Guar Beans : ग्वार खासतौर पर सब्जी, चारे और हरी खाद के लिए उगाई जाती है. ग्वार (Guar Beans) के बीजों में 28-33 फीसदी तक गोंद होता है. ग्वार (Guar Beans) के गोंद का औद्योगिक महत्त्व होता है. इस की खूबियों की वजह से कृषि वैज्ञानिकों, उत्पादकों, उद्योगपतियों और योजनाकारों द्वारा इस की नईनई सुधरी किस्मों पर खास ध्यान दिया जा रहा है.
ग्वार से बन रहा गोंद
वर्तमान में ग्वार (Guar Beans) के दानों से गोंद बनाने के कारखानों में इजाफा हुआ है. ग्वार (Guar Beans) से बनने वाला गोंद अमेरिका, जापान, फ्रांस, इटली व नीदरलैंड वगैरह देशों को भेजा जाता है.
ग्वार (Guar Beans) की फसल में भी कई रोग लग जाते हैं, नतीजतन उत्पादकता में काफी कमी आ जाती है. ग्वार में लगने वाले खास रोग व उन से बचाव के बारे में यहां जानकारी दी जा रही है.
शुष्क जड़गलन
बीज व भूमि दोनों से यह बीमारी फैलती है. सूखे हालात में इस बीमारी का हमला अधिक होता है. कभीकभी कम बारिश की वजह से या 2 बारिशों के बीच लंबे फासले से भी इस बीमारी का हमला होता है. जब बीमारी का असर ज्यादा होता है, तो से 40 से 50 फीसदी तक नुकसान हो जाता है.
इस बीमारी की वजह से रोगी पौधों की जड़ें सड़ जाती हैं. खेत में मुरझाए हुए रोगी पौधों के तनों का रंग हलका भूरा हो जाता है. ऐसे रोगी पौधे आसानी से उखाड़े जा सकते हैं. रोगग्रस्त पौधों पर फलियां नहीं लगती हैं.
अपनाएं फसल चक्र
फसलचक्र अपनाना चाहिए. फसलचक्र में बाजरा लेने से यह रोग कम लगता है. बोआई से पहले कार्बंडाजिम 50 डब्ल्यूपी की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम की दर से बीजों का उपचार करना चाहिए.
जल्दी पकने वाली किस्मों की बोआई करनी चाहिए. इस से बीमारी कम लगती है.
सिंचाई की सुविधा वाले इलाकों में जहां रबी की फसल भी ली जाती है, 2.5 टन सरसों की फलगरी व आधा टन सरसों की खली मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालना चाहिए और तेज गरमी के समय 1 बार पानी देना चाहिए. तेज गरमी में सरसों के कचरे के सड़ने पर जो गैसें पैदा होती हैं, वे इस रोग की फफूंद को खत्म कर देती हैं.
शाकाणु झुलसा
इस रोग में पत्तियों पर दोनों तरफ शिराओं के बीच में बड़ेबड़े गोल चिपचिपे धब्बे बन जाते हैं, जो अनुकूल वातावरण मिलने पर एकदूसरे से मिल कर पत्तियों को झुलसा देते हैं. रोगी पत्तियां समय से पहले गिर जाती हैं. रोग का असर ज्यादा होने पर तने पर लंबी धारियां दिखाई देती हैं, जिस से तना काला पड़ जाता है. पौधों पर फलियां कम लगती हैं व फलियों में दाने भी कम होते हैं.
रोकथाम
बोआई से पहले बीजों को स्ट्रेप्टोसाइक्लीन (0.025 फीसदी) से उपचारित करना चाहिए. इस के लिए 10 लीटर पानी में 2.5 ग्राम स्टे्रप्टोसाइक्लीन घोल कर उस में बीजों को 2 घंटे डुबो कर निकालें और छाया में सुखा कर बोआई करें.
रोगरोधी किस्मों की करें बोआई
रोगरोधी किस्मों की बोआई करें. आरजीसी 986, एचएफजी 75, आरजीसी 1002, एचजीएस 365 इस की खास रोगरोधी किस्में हैं.
छाछिया रोग
यह रोग पहले पत्तियों पर हमला करता है. इस की वजह से पत्तियों पर गहरे सफेद रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, जो निचली सतह पर ज्यादा होेते हैं. रोग का असर ज्यादा होने पर पत्तियां गिर जाती हैं, पौधे जल्दी पक जाते हैं, बीज हलके व छोटे रह जाते हैं और उपज में भी कमी हो जाती है.
रोकथाम
रोग के लक्षण दिखाई देते ही घुलनशील गंधक के 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए या गंधकचूर्ण का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर भुरकाव करना चाहिए. बचाव के लिए डिनोकेप या ट्राइडेमोर्फ 0.1 फीसदी घोल का छिड़काव भी किया जा सकता है. जरूरत के मुताबिक 15 दिनों के अंतराल पर दवा का दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है.
पत्ती धब्बा रोग
इस के असर से पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के छोटेछोटे गोल या असमान धब्बे पड़ जाते हैं, जो बाद में गोलाकार छल्लों का रूप ले लेते हैं. अधिक नमी के मौसम में ये धब्बे फैल कर पत्ती के ज्यादातर भाग को झुलसा देते हैं. रोग के असर से फलियां कम बनती हैं और उन में दाने छोटे व हलके होते हैं. उपज में काफी कमी आ जाती है.
रोकथाम
रोग रहित क्षेत्रों से अच्छे व स्वस्थ बीज लेने चाहिए.
एचजीएस 365 व आरजीसी 986 वगैरह रोगरोधी किस्मों को बोना चाहिए.
रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही मैंकोजेब या कापर आक्सीक्लोराइड के 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए. इस से पत्ती
धब्बा रोग सरकोस्पोरा, मायरोथिसियम, कालीटोट्राइकम व करबुलेरिया की भी रोकथाम हो जाती है.
ज्यादा जानकारी के लिए लेखक के मोबाइल नंबर 09414921262 पर संपर्क कर सकते हैं.





