पशुओं को गरमी और लू (Heat and Humidity) से यों बचाएं

वर्तमान में जरूरत से ज्यादा गरम मौसम और तेज हवाओं का प्रभाव पशुओं की सामान्य दिनचर्या को प्रभावित करता है. भीषण गरमी की स्थिति में पशुओं को सुरक्षित रखने के लिए विशेष प्रबंधन और उपायों, जिन में ठंडा व छायादार पशु आवास, साफ पीने का पानी आदि पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है.

तेज गरमी से बचाव प्रबंधन में जरा सी लापरवाही से पशु को ‘लू’ लग सकती है. ‘लू’ से ग्रस्त पशु को तेज बुखार हो जाता है और पशु सुस्त हो कर खानापीना बंद कर देता है. शुरू में पशु की सांस गति या नाड़ी की गति तेज हो जाती है. कभीकभी नाक से खून भी बहने लगता है.

पशुपालक के समय पर ध्यान न देने से पशु की सांस गति धीरेधीरे कम होने लगती है व पशु चक्कर खा कर बेहोशी की दशा में ही मर जाता है.

पशुओं के लिए पक्के पशु आवास की छत पर सूखी घास या कडबी रखें, ताकि छत को गरम होने से रोका जा सके.

पशु आवास की कमी में पशुओं को छायादार पेड़ों के नीचे बांधें. पशु आवास में गरम हवाओं को सीधा न आने दें. इस के लिए लकड़ी के फट्टे या बोरी के टाट को गीला कर दें, जिस से पशु आवास में ठंडक बनी रहे. पशु आवास में आवश्यकता से अधिक पशुओं को न बांधें और रात में पशुओं को खुले स्थान पर बांधें.

गरमी के मौसम में पशुओं को हरा चारा अधिक खाने को दें. पशु इसे बड़े ही चाव से खाते हैं और हरे चारे में 70-90 फीसदी पानी की मात्रा होती है, जो समयसमय पर पशु के शरीर को पानी की आपूर्ति भी करता है.

इस मौसम में पशुओं को भूख कम व प्यास अधिक लगती है. इस के लिए गरमी में पशुओं को पीने के लिए साफ पानी जरूरत के मुताबिक अथवा दिन में कम से कम 3 बार अवश्य पिलावें. इस से पशु शरीर के तापमान को नियंत्रित बनाए रखने में मदद मिलती है.

इस के अलावा पानी में थोड़ी मात्रा में नमक व आटा मिला कर पशु को पिलाना भी अधिक उपयुक्त है. इस से अधिक समय तक पशु के शरीर में पानी की आपूर्ति बनी रहती है, जो शुष्क मौसम में लाभकारी भी है. पशु को प्रतिदिन ठंडे पानी से नहलाने की भी व्यवस्था करें.

पशुपालकों को यह भी सलाह दी जाती है कि पशुओं को ‘लू’ लगने पर प्याज का रस और पानी में ग्लूकोज अथवा नमक व शक्कर घोल कर पिलाएं.

इस के अलावा पशुओं को वेटकूल दवा पिलाएं, जो पशु के शरीर को अंदर से ठंडा रखती है. पशुओं का हाजमा ठीक रखती है, जिस से पशु का दूध कम नहीं होता.

पशु को ‘लू’ लगने पर ठंडी जगह पर बांधने के अलावा माथे पर बर्फ या ठंडे पानी की पट्टी रखें, जिस से पशु को तुरंत आराम मिले.

पशुओं में बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से सलाह ले कर उस का उपचार कराएं, जिस से पशुओं व उस के उत्पादन में होने वाले नुकसान से बचा जा सके.

पशु चिकित्सा, जनस्वास्थ्य एवं महामारी पर कार्यशाला

हिसार : लाला लाजपत राय पशुचिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार के पशु चिकित्सा जनस्वास्थ्य एवं महामारी विज्ञान विभाग में क्रोमैटोग्राफी तकनीकों के प्रयोग द्वारा खाद्य एवं पर्यावरण संबंधी नमूनों में दूषित पदार्थों (संदूषकों) की जांच विषय पर तीनदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डा. विनोद कुमार वर्मा के दिशानिर्देशन में किया गया.

इस कार्यशाला के समापन समारोह में डा. सज्जन सिहाग, अधिष्ठाता, डेयरी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए. इस अवसर पर डा. सज्जन सिहाग ने कहा कि इस कार्यशाला में सभी प्रतिभागी निश्चित रूप से लाभान्वित हुए होंगे और इन क्रोमैटोग्राफी तकनीकों को अपनेअपने कार्यक्षेत्रों में प्रयोग करने के लिए सभी प्रतिभागियों को प्रेरित किया.

डा. सज्जन सिहाग ने इन क्रोमैटोग्राफी आधारित तकनीकों से संबंधित कार्यशालाओं को भविष्य में आयोजन करने और इन के प्रयोग द्वारा खाद्य व पशुओं के खाद्य पदार्थों में विभिन्न टोक्सिकनों की जांच के लिए तकनीकों के प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया.

सभी प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि द्वारा प्रमाणपत्र दिए गए
प्रशिक्षण के सफल आयोजन के बारे में जानकारी देते हुए पशु चिकित्सा, जनस्वास्थ्य एवं महामारी विज्ञान के विभागाध्यक्ष एवं निदेशक मानव संसाधन एवं प्रबंधन डा. राजेश खुराना ने बताया कि इस तीनदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न संस्थानों के 20 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया.

उन्होंने बताया कि भविष्य में भी क्रोमैटोग्राफी तकनीकों से संबंधित अन्य तरीकों एवं उन के उपयोग पर भी कार्यशालाओं एवं प्रशिक्षण का आयोजन किया जाएगा.

इस कार्यक्रम का संचालन विभाग के प्राध्यापक एवं प्रशिक्षक संयोजक डा. विजय जाधव द्वारा किया गया. उन्होंने प्रतिभागियों से इस कार्यशाला से हुए फायदे व भविष्य में इस को अधिक प्रभावी तरीके से आयोजन करने के लिए फीडबैक लिया.

इस अवसर पर विभाग के अन्य संकाय सदस्य डा. दिनेश मित्तल, डा. रेनू गुप्ता, डा. पल्लवी मुदगिल एवं डा. मनेश कुमार भी उपस्थित रहे. कार्य्रकम के अंत में धन्यवाद प्रस्ताव डा. विजय जाधव द्वारा प्रस्तुत किया गया.

मत्स्य आहार संयंत्र (Fish Feed Plant) से सानिया बनी सफल उद्यमी

छिंदवाड़ा : प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना छिंदवाड़ा जिले के विकासखंड परासिया के ग्राम जाटाछापर की सानिया अली और उन के पति जुनेद खान के लिए खासी अच्छी साबित हुई है. इस योजना के अंतर्गत जिले के विकासखंड छिंदवाड़ा के ग्राम भैंसादंड में लगभग साढ़े 3 करोड़ रुपए की लागत से स्थापित 20 टन प्रति दिवस के उत्पादन क्षमता के प्रदेश के पहले मत्स्य आहार संयंत्र की स्थापना कर सानिया अली और उन के पति जुनेद खान सफल उद्यमी बन गए हैं. उन की माली हालत अब अत्यंत सुदृढ़ हो गई है.

