड़ती हो, पेड़ों के बीच अंत:फसल ली जा सकती है.

अंत:फसल में शुरू के 2-3 सालों तक दलहनी फसलें व सब्जियां जिन के पौधे बड़े नहीं होते हैं, ले सकते हैं. लेकिन इन के लिए फसल के अनुसार अतिरिक्त पोषण की जरूरत होती है. बाग की सिंचाई 15 दिनों के अंतर पर फरवरी से बरसात की शुरुआत तक जरूरी है, लेकिन आम के सघन बाग में अधिक सिंचाई नहीं करनी चाहिए.

कटाईछंटाई

आम के साधारण बाग में कटाईछंटाई व पेड़ के आकारप्रकार का नियंत्रण आमतौर पर नहीं किया जाता है. विकसित देशों में बड़े पेड़ों की कटाईछंटाई मशीनों द्वारा की जाती है. विकासशील देशों में इस प्रकार के यंत्रों की सुविधा नहीं है, लिहाजा हाथ से चलाए जाने वाले यंत्र द्वारा कटाईछंटाई करते हैं. इसी तरह सघन बागबानी में पौधों को एक खास आकार देने के लिए हर साल फल तोड़ने के तुरंत बाद  कटाईछंटाई जरूर करते हैं. इस के लिए पेड़ लगाने के पहले साल में हर पेड़ का मुख्य तना 50 सेंटीमीटर तक बढ़ने दिया जाता है और फरवरीमार्च में उसे लगभग 50 सेंटीमीटर की ऊंचाई से काट देते हैं. इस के बाद हर मुख्य तने के ऊपरी भाग से कई शाखाएं निकलती हैं और इन से 3 से 5 पहली शाखाओं को जो तने के चारों ओर से निकल रही हों, बढ़ने देते हैं और यदि इन की संख्या इस से अधिक है तो इन में से कमजोर शाखाओं को मुख्य तने से काट कर निकाल देते हैं. इस के लिए जरूरी है कि कली अवस्था में ही उसे तोड़ दें. इस से पेड़ चारों दिशाओं में लगभग एक ऊंचाई से समान रूप से बढ़ता है. दूसरे साल से जूनजुलाई में हर पहली शाखा के ऊपरी भाग को 3-4 पत्तियों सहित काट कर अलग कर देते हैं और इस प्रकार पेड़ चारों तरफ समान रूप से फैलता है.

कुलतार का प्रयोग

आम के पेड़ में ओज फल की किस्म पर निर्भर करती है और इसी कारण कम ओज वाले दशहरी किस्म में तीसरे साल फलन शुरू हो जाती है, जबकि लंगड़ा, चौसा फजली वगैरह किस्मों में पहले 6-7 सालों बाद फलन शुरू होती है, लेकिन ये सभी किस्में 1 साल के अंतर में फलती हैं. लिहाजा हर साल फलन व पेड़ की बढ़वार के नियंत्रण के लिए कुलतार का इस्तेमाल किया जाता है. इस के लिए हर पेड़ को उस की सालाना उम्र पर 1 मिली लीटर कुलतार को आधा लीटर पानी में मिला कर मुख्य तने के चारों ओर मिट्टी में मिला कर सिंचाई कर देते हैं, जिस से मुख्य जड़ के सहारे कुलतार पतली जड़ों तक पहुंच सके और जड़ों द्वारा सोख कर पेड़ के ऊपरी सिरे तक पहुंच सके. कुलतार के इस्तेमाल के लिए जरूरी है कि बाग की मिट्टी में 1-2 महीने तक सही नमी बनी रहे. जरूरत पड़ने पर बाग की सिंचाई भी की जा सकती है.

उत्तरी भारत में कुलतार के इस्तेमाल का सही समय 15 सितंबर से 15 नवंबर है. इस के इस्तेमाल से जुलाईअगस्त में आई नई शाखाओं पर फरवरीमार्च में पुष्पन व फलन होता है. दूसरे व तीसरे साल में कुलतार की मात्रा को क्रमश: हर पेड़ के हिसाब से आधा और एकचौथाई कर देते हैं, क्योंकि मिट्टी में इस्तेमाल किया गया कुलतार का ज्यादा समय तक असर रहता है और मिट्टी में मिलाने के दोढाई महीने बाद ही इस का असर दिखाई पड़ता है. 3 साल बाद दोबारा कुलतार की मात्रा जिस दर से पहले 2 सालों में बढ़ाई गई थी, दोबारा बढ़ाई जाए, जिस से पेड़ की बढ़वार हो और फलन भी अच्छा बना रहे.

