Chilli Nursery: दुनिया में मिर्च की 200 से ज्यादा प्रजातियां उगाई जाती हैं, जिन के अलगअलग रंग होेते हैं. भारत में मिर्च का इस्तेमाल खाने में स्वाद बढ़ाने और तीखापन लाने के लिए किया जाता है. मिर्च में ओलियोरेजिल कैप्सिसिन नामक पदार्थ पाया जाता है और इस का तीखापन कैप्साइसिन नामक पदार्थ के कारण होता है.
कैसे लगाएं नर्सरी
मिर्च तमाम तरह की मिट्टियों में उगाई जा सकती है. वैसे दोमट मिट्टी या बलुई दोमट मिट्टी इस के लिए अच्छी मानी जाती है.
नर्सरी में मिर्च (Chilli Nursery) की बोआई के लिए हलकी, भुरभुरी व पानी को जल्दी सोखने वाली मिट्टी होनी चाहिए. साथ ही पानी निकलने का इंतजाम भी होना चाहिए.
अच्छी पौध तैयार करने के लिए नर्सरी (Chilli Nursery) में प्रति वर्गमीटर की दर से 10 ग्राम डाईअमोनियम फास्फेट व सड़ी गोबर की खाद डालें. उठी हुई क्यारियों के बीच खाद का डालना ठीक रहता है. बोआई अधिक घनी नहीं होनी चाहिए. बोआई के लिए एक लाइन से दूसरी लाइन की दूरी तकरीबन 5-6 सेंटीमीटर रखें.
बोआई के बाद क्यारियों को सड़ी गोबर की खाद से ढक दें, जिस से ऊपर की मिट्टी बैठने न पाए. फिर 1 महीने बाद जब पौध तैयार हो जाए, तो खेत में रोप दें. उस के बाद हलकी सिंचाई कर दें.
नर्सरी को पाले से बचाने का भी पुख्ता इंतजाम होना चाहिए.
कबकब बोएं बीज
मिर्च बोने के लिए सब से अच्छा समय अप्रैल से जून महीने के दौरान होता है. बडे़ फलों वाली किस्में मैदानी इलाकों में अगस्त से सितंबर महीने तक बोई जा सकती हैं. पहाड़ी इलाकों में भी इसी दौरान मिर्च बोई जा सकती है.
उत्तर भारत में, जहां सिंचाई की सहूलियत है, वहां मिर्च के बीज मानसून आने से तकरीबन 15 दिन पहले बोए जाते हैं और मानसून आने के साथसाथ इस की पौध नर्सरी से निकाल कर खेतों में लगा दी जाती है.
मिर्च की किस्में
पूसा सदाबहार : इस किस्म के पौधे सीधे और लंबे होते हैं. फल 6 से 8 सेंटीमीटर लंबे गुच्छों में होते हैं, जबकि 6-14 फल प्रति गुच्छे में आते हैं और सीधे ऊपर की ओर लगते हैं.
इस की खूबी यह है कि एक बार पौधा लगा देने पर 2-3 सालों तक फल मिलते रहते हैं.
पूसा ज्वाला : इस के पौधे छोटे आकार के होते हैं और पत्तियां चौड़ी होती हैं. इस की पत्तियां हलके हरे रंग की होती हैं. फल लंबे, पतले व चरपरे होते हैं, जो पकने पर हलके टेढे़मेढे़ और लाल रंग के हो जाते हैं.
जवाहर मिर्च 218 : इस किस्म की मिर्च में चरपराहट अधिक होती है. इस किस्म के फल लंबे होते हैं. यह मसाले के लिए अच्छी किस्म मानी जाती है.
एलसीए 235 : इस के पौधे छोटीछोटी गांठों वाले व छातानुमा होते हैं. इस की पत्तियां छोटी होती हैं. फल लंबे, नुकीले, गहरे हरे रंग के व काफी चरपरे होते हैं.
केए 2 : इस मिर्च के फल नीचे की तरफ लगते हैं. इस के पौधे छोटेछोटे होते हैं. इस किस्म के फलों की तोड़ाई 3-4 बार में खत्म हो जाती है. इस की फसल के बाद गेहूं को आसानी से बो सकते हैं.
पौधों को यों बचाएं
एंथ्रेक्नोज बीमारी में पत्तियों और फलों पर अलग तरह के गहरे, भूरे और काले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, जबकि आर्द्रगलन बीमारी में पत्तियां गलने लगती हैं. रोकथाम के लिए वीर एम 45 या बाविस्टन नाम की दवा को पानी में घोल कर छिड़कें.
मौजेक बीमारी में पत्तों पर हलके पीले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं. बाद में पत्तियां पूरी तरह से पीली पड़ जाती हैं. थ्रिप्स और एफिड कीडे़ भी पत्तियों से रस चूसते हैं.
कीडे़ लगे पौधों को उखाड़ कर जला दें या मिट्टी में दबा दें. उस के बाद कीडे़ मारने वाली दवा रोगर या मैटासिस्टाक्स को पानी में घोल कर छिड़काव करें.





