गेहूं की खेती में अगर उन्नत किस्मों का चयन किया जाए, तो किसान ज्यादा उत्पादन के साथसाथ ज्यादा मुनाफा भी कमा सकते हैं. किसान इन किस्मों का चयन समय और उत्पादन को ध्यान में रखते हुए कर सकते हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर-भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान यानी आईआईडब्ल्यूबीआर, करनाल की मानें, तो गेहूं की ये 5 किस्में सब से नई हैं और इन से उत्पादन भी बंपर होता है.
करण नरेंद्र
यह गेहूं की नई किस्मों में से एक है. इसे डीबीडब्ल्यू-222 भी कहते हैं. गेहूं की यह किस्म बाजार में साल 2019 में आई थी और 25 अक्तूबर से 25 नवंबर के बीच इस की बोवनी कर सकते हैं. इस की रोटी की गुणवत्ता अच्छी मानी जाती है.
दूसरी किस्मों के लिए जहां 5 से 6 बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है, पर इस में 4 सिंचाई की ही जरूरत पड़ती है. यह किस्म 143 दिनों में काटने लायक हो जाती है और प्रति हेक्टेयर 65.1 से 82.1 क्विंटल तक पैदावार होती है.
करन वंदना
इस किस्म की सब से खास बात यह होती है कि इस में पीला रतुआ और ब्लास्ट जैसी बीमारियां लगने की संभावना बहुत कम होती है. इस किस्म को डीबीडब्ल्यू-187 भी कहा जाता है.
गेहूं की यह किस्म गंगातटीय इलाकों के लिए अच्छी मानी जाती है. फसल तकरीबन 120 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस किस्म से प्रति हेक्टेयर तकरीबन 75 क्विंटल गेहूं पैदा होता है.
पूसा यशस्वी
गेहूं की इस किस्म की खेती कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए सब से सही मानी जाती है. यह फफूंदी और गलन रोग प्रतिरोधक होती है. इस की बोआई का सही समय 5 नवंबर से 25 नवंबर तक ही माना जाता है. इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 57.5 से 79.60 क्विंटल तक पैदावार होती है.
करण श्रिया
गेहूं की यह किस्म जून, 2021 में आई थी. इस की खेती के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, ?ारखंड, पश्चिम बंगाल जैसे राज्य ठीक माने जा रहे हैं.
तकरीबन 127 दिनों में पकने वाली किस्म को मात्र एक सिंचाई की जरूरत पड़ती है. प्रति हेक्टेयर अधिकतम पैदावार 55 क्विंटल है.
डीडीडब्ल्यू-47
गेहूं की इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा सब से ज्यादा तकरीबन 12.69 फीसदी होती है. इस के पौधे कई तरह के रोगों से लड़ने में सक्षम होते हैं. कीट और रोगों से खुद की सुरक्षा करने में यह किस्म सक्षम है. प्रति हेक्टेयर उत्पादन तकरीबन 74 क्विंटल है.
मशरूम की खेती अब पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो रही है. मशरूम की खेती सीधे आजीविका में सुधार कर सकती है. इस का आर्थिक पोषण और औषधीय योगदान बहुत है. यह ग्रामीण विकास, महिलाओं और युवाओं के अनुकूल पेशे का माध्यम बन सकता है.
उत्पादन तकनीक
कंपोस्ट की तैयारी
कंपोस्ट कृत्रिम ढंग से बनाया गया वह माध्यम है, जिस से मशरूम की कायिक संरचना भोजन प्राप्त कर अपने फलनकाय के रूप में मशरूम पैदा करती है, अत: कंपोस्ट बनाने के पीछे मशरूम को उचित भोजन सामग्री उपलब्ध कराना निहित है. कंपोस्ट बनाने के लिए पक्के फर्श या विशेष कंपोस्टिंग शैड उपयोग में लाए जाते हैं. कंपोस्ट बनाने के लिए निम्नलिखित सामग्री प्रयोग में लाएं :
गेहूं का भूसा-1,000 किलोग्राम, अमोनियम सल्फेट व कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट-30 किलोग्राम, सुपर फास्फेट-10 किलोग्राम, पोटाश-10 किलोग्राम, यूरिया-10 किलोग्राम, जिप्सम-100 किलोग्राम, गेहूं का चोकर-50 किलोग्राम, फ्यूरोडान 500 ग्राम.
कंपोस्ट बनाना शुरू करने से 48 घंटे पहले भूसे की पतली तह पक्के फर्श पर बिछा कर उसे अच्छी तरह से पलट कर पानी के फव्वारे से तर कर दें.
आरंभ या शून्य
इस आरंभ में भूसे में नमी की मात्रा 75 फीसदी होनी चाहिए. इस नमीयुक्त भूसे में चोकर, कैल्शियम, यूरिया, म्यूरेट औफ पोटाश और सुपर फास्फेट अच्छी तरह मिला देते हैं. अब लकड़ी के पूर्व निर्मित तख्तों की मदद से भूसे का लगभग 1.5 मीटर चौड़ा, 1.25 मीटर ऊंचा किसी भी लंबाई का ढेर बनाएं.
ढेर बनाने के बाद लकड़ी के तख्तों को ढेर से अलग कर दें. 24 घंटे के भीतर ढेर का भीतरी तापमान 70-75 डिगरी सैंटीग्रेड तक होना चाहिए. इस ढेर की नमी बनाए रखने के लिए एक या 2 बार बाहरी सतह पर पानी का छिड़काव करें.
पहली पलटाई
छठे दिन ढेर के बाहरी भाग को (15 सैंटीमीटर अंदर तक का) फर्श पर फैला दें, शेष भाग को दूसरी जगह फर्श पर फैला दें.
अब बाहरी भाग की कंपोस्ट को अंदर डाल कर व भीतरी भाग की कंपोस्ट को बाहर डाल कर लकड़ी के तख्तों की मदद से दोबारा ढेर बना कर तख्तों को अलग कर दें.
दूसरी पलटाई
10वें दिन बाहरी व भीतरी भाग को अलग कर के बाहरी भाग पर अच्छी तरह पानी का छिड़काव कर के ढेर को इस तरह बनाएं कि बाहरी भाग ढेर के भीतर व भीतरी भाग ढेर के बाहर पहुंच जाए.
तीसरी पलटाई
13वें दिन पहले की तरह पलटाई व ढेर का निर्माण करें व जिप्सम मिला दें.
चौथी पलटाई
16वें दिन पहले की तरह पलटाई व ढेर का निर्माण करें.
5वीं पलटाई
19वें दिन पहले की तरह पलटाई ढेर का निर्माण करें.
छठी पलटाई
22वें दिन पहले की तरह पलटाई का निर्माण करें व फ्यूरोडान मिला दें.
7वीं पलटाई
25वें दिन यदि कंपोस्ट अमोनिया गैस मुक्त है, तो कंपोस्ट बीजाई के लिए तैयार है, वरना 28वें दिन करें और बीजाई 30वें दिन करें.
बीजाई
बीजाई (स्पौनिंग) कंपोस्ट में स्पौन मिलाने के ढंग को कहते हैं. प्रति क्विंटल तैयार कंपोस्ट में 500 ग्राम से 750 ग्राम स्पौन (0.5-7.5 फीसदी की दर से) अच्छी प्रकार मिलाया जाता है. बीजाई की हुई कंपोस्ट को सैल्फ या पौलीथिन बैगों से हलका ढक कर रखना चाहिए. सैल्फ में 80-100 किलोग्राम/मीटर व बैग में 10-15 किलोग्राम कंपोस्ट भरते हैं.
