Plant Disease: धान खरीफ की सब से महत्त्वपूर्ण फसल है, जिसे कई कीट नुकसान पहुंचाते हैं. किसान कीटों से बचाव के लिए अंधाधुंध रासायनिक कीटानाशकों का इस्तेमाल करते हैं, जिस से न केवल पर्यावरण खराब होता है, बल्कि चावल के दानों में कीटनाशी रसायनों का असर भी आ जाता है, जो इनसानों की सेहत को खराब करता है. इस के अलावा फसल में मौजूद लाभकारी या मित्र कीटों को भी रसायनों से नुकसान होता है.
क्या है बकाने रोग
बकाने (Plant Disease) एशिया में पाई जाने वाली धान की सब से पुरानी बीमारी है. इस रोग से ग्रसित पौधे की लंबाई सामान्य पौधों के मुकाबले बहुत अधिक हो जाती है, लिहाजा इन पौधों की दूर से ही पहचान की जा सकती है. इस रोग को उत्तरी भारत में झंडा रोग के नाम से भी जाना जाता है.
बकाने रोग (Plant Disease) से धान की फसल में 15 फीसदी तक का नुकसान देखा गया है. यह रोग पूसा बासमती 1121 में बहुत ज्यादा पाया जाता है.
रोग के लक्षण
* नर्सरी में यह बीमारी संक्रमण की तेजी पर निर्भर करती है. जड़ों पर असर वाले पौधे रोपाई के पहले या बाद में भी मर सकते हैं. बीमारी के लक्षण रोपाई के 1 महीने बाद दिखाई पड़ते हैं.
* सामान्य पौधों के मुकाबले बीमार पौधों की लंबाई बहुत ज्यादा हो जाती है और पत्तियां गोलाकार व कमजोर हो जाती हैं.
* बीमार पौधों में अनियमित बढ़वार जड़ों के ऊपरी भाग पर सफेद या गुलाबी रंग की फफूंद की मौजूदगी के कारण होती है.
* पौधे के निचले भाग में पहली या दूसरी पोरी की गांठों के पास से जड़ें निकल आती हैं.
* बीमार पौधे का रंग कुछ पीलाहरा सा होता है, जो बाद में पीला पड़ जाता है.
* बीमार पौधों में बालियां जल्दी आती हैं और दाने पकने से पहले ही पौधे सूख जाते हैं.
रोग के खास पहलू
* बकाने बीज द्वारा पैदा होने वाला रोग है, पर ग्रसित जमीन में बोआई करने से भी
यह रोग काफी फैलता है. जमीन में रोग फैलाने वाली फफूंद 6 से 9 महीने तक रह सकती है.
* जमीन के 30 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान में यह रोग ज्यादा फैलता है.
* ज्यादा नाइट्रोजन भी इस बीमारी को बढ़ाने में मदद करती है.
* खेत से पानी निकालने के दौरान यह बीमारी तेजी से फैलती है.
* इस रोग का असर बासमती चावल की तमाम किस्मों में अलगअलग होता है. बासमती चावल की पूसा सुगंध 4-1121 किस्म में यह रोग ज्यादा लगता है.
* हवा या पानी द्वारा रोग के बीजाणु एक पौधे से दूसरे पौधे पर पहुंच जाते हैं.
* 30 से 35 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान बीमारी फैलाने में मददगार होता है.
कैसे करें रोकथाम
* एरोबिक फफूंद आक्सीजन की मौजूदगी में तेजी से पनपती है, लिहाजा धान की रोपाई के फौरन बाद खेतों का पानी न निकालें.
* धान की कटाई के बाद खेत में बचे डंठलों को हटा देना चाहिए, क्योंकि वे फफूंद को महफूज रखने में मददगार साबित होते हैं.
* बीजों का चुनाव बीमारी रहित खेतों से ही करें.
* स्वस्थ व साफ बीजों द्वारा बीमारी के असर को कम किया जा सकता है.
* नमक के पानी के सांद्र घोल में बीजों को डुबोने से हलके व रोगी बीज ऊपर तैरने लगते हैं, जिन्हें आसानी से अलग किया जा सकता है.
* सोडियम हाइपोक्लोराइट के 5 फीसदी घोल में बीजों को 2 घंटे डुबोने और बाद में साफ पानी से धो कर सुखाने से बीमार पर काबू पाया जा सकता है.
* बोआई से पहले फफूंदनाशक रसायन जैसे कार्बेंडाजिम या बिनोमिल से बीजों का उपचार इस बीमारी को रोकने में कारगर होता है.
* उपचार के लिए 1 किलोग्राम धान के बीजों को 2 ग्राम कार्बेंडाजिम के घोल में 1 से 2 घंटे तक भिगो कर रखें.
* रोपाई से पहले धान के पौधों की जड़ों को सूडोमोनास बैक्टीरिया (10 मिलीलीटर प्र्रति लीटर पानी) के घोल में आधा घंटे तक रखें.
* धान के बीजों को 60-62 डिगरी सेल्सियस पर 15 मिनट तक गरम पानी में भिगो कर रखने से 95 फीसदी बकाने रोग की रोकथाम की जा सकती है.
* बकाने रोग से ग्रसित धान की खड़ी फसल में स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस जीवाणु के इस्तेमाल से बीमारी को फैलाने से रोका जा सकता है.