सानिया अली और उन के पति जुनेद खान ने अपनी जेके इंडस्ट्रीज की स्थापना से जहां वर्ष 2023-24 में लगभग 90 लाख रुपए और वर्ष 2023-24 में लगभग पौने 2 करोड़ रुपए का टर्नओवर प्राप्त किया है, वहीं अपने इस उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 200 व्यक्तियों को रोजगार भी दिया है. अब वर्ष 2024-25 में उन्हें अपने व्यापार से लगभग ढाई से 3 करोड़ रुपए का टर्नओवर प्राप्त होने की संभावना है. हितग्राही को इस मत्स्य आहार संयंत्र में उत्पादित मत्स्य आहार के विक्रय से प्रतिवर्ष लगभग 8 से 10 लाख रुपए तक की आय प्राप्त हो रही है.

जेके इंडस्ट्रीज, भैंसादंड की स्वामी सानिया अली अपने पति जुनेद खान के साथ इस मत्स्य आहार संयंत्र का संचालन कर रही हैं. उन्होंने अपने पति जुनेद खान को इस इंडस्ट्रीज का मुख्य कार्यपालन अधिकारी नियुक्त किया है. मुख्य कार्यपालन अधिकारी जुनेद खान इस इंडस्ट्रीज को संचालित करने के लिए अपनी पत्नी सानिया अली को भरपूर सहयोग देते हैं. उन की मेहनत व संघर्ष का नतीजा है कि उन का व्यापार अब सफलता की ओर निरंतर बढ़ रहा है और एक सफल उद्यमी के रूप में उन की पहचान बन रही है.

जुनेद खान ने बताया कि वे लगभग 16 वर्ष की आयु से मत्स्यपालन के क्षेत्र में काम कर रहे हैं, इस के पूर्व वे वर्ष 2018 में जिले के जुन्नारदेव विकासखंड के ग्राम घोड़ावाड़ी में एक पौंड को किराए पर ले कर मत्स्यपालन कर चुके हैं.

2 साल तक उन्हें इस काम में घाटा हुआ और तीसरे वर्ष इस काम से उन्हें लाभ प्राप्त होना शुरू हुआ, किंतु अनुभव की कमी के कारण इस में अधिक सफलता नहीं मिली. वे मत्स्य आहार के क्षेत्र में कुछ बेहतर करना चाहते थे, इसलिये वे उचित मार्गदर्शन के लिए मत्स्य विभाग पहुंचे, जहां तत्कालीन सहायक संचालक मत्स्योद्योग द्वारा पुन: 5 लाख रुपए तक की मत्स्य यूनिट की जानकारी दी गई, जिस से उन्हें संतुष्टि नहीं मिली.

उन्होंने अन्य बड़ी योजनाओं के संबंध में जानकारी प्राप्त करना चाही, तो उन्हें प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना की जानकारी हुई, जिस में निजी क्षेत्र में मत्स्य आहार संयंत्र की स्थापना के लिए 2 करोड़ रुपए तक का लोन और 60  फीसदी का अनुदान उपलब्ध कराया जाता है. इस जानकारी से उन का मन प्रसन्न हो गया और उन्होंने अपनी पत्नी के नाम से इस योजना के अंतर्गत अपना प्रकरण तैयार कराया और मत्स्य विभाग के माध्यम से उन्हें 2 करोड़ रुपए का लोन और 60 फीसदी अर्थात 1.20 करोड़ रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ. इस संयंत्र की 13 सितंबर, 2021 को स्थापना की गई, जिस का उद्घाटन तत्कालीन संचालक मत्स्योद्योग भरत सिंह, संयुक्त संचालक शशिप्रभा धुर्वे और सहायक संचालक मत्स्योद्योग रवि गजभिये द्वारा किया गया.

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री डा. एल. मुरुगन ने 4 अप्रैल, 2023 को मध्य प्रदेश के इस प्रथम मत्स्य आहार संयंत्र का अवलोकन किया और संयंत्र के माध्यम से तैयार किए जा रहे मत्स्य आहार की प्रक्रिया की जानकारी के साथ ही मत्स्य आहार की गुणवत्ता, उत्पादन क्षमता, विक्रय दर, मत्स्य आहार की पैकिंग, निर्यात आदि के संबंध में विस्तार से जानकारी प्राप्त कर इस संयंत्र के माध्यम से तैयार किए जा रहे मत्स्य आहार और अन्य प्रक्रियाओं पर संतोष व्यक्त करते हुए इस की सराहना भी की.

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के देश में क्रियान्वयन के सफल 3 वर्ष पूरे होने पर 15 सितंबर, 2023 को ब्रिलिएंट कन्वेंशन सेंटर, इंदौर में केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री परषोत्तम रूपाला के मुख्य आतिथ्य में आयोजित कार्यक्रम में भी उन्होंने प्रदेश के प्रथम मत्स्य आहार संयंत्र के रूप में अपने संयंत्र का स्टाल लगा कर प्रदर्शन भी किया, जिस की केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री परषोत्तम रूपाला, केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री डा. एल. मुरुगन और प्रदेश के अन्य मंत्रियों ने सराहना की.

मत्स्य आहार संयंत्र से छिंदवाड़ा जिले के साथ ही आसपास के जिलों बैतूल, सिवनी, बालाघाट, इंदौर, भोपाल, खंडवा, राजगढ़, नर्मदापुरम आदि एवं प्रदेश के बाहर के प्रदेशों असम, ओड़िसा, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश आदि में भी विक्रय किया जा रहा है.

मुख्य कार्यपालन अधिकारी जुनेद खान ने बताया कि इस संयंत्र की स्थापना में उन की पत्नी और उन्हें अत्यंत कड़ा संघर्ष करना पड़ा.

उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि संयंत्र की स्थापना के लिए मत्स्य विभाग से लोन और अनुदान प्राप्त करने के अलावा अपने पिता जमील खान से लगभग 30 लाख रुपए की लागत से एक एकड़ भूमि खरीदवाई, बैंक औफ बड़ौदा की छिंदवाड़ा शाखा से 50 लाख रुपए का कर्जा लिया, व्यक्तिगत कर्ज लिया और अपनी सारी जमापूंजी लगाने के साथ ही अन्य रिश्तेदारों से भी माली मदद ली. भवन व अधोसंरचना निर्माण में लगभग 80 लाख रुपए, मुख्य आहार निर्माण मशीन में लगभग सवा करोड़ रुपए निजी ट्रांसफार्मर की स्थापना पर लगभग 12 लाख रुपए, रौ मेटेरियल पर लगभग 13 से 14 लाख रुपए, पैकिंग सामग्री पर लगभग 4 लाख रुपए, ट्रेड मार्क लेने पर लगभग 3 लाख रुपए और अन्य मदों पर राशि खर्च हुई.

उन्होंने आगे बताया कि आहार संयंत्र की स्थापना में पहले 2 साल बहुत ही मुश्किल हालात में बीते. राजस्थान और चीन से आहार संयंत्र की अत्याधुनिक मशीनें खरीदी गई थीं, किंतु राजस्थान से खरीदी मशीन बारबार बंद हो रही थी और उस के पार्ट्स व इंजीनियर को राजस्थान से बुलवाने में काफी समय लगता था. ऐसी स्थिति में 4 से 7 दिनों तक उत्पादन प्रभावित होता था. सुबह 9 बजे से लगातार रात 4 से 5 बजे तक मशीन का सुधार कार्य चलता था और इस काम में 3 से 4 दिन लग जाते थे. इस स्थिति से परेशान हो कर संबंधित कंपनी को मशीन वापस भेज कर उस से दूसरी मशीन रिप्लेस करवाई गई और काम शुरू किया गया.

