Tissue Culture Lab-
उत्तर प्रदेश की नकदी फसलों में गन्ना, आलू और केले का अहम स्थान है, लेकिन किसानों की इन तीनों प्रमुख फसलों के उन्नत पौध और बीज के लिए निर्भरता दूसरे राज्यों पर ही रही है. उत्तर प्रदेश और बिहार में नकदी फसल के रूप में केले की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. यही वजह है कि इस की उन्नत किस्म के पौधे महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों से आते हैं, क्योंकि केले की खेती में सब से ज्यादा जी-9 किस्म के टिश्यू प्लांट की जरूरत पड़ती है.
केले के टिश्यू प्लांट की लैब की उत्तर प्रदेश बिहार में भारी कमी है. केले के टिश्यू पौधों के लिए किसानों की निर्भरता महाराष्ट्र सहित दक्षिणी राज्यों पर ज्यादा है. इस वजह से ट्रांसपोर्टेशन चार्ज और पौधों के सूखने के चलते प्रति पौध लागत अधिक पड़ती है. कुछ यही हाल आलू और गन्ने के उच्च उत्पादकता वाले टिश्यू बीज को ले कर भी है.
चीन में बतौर प्रोफैसर और वैज्ञानिक के रूप में कार्य कर रहे डा. अरुण कुमार पांडेय कोरोना के चलते भारत में लौट कर लखनऊ स्थित अपने घर से वर्क फ्रॉम होम कर रहे थे तो उन्हें पता चला कि उत्तर प्रदेश के केला किसानों को समय से टिश्यू प्लांट्स उपलब्ध न हो पाने के चलते न ही केले की खेती पर न ही सरकारी अनुदान मिल पा रहा है और न ही केले की खेती से अपेक्षित लाभ मिल रहा है.
उन्होंने अपने प्लांट बायोटैक्नोलौजी, मौलिक्यूलर बायोलौजी, जैनेटिक्स, फंक्शनल जीनोमिक्स, फसल सुधार और टिशू कल्चर जैसे अनुभवों को विदेश में इस्तेमाल करने के बजाय देश के किसानों के लिए उपयोग करने का फैसला लिया और चीन की अपनी लाखों की नौकरी छोड़ लखनऊ में टिश्यू लैब स्थापित कर उच्च गुणवत्ता वाले पौधों को तैयार करने का निर्णय लिया. इसी सोच को साकार करते हुए साल 2024 में प्रोस्पेरा बायोटैक के नाम से अपना खुद का टिश्यू लैब स्थापित किया.
डा. अरुण कुमार पांडेय ने सब से पहले अपने टिश्यू लैब में उत्तर प्रदेश में केले की सब से बड़े पैमाने पर रोपी जाने वाली किस्म जी-9 के 3 लाख पौधे तैयार किए. लैब में तैयार इन पौधों को उन्होंने अपने हार्डनिंग सैंटर से परिपक्वता के पश्चात जब किसानों को बेचने की कोशिश की तो उन्हें बहुत ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा, क्योंकि उत्तर प्रदेश के ज्यादातर किसान केले के पौधों की खरीदारी महाराष्ट्र के जलगांव से करते थे. ऐसे में उत्तर प्रदेश की लैब में तैयार केले के पौधों पर उन का आसानी से विश्वास नहीं बन पा रहा था.
डा. अरुण कुमार पांडेय ने किसानों को विश्वास दिलाया कि अगर उन के द्वारा तैयार पौधों की फलत महाराष्ट्र से आने वाले पौधों की अपेक्षा कम आई तो उतने नुकसान की भरपाई वह स्वयं करेंगे. किसानों को युवा उद्यमी डा. अरुण कुमार पांडेय की यह बात जम गई, क्योंकि महाराष्ट्र से आने वाले पौधों की तुलना में इन पौधों का न केवल रेट कम था, बल्कि पौधे भी काफी स्वस्थ्य और अच्छी गुणवत्ता वाले दिख रहे थे.
