पशुओं में थनैला रोग और उस की रोकथाम

दुधारू पशुओं में अकसर थनैला रोग हो जाता है. इस वजह से किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है. समय पर उचित उपाय अपना कर इस रोग से छुटकारा पाया जा सकता है. पशु डाक्टर की देखरेख में ही उपचार करेंगे, तो आप का पशु भी सेहतमंद रहेगा.

वैसे, थनैला रोग का मतलब दूध देने वाले पशु के अयन यानी थन की सूजन और दूध की मात्रा के रासायनिक संघटन में अंतर आना होता है. अयन में सूजन, अयन का गरम होना और अयन का रंग हलका लाल होना इस रोग की खास पहचान है.

थनैला रोग विश्व के सभी भागों में पाया जाता है. इस से दुग्ध उत्पादन कम होता है और  दुग्ध उद्योग को भारी माली नुकसान उठाना पड़ता है. थनैला रोग जीवाणुओं, विषाणुओं और प्रोटोजोआ आदि के संक्रमण से होता है. संक्रमण के दौरान कई कारक खुद ही दूध में आ जाते हैं.

अगर इस का दूध इनसान इस्तेमाल करे, तो उसे भी कई रोग हो सकते हैं. इस वजह से यह रोग और भी खतरनाक हो जाता है. बीमार पशु के दूध को अगर उस का बच्चा सेवन करता है, तो वह भी बीमार हो सकता है.

आमतौर पर यह रोग छुआछूत और दूसरी कई वजहों से होता है, पर कई जीवाणुओं व विषाणुओं से होने पर दूसरे पशुओं में भी फैल सकता है. कई बार थन पर छाले पड़ जाते हैं, उस समय दूध निकालने पर थन पर घाव हो जाता है और हालत ज्यादा बिगड़ जाती है.

उपचार व रोकथाम

* बीमार पशु के अयन और थन की सफाई रखनी चाहिए.

* बीमारी की जांच शुरुआती समय में ही करवा लेनी चाहिए.

* थन या अयन के ऊपर किसी भी तरह के गरम तेल, घी या पानी की मालिश नहीं करनी चाहिए.

* दूध निकालने से पहले और बाद में किसी एंटीसैप्टिक लोशन से थन व अयन की धुलाई करनी चाहिए.

* डेरी में यदि ज्यादा पशु हैं, तो समयसमय पर थनैला रोग के परीक्षण का काम स्थानीय पशु डाक्टर की सलाह से जरूर करें.

* ज्यादा दूध देने वाले पशुओं को थनैला रोग का टीका भी लगवाना चाहिए.

* दूध निकालते समय थन पर दूध की मालिश नहीं करनी चाहिए. उस की जगह घी या तेल वगैरह का इस्तेमाल करना चाहिए.

* पशु में रोग होने पर तत्काल निकट के पशु डाक्टर से संपर्क कर उचित सलाह व दवा लें.

दूध देने वाले पशु से संबंधित सावधानियां

* दूध देने वाला पशु पूरी तरह से सेहतमंद होना चाहिए. टीबी, थनैला वगैरह रोग नहीं होने चाहिए. पशु की जांच समयसमय पर पशु डाक्टर से कराते रहना चाहिए.

* दूध दुहने से पहले पशु के शरीर की अच्छी तरह सफाई कर देनी चाहिए. दुहाई से पहले पशु के शरीर पर चिपका  गोबर, धूल, कीचड़, घास आदि साफ कर लेनी चाहिए, खासतौर से पशु के शरीर के पिछले हिस्से, पेट, अयन, पूंछ व पेट के निचले हिस्से की खासतौर पर सफाई करनी चाहिए.

* दूध दुहने से पहले अयन की सफाई पर खास ध्यान देना चाहिए. अयन व थनों को किसी जीवाणुनाशक घोल से धोया जाए और घोल के भीगे हुए कपड़े से पोंछ लिया जाए तो ज्यादा अच्छा होगा.

* अगर किसी थन में कोई रोग हो, तो दूध निकाल कर फेंक देना चाहिए.

* दूध दुहने से पहले हर थन की 2-4 दूध की धार जमीन पर गिरा देनी चाहिए या अलग बरतन में निकाल लेना चाहिए.

दूध देने वाले पशु के बंधने की जगह से संबंधित सावधानियां

* पशु बांधने व खड़े होने की जगह खुली होनी चाहिए.