मशीनरी ठीक होने के बाद जब अप्रैलमई, 2022 में उत्पादन प्रारंभ हुआ, तो मार्केटिंग की समस्या सामने आई और इस में एक वर्ष तक घाटे की स्थिति रही. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि संयंत्र को बंद करना पड़ सकता है, किंतु उन्होंने हार नहीं मानी और न ही उन की हिम्मत टूटी.

अपनी जिद और जुनून के दम पर उन्होंने मार्केटिंग के लिए अपनी इंडस्ट्री का ट्रेडमार्क लिया और देश के विभिन्न राज्यों में 15 डीलर नियुक्त किए, जिन के माध्यम से उन्हें व्यापार में सफलता मिलनी शुरू हुई.

मुख्य कार्यपालन अधिकारी जुनेद खान ने बताया कि मत्स्य आहार बनाने के लिए उन्होंने कोलकाता और नई दिल्ली के वैज्ञानिकों और डाक्टरों से रेसिपी प्राप्त की और आहार बनाना शुरू किया. मत्स्य आहार बनाने के लिए रौ मेटेरियल के रूप में सोयाबीन व सरसों की खली, गेहूं, मक्का, चावल, सूखी मछली, मछली का तेल, मेडिसन, मिनरल्स और अन्य सामग्री का उपयोग किया जा रहा है. उन के संयंत्र में मछलियों के साइज के हिसाब से आहार तैयार किया जाता है, जिस में 20 किलोग्राम और 35 किलोग्राम के पैकेट तैयार किए जाते हैं. 20 किलोग्राम की पैकिंग में 4 प्रकार के आहार बनाए जाते हैं, जिस में डस्ट में 40 फीसदी प्रोटीन व 6 फीसदी फेट, एक एमएम में 32 फीसदी प्रोटीन व 6 फीसदी फेट, 2 एमएम में 30 फीसदी प्रोटीन व 5 फीसदी फैट और 28 फीसदी प्रोटीन व 5 फीसदी फैट रहता है.

वहीं दूसरी ओर 35 किलोग्राम की पैकिंग में 3 एमएम में 28 फीसदी प्रोटीन व 5 फीसदी फैट, 4 व 6 एमएम में 28 फीसदी प्रोटीन व 5 फीसदी फैट, 4 एमएम में 26 फीसदी प्रोटीन व 5 फीसदी फैट, 4 एमएम में 24 फीसदी प्रोटीन व 5 फीसदी फैट और 4 एमएम में 20 फीसदी प्रोटीन व 5 फीसदी फैट रहता है.

इस पौष्टिक आहार से 6 माह में ही मछलियों का विकास एक से डेढ़ किलोग्राम तक होने पर वे बिकने को तैयार हो जाती हैं. इन के बिकने से कम समय में अधिक आय प्राप्त होती है और मत्स्यपालक लाभान्वित होते हैं, जबकि दूसरी कंपनियों के आहार में यह विकास 8 से 10 माह में होता है. बाजार मूल्य से 20 फीसदी कम मूल्य पर मत्स्य आहार उपलब्ध कराने पर हमारे संयंत्र से उत्पादित पौष्टिक आहार की मांग बढ़ती जा रही है.

उन्होंने आगे बताया कि मुख्य संयंत्र में प्रत्यक्ष रूप से 20 कर्मचारी काम कर रहे हैं, जिन्हें स्थायी रोजगार मिला है, जबकि अप्रत्यक्ष रूप से 15 डीलरों के पास 10-10 किसानों के अलावा 15 से 20 अन्य व्यक्ति रोजगार प्राप्त करते हैं और ट्रांसपोर्ट के काम में लगे 10 ट्रकों के 20-20 ड्राइवरों व कंडक्टरों को भी स्थायी रोजगार मिला है.

उन्होंने यह भी बताया कि उन के परिवार में पतिपत्नी के अलावा उन का एक 7 साल का बेटा व 3 साल की बेटी है. उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की तालीम हासिल की है, जबकि उन की पत्नी इलेक्ट्रिक इंजीनियर हैं.

अपने मत्स्य आहार संयंत्र को उन्होंने भारत का सब से बड़ा आहार निर्माण संयंत्र बनाने का संकल्प लेते हुए अपने लक्ष्य की पूर्ति की ओर वे निरंतर बढ़ रहे हैं.

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होने से उन्हें समाज में भी सम्मान मिला है. वह और अन्य उद्यमियों को इस योजना का लाभ लेने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं.

उन्होंने अपने पिता जमील खान, जिन्हें वे अपना गुरु मान कर उनके सिखाए रास्ते पर अपने उद्योग को चला रहे हैं, के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित किया है. साथ ही, इस योजना के अंतर्गत मत्स्य आहार संयंत्र चलाने में मार्गदर्शन और तकनीकी सहयोग प्रदान करने के लिए सहायक संचालक मत्स्योद्योग राजेंद्र सिंह, सहायक मत्स्योद्योग अधिकारी संजय अंबोलीकर और मत्स्य निरीक्षक अनिल राउत के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित किया है.

दुधारू पशु (Milch Animals) प्रदाय में अब गाय के साथ भैंस भी शामिल

रायसेन : राज्य शासन ने “मुख्यमंत्री दुधारू पशु प्रदाय कार्यक्रम’’ के रूप में लागू किया है. कार्यक्रम में अब हितग्राही की मंशा के अनुसार दुधारू गाय के अलावा भैंस भी प्रदाय की जा सकेगी. साथ ही, इस का लाभ अब विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा के साथ सहरिया और भारिया को भी मिलेगा. जनजातियों की कमजोर माली हालात को देखते हुए हितग्राही अंशदान की राशि 25 फीसदी से घटा कर 10 फीसदी कर दी गई है.

पशुपालकों को प्रति 2 दुधारू पशु गाय/भैंस दी जाएगी. कार्यक्रम में 90 फीसदी सकीय अनुदान और 10 फीसदी हितग्राही अंशदान होगा. खरीदे गए सभी पशुओं का बीमा होगा. मिल्क रूट और दुग्ध समितियों का गठन मध्य प्रदेश दुग्ध महासंघ और पशुपालन विभाग द्वारा किया जाएगा. गाय प्रदाय के लिए 1 लाख, 89 हजार 250 रुपए और भैंस के लिए 2 लाख, 43 हजार रुपए की राशि निर्धारित की गई है. गौ प्रदाय में 1 लाख, 70 हजार, 325 रुपए शासकीय अनुदान और बाकी 18 हजार, 925 रुपए हितग्राही अंशदान होगा. भैंस प्रदाय में 2 लाख, 18 हजार, 700 रुपए का शासकीय अनुदान और महज 24 हजार, 300 रुपए हितग्राही का अंशदान होगा.

कार्यक्रम का उद्देश्य दुग्ध उत्पादन और पशुओं की दुग्ध उत्पादक क्षमता में वृद्धि, रोजगार के नवीन अवसर द्वारा हितग्राहियों की आर्थिक स्थिति में सुधार और उच्च उत्पादक क्षमता के गायभैंस वंशीय पशुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना है.

