Multi Layer Farming-
त्रिपुरा के ऊंचाई वाले इलाकों में आईसीएआर की नई खेती की तकनीक से धान के बाद खाली रहने वाली जमीन का भी होगा इस्तेमाल.
त्रिपुरा के पहाड़ी और ऊंचाई वाले इलाकों में किसानों के लिए खेती का नया तरीका सामने आया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्वी क्षेत्र के लिए अनुसंधान परिसर, पटना ने बहु-स्तरीय खेती की तकनीक विकसित की है. इसे आईसीएआर-आरएलईआर, त्रिपुरा केंद्र के सहयोग से किसानों के खेतों में अपनाया जा रहा है.
खाली जमीन का होगा इस्तेमाल:
इन इलाकों में कई किसान बारिश के मौसम में धान की खेती करते हैं. धान की फसल के बाद खेत लंबे समय तक खाली पड़े रहते हैं. वहीं, कुछ जनजातीय किसान रबर के बागान लगाते हैं. ऐसे में जमीन का पूरे साल इस्तेमाल नहीं हो पाता और किसानों की आमदनी भी सीमित रहती है.
अब एक खेत में होंगी कई फसलें:
बहु-स्तरीय खेती में एक ही खेत में अलग-अलग ऊंचाई पर बढ़ने वाले पेड़ और फसलें लगाई जाती हैं. इस तकनीक में ऊपरी स्तर पर सागौन, बीच के स्तर पर आम और एक अन्य फल फसल के रूप में बेर लगाया जा रहा है. इनके बीच खाली जगह में दूसरी फसलें भी उगाई जा सकती हैं.
इस तरह खेत में उपलब्ध जमीन, धूप और मिट्टी की नमी का बेहतर इस्तेमाल होता है. किसान को भी अलग-अलग समय पर अलग-अलग स्रोतों से आमदनी मिलने का रास्ता बनता है.
शुरुआत में भी मिल सकती है कमाई:
पेड़ों को तैयार होने में समय लगता है. इसलिए उनके बीच खाली जगह में ऐसी फसलें लगाई जा सकती हैं, जिनसे शुरुआती वर्षों में मौसमी आमदनी हो सके. आगे चलकर आम और बेर से फल की कमाई होगी, जबकि सागौन से लंबे समय में इमारती लकड़ी के रूप में आय मिलने की उम्मीद है.
किसानों को दिया जा रहा प्रशिक्षण:
आईसीएआर की टीम ने टिकाऊ खेती के लिए काम करने वाली संस्था सेवन सिस्टर्स (SeSTA) के कर्मचारियों को खेत की योजना बनाने, पौधों की दूरी तय करने और रोपण की सही तकनीक का प्रशिक्षण दिया है. प्रशिक्षित कर्मचारी अब किसानों को इस तकनीक को अपनाने में मदद कर रहे हैं.
9 किसानों के खेतों में चल रहा प्रदर्शन:
फिलहाल इस बहु-स्तरीय खेती तकनीक का प्रदर्शन 9 किसानों के करीब 3 हेक्टेयर क्षेत्र में किया जा रहा है. क्षेत्रीय प्रदर्शन के दौरान करीब 20 किसानों ने भाग लिया और इस खेती पद्धति के बारे में जानकारी ली.
आईसीएआर के अनुसार, यह तकनीक त्रिपुरा की ऐसी ऊंचाई वाली जमीन के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है, जहां धान की खेती के बाद जमीन खाली रहती है. इससे जमीन का सालभर बेहतर इस्तेमाल हो सकता है और किसानों के लिए आमदनी के कई रास्ते खुल सकते हैं.