* फर्श अगर मुमकिन हो तो पक्का होना चाहिए. अगर नहीं है, तो कच्चा फर्श भी समतल होना चाहिए. फर्श में गड्ढे वगैरह न हों. मूत्र व पानी निकालने का उचित इंतजाम होना चाहिए.

* दूध दुहने से पहले पशु के चारों ओर सफाई कर देनी चाहिए. अगर बिछावन है, तो दुहाई से पहले उसे हटा देना चाहिए.

* दूध निकालने वाली जगह की दीवारें, छत आदि साफ होनी चाहिए. उन की चूने की पुताई करवा लेनी चाहिए और फर्श की फिनाइल से धुलाई 2 घंटे पहले कर लेनी चाहिए.

दूध के बरतन से संबंधित सावधानियां

* दूध दुहने का बरतन साफ होना चाहिए. उस की सफाई पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए. दूध के बरतन को पहले ठंडे पानी से, फिर सोडा या अन्य जीवाणुनाशक रसायन से मिले गरम पानी से, फिर सादा खौलते हुए पानी से धो कर धूप में या चूल्हे के ऊपर उलटा रख कर सुखा लेना चाहिए.

* साफ किए हुए बरतन पर मच्छरमक्खियों को नहीं बैठने देना चाहिए. यह भी ध्यान रहे कि बरतन को कुत्ता, बिल्ली वगैरह चाट न सकें.

* दूध दुहने वाले बरतन का मुंह चौड़ा व सीधा आसमान में खुलने वाला नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस से मिट्टी, धूल, गोबर आदि के कण व घासफूस के तिनके, बाल आदि सीधे दुहाई के समय बरतन में गिर जाएंगे. इसलिए बरतन संकरे मुंह वाला हो और टेढ़ा होना चाहिए.

* बरतन पर जोड़ व कोने कम होने चाहिए.

बकरियों में पीपीआर बीमारी के लक्षण व बचाव

बकरियां बीमार पड़ने पर खानापीना छोड़ देती हैं और आंख बंद कर किसी कोने में खड़ी हो कर हांफती नजर आती हैं.

पीपीआर बीमारी में बकरियों के शरीर का तापमान 105 से 106 डिगरी फारेनहाइट तक हो जाता है. नाक बहने लगती है. साथ ही, बदबूदार दस्त भी शुरू हो जाते हैं.

बकरी की आंखों के अंदर की तरफ और मसूड़ों में घाव हो जाता है, जिस से बकरियों का खानापीना प्रभावित होता है. यहां तक कि गर्भवती बकरियों का गर्भपात तक हो जाता है.

बचाव के उपाय

* जैसे कोरोना से बचाव के लिए एकदूसरे से लोग दूरी बना लेते हैं, उसी प्रकार बकरियों को भी उन के झुण्ड में से बीमार बकरी को अलग कर देना चाहिए, जिस से कि यह बीमारी स्वस्थ बकरियों में न फैल सके.

* बीमार बकरियों को रहने व खानेपीने की व्यवस्था अलग से करनी चाहिए.

* वैसे तो इस बीमारी का इलाज नहीं है, फिर भी बकरियों में हर साल इस बीमारी का टीकाकरण कराना चाहिए.

* बीमार बकरियों को एनरोसिन एंटीबायोटिक 3 से 5 दिन तक देने से मृत्युदर कम हो जाती है. बीमार बकरियों को हलका चारा और दलिया आदि देना चाहिए.

अधिक जानकारी हासिल करने के लिए नजदीक के पशु चिकित्सक से मिल कर संभव हो तो बकरियों का इलाज करवाएं.

अजोला है पौष्टिकता से भरपूर जलीय चारा

हमारे देश की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का महत्त्वपूर्ण स्थान है. हमारे यहां जोत का आकार दिनप्रतिदिन छोटा होता जा रहा है और किसान चाह कर भी हरे चारे की खेती करने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं. यही वजह है कि देश में हरे चारे की उपलब्धता बहुत कम होती जा रही है.

झांसी स्थित भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान के एक अनुमान के मुताबिक, साल 2025 में हरे चारे की आवश्यकता 1,170 मिलियन टन होगी, जबकि उपलब्धता महज 411 मिलियन टन तक ही होगी. इस प्रकार हरे चारे की उपलब्धता तकरीबन 65 फीसदी कम रहेगी. इसी कमी को पूरा करने के लिए हमें हरे चारे के वैकल्पिक स्रोत तलाशने होंगे, ताकि उन की सहायता से पशुओं को कुछ मात्रा में हरा चारा उपलब्ध कराया जा सके.