कुलतार की उपलब्धता के लिए इंपीरियल कैमिकल इंडस्ट्रीज इंडिया, लि. 34 चौरंगी रोड कोलकाता से संपर्क करें, जो इंपीरियल कैमिकल इंडस्ट्रीज पीएसी इंगलैंड की सहायक कंपनी है.

Mango Farming

कीट व बीमारियां

फल तोड़ने के बाद शाखाओं की कटाईछंटाई करने से बारिश के मौसम में नए प्ररोह आते हैं. इन पर एंथ्रेक्नोज नामक बीमारी का खास असर होता है. इस के लिए कटाईछंटाई के तुरंत बाद 2 ग्राम ताम्रयुक्त फफूंदनाशक प्रति लीटर पानी की दर से व 1 फीसदी यूरिया के घोल का छिड़काव करते हैं और 15-20 दिनों बाद जब नए प्ररोह निकल रहे हों, तब इस घोल का दोबारा छिड़काव कर देते हैं. फूल निकलने से पहले और निकलते समय आम के भुनगे की रोकथाम के लिए 15 दिनों के अंतर पर 2 बार सेविन, कार्बोरिल, मोनोक्रोटोफास या डाइमेक्रान का छिड़काव करते हैं. बौर निकलते समय कीटनाशी का छिड़काव नहीं करते हैं. इस समय केवल चूर्णिल आसिता की रोकथाम के लिए कैराथेन का

6 मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी की दर से छिड़काव करते हैं. फूल निकलने के समय के तुरंत बाद जब फल सरसों के दाने के बराबर दिखाई पड़ने लगें, उस समय 2 ग्राम प्रति लीटर ताम्रयुक्त फफूंदीनाशक के साथ भुनगे व चूर्णिल आसिता की रोकथाम के लिए पहले बताए गए कीटनाशी व फफूंदीनाशक रसायनों को छिड़कने से कीड़ों व बीमारियों के प्रकोप से बचा जा सकता है. इन्हीं कीटनाशक व फफूंदीनाशक रसायनों के साथ प्लेनोफिक्स या वर्धक या नेप्थालीन एसीटिक एसिड (25-50 पीपीएम या 25-50 मिलीग्राम प्रति लीटर) का इस्तेमाल कर सकते हैं और इस का छिड़काव 15 दिनों बाद दोहराना जरूरी होता है.

तोड़ाई व उपज

सघन बाग में फलों की तोड़ाई हाथ से आसानी से 2-3 पत्तियों व बौर की डंठल सहित काट कर करने से इन पेड़ों में दोबारा कटाईछंटाई का काम नहीं करना पड़ता है और फलों की तोड़ाई के समय ही कटाईछंटाई का काम पूरा किया जा सकता है. बौर के डंठल के साथ फलों का भंडारण करने से इन्हें काफी समय तक रखा जा सकता है. लिहाजा सघन बागबानी में इस प्रकार तोड़े गए फलों को दूर के बाजारों में भेजना आसान होता है.

सघन बाग में 5 साल से ही आम की उपज मिलने लगती है. 15 साल के बाद की उम्र तक आम की उपज साधारण बाग से 12 टन और सघन बागबानी से 112 टन प्राप्त होती है, जबकि इस उम्र के साधारण बाग से 8 साल तक आम की फसल से कोई खास आमदनी नहीं होती है और अच्छी आमदनी 15 साल बाद ही मिलती है. इसीलिए साधारण दूरी पर लगाए गए बागों में अंत:सस्यन बहुत जरूरी है.

इस प्रकार साधारण बागबानी के मुकाबले सघन बागबानी से 9-10 गुना अधिक उपज प्राप्त होती है.

अधिक जानकारी के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, अनुसंधान केंद्र नगीना से संपर्क करें.

Snacks : आगरा के भल्ले (Bhalle) कुरकुरे व टैस्टी

Snacks : आलू की टिक्की को उत्तर भारत में सब से ज्यादा पसंद किया जाता है. इसे कई अलगअलग नाम और तरह से चाट के तौर पर तैयार भी किया जाता है. दिल्ली और आगरा में इसे ‘आलू भल्ला’ (Bhalle) के नाम से जाना जाता है. आगरा, दिल्ली के हर बाजार, चाट की दुकानों में देशी घी से तैयार भल्ले खाने को मिलते हैं. आगरा के आलू भल्ले को दूसरे शहरों में आलू की टिक्की कहते हैं.