बीजाई की हुई कंपोस्ट को निर्जीवीकृत अखबार द्वारा ढक देते हैं. अखबारों को इस्तेमाल में लाने से एक हफ्ते पहले फौर्मेलीन घोल से या वाष्प द्वारा 20 पौंड पर आधा घंटा निर्जीवीकरण कर लेना चाहिए.
यदि पौलीथिन बैग इस्तेमाल कर रहे हैं, तो बैग को ऊपर से मोड़ कर बंद कर दें. बीजाई के बाद फसल कक्ष का तापमान 22-23 डिगरी सैंटीग्रेड या अपेक्षित आर्द्रता 85-90 फीसदी बनाए रखना चाहिए. दिन में 2 बार हलके पानी का छिड़काव अखबार के ऊपर व फसल कक्ष की फर्श व दीवार पर करें.
बीजाई के 6-7 दिन बाद धागेनुमा फफूंदी की वृद्धि दिखाई देने लगती है, जो 12-15 दिन में कंपोस्ट की सतह को सफेद कर देते हैं. बिछे हुए अखबार के ऊपर फैली हुई फफूंदी को आवरण मृदा द्वारा ढक दिया जाता है.
आवरण मृदा (केसिंग मिट्टी)
आवरण मृदा का मतलब है, कंपोस्ट पर फैली हुई फफूंदी के ऊपर मृदा मिश्रण का स्तर बिछाना, जिस से नमी बनाए रखने व गैस के आदानप्रदान में कवक को मदद मिलती रहे.
आवरण मृदा बीमारियों और कीड़ों से मुक्त व इस का पीएच मान 7.5 से 7.8 होना चाहिए. अपने देश में निम्नलिखित सामग्री से आवरण मृदा तैयार की जाती है :
* गोबर की खाद (2 साल पुरानी) बगीचे की मिट्टी (2:1)
* गोबर की खाद (2 साल पुरानी) स्पेंट कंपोस्ट (1:1)
आवरण मृदा का पाश्चुरीकरण
आवरण मृदा को फौर्मेलीन द्वारा शोधित किया जा सकता है. आवरण मृदा का मिश्रण पक्के फर्श पर ढेर के रूप में रख कर उस में 4 प्रतिशत फौर्मेलीन का घोल पानी में बना कर अच्छी तरह मिला लें. उस के बाद ढेर को पौलीथिन चादर को हटा कर आवरण मृदा को उलटपलट कर फौर्मेलीन की गंध उड़ने के लिए छोड़ देते हैं.
इस तरह 3-4 दिन तक आवरण मृदा को उलटतेपलटते रहते हैं व पूरी तरह से ढेर को फौर्मेलीन गंधरहित कर लेते हैं. आवरण मृदा का शोधन वाष्प द्वारा 65 डिगरी सैंटीग्रेड पर 6-8 घंटे करना ज्यादा उपयोगी है.
आवरण मृदा का प्रयोग
आवरण मृदा की 4 सैंटीमीटर मोटी सतह कवक जाल युक्त कंपोस्ट के ऊपर बिछा दी जाती है. आवरण मृदा बिछाने के बाद 2 फीसदी फौर्मेलीन घोल का छिड़काव इस पर करना चाहिए और फसल कक्ष का तापमान 15-18 डिगरी सैंटीग्रेड और आर्द्रता 80-85 फीसदी कर देना जरूरी है. साथ ही, समुचित वायु संचार का इस अवस्था में प्रबंधन करना जरूरी होता है.
आवरण मृदा के ऊपर से दिन में एक या 2 बार पानी का हलका छिड़काव करना चाहिए.
फसल की तुड़ाई
आवरण मृदा बिछान के 12 से 18 दिन बाद (मशरूम) निकलना शुरू हो जाता है और 50-60 दिन तक निरंतर निकलते रहते हैं.
दिन में एक अथवा दो बार मशरूम को टोपी खुलने के पहले (जिस की परिधि एक से डेढ़ इंच हो), उंगलियों के सहारे ऐंठ कर निकाल लेना चाहिए. इतना ही नहीं, मशरूम खुल जाने और छतरी बन जाने पर मशरूम की क्वालिटी और बाजार में इस की कीमत कम हो जाती है.
पैदावार
दीर्घ अवधि से बनाई गई प्रति 100 किलोग्राम कंपोस्ट से 14 से 16 किलोग्राम मशरूम व इतनी ही मात्रा में पाश्चुरीकरण कंपोस्ट से 18 से 22 किलोग्राम मशरूम की पैदावार हासिल हो जाती है.
यह धान की खेती की ऐसी तकनीक है, जिस में बीज, पानी, खाद और मानव श्रम का समुचित तरीके से इंतजाम करना शामिल है, जिस का मकसद प्रति इकाई क्षेत्रफल में ज्यादा से ज्यादा उत्पादकता बढ़ाना है.
जमीन का चुनाव
इस विधि में खासतौर से जमीन, पानी और दूसरे पोषक तत्त्वों के बेहतर इंतजाम से पौधे की जड़ों के ज्यादा से ज्यादा विकास पर जोर दिया जाता है. इस के लिए जमीन में अंत:कर्षण क्रियाएं समयसमय पर जरूर करनी चाहिए, ताकि जमीन में नमी बनी रहे, जो सूक्ष्म जीवाणुओं की सक्रियता बढ़ाने में मददगार होती है.
धान की खेती सभी तरह की जमीन में की जा सकती है, फिर भी इस के लिए दोमट चिकनी मिट्टी, पानी सोखने की ज्यादा कूवत वाली और ज्यादा जैविक तत्त्वों से भरपूर वाली जमीन अच्छी मानी जाती है, जिस की जल धारण की कूवत ज्यादा हो.
नर्सरी की तैयारी
परंपरागत विधि से धान की खेती एक एकड़ क्षेत्रफल में करने के लिए 12-16 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है, पर श्री विधि में एक एकड़ धान की खेती के लिए सिर्फ 2 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. इस के लिए 400 वर्गफुट की जगह पर नर्सरी तैयार की जाती है.
नर्सरी बनाने के समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए. इस विधि से 10-14 दिन में पौध का रोपण किया जाता है. नर्सरी की क्यारी बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्यारी खेत के बीच या कोने में बनाई जाए, जहां पौध रोपण करना है. लंबाई हालात के मुताबिक व बैड की ऊंचाई आधार तल से 6 इंच होनी चाहिए.
पहली परत : 1 इंच गोबर की सड़ी खाद.
दूसरी परत : 1-1.5 इंच बारीक मिट्टी.
तीसरी परत : 1 इंच सड़ी गोबर की खाद.
चौथी परत : 2-5 इंच बारीक मिट्टी.
मल्चिंग : 3-4 दिन तक.
नर्सरी में रासायनिक खाद के बजाय गोबर की सड़ी खाद का इस्तेमाल करना चाहिए. इस से मिट्टी मुलायम रहने से पौध को बिना नुकसान पहुंचाए खेत तक ले जाया जाता है.
नर्सरी में बीज की बोआई
शोधित बीज को हाथ से लाइन बना कर 1-1 कर के लाइन से बोया जाता है और उस पर एक हलकी परत सड़ी गोबर की खाद डाली जाती है और आखिर में नर्सरी बैड को पुआल से ढक दिया जाता है. बीज जमने के बाद पुआल को हटा दिया जाता है.
पुआल हटाने के बाद सुबहशाम रोजाना हलकी सिंचाई जरूर करें. सिंचाई करते समय यह सावधानी बरतनी चाहिए कि बीज मिट्टी से बाहर न निकले.