हितग्राही को आवेदन निर्धारित प्रपत्र में अपने निकटतम पशु चिकित्सा संस्था या दुग्ध सहकारी समिति को देना होगा. चयनित हितग्राहियों को पशुपालन, पशु आहार और पशु प्रबंधन प्रशिक्षण के साथ परिचयात्मक दौरा भी करवाया जाएगा.

पशु चिकित्सा तकनीक पर कार्यशाला

हिसार : लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार के पशु चिकित्सा जनस्वास्थ्य एवं महामारी विज्ञान विभाग में क्रोमैटोग्राफी तकनीकों के प्रयोग द्वारा खाद्य एवं पर्यावरण संबंधी नमूनों में दूषित पदार्थों (संदुष्कों) की जांच विषय पर तीनदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डा. विनोद कुमार वर्मा के दिशा निर्देशन में किया गया.

इस कार्यशाला के समापन समारोह में डा. सज्जन सिहाग, अधिष्ठाता, डेयरी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए.

इस अवसर पर डा. सज्जन सिहाग ने कहा कि इस कार्यशाला में सभी प्रतिभागी निश्चित रूप से लाभान्वित हुए होंगे और इन क्रोमैटोग्राफी तकनीकों को अपनेअपने कार्यक्षेत्रों में प्रयोग करने के लिए सभी प्रतिभागियों को प्रेरित किया.

डा. सज्जन सिहाग ने इन क्रोमैटोग्राफी आधारित तकनीकों से संबंधित कार्यशालाओं को भविष्य में आयोजन करने और इन के प्रयोग द्वारा खाद्य व पशुओं के खाद्य पदार्थों में विभिन्न टौक्सिकनों की जांच के लिए तकनीकों के प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया.

सभी प्रतिभागियों को दिए गए मुख्य अतिथि द्वारा प्रमाणपत्र

प्रशिक्षण के सफल आयोजन के बारे में जानकारी देते हुए पशु चिकित्सा जनस्वास्थ्य एवं महामारी विज्ञान के विभागाध्यक्ष एवं निदेशक मानव संसाधन एवं प्रबंधन डा. राजेश खुराना ने बताया कि इस तीनदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न संस्थानों के 20 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया.

उन्होंने बताया कि भविष्य में भी क्रोमैटोग्राफी तकनीकों से संबंधित अन्य तरीकों एवं उन के उपयोग पर भी कार्यशालाओं एवं प्रशिक्षण का आयोजन किया जाएगा.

इस कार्यक्रम का संचालन विभाग के प्राध्यापक एवं प्रशिक्षक संयोजक डा. विजय जाधव द्वारा किया गया. डा. विजय जाधव ने प्रतिभागियों से इस कार्यशाला से हुए फायदे व भविष्य में इस को अधिक प्रभावी तरीके से आयोजन करने के लिए फीडबैक लिया.

इस अवसर पर विभाग के अन्य संकाय सदस्य डा. दिनेश मित्तल, डा. रेनू गुप्ता, डा. पल्लवी मुदगिल एवं डा. मनेश कुमार भी उपस्थित रहे. कार्य्रकम के अंत में धन्यवाद प्रस्ताव डा. विजय जाधव द्वारा प्रस्तुत किया गया.

दुग्ध उत्पादकों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता

जयपुर: पशुपालन, गोपालन एवं डेयरी मंत्री जोराराम कुमावत से पिछले दिनों भारतीय किसान संघ के प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात कर उन का आभार व्यक्त किया. जयपुर डेयरी के दुग्ध उत्पादक किसानों के 6 महीने से लंबित चल रहे बकाया अनुदान का भुगतान हो जाने पर प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने खुशी जाहिर करते हुए जोराराम कुमावत का धन्यवाद किया.

पशुपालन मंत्री जोराराम कुमावत ने बताया कि पिछले एक महीने में लगभग 80 फीसदी किसानों के बकाया अनुदान राशि का भुगतान हो चुका है, बाकी 20 फीसदी का भुगतान भी जल्दी ही हो जाएगा.

उन्होंने कहा कि प्रदेश में नवगठित सरकार की पहली प्राथमिकता राज्य की सभी सहकारी डेयरियों से जुड़े दुग्ध उत्पादकों का सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान है और इस के लिए नई कल्याणकारी योजनाएं अमल में लाई जाएंगी. ग्रास रूट लेवल तक दुग्ध उत्पादकों को सहकारी डेयरियों से जोड़ने के प्रयास किए जाएंगे और अधिक से अधिक संख्या में नई प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों का गठन किया जाएगा.

मंत्री जोराराम कुमावत ने कहा कि प्रदेश में दुग्ध उत्पादकों की सामाजिक सुरक्षा और उन के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी और वर्तमान में चल रही सुरक्षा योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा. उन्होंने जिला दुग्ध संघों के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों और डेयरी अधिकारियों में बेहतर समन्वय स्थापित किए जाने पर भी बल दिया.

उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि राजस्थान ने दुग्ध उत्पादन में देशभर में पहला स्थान प्राप्त कर लिया है. उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार दुग्ध उत्पादकों की समस्याओं का समाधान करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहेगी. प्रतिनिधिमंडल में जगदीश गुर्जर, मंजू, करण सिंह, चंद सिंह, वीरेंद्र, करण सिंह आदि सम्मिलित थे.

गरमियों में पशुओं की देखभाल (Animal Care)

इस सीजन में पशुओं के दूध देने की कूवत दूसरे मौसम की तुलना में काफी कम हो जाती है. इस वजह से पशुपालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है. गरमी बढ़ते ही पशुपालकों को चाहिए कि पशुओं के खानपान पर खासा ध्यान दें, जिस से दूध देने पर ज्यादा असर न पड़े, इसलिए इस मौसम में पशुओं की देखभाल करना काफी अहम माना जाता है.

पशु डाक्टरों का कहना है कि पशुओं को दिन में 3 से 4 बार पानी पिलाएं, लेकिन हर बार ताजा पानी ही दें. सुबहशाम पशुओं को नहलाना भी चाहिए, ताकि उन में ताजगी बनी रहे.

आमतौर पर देखा जाता?है कि इस मौसम में पशु अपना आहार कम कर देते हैं, इसलिए उन के खानपान पर खास ध्यान दें. इस के लिए उन्हें हरा चारा के साथसाथ मिनिरल्स मिला कर के दें, जिस से दूध देने की कूवत पर खास फर्क न पड़े.

इस सीजन में पशुओं में बीमारियां भी खूब फैलती?हैं. इन में प्रमुख रूप से गलाघोंटू है. इस बीमारी से पशुओं को बचाने के लिए पहले से टीका लगवा लेना बेहतर होता है.

उत्तर भारत में गरमी शुरू होते ही गरम हवा अपना असर दिखाने लगती है, जो आगे जा कर लू में बदल जाती?है. गरम मौसम में हवा के गरम थपेड़ों और बढ़े हुए तापमान से पशुओं में लू लगने का खतरा बढ़ जाता है. ज्यादा समय तक धूप में रहने पर पशुओं को सनस्ट्रोक बीमारी हो सकती है, इसलिए उन्हें किसी हवादार या छायादार जगह पर बांधें.

इस मौसम में पशुओं के नवजात बच्चों की देखभाल जरूर करें. अगर पशुपालक उन का ढंग से खयाल नहीं रखते हैं तो उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

समस्या और समाधान

* गरमी के मौसम में पशुओं की सांस लेने व छोड़ने की रफ्तार बढ़ जाती?है. वे हांफने लगते हैं और उन के मुंह से लार गिरने लगती है.