उत्तर प्रदेश में आगरा पर्यटकों के लिए सब से ज्यादा घूमने वाला शहर समझा जाता है. यहां आने वाला हर पर्यटक शाम को भल्ले जरूर खाना पसंद करता है. भल्ले भले ही आलू की टिक्की के रूप में दूसरे शहरों में मिलते हों, पर ‘आगरा के भल्ले’ अलग ही स्वाद देते हैं. कुछ चाट दुकानदार भल्ले के साथ काबुली चने और चटनी का इस्तेमाल भी करते हैं.

आगरा में शाम के समय हर सड़क पर ऐसी चाट की दुकानें मिल जाती हैं. सदर बाजार, आगरा में चाट की दुकानों पर भल्ले खाने वालों की लाइन लगी होती है. इस के अलावा फतेहाबाद रोड और ताजमहल के आसपास सड़कों पर स्ट्रीट फूड के रूप में भल्ले सभी जगह मिलते हैं. बड़े होटल और रैस्टोरैंट में भी भल्ले खाने को मिलते हैं. चटपटी चाट के रूप में भल्ले की दुकान लगाना रोजगार का बड़ा साधन हो गया है. यहां दुकान चलाने वाले लोग बताते हैं कि वैसे तो भल्ले आलू टिक्की की ही तरह होते हैं, पर आगरा में इन का स्वाद और भी ज्यादा टेस्टी हो जाता है. इस की वजह पश्चिम उत्तर प्रदेश में पैदा होने वाले आलू को माना जाता है. इस का स्वाद बाकी देश से अलग होता है.

आगरा की रहने वाली अर्चना श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘आगरा घूमने वाले पर्यटक ताजमहल देखने के साथ यहां के भल्ले जरूर खाना पसंद करते हैं. इस का स्वाद खाने वालों को बहुत भाता है. यही वजह है कि भल्ले की दुकानें आप को हर जगह मिल जाती हैं. आलू किसानों को भी आज एक नई पहचान मिल रही है. पश्चिम उत्तर प्रदेश का यह इलाका आलू की खेती के साथ देशी घी के लिए काफी जाना जाता है. देशी घी में तले हुए भल्ले का स्वाद बहुत अच्छा लगता है.’’

आवश्यक सामग्री: आलू 300 ग्राम उबले छिले हुए, हरी मटर के दाने 1 कप दरदरे पिसे हुए, तेल टिक्की सेंकने के लिए, गरम मसाला छोटी चम्मच, नमक स्वादानुसार, अमचूर पाउडर छोटी चम्मच, लाल मिर्च पाउडर छोटी चम्मच, धनिया पाउडर आधा छोटी चम्मच, अरारोट 2 चम्मच, दही, हरी चटनी, मीठी चटनी, चाट मसाला.

बनाने की विधि: आलू को कद्दूकस कर लें. इस में 2 छोटी चम्मच अरारोट डाल कर अच्छी तरह से मिलाते हुए एकदम गुंथे आटे जैसा तैयार कर लें. आलू के साथ मिक्स करने के लिए मटर में गरम मसाला, स्वादानुसार नमक, अमचूर, लाल मिर्च पाउडर और धनिया पाउडर डाल कर सारी चीजों को अच्छी तरह से मिला लीजिए. जितना बड़े भल्ले बनाना है, उतना बड़े गुंथे आलू से निकाल कर गोले बना लीजिए. इसी पिसी मटर को भी तैयार कर लीजिए. एक गोला उठाइए और इस के बीच में जगह बना कर एक भाग मटर इस में भर दीजिए. चारों तरफ से आलू ले कर मटर को बंद कर दीजिए.

तवा गरम कर के उस पर एक टेबल स्पून तेल डाल कर चारों ओर फैला दीजिए. एकएक कर के तवे पर जितनी टिक्की आ जाए, सिंकने के लिए लगा कर रख दीजिए. धीमी आग पर आलू टिक्की सेंकिए. टिक्कियों को उलटपलट कर दोनों ओर से ब्राउन होने तक सेंकें. टिक्कियां सिंकने के बाद और कुरकुरा करने के लिए इन्हें तवे के किनारे लगा कर रख दीजिए. बाकी टिक्कियां भी इसी तरह सेंक लें. लीजिए, आलू भल्ले तैयार हैं.

आलू भल्ले को खाने के लिए देने से पहले टिक्की को तवे पर बीच में ला कर दबा कर और कुरकुरा कर लीजिए. एक या 2 टिक्की प्लेट में निकाल कर रखिए. टिक्की के ऊपर दही, हरी चटनी, मीठी चटनी डालिए और ऊपर से चाट मसाला भी डालिए. गरमागरम आलू भल्ला परोसिए. कई जगहों पर इसे हरेभरे पत्तों से बने दोने में दिया जाता है, तो कई जगह पर मिट्टी के कुल्हड़ में भल्ले खाने को दिए जाते हैं. प्रयोग के तौर पर इस में ऊपर से महीन सेव भी डाल दी जाती है.