खेत की तैयारी
इस विधि में दूसरी फसलों की तरह खेत की तैयारी की जाती है. खेत की जुताई करने के बाद पाटा लगा देते हैं. इस के बाद मार्कर यंत्र से खेत में लाइन बनाते हैं या फिर रस्सी की मदद से खेत में 25×25 सैंटीमीटर या 30×30 सैंटीमीटर पर लाइन खींच लेते हैं. जहां कटान होता है, वहीं पर प्रति हिल एक पौध की रोपाई की जाती है. इस विधि में परंपरागत विधि की तुलना में प्रति पौधा ज्यादा कड़े निकलते हैं.
पौध रोपण और सावधानियां
क्यारी में बीज बोने के बाद तकरीबन 10-14 दिन की पौध को सावधानी से निकाल कर 1-1 कर के मुख्य खेत में आधे घंटे के अंदर सावधानी से रोपना चाहिए और खेत में 2 सैंटीमीटर से अधिक पानी नहीं भरा होना चाहिए.
पौध की तैयारी
पौधे से पौधे की दूरी 25×25 सैंटीमीटर रखनी चाहिए और एक हिल पर एक ही पौध रोपना चाहिए. अगर जमीन की उर्वराशक्ति अधिक हो तो पौधे से पौधे की दूरी 30×30 सैंटीमीटर बढ़ा सकते हैं.
खरपतवार नियंत्रण और जड़ों का विकास
अच्छे पौधे विकसित हों, इस के लिए खेत में नमी बनाए रखें. बहुत ज्यादा पानी न भरें और जमीन में रंद्रावकाश अच्छा रखने के लिए खेत में कोनोवीडर से निराईगुड़ाई करें. जरूरत के हिसाब से ही पानी दें, जिस से पानी की बचत होगी.
सिंचाई
इस विधि में जरूरत के हिसाब से एक तय समय के बाद सिंचाई करते हैं, जिस से खेत में नमी बनाए रखने के साथसाथ जमीन में वायु का संचार अच्छा रहे. खेत में 1-2 सैंटीमीटर से ज्यादा पानी नहीं देना चाहिए. पानी की कमी को ध्यान में रख कर इस तकनीक की अहमियत और ज्यादा बढ़ गई है.
गोबर की खाद या कंपोस्ट का इस्तेमाल
इस विधि में धान की ज्यादा उपज लेने के लिए कार्बनिक खादों जैसे गोबर की खाद या कंपोस्ट का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना चाहिए. कार्बनिक खाद मुहैया न होने पर जमीन की उर्वराशक्ति की जांच के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का इस्तेमाल कर सकते हैं.
धान की फसल में पाए जाने वाले प्रमुख खरपतवार घास, सावां, टोडी बट्टा या गुरही, रागीया, मोथा, जंगली धान या करघा, केबघास, बंदराबंदरी, दूब (एकदलीय घास कुल के), गारखमुडी, विलजा, अगिया, जलकुंभी, कैना, कनकी, हजार दाना और जंगली जूट हैं. इन खरपतवारों के नियंत्रण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाएं :
* जहां खेत में मिट्टी का लेव बना कर और पानी भर कर धान को रोपा या बोया जाता है, वहां जो खरपतवार भूमि तैयार करने से पहले उग आते हैं, वे लेव बनाते समय जड़ से उखाड़ कर कीचड़ में दबसड़ जाते हैं. इस के बाद मिट्टी को 5 सैंटीमीटर या अधिक पानी से भरा रखने पर नए व पुराने खरपतवार कम पनप पाते हैं.
* बीज छिटकवां धान, जिस में बियासी नहीं की जाती हो, वहां बोआई के तुरंत बाद या नई जमीन में या सूखी भूमि में बोनी के बाद, पानी बरसने के फौरन बाद ब्यूटाक्लोर 2.5 लिटर प्रति हेक्टेयर सक्रिय तत्त्व का छिड़काव 500 लिटर पानी में घोल कर करने से तकरीबन 20 से 25 दिनों तक खरपतवार नहीं उगते हैं. खड़ी फसल में 2 बार 20-25 दिनों और 40-45 दिनों की अवस्था पर निराई करें.
* बीज छिटकवां धान, जहां बोया जाता हो, वहां बोने करने के बाद 7 दिनों के भीतर निराई और गुड़ाई किया जाना चाहिए. दूसरी निराई 25-30 दिनों पर करनी चाहिए. बोने के समय पर पानी उपलब्ध होने पर निराई करनी चाहिए. बोआई के 40-45 दिन बाद बोना नहीं चाहिए.
* धान के खेत में खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक विधियां ज्यादा कारगर साबित हुई हैं.
* धान के खेत में नोमिनो गोल्ड खरपतवारनाशक छिड़कें. इस के सिर्फ एक ही छिड़काव में सभी प्रमुख खरपतवारों (डिला मोथा, छतरी वाला मोथा, फिम्बीस्टाइलिस), घुई (मोथा के विभिन्न प्रकार का पान पत्ता), पानी घास, पीले फूल वाली बूंटी मिर्च, बूंटी चार पत्ती, सफेद फूस वाली बूंटी (चौड़ी पत्ती) और घास (स्वांकी, स्वांक और कनकी) को नियंत्रित करता है.
* इस खरपतवारनाशक को खरपतवार निकलने के बाद 10-25 दिन के बीच में इस्तेमाल कर सकते हैं. यह खरपतवारनाशक सीधे बोए गए धान, धान की नर्सरी और रोपित धान, सभी में प्रभावी खरपतवार नियंत्रण करता है.
* यह खरपतवारनाशक धान की फसल के लिए पूरी तरह सुरक्षित है और धान को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है. एक हेक्टेयर में नोमिनो गोल्ड खरपतवारनाशक दवा की 200 से 300 मिलीलिटर को 450 से 500 लिटर पानी में मिलाएं और खेत में से पानी निकाल कर खरपतवारनाशक दवा का छिड़काव करें, ताकि खरपतवार पर दवा का इस्तेमाल हो सके.
* खरपतवारनाशी दवा का छिड़काव करने के 2-3 दिन बाद दोबारा खेत में पानी भर दें और कम से कम 3-5 सैंटीमीटर पानी खड़ा रहने दें.
* खरपतवारनाशक दवा का छिड़काव करने के 6 घंटे में ही अपना काम शुरू कर देता है. 6 घंटे बाद बरसात आने पर भी खरपतवार नियंत्रण पर कोई असर नहीं पड़ता. इस खरपतवारनाशी को दूसरे पौधरक्षक रसायनों के साथ मिश्रण के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है और इस का धान पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है.
आज के समय में गन्ने की फसल किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए वरदान साबित हो रही है, लेकिन गन्ना पैदा करने वाले किसानों को अपनी गन्ना फसल को खांड़सारी व शुगर मिलों में ले जा कर बेचना काफी मेहनत भरा काम लगता है.
शुगर मिलों में लंबी लाइनों में अपने ट्रैक्टरट्रौली को खड़ा करना पड़ता है. 2-3 दिन के इंतजार के बाद गन्ना फसल की तुलाई होती है और फसल के मूल्य का भुगतान भी महीनों बाद मिल पाता है.
ऐसे में गन्ना किसान अगर अपने खेत पर गुड़भट्ठी लगा कर गुड़ बनाएं तो उन की मेहनत व समय की बचत के साथ ही लोकल लोगों को रोजगार मिलेगा. अपनी भट्ठी में बने गुड़ को लोकल हाट, बाजारों में ले जा कर उन्हें अच्छी कीमत मिल सकती है. बड़े गुड़ कारोबारी भी किसानों के गुड़ को खरीद कर साप्ताहिक भुगतान कर देते हैं.
