पशुओं का पसंदीदा चारा : बरसीम (Barseem)

सर्दियों में उगाई जाने वाली हरे चारे की यह खास फसल है. यह मुलायम, रसीला और पौष्टिक चारा है. देश में अनेक हिस्सों में इसे बोया जाता है. इस चारे को एक बार बो कर इस से 6 से 8 महीने तक चारा लिया जा सकता है.

जब चारा पकने लगे तब इस से बीज की पैदावार भी ली जा सकती है. इस बीज को आगे भी बोने के काम में लिया जा सकता है. सर्दी में उगाए जाने वाले चारे की बढ़वार भी ठंडे मौसम में अच्छी होती है.

जमीन और खेत की तैयारी : पानी सोखने वाली दोमट मिट्टी में बरसीम की अच्छी बढ़ोतरी होती है. खेत तैयार करने के लिए पहले खेत की जुताई करें, फिर पाटा लगा कर इकसार करें.

बोआई के लिए छोटीछोटी क्यारियां बनाएं जिस से पानी ठीक से लगाया जा सके. लंबे या बड़े इलाके में एकसाथ पानी देने पर कहींकहीं पानी ठहर सकता है.

यह बात सभी फसल के लिए लागू होती है कि पानी खेत में जगहजगह न भरे. जगहजगह पानी भर जाने से फसल को नुकसान होना तय है इसलिए इस तरह की सामान्य बातों का ध्यान रखें.

बरसीम बोने का समय : सितंबर के आखिरी हफ्ते से नवंबर महीने तक इसे बोया जा सकता है. देरी से बोआई करने पर चारे की कम कटाई मिलेगी.

किस्में : अच्छी पैदावार के लिए साफसुथरे व अच्छे किस्म का बीज लें. वरदान, जेबी 1, बीएल 1 भस्कावी वगैरह किस्में अच्छी पैदावार देती हैं.

बीजोपचार व बोआई : बोने से पहले बीजोपचार कर लें. बरसीम के बीज को कल्चर (बरसीम का टीका) से उपचारित करना चाहिए. यह टीका आप अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से हासिल कर सकते हैं जो बहुत कम कीमत में मिलता है. 20 से 25 किलोग्राम बीज को उपचारित करने के लिए 1 लिटर पानी में 100 से 125 ग्राम गुड़ घोल कर उसे ठंडा कर लें. ठंडे किए गए घोल और कल्चर (टीका) में मिला लें. इस के बाद इसे बरसीम बीज पर इस तरह से मिलाएं कि बीजों पर उस की परत चढ़ जाए. उस के बाद बीज को छाया में सुखा लें.

अगर आप कल्चर से बीज उपचारित नहीं कर पा रहे हैं तो जिस खेत में पिछली बार बरसीम बोया गया हो उस खेत की मिट्टी को बीज के साथ मिला कर बरसीम की बोआई की जा सकती है.

बरसीम बोना बहुत ही आसान है. इस के लिए तैयार किए गए खेत में पानी भर दें. उस के बाद उस पानी भरी क्यारियों या खेत में समान मात्रा में बरसीम बीज छिड़क दें. धीरेधीरे जब खेत का पानी जमीन सोख लेगा तो बीज भी वहीं पर जमने लगेगा.

बरसीम को कभी भी सूखे खेत में छिड़क कर न बोएं. पानी भरे खेत में ही छिड़कवां तरीके से बीज बोएं वरना सूखे खेत में बीज छिड़कने के बाद आप अगर खेत में पानी देंगे तो बीज पानी के साथ बह कर जगहजगह या एक जगह इकट्ठा हो जाएगा.

सिंचाई : तकरीबन 15-20 दिनों के अंतराल पर फसल में पानी देने की जरूरत होती है.

खाद व उर्वरक : यह काम खेत तैयार करते समय करना चाहिए. खेत की जुताई के दौरान ही सड़ी गोबर की खाद देनी चाहिए और आखिरी जुताई के समय 25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला देना चाहिए.

कटाई : बरसीम बोने के 40-45 दिनों बाद ही बरसीम काटने लायक हो जाती है और अपनी सुविधानुसार फसल की कटाई करते रहें. आमतौर पर चारे की 7-8 बार कटाई की जाती है. चारे की कटाई 25-30 दिनों के अंतराल पर करें.

बीज पैदावार : चारे की कटाई का समय खत्म होने के बाद फसल न काटें. मार्च में आप चारे की कटाई बंद कर दें और आखिरी कटाई के बाद उस में सिंचाई कर के छोड़ दें. उस समय गरमी का मौसम होता है. अगर जरूरत हो तो फिर सिंचाई कर दें लेकिन सिंचाई सीमित ही करें क्योंकि बीज पकते समय ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है.

बरसीम फसल पक कर मईजून तक बीज के लिए तैयार हो जाती है. इसे आप अगले सीजन में इस्तेमाल कर सकते हैं या बाजार में बेच भी सकते हैं.

चारा काटने की मशीन

हाथ से चारा काटते समय अकसर दुर्घटना हो जाती है. कई बार हाथ तक कट जाता है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए पूसा कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने अपनी मशीन में समयसमय पर तमाम सुधार किए हैं, जो दुर्घटनारहित हैं. इन में लगे चारा काटने वाले ब्लैडों से दुर्घटना को रोकने के लिए ब्लैड गार्ड लगाए गए हैं. इन गार्डों को ब्लैडों के आगे बोल्टों के जरीए जोड़ा गया है.

मशीन से जब काम न लेना हो तो उसे बोल्टों के जरीए ताला लगा कर बंद किया जाता है.

चारा लगाने वाली जगह पर एक खास रोलर भी लगाया गया है जिस से चारा लगाते समय हाथ असुरक्षित जगह पर न जाने पाए, इस का पता पहले ही लग जाता है.

घी उत्पादन (Ghee Production) के लिए पालें भदावरी भैंस

किसान खेत के साथसाथ पशुपालन, डेरी, फूड प्रोसैसिंग जैसे कामों को कर के ज्यादा से ज्यादा फायदा ले सकते हैं. ऐसे तमाम किसान हैं जिन्होंने पशुपालन व डेरी का कारोबार अपना कर न केवल अपनी माली हालत में सुधार किया है बल्कि दूसरों के लिए रोजगार मुहैया कराने का जरीया भी बने हैं.

अगर आप दुधारू पशुओं को पालने की इच्छा रखते हैं तो इस के साथसाथ डेरी और दूध से बनी तमाम चीजों को तैयार कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा ले सकते हैं.

देश में शुद्ध देशी घी की काफी मांग रहती है लेकिन बाजार में देशी घी के नाम से बिकने वाले ब्रांडों की क्वालिटी पर अकसर सवाल खड़ा होता रहता है. ऐसे में किसान डेरी व्यवसाय के साथसाथ देशी घी का उत्पादन कर मुनाफा कमा सकते हैं.

वैसे तो देशी घी का कारोबार गाय या भैंस पाल कर किया जा सकता है लेकिन भैंसों के दूध में वसा की मात्रा ज्यादा होने की वजह से यह घी के लिए ज्यादा मुफीद मानी जाती है.

देश में भैंसों की प्रमुख रूप से 12 नस्लें हैं लेकिन भदावरी नस्ल की भैंस के दूध में वसा की मात्रा ज्यादा होने से दूसरी नस्लों की अपेक्षा इस के दूध से अच्छा घी निकलता है.

भदावरी नस्ल की भैंस का पालन उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में किया जाता है. भैंसों की यह प्रजाति विलुप्त होने के कगार पर है.

सरकार द्वारा इसे बचाने के लिए कई योजनाओं पर काम चल रहा है. इस नस्ल की भैंसों की तादाद देश में बहुत कम हो गई है. इसे अब सुरक्षित करने की भी जरूरत है.

भदावरी नस्ल की भैंस के दूध में वसा की मात्रा 12-13 फीसदी पाई जाती है जो उस के खानपान पर निर्भर है. वैसे, उस के खानपान के मुताबिक 6-14 फीसदी तक वसा पाई जाती है.

भदावरी भैंस का पालन करने वाले पशुपालकों के मुताबिक, अगर भदावरी नस्ल की भैंस हर रोज 5 लिटर दूध दे तो एक हफ्ते में 5 किलोग्राम शुद्ध देशी घी हासिल किया जा सकता है जो साढ़े 12 फीसदी वसा के बराबर है.

