पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ने की मिठास को और बढ़ाने के लिए कृषि वैज्ञानिक जुटे हुए हैं. लक्ष्य सिर्फ गन्ने की मिठास बढ़ाना ही नहीं, बल्कि ऐसी प्रजाति विकसित करना है जिसमें रोग कम से कम लगें और प्रतिकूल मौसम का प्रजाति पर कोई असर नहीं पड़े. टिश्यू कल्चर तकनीक मुद्दे पर बायोटेक कॉलेज में बनी टिश्यू कल्चर लैब प्रभारी और शोध में जुटे डा. आर. एस. सेंगर से लंबी बातचीत हुई. आइए जानते हैं कि उन्होंने क्या बताया :

टिश्यू कल्चर तकनीक से गन्ना की नई प्रजातियां होंगी तैयार

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय ने टिश्यू कल्चर लैब में गन्ने की प्रजातियों को विकसित करने का काम शुरू कर दिया है. इस पर शोध के लिए वैज्ञानिकों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रचलित गन्ने की प्रजातियों के अलावा कुछ बाहरी प्रजातियों का भी चयन किया है. इसमें गन्ने की मिठास बढ़ाने के अलावा विभिन्न कारणों से गन्ने में लगने वाले रोगों की रोकथाम भी शामिल है.

वैज्ञानिकों का मानना है यदि प्रयोग सफल रहा तो किसानों तक जो प्रजाति पहुंचेगी वह रोगरहित होगी. छोटे-मोटे रोग, प्रजाति के आसपास भी नहीं फटकेंगे.

बायोटेक टिश्यू कल्चर लैब प्रभारी और शोध में जुटे डॉ. आरएस सेंगर ने बताया कि तमिलनाडु की तरह यदि हम टिश्यू कल्चर तकनीक से गन्ना उत्पादन करें तो काफी लाभ हो सकता है. तमिलनाडु में प्रति हेक्टेयर गन्ना उत्पादक 104.2 टन है, जो उत्तर प्रदेश में औसतन 61.9 टन है, जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 65 टन प्रति हेक्टेयर है.

वैज्ञानिक तरीके से गन्ना उत्पादन, पूरे साल चल रहीं चीनी मिल

कोयंबटूर क्षेत्र में पूरे साल गन्ने की फसल होती है और चीनी मिलें पूरे साल चलती हैं. देखने में यह आया है कि वहां पर गन्ने की लंबाई तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश से कम है लेकिन गन्ने की मोटाई लगभग दोगुना होती है. यह प्रजाति पर निर्भर करता है कि उसकी मोटाई कितनी हो. यहां के 90 फीसदी किसान वैज्ञानिक पद्धति से गन्ने की खेती करते हैं और संख्या के हिसाब से गन्ने का प्लांटेशन करते हैं. जरूरत होने पर खेत में गैप को पूरा करने के लिए गन्ने की पौध को वहां लगाकर पूरा करते हैं.

पैडी प्रबंधन है समस्या का समाधान

गन्ना बोते समय कई बार कुछ-कुछ जगह गन्ना नहीं उगता. कारण चाहे कोई भी हो पर नुकसान किसान का होता है. इसके लिए किसानों को चाहिए कि वे पॉलीबैग में गन्ने की पौध उगाकर तैयार रख लें और जहां भी खेत में गैप रह जाता है वहां पर उस गन्ना पौध के जरिए तुरंत रोपाई करें, जिससे गन्ना उत्पादन अच्छा होगा.

उत्तर प्रदेश में अक्सर पैडी प्रबंधन का अभाव देखा गया है. यहां पर गन्ने के पौधों में 60-75 सेंटीमीटर का अंतर होता है लेकिन तमिलनाडु में यह अंतर 90 सेंटीमीटर होता है. वहां का तापमान हमेशा 21 से 35 डिग्री सेल्सियस होता है जो गन्ने की फसल से लिए अनुकूल है. वहां पर किसान बीज प्रबंधन, पोषक तत्त्व प्रबंधन, सिंचाई और कीड़ों व बीमारियों पर विशेष ध्यान देता है लेकिन यहां पर बिना मृदा परीक्षण के ही लगातार खेती करता रहता है, जो नुकसान का कारण भी बनता है.

क्या है टिश्यू कल्चर तकनीक?

इस खास तकनीक के बारे में डॉ. सेंगर ने बताया कि इस विधि में पौधे के भाग से ऊतक लेकर प्रयोगशाला में संर्वधन किया जाता है, जिससे नए पौधे बनते हैं. यही विधि टिश्यू कल्चर विधि कहलाती है.

टिश्यू कल्चर तकनीक से उन पौधों को बनाने में फायदा होता है जिनके बीज आसानी से नहीं मिलते हैं. इसके लिए एक स्वस्थ पौधे को लेकर इससे रोगरहित कई पौधे एक ही वर्ष में बनाए जा सकते हैं.

टिश्यू कल्चर तकनीक से लाखों पौधे होते हैं तैयार

टिश्यू कल्चर के पौधे पैतृक गुणों के होते हैं. इसके एक छोटे से भाग से लाखों पौधे तैयार हो जाते हैं और वे एक समान प्रकार के गन्ने पैदा करने में सक्षम होते हैं. उनसे शुरू से ही अच्छा अंकुरण और पौधे की अच्छी बढ़वार होती है. विकसित पौधों में रोग लगने की संभावना कम होती है और उत्पादन भी अच्छा मिलता है.

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