गुड़ बनाने के लिए जमीन में गड्ढा खोद कर भट्ठी तैयार की जाती है. ईंटों की जुड़ाई से चिमनी बनाई जाती है. ज्यादातर किसान आयताकार भट्ठी बनाते हैं. गन्ना पिराई के लिए क्रेशर लगाया जाता है, जो बिजली के अलावा ट्रैक्टर से भी चलाया जा सकता है.
गन्ना क्रेशर के पास ही गन्ने के रस को स्टोर करने के लिए सीमेंट या लोहे की धातु से बने टैंक का इस्तेमाल किया जाता है.
गन्ना के रस को गरम करने के लिए आयताकार या चौकोर आकार की बड़ीबड़ी कड़ाहियों का इस्तेमाल किया जाता है.
भट्ठी के निचले भाग में आग जला कर भट्ठी को गरम किया जाता है. शुरू में कुछ ईंधन की व्यवस्था करनी होती है. बाद में क्रेशर से रस निकालने के बाद गन्ने के जो अवशेष बचते हैं, उन्हें मैदान में फैला कर व सुखा कर ईंधन में इस्तेमाल किया जाता है.
गन्ने के रस को बड़ीबड़ी कड़ाहियों में भर कर भट्ठी पर गरम किया जाता है. जैसेजैसे रस उबलता है, उस में झाग आते हैं. ये झाग रस में मिला हुआ मैल या कूड़ा होता है. इसे एक करछी या छलनी की मदद से अलग कर दिया जाता है. भट्टी का ताप बढ़ते ही रस उबलने लगता है और गुड़ जमने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.
जैसे ही गुड़ जमना शुरू होता है, उसे चट्टू की सहायता से खरोंच कर अलगअलग नाप वाले सांचों में भर दिया जाता है. सांचों में तेल की चिकनाई लगा दी जाती है. सांचों में भरे गुड़ को ठंडा होने के बाद बाहर निकाला जाता है.
जबलपुर जिले के खजरी दोनी गांव के किसान अभिषेक चंदेल बताते हैं कि वे अपनी गन्ना फसल शुगर मिलों को देने के बजाय अपने खेत पर गुड़भट्ठी बना कर देशी गुड़ बनाने का काम करते हैं. उन की गुड़भट्ठी में गांव के 8-10 नौजवानों को कामधंधा भी मिल जाता है और गुड़ बना कर बाजार में बेचने से शुगर मिलों से ज्यादा दाम भी किसानों को मिल जाते हैं. एक एकड़ के गन्ने से 45 से 50 क्विंटल गुड़ आसानी से बन जाता है. 5, 10, और 20 किलोग्राम की पैकिंग में परियां बना कर देशी गुड़ को रखा जाता है. हाट और बड़े बाजार के अलावा बड़ी तादाद में आसपास के गांव वाले देशी गुड़ उन की भट्ठी से भी खरीद कर ले जाते हैं.
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के करताज गांव के किसान राकेश दुबे बताते हैं कि उन्होंने 4 एकड़ जमीन में जैविक खेती के जरीए गन्ने की पैदावार ली. उन के द्वारा बीते 2 साल में गन्ने का उत्पादन 900 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गया और जैविक तरीके से कैमिकलरहित गुड़ बनाने का काम शुरू किया.
‘कुशल मंगल’ नाम से रजिस्टर्ड जैविक गुड़ का दाम बाजार में 50 से 70 रुपए प्रति किलोग्राम है. गन्ने की खेती से राकेश दुबे डेढ़ से 2 लाख रुपए प्रति एकड़ तक की आमदनी हासिल कर रहे हैं.
राकेश दुबे के मुताबिक, एक एकड़ में जैविक गुड़ 30 से 35 क्विंटल तक निकलता है, जबकि कैमिकल गुड़ 50 से 60 क्विंटल तक निकलता है. जैविक गुड़ की मार्केटिंग खुद करनी पड़ती है. भाव सही मिलने से मुनाफा ज्यादा होता है. जैविक गन्ने की लागत भी कम आती है. अभी सब से ज्यादा इन का गुड़ चंडीगढ़ जाता है. महाराष्ट्र, जयपुर, गुजरात, राजस्थान, हैदराबाद में भी इस की अच्छीखासी मांग है.
जैविक गुड़ विदेश में भी
गन्ने की खेती का 20 साल का अनुभव साझा करते हुए राकेश दुबे ने कहा, ‘‘किसानों को बाजार में गन्ने का न तो सही भाव मिलता है और न ही समय पर पैसा मिलता है. इसलिए हमारे जिले के ज्यादातर किसान गन्ने का उत्पाद बना कर ही बेचते हैं.
‘‘मैं ने यह काम बड़े पैमाने पर जैविक तरीके से शुरू किया. एक क्विंटल गन्ने से 13 किलोग्राम जैविक गुड़ बनता है.’’
नरसिंहपुर जिले में बनने वाले इस जैविक गुड़ का ‘कुशल मंगल’ नाम से रजिस्ट्रेशन हो चुका है. राकेश दुबे ने इस के लिए एक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनाई है, जिस में 22 किसान हैं. अब ये किसान भी जैविक गन्ने के उत्पादन के साथ ही जैविक गुड़ बनाने की शुरुआत कर चुके हैं.
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में पिछले साल लगे कृषि मेले में इन के गुड़ की काफी मांग थी. कस्टम एजेंट की मदद से भी राकेश दुबे के गुड़ की मांग विदेशों में बढ़ी है. ये गुड़ औनलाइन अमेजन पर भी उपलब्ध है. कार्गो सर्विस, पोस्टल सर्विस, कोरियर ट्रांसपोर्ट के द्वारा दुबई और श्रीलंका जैसों देशों में भी ये गुड़ भेजा जाता है.
स्वास्थ्यवर्धक रहता है गुड़
जहां शक्कर या चीनी सिर्फ सुक्रोज से बनती है, वहीं गुड़ मुख्य रूप से सुक्रोज, मिनरल्स, आयरन और कुछ फाइबर से बनता है. इसलिए गुड़ दोनों से ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है. चीनी और गुड़ के बीच का अंतर शरीर पर साफ दिखता है.
चीनी सुक्रोज का सरलतम रूप है, जो खून में तुरंत घुल जाता है. इस वजह से तुरंत ऊर्जा मिलती है. इसलिए मधुमेहग्रस्त लोगों को इस से दूर रहने के लिए कहा जाता है.
दूसरी तरफ गुड़ सुक्रोज की लंबी शृंखला से बना है, जिस के कारण हजम भी देर से होता है और ऊर्जा भी धीरेधीरे निकलती है. यह ऊर्जा बहुत देर तक रहती है और नुकसान भी नहीं होता है. गुड़ को लोहे के पात्र में प्रोसैस किया जाता है, इसलिए यह आयरन का स्रोत होता है.
डाक्टर बीएल चौहान के मुताबिक, गुड़ माइग्रेन को ठीक करने में मदद करता है और रजोस्राव के दौरान होने वाली ऐंठन में आराम दिलाता है. बच्चे को जन्म देने के बाद नई मां को गुड़ का काढ़ा इसीलिए दिया जाता है क्योंकि शिशु के जन्म के 40 दिन के बीच खून के थक्के को निकालने में मदद करता है.
गुड़ में जो सेलेनियम रहता है, वह ऐंटीऔक्सिडैंट का काम करता है जबकि पोटैशियम और सोडियम शरीर की कोशिकाओं में अम्लीय संतुलन को बनाए रखता है और ब्लड प्रैशर को संतुलत करता है.
वैसे, गुड़ में संतुलित मात्रा में कैल्शियम, फास्फोरस और जिंक रहता है जो खून को साफ करता है, वात रोग से बचाता है और पित्त विकार को ठीक करता है. गुड़ पीलया को ठीक करने में भी मदद करता है.