जिन किसानों ने डा. अरुण कुमार पांडेय के लैब से केले के पौधे क्रय किए थे, उन के फलों की साइज और घार का वजन काफी अच्छा रहा, जिस के चलते दूसरे किसान भी उन से जुड़ते गए और दूसरे साल ही उन के पास उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड से करीब 200 केला किसान जुड़ गए.
हौसले को मिला पंख
डा. अरुण कुमार पांडेय ने अपने लैब में तैयार केले के पौधों की बढ़ती डिमांड को देखते हुए न केवल केले के पौधों का उत्पादन 4 गुना तक बढ़ाया, बल्कि वह आलू किसानों को उच्च गुणवत्ता वाली नवीन किस्मों को मुहैया कराने के उद्देश्य को साकार करने के लिए मेरठ और पंजाब की 2 आलू बीज उत्पादक कंपनियों के साथ समझौता कर हालिया रिलीज आलू की नवीन किस्मों के टिश्यू प्लांट भी तैयार कर रहे हैं.
डा. अरुण कुमार पांडेय ने बताया कि उन के लैब से तैयार आलू के टिश्यू प्लांट्स संबंधित कंपनियों के हार्डनिंग सैंटर में जाते हैं, जहां करीब डेढ़ से 2 साल की लंबी प्रक्रिया के बाद आलू के उच्चतम गुणवत्ता वाले बीज तैयार किए जाते हैं. इन दिनों वे गन्ना किसानों के लिए गन्ने के टिश्यू प्लांट्स भी तैयार करने पर काम कर रहे हैं.
सजावटी इनडोर पौधों का उत्तर भारत का पहला लैब
घरों की खूबसूरती बढ़ाने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए जिन इनडोर प्लांट्स का उपयोग किया जाता है, वे काफी महंगे आते हैं. इस का कारण है कि इस तरह के पौधों को तैयार करने वाली भारत में बहुत कम टिश्यू लैब हैं.
डा. अरुण कुमार पांडेय ने ऐसे इनडोर पौधों की लागत कम करने और आसानी से उपलब्धता सुनिश्चित करने को लेकर अपने लैब में एग्लोनेमा रैड, एग्लोनेमा मनीला ब्यूटी, एग्लोनेमा स्नो व्हाइट पौधा, एग्लोनेमा आइस प्लांट, एग्लोनेमा पिंक ब्यूटी प्लांट, एग्लोनेमा स्ट्राइप्स प्लांट, एग्लोनेमा डोव प्लांट तैयार कर रहे हैं. उन का कहना है कि आमतौर पर यह 200 से 500 रुपए प्रति पौध तक बिकता है, लेकिन उन के लैब में तैयार होने वाले यह पौधे बहुत ही मामूली कीमत पर उपलब्ध हो जाते हैं.
महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा
डा. अरुण कुमार पांडेय ने जब अपने टिश्यू लैब की स्थापना की तो उन के सामने समस्या थी ऐसे हुनरमंद लोगों की, जो टिश्यू प्लांट्स तैयार करने की पूरी विधि को आसानी से सीख पाएं और इन्हें रोजगार भी मिल सके. ऐसे में उन्हें लगा कि हर जगह पुरुष ही काम करता है, क्यों न यह काम महिलाओं को सिखाया जाए.
डा. अरुण कुमार पांडेय ने बताया कि उन्होंने सामान्य पढ़ाई करने वाली 12 महिलाओं को टिश्यू प्लांट्स तैयार करने की पूरी ट्रेनिंग दी, जो ये महिलाएं बहुत आसानी से सीखने में सफल रहीं. इस के अलावा उन्होंने अपनी पत्नी सरिता पांडेय को लैब संचालन की ट्रेनिंग दी. आज के समय में उन का पूरा लैब उन की पत्नी और दूसरी महिलाएं संभाल रही हैं, जबकि डा. अरुण कुमार पंदह पौधों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के साथसाथ मार्केटिंग संभाल रहे हैं.