Kisan Samman : भोपाल में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के किसानों का सम्मान

Kisan Samman : दिल्ली प्रेस की कृषि पत्रिका फार्म एन फूड द्वारा 28 फरवरी, 2025 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रवींद्र भवन में राज्य स्तरीय फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के 150 से ज्यादा किसान और कृषि वैज्ञानिक शामिल हुए और खेती में नवाचार और तकनीकी के जरिए विभिन्न 17 श्रेणियों में बदलाव लाने वाले तकरीबन 30 किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विज्ञान केंद्रों को राज्य स्तरीय फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड से सम्मानित किया गया.

दिल्ली प्रेस के कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ ने कहा, ‘कृषि जगत हमारे देश की रीढ़ की हड्डी है. इसी क्षेत्र में किसानों के योगदान को लोगों को बताने के लिए हम ने फार्म एन फूड पत्रिका को शुरू करने की सोची और यह भी माना कि यह किसान समाज को जोड़ने की कड़ी है. मैं खुद को कृषि का छात्र मानता हूं. कोरोना काल मे घर पर एक किचन गार्डन बनाया था जो अब भी बरकरार है. हमारे जो आज के विजेता हैं वे बहुत मेहनती हैं और वे इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा अचीव कर रहे हैं. मेरी अपील है कि किसान इस पत्रिका से जुड़े रहें ताकि हमारी संस्था कृषि जगत में होने वाली हर बात को जनजन तक पहुंचा सकें.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और मध्य प्रदेश के सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, ‘भारत गांव में, खेत में और खलिहान में बसता है. हमें खेती पर और किसान पर ध्यान देना होगा. हमें फूड प्रोसेसिंग पर जोर देना होगा. ‘नदी जोड़ो अभियान’ इस में सहायक है. खेत से ही इस देश को मजबूत करने की इबारत लिखी जा सकती है. सरकार का यही उद्देश्य की खेती मुनाफे का धंधा बने.’

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और मध्य प्रदेश सरकार में कौशल विकास एवं रोजगार मंत्री गौतम टेटवाल ने कहा, ‘सीखने की कोई उम्र नहीं होती और किसान हमेशा सीखता है. वह नवाचार करता है, नई तकनीक इस्तेमाल करता है. जब किसान के पास पर्याय खाद होगी और दूसरी सुविधाएं मुहैया होंगी, वह इस क्षेत्र में और आगे बढ़ेगा.’

विजेता किसानों में रतलाम के कपिल धाकड़ को बेस्ट यंग फार्मर अवार्ड दिया गया. महासमुंद के मिलन सिंग विश्वकर्मा और भोपाल के मनोहर पाटीदार को बेस्ट मेल फार्मर अवार्ड मिला. ग्वालियर की निशा निरंजन को बेस्ट फीमेल फार्मर अवार्ड से सम्मानित किया गया, जबकि भोपाल के गीता प्रसाद पाटीदार, शाजापुर के जयनारायण पाटीदार और टीकमगढ़ के पूरन लाल कुशवाहा को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इनोवेटिव फार्मिंग अवार्ड दिया गया.

अशोकनगर के खुमान सिंह रघुवंशी, भिंड के रामगोपाल सिंह, दंतेवाड़ा के जयलाल यादव को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन आर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग का अवार्ड मिला. उज्जैन के अश्विनी सिंह चौहान, नारायणपुर के सुरेंद्र कुमार नाग को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इंटीग्रेटेड फार्मिंग दिया गया.

नरसिंहपुर के कृष्णपाल लोधी को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन शुगरकेन प्रोडक्शन मिला, जबकि अशोकनगर के राजपाल सिंह नरवरिया को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मैकेनाइजेशन अवार्ड हासिल हुआ. इसी तरह बलौदाबाजार के विरेंद्र अग्रवाल को बेस्ट डेयरी/एनिमल कीपर का अवार्ड, तो मुरैना के यशपाल कुशवाह को बेस्ट मधुमक्खीपालक फार्मर अवार्ड दिया गया. शाजापुर के कृष्णपाल सिंह राजपूत को बेस्ट पोल्ट्री/हैचरी फार्मर अवार्ड मिला, तो नरसिंहपुर के राकेश दुबे को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मार्केटिंग दिया गया.