गन्ने से गुड़ बनाने की उन्नत तकनीक की जानकारी के लिए राकेश दुबे के मोबाइल नंबर 9425448313 और अभिषेक चंदेल के मोबाइल नंबर 9303375525 पर जानकारी ली जा सकती है.
स्वस्थ एवं रोग व कीट से मुक्त धान की नर्सरी ही अधिक व गुणवत्तापूर्ण धान के उत्पादन का आधार होता है. नर्सरी स्वस्थ होनी चाहिए. खेतों की मेंड़ों को रोपाई से पहले साफसुथरा कर लेना चाहिए, जिस से कीट नहीं पनपते हैं.
सवाल : धान की रोपाई कब तक कर लेना उचित होता है?
जवाब : धान की रोपाई जुलाई माह के मध्य तक अवश्य कर लें. उस के बाद उपज में कमी निरंतर होने लगती है. यह कमी 30 से 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर में प्रतिदिन होती है.
सवाल : धान की कितने दिन की नर्सरी लगाना ज्यादा अच्छा रहता है?
जवाब : धान की 21 से 25 दिन की नर्सरी रोपाई के लिए सब से उपयुक्त होती है.
सवाल : धान की रोपाई की उचित दूरी क्या होनी चाहिए?
जवाब : साधारण उर्वरा भूमि में पंक्तियों एवं पौधों की दूरी 20 × 10 सैंटीमीटर उर्वरा भूमि में 20× 15 सैंटीमीटर रखें. पौधों की रोपाई 3 से 4 सैंटीमीटर से अधिक गहराई पर नहीं करनी चाहिए, अन्यथा कल्ले कम निकलते हैं और उपज में कमी होती है. एक स्थान पर 2 से 3 पौधे लगाएं. अगर वर्षा देर से हो रही है या फिर रोपाई में देरी होने के कारण एक स्थान पर 3 से 4 पौधे लगाना उचित होगा.
ध्यान रहे कि समय से रोपाई पर प्रति वर्गमीटर क्षेत्रफल में 50 हिल अवश्य होना चाहिए. ऊसर और देर से रोपाई की स्थिति में 65 से 70 हिल प्रति वर्गमीटर क्षेत्रफल में होना चाहिए.
रोपाई के बाद जो पौधे मर जाएं, उन के स्थान पर दूसरे पौधों को तुरंत लगा दें. अच्छी उपज के लिए प्रति वर्गमीटर क्षेत्रफल में 250 से 350 बालियों की संख्या होनी चाहिए.
सवाल : धान की नर्सरी बड़ी होने पर किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
जवाब : धान की नर्सरी बड़ी हो जाने पर और देर से रोपाई की स्थिति में पौधों की चोटी चार अंगुल ऊपर से काट कर रोपाई करनी चाहिए, जिस से नर्सरी में दिए हुए कीटों के अंडे नष्ट हो जाएंगे और एक स्थान पर 3-4 पौधे लगाने चाहिए.
– प्रो. रवि प्रकाश मौर्य, (सेवानिवृत्त वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष), निदेशक प्रसार्ड ट्रस्ट, मल्हनी, भाटपार रानी, देवरिया-274702 (उ.प्र.)
बांस से निर्मित वस्तुएं देखने में खूबसूरत, मजबूत व टिकाऊ होती हैं. इस की अलगअलग क्वालिटी के अनुसार इस का रेट भी किसानों को अच्छा मिलता है. इसलिए किसानों के लिए बांस की खेती फायदेमंद साबित होती रही है. बांस को एक बार रोपने के बाद 30-40 सालों तक उस की फसल ली जा सकती है.
बांस की विभिन्न वस्तुओं में उपयोग के अनुसार उस की अलगअलग किस्में आती हैं. लाठी के लिए प्रयोग किया जाना वाला बांस ठोस एवं पतला व कम लंबाई वाला होता है, वहीं घरों के निर्माण प्रयोग में आने वाले बांस की लंबाई अन्य किस्मों की अपेक्षा अधिक होती है. इस की कंटीली प्रजाति में मजबूती अधिक पाई जाती है व खोखलापन कम होता है. बांसुरी के लिए पतले बांस की किस्में प्रयोग में लाई जाती हैं, वहीं सजावटी वस्तुओं के निर्माण में प्रयोग में होने वाला बांस पीला, हरा व खोखला होता है.
बांस की खेती देश के हर कोने में की जा सकती है. यह पठारी, दोमट, बलुई, चिकनी, ऊसर व पथरीली जमीनों पर भी आसानी से उगाया जाने वाला पौधा है.
बांस की खेती खाली पड़ी जमीनों, नाले, नहरों व नदियों के किनारे स्थित खाइयों व नमी वाले स्थानों पर आसानी से की जा सकती है.
पूरे भारत में बांस की सब से अधिक खेती व अधिक किस्में पूर्वोत्तर राज्यों में पाई जाती है. बांस की खेती सिर्फ क्षारीय मिट्टी में नहीं की जा सकती है.
बांस की उन्नत प्रजातियां
अभी तक बांस की कुल 1,250 प्रजातियां पाई गई हैं, जिस में से 145 प्रजातियों को भारत में या तो उगाया जाता है या वह अपनेआप ही उग आता है.
भारत में उगाई जाने वाली बांस की कुछ उन्नत प्रजातियां निम्न है :
बैब्यूसा वलगैरिस
इस प्रजाति के बांस पीली, हरी व धारीधार होती है, जो देखने में बहुत खूबसूरत लगते हैं. इस वजह से इस की मांग सजावटी वस्तुओं के निर्माण के लिए ज्यादा होती है.
बैंब्यूसा टुल्ला
इस बांस की प्रजाति अपेक्षाकृत लंबी होती है.
बैंब्यूसा स्पायनोसा
इस किस्म में कांटे पाए जाते हैं. यह मजबूत होती है. इस की खेती उत्तरपश्चिम भारत में ज्यादा होती है.
डेंड्रोकलामस सख्त
इस प्रजाति के बांस मजबूत होते हैं व लंबाई में अधिक होते हैं.
बंबूसा नूतन
इस किस्म के बांस का उपयोग कई कामों में किया जाता है, इसलिए इस की मांग ज्यादा होती है.
मेलोकन्ना बंबूसोइड्स
इस बांस की किस्म की खेती पश्चिम बंगाल में अधिक होती है.
बैब्यूसा अरंडनेसी
यह सब से लंबी किस्म होती है. इस की ऊंचाई 30-40 फुट होती है, जो 30-100 के झुंड में एकसाथ उगती है.
बांस की रोपाई की तैयारी
बांस की रोपाई जुलाई से सितंबर माह तक की जा सकती है. यह नर्सरी तैयार कर राइजोम या उस की गांठों के द्वारा रोपा जाता है. बांस की रोपाई के लिए 30 सैंटीमीटर के लंबाई, चौड़ाई व गहराई का गड्ढा खोद कर 5×6 का अंतराल रखा जाता है.
बांस की नर्सरी तैयार करने के लिए उस के बीज को 24 घंटे तक पानी में भिगोए जाते हैं. इस दौरान एक बार पानी बदलना जरूरी होता है.
बांस के बीज : बांस की फसल रोपे जाने के 20-40 सालों के बीच सिर्फ एक बार पौधों में फूल आने से प्राप्त होते हैं. इस के बीज चावल की तरह होते हैं.
बांस के एक किलोग्राम बीज में लगभग 4,000 बीज होते हैं. बांस के पुंज में एकसाथ फूल आता है और सभी बांस फूल आने के बाद सूख जाते हैं.