यह किसी भी नस्ल की भैंस में पाए जाने वाली वसा की मात्रा से कहीं ज्यादा है. भदावरी नस्ल की भैंसों के दूध में औसतन 8.2 फीसदी वसा, 19 फीसदी ठोस तत्त्व, 4.11 फीसदी प्रोटीन, 205.72 मिग्रा कैल्शियम, 140.90 मिग्रा फास्फोरस, 3.82 माइक्रोग्राम जिंक, 0.24 माइकोग्राम कौपर व 0.117 माइक्रोग्राम मैंगनीज पाया जाता है.

भदावरी भैंस की खूबी

भदावरी भैंसों का कद मध्यम छोटा होता है. शरीर नुकीला, छोटा सिर, छोटी और मजबूत टांगें, काले खुर, एकसमान पुट्ठे, कौपर या हलके भूरे रंग की पलकें और काले रंग के लंबे सींग होते हैं. इन के शरीर पर बाल कम होते हैं. इन की टांगें छोटी व मजबूत होती हैं. घुटने के नीचे का हिस्सा हलका पीला व सफेद रंग का होता है. सिर के अगले हिस्से पर आंखों के ऊपर वाला भाग सफेदी लिए होता है. गरदन के निचले भाग पर 2 सफेद धारियां होती हैं. इन की सींगें तलवार के आकार की होती हैं. ये प्रति ब्यांत में औसतन 800-1000 लिटर दूध देती हैं.

भदावरी नस्ल के बड़े पशुओं का औसत वजन 300-400 किलोग्राम होता है. छोटा आकार व कम वजन की वजह से इन का आहार दूसरी नस्ल की भैंसों की अपेक्षा काफी कम होता है.

इसे कम संसाधनों में किसानों, पशुपालकों व भूमिहीन पशुपालकों द्वारा आसानी से पाला जा सकता है. जो भी मिल जाए, उस को खा कर अपना गुजारा कर लेती है. इस नस्ल की भैसों में कई बीमारियों के लड़ने की कूवत पाई जाती है. भदावरी भैंस के बच्चों की मृत्यु दर काफी कम है.

यों करें चारा प्रबंधन

भदावरी नस्ल की भैंसों के चारे में ऊर्जा, प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ए की प्रचुर मात्रा होनी चाहिए. इस नस्ल की भैंसों को जरूरत के मुताबिक ही चारा खिलाएं ताकि दूध देने की कूवत में गिरावट न आने पाए. सूखे चारे के साथ ही हरा चारा खिलाने से इन की सेहत भी अच्छी रहती है. इन के चारे में दानों का विशेष खयाल रखना चाहिए. इस के लिए मक्की, जौ, जई, बाजरा, गेहूं का मिश्रण खिलाना चाहिए.

चारे के खुराक का मिश्रण बनाने के लिए तेल के बीजों की खली जिस में मूंगफली, तिल, सोयाबीन, अलसी, सरसों, सूरजमुखी की खली को मिलाया जा सकता है.

इसी के साथ गेहूं का चोकर, चावल का कन, नमक और दूसरे खनिज पदार्थ मिला कर खिलाना फायदेमंद होता है.

ऐसे लें दूध उत्पादन

भदावरी भैंस मुर्रा भैंस की तुलना में दूध तो थोड़ा कम देती है, लेकिन दूध में वसा की ज्यादा मात्रा होने के चलते गंभीर हालात में रहने की कूवत, बच्चों की कम मृत्यु दर और तुलनात्मक रूप से कम भोजन वगैरह गुणों के चलते यह नस्ल किसानों में काफी लोकप्रिय है.

भदावरी भैंस का औसत दूध उत्पादन 4-5 किलोग्राम प्रतिदिन है, लेकिन अच्छे पशु प्रबंधन द्वारा 8-10 किलोग्राम दूध प्रतिदिन हासिल किया जा सकता है.

भदावरी भैंसें एक ब्यांत यानी तकरीबन 300 दिन में अधिकतम 1,200 से 1,800 लिटर दूध देती हैं. इस तरह अगर माना जाए तो प्रतिदिन औसत दूध उत्पादन के आधार पर इस नस्ल के एक ब्यांत की अवधि 280 दिन की होती है.

ऐसे लें ज्यादा घी

कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया, जनपद बस्ती में वरिष्ठ पशु विज्ञानी डाक्टर एसएन लाल के मुताबिक, भदावरी भैंसों से ज्यादा घी हासिल करने के लिए पशुपालक अगर कुछ विशेष चीजों पर ध्यान दें तो घी के उत्पादन को और भी ज्यादा बढ़ाया जा सकता है.

इस के लिए पशुपालक भदावरी नस्ल की इन भैंसों को हरे चारे और सूखे चारे का संतुलित आहार दे कर भी दूध में घी की मात्रा को बढ़ा सकते हैं.

सिर्फ हरा चारा खिलाने से दूध और उस में घी की मात्रा नहीं बढ़ती है, बल्कि हरे चारे से दूध तो बढ़ता है, लेकिन उस में चरबी कम हो जाती है. ऐसे में इस नस्ल की भैंस को 60 फीसदी हरा चारा और 40 फीसदी सूखा चारा मिला कर खिलाना चाहिए.

अचानक ही पशु के आहार में बदलाव न करें. थनों से दूध निकालते समय इस बात का ध्यान रखें कि पड़वा को आखिरी में आने वाला दूध न पिलाएं क्योंकि घी की मात्रा आखिरी में आने वाले दूध में सब से ज्यादा होती है.

बारिश में चौपायों की ऐसे करें देखभाल

आबोहवा में ज्यादा नमी के चलते पशुओं की पाचन क्रिया के साथसाथ अंदरूनी बीमारियों से लड़ने की कूवत पर भी असर पड़ता है. नतीजा यह होता है कि पशु तमाम रोगों से ग्रसित हो जाते हैं.

बरसात में परजीवियों की तादाद में ज्यादा बढ़ोतरी देखने को मिलती है. इस वजह से पशुओं को प्रोटो जून और पैरासिटिक रोग हो जाते हैं. इन रोगों के प्रकोप से पशु की सेहत बिगड़ने लगती है.

एक तरफ जहां पशुओं को बीमारी से परेशानी होती है, वहीं दूसरी ओर पशुपालकों को माली नुकसान उठाना पड़ता है इसलिए अगर आप अपने मवेशियों को बारिश के संक्रमण से बचाना चाहते हैं तो इस के लिए पहले से ही तैयार रहें और रोग होने पर बचाव करें.

गलघोंटू : बारिश में पशुओं में यह रोग अधिक होता है, खासतौर पर भैंसों को. इस मौसम में पशुओं की अंदरूनी बीमारी से लड़ने की ताकत घट जाती है, जिस से उन के शरीर में मौजूद बीमारी के जीवाणु भयंकर रूप धारण कर लेते हैं. इस बीमारी से ग्रसित पशुओं को तेज बुखार आ जाता है. साथ ही, उस के गले में सूजन भी आ जाती है. इस से उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है. अगर सही समय पर इलाज नहीं हुआ तो दम घुटने से मौत भी हो जाती है.

उपचार : पशुपालकों को बीमारी से ग्रसित पशुओं को दूसरे सेहतमंद पशुओं से अलग रखें और तुरंत ही पशु डाक्टर से समुचित उपचार कराएं.

रोकथाम : बारिश शुरू होने से पहले पशुपालक को नजदीकी पशु अस्पताल में जा कर अपने पशुओं को गलघोंटू रोग का टीका लगवा लें ताकि इस से बचाव किया जा सके.

लंगड़ा बुखार  : यह बुखार 3 दिन तक रहता है, लेकिन है बहुत ही खतरनाक. इस बीमारी में पशु 3 दिन तक तेज बुखार से ग्रसित रहता है. उसे खड़े रहने में कमजोरी महसूस होती है. इस वजह से वह बैठा रहता है और एकदम सुस्त रहता है.

उपचार : इस के उपचार के लिए मीठा सोडा और सोडियम सैलिसिएट को बराबर मात्रा में पशुओं को पिलाना होता है. इस से उन्हें जल्द आराम मिलता है.

चेचक रोग : जिस तरह से इनसानों को चेचक रोग हो जाता है, ठीक उसी तरह जानवरों और पक्षियों में खासकर पालतू मुरगियों में चेचक रोग बहुत तेजी से फैलता है. अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया जाता तो जानवरों की मौत भी हो जाती है. यह रोग पशु आवास में गंदगी के रहने से होता है. इस में पशु के अयन पर लाल रंग के दाने निकलने के साथसाथ तेज बुखार भी रहता है.

उपचार : थनों और अयन को पहले पोटेशियम परमैगनेट (लाल दवा) के घोल से अच्छी तरह धोएं और उस के बाद मलहम लगाने से पशु को आराम मिलता है.

