मसालों में सौंफ बड़ी अहम फसल है. खरीफ में रोपण विधि से लगाई गई सौंफ खरीफ की सौंफ कहलाती है. किसान अक्तूबर व नवंबर में सौंफ की सीधे बोआई करते हैं. वे एक-साथ कटाई करके ट्रैक्टर से फसल को सीधे बाजार भेज देते हैं. उसमें गुणवत्ता नहीं रहती और बाजार में दाम बहुत कम मिलते हैं. राजस्थान के सिरोही जिले के फूलाबाई खेड़ा गांव के प्रगतिशील किसान अर्जुन सिंह ने 11वीं जमात तक पढ़ाई के बाद खेती को अपना लिया था. वे सौंफ की खेती कैसे करते है , उनकी सफलता की कहानी जानिएं , उनकी ही ज़ुबानी
सौंफ की खेती
अर्जुन सिंह का कहना है कि, सौंफ की खेती करके उसकी गुणवत्ता बनाए रखें, तो भरपूर आमदनी होती है. 1 बीघा खेत में सौंफ की पैदावार 15 बोरी तक हो सकती है. अधिक कमाई के लिए उत्तम गुणवत्ता का होना बेहद जरूरी है.
खेत की तैयारी और बोआई
उत्तम गुणवत्ता के लिए वे खरीफ की सौंफ बोते हैं, यानी जुलाई में सौंफ की क्यारियों में बोआई करते हैं. अर्जुन 10×5 फुट की क्यारियां बनाते हैं. वे अच्छी बरसात में सौंफ के पौधों को खेतों में रोपते हैं. रोपाई से पहले वे खेत में अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद डालते हैं. वे डीएपी व यूरिया अंतिम जुताई के समय खेत में डालते हैं. वे 30 किलोग्राम नाइट्रोजन बोआई के समय डालते हैं और 30 किलोग्राम नाइट्रोजन फूल आने पर फसल की सिंचाई के समय डालते हैं.
अर्जुन रोपाई के समय 2 कतारों के बीच करीब 3 फुट की दूरी रखते हैं. वे 2 कतारों के बाद 6 से 7 फुट की जगह छोड़ कर फिर 2 कतारें लगाते हैं. वे पौधे से पौधे की दूरी 1 फुट रखते हैं. कतारों में 6 से 7 फुट की दूरी रखकर वे खरपतवार निकालने में ट्रैक्टर की मदद लेते हैं, क्योंकि मजदूरों से खरपतवार निकलवाना महंगा पड़ता है.
ड्रिप सिंचाई है लाभकारी
वे बूंद- बूंद सिंचाई विधि से सिंचाई करते हैं. इससे रोग कम होते हैं और पानी की भी बचत होती है. वे कृषि विज्ञान केंद्र, सिरोही के वैज्ञानिकों से समय-समय पर सलाह लेते रहते हैं. कृषि विभाग से भी अर्जुन को सौंफ की पूरी जानकारी मिलती रहती है.
उत्पादन
अर्जुन सौंफ की कटाई दिसंबर से शुरू करते हैं. वे 4-5 बार कटाई करते हैं. कटाई के बाद सौंफ के गुच्छों को रस्सियों पर सुखाते हैं, जिससे उसका रंग हरा बना रहता है.
सूखने के बाद डंडे से पीटकर वे तिरपाल पर सौंफ की सफाई करते हैं. इसके बाद बोरियों में सूखी सौंफ भर लेते हैं और उसे ऊंझा मंडी में बेचते हैं.





