कम पानी में अच्छा उत्पादन देने वाली बासमती की प्रजातियां लगाएं किसान

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में 20 कृषि विज्ञान केंद्रों पर नवनियुक्त विषय विशेषज्ञों के लिए कृषि विपणन पर प्रेरण कार्यक्रम विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यशाला का शुभारंभ कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डा. केके सिंह की अध्यक्षता में हुआ.

कुलपति डा. केके सिंह ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि निर्यात के लिए गुणवत्तायुक्त बासमती चावल के उत्पादन एवं इस के द्वारा आय में वृद्धि विषय पर प्रकाश डालते हुए किसानों को नई तकनीकी अपनाने की सलाह दी.

उन्होंने यह भी कहा कि धान उत्पादन के लिए ऐसी किस्मों का चुनाव करें, जिस में कम पानी लगता हो और विपरीत परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन देती हो.

डा. केके सिंह ने आगे कहा कि प्रतिबंधित पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल बासमती खेती में नहीं करना चाहिए.

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कहा कि बासमती धान जब बनते थे, तो इस में खुशबू बहुत आती थी, लेकिन अब ऐसे चावल कम देखने को मिलते हैं. किसानों को चाहिए कि आज तकनीकी के युग में खेतीकिसानी काफी आगे पहुंच गई है.

उन्होंने कहा कि खेती करते समय कैमिकल खादों का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए, क्योंकि इन का अधिक प्रयोग करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो रही हैं, इसलिए कैमिकल खादों से और पेस्टिसाइड से बचना चाहिए.

प्रो. संगीता शुक्ला ने कहा कि हर परिवार से कम से कम एक सदस्य ऐसा होना चाहिए, जो एग्रीकल्चर से जुड़ा हो तो निश्चित रूप से हमारा देश काफी आगे बढ़ सकता है.

उन्होंने किसानों से आवाह्न किया कि वे कृषि की नवीनतम तकनीकों का प्रयोग खेती में करें, जिस से किसानों की आय बढ़ सकेगी.

पद्मश्री वैज्ञानिक डा. बीपी सिंह ने बासमती चावल के उत्पादन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक 100 में से 7 व्यक्ति चावल पर निर्भर रह कर जीविकोपार्जन कर रहा है. यही वजह है कि चावल धन देता है और चावल में चावल यदि कोई है तो वह बासमती है.

उन्होंने आगे बताया कि पूरे विश्व में खुशबू वाली लगभग 1,000 प्रजातियां हैं, लेकिन वे सभी प्रजातियां बासमती नहीं हैं. वर्ष 1970 में बासमती की 370 प्रजाति सब से पहले भारत में तैयार हुई और उस के बाद शोध कर के अनेक बासमती की प्रजातियां विकसित की गईं, जिस में से 1,121 दुनिया में सब से लंबा बासमती के नाम से पहचाना जाने वाला चावल है.

वैज्ञानिक डा. रितेश शर्मा ने बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान ने उत्पादन तकनीक पर विस्तार से चर्चा की. डा. अनुपम दीक्षित ने बासमती चावल के मानकों की जानकारी दी.

डा. पीके सिंह ने बताया कि कार्यक्रम में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 18 जनपदों के वैज्ञानिकों एवं प्रगतिशील किसानों ने प्रतिभाग किया. किसान ज्ञान प्रतियोगिता में सहारनपुर, संभल, मुरादाबाद एवं मुजफ्फरनगर के प्रगतिशील किसानों ने सवालों के सही जवाब दे कर पुरस्कार जीता.

निदेशक प्रसार डा. पीके सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया और धन्यवाद प्रस्ताव निदेशक शोध डा. अनिल सिरोही ने दिया.

कार्यक्रम में प्रो. रामजी सिंह, कुलसचिव, लक्ष्मी मिश्रा, वित्त नियंत्रक निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, प्रो. आरएस सेंगर, अधिष्ठाता कृषि, डा. विवेक धामा, डा. रविंद्र कुमार, डा. कमल खिलाड़ी, डा. विजेंद्र सिंह, डा. लोकेश गंगवार, सत्येंद्र खारी, डा. गोपाल सिंह आदि लोग मौजूद रहे.

जंगली सब्जी कसरोड़

जम्मूकश्मीर में प्राकृतिक रूप में पाई जाने वाली कई सब्जियां होती हैं, जिन के लिए खेतीबारी नहीं की जाती है. ये प्राकृतिक तौर पर समय के अनुसार खुद ही तैयार हो जाती हैं. इन्हीं सब्जियों में से एक है कसरोड़, जो खाने में बहुत ज्यादा स्वादिष्ठ होती है.

कसरोड़ का विभिन्न स्थानों में अलगअलग नाम है जैसे जम्मू में कसरोड़, पुंछ में कंदोर, किस्तवाड़ में टेड कहते हैं. जम्मूकश्मीर के रामवन जिले में इसे धोड के नाम से जाना जाता है. हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में लिंगड़, कुल्लू घाटी में लिंगडी, कांगड़ा जिले में कसरोद कहते हैं. उत्तराखंड में कसरोड़ को लिब्रा कहते हैं. त्रिपुरा की लोकल भाषा में मुइखोन कहते हैं.