कोंडागांव, छत्तीसगढ़ के डा. राजाराम त्रिपाठी को सस्टेनेबल फार्मिंग टेक्नोलॉजी अवार्ड, तो कोंडागांव की ही डा. अपूर्वा त्रिपाठी को वुमन एग्री-इनोवेटर आफ द ईयर का अवार्ड मिला. रतलाम के डा. सुशील कुमार, भिंड के डा. सत्येंद्र पाल सिंह, दुर्ग की डा. ज्योत्स्ना मिश्रा को बेस्ट रिसर्च अवार्ड इन फार्मिंग सिस्टम से नवाजा गया.

इसी तरह केवीके बड़वानी, जिला बड़वानी, केवीके जावरा, जिला रतलाम, केवीके, रायसेन, जिला रायसेन, केवीके, नारायणपुर, जिला नारायणपुर, केवीके, बालोद, जिला बालोद को बेस्ट कृषि विज्ञान केंद्र अवार्ड मिला. भोपाल के खारपी फार्मर एफपीओ और नरसिंहपुर के शक्तिपूजा एफपीओ को बेस्ट एफपीओ अवार्ड दिया गया.

इन श्रेणियों में मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ से कृषि विज्ञान केंद्रों व कृषि संस्थानों के संस्तुति सहित 200 से भी अधिक नोमिनेशन प्राप्त हुए थे. विभिन्न श्रेणियों में प्राप्त इन नोमिनेशन का 4 सदस्यीय जूरी द्वारा मूल्यांकन किया गया, जिस में सर्वश्रेष्ठ नोमिनेशन को पुरस्कार के लिए चुना गया.

इस सम्मान समारोह में पुरस्कृत किसानों के साथसाथ कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य कृषि संस्थानों के वैज्ञानिक, अन्य शासकीय और प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित रहे. इस कार्यक्रम का मंच संचालन विजी श्रीवास्तव ने किया. इस कार्यक्रम में कृभको और जात्रे आइसक्रीम की विशेष रूप से सहभागिता रही. उन्होंने सह प्रायोजक के रूप में किसानों का हौसला बढ़ाया.

आम (Mango) के रोग और उपचार

आम का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है और दिल को सुकून मिलता है. हमारे दिमाग में एक ऐसे फल की तसवीर उभरती है जिसे सोच कर ही खुशी से झूमने लगता है. आम ऐसी फसल है जिसे हर कोई खाना पसंद करता है.

भारत में आम फलों का राजा है. इस की पैदावार तकरीबन पूरे भारत में होती है, लेकिन खासतौर से उत्तर प्रदेश आम के लिए जाना जाता है. यहां पर मलीहाबाद के आमों की मिठास विदेशों में भी लोगों को अपना मुरीद बना चुकी है.

पाकिस्तान, बंगलादेश, अमेरिका, फिलीपींस, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, जांबिया, माले, ब्राजील, पेरू, केन्या, जमायका, थाईलैंड, इंडोनेशिया, श्रीलंका वगैरह देशों में भी आम उगाया जाता है.

भारत में आम के बाग सब से ज्यादा उत्तर प्रदेश में हैं, लेकिन इस की सब से ज्यादा पैदावार आंध्र प्रदेश में होती है. आम की बागबानी के लिए गरम आबोहवा बेहतर है.

आम के लिए 24 से 26 डिगरी सैल्सियस तापमान वाला इलाका सब से अच्छा माना गया है. यह नम व सूखी दोनों तरह की जलवायु में उगता है. लेकिन जिन इलाकों में जून से सितंबर माह तक अच्छी बारिश होती है और बाकी महीने सूखे रहते हैं, वहां आम की पैदावार ज्यादा होती है.

आम के पेड़ों को रोगों से बचाना बहुत जरूरी है. समयसमय पर आम में लगने वाली खास बीमारियों पर नजर रख कर ही रोगों से बचाया जा सकता है.

काली फफूंद रोग

आम के पुराने और घने गहरे बगीचों में आम के फूलों और मुलायम पत्तियों से रस चूसने वाले कीट जैसे भुनगा, फुदका, मधुआ और कढ़ी कीट का प्रकोप चैत्र माह से ही शुरू हो जाता है. ये कीट छोटीछोटी नई मुलायम पत्तियों और फूलों से रस चूसते रहते हैं. इस वजह से आम की पत्तियों और फूलों के ऊपर एक चिपचिपाहट सी बनने लगती है और फल झड़ने लगते हैं.

यह रोग भुनगा कीट की वजह से होता है. फफूंद के जरीए भी यह रोग तेजी से फैलती है. कुछ समय बाद आम के बगीचों में पेड़ों की पत्तियों पर काले रंग की एक परत बन जाती है, जो सीधा पत्तियों से भोजन बनाने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है.