परजीवियों का प्रकोप : बरसात में परजीवियों की तादाद भी तेजी से बढ़ने लगती है, जिस से पशुओं को शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इन का प्रकोप 2 प्रकार से होता है:

अंत:जीवी : जैसे पेट के कीड़े, कृमि वगैरह.

बाह्य जीवी : चीचड़, मेंज, जूं वगैरह.

लक्षण : रोग से ग्रसित पशुओं में सुस्ती, कमजोरी, एनीमिया (खून की कमी) और दूध में कमी देखने को मिलती है. पशु को पाचन क्रिया की शिकायत रहती है, जिस से पेट में दर्द और पतला गोबर आता है.

बचाव : परजीवियों से पशुओं के बचाव के लिए आप को इस बात का खास खयाल रखना है कि बारिश में पशुओं को जोहड़ के किनारे न ले जाएं. साथ ही, जोहड़ के किनारों वाली घास न खिलाएं क्योंकि ये घास कीड़ों के लार्वा से ग्रसित होती है जो पेट में जा कर कीड़े बन जाते हैं और तमाम रोग पैदा करते हैं.

उपचार  : पशु डाक्टर की सलाह से पशुओं को उन के वजन के मुताबिक परजीवीनाशक नियमित रूप से 2 बार देना चाहिए. इस से आप को अच्छा नतीजा देखने को मिलेगा.

खाजखुजली : खाजखुजली सिर्फ आप को ही नहीं, बल्कि घरों में बंधे जानवरों को भी होती है. आप इस तरह से समझ सकते हैं कि गाय या भैंस खुजली होने पर खुद को किसी दीवार या फिर जमीन पर लेट कर खूब रगड़ती है. इस बीमारी की खास वजह पशुशाला में गंदगी का होना है. इस में पशुओं के शरीर पर तेज खुजलाहट होती है. इस वजह से चमड़ी मोटी हो कर मुरझा जाती है और उस जगह के सारे बाल झड़ने लगते हैं. कभीकभी इन जगहों पर जीवाणुओं के आश्रय से बहुत गंदी बदबू भी आने लगती है.

उपचार : बीमार पशुओं का इलाज माहिर पशु डाक्टर से ही कराना चाहिए.

इन उपायों की मदद से आप अपने पालतू पशुओं की अच्छी तरह देखभाल कर सकते हैं. इस से यह फायदा होगा कि एक तरफ जहां पशुओं को तकलीफ नहीं होगी, वहीं दूसरी तरफ आप को उन की बीमारी की वजह से माली नुकसान नहीं होगा क्योंकि बीमार गाय या भैंस दूध देना बंद कर देती हैं या फिर मात्रा कम हो जाती है. वैसे भी बीमार पशुओं के दूध का सेवन नहीं करना चाहिए.

four-legged animals

इन बातों का भी रखें ध्यान

* पशुपालकों को इस बात का खयाल रखना चाहिए कि बारिश में पशुओं को भीगना तो नहीं पड़ रहा है. जहां उन्हें रखा जाता हो, वहां पर रोजाना साफसफाई करना बहुत जरूरी होता है क्योंकि बारिश में हर तरफ गंदगी फैली होती है. इस की वजह से मक्खी, मच्छर और तरहतरह के कीड़ेमकोड़े अपना आशियाना बना लेते हैं और पशुओं को बीमार कर कमजोर करते हैं.

* पशुशाला की खिड़कियां खुली रखनी चाहिए और बिजली के पंखों का इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि पशुओं को उमस और गरमी से राहत मिल सकें.

* पशुशाला में पशु के मलमूत्र के निकलने का सही बंदोबस्त होना चाहिए. पशुशाला को दिन में एक बार फिनाइल के घोल से जरूर साफ करें ताकि बदबू फैलाने वाले बैक्टीरिया का असर कम हो सके.

* पशुओं को खेतों के पास गड्ढे या जोहड़ का पानी पिलाने से परहेज करें. इस दौरान किसान खेतों में खरपतवार व कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं जो रिस कर इन में आ जाता है. कोशिश करें कि पशु को बालटी से साफ व ताजा पानी पिलाएं.

* पशुओं को हरा चारा अच्छी तरह देखभाल व झाड़ कर खिलाएं क्योंकि बरसात में घोंघों का प्रकोप ज्यादा होता है. घोंघे चारे के निचले तने और पत्तियों पर चिपके होते हैं. घोंघे फ्लूक के संरक्षक होते हैं इसलिए पशुपालकों को तय कर लेना चाहिए कि पशुओं का चारा घोंघों से ग्रसित न हो.

* सरकारी अस्पताल में जा कर पशुओं को टीका जरूर लगवाएं जैसे गलघोंटू, मुंहपका, खुरपका वगैरह के टीके.

* 15 दिन के अंतराल पर परजीवियों की रोकथाम के लिए कीटनाशक दवाओं को पशु डाक्टर की सलाह के मुताबिक इस्तेमाल करें.

पशुपालन व्यवसाय में तकनीक से तरक्की

पशुपालन के बारे में यह आम सोच है कि इसे व्यवसाय के रूप में चुनने के लिए किसी खास पढ़ाई या डिगरी की जरूरत नहीं होती. यह व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है. अगर इस व्यवसाय को आधुनिक तकनीक के साथ मिला दिया जाए तो किसी भी क्षेत्र में नए आयाम बनाए जा सकते हैं.

पशुपालन के क्षेत्र में ऐसे ही कुछ सुनहरे पन्ने जोड़े हैं बीकानेर के एक नौजवान टैक्नोग्रेड नवीन सिंह तंवर ने. यूथ आईकौन के रूप में उभरने वाले नवीन सिंह तंवर ने नौजवानों के लिए उन्नत कृषि और पशुपालन व्यवसाय में संभावनाओं के नए दरवाजे खोले हैं.

आज हर ओर मिलावटी दूध की चर्चा देखनेसुनने और पढ़ने को मिलती है. यूरिया और डिटर्जैंट जैसे हानिकारक तत्त्व दूध के नमूनों में पाए जाते हैं. लेकिन नवीन सिंह ने साबित कर दिखाया है कि किस तरह आधुनिक तकनीक को अपना कर बिना सेहत से खिलवाड़ किए ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है.

इस सिलसिले में नवीन सिंह तंवर से बातचीत की गई. पेश हैं, उसी के खास अंश:

एक छोटी सी नौकरी पाने के लिए भी नौजवानों को कड़ी मेहनत करते हुए देखा जा सकता है. ऐसे में लाखों रुपए का पैकेज छोड़ कर दूध डेरी खोलने का विचार आप को कैसे आया?

मेरी 3 साल की बेटी के लिए घर में जो दूध आता था, एक दिन मैं ने उस का सैंपल टैस्ट करवाया तो मुझे पता चला कि इस में कितनी पेस्टीसाइड की मिलावट की जाती है.

मेरे एक डाक्टर दोस्त ने कहा कि इस रूप में हम एक तरह से धीमा जहर पी रहे हैं. बस… बच्चों और परिवार की सेहत को ध्यान में रखते हुए मैं होलस्टन नस्ल की 2 गाएं ले आया.

यहीं नहर के किनारे हमारा फार्म है. चूंकि हाथों से दूध निकालते समय भी दूध में कीटाणु जा सकते हैं इसलिए हम ने मशीन मिल्किंग को अपनाया. धीरेधीरे दोस्तों और रिश्तेदारों ने भी शुद्ध दूध लेने की इच्छा जाहिर की तो फिर इसे एक व्यवसाय के रूप में अपनाने का विचार आया क्योंकि लोग अपनी सेहत को ले कर जागरूक हो गए हैं.

आज जहां आएदिन खानेपीने की चीजों में मिलावट की खबरों से अखबार भरे रहते हैं, वहीं लोग अतिरिक्त पैसा खर्च कर के भी शुद्ध खानपान अपनाना चाह रहे हैं.

इसी सोच ने मुझे डेरी खोलने की प्रेरणा दी. हम ने उत्तर भारत की बहुत सी डेरियां देखी हैं. होलेस्टन नस्ल की गायों के बारे में इंटरनैट से भी बहुत सी जानकारी इकट्ठा की. हम हर साल धीरेधीरे गायों की तादाद बढ़ाते गए. आज हमारे पास तकरीबन 200 गाएं हैं. यहां इस नस्ल को और बेहतर करने का काम भी किया जाता है ताकि गायों की ज्यादा दुधारू नस्ल विकसित की जा सके.