बढ़ी कमाई
डा. अरुण कुमार पांडेय ने सितंबर, 2024 में जब चीन की अपनी जमीजमाई नौकरी छोड़ देश में ही केला, आलू और सजावटी पौधों को तैयार करने के लिए प्रोस्पेरा बायोटैक के नाम से टिश्यू लैब की स्थापना की थी तो यह निश्चित नहीं था कि उन्हें इस काम में सफलता मिलेगी ही, लेकिन उन के इस कठिन निर्णय ने सफलता की सीढ़ियों तक पहुंचाने का काम किया.
उन्होंने बताया कि सितंबर, 2024 से मार्च, 2025 तक तकरीबन 12 लाख रुपये का कारोबार हुआ. इस के बाद अप्रैल, 2025 से 31 मार्च, 2026 तक कारोबार तकरीबन 45 लाख रुपए तक पहुंच गया. इस सफर की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि इस उद्यम से 12 महिलाओं को सीधा रोजगार देने में भी उन्हें सफलता मिली है.
पहले ट्रायल, फिर किसानों को पौधे
डा. अरुण कुमार पांडेय के मुताबिक, टिश्यू कल्चर से तैयार किसी भी नई किस्म के पौधे को सीधे किसानों को बड़े स्तर पर नहीं देते हैं, बल्कि पहले उस का खेत में ट्रायल किया जाता है. सफलता मिलने के बाद ही किसानों को पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं. उन के द्वारा तैयार पौधे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश तक भेजे जा रहे हैं.
क्या है टिशू कल्चर तकनीक
डा. अरुण कुमार पांडेय ने टिश्यू कल्चर तकनीक पर जानकारी देते हुए बताया कि टिश्यू कल्चर यानी ऊतक संवर्धन ऐसी आधुनिक तकनीक है, जिस में पौधे के एक छोटे से हिस्से जैसे पत्ती, तना या जड़ के ऊतक को प्रयोगशाला में कृत्रिम पोषक माध्यम और नियंत्रित, स्वच्छ वातावरण में विकसित किया जाता है. पोषक तत्वों और हार्मोन्स की मदद से कोशिकाएं तेजी से विभाजित हो कर नए पौधे तैयार करती हैं. लैब में तैयार पौधों को खेत या नर्सरी में लगाने से पहले हार्डनिंग के जरीए बाहरी वातावरण के अनुकूल बनाया जाता है. इस तकनीक से कम समय में बड़ी संख्या में एक जैसे गुणों वाले, स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण पौध तैयार किए जा सकते हैं. मौसम की बाधा कम होने के कारण इस का उपयोग सालभर किया जा सकता है और केला, आलू, सजावटी पौधों सहित कई फसलों की गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री तैयार करने में यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.
उन्होंने बताया कि प्रयोगशाला के नियंत्रित और स्वच्छ वातावरण में तैयार किए जाने के कारण इस से गुणवत्तापूर्ण एवं अपेक्षाकृत रोगमुक्त पौध तैयार करने में मदद मिलती है. इस की सब से बड़ी खासीयत कम समय और कम जगह में बड़ी संख्या में पौध तैयार करना है.
टिश्यू कल्चर से तैयार पौधे सामान्यतः मूल पौधे के समान आनुवंशिक गुण रखते हैं, जबकि नियंत्रित वातावरण के कारण इस का उत्पादन मौसम की बाधाओं से काफी हद तक मुक्त रहता है. यही वजह है कि केला, आलू, सजावटी पौधों सहित कई फसलों की गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री तैयार करने के साथसाथ दुर्लभ और संकटग्रस्त पौध प्रजातियों के संरक्षण में भी इस तकनीक का महत्व लगातार बढ़ रहा है. Tissue Culture Lab