अगर बांस की रोपाई उस की गांठों से करनी है, तो काटे गए बांसों की जड़ों को खोद कर उसे जुलाई से सितंबर माह तक रोप देना चाहिए और प्रत्येक दो माह के अंतराल पर इस की सिंचाई करते रहना चाहिए. इस के अलावा इस की जड़ों में सड़ी हुई गोबर की खाद व पत्तियों का प्रयोग करने से कल्ले अधिक फूटते हैं व फसल की बढ़वार अधिक होती है.
फसल की रोपाई के बाद पांचवे वर्ष से बांस की फसल मिलनी शुरू हो जाती है. इस के प्रत्येक पुंज में 5 से 10 वर्ष के बीच में किस्मों के अनुसार 15-100 कल्ले प्राप्त होते हैं. 15-20 वर्ष के बाद कल्लों की संख्या बढ़ जाती है और 30 वर्ष के बाद कल्लों की संख्या घटनी शुरू हो जाती है.
बांस की कटाई
बांस के पौधे अन्य फसलों की तरह नहीं होते हैं. इस की पुंजों से जो भूमिगत तना निकलता है, वह बड़ी तेजी से बढ़ता है और किसीकिसी किस्म की बढ़वार एक दिन में एक मीटर तक की होती है.
बांस 2 माह में अपना पूरा विकास कर लेता है. बांस के अच्छे बढ़वार के लिए वर्षा ऋतु में इस के पुंजों की बगल में मिट्टी चढ़ा कर जड़ों को ढक देना चाहिए.
बांस की कटाई उस के होने वाले उपयोग पर निर्भर करता है. अगर बांस की टोकरी बनानी है, तो वह 3-4 वर्ष पुरानी फसल हो. अगर मजबूती के लिए बांस की आवश्यकता है, तो 6 वर्ष की फसल ज्यादा उपयुक्त होती है.
बांस की कटाई का उपयुक्त समय अक्तूबर के दूसरे सप्ताह से दिसंबर माह तक का होता है. गरमी के मौसम में बांस की कटाई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इस से जड़ें सूख सकती हैं और कल्ले फूटने की कम संभावनाएं होती हैं.
बांस की खूबियां
बांस को अगर पर्यावरण मित्र कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति न होगा, क्योंकि इस के एक हेक्टेयर खेत से 17 टन कार्बन अवषोषित किया जाता है. यह सर्वाधिक औक्सीजन छोड़ने वाला पौधा है. इसलिए यह वातावरण में शुद्ध वायु छोड़ने का एक प्रमुख घटक भी है.
बांस की एक खूबी यह भी है कि अगर इस की तुलना एक पेड़ से की जाए तो वह पेड़ 18 मीटर की लंबाई में बढ़ने के लिए 30-60 वर्ष का समय लेता है, जबकि बांस मात्र 30-60 दिनों के भीतर में 18 मीटर लंबाई में बढ़ जाता है.
बांस की खेती के अनगिनत लाभ
किसान राममूर्ति मिश्रा का कहना है कि बांस की खेती में न्यूनतम लागत व कम देखभाल की जरूरत होती है. इसे एक बार रोपने के बाद कई सालों तक फसल ली जा सकती है.
बांस प्रत्यक्ष रूप से किसान को लाभ तो देता ही है, साथ ही यह अप्रत्यक्ष रूप से भी कइयों को लाभ देने का माध्यम साबित हो रहा है.
Bamboo Products
देश में लाखों परिवार बांस आधारित उद्योग से अपना जीवनयापन कर रहे हैं. बांस से बनी हुई चीजें देशी पर्यटकों द्वारा महंगे दामों पर खरीदी जाती हैं. इस से महिलाओं के लिए सौंदर्य प्रसाधन, हेयर क्लिप, ग्रीटिंग कार्ड, चम्मच, तीरधनुष, खेती के उपकरण, कुरसीमेज, मछली पकड़ने का कांटा, चारपाई, डलिया जैसी हजारों वस्तुओं का निर्माण किया जाता है, इसलिए बांस को हरा सोना भी कहा जा सकता है.
सलाद एक मुख्य विदेशी फसल है. दूसरी सब्जियों की तरह यह भी पूरे भारत में पैदा की जाती है. इस की कच्ची पत्तियों को गाजर, मूली, चुकंदर व प्याज की तरह सलाद और सब्जी के तौर पर प्रयोग में लाया जाता है.
यह फसल मुख्य रूप से जाड़ों में उगाई जाती है. अधिक ठंड में बहुत अच्छी बढ़वार होती है और तेजी से बढ़ती है. इस फसल को ज्यादातर व्यावसायिक रूप से पैदा करते हैं और फसल की कच्ची व बड़ी पत्तियों को बड़ेबड़े होटलों और घरों में मुख्य सलाद के रूप में इस्तेमाल करते हैं, इसलिए इस फसल की पत्तियां सलाद के लिए बहुत प्रसिद्ध हैं.
इस विदेशी फसल को देश में भी उगाया जाता है. सलाद के सेवन से शरीर को अधिक मात्रा में खनिज पदार्थ और विटामिंस मिलते हैं. यह विटामिन ‘ए’ का मुख्य स्रोत है. इस के अलावा प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, कैल्शियम और विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ दोनों ही मिलते हैं.
जमीन और जलवायु
सलाद की फसल के लिए ठंडे मौसम की जलवायु सब से उत्तम होती है. ज्यादा तापमान होने पर बीज बनने लगता है और पत्तियों का स्वाद बदल जाता है, इसलिए इस का तापमान 12 डिगरी सैंटीग्रेड से 15 डिगरी सैंटीग्रेड सही होता है.
बीज अंकुरण के लिए भी तापमान
20-25 डिगरी सैंटीग्रेड सब से अच्छा होता है. 30 डिगरी सैंटीग्रेड से ज्यादा तापमान होने पर बीजों का अंकुरण सही नहीं हो पाता.
फसल के लिए उपजाऊ जमीन सब से अच्छी होती है. हलकी बलुई दोमट व मटियार दोमट मिट्टी सही होती है. जमीन में पानी रोकने की क्षमता होनी चाहिए, ताकि नमी लगातार बनी रहे. पीएच मान 5.8-6.5 के बीच की जमीन में अच्छा उत्पादन होता है.
खेती की तैयारी और खादउर्वरक
जमीन की 2-3 बार मिट्टी पलटने वाले हल या 3-4 देशी हल या ट्रैक्टर से जुताई करनी चाहिए. खेत को ढेलेरहित कर के भुरभुरा कर लेना अच्छा है. हर जुताई के बाद पाटा लगाना चाहिए.
सलाद के लिए खेत में सड़ी हुई गोबर की खाद 15-20 ट्रौली प्रति हेक्टेयर डाल कर मिट्टी में मिला देनी चाहिए और कैमिकल उर्वरकों का इस्तेमाल इस तरह करना चाहिए कि नाइट्रोजन 120 किलोग्राम, 60 किलोग्राम फास्फेट और 80 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए.
खेत तैयार करते समय नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फेट व पोटाश की पूरी मात्रा को बोआई से पहले डालें. नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा को 2 बार में खड़ी फसल पर पत्तियों को 2-3 बार तोड़ने के बाद छिड़कना चाहिए. इस तरह से उपज अच्छी मिलती है.
बगीचों में 3-4 टोकरी देशी खाद डाल कर यूरिया 600 ग्राम, 300 ग्राम फास्फेट और 200 ग्राम पोटाश 8-10 वर्गमीटर में डालना चाहिए और यूरिया की आधी मात्रा फसल के बड़ी होने पर यानी 15-20 दिन के अंतराल से 2 बार में छिड़कना चाहिए.
ध्यान रहे कि यूरिया की दूसरी मात्रा पत्तियों के तोड़ने के तुरंत बाद छिड़कनी चाहिए. इस तरह हरी पत्तियां बाद तक मिलती हैं और अधिक मिलती हैं.