बीकानेर शहर को एशिया का डेनमार्क कहा जाता है. ऐसे में कड़ी होड़ में न केवल टिके रहना बल्कि मुनाफा कमाना भी एक चुनौती है. आप की क्या रणनीति रही?

आप ने बिलकुल सही कहा है कि एशिया में सब से ज्यादा डेरी फार्म बीकानेर में ही हैं, लेकिन फिर भी यहां तकरीबन 70 फीसदी दूध मिलावटी पाया जाता है. दूध में पानी की ही नहीं बल्कि यूरिया, डिटर्जैंट और दूसरे हानिकारक कैमिकल मिलाए जाते हैं.

ऐसा एक एनजीओ के सर्वे में सामने आया है. 1,200 घरों से दूध के सैंपल ले कर यह सर्वे किया गया था. तब हम ने अपने उत्पाद की शुद्धता और अच्छी क्वालिटी को पैमाना बना कर इस व्यवसाय में कदम रखा. साथ ही, हम ने अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया.

मिल्क पार्लर में गायों का दूध निकालने के बाद पैक्ड कैन से पाइप के जरीए दूध को बल्क कूलर में सप्लाई किया जाता है. यहां इसे 4 डिगरी तक ठंडा किया जाता है. बल्क कूलर से दूध को पाइप के जरीए ही पैकेजिंग मशीन में लगे बरतन में सप्लाई किया जाता है. यहां से इस की एकएक लिटर की पैकिंग होती है.

हम ने ‘काऊबेस’ नाम से अपना ब्रांड बनाया और क्वालिटी के मानक तय किए.

पशुपालन (Animal Husbandry)

हम ने सोशल मीडिया सहित हर आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया. हम ने उपभोक्ता और उत्पादक के बीच से मिडिल की कड़ी को हटा दिया. दूध दुहने से ले कर उस की पैकिंग तक का काम पूरी तरह से मशीनी होता है.

हमारे यहां हर रोज 1500 लिटर दूध तकरीबन 650 घरों में सीधे ग्राहकों तक पहुंचाया जाता है. हम इसे विनायक परिवार कहते हैं. सभी ग्राहक ह्वाट्सऐप ग्रुप के जरीए हम से सीधे जुड़े हैं.

हमें खुशी है कि हम लोगों का भरोसा बना पाए. हमारी डेरी का सालाना टर्नओवर डेढ़ करोड़ रुपए है. यही हमारी कामयाबी का राज है.

गाय एक ऐसा पशु है जिसे जो कुछ भी खिलाया जाता है, उस का असर जैसे स्वाद, महक और गुण दूध में आ जाते हैं. ऐसे में आप दूध की शुद्धता कहां तक बना कर रखेंगे क्योंकि चारे और दाने में भी तो हानिकारक कैमिकलों की मिलावट हो सकती है?

बीकानेर की ज्यादातर डेरियों में पशुओं को मूंगफली का चारा खिलाया जाता है, जिस में पेस्टीसाइड भरपूर मात्रा में होते हैं. ऐसे में अगर दूध में कोई बाहरी मिलावट न भी की जाए तब भी पेस्टीसाइड का असर आ जाता है.

दूध में पोषक तत्त्वों को बनाए रखने के लिए हम गायों को पूरे साल अपने ही फार्म में उगा हरा चारा खिलाते हैं. गरमियों में ज्वार और सर्दियों में जई. फार्म में सिर्फ और्गेनिक खाद ही इस्तेमाल की जाती है.

गायों पर कभी भी औक्सीटोसिन का इस्तेमाल नहीं किया जाता. जरूरत होने पर होमियोपैथी दवाएं दी जाती हैं. यहां तक कि गायों में चिचड़ी होने पर भी किसी तरह की दवा नहीं दी जाती. इस के अलावा यहां मुरगीपालन किया गया है, क्योंकि वे चिचड़ी को खोजखोज कर खा जाती हैं. हाईजीन के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जाता. पूरा फार्म सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में है.

यह फार्म 3 भागों में बंटा हुआ है. पहले भाग में हरा चारा सूखी तूड़ी के साथ मिला कर भरपेट खिलाया जाता है. यह सभी के लिए समान है. वहीं दूसरे भाग में पेट से होने वाली गायों को रखा जाता है. यहां उन्हें उन की जरूरत के मुताबिक दाना यानी बांट खिलाया जाता है. दाने या बांट की मात्रा हरेक पशु के लिए उस की बौडी साइज, वजन और दूध देने की कूवत के मुताबिक तय की जाती है.

पेट से होने वाली गायों की खास देखभाल की जाती है. इन्हें बाईपास फैट खिलाया जाता है जो कि एक विशेष प्रकार का आहार है और न्यूट्रीशन का बहुत ही रिच सोर्स है. यह सीधा गायों की आंतों में घुलता है और उस का पूरा फायदा पशु को मिलता है. इस से ब्याने के बाद उस का दूध अच्छी क्वालिटी का होगा और उस की मात्रा भी ज्यादा होगी.

तीसरे भाग में नई ब्या चुकी गाएं हैं. नई ब्याई गायों को 2 महीने तक गुड़, अजवाइन और मेथी का बांट पका कर खिलाया जाता है ताकि दूध की मात्रा और पौष्टिकता बनी रहे यानी परंपरागत नुसखों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ कर गायों की बेहतरीन देखभाल की जाती है.

गरमियों में राजस्थान का तापमान 45 से 50 डिगरी तक पहुंच जाता है. पशुओं का दूध भी कम हो जाता है. आप गायों की इन समस्याओं से कैसे निबटते हैं?

हमारी गाएं संकर नस्ल की हैं. ये गाएं 50 डिगरी के तापमान पर भी बेहतर काम करती हैं. साथ ही, यहां पर गायों को पूरी तरह कुदरती माहौल दिया जाता है यानी घने पेड़ों की छाया और और्गेनिक हरा चारा.

चूंकि गायों को पसीना नहीं आता इसलिए इन की डाइनिंग टेबल के आसपास पंखे और फौगर लगाए गए हैं ताकि उन के शरीर में ठंडक बनी रहे.

गायों को सैंधा नमक भी चारे के साथ चटाया जाता है. इस का सोडियम पशु को स्वस्थ रखता है. यहां बड़ेबड़े ब्रश भी लगाए गए हैं. यहां आ कर गाएं अपनेआप को खुजा कर जाती हैं. ये छोटेछोटे उपाय पशुओं को सेहतमंद रखने में कारगर साबित होते हैं.

हमारे यहां हरेक गाय के दूध का रिकौर्ड रखा जाता है. 1-2 किलोग्राम लिटर दूध का उतारचढ़ाव आते ही उसे डाक्टरी मदद मुहैया कराई जाती है. इस के लिए प्रतिदिन एक पशुचिकित्सक की विजिट होती है.

आप अपने भविष्य की योजनाएं हमारे युवा दोस्तों के साथ साझा कीजिए.

आने वाले समय में हम फार्म पर ही केंचुआ खाद बनाएंगे. बायोगैस से बिजली बनाने की भी योजना है. इस के अलावा दूसरे दूध उत्पाद जैसे दही, घी, मक्खन, पनीर वगैरह भी हम सहयोगी उत्पाद के रूप में बनाने पर विचार कर रहे हैं.

परंपरागत जानकारी के साथसाथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किसी भी व्यवसाय को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है. इस क्षेत्र में भी काफी संभावनाएं हैं. सरकार भी खेती और पशुपालन को बढ़ावा दे रही है. बहुत सी आधुनिक तकनीक इस क्षेत्र में आ चुकी हैं. उन से अपडेट रहना समझदारी है. बस थोड़ा सा सब्र और अपने पेशे के प्रति ईमानदारी रखी जाए तो यह नौजवानों के लिए एक बेहतर भविष्य वाला व्यवसाय है.

नवजात बछड़ों एवं बछियों (Calves and Heifers) की देखभाल

अकसर यह देखा गया है कि पशुपालक अपने नवजात बछड़े व बछिया की सही तरीके से देखभाल नहीं कर पाते हैं, जिस से वे तमाम तरह की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और उन का शरीर कमजोर हो जाता है. इस के चलते पशुपालकों को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है. अगर पशुपालक नीचे लिखी बातों को ध्यान में रखें तो बछड़े और बछिया की सेहत सुधारने के अलावा उन्हें कई बीमारियों से बचाया जा सकता है:

* बछड़े या बछिया के पैदा होने के तुरंत बाद उन की आंख, नाक व मुंह के अंदर से झिल्लियां उतार दें, ताकि वे सांस ले सकें. अगर सांस लेने में कोई कठिनाई दिखाई दे तो पिछले घुटने को पकड़ कर कुछ देर तक उलटा लटका दें ताकि झिल्लियां अपनेआप बाहर आ जाएं.