कसरोड़ आमतौर पर पहाड़ी क्षेत्रों में घने जंगलों और ठंडे क्षेत्र में नदीनालों के पास पाई जाने वाली जंगली सब्जी है. किसानों को इस के लिए खाद नहीं डालनी पड़ती और अन्य किसी प्रकार की देखभाल की जरूरत नहीं होती.

कसरोड़ के पौधों का आकार और रंग अलगअलग क्षेत्रों में अलगअलग है. हिमाचल प्रदेश में पाए जाने वाली कसरोड़ के डंठल मोटे और पत्ते छोटे होते हैं. डंठल के हिस्से का रंग अत्यधिक गहरा होता है. उत्तराखंड में कसरोड़ के पत्ते पतले और कम पाए जाते हैं, जबकि डंठल अधिक मोटा होता है.

जम्मूकश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र में पाई जाने वाली कसरोड़ सब्जी का रंग थोड़ा लालिमा लिए होता है. जम्मूकश्मीर के कठुआ जिले में पाया जाने वाला कसरोड़ का डंठल कमजोर होता है, जबकि इस के पत्ते लंबे और घने होते हैं.

जम्मूकश्मीर के बनी, बसोली, लुहाई, मल्हार भद्रवाह, रामवन और पुंछ में हरे और गहरे लाल रंग का कसरोड़ पाया जाता है.

हरे रंग के कसरोड़ में हलकी सी गंध आती है, जबकि गहरे लाल रंग का कसरोड़ खाने में ज्यादा स्वादिष्ठ होता है. इस का मुख्य कारण है, 1,800 से 2,000 मीटर की ऊंचाई पर बहने वाली नदी, नालियों और झरने का पानी शुद्ध होता है, साथ ही किसी प्रकार की गंदगी  नदीनालों के पास नहीं पाई जाती. वातावरण भी अनुकूल होता है.

कसरोड़ मार्च महीने से प्रस्फुटित होता है और मई के अंत तक पौधे तैयार होने लगते हैं. यह मई और जून में बाजार में बिकने लगता है और जुलाई में धीरेधीरे कम हो जाता है. इन दिनों इस के डंठल सख्त और पत्ते कम हो जाते हैं.

इस के डंठल में हलकेहलके रुईदार कांटे उंग जाते हैं, फिर यह सब्जी बनाने के काबिल नहीं रहती. सब्जी बेचने वालों को इस की देखभाल करनी पड़ती है. अगर धूप लग जाए तो पत्तों के साथ डंठल तक मुरझा जाते हैं. इस के उखाड़ने के बाद 1-2 दिन तक ही इसे बेचा जा सकता है. इस के मुरझाने के बाद यह किसी काम का नहीं रहता है.

कसरोड़ काली, गहरी, भूरी और नमी वाली मिट्टी में उगता है. इस का डंठल एक सैंटीमीटर पुलाई लिए 9 सैंटीमीटर तक लंबा होता है. इस का सिरा मुड़ा हुआ होता है. इन का डंठल जितना नरम और मुलायम होगा उतनी ही उस की सब्जी और अचार स्वादिष्ठ होंगे.

कसरोड़ की सब्जी बनाने से पहले अच्छी तरह धोया जाता है. धोने से पहले इस की साफसफाई जरूरी है, क्योंकि इस के डंठल नरम होने के कारण उन पर कई प्रकार के सूखे पत्ते चिपके होते हैं. साथ ही, चिकनी मिट्टी इन के पत्तों से चिपकी होती है.

बाजार में इस की कीमत 100 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम है. इस की सब्जी में विटामिन ए, विटामिन बी, मैग्नीशियम पोटैशियम, कौपर, आयरन, सोडियम, कैरोटीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है. इस की सब्जी खाने से मांसपेशियां और हड्डियां मजबूत  होती हैं.

प्राकृतिक खेती में नवाचार की जरूरत

उदयपुर : 30 जून, 2023 को महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अनुसंधान निदेशालय में टिकाऊ कृषि के लिए प्राकृतिक खेती पर 2 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुभारंभ हुआ.

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में कुलपति, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर, डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए बताया कि पूरेे विश्व में रासायनिक उर्वरकों एवं हानिकारक कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग व एकल फसल प्रणाली से मिट्टी की गुणवत्ता में कमी, जैव विविधता का घटता स्तर, हवा की बिगड़ती गुणवत्ता और दूषित पर्यावरण के कारण हरित कृषि तकनीकों के प्रभाव टिकाऊ नहीं रहे हैं.

उन्होंने आगे बताया कि अत्यधिक उर्वरक के उपयोग से इनसान की सेहत, पशुओं की सेहत और बढ़ती लागत को प्रभावित कर रहे हैं और अब वैज्ञानिक तथ्यों से भी यह स्पष्ट है कि भूमि की जैव क्षमता से अधिक शोषण करने से एवं केवल रासायनिक तकनीकों से खाद्य सुरक्षा एवं पोषण सुरक्षा प्राप्त नहीं की जा सकती है.

उन्होंने यह भी कहा कि जैव विविधता को संरक्षित करते हुए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना चाहिए, जिस से कि लाभदायक कीट जैसे मधुमक्खीपालन को कृषि में बढ़ावा मिल सके.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने प्राकृतिक खेती के 4 मूल अवयव ‘बीजामृत, जीवामृत, आच्छादन, नमी संरक्षण’ एवं जैव विविधता के बारे में विस्तृत रूप से प्राकृतिक खेती के परिपेक्ष में चर्चा की.

डा. एसके शर्मा, सहायक महानिदेशक, मानव संसाधन विकास, भारत कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधन करते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने से कृषि उत्पादन में टिकाऊपन आ सकता है. प्राकृतिक खेती गांव आधारित समन्वित खेती है, प्रदूषणरहित खेती है, अतः स्वस्थ भोजन के लिए ग्राहकों में इस की मांग बढ़ रही है. बढ़ती मांग के मद्देनजर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो गांवों में रोजगार बढ़ाने में भी सहायक होगी.

उन्होंने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती को देश को कृषि के पाठ्यक्रम में चलाने के साथसाथ नईनई तकनीकों को आम लोगों तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है. इस के तहत आने वाले समय में देश के तकरीबन एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती की तरफ ले जाना है, जो कि वर्तमान में देश के कृषि वैज्ञानिकों के सामने एक मुख्य चुनौती है. प्राकृतिक खेती में देशज तकनीकी जानकारी और किसानों के अनुभवों को भी साझा किया.

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डा. चंद्रेश्वर तिवारी, पूर्व निदेशक प्रसार शिक्षा, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड ने बताया कि प्रकृति और पारिस्थितिक कारकों के कृषि में समावेश कर के ही पूरे कृषि तंत्र का ‘शुद्ध कृषि’ की तरफ बढ़ाया जा सकता है.

उन्होंने बताया कि भारतीय परंपरागत कृषि पद्धति योजना के तहत राज्यों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है. इस से कम लागत के साथसाथ खाद्य पोषण सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा. जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों के तहत खेती को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्राकृतिक खेती के घटकों को आधुनिक खेती में समावेश करना आवश्यक है.

डा. अरविंद वर्मा, अनुसंधान निदेशक ने कार्यक्रम की आवश्यकताओं एवं उद्देश्य के बारे में चर्चा करते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती की नवीनतम तकनीकों का विकास करना आवश्यक है. इस के लिए विद्यार्थियों को अभी से ही जागरूक होने की आवश्यकता है. साथ ही, किसानों एवं कृषि बाजार को जोड़ कर किसानों एवं पर्यावरण को फायदा पहुंचाना आज के समय की जरूरत है. प्राकृतिक खेती और जैविक पशुपालन को वर्तमान कृषि पद्धति के साथ जोड़ कर अपनी आय को बढ़ा सकते हैं.

डा. रोशन चौधरी, कार्यक्रम सहसंयोजक ने कार्यक्रम का संचाालन करते हुए बताया कि 2 दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान प्राकृतिक खेती पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान हुए.

इस कार्यक्रम में डा. एसएस शर्मा, अधिष्ठाता, राजस्थान कृषि महाविद्यालय, डा. पीके सिंह, अधिष्ठाता, कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय, डा. महेश कोठारी, निदेशक, आयोजना एवं परिवेक्षण निदेशालय, डा. मनोज कुमार महला, निदेशक, छात्र कल्याण अधिकारी, डा. बीके शर्मा, अधिष्ठाता, मात्स्यिकी महाविद्यालय, डा. विरेंद्र नेपालिया, विशेष अधिकारी, डा. अमित त्रिवेदी, क्षेत्रीय निदेशक अनुसंधान, कृषि अनुसंधान केंद्र, उदयपुर, डा. रविकांत शर्मा, उपनिदेशक अनुसंधान उपस्थित थे.

कम लागत और जल संरक्षण के लिए सीधी बोआई है उपयोगी

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान फिलीपींस मनिला के 2 सदस्य दल डाक्टर अमिलिया हेनरी और डाक्टर जसवंत विश्वविद्यालय पहुंचे. इन्होंने फसल अनुसंधान केंद्र पर पहुंच कर परियोजना के अंतर्गत लगाए गए परीक्षणों की जांच की और वहां पर मृदा के परीक्षण और फील्ड की जांच की.

फिलीपींस से आए प्रतिनिधिमंडल ने कुलपति प्रो. केके सिंह से मुलाकात की और भविष्य में दोनों देशों के सहयोग से किए जाने वाले शोध कार्यों के बारे में चर्चा की.

कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफैसर केके सिंह ने कहा कि चावल उत्पादन के लिए सही विधि का चयन करना चाहे सीधी बीजारोपण विधि हो या नर्सरी विधि एक महत्वपूर्ण निर्णय है, जो कई कारकों पर निर्भर करता है. सीधी बीजारोपण विधि में लागत की बचत होती है और ट्रांसप्लांटिंग और अंकुर प्रबंधन के लिए कम श्रम प्रविष्टियां आवश्यक होती हैं.

कृषि विश्वविद्यालय ने फिलीपींस के बीच एक अनुबंध किया है, जिस में धान उत्पादन की तकनीकी एवं उस के विकास के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य किए जाएंगे.

परियोजना की मुख्य अन्वेषण डाक्टर शालिनी गुप्ता ने बताया कि कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति के प्रयास से अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान फिलीपींस के बीच इस बार एक अनुबंध हुआ है, जिस में शिक्षा शोध एवं प्रसार के कार्यों को बढ़ावा दिया जाएगा.

इस अंतर्राष्ट्रीय परियोजना की प्रधान अन्वेषक डाक्टर शालिनी गुप्ता ने यह भी बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए यह पहली परियोजना है, जिस के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान फिलिपींस मनिला और यह कृषि विश्वविद्यालय मिल कर धान की स्क्रीनिंग और उन की उपयोगिता की जांच के लिए कार्य किया जाएगा. इस से यह पता चलाया जा सकेगा कि कौन से जर्म प्लाज्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए लाभकारी है.

उन्होंने आगे यह भी बताया कि कृषि विश्वविद्यालय में किए जा रहे इस प्रकार के अनुसंधान से सीधी बोआई की उपयोगिता का पता आसानी से लगाया जा सकेगा. उस के उपरांत उपयुक्त विधि का चयन करने से उत्पादन की संभावना को अधिकतम किया जा सकेगा.

उन्होंने कहा कि किसी दवाई से खरपतवार नियंत्रण में दिक्कतें आती हैं. खरपतवार खेत में अधिक हो जाता है. उस के नियंत्रण के लिए भी तकनीक विकसित करने पर विचार किया जाएगा. साथ ही साथ इस विधि से बोआई करने पर जल संरक्षण हो सकेगा.

उन्होंने आगे कहा कि इस प्रकार के अनुसंधान से चावल की उत्पादकता और उत्पादन को और भी अधिक बढ़ाया जा सकेगा.

डाक्टर शालिनी गुप्ता ने बताया कि इस परियोजना के अंतर्गत प्राप्त विभिन्न जर्म प्लाज्म की खेत में सीधी बोआई की गई है. इस परियोजना के अंतर्गत लगभग आधा एकड़ क्षेत्रफल में धान की विभिन्न प्रजातियों की सीधी बोआई की गई है. यहां पर जो जर्म प्लाज्म लगाया गया है, उस की गुणवत्ता की जांच की जाएगी. साथ ही, देखा जाएगा कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के वातावरण में कौन सा जर्म प्लाज्म अच्छा उत्पादन देता है.

इस दौरान विश्वविद्यालय के निदेशक शोध प्रोफैसर अनिल सिरोही, निदेशक, ट्रेनिंग और प्लेसमेंट और विभागाध्यक्ष प्रोफैसर आरएस सेंगर, परियोजना के सहअन्वेषक डाक्टर आदेश कुमार और एमएससी और पीएचडी के शोध छात्र भी मौजूद रहे.

संभागीय किसान महोत्सव में एमपीयूएटी :  किसानों के महाकुंभ में बही एमपीयूएटी की ज्ञानगंगा

उदयपुर : 26 जून 2023. उदयपुर के बलीचा स्थित कृषि उपज मंडी सबयार्ड में आयोजित 2 दिवसीय संभाग स्तरीय किसान महोत्सव का आगाज धूमधाम से हुआ. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस किसान महोत्सव का उद्घाटन किया. संभाग स्तरीय किसानों के महाकुंभ में महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की 20 से अधिक स्टाल लगाई गई, जिन पर विश्वविद्यालय में विकसित नवीनतम कृषि तकनीकों से संभाग भर से आए किसानों को रूबरू करवाया गया.

मेला स्थल पर उपस्थित कृषि विश्वविद्यालय एमपीयूएटी के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि विश्वविद्यालय की विभिन्न इकाइयों में संचालित कृषि अनुसंधान परियोजनाओं मुख्यतः भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा प्रायोजित अखिल भारतीय समन्वित कृषि अनुसंधान परियोजनाओं, जिन में मुख्यतः मशरूम उत्पादन एवं अनुसंघान, खरपतवार नियंत्रण, जैविक खाद, जैविक खेती, जैविक कीटनाशक, मोटे अनाजों पर संचालित परियोजना, विभिन्न प्रकार की कंदीय फसलों, गेहूं, जो, मूंगफली, ज्वार, मक्का, बीजीय फसलों, उद्यानिकी फसलों, फूलों की खेती, कृषि अभियांत्रिकी, मृदा एवं जल संरक्षण अभियांत्रिक, रोबोटिक्स, आभासी तकनीकी, इंटरनेट औफ थिंग्स, सेंसर आधारित खेती, समन्वित खेती पद्धति, कृषि यांत्रिकी विभाग एवं परियोजना में विकसित अनेक कृषि यंत्रों का प्रर्दशन, सामुदायिक विज्ञान और कृषक महिला विकास से संबंधित परियोजनाओं, कटाई के उपरांत खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, सोलर ऊर्जा चालित विभिन्न यंत्रों, सोलर चालित पंप, साइकिल, सोलर ड्रायर इत्यादि तकनीकों का विस्तृत प्रर्दशन किया गया.

इस अवसर पर एमपीयूएटी में विकसित विभिन्न पशु नस्लों प्रतापधन मुरगी, बकरी की नस्लें, खरगोश, बटेर व मछलीपालन स्टाल में मछली की विभिन्न खाने योग्य और रंगीन मछलियां की पालन योग्य प्रजातियों का प्रदर्शन किया गया, जिस में विभिन्न उम्र के किसानों ने विशेष रुचि दिखाई.

प्रसार शिक्षा निदेशक डा. आरए कौशिक ने बताया कि किसानों ने विश्वविद्यालय द्वारा विकसित विभिन्न फसलों के बीज की किस्में लगाने के लिए अपनी रुचि दिखाई है. अनुसंधान निदेशक अरविंद वर्मा ने बताया कि एमपीयूएटी की विभिन्न अनुसंधान तकनीकों को जानने एवं अपनाने में किसानों की रुचि देखी गई. दिनभर इन स्टालों पर किसानों का रेला लगा रहा. किसानों के विभिन्न सवालों के जवाब कृषि वैज्ञानिकों ने मौके पर ही दिए और इस अवसर पर सवालजवाब के लिए विशेष रुप से आयोजित जाजम चौपाल में विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि, पशुपालन, मछलीपालन, बीज उत्पादन, फसल संरक्षण, जैविक खेती, फसल संरक्षण कीट व्याधि नियंत्रण और उद्यानिकी फसलों से संबंधित विभिन्न सवालों के जवाब दे कर किसानों को संतुष्ट किया.

नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन-इंडिया के साथ मिल कर नवाचारों पर काम करेगी एमपीयूएटी

उदयपुर : महाराणा प्रताप यूनिवर्सिटी औफ एग्रीकल्चर एंड टैक्नोलौजी और नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन-इंडिया (एनआईएफ) ने एक समझौता ज्ञापन में प्रवेश किया है. एनआईएफ विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक स्वायत्त निकाय है, जिस का कार्यालय गांधीनगर, गुजरात में है.

यह जमीनी तकनीकी नवाचारों और उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान को मजबूत करने के लिए भारत की राष्ट्रीय पहल है. इस का मिशन जमीनी तकनीकी नवप्रवर्तकों के लिए नीति और संस्थागत स्थान का विस्तार कर के भारत को एक रचनात्मक और ज्ञान आधारित समाज बनने में मदद करना है.

एमपीयूएटी कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि इस समझौता ज्ञापन के माध्यम से दोनों संस्थान शैक्षणिक और अनुसंधान सहयोग के माध्यम से एक समावेशी नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए सहयोग करने पर सहमत हुए हैं. इस समझोते से छात्रों और विश्वविद्यालय की फैकल्टी को समाज के लिए उपयोगी नवीन परियोजनाओं पर काम करने (मूल्यवर्धन और सत्यापन) का अवसर मिलेगा.

एमपीयूएटी की फैकल्टी और छात्र अपने नवाचारों को विपणन योग्य समाधानों में बदलने के लिए जमीनी स्तर और छात्र नवप्रवर्तकों को अपना परामर्श व समर्थन प्रदान करेंगे. एनआईएफ में अनुसंधान कार्य करने के लिए छात्रों/शोधकर्ताओं का आदानप्रदान जमीनी स्तर के उत्पादों के सत्यापन और मूल्यवर्धन से संबंधित अनुसंधान और/या समाज की अपूर्ण जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए किया जा सकता है.

डा. अरविंद सी. रानाडे, निदेशक, एनआईएफ और सुधांशु सिंह, रजिस्ट्रार, एमपीयूएटी, उदयपुर ने कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक, प्रो. महेश कोठारी, निदेशक योजना और विस्तार, प्रो. पीके सिंह, अधिष्ठाता सीटीएई, डा. सांवल सिंह मीना, विभागाध्यक्ष और वरिष्ठ संकाय सदस्य की उपस्थिति में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक, डा. अरविंद सी. रानाडे और सुधांशु सिंह ने उल्लेख किया कि समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए सहयोग को सर्वोत्तम स्तर तक पहुंचाने के लिए प्रत्येक संस्थान का पूर्ण सहयोग दिया जाएगा.

किसानों की मेहनत, वैज्ञानिकों की कुशलता व सरकार की नीतियों से रिकौर्ड उत्पादन

नई दिल्ली : 26 जून 2023. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय/विभाग, राज्यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों एवं अन्य सरकारी स्रोत एजेंसियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर संकलित, बागबानी फसलों के क्षेत्र व उत्पादन के संबंध में वर्ष 2021-22 के अंतिम आंकड़े और वर्ष 2022-23 के प्रथम अग्रिम अनुमान जारी किए गए हैं. वर्ष 2021-22 में कुल बागबानी उत्पादन रिकौर्ड 347.18 मिलियन टन हुआ है, जो वर्ष 2020-21 के उत्पादन से 12.58 मिलियन टन (3.76 फीसदी) अधिक है. वर्ष 2022-23 में कुल बागबानी उत्पादन रिकौर्ड 350.87 मिलियन टन होने का (प्रथम अग्रिम) अनुमान है, जो वर्ष 2021-22 (अंतिम) की तुलना में 3.69 मिलियन टन की वृद्धि (1.06 फीसदी से अधिक) है.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन में हमारे किसान भाईबहनों की अथक मेहनत, वैज्ञानिकों की कुशलता और केंद्र सरकार की किसान हितैषी नीतियों व राज्य सरकारों के सहयोग से देश में रिकौर्ड उत्पादन संभव हो रहा है.

बागबानी फसलों के क्षेत्र व उत्पादन के संबंध में वर्ष 2021-22 (अंतिम आंकड़े) की मुख्य बातें:

वर्ष 2021-22 में कुल बागबानी उत्पादन रिकौर्ड 347.18 मिलियन टन हुआ, जो वर्ष 2020-21 के उत्पादन से लगभग 12.58 मिलियन टन (3.76 फीसदी) अधिक है. वहीं वर्ष 2021-22 में फलों का उत्पादन 107.51 मिलियन टन हुआ, जबकि वर्ष 2020-21 में 102.48 मिलियन टन का उत्पादन हुआ था.

सब्जियों का उत्पादन पिछले वर्ष के 200.45 मिलियन टन की तुलना में 4.34 फीसदी की वृद्धि के साथ वर्ष 2021-22 में 209.14 मिलियन टन हुआ.

वर्ष 2021-22 में प्याज का उत्पादन 31.69 मिलियन टन हुआ, जबकि वर्ष 2020-21 में 26.64 मिलियन टन का उत्पादन हुआ था.

वर्ष 2021-22 में आलू का उत्पादन 56.18 मिलियन टन हुआ, जो इस के गत वर्ष करीब इतना ही था.

वर्ष 2022-23 (प्रथम अग्रिम अनुमान) की मुख्य बातें :

वर्ष 2022-23 में कुल बागबानी उत्पादन 350.87 मिलियन टन होने का अनुमान है, जो वर्ष 2021-22 (अंतिम) की तुलना में लगभग 3.69 मिलियन टन (1.06 फीसदी अधिक) की वृद्धि है.

फलों, सब्जियों, मसालों, फूलों, सुगंधित और औषधीय पौधों और वृक्षारोपण फसलों के उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि का अनुमान है.

फलों का उत्पादन वर्ष 2021-22 में 107.51 मिलियन टन की तुलना में 107.75 मिलियन टन होने का अनुमान है.

सब्जियों का उत्पादन 212.53 मिलियन टन होने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2021-22 में 209.14 मिलियन टन था.

प्याज का उत्पादन पिछले वर्ष के 31.69 मिलियन टन की तुलना में 31.01 मिलियन टन होने का अनुमान है.

आलू का उत्पादन 59.74 मिलियन टन होने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2021-22 में यह 56.18 मिलियन टन था.

टमाटर का उत्पादन वर्ष 2021-22 में 20.69 मिलियन टन की तुलना में 20.62 मिलियन टन होने का अनुमान है.

सुगंधित व औषधीय पौधों का उत्पादन वर्ष 2021-22 में 664 हजार टन की तुलना में 680 हजार टन होने का अनुमान है.

कुल बागबानी
2020-21 (अंतिम)
2021-22(अंतिम)
2022-2023 (प्रथम अग्रिम अनुमान)

क्षेत्रफल (मिलियन हेक्टेयर में)
27.48
28.04
28.28

उत्पादन (मिलियन टन में)
334.60
347.18
350.87

इस विधि से करें भंडारण, सुरक्षित रहेगा अनाज

सरसों, चना, अलसी, गेहूं फसलों की कटाई के बाद इन का भंडारण करना होता है. भंडारण की सही जानकारी न होने के कारण 20-25 फीसदी तक अनाज नमी, दीमक, घुन, चूहों द्वारा नष्ट हो जाता है, इसलिए अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए इन विधियों को अपना सकते हैं.

भंडारण की सही जानकारी न होने से 10 से 15 फीसदी तक अनाज नमी, दीमक, घुन, बैक्टीरिया द्वारा बरबाद हो जाता है. अनाज को रखने के लिए गोदाम की सफाई कर दीमक और पुराने अवशेष आदि को बाहर निकाल कर जला कर नष्ट कर दें.

दीवारों, फर्श व जमीन आदि में यदि दरार हो तो उन्हें सीमेंट, ईंट की मदद से बंद कर दें. टूटी दीवारों आदि की मरम्मत करा दें. भंडारण में होने वाले इस नुकसान को रोकने के लिए किसान इन सुझावों को ध्यान में रख कर अनाज को भंडारित कर सकते हैं :

अनाजों को अच्छी तरह से साफसुथरा कर धूप में सुखा लेना चाहिए, जिस से कि दानों में 10 फीसदी से अधिक नमी न रहने पाए. अनाज में ज्यादा नमी रहने से फफूंद व कीटों का हमला अधिक होता है. अनाज को सुखाने के बाद दांत से तोड़ने पर कट की आवाज करे तो समझ लेना चाहिए कि अनाज भंडारण के लायक सूख गया है.

बोरियों में अनाज भर कर रखने से पहले इन बोरियों को 20-25 मिनट तक खौलते पानी में डाल देना चाहिए. इस के बाद धूप में अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए या छिड़काव के लिए बने मैलाथियान 50 फीसदी के घोल में बोरियों को डुबो कर फिर बाहर निकाल कर सुखा लेना चाहिए. ठीक से सूख जाने के बाद ही उस में अनाज भरना चाहिए.

खुले हुए अनाज पर सीधे सूखे या तरल कीटनाशी का प्रयोग नहीं करना चाहिए. चूहा शंकालु प्रकृति का होता है, इसलिए बदलबदल कर विषाक्त चारा, चूहेदानी और टिकिया का प्रयोग करना चाहिए. अनाज में दवा डालने के बाद साबुन से अच्छी तरह हाथ धो लें.

भंडारण में एलुमीनियम फास्फाइड 2 से 3 गोली प्रति टन की दर से प्रयोग करें और भंडारण कक्ष पूरी तरह से वायुरोधी होना चाहिए, ताकि एलुमीनियम फास्फाइड गैस से कीट प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा समय तक बनी रहे.

अनाज का भंडारण करते समय हवा के रुख को जरूर ध्यान में रखें. अगर पुरवा हवा चल रही हो तब अनाज का भंडारण न करें.

अनाज के भंडारण में नीम की पत्ती का प्रयोग करते समय नीम की पत्तियां सूखी होनी चाहिए. इस के लिए नीम की पत्तियों को भंडारण से 15 दिन पहले किसी छायादार जगह पर कागज पर रख कर सुखा लें.

हरी खाद ढैंचा : बढ़ाए पैदावार

फसलों से ज्यादा उत्पादन प्राप्त करने के लिए रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग किया जाता है, जिस से मिट्टी में जीवाश्म की कमी हो जाती है और मिट्टी की सेहत लगातार नीचे गिर रही है. ऐसे हालात में किसानों को उत्पादन बढ़ाने के लिए ऐसे उर्वरक (खाद) का प्रयोग करना चाहिए, जिस से मिट्टी में जीवाणुओं की कमी न हो.

खेत में जीवाश्म की मात्रा को बढ़ाने व उर्वराशक्ति के विकास में जैविक व हरी खाद का प्रयोग काफी लाभदायक रहता है. हरी खाद के रूप में प्रयोग की जाने वाली ढैंचा की फसल से मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ती है. इस से फसल उत्पादन बढ़ा कर लागत कम की जा सकती है.

ढैंचा की फसल बोने के 55-60 दिनों के बाद खेत में पलटाई कर दी जाती है. इस के बाद खेत में पानी भर दिया जाता है, जिस से ढैंचा खेत में अच्छी तरह सड़ जाए.

ढैंचा से हरी खाद को लगभग 75-80 किग्रा नाइटोजन और 200-250 किग्रा कार्बनिक पदार्थ प्राप्त होता है, जिस से खेतों में पोषक तत्त्वों का संरक्षण होता है. मृदा में नाइट्रोजन के स्थिरीकरण के साथ मृदा की क्षारीय व लवणीय शक्ति बढ़ती है. ढैंचा के अन्य हरी खादों के मुकाबले नाइट्रोजन की ज्यादा मात्रा मिलती है.

ढैंचा की उन्नत किस्में

वर्तमान में ढैंचा की अनेक उन्नत किस्में हैं, जैसे पंजाबी ढैंचा -1, सीएसडी-137, हिसाब ढैंचा -1, पंत ढैंचा -1 आदि.

अनुकूल मृदा

वैसे तो हरी खाद के लिए ढैंचा की बोआई किसी भी तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन जलमग्न, क्षारीय व लवणीय व सामान्य मिट्टियों में ढैंचा की फसल लगाने से अच्छी गुणवत्ता वाली हरी खाद मिलती है.

बोआई का समय व बीज की मात्रा

ढैंचा की बोआई से पहले खेत की एक बार जुताई कर लेनी चाहिए इस के बाद 50 किग्रा प्रति हेक्टेयर बीज की बोआई अप्रैल के अंतिम सप्ताह से ले कर जून के अंतिम सप्ताह तक करनी चाहिए. जब फसल 20 दिनों की हो जाए तो 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया का छिड़काव करें. इस से फसल में नाइट्रोजन की मात्रा बनती है.

सिंचाई

इन के पौधों के अंकुरण के बाद सिंचाई की जरूरत कम होती है, परंतु अधिक उत्पादन के लिए 4-5 सिंचाई करनी चाहिए.

फसल के रोग व रोकथाम

ढैंचा की फसल में कम ही रोग देखने को मिलते हैं. लेकिन कीट की सूंडि़यों के आक्रमण से पौधों की पैदावार कम होती है. इस के पौधे पर लार्वा इस की पत्तियों व कोमल शाखाओं को खा कर पौधे का विकास रोक देती है, जिस के कारण पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पैदावार गिर जाती है.

रोग व कीट की रोकथाम के लिए पौधे पर नीम औयल 5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी के घोल के साथ छिड़काव करना चाहिए.

उपरोक्त बिंदुओं पर ध्यान रखते हुए हरी खाद के लिए ढैंचा की खेती उपयुक्त होती है.

कृषि यंत्रों से खेती: रोजगार का जरीया भी

कम होती खेती की जमीन, युवाओं का खेती से मुंह मोड़ कर शहरों की ओर कामधंधे की तलाश में पलायन करना आम बात है. सरकार युवाओं के लिए ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर मुहैया कराने में भी नाकाम साबित हो रही है. हालांकि कुछ लोग इन में ऐसे भी हैं, जो हाथ के दस्तकार हैं. वे अपने गांवों के आसपास ही कमाखा रहे?हैं.

कुछ लोग ऐसे भी?हैं, जिन के पास खेती की जमीन?है, पर वे भी खेती से संतुष्ट नहीं?हैं. वे लोग खेती से अधिक कमाई के लिए परदेश चले जाते हैं. जिन लोगों के पास खेती है, उन्हें खेती को ही बेहतर रोजगार का जरीया बनाना चाहिए.

कृषि के पारंपरिक तौरतरीकों को छोड़ कर नई तकनीकों से खेती करनी चाहिए. सरकारी स्कीमों का फायदा लेना चाहिए.

देश के?ज्यादातर किसानों के हालात ऐसे नहीं?हैं, जो ट्रैक्टर, हार्वेस्टर जैसे महंगे यंत्र खरीद सकें. ऐसे किसानों के लिए आज अनेक ऐसे कृषि यंत्र हैं, जो उन की पहुंच में?हैं और बड़े यंत्रों की जगह उन छोटे यंत्रों को इस्तेमाल कर फायदा ले सकते?हैं.

मशीनों के इस्तेमाल से समय और पैसे की भी बचत होती?है. उस बचे हुए समय को अन्य किन्हीं कामों में लगा सकते हैं. कृषि से जुड़े अनेक काम होते?हैं, उन्हें कर सकते?हैं.

उन कृषि यंत्रों से दूसरों के खेतों में काम कर के भी आमदनी कर सकते?हैं.

यहां हम आप को कुछ ऐसे ही कृषि यंत्रों के बारे में जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं, जो आप के बड़े काम की?हैं:

ह्वीट कटर

यह एक ऐसी मशीन है, जिस की मदद से गेहूं, जौ, धान, चारा वगैरह फसलों को आसानी से काटा जा सकता है.

ह्वीट कटर से किसान फसल के अलावा घासफूस और छोटीमोटी ?ाड़ी, जंगल को भी साफ कर सकते हैं. यह मशीन पैट्रोल से चलती है और एक आदमी इस मशीन को बैल्ट की मदद से अपनी कमर में बांध कर आसानी से फसल को काट सकता है.

स्प्रे पंप

अच्छी फसल हासिल करने के लिए समयसमय पर कीटनाशक, बीमारीनाशक और खरपतवारनाशक दवाओं का छिड़काव बहुत ही जरूरी है. फसल की लागत में बीज, खाद, पानी के बाद सब से ज्यादा लागत कैमिकलों पर आती है. इस स्प्रे पंप की खास बात यह है कि इस में दवा का पूरापूरा इस्तेमाल होता है. यह बागबगीचों में कैमिकल का स्प्रे बहुत ही अच्छी तरह से करता है.

कैमिकल निकालने के लिए एक सूई की नोक के बराबर पौइंट होता है और इस में प्रैशर से फौग बनता है. थोड़ा सा कैमिकल धुएं का गुबार बन कर गिरता है. इस तकनीक से 50 फीसदी तक कैमिकल की बचत होती है.

पावर टिलर

इस को छोटा ट्रैक्टर भी कहते हैं. छोटे खेत और पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा खेतों में पावर टिलर बहुत ही कारगर है. इस से ट्रैक्टर द्वारा किए जाने वाले तमाम काम किए जा सकते हैं. मसलन, जुताई, सिंचाई, ढुलाई, कटाई, मेंड़ बनाने वगैरह खेती के सभी कामों में यह इस्तेमाल होता है.

टिलर छोटा, हलका और असरदार होता है. इस का रोटावेटर न केवल जुताई करता है, बल्कि खेत की मिट्टी को अच्छी तरह से मिला देता है. बागबगीचों, आलू, गन्ना, औषधीय पौधों वगैरह के खेतों में मेंड़ बनाना, नाली तैयार करना, निराईगुड़ाई या खरपतवार निकालना वगैरह कामों में टिलर कामयाब है. केले या अंगूर के बागों में दवा का छिड़काव या सिंचाई जैसे काम टिलर से ही मुमकिन हैं.

टिलर से पेड़पौधों के चारों तरफ थाले बनाए जा सकते हैं. इस से खेत की जुताई, रीजर द्वारा नाली बनाना, धान की फसल की मचाई करना जैसे काम किए जा सकते हैं. ट्रैक्टर की तरह ही टिलर में तकरीबन एक दर्जन औजार जोड़ कर बहुत सारे काम किए जा सकते हैं.

पावर वीडर 

फसल में उगे खरपतवारों को निकालने के लिए पावर वीडर बहुत ही कामयाब मशीन है. हाथ से खेत की निराईगुड़ाई करने में समय और पैसा बहुत लगता है. इस के अलावा खेती में मजदूरों की लगातार होती कमी भी एक बड़ी परेशानी है. ऐसे में पावर वीडर बहुत ही मददगार साबित हो रहा है.

यह पावर वीडर 60-65 किलोग्राम वजनी है और यह पैट्रोल से चलने वाली मशीन है.

2 पहियों पर रखी मशीन को चलाने के लिए हैंडिल दिए हुए हैं. यह 18-20 इंच चौड़ाई में निराईगुडाई करती हुई आगे बढ़ती है.

एक आदमी इसे बड़ी आसानी से चलाता हुआ तकरीबन डेढ़ घंटे में एक एकड़ खेत की निराईगुड़ाई कर सकता है. यह गन्ना और सब्जी की खेती में निराईगुड़ाई में बहुत ही कारगर है.

इस तरह और भी बहुत सारी छोटी मशीनें जैसे गन्ना सफाई मशीन, पावर रीपर, कल्टीवेटर, पेड़ वगैरह की कटाई के लिए चैनसा और बागबानी के लिए गड्ढे खोदने के लिए अर्थ औगर वगैरह हैं, जिन की मदद से कम लागत में खेती के काम को आसान कर पैदावार को कई गुना बढ़ा सकते हैं.