उपचार

काली फफूंदी के नियंत्रण के लिए नीम की पत्तियों को उबालें. इस के बाद 10-12 लिटर उबले हुए पानी को 100 लिटर पानी में मिला कर पेड़ों पर 2-3 बार अच्छी तरह से स्प्रेयर पंप की मदद से छिड़काव करना चाहिए.

आम का भुनगा, फुदका और कढ़ी कीट पर 300 से 400 मिलीलिटर नीम के तेल को 100 लिटर पानी में घोल कर फूल खिलने से पहले या फिर मटर के दाने के बराबर फल बनने के बाद 2-3 छिड़काव करने से इन कीटों पर काबू पाया जा सकता है.

इस के अलावा ब्यूबेरिया बेसियाना की 200 ग्राम मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल कर 2-3 बार छिड़काव करने या 15-20 दिन पुरानी सड़ी हुई छाछ या मट्ठा 10 लिटर व 8 से 10 दिन पुराने 10 लिटर गौमूत्र को 100 लिटर पानी में मिला कर पूरे पौधे पर 2-3 छिड़काव करने से कीट पर नियंत्रण पाया जा सकता है.

चूर्णिल आसिता रोग

आम का यह रोग फफूंद की वजह से फैलता है. इस रोग का हमला होने आम की पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसे धब्बे बन जाते हैं. कभीकभी फूलों की टहनियों और छोटेछोटे फलों पर भी ये धब्बे हवा के रुख के साथ फैल जाते हैं. इस वजह से फल पकने से पहले ही पेड़ से पत्ते गिर जाते हैं.

इस रोग की रोकथाम के लिए 100 लिटर पानी में मिलाएं 10 दिन पुरानी सड़ी हुई छाछ या मट्ठा 10 लिटर या 10 लिटर गौमूत्र 10-12 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करने से रोग इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है.

सूखा रोग

आम के पेड़ों में लगने वाला सूखा रोग यानी तनाछेदक कीट हरियाली का दुश्मन है. इस रोग के प्रकोप से आम का हराभरा पेड़ कुछ ही महीनों में सूख कर ढांचे में तबदील हो जाता है.

तनाछेदक कीट पौधे के तने में छेद कर आसानी से अंदर घुस जाता है. पेड़ के तने को सावधानी से देखने पर किसानों को कीड़ों के होने की प्रारंभिक दशा में छाल पर चूर्ण जैसा पदार्थ देखने को मिलता है. तना गीला हो जाता है. कीट के बड़े हो जाने पर तने में सुराख साफसाफ दिखाई देने लगता है.

उपचार न होने की दशा में कीट तने को खोखला कर देते हैं. इस से पेड़ सूखने लगता है. इस में पत्तियां ऊपर से सूखना शुरू होती हैं, जो नीचे की ओर बढ़ती जाती हैं.

ऐसे करें रोकथाम

तनाबेधक या तनाछेदक कीट साल में सिर्फ 2 महीने मई व जून माह में बाहर रहता है. नियंत्रण के लिए क्विनालफास व साइपरमैथलीन दवा का स्प्रे करें.

रोकथाम के लिए बाद में तने को छील कर सुराख में साइकिल की तीली डाल कर बड़े कीटों को मारा जा सकता है.

अंडे बच्चों को नष्ट करने के लिए मोनोक्रोटोफास के घोल को रुई में भिगो कर सुराख में डाल दें व ऊपर से गाय के गोबर में मिट्टी मिला कर लेप लगा दें.

देशी उपचार में 2 किलोग्राम तंबाकू व ढाई सौ ग्राम फ्यूरोडान प्रति पेड़ की जड़ में डालने से भी रोकथाम हो सकती है.

बौर का रोग

आम के बौरों, फलों या पत्तियों पर सफेद चूर्ण की तरह का पदार्थ दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि पेड़ों पर राख छिड़क दी गई है. प्रकोप होने से उन की बढ़वार रुक जाती है और फूल गिरने लगते हैं.

बौर के समय फुहार और ठंडी रातें इस रोग के बढ़ने में मददगार होती हैं. कवक से नए फल बिलकुल ढक जाते हैं और धीरेधीरे उस की बाहरी सतह पर दरारें पड़ने लगती हैं. दरार वाला वह भाग कड़ा हो जाता है. नए फल मटर के दाने के बराबर होने के पहले ही गिर जाते हैं.