* पशुओं के शरीर में बाईकार्बोनेट आयनों की कमी हो जाती है और खून का पीएच मान बढ़ जाता है.

* त्वचा की ऊपरी सतह का रक्त प्रभाव बढ़ जाता है, जिस के चलते अंदरूनी ऊतकों पर भी असर हो जाता?है.

* दूध देने की कूवत में कमी आ जाती है.

* पशुओं में पानी पीने की जरूरत बढ़ जाती है.

आप अगर बताए गए तरीकों पर काम करें तो पशुओं को?ज्यादा परेशानी नहीं होगी. इस का फायदा यह होगा कि दूध देने की कूवत कम नहीं होगी. पशुओं को भी मौसम के मुताबिक रहने और खानेपाने का इंतजाम करना जरूरी होता है, वरना उस का उलटा असर होता है.

इन बातों का रखें ध्यान

*    पशुओं को दिन के समय सीधी धूप से बचाएं. साथ ही, उन्हें बाहर चराने न ले जाएं.

*    पशुओं को बांधने के लिए हमेशा छायादार और हवादार जगह चुनें.

*    पशुओं को हमेशा ताजा पानी पिलाएं.

*    पशुओं के पास भी पीने का साफ पानी रखें.

*    पशुओं को ज्यादा से ज्यादा हरा चारा खिलाएं.

*    पशुओं में असामान्य लक्षण नजर आते ही पशु डाक्टर से बात करें या उन्हें दिखा कर सही इलाज कराएं.

*    मुमकिन हो तो डेरी शेड में दिन के समय कूलर, पंखे वगैरह का इस्तेमाल करें.

*    पशुओं को संतुलित आहार दें, खासकर हरा चारा दें.

*    ज्यादा गरमी होने पर पशुओं के शरीर पर पानी का छिड़काव करें.

जब पशु खुजली से रहे परेशान

इनसानों में जैसे कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं, ठीक उसी तरह जानवरों में भी बीमारियां होती हैं. पशुपालक अगर समय रहते इलाज नहीं कराते तो उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ता है. अब जानवर तो आखिर जानवर ही होते हैं, वे आप की तरह अपनी बीमारी बता नहीं सकते, लेकिन जरा सी सावधानी से आप पशुओं की बीमारी को पकड़ सकते हैं.

अकसर आप ने गायभैंस, बैलबकरी आदि पशुओं को पेड़ या दीवारों से अपना शरीर खुजलाते हुए देखा होगा. दरअसल, यह एक रोग है, खुजली नहीं. लेकिन ज्यादातर पशुपालक इस पर ध्यान नहीं देते. आम बोलचाल की भाषा में इसे चर्म रोग कहते हैं, जो इनसानों के जैसे पशुओं में भी होता है.

चर्म रोग में पशुओं के बाल धीरेधीरे झड़ने लगते हैं और खुजली की जगह चमड़ी पूरी तरह सख्त हो जाती है. खुजली होने पर ज्यादातर पशु तनाव में चले जाते हैं.

यह बात आप को भले ही समझ में न आए, लेकिन खुजली और पशुओं के शरीर पर भिनभिनाने वाली मक्खियां, कीड़ेमकोड़े वगैरह पशुओं को इतनी परेशानी में डाल देते हैं कि वे जिस्मानी रूप से कमजोर हो जाते हैं. इस का सीधा असर उन की उत्पादन कूवत पर पड़ता है.

बीमारी तभी ज्यादा फैलती है जब मौसम बदलता है. पशु डाक्टर बताते हैं कि बदलते मौसम में पशुओं का खास खयाल रखना होता है क्योंकि उसी समय उन में त्वचा रोग होने की संभावना ज्यादा रहती है. जीवाणु समेत कई

तरह के कृमि पशुओं में त्वचा रोगों के लिए जिम्मेदार होते हैं, खासकर जीवाणु से होने वाले त्वचा रोगों में पशुओं के शरीर में मवाद पड़ जाता है.

पशुपालकों के सामने समस्या यह होती है कि आमतौर पर त्वचा रोग के लक्षण दिखने में लंबा समय लग जाता है, जिस का नतीजा होता है कि पशु तब तक गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं, इसलिए पशुओं पर ध्यान देना बहुत जरूरी है.

त्वचा रोग दिखने में बहुत साधारण होते हैं, लेकिन कई बार यह गंभीर बीमारी बन जाती है. दुधारू पशुओं में कई तरह के त्वचा रोग होते हैं. इन रोगों से पशुओं की त्वचा पूरी तरह से खराब भी हो जाती है.

पशुओं को सेहतमंद रखना है तो गरमियों व बरसात में उन के शरीर पर सब से ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है. गायभैंसों में त्वचा रोग सब से ज्यादा होता है. पशुओं को कई तरह के चर्म रोग (पैरासाइट्स, बैक्टीरिया, वायरस, एलर्जी, फंगस) होते हैं.

चर्म रोग में पशुओं का दूध तो नहीं घटता, लेकिन वे तनाव में जरूर आ जाते हैं. इस से उन के दूध देने की कूवत पर असर पड़ता है.

ध्यान दें कि आप के पशुबाड़े में ऐसी कोई चीज न रखें, जिस से उस के शरीर में कोई चोट लग जाए. इसलिए जहां पशु बांधे जाते हों, वहां साफसफाई बहुत जरूरी है. पशुओं के खानपान पर भी ध्यान देना बहुत जरूरी है क्योंकि विटामिन की कमी से चर्म रोग होता है.

अगर पशु को किसी भी तरह का चर्म रोग हो गया है तो पास के पशु अस्पताल में दिखा लें. इस रोग में चर्मिल प्लस ट्यूब का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

चर्म रोग के लक्षण

जीवाणुजनित रोग : इस रोग से पशुओं की प्रभावित जगह गरम हो जाती है और त्वचा लाल हो जाती है. वहां पर जख्म भी हो जाता है और मवाद निकलने लगता है.

कृमिजनित रोग : इस रोग की पहचान आसानी से की जा सकती है, क्योंकि खुजली की जगह पर बाल का झड़ जाना, कान की खुजली में पशु सिर हिलाता है, कान फैल जाता है और उस में भूरे काले रंग का वैक्स जमा हो जाता है. इस के उपचार के लिए पशु के कान को हलके गरम पानी में धोने वाला सोड़ा मिला कर उस की सफाई करनी चाहिए.

बाह्य त्वचा रोग : इस रोग के लिए कृमि जिम्मेदार होता है. यह रोग पशुओं के अलावा इनसानों में भी फैलता है. इस में त्वचा मोटी होने के अलावा बहुत खुजली होती है.

फफूंदजनित त्वचा रोग : इस में पशु की त्वचा, बाल और नाखून प्रभावित होते हैं.

विषाणुजनित त्वचा रोग : पशुओं की नाक और खुर की त्वचा मोटी हो जाती है और पेट में फुंसी हो जाती है.

ऐसे करें देखभाल

पशु खुजली

*    आप हमेशा पशुओं को स्वच्छ व साफ जगह रखें.

*    गरमियों के मौसम में प्रतिदिन नहलाना चाहिए.

*    आसपास की गंदगी (गोबर वगैरह) को नियमित रूप से साफ करें.

*    बारिश में सब से ज्यादा बीमारियां फैलती हैं, इसलिए पशुओं के इर्दगिर्द पानी जमा न होने दें.

