Rice Transplanter. खरीफ में धान की खेती भारत के 70-80 फीसदी खेतों में की जाती है. पारंपरिक तरीके से धान की खेती करने में कुल पानी का 30 फीसदी केवल कादो यानी कीचड़ और रोपाई में ही खर्च हो जाता है. इस के अलावा कीचड़ करने से मिट्टी की बनावट खराब हो जाती है, जिस का असर अगली फसल पर पड़ता है. ऐसे हालात से निबटने के लिए धान की मैट नर्सरी उगा कर 15 से 18 दिन पुरानी पौध को राइस ट्रांसप्लांटर द्वारा बिना कादो किए हुए खेत में रोपाई कर सकते हैं.

मशीन से धान की रोपाई

इस तकनीक में धान की मैट नर्सरी उगा कर पौध की रोपाई आटोमैटिक या हाथ से चलाए जाने वाले राइस ट्रांसप्लांटर द्वारा खेत में लाइन से लाइन और पौधे से पौधे की दूरी को ध्यान में रखते हुए की जाती है. धान की मैट नर्सरी द्वारा तैयार की गई पौध को रखने के लिए  लोहे की ट्रे इस ट्रांसप्लांटर से जुड़ी होती है.

परंपरागत तरीके से एक मजदूर दिनभर में 500 वर्ग मीटर में रोपाई कर सकता है, जबकि राइस ट्रांसप्लांटर से डेढ़ हेक्टेयर जमीन में 2 मजदूरों द्वारा रोपाई की जा सकती है.

मशीनी रोपाई के फायदे

बारिश में देरी होने पर भी समय पर रोपाई की जा सकती है.

एक समान लाइन से लाइन व पौध से पौध की दूरी को बनाए रखना, जिस से खरपतवार की रोकथाम में आसानी होती है.

कम समय में कल्ले फूटते हैं और एक समय पर ही धान पकता है. इस तकनीक से मौजूदा संसाधनों का सही इस्तेमाल होता है.

मिट्टी की उर्वरा शक्ति और बनावट को बरकरार रखने में और खेती की लागत कम करने में यह तकनीक बहुत कारगर है.

राइस ट्रांसप्लांटर और धान की मैट नर्सरी उगा कर इसे किराए पर दे कर रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं.

रोपाई तकनीक

मशीन को तैयार करने के बाद उस की ट्रे में नर्सरी मैट को रख दें.

खेत के चारों ओर मशीन के चलने लायक जगह छोड़ दें ताकि जब मशीन को मोड़ा जाए तो रोपित बिचड़े को नुकसान न पहुंचे और रोपनी के बाद मशीन को खेत से बाहर निकाला जा सके.

मशीन को सीधा चलाएं और खेत के आखिर में मशीन को अंगरेजी के यू आकार में मोड़ें और आखिरी लाइन में रोपित बिचड़े की सीध में चलाएं.

मशीन को चलाने पर मशीन में बनी अंगुलिकाएं ट्रे से बिचड़े को उठा कर मिट्टी में लगाती हैं.

रोपनी के समय पूरे खेत पर नजर रखें, कहीं पर खाली जगह दिखाई दे तो उस जगह पर हाथ से रोपाई कर दें.

ट्रे खाली होने से पहले उस में नर्सरी मैट को फिर से भर दें.

रोपनी के बाद एक दिन के अंतर पर 5 दिनों तक हलकी सिंचाई करते रहें.

नर्सरी की रोपाई के बाद खरपतवार नियंत्रण, खाद, सिंचाई, कीट व बीमारी से बचाव वगैरह काम परंपरागत तरीके से रोपित धान की तरह ही करें.

इस तरह धान की खेती में आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल कर के हम समय, मेहनत और खर्च बचा कर ज्यादा पैदावार ले सकते हैं.

राइस ट्रांसप्लांटर

2 तरह के राइस ट्रांसप्लांटर बाजार में उपलब्ध हैं:

आटोमैटिक ट्रांसप्लांटर : इस ट्रांसप्लांटर को ट्रैक्टर की तरह इस्तेमाल किया जाता है. इस में किसान के बैठने की जगह होती है. इसे ट्रैक्टर की तरह पूरे खेत में चलाया जाता है और रोपाई  का काम किया जाता है.

हाथ वाला ट्रांसप्लांटर : यह ट्रांसप्लांटर का छोटा रूप है, जिसे पावर टिलर की तरह एक आदमी पीछे से दिशा देते हुए रोपाई करता है.

किसी भी ट्रांसप्लांटर के 2 हिस्से होते हैं,  अगला और पिछला भाग, जो कि अलग भी किए जा सकते हैं. आगे के हिस्से में मशीन का इंजन, गियर बाक्स, लीवर, दांतेदार पहिया होते हैं. पिछले भाग में फ्लोटिंग बोर्ड, नर्सरी प्लेटफार्म, रोपाई करने वाली अंगुलिकाएं व चेन वगैरह होती हैं. आटोमैटिक ट्रांसप्लांटर के अगले हिस्से में चालक के बैठने की सीट और स्टीयरिंग होती है, जब कि हाथ वाले ट्रांसप्लांटर के पिछले हिस्से में हैंडलनुमा ढांचा होता है.

रोपनी से पहले खेत की तैयारी : जिस खेत में मशीन द्वारा रोपाई की जानी है उसे 15-20 दिन पहले लेजर लेवलर द्वारा एकसार कर लेना चाहिए.

रोपनी से 12 घंटे पहले खेत में 1-2 सेंटीमीटर पानी भर दें, ताकि मिट्टी नरम हो जाए. अगर मिट्टी सख्त होगी तो बिचड़े मिट्टी को ठीक ढंग से पकड़ नहीं पाएंगे.

बिना कादो किए गए खेत में राइस ट्रांसप्लांटर द्वारा रोपनी करने के पहले खेत को कल्टीवेटर से जोत कर समतल कर लेना चाहिए. अगर खेत में पानी जमा हो तो रोपनी से 12 से 24 घंटे पहले पानी निकाल देना चाहिए.Rice Transplanter

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