नई पत्तियों की पिछली सतह पर यह रोग काफी फैलता है और स्लेटी रंग के धब्बे बनने लगते हैं, जिस पर सफेद चूर्ण दिखाई पड़ता है और रोगग्रस्त पत्तियां टेढ़ी हो जाती हैं. ऐसी पत्तियां पूरे साल पौधों पर लगी रहती हैं और अगले साल भी रोगों को फैलाने में सहायक होती हैं.

उपचार से करें बचाव

इस रोग से बचाव के लिए फूल के मौसम में कुल 3 छिड़काव करने चाहिए. पहला छिड़काव 0.2 फीसदी विलयशील गंधक (वेटेबल सल्फर) (सल्फेट या दूसरा विलयशील गंधक फफूंदनाशक 2 ग्राम प्रति लिटर), दूसरा छिड़काव 0.1 फीसदी ट्राइडीमार्फ या 0.04 फीसदी फ्लूजिजाल (1 मिलीलिटर कैलिक्सीन या 0.4 मिलीलिटर पंच प्रति लिटर) और तीसरा छिड़काव 0.1 फीसदी डाइनोकैप या बावस्टीन (1 मिलीलिटर 5 प्रति केराथेन या 1 ग्राम ट्राइडीमेफान प्रति लिटर) से करना चाहिए.

पहला छिड़काव बौर निकलने के दौरान करना चाहिए. दूसरा और तीसरा छिड़काव 10-15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए.

आम (Mango)

पत्तियों पर एंथ्रेक्नोज रोग

तुड़ाई के बाद आम का यह सब से खास रोग है. यह एक फफूंद कोलेटोट्राइकम ग्लोयोस्पोराइडिस से होती है. इस का प्रकोप हर आम उगाने वाली जगहों पर होता है. फलों पर इन के लक्षण शुरू में छोटेछोटे भूरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते  हैं, जो बाद में बढ़ कर पूरे फल को ढक लेते हैं. ये धब्बे 3-4 दिन में ही पूरे फल को ढक लेते हैं और पूरा फल काला हो कर सड़ जाता है.

रोकथाम

कार्बंडाजिम या टापसिन-एम (0.1 फीसदी यानी 1 ग्राम प्रति लिटर) का 3 छिड़काव तुड़ाई से पहले करें फिर 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए. छिड़काव इस तरह करना चाहिए कि अंतिम छिड़काव तुड़ाई से 15 दिन पहले हो जाए.

फलों को 0.05 फीसदी कार्बंडाजिम (0.5 ग्राम प्रति लिटर) के कुनकुने पानी में 15 मिनट तक डुबो कर रखने से इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है.

शाखा रोग

इस रोग से शाखाएं और टहनियां सूखने लगती हैं. उन्हें देखने से ऐसा मालूम होता है कि शाखा आग से झुलस गई है. रोग की शुरुआत में शाखाओं के अगले भाग की छाल काली पड़ जाती है, जो धीरेधीरे बढ़ती है और फिर पूरी शाखा ही सूख जाती है. साथ ही, गोंद का रिसाव भी होने लगता है.

रोकथाम

रोगग्रस्त शाखाओं की कटाई रोग से ग्रसित हिस्से के करीब 7.5-10 सैंटीमीटर नीचे से करनी चाहिए. इस के बाद 3 ग्राम फफूंदनाशक दवा प्रति लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करना चाहिए और कटे हुए भाग पर इसी फफूंदनाशक दवा का लेप लगाना चाहिए. छोटे पेड़ों में भी रोगग्रस्त शाखाओं की छंटाई के बाद कौपर औक्सीक्लोराइड का लेप लगाना फायदेमंद है.

रेड रस्ट रोग

पत्तियों पर गोलाकार, मटमैले रंग के मखमली धब्बे दिखाई देते हैं, जिन का आकार बाद में बड़ा और रंग बादामी हो जाता है.

धब्बे की सतह भी उभरी हुई होती है. इस के ऊपर काई के बीजाणु बनते हैं जो बाद में तांबे के रंग के हो जाते हैं. आखिर में बीजाणुओं के झड़ने की वजह से पत्तियों पर गोलाकार सफेद निशान रह जाते हैं.

इस रोग के कारण पत्तियां और टहनियां छोटी रह जाती हैं और बाद में सूखने लगती हैं.

दिसंबरजनवरी माह में रोग से ग्रसित पत्तियां अधिक झड़ती हैं और पौधे दूर से ही मुरझाए हुए से दिखाई देते हैं.

रोकथाम

इस रोग की रोकथाम के लिए 0.3 फीसदी कौपर औक्सीक्लोराइड (3 ग्राम प्रति लिटर का 2-3 ग्राम प्रति लिटर) का छिड़काव करना असरदार पाया गया है.

ये सारे रोग आम के फलों में तुड़ाई से पहले लगते हैं, लेकिन इन सारे रोगों से निबटने के बाद भी आम के उत्पादकों को तुड़ाई के बाद भी कई तरह के रोगों से अपने फलों को बचाने की चुनौती रहती है. अगर जरा सी लापरवाही की गई तो सारी मेहनत पर पानी फिर सकता है.

आम (Mango)

तुड़ाई के बाद रोग

फलों में तुड़ाई के बाद भी उत्पादन का तकरीबन 25-40 फीसदी कई वजहों से खराब हो जाता है. यह नुकसान गलत समय पर फलों की तुड़ाई, गलत तुड़ाई के तरीके और गलत ढंग से भंडारण करने की वजह से होता है. लेकिन जो नुकसान होता है, वह मुख्य रूप से फलों की तुड़ाई के बाद लगने वाले रोग हैं.

आम की तुड़ाई के बाद होने वाले रोगों में मुख्य फफूंद है. तुड़ाई के बाद फलों में संक्रमण, आम की ढुलाई, भंडारण और लाने और ले जाने के दौरान होता है.

आम में बीमारियों का प्रकोप 2 तरह से होता है. एक तो फलों के लगते समय ही उन को संक्रमित कर देते हैं, दूसरे तुड़ाई के बाद फलों के रखरखाव के दौरान होता है.

आम की तुड़ाई के बाद भी बहुत सी बीमारियां लगती हैं, लेकिन इन में एंथ्रेक्नोज, ढेपी विगलन और काला सड़न बीमारी से अधिक नुकसान का डर रहता है.

गहरे भूरे रंग का डंठल

तुड़ाई के बाद आम की यह खास बीमारी है. यह लेसियोडिपलोडिया थियोब्रोमी नामक फफूंद से होती है. इस में तकरीबन 15-20 फीसदी तक का नुकसान होता है. यह बीमारी आम की चौसा किस्म में अधिक पाई जाती है. फलों में यह बीमारी ढेपी की तरह से शुरू होती है तभी इसे ढेपी विगलन रोग कहते हैं.

शुरू में जहां पर डंठल लगा होता है, वह भाग गहरे भूरे रंग का हो जाता है और धीरेधीरे बढ़ कर यह पूरे फल को ढक लेता है. 3-4 दिन बाद पूरा फल सड़ कर काले रंग का हो जाता है.

रोकथाम

फल को 1 से 2 सैंटीमीटर के डंठल सहित तोड़ना चाहिए. इस के बाद फल को मिट्टी के संपर्क में नहीं आने देना चाहिए.

तुड़ाई से पहले 2 छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर कार्बंडाजिम या टापसिन एम (0.1 फीसदी यानी 1 ग्राम प्रति लिटर) का करना चाहिए. फलों को 0.05 फीसदी कार्बंडाजिम (0.5 ग्राम प्रति लिटर) के कुनकुने पानी में 5 मिनट डुबो कर रखने से इस रोग पर नियंत्रण किया जा सकता है.

काला सड़न रोग

यह रोग एस्परजीलस नाइजर नामक फफूंद से होता है. यह रोग फलों में चोट या कटे स्थान से शुरू होता है.

शुरू में इस के लक्षण पीले रंग के गोल धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं, जो बाद में भूरे रंग के हो जाते हैं. 3-4 दिन में धब्बे आकार में बढ़ जाते हैं और इन के ऊपर काले रंग के फफूंद के जीवाणु दिखाई देने लगते हैं.

रोकथाम

फलों को सावधानी से तोड़ना चाहिए, ताकि फलों पर खरोंच न लगे या फल न कटे.

फलों को 0.5 फीसदी कार्बंडाजिम (0.5 ग्राम प्रति लिटर) के कुनकुने पानी में 5 मिनट तक डुबो कर रखने से इस रोग पर काबू किया जा सकता है.

अगर आप को आम की अच्छी उपज लेनी है तो शुरू से ही पौधों की देखभाल करें. आम के पौधों को जितना फल लगने के बाद देखभाल की जरूरत होती है, उस से कहीं ज्यादा फल आने के पहले होती है.

आमतौर पर किसान यहीं गलती करते हैं. इस वजह से उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है. बौर आने के पहले रोगों से आम को बचाएं, साथ ही, बौर आने के बाद भी कई तरह के छिड़काव से रोगों से बचाना अहम हो जाता है. जब फल बड़े हो कर तुड़ाई के लिए तैयार हो जाएं तब भी उन्हें सड़नेगलने से बचाना उतना ही जरूरी है, जितना शुरुआत में बचाया गया था.