प्रमुख जातियां
सलाद की मुख्य जातियां, जिन को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा बोने की सिफारिश की जाती है क्योंकि इन प्रजातियों के इस्तेमाल से अधिक मात्रा में पत्तियां और मुलायम तना मिलता है:
ग्रेट लेकस, चाइनीज यलो, स्लोवाल्ट हैं.
बोने का समय और दूरी
सलाद की बोआई के पहले पौधशाला में पौध तैयार करते हैं. जब पौध 5-6 हफ्ते की हो जाती है तो खेत में रोप दिया जाता है.
अगस्तसितंबर माह में बीज लगाते हैं और रोपाई सितंबरअक्तूबर माह में की जाती है. कतारों से कतारों की दूरी 30 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 25 सैंटीमीटर रखते हैं.
बीज की मात्रा
बीज की मात्रा 500-600 ग्राम प्रति हेक्टेयर काफी है. बीज को पौधशाला में क्यारियां बना कर पौध तैयार करनी चाहिए और बड़ी पौध को लाइन में लगाना चाहिए.
बीमारी और रोकथाम
पाउडरी मिल्ड्यू : इस रोग में सब से पहले पत्तियों पर हलके हरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. पत्तियों के निचले भाग में ये धब्बे ज्यादातर दिखते हैं. रोकथाम के लिए अगेती फसल बोनी चाहिए और रोगी पौधों को उखाड़ देना चाहिए. ज्यादा बीमारी होने पर फंजीसाइड का इस्तेमाल करना चाहिए.
मोजैक : ये रोग वायरस द्वारा फैलता है. इस का असर पौध पर ज्यादा होता है और पत्तियों पर इस का प्रकोप होता है. पत्ते व पौधे हलके पीले पड़ जाते हैं. नियंत्रण के लिए बीज को उपचारित कर के बोना चाहिए. रोगी पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिए.
रोगों से बचाव
सलाद की फसल पर ज्यादा कीट नहीं लगते, लेकिन कभीकभार एफिड का हमला होता है जो कि ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. नियंत्रण के लिए जिन पौधों पर कीट लगे हों, उन्हें उखाड़ कर जला देना चाहिए. इन कीटों का अधिक हमला होने पर 0.1 फीसदी मैटासिस्टौक्स या मैलाथियान का घोल बना कर 10-10 दिन के अंतराल पर 2-3 बार छिड़काव करना चािहए. इस के बाद इन कीटों का हमला रुक जाता है.
सावधान रहें कि दवा छिड़कने के बाद पत्तियों को ठीक तरह से धो कर इस्तेमाल में लाएं.
सिंचाई व खरपतवार पर नियंत्रण
सलाद के खेत की सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद करनी चाहिए. इस के बाद 10-12 दिन के अंतर से सिंचाई करनी चाहिए. फसल में नमी का होना बहुत जरूरी है. सिंचाई के तुरंत बाद निकाईगुड़ाई करते हैं और घास व खरपतवारों को निकाल देना चाहिए.
सलाद की कटाई
सलाद की फसल जब बड़ी हो जाए तो जरूरत के मुताबिक मुलायम पत्तियों को तोड़ते रहना चाहिए जिस से कि पत्तियां कड़ी न होने पाएं. कड़ी पत्तियों में पोषक तत्त्वों की मात्रा कम हो जाती है और रेशे की मात्रा बढ़ जाती है, इसलिए चाहिए कि तुड़ाई या कटाई का विशेष ध्यान रखें.
इस तरह से 2-3 दिन के अंतराल पर तुड़ाई करते रहना चाहिए. तुड़ाई या कटाई करते समय पत्तियों वाली शाखाओं को सावधानी से तोड़ना या काटना चाहिए. तुड़ाई हाथों से या कटाई तेज चाकू या हंसिया से करनी चाहिए.
पत्तियों की पैदावार
सलाद की पत्तियों की पैदावार 125-150 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और 600-700 बीज प्रति हेक्टेयर हासिल होती है.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना मुख्य फसल के रूप में उगाया जाता है. नकदी फसल होने और तमाम चीनी मिलें होने की वजह से किसानों के बीच गन्ना बहुत ही लोकप्रिय फसल है. इस की खेती ज्यादातर एकल फसल के रूप में की जाती है. किसान गन्ने की फसल को नौलख या पेड़ी के रूप में 2-3 साल तक लेते रहते हैं. अनेक किसान गन्ने के साथ अन्य फसल भी लेते हैं जिसे हम सहफसली खेती के रूप में जानते हैं. ऐसा करने से गन्ने की खेती में मुनाफा भी बढ़ जाता है.
गन्ना और राजमा की सहफसली खेती
खेत का चुनाव व तैयारी : गन्ना और राजमा की खेती के लिए समतल जीवांशयुक्त बलुई दोमट मिट्टी का चुनाव करना चाहिए. गोबर की खाद को खेत में डाल कर 4-5 बार जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए.
बीज का चुनाव व बोआई : पंत अनुपमा, अर्का कोमल, करिश्मा, सेमिक्स, कंटेंडर वगैरह राजमा की उन्नत प्रजातियां हैं. राजमा के बीजों को कार्बंडाजिम की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. गन्ने के बीजोपचार के लिए कार्बंडाजिम की 200 ग्राम मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल कर टुकड़ों को उस में 25-30 मिनट तक डुबोएं.
गन्ना और राजमा की सहफसली खेती में राजमा के 80 किलोग्राम और गन्ने के 60 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने चाहिए. बोआई 25 अक्तूबर से 15 नवंबर के मध्य कर लेनी चाहिए. गन्ने की 2 लाइनों के बीच राजमा की 2 लाइनों की मेंड़ों पर बोआई करें.
निराईगुड़ाई व सिंचाई : दोनों फसलों की बोआई सर्दी के मौसम में होने की वजह से खरपतवारों की समस्या कम रहती है, फिर भी खरपतवार निकालने के लिए फसल में 2-3 बार निराईगुड़ाई करें. पूरे फसलोत्पादन के दौरान जमीन को नम बनाए रखें, ताकि फसल को पाले से सुरक्षित रखा जा सके.
खाद व उर्वरक : खेत में 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से सड़ी गोबर की खाद मिलानी चाहिए. इस के अलावा 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 80 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट उर्वरकों का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.
फसल सुरक्षा : बोआई से पहले बीजोपचार जरूर करें. आमतौर पर फलियां बनते समय फली भेदक, पर्ण सुरंगक व कुछ चूषक कीटों का हमला हो जाता है. कभीकभी मोजैक रोग का संक्रमण भी हो जाता है.
उन्नत तकनीक से खेती करने पर राजमा की फलियों की औसत उपज 50-60 क्विंटल प्रति एकड़ तक हासिल हो जाती है और तकरीबन 40,000 रुपए प्रति एकड़ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है. इस के साथ ही गन्ने की उत्पादकता में भी इजाफा होता है.
खास वजह यह भी है कि खेत में डाली गई खाद व उर्वरकों का अधिकतम इस्तेमाल भी है. खरपतवार प्रबंधन का लाभ दोनों फसलों द्वारा हासिल किया जाता है और सहफसल में अपनाए गए कीट व रोग प्रबंधन का लाभ मुख्य फसल को भी मिल जाता है.
कीटों व रोगों की रोकथाम
* नीम का तेल 1.5 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. इस के इस्तेमाल से फसल की सुरक्षा भी हो जाती है और इनसानों की सेहत पर बुरा असर नहीं पड़ता है.
* नीम का तेल न होने पर 2 लिटर क्विनालफास 25 ईसी या 1.25 लिटर मोनोक्रोटोफास 36 एसएल या 2 किलोग्राम कार्बारिल 50 डब्लूपी को 600-700 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से 12-14 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें.