* गाय अपने बच्चे को चाट कर उसे साफ व सूखा कर देती है. अगर ऐसा न हो तो नवजात बच्चे को किसी मोटे कपड़े या बोरी से रगड़ कर साफ करें. ऐसा करने से उस के शरीर में खून का बहाव तेज हो जाता है.

* नवजात बछड़े या बछिया की नाल अगर अपनेआप न टूटे तो उसे साफ ब्लेड या कैंची से पेट से एक इंच की दूरी से काट दें और धागे से बांध कर उस पर टिंचर आयोडीन तब तक लगाते रहें जब तक वह पूरी तरह से ठीक न हो जाए.

* नवजात बच्चा अगर खुद न खड़ा हो सके तो उसे सहारा दे कर खड़ा करें और उसे उस की मां के पास छोड़ दें.

* बछड़े या बछिया को जन्म के आधे घंटे से ले कर 2 घंटे के भीतर खीस जरूर पिलाएं क्योंकि यही खीस उसे बीमारियों से जिंदगीभर लड़ने की ताकत देती है. खीस थोड़ीथोड़ी मात्रा में दिन में 5-7 बार उस के शरीर के वजन के 10वें भाग यानी 2-3 लिटर प्रतिदिन की दर से पिलाएं.

* खीस खत्म होने के बाद यानी ब्याने के 4-5 दिन बाद नवजात को शरीर के वजन के 10वें भाग के हिसाब से दूध पिलाएं. तीसरे हफ्ते से थोड़ाथोड़ा दाना और सूखा चारा देना शुरू कर दें. नांद में खनिज मिश्रण की ईंटें चाटने के लिए रखें.

* नवजात को ठंडी हवा व खराब मौसम से बचाएं. उन के रहने की जगह साफसुथरी, हवादार व फर्श पर बिछावन होना चाहिए.

* साफ पानी न मिलने और सफाई की कमी में नवजात पशु के पेट में कीड़े हो जाते हैं. इस वजह से उन्हें दस्त, कमजोरी व शरीर में खुजली हो जाती है, इसलिए जन्म के 10-15 दिन बाद बच्चों को पेट के कीड़े मारने की दवा पिलानी चाहिए.

* नवजात बच्चों को कई तरह की अंदरूनी और बाहरी परजीवी जैसे चिचड़ी या कुटकी, जूं, टिक, माइट वगैरह लग जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए इवरमैक्टिन का इंजैक्शन, अल्बेंडाजोल की गोली या सुमिथियान बूटोक्स 0.5 फीसदी घोल बना कर उन के शरीर पर छिड़काव करें.

* नवजात पशुओं में  दस्त, निमोनिया, खुरपका, मुंहपका, टीबी यानी क्षय रोग, लंगड़ी, गलघोंटू, गिल्टी रोग वगैरह संक्रामक बीमारियों की रोकथाम के लिए उन्हें 4-6 महीने की उम्र में रोग अवरोधक टीके मानसून आने से पहले जरूर लगवाएं.

अगर पशुपालक इन बातों पर अमल करेंगे तो बछड़े व बछिया की सही देखभाल कर सकते हैं और उन्हें तमाम बीमारियों से बचा सकते हैं.

वैज्ञानिक तरीके से गायभैंस के नवजात बच्चों (Newborn Calves) की देखभाल

हमारे देश में पशुपालन खेती के मददगार रोजगार के रूप में पनप रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों से दूध की बढ़ती कीमतों से अच्छा मुनाफा होने पर बेरोजगार नौजवान भी इसे व्यवसाय के रूप में अपनाने लगे हैं. यह एक ऐसा काम है, जिस में अनुभवी, मेहनती और लगनशील व्यक्ति अच्छाखासा मुनाफा कमा सकता है.

गांवदेहात में कम कीमत पर कम उम्र के पशु मिल जाते हैं, जिन के पालनपोषण का यदि खास ध्यान रखा जाए तो वह अच्छे दुधारू पशु बन सकते हैं.

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार गाय व भैंस के बच्चा जनने के पहले व बाद में देखभाल पर कुछ सुझाव दिए गए हैं, जिन पर पशुपालकों को ध्यान देना चाहिए:

* गाय या भैंस का औसत गाभिन काल 282 और 310 दिन होता है.

* गाभिन पशु को अपने शरीर की जरूरत और गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए पोषक तत्त्वों की जरूरत होती है. यदि पशुओं को पोषक तत्त्व सही खुराक में नहीं मिले तो बच्चा कमजोर होगा, साथ ही पशु अगले ब्यांत में भी दूध कम देगा.

* पशु के ब्याने के 2 माह पहले से पशु के ब्याने तक पोषक तत्त्वों की खुराक बढ़ानी चाहिए. इस जरूरत को पूरा करने के लिए पहले से खिलाई जा रही खुराक के अलावा या तो 1 किलोग्राम दाना मिश्रण या 10 से 15 किलोग्राम हरा या मुलायम रसदार चारे के साथ थोड़ी मात्रा में सूखा चारा मिला कर की जा सकती है.

* गाभिन पशु को चोट लगने और दूसरे पशुओं से सुरक्षित बचा कर रखना चाहिए. हो सके तो गाभिन पशुओं को दूसरे पशुओं से अलग रखना चाहिए.

* बच्चा जनने के समय पशु का अयन (थन का ऊपरी हिस्सा) फूल जाता है यानी पशु के बाहरी जननांग फूल जाते हैं और पूंछ के पास के अस्थि बंधक तंतु ढीले हो जाते हैं. इस दौरान पशु का खास ध्यान रखना चाहिए.

* बच्चा जनने में आमतौर पर 1 से 2 घंटे का समय लगता है. पशु का कमरा पूरी तरह से हवादार होने के साथसाथ साफ, छूत से होने वाली बीमारी रोकने वाले पदार्थ से छिड़का होना व बिछावनदार होना चाहिए.

* यदि पशु स्वस्थ है तो बच्चा जनने में किसी तरह की मदद की जरूरत नहीं पड़ती है. फिर भी बच्चा पैदा होने के समय इमर्जैंसी में कोई न कोई जरूर होना चाहिए.

* सब से पहले बच्चे के अगले पैर और उस के बाद नाक बाहर आती है. अगर कोई परेशानी लगे तो तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएं.

* बच्चा पैदा होने के बाद पशु के बाहरी जननांगों व आसपास के भाग और पूंछ को नीम के पत्तों के पानी से धो देना चाहिए. (नीम डाल कर उबाल कर पानी को ठंडा कर के रखें) या साफ पानी में पोटेशियम परमैगनेट डाल लें, उसे लाल दवा के घोल से धोना चाहिए. ऐसा करने से पशु पर लगी गंदगी साफ हो जाएगी. साथ ही, कीटाणुओं को पनपने का मौका नहीं मिलेगा.

* पशु को तकरीबन आधा किलोग्राम गुड़, 3 किलोग्राम चोकर, 50 ग्राम नमक और 40 ग्राम खनिज मिश्रण के साथ भरपूर चारा दिया जाए.

* पशु को ठंड से बचा कर रखना चाहिए. इस के लिए कुनकुना पानी या गुड़ का गरम शरबत देना चाहिए. ब्यांत के 2 दिन बाद चोकर की जगह जई का चोकर व अलसी का दलिया देना चाहिए.

* आमतौर पर पशु 2 से 4 घंटे में जेर डाल देता है. यदि वह 8-10 घंटे बाद भी जेर न डाले तो अरगट मिक्सचर दें. इस के बाद भी जेर न गिरे तो पशु चिकित्सक की मदद लेनी चाहिए.

* बच्चा जनने के तुरंत बाद अयन में दूध आ जाता है. इस वजह से वह फूल जाता है. इसलिए नाखून व घास के टुकड़ों से अयन को नुकसान न पहुंचे, इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए.

* ब्यांत के बाद पशु को कैल्शियम की कमी के कारण दुग्ध ज्वर हो सकता है. इस रोग से बचाव के लिए सब से अच्छा तरीका है कि बच्चा जनने के 1-2 दिन बाद तक अयन से पूरा दूध न निकाला जाए और कैल्शियम की भरपाई की जाए.

* पशु के ब्याने के बाद मैग्नीशियम की कमी के कारण मैगनीशियम टिटेनी हो सकता है. इस के लिए माइफैक्स का इंजेक्शन देना चाहिए. कैल्शियम की कमी पूरी करने के लिए कैल्शियम बोरोग्लूकोनेट का इंजैक्शन दिया जाता है. यह काम पशु चिकित्सक से करवाना चाहिए.

* ज्यादा दूध देने वाले पशुओं में थनेला रोग होने का भी खतरा रहता है. इस के लिए पशु चिकित्सक से इस की जांच भी जरूर करा लें.

पशु के बच्चे की देखभाल

* गाय और भैंस के नवजात बच्चों की मृत्युदर काफी ज्यादा होती है इसलिए उन की वैज्ञानिक तरीके से देखभाल करें. जैसे ही बच्चा पैदा हो, उस की नाक, आंख, कान और शरीर में लगी झिल्ली या चिपकी हुई गंदगी को अच्छी तरह से साफ कर देना चाहिए, ताकि वह अच्छी तरह सांस ले सके.

* आमतौर पर गाय या भैंस खुद ही अपने बच्चे को चाट कर साफ कर देती है. यदि वह बच्चे को चाटे न तो उस के शरीर पर थोड़ा नमक छिड़क दें. इस के बाद पशु अपने बच्चे को चाटने लगता है.

* यदि बच्चा सांस लेना शुरू न करे तो उस की छाती को बारबार दबा कर व छोड़ कर कृत्रिम सांस देने की कोशिश करनी चाहिए. यह प्रक्रिया बच्चे को साइड में लिटा कर करनी चाहिए.

* बच्चे की नाभि पर टिंचर आयोडीन लगाना चाहिए और उस के बाद बोरिक एसिड का पाउडर भरना चाहिए. अगर नेवल कौर्ड लंबा है तो उसे शरीर से 2 इंच नीचे से आयोडीन लगाने से पहले काट देना चाहिए ताकि शरीर में संक्रमण न फैले.

* ज्यादातर नवजात बच्चे जन्म के 1 घंटे बाद ही अपने पैरों पर खड़े हो कर दूध पीना शुरू कर देते हैं. फिर भी इस दौरान यदि बच्चा सही तरह से दूध न पी सके तो उसे सहारा दे कर दूध पिलाने में मदद करें. अयन के साथसाथ थनों को बच्चे के दूध पीने से पहले अच्छी तरह धो लें. ऐसा करने से बच्चे का बीमारी से बचाव होगा.

* बच्चे को जन्म के 48 घंटे तक शुरुआती दूध (जिसे कोलेस्ट्रम व आम भाषा में खीस कहते हैं) जरूर दिया जाए, इस दूध से बच्चे को कई तरह की बीमारियों से लड़ने की ताकत मिलती है व बच्चों का कई बीमारियों से बचाव होता है.

* स्वस्थ बच्चे को प्रतिदिन उस के वजन के 10 फीसदी भार के बराबर दूध देना चाहिए जो कि 5-6 लिटर प्रतिदिन से ज्यादा नहीं होना चाहिए. अगर पशु को कुछ समस्या हो तो पशु चिकित्सक से जरूर सलाह ली जानी चाहिए.

* जब बच्चा 15 दिन का हो जाए तो उसे एचएस का 30-40 मिलीलिटर सीरम का टीका देना चाहिए.

* 15 दिन बाद कास्टिक छड़ी द्वारा सींग रोधन कर देना चाहिए.

* 3 महीने की उम्र पर एंथ्रेक्स का टीका व इस के 15 दिन बाद बीक्यू का टीका जरूर लगवाना चाहिए.

जई (Oats) की नई किस्म से बढ़ेगा पशुओं का दूध

हिसार : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के चारा अनुभाग ने जई की नई उन्नत किस्म एचएफओ 906 विकसित की हैं. देश के उत्तरपश्चिमी राज्यों के किसानों व पशुपालकों को जई की इस किस्म से बहुत लाभ होगा.

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने यह जानकारी देते हुए बताया कि इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा व पाचनशीलता अधिक होने के कारण ये पशुओं के लिए बहुत उत्तम हैं. उन्होंने बताया कि देश में 11.24 फीसदी हरे व 23.4 फीसदी सूखे चारे की कमी है. जिस के कारण पशुओं की उत्पादकता प्रभावित हो रही है. चारे की अधिक गुणवत्तापूर्ण व ज्यादा पैदावार देने वाली किस्में विकसित होने से पशुपालकों को लाभ होगा व पशुओं की उत्पादकता भी बढ़ेगी. साथ ही, एचएफओ 906 किस्म राष्ट्रीय स्तर की चैक किस्म कैंट एवं ओएस 6 से भी 14 फीसदी तक अधिक हरे चारे की पैदावार देती है.

जई की एचएफओ 906 एक कटाई वाली किस्म है. उन्होंने बताया कि भारत सरकार के राजपत्र में केंद्रीय बीज समिति की सिफारिश पर जई की एचएफओ 906 किस्म को देश के उत्तरपश्चिमी जोन (हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व उतराखंड) के लिए समय पर बिजाई के लिए अनुमोदित की गई हैं.

कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने कहा कि हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई फसलों की किस्मों का न केवल हरियाणा, अपितु देश के अन्य राज्यों के किसानों को भी लाभ हो रहा है. हकृवि द्वारा विकसित किस्मों की मांग अन्य प्रदेशों में भी लगातार बढ़ती जा रही है. यह हकृवि के साथ हरियाणा राज्य के लिए गर्व की बात है. उन्होंने इस उपलब्धि के लिए चारा अनुभाग के वैज्ञानिकों को बधाई दी और भविष्य में भी अपने प्रयास जारी रखने का आह्वान किया.

उत्तरपश्चिमी राज्यों के लिए विकसित जई की नई किस्म की विशेषताएं

विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डा. एसके पाहुजा ने जई की नई किस्म की विशेषता के बारे में बताया कि एचएफओ 906 किस्म की हरे चारे की औसत पैदावार 655.1 क्विंटल व सूखे चारे की औसत पैदावार 124.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इस की बीज की औसत पैदावार 27.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि क्रूड प्रोटीन की पैदावार 11.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इस किस्म के चारे में प्रोटीन की मात्रा 10 फीसदी है, जिस के कारण इस के चारे की गुणवत्ता पशुओं के लिए अधिक लाभदायक है.

एचएफओ 906 किस्म को विकसित करने में इन वैज्ञानिकों का रहा योगदान

इस किस्म को विकसित करने में चारा अनुभाग के वैज्ञानिकों डा. योगेश जिंदल, डा. डीएस फोगाट, डा. सत्यवान आर्य, डा. रवीश पंचटा, डा. एसके पाहुजा, डा. सतपाल एवं डा. नीरज खरोड़ का खासा योगदान रहा है.

इस अवसर पर आनुवांशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग के अध्यक्ष डा. गजराज सिंह दहिया, मीडिया एडवाइजर डा. संदीप आर्य एवं एसवीसी कपिल अरोड़ा भी उपस्थित रहे.

बरबरी बकरी (Barbari Goat) कम लागत में ज्यादा आमदनी

पिछले कुछ सालों से खेती में जिस तरह से किसानों का लगातार नुकसान हो रहा है, उस से खेती से उन का धीरेधीरे मोह भंग होता जा रहा है इसलिए सरकार भी किसानों को पशुपालन के लिए प्रोत्साहित कर रही है.

गरीब किसानों के लिए भैंस पालना काफी महंगा है, ऐसे लोगों के लिए बकरीपालन ज्यादा बेहतर होता है. बकरीपालन में कम बजट में अधिक फायदा कमाया जा सकता है.

आज के समय में लोग शौकिया तौर पर शहरों में भी बरबरी बकरी पाल रहे हैं. इस के लिए वे लोग घर की छतों का इस्तेमाल करते हैं.

गायभैंस की तरह बरबरी बकरी को भी एक जगह बांध कर पाला जा सकता है. अगर आप बकरी पालना चाहते हैं तो बरबरी बकरी सब से अच्छी होती है. जहां जमुनापारी 22 से 23 महीने में, सिरोही 18 महीने में गाभिन होती है, वहीं बरबरी महज 11 महीने में ही तैयार हो जाती है. बरबरी बकरी से साल में 2 बार बच्चे ले सकते हैं, जबकि दूसरी नस्ल की बकरियों में ऐसा नहीं है.

पूरी दुनिया में बकरियों की कुल 102 प्रजातियां हैं. इन में से महज 20 प्रजातियां ही भारत में हैं. 19वीं पशुगणना के मुताबिक, भारत में 7.61 करोड़ बकरियां हैं, वहीं जानकारों का मानना है कि किसानों की नासमझी की वजह से बरबरी बकरी विलुप्त होने के कगार पर है.

अगर किसान फिर से इस नस्ल की बकरी पालें तो तादाद बढे़गी, साथ ही आमदनी का एक अच्छा और सस्ता जरीया भी होगा.

शरीर की बनावट

बरबरी बकरी मध्यम कद की होती है, लेकिन इस का शरीर काफी गठीला होता है. शरीर पर छोटेछोटे बाल होते हैं. सफेद रंग के साथ शरीर पर भूरा या सुनहरे रंग का धब्बा होता है. इस की नाक और कान बहुत ही छोटे होते हैं. इस के कान खड़े रहते हैं. मैदान के गरम इलाकों के अलावा इसे पहाड़ के ठंडे इलाकों में भी आसानी से पाला जा सकता है.

इस प्रजाति की मादा का वजन 25 से 30 किलोग्राम होता है. इस की प्रजनन कूवत भी काफी अच्छी होती है. इस नस्ल की खूबी यह है कि यह साल में 2 बार बच्चे देती है. इन के बच्चे 10 से 12 महीनों में वयस्क होते हैं. ये बकरियां रोजाना 1 लिटर दूध देती हैं.

स्वास्थ्य

बरबरी बकरी दूसरी बकरियों की तरह जल्दी बीमार नहीं होतीं. ये बकरियां गरमी, बरसात और सर्दी सभी तरह के मौसम में आसानी से रह सकती हैं, जबकि दूसरी नस्ल की बकरियों में बीमारी जल्दी आती है.

बकरियों के लिए सब से खराब मौसम बारिश का माना जाता है, लेकिन बरबरी बकरी अपनेआप को इस मौसम के मुताबिक ढाल लेती है. इस लिहाज से इसे पालना काफी आसान रहता है.

विलुप्त होने के कगार पर

जानकारों का कहना है कि इस के विलुप्त होने की सब से बड़ी वजह लोगों की नासमझी है. इस बकरी का नाम बरबरी इसलिए रखा गया क्योंकि अफ्रीका में बरबरा एक जगह का नाम है, जहां से इस को भारत लाया गया था.

किसानों में जानकारी की कमी के चलते इन बकरियों को देशी बकरियों से क्रौस करा दिया गया, इसलिए ये विलुप्ति के कगार पर पहुंच गईं. किसानों के साथ सरकार भी इस तरफ ध्यान दे रही है ताकि इस की तादाद को बढ़ाया जा सके.

स्टाल फेड विधि

गांव या शहरों में लोग घरों पर ही इसे पालते हैं. परंतु बड़े पैमाने पर अगर व्यवस्था करनी हो तब वैज्ञानिक तौरतरीके से इस का पालन करने में ज्यादा फायदा होता है.

स्टाल फेड विधि से बकरी पालना ज्यादा दिनों तक चलता है. फ्लोर और पार्टिशन को इंटरलौकिंग कर के कुछ दिनों में ही आसानी से बकरी पालने के लिए फ्लोर तैयार किया जा सकता है.

इस विधि से बाड़े की आसानी से धुलाई की जा सकती है. 16 मिलीमीटर होल से मैगनी और यूरिन नीचे गिर जाता है और फ्लोर एकदम साफसुथरा रहता है. वाटरप्रूफ वर्जिन प्लास्टिक का इस्तेमाल करने से यह बकरी को नमी और गरमी से बचाता है, पानी गिरने पर भी कोई फिसलन नहीं होती.

स्टाल फेड विधि के लाभ

* इस विधि में बाहर चराने का झंझट नहीं होता, जिस से पैसे और समय की बचत होती है.

* इस विधि से इन बकरियों की ऊर्जा कम खर्च होती है. दूसरी बकरियों के मुकाबले उन के वजन में बढ़ोतरी तेजी से होती है.

* बकरियों को शेड में ही (जमीन पर या जमीन से उठा हुआ) ब्रीड, लिंग, उम्र और वजन के मुताबिक अलग किया जाता है.

* बकरे और बकरियों को अलगअलग बाड़ों में रखा जाता है और उन को मेटिंग के समय ही बकरियों से मिलाया जाता है.

* चारे की मात्रा हर उम्र की बकरियों के मुताबिक दे कर नियंत्रित किया जा सकता है.

किसानों को अगर अपनी आमदनी बढ़ानी है तो खेती के साथ ही साथ बकरीपालन करना चाहिए, जिस से आमदनी का एक बेहतर जरीया बना रहे. इस से फायदा यह होगा कि उन्हें अकेले खेती पर ही निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. बकरीपालन बहुत कम लागत में शुरू किया जा सकता है.

चूंकि इस नस्ल की बकरी साल में 2 बार बच्चे देती है और एक बार में 2-3 होते हैं, इस तरह से साल में 4 से 6 बच्चे हो सकते हैं. इस तरह से 1-2 साल में बकरी और बकरे को बेच कर मोटी कमाई की जा सकती है.

हरा चारा ज्वार, पशुओं के लिए फायदेमंद

हमारे गांवों की लगभग 70 फीसदी आबादी पशुपालन से जुड़ी है. जिन किसानों के पास जोत कम है, वे भी चारे की फसलों की अपेक्षा नकदी फसलों की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं.

हरा चारा खिलाने से पशुओं में भी काम करने की कूवत बढ़ती है वहीं दूध देने वाले पशुओं के दूध देने की कूवत बढ़ती है, इसलिए उत्तम चारे का उत्पादन जरूरी है, क्योंकि चारा पशुओं को मुनासिब प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और खनिज पदार्थों की भरपाई करते हैं.

हरा चारे का उत्पादन कुल जोत का तकरीबन 4.4 फीसदी जमीन पर ही किया जा रहा है. 60 के दशक में पशुओं की तादाद बढ़ने के बावजूद भी चारा उत्पादन रकबे में कोई खास फर्क नहीं हुआ है.

अच्छी क्वालिटी का हरा चारा हासिल करने के लिए ये तरीके अपनाए जाने चाहिए:

जमीन : ज्वार की खेती के लिए दोमट, बलुई दोमट और हलकी व औसत दर्जे वाली काली मिट्टी जिस का पीएच मान 5.5 से 8.5 हो, बढि़या मानी गई है.

यदि मिट्टी ज्यादा अम्लीय या क्षारीय है तो ऐसी जगहों पर ज्वार की खेती नहीं करनी चाहिए.

खेत और बीज

पलेवा कर के पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें या हैरो से. उस के बाद 1-2 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से कर के पाटा जरूर लगा देना चाहिए.

एकल कटाई यानी एक कटाई वाली किस्मों के लिए 30-40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर और बहुकटान यानी बहुत सी कटाई वाली प्रजातियों के लिए 25-30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में डालना चाहिए.

उन्नतशील किस्में चुनें

हरे चारे के लिए ज्वार की ज्यादा पैदावार और अच्छी क्वालिटी लेने के लिए अच्छी प्रजातियों को ही चुनें.

बीजोपचार

बोने से पहले बीजों को 2.5 ग्राम एग्रोसन जीएन थीरम या 2.0 ग्राम कार्बंडाजिम प्रति किलोग्राम के हिसाब से बीज उपचारित करना काफी फायदेमंद रहता है. ऐसा करने से फसल में बीज और मिट्टी के रोगों को कम कर सकते  हैं.

ज्वार को फ्रूट मक्खी से बचाने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 1 मिलीलिटर प्रति किलोग्राम के हिसाब से बीज उपचारित करना फायदेमंद रहेगा.

बोने का तरीका

हरे चारे के लिए जायद मौसम में बोआई का सही समय फरवरी से मार्च तक है. ज्यादातर किसान ज्वार को बिखेर कर बोते हैं, पर इस की बोआई हल के पीछे कूंड़ों में और लाइन से लाइन की दूरी 30 सैंटीमीटर पर करना ज्यादा फायदेमंद है.

खाद और उर्वरक

खाद और उर्वरक की मात्रा का इस्तेमाल जमीन के मुताबिक करना चाहिए. अगर किसान के पास गोबर की सड़ी खाद, खली या कंपोस्ट खाद है तो बोआई से 15-20 दिन पहले इन का इस्तेमाल खेत में करना चाहिए.

एकल कटान यानी एक कटाई वाली प्रजातियों में 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन और 40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें और बची 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन फसल बोने के एक महीने बाद मुनासिब नमी होने पर खड़ी फसल पर इस्तेमाल करना चाहिए.

बहुकटान वाली किस्मों में 60-75 किलोग्राम नाइट्रोजन और 40 किलोग्राम फास्फोरस बोआई के समय और 15-20 किलोग्राम नाइट्रोजन हर कटाई के बाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

आमतौर पर बारिश के मौसम में पानी देने की जरूरत नहीं होती. अगर बारिश न हो तो पहले फसल को हर 8-12 दिन के फासले पर सिंचाई की जरूरत होती है.

फसल की बोआई के तुरंत बाद खरपतवार को जमने से रोकने के लिए 1.5 किलोग्राम एट्राजिन 50 डब्ल्यूपी या सिमेजिन को 1000 लिटर पानी में घोल बना कर जमाव से पहले खेत में छिड़कना चाहिए.

ज्वार के कीट व रोग प्रबंधन

मधुमिता रोग : फूल आने से पहले 0.5 फीसदी जीरम का 5 दिन के फासले पर 2 छिड़काव करने से इस रोग से बचाव हो सकता है. बाली पर अगर रोग दिखाई दे रहा हो तो उसे बाहर निकाल कर जला दें.

दाने पर फफूंद : फूल आते समय या दाना बनते समय अगर बारिश होती है तो इस रोग का प्रकोप ज्यादा होता है. दाने काले व सफेद गुलाबी रंग के हो जाते हैं. क्वालिटी गिर जाती है. इसलिए अगर फसल में सिट्टे आने के बाद आसमान में बादल छाएं और आबोहवा में नमी ज्यादा हो तो मैंकोजेब 75 फीसदी 2 ग्राम या कार्बंडाजिम दवा 0.5 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 दिन के फासले पर 2 छिड़काव करें.

चारकोल राट : इस रोग का प्रकोप रबी ज्वार के सूखे रकबे में छिली मिट्टी में होता है. इस का फैलाव जमीन पर होता है. इस रोग की रोकथाम के लिए नाइट्रोजन खाद का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए और प्रति हेक्टेयर पौधों की तादाद कम रखनी चाहिए. बीज को बोआई के समय थाइरम 4.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए.

पत्ती पर धब्बे (लीफ स्पौट) : इस की रोकथाम के लिए डाईथेन जेड 78 0.2 फीसदी का 2 बार 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करने से बचाव हो जाता है.

मुख्य कीट

प्ररोह मक्खी : यह कीट ज्वार का घातक दुश्मन है. फसल की शुरुआती अवस्था में यह कीट बहुत नुकसान पहुंचाता है. जब फसल 30 दिन की होती है, तब तक कीट से फसल को 80 फीसदी तक नुकसान हो जाता है.

इस कीट की रोकथाम के लिए बीज को इमिडाक्लोप्रिड गोचो 14 मिलीलिटर प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोना चाहिए.

बोआई के समय बीज की मात्रा 10 से 12 फीसदी ज्यादा रखनी चाहिए. जरूरी हो तो अंकुरण के 10-12 दिन बाद इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल 5 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. फसल काटने के बाद खेत में गहरी जुताई करें और फसल के अवशेषों को एकत्रित कर जला दें.

तनाभेदक कीट : इस कीट का हमला फसल लगने के 10-15 दिन से शुरू हो कर फसल पकने तक रहता है. इस के नियंत्रण के लिए फसल काटने के तुरंत बाद खेत में गहरी जुताई करें और बचे हुए फसल अवशेषों को जला दें.

खेत में बोआई के समय खाद के साथ 10 किलोग्राम की दर से फोरेट 10 जी या कार्बोफ्यूरान दवा खेत में अच्छी तरह मिला दें.

बोआई के 15-20 दिन बाद इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल 5 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर या कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करना चाहिए.

सिट्टे की मक्खी : यह मक्खी सिट्टे निकलते समय फसल को नुकसान पहुंचाती है. इस की रोकथाम के लिए जब 50 फीसदी सिट्टे निकल आएं तब प्रोपेनफास 40 ईसी दवा 25 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी में घोल बना कर 10 से 15 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करना चाहिए.

टिड्डा : यह कीट ज्वार की फसल को छोटी अवस्था से ले कर फसल पकने तक नुकसान पहुंचाता है और पत्तियों के किनारों को खा कर धीरेधीरे पूरी पत्तियां खा जाता है. बाद में फसल में मात्र मध्य शिराएं और पतला तना ही रह जाता है.

इस कीट के नियंत्रण के लिए फसल में कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 से 15 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करना चाहिए.

पक्षियों से बचाव : ज्वार पक्षियों का मुख्य भोजन है. फसल में जब दाने बनने लगते हैं, तो सुबहशाम पक्षियों से बचाना बहुत जरूरी है अन्यथा फसल को काफी नुकसान होता है.

कटाई : पशुओं को पौष्टिक चारा खिलाने के लिए फसल की कटाई 5 फीसदी फूल आने पर अथवा 60-70 दिन बाद करनी चाहिए. बहुकटान वाली प्रजातियों की पहली कटाई बोआई के 50-60 दिनों के बाद और बाद की कटाई 30-35 दिन के अंतर पर जमीन की सतह से 6-8 सैंटीमीटर की ऊंचाई पर या 4 अंगुल ऊपर से काटने पर कल्ले अच्छे निकलते हैं.

उपज : प्रजातियों के हरे चारे की उपज 250-450 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है, जबकि बहुकटान वाली किस्मों की उपज 750-800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है.

जनसमर्थ पोर्टल (Jan Samarth Portal) से पूरे देश के मछुआरों को सुविधा

नई दिल्ली: मत्स्यपालन विभाग ने जनसमर्थ पोर्टल पर किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) मत्स्यपालन योजना के एकीकरण का सफलतापूर्वक उद्घाटन किया, जिस से पूरे देश में मछुआरों, मछली किसानों आदि के लिए ऋण सुविधा तक पहुंच में क्रांतिकारी बदलाव आया है. वर्चुअल समारोह में मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय, भारत सरकार, के संयुक्त सचिव, सागर मेहरा, वित्तीय सेवा विभाग, वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव, पंकज शर्मा, और मुख्य महाप्रबंधक, (डिजिटल परिवर्तन और ई-कौमर्स), भारतीय स्टेट बैंक के राजीव रंजन प्रसाद सहित सम्मानित गणमान्य व्यक्तियों ने भाग ले कर केसीसी मत्स्यपालन अनुप्रयोग प्रसंस्करण प्रणाली के डिजिटलीकरण में एक महत्वपूर्ण पड़ाव पार किया.

कार्यक्रम में बोलते हुए सागर मेहरा ने मत्स्यपालन क्षेत्र में ऋण प्रणाली के डिजिटलीकरण में सरकार के अथक प्रयासों पर प्रकाश डाला. उन्होंने योजना को जनसमर्थ पोर्टल पर एकीकृत करने के परिवर्तनकारी प्रभाव पर जोर दिया, जो संस्थागत ऋण सुविधाओं तक निर्बाध पहुंच की सुविधा प्रदान करेगा और मत्स्यपालन के समावेशी विकास को बढ़ावा देगा.

जनसमर्थ पोर्टल पर केसीसी मत्स्यपालन योजना का एकीकरण मछलीपालन क्षेत्र में मछली किसानों और हितधारकों के लिए एक डिजिटल मंच प्रदान करने की दिशा में एक बड़ी छलांग का प्रतीक है. इस पहल का उद्देश्य प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना, वर्कफ्लो को डिजिटल बनाना और लाभार्थियों के लिए बेहतर पहुंच और पारदर्शिता सुनिश्चित करते हुए कुशल ऋण प्रबंधन सेवाएं प्रदान करना है.

मत्स्यपालन विभाग के प्रभावशाली नेतृत्व में, केसीसी मत्स्यपालन योजना के बारे में जागरूकता लाने के लिए व्यापक प्रयास किए गए हैं, जिस के परिणामस्वरूप देशभर में मत्स्यपालन और जलीय कृषि गतिविधियों में लगे लाभार्थियों को 3,01,309 से अधिक केसीसी कार्ड जारी किए गए हैं. यह ठोस प्रयास मछुआरों और मछली किसानों को ऋण सुविधाओं को सशक्त बनाने और मत्स्यपालन उद्योग के विकास को बढ़ावा देने की सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है.

जनसमर्थ पोर्टल पर केसीसी मत्स्य

पालन योजना का एकीकरण मत्स्य पालन क्षेत्र में दक्षता, पारदर्शिता और समावेशिता के एक नए युग की शुरुआत है. देशभर के मछुआरे और मछली किसान अब आसानी से अपने केसीसी ऋण के लिए आवेदन कर सकते हैं और अपने ऋण खातों का औनलाइन प्रबंधन भी कर सकते हैं