पशुओं के लिए वैकल्पिक हरे चारे के रूप में अजोला का नाम सब से ऊपर आता है. अजोला उगाने के लिए हरे चारे की फसलों को उगाने की तरह उपजाऊ भूमि की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है. इसे किसी भी प्रकार की भूमि में गड्ढा खोद कर और उस में पानी भर कर जलीय चारे के रूप में उगाया जा सकता है. रेतीली जमीन में भी गड्ढे में प्लास्टिक की शीट बिछा कर पानी भर कर अजोला को उगाया जा सकता है.

अजोला वास्तव में समशीतोष्ण जलवायु में पाया जाने वाला एक जलीय फर्न है. वैसे तो इस की कई प्रजातियां होती हैं, मगर इन में अजोला पिन्नाटा सब से प्रमुख है.

अजोला हरे चारे की आवश्यकता को पूरी तरह तो प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है, मगर अपने पोषक गुणों के कारण यह पशुओं के लिए हरे चारे में एक उत्तम विकल्प के रूप में जाना जाता है. अजोला गाय, भैंस, मुरगियों व बकरियों के लिए आदर्श चारा है.

अजोला खिलाने से दुधारू पशुओं के दूध उत्पादन में बढ़ोतरी होती है. जो मुरगी सामान्य रूप से साल में 150 अंडे देती है, अजोला आहार में देने से वह साल में 180-190 अंडे तक दे सकती है. इतना ही नहीं, मछली उत्पादन में भी अजोला लाभकारी साबित हुआ है.

अजोला पोषक तत्त्वों से भरपूर होने के साथसाथ कम लागत में बेहतर परिणाम देने में सक्षम है. इसे उगाने के लिए अलग से जमीन की भी आवश्यकता नहीं होती. इसे सीमेंट की क्यारियों में भी तैयार किया जा सकता है. गुणवत्ता, पाचनशीलता और प्रचुर मात्रा में प्रोटीन का स्रोत होने के कारण अजोला किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.

अजोला की पत्तियों में एनाबीना नामक साइनोबैक्टीरिया होता है, जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद करता है, इसीलिए धान के खेतों में रोपनी के एक सप्ताह बाद अजोला की खेती करने पर धान की भरपूर पैदावार हासिल होती है. अजोला पशुपालन से ले कर फसल उत्पादन बढ़ाने तक किसानों के लिए बड़ा लाभकारी हो सकता है.

अजोला की प्रमुख प्रजातियां

* अजोला माइक्रोफिला

* अजोला पिन्नाटा

* अजोला फिलिक्लोइड्स

* अजोला रुबरा

* अजोला कैरोलिनियाना

अजोला उगाने का तरीका

सब से पहले एक छोटी ट्रे में अजोला का प्योर कल्चर तैयार करते हैं. फिर 2 मीटर 3 2 मीटर 3 30 सैंटीमीटर का एक गड्ढा खोद कर इस में प्लास्टिक शीट बिछा देते हैं, ताकि पानी मिट्टी में अवशोषित न हो सके. इस के बाद गड्ढे में 10-12 किलोग्राम मिट्टी भर देते हैं. फिर इस में 10 लिटर पानी + 2 किलोग्राम गाय का गोबर + 30 ग्राम सुपर फास्फेट का मिश्रण डालते हैं. अब इस में 0.5 से 1 किलोग्राम शुद्ध अजोला कल्चर समान रूप से फैला देते हैं.

अजोला बहुत तेजी से फैलता है और 8-10 दिनों में गड्ढे को पूरा ढक देता है. जब गड्ढा पूरा ढक जाए तो उस में से प्रतिदिन 1 से 1.5 किलोग्राम अजोला निकाला जा सकता है.

अजोला को बांस की छलनी की सहायता से क्यारी से निकाल लेते हैं और 3-4 बार साफ पानी से धो कर ही पशु को चारे के साथ मिला कर नियमित रूप से खिलाते हैं.

बेहतर उत्पादन के लिए हर 5वें दिन तालाब में 20 ग्राम सुपर फास्फेट+1 किलोग्राम गोबर का मिश्रण डालते हैं. इस प्रकार एक वर्ग फुट तालाब से प्रतिदिन 200 से 250 ग्राम अजोला का उत्पादन सफलतापूर्वक किया जा सकता है.