लहसुन की खेती में कीट व रोगों की रोकथाम कर अच्छा मुनाफा लिया जा सकता है. लहसुन जड़ वाली फसल है, इसलिए खासकर ध्यान रखें कि हमारे खेत की मिट्टी रोगरहित हो. अगर फिर भी पौधों में कीट व रोगों का प्रकोप दिखाई दे, तो समय रहते उन का उपचार करें.
लहसुन के खास कीट
माहू : इस के निम्फ और वयस्क दोनों ही पौधों से रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां किनारों से मुड़ जाती हैं. कीट की पंख वाली जाति लहसुन में वाइरसजनित रोग भी फैलाती है. ये चिपचिपा मधुरस पदार्थ अपने शरीर के बाहर निकालते हैं, जिस से पत्तियों के ऊपर काली फफूंद पनपती देखी जा सकती है, जिस से पौधों के भोजन बनाने की क्रिया पर असर पड़ता है.
रोकथाम : माहू का प्रकोप होने पर पीले चिपचिपे ट्रैप का इस्तेमाल करें, जिस से माहू ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं. परभक्षी कौक्सीनेलिड्स या सिरफिड या क्राइसोपरला कार्निया को एकत्र कर 50,000-1,00,000 अंडे या सूंड़ी प्रति हेक्टेयर की दर से छोडे़ं. जरूरतानुसार डाईमिथोएट 30 ईसी या मैटासिस्टौक्स 25 ईसी 1.25-2.0 मिलीलिटर प्रति लिटर की दर से छिड़काव करना चाहिए.
लहसुन का मैगट : मैगट पौधे के तने व शल्क कंद में घुस कर नुकसान पहुंचाते हैं. बड़े शल्क कंदों में 8 से 10 मैगट एकसाथ घुस कर उसे खोखला बना देते हैं.
रोकथाम: शुरुआत में रोगी खेत पर काटाप हाइड्रोक्लोराइड 4जी की 10 किलोग्राम मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में बिखेर कर सिंचाई कर दें. बढ़ते हुए पौधों पर मिथोमिल 40 एसपी की 1.0 किलोग्राम या ट्राईजोफास 40 ईसी की 750 मिलीलिटर मात्रा को 500-600 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने पर नए निकले हुए मैगट मर जाते हैं.
थ्रिप्स : इस कीट का हमला तापमान के बढ़ने के साथसाथ होता है व मार्च महीने में इस का हमला ज्यादा दिखाई देता है. यह कीट पत्तियों से रस चूसता है, जिस से पत्तियां कमजोर हो जाती हैं और रोगी जगह पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं, जिस के कारण पत्तियां मुड़ जाती हैं.
रोकथाम : लहसुन की कीट रोधी प्रजातियां उगानी चाहिए. कीट के ज्यादा प्रकोप की दशा में 150 मिलीलिटर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल को 500-600 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.
माइट्स : इस कीट के प्रकोप से पत्ती का असर वाला भाग पीला हो जाता है और पत्तियां मुड़ी हुई निकलती हैं. वयस्क और शिशु कीट दोनों ही नई पत्तियों का रस चूस कर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं.
रोग के शुरू में सब से पहले पौधों की निचली पत्तियां तैलीय हो जाती हैं और बाद में पूरा पौधा तैलीय हो जाता है. रोगी पत्तियां छोटी हो जाती हैं और चमड़े की तरह दिखाई देती हैं. पत्तियां निचली तरफ से तांबे जैसी रंगत की दिखाई देती हैं. माइट का ज्यादा हमला होने से रोगी पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं और पूरा पौधा मुरझा कर सूख जाता है.
रोकथाम : रोगी पौधों के कंद व जड़ सहित उखाड़ कर नष्ट कर दें. घुलनशील गंधक 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या कैराथीन 500 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करें. मैटासिस्टौक्स छिड़कने से भी फायदा होता है.
लहसुन के रोग
विगलन : इस रोग का असर कंदों पर खेतों में या भंडारगृह दोनों में हो सकता है. खेत में रोगी पौधा पीला हो जाता है और जड़ें सड़ने लगती हैं.
कभीकभी रोग के लक्षण बाहर से नहीं दिखाई पड़ते हैं, लेकिन लहसुन की गर्दन के पास दबाने से कुछ शल्क मुलायम जान पड़ते हैं. बाद में ये शल्क भूरे रंग के हो जाते हैं. सूखे मौसम में शल्क धीरेधीरे सूख कर सिकुड़ जाते हैं, जिस की वजह से छिलका फट कर अलग हो जाता है.
रोकथाम : खेत को ट्राईकोडर्मा नामक जैव फफूंद की 2.5 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए. गरमी के महीनों में खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खुला छोड़ दें, जिस से कि कवक व अन्य रोग जनकों की मौत हो जाए. कंदों को बोआई से पहले 2.0 ग्राम कार्बंडाजिम का प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर उपचारित करें.
बैगनी धब्बा : इस रोग से लहसुन को काफी नुकसान होता है. इस रोग के लक्षण पत्तियों, कंदों पर उत्पन्न होते हैं, शुरू में छोटे धंसे हुए धब्बे बनते हैं, जो बाद में बड़े हो जाते हैं. धब्बे के बीच का भाग बैगनी रंग का हो जाता है. यदि आप उसे हाथों से छुएं तो काले रंग का चूर्ण हाथ में चिपका हुआ दिखाई देता है. रोगी पत्तियां झुलस कर गिर जाती हैं. रोगी पौधों से प्राप्त कंद सड़ने लगते हैं.
रोकथाम : 2-3 साल का सही फसल चक्र अपनाएं. रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैंकोजेब की 2.0 ग्राम मात्रा प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर 2 बार छिड़काव करें.
सफेद सड़न : इस बीमारी से कलियां सड़ने लगती हैं.
रोकथाम : जमीन को ट्राईकोडर्मा नामक जैव फफूंद की 2.5 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए. गरमी के महीनों में खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खुला छोड़ दें जिस से कि कवक व अन्य रोग जनकों की मौत हो जाए. कंदों को बोआई के पहले 2.0 ग्राम कार्बंडाजिम का प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर उपचारित करें.
कंद सड़न : इस बीमारी का हमला भंडारण में होता है.
रोकथाम : इस की रोकथाम के लिए कंद को 2 फीसदी बोरिक अम्ल से उपचारित कर के भंडारण करना चाहिए. बीज के लिए यदि कंद को रखना हो तो 0.1 फीसदी मरक्यूरिक क्लोराइड से उपचारित कर के रखें. खड़ी फसल में मैंकोजेब की 2.0 ग्राम मात्रा का प्रति लिटर पानी की दर से छिड़काव करें.
फुटान : नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल से यह बीमारी फैलती है. इस के अलावा ज्यादा पानी या ज्यादा दूरी पर रोपाई की वजह से फुटान ज्यादा होता है. इस बीमारी से लहसुन कच्ची दशा में कई छोटेछोटे फुटान देता है, जिस से कलियों का भोजन पदार्थ वानस्पतिक बढ़वार में इस्तेमाल होता है.
रोकथाम : लहसुन की रोपाई कम दूरी पर करें और नाइट्रोजन व सिंचाई का इस्तेमाल ज्यादा न करें. ऐसे रोगी पौधों को देखते ही पौलीथिन की थैली से ढक कर सावधानीपूर्वक उखाड़ कर मिट्टी में दबा दें.
बीजों को बोने से पहले वीटावैक्स 2.5 ग्राम या टेबूकोनाजोल 1.0 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम की दर से उपारित करें.