Medicinal & Aromatic Farming : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर, राजस्थान में संचालित अखिल भारतीय औषधीय एवं सुगंधित परियोजना के अंतर्गत विगत दिनों अनुसूचित जनजाति उप-योजना (TSP) के तहत कृषक प्रशिक्षण एवं आदान वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को औषधीय एवं सुगंधित फसलों की उन्नत खेती के प्रति जागरूक करना एवं आधुनिक तकनीकों से जोड़ना था.

परियोजना प्रभारी डॉ. अमित दधीच ने कहा कि वर्तमान समय में औषधीय एवं सुगंधित फसलों की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे किसानों के लिए यह एक लाभकारी विकल्प बनकर उभर रही है. उन्होंने बोआई से कटाई तक की संपूर्ण उत्पादन प्रक्रिया, प्रमाणित बीजों के उपयोग, फसल प्रबंधन एवं विपणन संभावनाओं पर प्रकाश डाला.

डॉ. रविकांत शर्मा ने जैविक एवं प्राकृतिक खेती पर किया फोकस. वैज्ञानिक सह-निदेशक डॉ. रविकांत शर्मा ने जैविक एवं प्राकृतिक खेती के महत्त्व को रेखांकित करते हुए किसानों को रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक विकल्प अपनाने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने बताया कि जैविक खेती से मृदा की उर्वरता बनी रहती है और उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार होता है.

डॉ. वीरेंद्र कुमार ने रोगों एवं कीटों की रोकथाम पर दी जानकारी. उद्यानिकी वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र कुमार एवं पौध व्याधि वैज्ञानिक डॉ. पोखर रावल ने औषधीय पौधों में लगने वाले रोगों एवं कीटों की पहचान, उनके जीवनचक्र तथा नियंत्रण के उपायों की जानकारी दी। उन्होंने समेकित रोग एवं कीट प्रबंधन (IPM) तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया.

डॉ. दीपक राजपुरोहित ने पौधों की उन्नत किस्मों को अपनाने पर दिया जोर. उन्होंने जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से औषधीय पौधों की उन्नत किस्मों के विकास पर प्रकाश डालते हुए किसानों को नई तकनीकों के लाभ बताए. वहीं, मृदा वैज्ञानिक डॉ. धर्मपाल सिंह डूडी ने मृदा परीक्षण एवं संतुलित उर्वरक उपयोग के महत्त्व को समझाया.

आज के समय में किसानों के लिए औषधीय व सुगंधित खेती करना फायदेमंद है, क्योंकि आज बड़े पैमाने पर सौंदर्य प्रसाधनों और औषधियों में इनका इस्तेमाल होता है. कार्यक्रम के अंत में डॉ. एन. के. पालीवाल ने सभी किसानों का आभार व्यक्त किया.

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