*    मच्छर, मक्खी व कीड़ेमकोड़े दूर करने के लिए अच्छा इंतजाम करें.

*    3 महीने के अंतराल पर पशुओं को आंतरिक परजीवीनाशक दवा का सेवन कराना चाहिए.

*    सभी तरह के त्वचा रोगों में पशु को अच्छा खानपान, विटामिन व खनिज लवण देने चाहिए. साथ ही, लिवर टौनिक व बालों के लिए कंडीशनर का प्रयोग करना चाहिए.

आइसक्रीम की इकाई (Ice-Cream Unit) लगाएं मुनाफा कमाएं

यह बड़ी पुरानी कहावत है कि हमारे देश में दूध की नदियां बहती थीं यानी पहले भी दूध का उत्पादन बहुतायत में होता था. दूध व उस का इस्तेमाल हमारे जीवन में इस तरह रचाबसा था कि ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ व ‘दूध का कर्ज उतारने’ जैसे बहुत से मुहावरे रोजमर्रा की आम बोलचाल में बखूबी इस्तेमाल किए जाते हैं.

खानपान में बदलाव के बावजूद दूध आज भी ज्यादातर लोगों की सब से बड़ी जरूरत है इसलिए डेरी उद्योग में पैर जमाने, आगे बढ़ने व कमाने की बहुत गुंजाइश है. दूध जल्दी खराब होने वाली बड़ी नाजुक चीज है इसलिए इस के उत्पादन, भंडारण, रखरखाव व बिक्री में जल्दी, पुख्ता इंतजाम, बहुत साफसफाई और सूझबूझ की जरूरत होती है.

चाहे खेती हो या डेरी, ज्यादा कमाई के लिए किसानों को उद्यमी बनना होगा. दरअसल, ज्यादातर किसानों को उन के दूध की वाजिब कीमत नहीं मिलती. इसलिए दूध का बेहतर इस्तेमाल उस की चीजें बना कर बेचने से हो सकता है. मसलन, कुछ पशुपालक दूध से दही, मावा, पनीर, मक्खन व घी वगैरह चीजें बनाते रहे हैं, लेकिन ये तो सिर्फ 5 चीजें हैं, जबकि अमूल कोआपरेटिव दूध से छाछ, लस्सी, दही, चीज व आइसक्रीम वगैरह 50 चीजें बना कर बेच रही है.

जरूरत है नए नजरिए की. ग्राम नबीपुर, जिला शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील किसान ज्ञानेश तिवारी सुधरे तरीकों से अपनी डेरी में 400 लिटर दूध का उत्पादन कर के लाखों रुपए हर महीने कमा रहे हैं.

मसलन, अब आइसक्रीम की मांग तेजी से बढ़ रही है. इसलिए डेरी का काम करने वालों को ध्यान दे कर इस नए काम में अपना हाथ आजमाना चाहिए.

हर इलाके में किसी न किसी उपज की बहुतायत होती है. बाजार में उस उपज की भरमार रहने से उत्पादकों को वाजिब कीमत तो दूर कई बार लागत भी नहीं मिलती. केरल के नारियल उत्पादक भी इस समस्या से आजिज आ चुके थे. उन्होंने फूड प्रोसैसिंग को कमाई बढ़ाने का जरीया बनाया और ताजा नारियल की आइसक्रीम बना कर खुद इस मसले का हल खोजा.

आज केरल में टैंडर कोकोनट आइसक्रीम का कारोबार 100 करोड़ रुपए से भी ऊपर पहुंच चुका है इसलिए डेरी उद्यमी भी ऐसा कर सकते हैं.

पशुपालक अपनी डेरी के दूध से आइसक्रीम बना कर बेच सकते हैं. इस से उन की उत्पादन लागत दूसरों के मुकाबले कम हो सकती है. हालांकि पशुपालन व दूध उत्पादन सदियों से खेती के सहायक कामधंधों में शामिल व अहम रहा है, लेकिन पशु व उन के आहार की कीमत बढ़ने से डेरी उद्योग में भी लगातार बढ़ी है, इसलिए सिर्फ दूध निकाल कर बेचने से कहीं ज्यादा कमाई दूध से आइसक्रीम बना कर बेचने से की जा सकती है.

बढती मांग

आइसक्रीम की इकाई (Ice-Cream Unit)

चुसकी, मलाई बर्फ, कुलफी, सौफ्टी व आइसक्रीम वगैरह का चलन बहुत पुराना व ज्यादा है. देशभर में आइसक्रीम बनाने के बहुत से छोटेबड़े कारखाने चल रहे हैं. हालांकि आइसक्रीम की मांग अमूमन पूरे साल बनी रहती है, लेकिन गरमियों में आइसक्रीम की खपत व बिक्री बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. तरहतरह के स्वाद वाली रंगबिरंगी आइसक्रीम बच्चों से ले कर बड़ेबुजुर्गों व घरों से होटलों तक में खूब पसंद की जाती है. शादीब्याह व दावतों में शहरी व गंवई इलाकों तक में बड़े पैमाने पर आइसक्रीम की खपत होती है.

भारत में आइसक्रीम का बाजार तकरीबन 1800 करोड़ रुपए सालाना का है, जो हर साल 20 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है.

किसान चाहें तो कच्चा माल खरीद कर इस मैदान में उतर कर ज्यादा फायदा कमा सकते हैं, जरूरत है हिचक छोड़ कर पहल करने की.

बीते 80 सालों से आइसक्रीम बना रही अहमदाबाद की सब से पुरानी कंपनी वाडीलाल है. इस अकेली कंपनी की गुजरात में 35 फीसदी की हिस्सेदारी व पूरे देश के आइसक्रीम बाजार में 14 फीसदी की हिस्सेदारी है. यह कंपनी 150 किस्मों के फ्लेवर में 300 तरह के आइसक्रीम पैक तैयार करती है.

जानकारों के मुताबिक, अब आइसक्रीम के बाजार में इलाकाई कंपनियों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है. किसान आपस में मिल कर भी यह काम शुरू कर सकते हैं.

अमीर मुल्कों में प्रति आदमी आइसक्रीम की खपत 2 लिटर व भारत में उस से 10 गुना कम सिर्फ 200 ग्राम है. दूध से खुद आइसक्रीम बना कर बेचने का काम पशुपालकों के लिए खासा मुनाफे का सौदा हो सकता है. किसान चाहें तो जानकारी, ट्रेनिंग या तजरबा हासिल कर आइसक्रीम बनाने की इकाई लगा कर चला सकते हैं.

कमाई का अच्छा मौका

दूध से आइसक्रीम बनाने का काम शुरू कर के डेरी उद्यमी अपने बच्चों को घर बैठे फायदेमंद रोजगार मुहैया करा सकते हैं. यह काम करना कोई मुश्किल नहीं है. इस काम की सब से बड़ी खूबी यह है कि आइसक्रीम का बाजार बहुत बड़ा है. इसलिए दूध उत्पादक अपनी कूवत के मुताबिक इकाई लगा सकते हैं.

किसान आइसक्रीम बनाने की इकाई लगाने में सब से पहले यह फैसला करें कि यह काम उन्हें अकेले करना है या दूसरों के साथ मिल कर या साझेदारी फर्म, प्राइवेट लिमिटेड कंपनी या फिर अमूल की तरह कोआपरेटिव सोसायटी बना कर करना है. पशुपालक किसानों की अपनी संस्था अमूल बीते 25 सालों से कई तरह की आइसक्रीम बना कर देशभर में बेच रही है.

कारोबार के तयशुदा ढांचे के मुताबिक ही संबंधित रजिस्ट्रार के यहां फर्म, कंपनी या सोसायटी का रजिस्ट्रेशन कराया जाता है, उस के बाद बिक्री, व्यापार कर और एफएसएसएआई का लाइसैंस हासिल किया जाता है. ये सारे काम जिला उद्योग केंद्र की मदद से पूरे किए जा सकते हैं. इस के अलावा पूंजी, बिजली, पानी, कोल्ड स्टोर व वाहनों की जरूरत होती है.

अब बहुत तरह की आइसक्रीम बाजार में मिलती हैं, इसलिए दूध उत्पादक किसानों के साथसाथ फल उत्पादक किसान भी चाहें तो आइसक्रीम इकाई लगा कर अपनी उपज की ज्यादा कीमत पा सकते हैं.

मुंबई, दिल्ली, नोएडा, कानपुर, आगरा, लखनऊ, एर्णाकुलम आदि कई शहरों में आइसक्रीम पार्लर चला रही नेचुरल कंपनी की पहचान सब से अलग है, क्योंकि इस कंपनी की 18 किस्म की खास आइसक्रीम में ताजा फलों की भरमार रहती है.

कुदरती स्वाद के लिए मशहूर हो चुकी नेचुरल आइसक्रीम में शरीफा, चीकू, तरबूज, पपीता, अमरूद, ताजा नारियल, सीताफल, जामुन, स्ट्राबेरी, आम वगैरह कई चीजों का खूब इस्तेमाल किया जाता है इसलिए आइसक्रीम में अलग ही स्वाद होता है. खास बात यह भी है कि नेचुरल की पैक्ड आइसक्रीम को आसानी से कहीं भी लाया व ले जाया जा सकता है.

नई तकनीक से पैक की गई यह आइसक्रीम 6 घंटे तक नहीं पिघलती, क्योंकि नई पैकेजिंग तकनीक से अब नामुमकिन काम भी आसान हो गए हैं.

कच्चा माल व जरूरी चीजें

असल में आइसक्रीम दूध, क्रीम, वनीला, स्ट्राबेरी व दूसरी कई जायकेदार चीजों को मिला कर ठंडा कर के जमी हुई मिठाई की तरह होती है. इसे बनाने के लिए दूध, क्रीम, दूध पाउडर, चीनी, पानी, अंडे, क्रीम, रंग, मेवे, फलों के एसेंस, फ्लेवर टिकाऊ बनाने के लिए स्टैबलाइजर के तौर पर ग्वारगम या एथिल सैल्यूलोज आदि का इस्तेमाल किया जाता है ताकि उस के अंदर बर्फ के कण न जमें, वह चिकनी और आधी ठोस बनी रहे.

दूध में पानी व चीनी मिलाने के बाद उसे पाश्चुरीकृत करने के लिए 72 सैंटीग्रेड तापमान पर 30 मिनट तक गरम किया जाता है. इस के बाद उसे एकसमान करने के लिए लगातार घुमाया व चलाया जाता है ताकि सारा मिश्रण मिल जाए, उस में चिकनाई आ जाए व हवा भर जाए. इस के बाद उसे ठंडा किया जाता है. इस के बाद उस में जरूरत के मुताबिक वनीला या स्ट्राबेरी के एसेंस मिलाए जाते हैं.

यहां से शुरू होती है अलगअलग तरह के छोटेबड़े खांचों में भर कर 0 सैंटीग्रेड से नीचे तापमान में रख कर आइसक्रीम को जमाने की प्रक्रिया. बाद में आइसक्रीम को काजू, किशमिश, पिस्ता व बादाम आदि सूखे मेवों, चौकलेट की परत या चेरी डाल कर सजाने का काम किया जाता है.

आइसक्रीम जमाने के लिए कप, जार व फ्रीजर की जरूरत पड़ती है. अब ऐसी सभी सामग्री अपने देश में आसानी से मिल जाती है.

बाजार व बिक्री

आइसक्रीम की इकाई (Ice-Cream Unit)

याद रखें कि रोज नए फ्लेवर से आइसक्रीम का कलेवर बदल रहा है. नईनई आइसक्रीम खानपान व खुशियों का हिस्सा बन रही हैं.

आप का आजमाया हुआ नया व उम्दा नुसखा आइसक्रीम के बाजार में आप की अलग पहचान बना सकता है. साथ ही, आप की बिक्री तेजी से बढ़ सकती है, क्योंकि अब आइसक्रीम की औनलाइन डिलीवरी सीधे घरों तक हो रही है. जरूरत है बाजार में हो रहे बदलाव से फायदा उठाने की.

उत्पादक व उपभोक्ता अब औनलाइन मिल जाते हैं. इस सिस्टम से बीच के बिचौलिए कम हैं. इस से निर्माता का फायदा बढ़ता है. बाजार में ग्राहक बेशक राजा होता है, लेकिन उम्दा क्वालिटी व प्रचार भी काफी माने रखते हैं.

ध्यान रहे कि आइसक्रीम के बाजार में वही ज्यादा बिकेगा जो वाकई अच्छा होगा. अमीर मुल्कों से तरहतरह के गुर सीख कर आइसक्रीम की बिक्री बढ़ाने की राह में अभी बहुतकुछ करना बाकी है. मसलन, ब्रैड स्लाइस के बीच में आइसक्रीम की स्लाइस लगा कर बेचने की शुरुआत अभी तक अपने देश में नहीं हुई है, जबकि सिंगापुर वगैरह देशों में ऐसे कई तरीके सालों से बहुत कामयाब साबित हो रहे हैं, जिन्हें अपनाया जा सकता है.

आइसक्रीम बेचने के तरीकों में क्वालिटी जैसी बड़ी कंपनियां भी बरसों से एक ही कदमताल कर रही हैं. मसलन, आइसक्रीम के ज्यादातर पार्लर्स में 2 से 5 आइसक्रीम के बड़े पैक गत्ते के कटेफटे चोकोर डब्बों में रखे रहते हैं. स्कूप से कोन या कप में आइसक्रीम डाल कर देने का तरीका अब पुराना हो गया है.

सिंगापुर में आइसक्रीम को ट्रे में केक व मिठाई की तरह बेहद सुंदर ढंग से सजा कर रखा जाता है. उस के ऊपर इतनी उम्दा टौपिंग होती है कि देखते ही ग्राहक का मन उसे खानेखरीदने के लिए करने लगता है.

इस तरह पशुपालक किसान भी अगर बेहतर मार्केटिंग के नए व कारगर गुर सीख लें तो वे आइसक्रीम से जल्दी पैसे कमा कर खुशहाल हो सकते हैं. अमूल, इफको व पतंजली जैसी कई नामी कंपनियां इस बात का सुबूत हैं, जो बेहतर मार्केटिंग से बाजार में छा गईं व आज लाखोंकरोड़ों रुपए का कारोबार कर रहे हैं.

मशीनें यहां से लें

इच्छुक उद्यमी किसान पहले छोटे पैमाने पर आइसक्रीम बना सकते हैं. वाजिब दाम पर उम्दा क्वालिटी का माल दे कर बाजार में अपनी पैठ व अच्छी साख बना सकते हैं ताकि मशहूर हो सकें. फिर धीरेधीरे काम को आगे बढ़ाएं तो कामयाबी मिलनी तय है.

आइसक्रीम बनाने वाली आटोमैटिक मशीनों की जानकारी अलीबाबा डौट काम या इंडियामार्ट डाट कौम पर ली जा सकती है. इस के अलावा इन निर्माताओं से भी संपर्क किया जा सकता है:

मैं. केवीआर इंडस्ट्रीज , 6-33/1 निकट कूकरपल्ली बस स्टैंड, मूसापैट, हैदराबाद, पिन-500018. फोन : 0848606212

मै. शांति इंजीनियर्स, 11 अमेनियम स्ट्रीट, चौथा तल, बरावोराने रोड, बुर्रा बाजार, कोलकाता-700001, पश्चिम बंगाल.

आइसक्रीम जैसा फ्रोजन डेजर्ट

अमूल व मदर डेरी में दूध की चिकनाई से बनी आइसक्रीम असली होती है, लेकिन दूध की वसा के अलावा अब म्यूनीज, सोया क्रीम व पीनट बटर जैसी कई दूसरी किफायती चिकनाई भी खूब इस्तेमाल हो रही है. आइसक्रीम जैसी एक चीज फ्रोजन डेजर्ट भी बनने लगी है, जो सब्जियों की वसा से बनाई जाती है. इस की लागत भी बहुत कम है.

हमारे देश में अब फ्रोजन डेजर्ट का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है. जानकारों के मुताबिक, देश के आइसक्रीम बाजार में तकरीबन 40 फीसदी हिस्सेदारी फ्रोजन डेजर्ट की हो गई है.

ज्यादातर उपभोक्ता आइसक्रीम व फ्रोजन डेजर्ट के महीन अंतर को नहीं परख पाते और फ्रोजन डेजर्ट को भी आइसक्रीम समझ कर ही खा जाते हैं. इसी तरह अब दही से बनी आइसक्रीम फ्रोजन योगर्ट के नाम से बन कर बिक रही है.

ईस्मा : आइसक्रीम निर्माताओं की मददगार संस्था

हमारे देश में चल रहे आइसक्रीम उद्योग की सारी जानकारी मुहैया कराने के मकसद से अप्रैल, 2011 से इंडियन आइसक्रीम मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ‘ईस्मा’ काम कर रही है. यह संस्था अपने सदस्यों को सरकारी नीतियों, फूड सेफ्टी की हिदायतों, उन के पालन, इंटरनैशनल बिजनैस, इंटरनैशनल स्टैंडर्ड समेत ट्रेनिंग वगैरह की सहूलियतें मुहैया कराती है.

‘ईस्मा’ आपसी सलाहमशवरे से चुनौतियों का मुकाबला करने, कारोबार बढ़ाने के उपाय खोजने, रणनीति व माहिरों के तजरबों का फायदा दिलाने का काम भी करती है, इसलिए आइसक्रीम बनाने वालों को इस संगठन का सदस्य बनना बहुत फायदेमंद रहता है.

इच्छुक उद्यमी निदेशक, इंडियन आइसक्रीम मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन यानी ‘ईस्मा’ ए-801, 8वां तल, टाइम स्क्वायर बिल्डिंग, सीजी रोड, नवरंगपुरा, अहमदाबाद 380009, फोन 7383354764 से संपर्क कर सकते हैं.

कैसा हो पशु आहार(Animal Feed)? हकृवि में प्रशिक्षण

हिसार: चैधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के विस्तार शिक्षा निदेशालय के अंतर्गत चल रहे फार्मर फस्र्ट प्रोग्राम के तहत किसानों के लिए ‘‘पशुओं के आहार में खनिज मिश्रण की उपयोगिता’’ विषय पर एकदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम में हिसार जिले के गांव पायल व चिड़ोद के किसानों ने भाग लिया.

फार्मर फस्र्ट प्रोग्राम के प्रमुख अन्वेषक डा. अशोक गोदारा ने बताया कि इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पशुपालकों को पशुओं को स्वस्थ बनाए रखने व दूध उत्पादन बढ़ाने की जानकारी देना है, ताकि किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सकें. फार्मर फस्र्ट प्रोग्राम (एफएफपी) के तहत उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के अलावा किसानवैज्ञानिक इंटरफेस को बढ़ा कर छोटे किसानों की कृषि और अधिकांश किसानों की जटिल, विविध और जोखिम वाली वास्तविकताओं को महत्त्व देने के लिए आईसीएआर की एक पहल है.

उन्होंने बताया कि इस प्रोग्राम के अंतर्गत कृषि में संसाधन प्रबंधन, जलवायु लचीली कृषि, भंडारण, बाजार, आपूर्ति श्रंखला, मूल्य श्रंखला, नवाचार, सूचना प्रणाली आदि सहित उत्पादन प्रबंधन पर विशेष जोर दिया जाता है.

कार्यक्रम में पशु पोषण वैज्ञानिक डा. सज्जन सिहाग ने पशुओं को उन की अवस्था के अनुसार संतुलित आहार, जिस में हरा चारा, सूखा चारा, चोकर व मिनरल मिक्सचर खिलाने की सलाह दी.

उन्होंने कहा कि पशु के अंदर खनिज मिश्रण की कमी के कारण पशु जकड़न व नया दूध नहीं होता, पशु मूत्र पीते हैं, दीवार चाटते हैं, कपड़ा, गाभा व मिट्टी खाते हैं. इसलिए पशुओं को खनिज मिश्रण पूरे साल रोज देते रहें. इस से पशु को बहुत ही फायदा होगा.

चारा अनुभाग के सस्य वैज्ञानिक डा. सतपाल ने हरा चारा उत्पादन व पशुओं के अच्छे स्वास्थ्य के लिए सालभर हरा चारा उपलब्ध करवाने के लिए फसल चक्रों के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि कम खर्च पर अधिक दूध उत्पादन के लिए जरूरी है कि पशुओं को पौष्टिक व संतुलित मात्रा में हरा चारा पूरे साल मिलता रहे. साल के कुछ माह में जैसे अक्तूबरनवंबर व मईजून में हरे चारे की कमी आ जाने के कारण हम पशुओं को हरा चारा पूरी मात्रा में नहीे दे पाते हैं, जिस के फलस्वरूप पशुओं की सेहत खराब हो जाती है और दूध उत्पादन में कमी आ जाती है.

उन्होंने बताया कि मईजून माह में हरे चारे की कमी न हो, इस के लिए पशुपालक मार्च माह में ही ज्वार, मक्का, लोबिया आदि फसलों की बिजाई कर सकते हैं. मार्च माह में अनेक कटाई देने वाली ज्वार की किस्म जैसे एसएसजी 59-3 व सीएसवी 33 एमएफ (अनंत) व सीएसएच 24 एमएफ की बिजाई कर सकते हैं, जिस से 4 से 5 कटाई में नवंबर माह तक हरा चारा मिलता रहेगा.

कार्यक्रम के अंत में पशुपालकों को पशु स्वास्थ्य सुधार के लिए मिनरल मिक्सचर के 5-5 किलोग्राम के पैकेट महत्त्वपूर्ण इनपुट के तौर पर निःशुल्क वितरित किए गए. इस अवसर पर पौध रोग विशेषज्ञ डा. एचएस सहारण व एसआरएफ डा. बिट्टू राम भी मौजूद रहे.