Lentil: मसूर की दाल कई मानों में खास है. एक तरफ जहां यह दूसरी दालों के मुकाबले सस्ती होती है, वहीं यह असानी से पचने के कारण कई बीमारियों में भी लाभप्रद है. अगर इस में मौजूद पोषक तत्त्वों की बात की जाए तो इस में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम व लोहा वगैरह पाए जाते हैं.

कम पानी की खेती

मसूर (Lentil) में अन्य दलहनी फसलों के मुकाबले सूखा सहन करने की कूवत ज्यादा होती है. यह फसल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने व मृदाक्षरण रोकने में सहायक होती है. इस लिहाज से किसानों के लिए मसूर की खेती कम लागत में काफी लाभप्रद है. आइए जानते हैं मसूर (Lentil) की खेती के बारे में सीनियर साइंटिस्ट डा. ज्योति कुमारी से:

कैसे करें खेती की तैयारी

बलुई दोमट और मध्यम दोमट मिट्टी मसूर (Lentil) की खेती के लिए अच्छी है. बोआई के लिए पलेवा कर के 2 से 3 जुताई करनी चाहिए, जिस से मिट्टी भुरभुरी हो जाए. खेत में खरपतवार व पिछली फसल के अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए. खेत की तैयारी के समय उचित नमी का ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि उचित नमी पर ही बीजों का जमाव निर्भर करता है.

मसूर की नई प्रजातियां

मसूर की नई उपलब्ध प्रजातियां हैं लेंस 4076, डीपीएल 15, पूसा वैभव, डीपीएल 62, जेएल 3, आईपीएल 81, केएलएस 218, एचयूएल 57 और वीएल 507 वगैरह. इन में से किसी का भी इस्तेमाल आवश्यकतानुसार किया जा सकता है.

कब करें बोआई

मसूर का भरपूर उत्पादन हासिल करने के लिए इस की समय से बोआई बेहद जरूरी है. अक्तूबर का अंतिम हफ्ता मसूर की बोआई के लिए सही समय है. हालांकि नवंबर के दूसरे हफ्ते तक इस की बोआई की जा सकती है.

सीडड्रिल से बोआई है लाभकारी

बोआई देशी हल या सीडड्रिल द्वारा की जा सकती है. अधिक उत्पादन के लिए सीडड्रिल द्वारा बोआई करनी चाहिए. बोते समय इस बात का खयाल रखना चाहिए कि खेत में पर्याप्त नमी हो जिस से बीजों का जमाव सुनिश्चित हो सके. बोआई कतारों में करनी चाहिए, इस से पौधों के विकास में सहायता मिलेगी और निराईगुड़ाई में भी आसानी होगी.

बीजोपचार है जरूरी

बीजों को फफूंदनाशक रसायन जैसे बीनोमाइल 0.3 फीसदी से उपचारित कर के बोना चाहिए. किसी क्षेत्र में मसूर की खेती पहली बार की जा रही हो, तो बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए. इस से जड़ों में गांठों का उचित विकास होता है, जो उत्पादन वृद्धि में सहायक है.

कब करें उर्वरकों का इस्तेमाल

दलहनी फसल होने के कारण मसूर में नाइट्रोजन 15 से 20 किलोग्राम, फास्फोरस 50 से 60 किलोग्राम और पोटाश 30 से 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से दी जानी चाहिए. जिन क्षेत्रों में जिंक की कमी हो, वहां पर 2.5 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करनी चाहिए. खेत में सल्फर की जरूरत होने पर 30 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के समय देना लाभप्रद होता है.

कीट नियंत्रण जरूरी

मसूर में कीटों का प्रकोप आमतौर पर कम ही होता है. उत्तर, पूर्व और मध्य भारत के इलाकों में जब जनवरी के महीने में तापमान सामान्य से ज्यादा होता है, तो माहू का प्रकोप बढ़ जाता है. माहू पौधों के तनों, पत्तियों और फलियों का रस चूस कर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं. इस से बचाव के लिए डाइमिथोएट 0.03 फीसदी कीटनाशक दवा का पानी में घोल बना कर 500 से 600 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

कब करें कटाई

जब फलियों में पीलापन शुरू हो जाए यानी 70 से 80 फीसदी फलियां सूखने जैसी हालत में आ जाएं, तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिए. इस से बीजों का पौधों से अलग होना रोका जा सकता है. फसल को खेत में सुखा कर दाने अलग कर लें.

अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें...