गाजर घास से फसल का बचाव

गाजर घास की 20 प्रजातियां पूरे विश्व में पाई जाती हैं. गाजर घास की उत्पत्ति का स्थान दक्षिणमध्य अमेरिका है. अमेरिका, मैक्सिको, वेस्टइंडीज, चीन, नेपाल, वियतनाम और आस्ट्रेलिया के विभिन्न भागों में फैला यह खरपतवार भारत में अमेरिका या कनाडा से आयात किए गए गेहूं के साथ आया.

हमारे देश में साल 1951 में सब से पहले पूना में नजर आने के बाद यह विदेशी खरपतवार तकरीबन 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुका है.

गाजर घास को देश के विभिन्न भागों में अलगअलग नामों जैसे कांग्रेस घास, सफेद टोपी, चटक चांदनी व गंधी बूटी वगैरह नामों से जाना जाता है. कांग्रेस घास इस का सब से ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला नाम है.

वैसे तो गाजर घास पानी मिलने पर सालभर पनपती है, पर बारिश के मौसम में ज्यादा अंकुरण होने पर यह खतरनाक खरपतवार का रूप ले लेती है. गाजर घास का पौधा 3-4 महीने में अपना जीवनचक्र पूरा कर लेता है यानी 1 साल में इस की 3-4 पीढि़यां पूरी हो जाती हैं.

तकरीबन डेढ़ मीटर लंबी गाजर घास के पौधे का तना काफी रोएंदार और शाखाओं वाला होता है. इस की पत्तियां असामान्य रूप से गाजर की पत्तियों की तरह होती हैं. इस के फूलों का रंग सफेद होता है. हर पौधा 1,000 से 50,000 बेहद छोटे बीज पैदा करता है, जो जमीन पर गिरने के बाद नमी पा कर अंकुरित हो जाते हैं.

गाजर घास के पौधे हर प्रकार के वातावरण में तेजी से बढ़ते हैं. ये ज्यादा अम्लीयता व क्षारीयता वाली जमीन में भी उग सकते हैं. इस के बीज अपनी 2 स्पंजी गद्दियों की मदद से हवा व पानी के जरीए एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से पहुंच जाते हैं.

गाजर घास के नुकसान

* गाजर घास से इनसानों को एग्जिमा, एलर्जी, बुखार व दमा जैसी बीमारियां हो जाती हैं. इस का 1 पराग कण भी इनसान को बीमार करने के लिए काफी है. इस के पराग कण सांस नली में घुस कर दमा व एलर्जी पैदा करते हैं. इस के ज्यादा असर से इनसानों की मौत तक हो जाती है.

* गाजर घास की वजह से खाद्यान्नों की फसलों की पैदावार में 40 फीसदी तक की कमी आंकी गई है. इस से फसलों की उत्पादकता घट जाती है.

* इस पौधे से एलीलो रसायन जैसे पार्थेनिन, काउमेरिक एसिड, कैफिक एसिड वगैरह निकलते हैं, जो अपने आसपास किसी अन्य पौधे को उगने नहीं देते हैं. इस से फसलों के अंकुरण और बढ़वार पर बुरा असर पड़ता है.

* गाजर घास के वन क्षेत्रों में तेजी से फैलने के कारण कई खास वनस्पतियां और जड़ीबूटियां खत्म होती जा रही हैं.

* दलहनी फसलों में यह खरपतवार जड़ ग्रंथियों के विकास को प्रभावित करता है और नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणुओं की क्रियाशीलता को कम कर देता है.

* इस के परागकण बैगन, मिर्च व टमाटर वगैरह सब्जियों के पौधों पर जमा हो कर उन के परागण, अंकुरण व फल विन्यास को प्रभावित करते हैं और पत्तियों में क्लोरोफिल की कमी व पुष्प शीर्षों में असामान्यता पैदा कर देते हैं.

* पशुओं के चारे में इस खरपतवार के मिल जाने से दुधारू पशुओं के दूध में कड़वाहट आने लगती है. ज्यादा मात्रा में इसे चर लेने से पशुओं की मौत भी हो सकती है.

यों करें रोकथाम

* बारिश के मौसम में गाजर घास को फूल आने से पहले जड़ से उखाड़ कर कंपोस्ट व वर्मी कंपोस्ट बनाना चाहिए.

* घर के आसपास गेंदे के पौधे लगा कर गाजर घास के फैलाव को रोका जा सकता है.

* गाजर घास की रासायनिक विधि द्वारा रोकथाम करने के लिए खरपतवार वैज्ञानिक की सलाह लेनी चाहिए.

* नमक के 20 फीसदी घोल से गाजर घास की रोकथाम की जा सकती है, पर यह विधि छोटे क्षेत्र के लिए ही ठीक है.

सामुदायिक कोशिशें

* जमीन को गाजर घास से बचाने के लिए सामुदायिक कोशिशें बहुत जरूरी हैं. गांवों, शहरी कालोनियों, स्कूलों, महाविद्यालयों में रहने या पढ़ने वाले लोगों को चाहिए कि वे अपने आसपास की जमीन को गाजर घास से मुक्त रखें. इसी तरह की कोशिशों से पंजाब राज्य के लुधियाना जिले का मनसूरा गांव पहला गाजर घास मुक्त क्षेत्र बन गया है.

* जगहजगह जा कर लोगों को गाजर घास के नुकसानों व रोकथाम के बारे में जानकारी दे कर उन्हें जागरूक करना चाहिए.

* हर साल अगस्तसितंबर माह में गाजर घास जागरूकता सप्ताह मनाया जाता है, क्योंकि अक्तूबरनवंबर में गाजर घास बहुत ज्यादा होती है.

गाजर घास के इस्तेमाल

* गाजर घास का इस्तेमाल तमाम किस्म के कीटनाशक, जीवाणुनाशक और खरपतवारनाशक बनाने में किया जा सकता है.

* इस की लुगदी से कई तरह के कागज तैयार किए जा सकते हैं.

* बायोगैस उत्पादन में भी इसे गोबर के साथ मिलाया जा सकता है.

वैज्ञानिक तरीके से करें रामदाना की उन्नत खेती

पोषक तत्वों से भरपूर रामदाना को कौन नहीं जानता है. रामदाना में 12-15 फीसदी प्रोटीन, 6-7 वसा, फीनाल्स- 0.045-0.068 फीसदी एवं एंटीऔक्सीडेंट डीपीपीएच 22.0-270 फीसदी पाया जाता है. इसीलिए शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए रामदाने के दाने से लइया और लड्डू बनाया जाता है, जो खाने में कुरकुरा व बेहद स्वादिष्ठ होता है. इसलिए यह सब के लिए प्यारा खाद्य प्रदार्थ माना जाता है.

रामदाना की खेती दाना प्राप्त करने व पशुओं के लिए चारा प्राप्त करने के लिए की जाती है. इन की खेती रबी व खरीफ दोनों ही सीजन में की जाती है. यह गरम एवं नम जलवायु की फसल है. कम वर्षा वाले क्षेत्रों में रामदाना की खेती भरपूर मात्रा में की जाती है.

रामदाना की खेती के लिए भारत में जम्मूकश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, तमिलनाडु, बिहार, गुजरात, पूर्वी उत्तर प्रदेश व बगांल प्रमुख रूप से जाना जाता है. रामदाना की खेती संयुक्त फसल के रूप में भी बेहद सफल रही है.

रामदाना की खेती के लिए दोमट, बलुई दोमट व उचित जलनिकासी वाली मिट्टी ज्यादा उपयुक्त होती है. रामदाना की बोआई करने से पहले खेत की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या हैरो से कर के सितंबर माह में पाटा लगा कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए.

बीज का चयन

रामदाना की बोआई के लिए खेत की तैयारी करने के साथ ही उन्नतशील व अधिक उत्पादन वाले बीज का चयन भी कर लेना जरूरी होता है. रबी सीजन की बोआई के लिए रामदाना की 3 उन्नतिशील प्रजातियों खेती के लिए योग्य पाई गई है.

पहली, जीए-1- रामदाना की किस्म 110-115 दिन में पक कर तैयार होती है. पौधे की ऊंचाई 200-200 सैंटीमीटर होती है. इस किस्म की बाली का रंग हरा एवं पीला होता है. उपज 20-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

दूसरी, जीए- 2- रामदाना की किस्म कम समय में पक कर तैयार होती है. इस की फसल तैयार होने में 98-102 दिन का समय लगता है. इस के पौधे 180-190 सैंटीमीटर व उपज 23-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई जाती है जबकि तीसरी को तैयार होने में 105-110 दिन का समय लगता है. इस के पौधों की लंबाई 200-205 सैंटीमीटर व उपज 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

रामदाना की इन प्रजातियों की बोआई का उपयुक्त समय सितंबर के आखिरी सप्ताह से नवंबर का प्रथम सप्ताह तक होता है.

रामदाना के बीजों की खेत में बोआई करने से पहले बीज की मात्रा एवं उपचार सुनिश्चित वजन 8 ग्राम होता है. इसलिए एक हेक्टेयर में मात्र 1 किलोग्राम बीज ही बोआई के लिये पर्याप्त होता है. बीज को बोआई के पहले 2-2.5 ग्राम थीरम में प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित कर लेना चाहिए.

रामदाना की बोआई विधि

रामदाना की बोआई 2 विधियों से की जाती है. पहली छिटकवां विधि से, जिस में बीज को छिटक कर पाटा चला दिया जाता है. इस विधि में फसल के दानों के कमजोर होने की शंका बनी रहती है. वहीं दूसरी विधि में रामदाना की बोआई लाइन से की जाती है. इस में लाइन से लाइन की दूरी 45 सैंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 15 सैंटीमीटर रखते हैं. इस विधि से रामदाना की फसल अच्छी व दाने मोटे होते हैं.

खाद एवं उर्वरक

रामदाना की बोआई के समय नाइट्रोजन 30 किलोग्राम, फासफोरस 40 किलोग्राम व पोटाश 20 किलोग्राम की मात्रा की आवश्यकता पड़ती है. इस के बाद नाइट्रोजन की 15-15 किलोग्राम मात्रा 2 बार में रामदाना की फसल को देनी चाहिए.

निराईगुड़ाई एवं सिंचाई

रामदाना फसल की सिंचाई जरूरत होने पर अवश्य देनी चाहिए. इस के अलावा फसल में फल आने के पहले हलकी सिंचाई जरूरी होती है. फसल की उचित बढ़वार व अच्छी उपज के लिए बोआई के 20-25 दिन बाद एक बार निराईगुड़ाई आवश्यक होती है. इस के अलावा पौधे की उचित बढ़वार के लिए 2 बार सिंचाई व गुड़ाई करनी चाहिए.

कीट एवं बीमारियों का नियंत्रण

रामदाना की फसल में आमतौर पर कीट व बीमारियों का प्रकोप नहीं होता है. रामदाना की फसल में ब्लास्ट झोका व ब्लास्ट सड़न का प्रकोप होता है. इस के नियंत्रण के लिए डाइथेन जेड 78 व 0.05 फीसदी बाविस्टीन के घोल का छिड़काव करना चाहिए.

कटाईमड़ाई व भंडारण

प्रगतिशील किसान प्रवींद्र राय का कहना है कि जब रामदाना की पत्तियां व फसल पीली पड़ जाए, तो फसल की कटाई कर उस की मड़ाई कर लें. इस के बाद दानों को 2 घंटे धूप में सुखा कर उस का भंडार किसी शुष्क स्थान पर कर देना चाहिए.

गन्ने का कचरा भी है कीमती

हमारे देश के 19 राज्यों में बड़े रकबे में गन्ने की खेती होती है. गन्ने की खेती से हरी, सूखी पत्तियां, अगोला, पेराई के बाद खोई व गन्ने की प्रोसैसिंग से शीरा, स्पेंट वाश व मैली का कचरा बचता है. जानकारी न होने की वजह से ज्यादातर किसान इस कचरे का बेहतर इस्तेमाल नहीं कर पाते. वे उन्हें बेकार समझ कर फेंक देते हैं. इस से गंदगी बढ़ती है. कुछ किसान व ईंट भट्टे वाले गन्ने का कचरा बतौर ईंधन में इस्तेमाल कर लेते हैं.

आसान बचत

भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि गन्ने का कचरा कीमती और फायदेमंद है, क्योंकि इस का इस्तेमाल बढि़या कार्बनिक खाद के तौर पर मिट्टी की सेहत सुधारने में किया जा सकता है. गन्ने का कचरा मल्चिंग, ऊसर खेतों को ठीक करने के काम आ सकता है. इस से किसानों का पैसा बचेगा और मिट्टी को पोषक खुराक मिलेगी. किसान थोड़ा ध्यान दे कर अगर इस तकनीक को समझ लें तो वे आसानी से अपना काफी पैसा बचा सकते हैं.

जाहिर है कि नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश वाले अकार्बनिक और महंगी खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी की संरचना व संतुलन दोनों बिगड़ रहे हैं. एक तरफ फसलों पर इन का खराब असर पड़ रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ किसानों की जेब हलकी होती है. खेती की लागत बढ़ती है. खेतों से ले कर कोल्हू, खांडसारी क्रेशरों व चीनी मिलों तक में हर साल गन्ने का लाखों टन कचरा बचता है. इस के सही इस्तेमाल से मिट्टी में जरूरी तत्त्वों की कमी पूरी की जा सकती है.

गन्ने की पत्ती

गन्ने की हरी पत्तियों को पशु बड़े ही चाव से खाते हैं इसलिए गन्ने की हरी पत्तियां यानी अगोले का इस्तेमाल चारे के रूप में किया जाता है. माहिरों का कहना है कि ज्यादातर किसान गन्ना नहीं बांधते. तेज हवाओं से गन्ने की लंबी फसल गिर जाती है. जुलाईअगस्त के महीने में पत्तियों की मदद से गन्ने की बंधाई जरूर कर देनी चाहिए. इस के लिए गन्ने की पत्तियों को रस्सी की तरह बंट लें और लाइनों में खड़े गन्ने के थानों को आपस में बांध दें.

गन्ने की सूखी पत्तियां गांवों में जलाने या फूंस के साथ छप्पर बांधने में काम आती हैं. अब उन्हें कागज की लुगदी बनाने वाले कारखाने भी खरीद रहे हैं. पिछले साल उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर व सहारनपुर के इलाकों में गन्ने की सूखी पत्तियां 2-3 सौ रुपए क्विंटल तक बिकी थीं. माहिरों के मुताबिक, गन्ना जमने के बाद व गरमी में सिंचाई के बाद गन्ने की सूखी पत्तियां बिछाने से खेत में नमी बनी रहती है. साथ ही, गन्ना काटने के बाद खेत में सूखी पत्तियां बिछा कर आग लगाने से कीड़ेमकोडे़ वगैरह मर जाते हैं. खरपतवार काबू में रहते हैं व पेड़ी की फसल अच्छी होती है.

गन्ने की मैली खाद की थैली

गन्ने का रस छानने के बाद बची मैली को प्रेसमड कहते हैं. इस में कई पोषक तत्त्व होते हैं, लेकिन इसे सीधे खेत में डालने से खेत में दीमक व अन्य कीट का खतरा बढ़ जाता है. किसान नजदीकी चीनी मिलों से प्रेसमड ले कर सड़ाने के बाद इस का इस्तेमाल कर सकते हैं. गन्ने की मैली से बढि़या खाद बनती है. उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर जैविक चीजों को जल्द सड़ाने को आर्गेनोडीकंपोजर, नाइट्रोजन स्थिर करने को एजेटोबैक्टर, फास्फोरस बढ़ाने को साल्विलाइजिंग बैक्टीरिया और बेधकों के सफाए को ट्राइको कार्ड किसानों को कम दाम पर मुहैया कराती है.

खेती के माहिरों ने जीवाणु कल्चर यानी टीके या वर्मी कल्चर यानी केंचुओं की मदद से गन्ने की मैली को बेहतर खाद में बदलने का तरीका निकाला है. इस के लिए डेढ़ मीटर लंबे, 2 मीटर चौड़े व एक मीटर गहरे गड्ढ़े में गन्ने की सूखी पत्तियां, गन्ने की खोई व घरेलू कचरे की 2 इंच मोटी तह लगाएं. उस पर 8 किलोग्राम यूरिया व 10 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट प्रति टन की दर से डालें. फिर 5 सौ लिटर पानी में 1 क्विंटल गोबर के घोल में एक किलोग्राम जीवाणु कल्चर का घोल बना कर छिड़क देना चाहिए. जीवाणु कल्चर गन्ना शोध केंद्रों पर मिल जाता है.

इस तरह 3-4 परत लगाने से गड्ढ़ा भर जाता है. गड्ढ़े की लंबाई में एक फुट जगह हवा के लिए छोड़ने के बाद गोबर, मिट्टी व प्रेसमड के लेप से गड्ढ़ा ढक दें. पहले हर 15 दिन पर 2 बार, फिर एक महीने बाद तीसरी पलटाई करें. हर पलटाई पर पानी जरूर छिड़कें. इस तरह 75 से 90 दिनों में गन्ने की मैली से बढि़या खाद तैयार हो जाती है. इसे गड्ढ़े की जगह ढेर लगा कर भी बनाया जा सकता है. इस के अलावा दूसरा तरीका है वर्मी कल्चर यानी केंचुओं से प्रेसमड को बनाने का.

प्रेसमड को वर्मी कल्चर से बनाने के लिए पहले 45 दिन तो जीवाणु कल्चर की तरह गड्ढ़े में सड़ाया जाता है. आधा सड़ने के बाद उसे किसी शेड के नीचे पक्के फर्श पर डाल कर उस में प्रति टन 1 किलोग्राम की दर से केंचुए छोड़ दिए जाते हैं. इस के बाद पानी छिड़क कर 60 फीसदी नमी बनाने से तकरीबन 45 दिनों में गन्ने की मैली काले रंग की वर्मी कंपोस्ट में बदल जाती है. इस खाद को गन्ना बोते समय 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालना चाहिए.

गन्ने की खोई

गन्ना पेरने के बाद बची खोई को जलाने के लिए भट्टी में झोंका जाता है, जबकि कागज, गत्ता, परफ्यूराल, अल्फासेलूलोज व जिलीटाल बनाने वाले इसे अच्छी कीमत पर खरीदते हैं. इस के अलावा गन्ने की खोई को मुरगीघर में बिछावन, क्षारीय मिट्टी में सुधार व शीरे के साथ जानवरों के चारे में भी इस्तेमाल किया जाता है. बदलती खेती के इस दौर में पुरानी लीक पर चलने की जगह नईनई जानकारी से फायदा उठाना जरूरी है, ताकि बेकार बचे कचरे को भी कंचन बनाया जा सके. यानी खेतीबारी में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाया जा सके.

कम पानी में अच्छा उत्पादन देने वाली बासमती की प्रजातियां लगाएं किसान

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में 20 कृषि विज्ञान केंद्रों पर नवनियुक्त विषय विशेषज्ञों के लिए कृषि विपणन पर प्रेरण कार्यक्रम विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यशाला का शुभारंभ कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डा. केके सिंह की अध्यक्षता में हुआ.

कुलपति डा. केके सिंह ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि निर्यात के लिए गुणवत्तायुक्त बासमती चावल के उत्पादन एवं इस के द्वारा आय में वृद्धि विषय पर प्रकाश डालते हुए किसानों को नई तकनीकी अपनाने की सलाह दी.

उन्होंने यह भी कहा कि धान उत्पादन के लिए ऐसी किस्मों का चुनाव करें, जिस में कम पानी लगता हो और विपरीत परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन देती हो.

डा. केके सिंह ने आगे कहा कि प्रतिबंधित पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल बासमती खेती में नहीं करना चाहिए.

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कहा कि बासमती धान जब बनते थे, तो इस में खुशबू बहुत आती थी, लेकिन अब ऐसे चावल कम देखने को मिलते हैं. किसानों को चाहिए कि आज तकनीकी के युग में खेतीकिसानी काफी आगे पहुंच गई है.

उन्होंने कहा कि खेती करते समय कैमिकल खादों का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए, क्योंकि इन का अधिक प्रयोग करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो रही हैं, इसलिए कैमिकल खादों से और पेस्टिसाइड से बचना चाहिए.

प्रो. संगीता शुक्ला ने कहा कि हर परिवार से कम से कम एक सदस्य ऐसा होना चाहिए, जो एग्रीकल्चर से जुड़ा हो तो निश्चित रूप से हमारा देश काफी आगे बढ़ सकता है.

उन्होंने किसानों से आवाह्न किया कि वे कृषि की नवीनतम तकनीकों का प्रयोग खेती में करें, जिस से किसानों की आय बढ़ सकेगी.

पद्मश्री वैज्ञानिक डा. बीपी सिंह ने बासमती चावल के उत्पादन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक 100 में से 7 व्यक्ति चावल पर निर्भर रह कर जीविकोपार्जन कर रहा है. यही वजह है कि चावल धन देता है और चावल में चावल यदि कोई है तो वह बासमती है.

उन्होंने आगे बताया कि पूरे विश्व में खुशबू वाली लगभग 1,000 प्रजातियां हैं, लेकिन वे सभी प्रजातियां बासमती नहीं हैं. वर्ष 1970 में बासमती की 370 प्रजाति सब से पहले भारत में तैयार हुई और उस के बाद शोध कर के अनेक बासमती की प्रजातियां विकसित की गईं, जिस में से 1,121 दुनिया में सब से लंबा बासमती के नाम से पहचाना जाने वाला चावल है.

वैज्ञानिक डा. रितेश शर्मा ने बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान ने उत्पादन तकनीक पर विस्तार से चर्चा की. डा. अनुपम दीक्षित ने बासमती चावल के मानकों की जानकारी दी.

डा. पीके सिंह ने बताया कि कार्यक्रम में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 18 जनपदों के वैज्ञानिकों एवं प्रगतिशील किसानों ने प्रतिभाग किया. किसान ज्ञान प्रतियोगिता में सहारनपुर, संभल, मुरादाबाद एवं मुजफ्फरनगर के प्रगतिशील किसानों ने सवालों के सही जवाब दे कर पुरस्कार जीता.

निदेशक प्रसार डा. पीके सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया और धन्यवाद प्रस्ताव निदेशक शोध डा. अनिल सिरोही ने दिया.

कार्यक्रम में प्रो. रामजी सिंह, कुलसचिव, लक्ष्मी मिश्रा, वित्त नियंत्रक निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, प्रो. आरएस सेंगर, अधिष्ठाता कृषि, डा. विवेक धामा, डा. रविंद्र कुमार, डा. कमल खिलाड़ी, डा. विजेंद्र सिंह, डा. लोकेश गंगवार, सत्येंद्र खारी, डा. गोपाल सिंह आदि लोग मौजूद रहे.

जंगली सब्जी कसरोड़

जम्मूकश्मीर में प्राकृतिक रूप में पाई जाने वाली कई सब्जियां होती हैं, जिन के लिए खेतीबारी नहीं की जाती है. ये प्राकृतिक तौर पर समय के अनुसार खुद ही तैयार हो जाती हैं. इन्हीं सब्जियों में से एक है कसरोड़, जो खाने में बहुत ज्यादा स्वादिष्ठ होती है.

कसरोड़ का विभिन्न स्थानों में अलगअलग नाम है जैसे जम्मू में कसरोड़, पुंछ में कंदोर, किस्तवाड़ में टेड कहते हैं. जम्मूकश्मीर के रामवन जिले में इसे धोड के नाम से जाना जाता है. हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में लिंगड़, कुल्लू घाटी में लिंगडी, कांगड़ा जिले में कसरोद कहते हैं. उत्तराखंड में कसरोड़ को लिब्रा कहते हैं. त्रिपुरा की लोकल भाषा में मुइखोन कहते हैं.

कसरोड़ आमतौर पर पहाड़ी क्षेत्रों में घने जंगलों और ठंडे क्षेत्र में नदीनालों के पास पाई जाने वाली जंगली सब्जी है. किसानों को इस के लिए खाद नहीं डालनी पड़ती और अन्य किसी प्रकार की देखभाल की जरूरत नहीं होती.

कसरोड़ के पौधों का आकार और रंग अलगअलग क्षेत्रों में अलगअलग है. हिमाचल प्रदेश में पाए जाने वाली कसरोड़ के डंठल मोटे और पत्ते छोटे होते हैं. डंठल के हिस्से का रंग अत्यधिक गहरा होता है. उत्तराखंड में कसरोड़ के पत्ते पतले और कम पाए जाते हैं, जबकि डंठल अधिक मोटा होता है.

जम्मूकश्मीर के पहाड़ी क्षेत्र में पाई जाने वाली कसरोड़ सब्जी का रंग थोड़ा लालिमा लिए होता है. जम्मूकश्मीर के कठुआ जिले में पाया जाने वाला कसरोड़ का डंठल कमजोर होता है, जबकि इस के पत्ते लंबे और घने होते हैं.

जम्मूकश्मीर के बनी, बसोली, लुहाई, मल्हार भद्रवाह, रामवन और पुंछ में हरे और गहरे लाल रंग का कसरोड़ पाया जाता है.

हरे रंग के कसरोड़ में हलकी सी गंध आती है, जबकि गहरे लाल रंग का कसरोड़ खाने में ज्यादा स्वादिष्ठ होता है. इस का मुख्य कारण है, 1,800 से 2,000 मीटर की ऊंचाई पर बहने वाली नदी, नालियों और झरने का पानी शुद्ध होता है, साथ ही किसी प्रकार की गंदगी  नदीनालों के पास नहीं पाई जाती. वातावरण भी अनुकूल होता है.

कसरोड़ मार्च महीने से प्रस्फुटित होता है और मई के अंत तक पौधे तैयार होने लगते हैं. यह मई और जून में बाजार में बिकने लगता है और जुलाई में धीरेधीरे कम हो जाता है. इन दिनों इस के डंठल सख्त और पत्ते कम हो जाते हैं.

इस के डंठल में हलकेहलके रुईदार कांटे उंग जाते हैं, फिर यह सब्जी बनाने के काबिल नहीं रहती. सब्जी बेचने वालों को इस की देखभाल करनी पड़ती है. अगर धूप लग जाए तो पत्तों के साथ डंठल तक मुरझा जाते हैं. इस के उखाड़ने के बाद 1-2 दिन तक ही इसे बेचा जा सकता है. इस के मुरझाने के बाद यह किसी काम का नहीं रहता है.

कसरोड़ काली, गहरी, भूरी और नमी वाली मिट्टी में उगता है. इस का डंठल एक सैंटीमीटर पुलाई लिए 9 सैंटीमीटर तक लंबा होता है. इस का सिरा मुड़ा हुआ होता है. इन का डंठल जितना नरम और मुलायम होगा उतनी ही उस की सब्जी और अचार स्वादिष्ठ होंगे.

कसरोड़ की सब्जी बनाने से पहले अच्छी तरह धोया जाता है. धोने से पहले इस की साफसफाई जरूरी है, क्योंकि इस के डंठल नरम होने के कारण उन पर कई प्रकार के सूखे पत्ते चिपके होते हैं. साथ ही, चिकनी मिट्टी इन के पत्तों से चिपकी होती है.

बाजार में इस की कीमत 100 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम है. इस की सब्जी में विटामिन ए, विटामिन बी, मैग्नीशियम पोटैशियम, कौपर, आयरन, सोडियम, कैरोटीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है. इस की सब्जी खाने से मांसपेशियां और हड्डियां मजबूत  होती हैं.

प्राकृतिक खेती में नवाचार की जरूरत

उदयपुर : 30 जून, 2023 को महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अनुसंधान निदेशालय में टिकाऊ कृषि के लिए प्राकृतिक खेती पर 2 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुभारंभ हुआ.

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में कुलपति, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर, डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए बताया कि पूरेे विश्व में रासायनिक उर्वरकों एवं हानिकारक कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग व एकल फसल प्रणाली से मिट्टी की गुणवत्ता में कमी, जैव विविधता का घटता स्तर, हवा की बिगड़ती गुणवत्ता और दूषित पर्यावरण के कारण हरित कृषि तकनीकों के प्रभाव टिकाऊ नहीं रहे हैं.

उन्होंने आगे बताया कि अत्यधिक उर्वरक के उपयोग से इनसान की सेहत, पशुओं की सेहत और बढ़ती लागत को प्रभावित कर रहे हैं और अब वैज्ञानिक तथ्यों से भी यह स्पष्ट है कि भूमि की जैव क्षमता से अधिक शोषण करने से एवं केवल रासायनिक तकनीकों से खाद्य सुरक्षा एवं पोषण सुरक्षा प्राप्त नहीं की जा सकती है.

उन्होंने यह भी कहा कि जैव विविधता को संरक्षित करते हुए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना चाहिए, जिस से कि लाभदायक कीट जैसे मधुमक्खीपालन को कृषि में बढ़ावा मिल सके.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने प्राकृतिक खेती के 4 मूल अवयव ‘बीजामृत, जीवामृत, आच्छादन, नमी संरक्षण’ एवं जैव विविधता के बारे में विस्तृत रूप से प्राकृतिक खेती के परिपेक्ष में चर्चा की.

डा. एसके शर्मा, सहायक महानिदेशक, मानव संसाधन विकास, भारत कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधन करते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने से कृषि उत्पादन में टिकाऊपन आ सकता है. प्राकृतिक खेती गांव आधारित समन्वित खेती है, प्रदूषणरहित खेती है, अतः स्वस्थ भोजन के लिए ग्राहकों में इस की मांग बढ़ रही है. बढ़ती मांग के मद्देनजर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो गांवों में रोजगार बढ़ाने में भी सहायक होगी.

उन्होंने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती को देश को कृषि के पाठ्यक्रम में चलाने के साथसाथ नईनई तकनीकों को आम लोगों तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है. इस के तहत आने वाले समय में देश के तकरीबन एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती की तरफ ले जाना है, जो कि वर्तमान में देश के कृषि वैज्ञानिकों के सामने एक मुख्य चुनौती है. प्राकृतिक खेती में देशज तकनीकी जानकारी और किसानों के अनुभवों को भी साझा किया.

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डा. चंद्रेश्वर तिवारी, पूर्व निदेशक प्रसार शिक्षा, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड ने बताया कि प्रकृति और पारिस्थितिक कारकों के कृषि में समावेश कर के ही पूरे कृषि तंत्र का ‘शुद्ध कृषि’ की तरफ बढ़ाया जा सकता है.

उन्होंने बताया कि भारतीय परंपरागत कृषि पद्धति योजना के तहत राज्यों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है. इस से कम लागत के साथसाथ खाद्य पोषण सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा. जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों के तहत खेती को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्राकृतिक खेती के घटकों को आधुनिक खेती में समावेश करना आवश्यक है.

डा. अरविंद वर्मा, अनुसंधान निदेशक ने कार्यक्रम की आवश्यकताओं एवं उद्देश्य के बारे में चर्चा करते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती की नवीनतम तकनीकों का विकास करना आवश्यक है. इस के लिए विद्यार्थियों को अभी से ही जागरूक होने की आवश्यकता है. साथ ही, किसानों एवं कृषि बाजार को जोड़ कर किसानों एवं पर्यावरण को फायदा पहुंचाना आज के समय की जरूरत है. प्राकृतिक खेती और जैविक पशुपालन को वर्तमान कृषि पद्धति के साथ जोड़ कर अपनी आय को बढ़ा सकते हैं.

डा. रोशन चौधरी, कार्यक्रम सहसंयोजक ने कार्यक्रम का संचाालन करते हुए बताया कि 2 दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान प्राकृतिक खेती पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान हुए.

इस कार्यक्रम में डा. एसएस शर्मा, अधिष्ठाता, राजस्थान कृषि महाविद्यालय, डा. पीके सिंह, अधिष्ठाता, कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय, डा. महेश कोठारी, निदेशक, आयोजना एवं परिवेक्षण निदेशालय, डा. मनोज कुमार महला, निदेशक, छात्र कल्याण अधिकारी, डा. बीके शर्मा, अधिष्ठाता, मात्स्यिकी महाविद्यालय, डा. विरेंद्र नेपालिया, विशेष अधिकारी, डा. अमित त्रिवेदी, क्षेत्रीय निदेशक अनुसंधान, कृषि अनुसंधान केंद्र, उदयपुर, डा. रविकांत शर्मा, उपनिदेशक अनुसंधान उपस्थित थे.

कम लागत और जल संरक्षण के लिए सीधी बोआई है उपयोगी

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान फिलीपींस मनिला के 2 सदस्य दल डाक्टर अमिलिया हेनरी और डाक्टर जसवंत विश्वविद्यालय पहुंचे. इन्होंने फसल अनुसंधान केंद्र पर पहुंच कर परियोजना के अंतर्गत लगाए गए परीक्षणों की जांच की और वहां पर मृदा के परीक्षण और फील्ड की जांच की.

फिलीपींस से आए प्रतिनिधिमंडल ने कुलपति प्रो. केके सिंह से मुलाकात की और भविष्य में दोनों देशों के सहयोग से किए जाने वाले शोध कार्यों के बारे में चर्चा की.

कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफैसर केके सिंह ने कहा कि चावल उत्पादन के लिए सही विधि का चयन करना चाहे सीधी बीजारोपण विधि हो या नर्सरी विधि एक महत्वपूर्ण निर्णय है, जो कई कारकों पर निर्भर करता है. सीधी बीजारोपण विधि में लागत की बचत होती है और ट्रांसप्लांटिंग और अंकुर प्रबंधन के लिए कम श्रम प्रविष्टियां आवश्यक होती हैं.

कृषि विश्वविद्यालय ने फिलीपींस के बीच एक अनुबंध किया है, जिस में धान उत्पादन की तकनीकी एवं उस के विकास के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य किए जाएंगे.

परियोजना की मुख्य अन्वेषण डाक्टर शालिनी गुप्ता ने बताया कि कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति के प्रयास से अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान फिलीपींस के बीच इस बार एक अनुबंध हुआ है, जिस में शिक्षा शोध एवं प्रसार के कार्यों को बढ़ावा दिया जाएगा.

इस अंतर्राष्ट्रीय परियोजना की प्रधान अन्वेषक डाक्टर शालिनी गुप्ता ने यह भी बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए यह पहली परियोजना है, जिस के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान फिलिपींस मनिला और यह कृषि विश्वविद्यालय मिल कर धान की स्क्रीनिंग और उन की उपयोगिता की जांच के लिए कार्य किया जाएगा. इस से यह पता चलाया जा सकेगा कि कौन से जर्म प्लाज्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए लाभकारी है.

उन्होंने आगे यह भी बताया कि कृषि विश्वविद्यालय में किए जा रहे इस प्रकार के अनुसंधान से सीधी बोआई की उपयोगिता का पता आसानी से लगाया जा सकेगा. उस के उपरांत उपयुक्त विधि का चयन करने से उत्पादन की संभावना को अधिकतम किया जा सकेगा.

उन्होंने कहा कि किसी दवाई से खरपतवार नियंत्रण में दिक्कतें आती हैं. खरपतवार खेत में अधिक हो जाता है. उस के नियंत्रण के लिए भी तकनीक विकसित करने पर विचार किया जाएगा. साथ ही साथ इस विधि से बोआई करने पर जल संरक्षण हो सकेगा.

उन्होंने आगे कहा कि इस प्रकार के अनुसंधान से चावल की उत्पादकता और उत्पादन को और भी अधिक बढ़ाया जा सकेगा.

डाक्टर शालिनी गुप्ता ने बताया कि इस परियोजना के अंतर्गत प्राप्त विभिन्न जर्म प्लाज्म की खेत में सीधी बोआई की गई है. इस परियोजना के अंतर्गत लगभग आधा एकड़ क्षेत्रफल में धान की विभिन्न प्रजातियों की सीधी बोआई की गई है. यहां पर जो जर्म प्लाज्म लगाया गया है, उस की गुणवत्ता की जांच की जाएगी. साथ ही, देखा जाएगा कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के वातावरण में कौन सा जर्म प्लाज्म अच्छा उत्पादन देता है.

इस दौरान विश्वविद्यालय के निदेशक शोध प्रोफैसर अनिल सिरोही, निदेशक, ट्रेनिंग और प्लेसमेंट और विभागाध्यक्ष प्रोफैसर आरएस सेंगर, परियोजना के सहअन्वेषक डाक्टर आदेश कुमार और एमएससी और पीएचडी के शोध छात्र भी मौजूद रहे.

संभागीय किसान महोत्सव में एमपीयूएटी :  किसानों के महाकुंभ में बही एमपीयूएटी की ज्ञानगंगा

उदयपुर : 26 जून 2023. उदयपुर के बलीचा स्थित कृषि उपज मंडी सबयार्ड में आयोजित 2 दिवसीय संभाग स्तरीय किसान महोत्सव का आगाज धूमधाम से हुआ. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस किसान महोत्सव का उद्घाटन किया. संभाग स्तरीय किसानों के महाकुंभ में महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की 20 से अधिक स्टाल लगाई गई, जिन पर विश्वविद्यालय में विकसित नवीनतम कृषि तकनीकों से संभाग भर से आए किसानों को रूबरू करवाया गया.

मेला स्थल पर उपस्थित कृषि विश्वविद्यालय एमपीयूएटी के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि विश्वविद्यालय की विभिन्न इकाइयों में संचालित कृषि अनुसंधान परियोजनाओं मुख्यतः भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा प्रायोजित अखिल भारतीय समन्वित कृषि अनुसंधान परियोजनाओं, जिन में मुख्यतः मशरूम उत्पादन एवं अनुसंघान, खरपतवार नियंत्रण, जैविक खाद, जैविक खेती, जैविक कीटनाशक, मोटे अनाजों पर संचालित परियोजना, विभिन्न प्रकार की कंदीय फसलों, गेहूं, जो, मूंगफली, ज्वार, मक्का, बीजीय फसलों, उद्यानिकी फसलों, फूलों की खेती, कृषि अभियांत्रिकी, मृदा एवं जल संरक्षण अभियांत्रिक, रोबोटिक्स, आभासी तकनीकी, इंटरनेट औफ थिंग्स, सेंसर आधारित खेती, समन्वित खेती पद्धति, कृषि यांत्रिकी विभाग एवं परियोजना में विकसित अनेक कृषि यंत्रों का प्रर्दशन, सामुदायिक विज्ञान और कृषक महिला विकास से संबंधित परियोजनाओं, कटाई के उपरांत खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, सोलर ऊर्जा चालित विभिन्न यंत्रों, सोलर चालित पंप, साइकिल, सोलर ड्रायर इत्यादि तकनीकों का विस्तृत प्रर्दशन किया गया.

इस अवसर पर एमपीयूएटी में विकसित विभिन्न पशु नस्लों प्रतापधन मुरगी, बकरी की नस्लें, खरगोश, बटेर व मछलीपालन स्टाल में मछली की विभिन्न खाने योग्य और रंगीन मछलियां की पालन योग्य प्रजातियों का प्रदर्शन किया गया, जिस में विभिन्न उम्र के किसानों ने विशेष रुचि दिखाई.

प्रसार शिक्षा निदेशक डा. आरए कौशिक ने बताया कि किसानों ने विश्वविद्यालय द्वारा विकसित विभिन्न फसलों के बीज की किस्में लगाने के लिए अपनी रुचि दिखाई है. अनुसंधान निदेशक अरविंद वर्मा ने बताया कि एमपीयूएटी की विभिन्न अनुसंधान तकनीकों को जानने एवं अपनाने में किसानों की रुचि देखी गई. दिनभर इन स्टालों पर किसानों का रेला लगा रहा. किसानों के विभिन्न सवालों के जवाब कृषि वैज्ञानिकों ने मौके पर ही दिए और इस अवसर पर सवालजवाब के लिए विशेष रुप से आयोजित जाजम चौपाल में विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि, पशुपालन, मछलीपालन, बीज उत्पादन, फसल संरक्षण, जैविक खेती, फसल संरक्षण कीट व्याधि नियंत्रण और उद्यानिकी फसलों से संबंधित विभिन्न सवालों के जवाब दे कर किसानों को संतुष्ट किया.

नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन-इंडिया के साथ मिल कर नवाचारों पर काम करेगी एमपीयूएटी

उदयपुर : महाराणा प्रताप यूनिवर्सिटी औफ एग्रीकल्चर एंड टैक्नोलौजी और नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन-इंडिया (एनआईएफ) ने एक समझौता ज्ञापन में प्रवेश किया है. एनआईएफ विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक स्वायत्त निकाय है, जिस का कार्यालय गांधीनगर, गुजरात में है.

यह जमीनी तकनीकी नवाचारों और उत्कृष्ट पारंपरिक ज्ञान को मजबूत करने के लिए भारत की राष्ट्रीय पहल है. इस का मिशन जमीनी तकनीकी नवप्रवर्तकों के लिए नीति और संस्थागत स्थान का विस्तार कर के भारत को एक रचनात्मक और ज्ञान आधारित समाज बनने में मदद करना है.

एमपीयूएटी कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि इस समझौता ज्ञापन के माध्यम से दोनों संस्थान शैक्षणिक और अनुसंधान सहयोग के माध्यम से एक समावेशी नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए सहयोग करने पर सहमत हुए हैं. इस समझोते से छात्रों और विश्वविद्यालय की फैकल्टी को समाज के लिए उपयोगी नवीन परियोजनाओं पर काम करने (मूल्यवर्धन और सत्यापन) का अवसर मिलेगा.

एमपीयूएटी की फैकल्टी और छात्र अपने नवाचारों को विपणन योग्य समाधानों में बदलने के लिए जमीनी स्तर और छात्र नवप्रवर्तकों को अपना परामर्श व समर्थन प्रदान करेंगे. एनआईएफ में अनुसंधान कार्य करने के लिए छात्रों/शोधकर्ताओं का आदानप्रदान जमीनी स्तर के उत्पादों के सत्यापन और मूल्यवर्धन से संबंधित अनुसंधान और/या समाज की अपूर्ण जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए किया जा सकता है.

डा. अरविंद सी. रानाडे, निदेशक, एनआईएफ और सुधांशु सिंह, रजिस्ट्रार, एमपीयूएटी, उदयपुर ने कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक, प्रो. महेश कोठारी, निदेशक योजना और विस्तार, प्रो. पीके सिंह, अधिष्ठाता सीटीएई, डा. सांवल सिंह मीना, विभागाध्यक्ष और वरिष्ठ संकाय सदस्य की उपस्थिति में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक, डा. अरविंद सी. रानाडे और सुधांशु सिंह ने उल्लेख किया कि समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए सहयोग को सर्वोत्तम स्तर तक पहुंचाने के लिए प्रत्येक संस्थान का पूर्ण सहयोग दिया जाएगा.

किसानों की मेहनत, वैज्ञानिकों की कुशलता व सरकार की नीतियों से रिकौर्ड उत्पादन

नई दिल्ली : 26 जून 2023. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय/विभाग, राज्यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों एवं अन्य सरकारी स्रोत एजेंसियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर संकलित, बागबानी फसलों के क्षेत्र व उत्पादन के संबंध में वर्ष 2021-22 के अंतिम आंकड़े और वर्ष 2022-23 के प्रथम अग्रिम अनुमान जारी किए गए हैं. वर्ष 2021-22 में कुल बागबानी उत्पादन रिकौर्ड 347.18 मिलियन टन हुआ है, जो वर्ष 2020-21 के उत्पादन से 12.58 मिलियन टन (3.76 फीसदी) अधिक है. वर्ष 2022-23 में कुल बागबानी उत्पादन रिकौर्ड 350.87 मिलियन टन होने का (प्रथम अग्रिम) अनुमान है, जो वर्ष 2021-22 (अंतिम) की तुलना में 3.69 मिलियन टन की वृद्धि (1.06 फीसदी से अधिक) है.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन में हमारे किसान भाईबहनों की अथक मेहनत, वैज्ञानिकों की कुशलता और केंद्र सरकार की किसान हितैषी नीतियों व राज्य सरकारों के सहयोग से देश में रिकौर्ड उत्पादन संभव हो रहा है.

बागबानी फसलों के क्षेत्र व उत्पादन के संबंध में वर्ष 2021-22 (अंतिम आंकड़े) की मुख्य बातें:

वर्ष 2021-22 में कुल बागबानी उत्पादन रिकौर्ड 347.18 मिलियन टन हुआ, जो वर्ष 2020-21 के उत्पादन से लगभग 12.58 मिलियन टन (3.76 फीसदी) अधिक है. वहीं वर्ष 2021-22 में फलों का उत्पादन 107.51 मिलियन टन हुआ, जबकि वर्ष 2020-21 में 102.48 मिलियन टन का उत्पादन हुआ था.

सब्जियों का उत्पादन पिछले वर्ष के 200.45 मिलियन टन की तुलना में 4.34 फीसदी की वृद्धि के साथ वर्ष 2021-22 में 209.14 मिलियन टन हुआ.

वर्ष 2021-22 में प्याज का उत्पादन 31.69 मिलियन टन हुआ, जबकि वर्ष 2020-21 में 26.64 मिलियन टन का उत्पादन हुआ था.

वर्ष 2021-22 में आलू का उत्पादन 56.18 मिलियन टन हुआ, जो इस के गत वर्ष करीब इतना ही था.

वर्ष 2022-23 (प्रथम अग्रिम अनुमान) की मुख्य बातें :

वर्ष 2022-23 में कुल बागबानी उत्पादन 350.87 मिलियन टन होने का अनुमान है, जो वर्ष 2021-22 (अंतिम) की तुलना में लगभग 3.69 मिलियन टन (1.06 फीसदी अधिक) की वृद्धि है.

फलों, सब्जियों, मसालों, फूलों, सुगंधित और औषधीय पौधों और वृक्षारोपण फसलों के उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि का अनुमान है.

फलों का उत्पादन वर्ष 2021-22 में 107.51 मिलियन टन की तुलना में 107.75 मिलियन टन होने का अनुमान है.

सब्जियों का उत्पादन 212.53 मिलियन टन होने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2021-22 में 209.14 मिलियन टन था.

प्याज का उत्पादन पिछले वर्ष के 31.69 मिलियन टन की तुलना में 31.01 मिलियन टन होने का अनुमान है.

आलू का उत्पादन 59.74 मिलियन टन होने का अनुमान है, जबकि वर्ष 2021-22 में यह 56.18 मिलियन टन था.

टमाटर का उत्पादन वर्ष 2021-22 में 20.69 मिलियन टन की तुलना में 20.62 मिलियन टन होने का अनुमान है.

सुगंधित व औषधीय पौधों का उत्पादन वर्ष 2021-22 में 664 हजार टन की तुलना में 680 हजार टन होने का अनुमान है.

कुल बागबानी
2020-21 (अंतिम)
2021-22(अंतिम)
2022-2023 (प्रथम अग्रिम अनुमान)

क्षेत्रफल (मिलियन हेक्टेयर में)
27.48
28.04
28.28

उत्पादन (मिलियन टन में)
334.60
347.18
350.87