अजोला उत्पादन के लिए 25 डिगरी सैल्सियस से ऊपर का तापमान, पानी का पीएच मान 5.5-7 व आंशिक धूप इष्टतम स्थिति कहलाती है. सीधी धूप शैवाल के बनने में सहायक हो कर अजोला फर्न के उत्पादन में बाधक हो सकती है, इसलिए अजोला की क्यारियों के ऊपर थोड़ी छाया कर देते हैं.

अजोला कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन व लाभकारी फाईटोकैमिकल्स का अच्छा स्रोत होने के कारण पशुओं के शारीरिक विकास के लिए अच्छा है. गायों को चारे के साथ अजोला देने से उन के दूध उत्पादन में 15 फीसदी तक की वृद्धि देखी गई है.

नवंबर महीने से जुड़े  खेतीकिसानी के काम

रबी के सीजन में ली जाने वाली फसलों के नजरिए से नवंबर का महीना सब से अहम होता है. यह महीना गेहूं, जौ, तिलहन, दलहन, सब्जी के साथ ही बागबानी और फूलों की खेती के लिए सब से खास माना गया है. ऐसे में इस महीने में किसानों को खेतीकिसानी को ले कर खासा सतर्क रहने की जरूरत होती है, क्योंकि थोड़ी सी लापरवाही नुकसानदायक हो सकती है. लिहाजा, नवंबर महीने में किसान खेतीकिसानी से जुड़े कामों को समय से निबटाएं.

जिन किसानों ने काला नमक धान की किरण केएन-2, केएन-3 और किरन, बौना काला नमक 101 या 102 के अलावा पारंपरिक देशी प्रजाति लगा रखी है, वे इस महीने के पहले हफ्ते तक फसल की अंतिम सिंचाई कर दें, क्योंकि इस समय बारिश न होने से खेतों में नमी नहीं होती है.

इस के अलावा नवंबर महीने में धान की ज्यादातर प्रजातियों की कटाई और मड़ाई किसान पूरी कर चुके होते हैं. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि मड़ाई के बाद तैयार फसल का उचित तरीके से भंडारण किया जाए. इस के लिए किसान नई बोरियों का इस्तेमाल करें.

किसान यह तय करें कि अगर धान की कटाई हो चुकी है और गेहूं की फसल लेने के लिए खेत में जरूरी नमी नहीं है, तो नवंबर महीने के पहले हफ्ते में हलकी सिंचाई कर दें, जिस से गेहूं की बोआई के समय खेत में पूरी नमी मुहैया हो.

यह भी तय करें कि खेत में जरूरी नमी के रहते खेत की अच्छी तरह से जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरा बना कर खेत में पाटा लगा दिया जाए. इस से खेत की नमी बनी रहने में मदद मिलती है.

गेहूं की बोआई का सब से अच्छा समय 15 से 30 नवंबर तक का होता है. कोशिश करें कि इस बीच गेहूं की बोआई हर हालत में पूरी कर ली जाए. गेहूं बीज की खरीदारी लाइसैंसशुदा दुकानों से ही करें और प्रमाणित बीज ही खरीदें. खेतों में बीज डालने के पहले बीज शोधन करना न भूलें.

हाल ही में गेहूं की कई किस्में विकसित की गई हैं, जैसे एचडी 3298, डीडब्लू 187,  डीडब्लू 3030, डब्लूएच 1270, सीजी 1029, एचआई 1634, डीडीडब्लू 48, एचआई 1633, एनआईडीडब्लू 1149 आदि. किसान इन की बोआई कर सकते हैं. ये सभी प्रजातियां क्षेत्र विशेष को ध्यान में रख कर विकसित की गई हैं. ऐसे में अपने क्षेत्र के मुताबिक प्रजातियों को चुनें.

इस के अलावा गेहूं की उन्नत प्रजातियों में के 9107, एचपी 1731, के 9006, एनडब्लू 1012, यूपी 2382, एचपी 1761, एचयूडब्लू 468, एचडी 2733, एचडी 2834, पीबीडब्लू 343, पीबीडब्लू 443, यूपी 2338, के 0307, पीबीडब्लू 502, सीबीडब्लू 38, राज 4120, डीबीडब्लू 39, एनडब्लू 5054 वगैरह की बोआई कर सकते हैं.

अगर खेत की मिट्टी ऊसर है, तो केआरएल 19, लोक 1, एनडब्लू 1067, एनडब्लू 1076, केआरएल 210 और 213, केआरएल 14, राज 3077, के 8434 की बोआई करें.

गेहूं में कम लागत से ज्यादा से ज्यादा उत्पादन के लिए सीड ड्रिल से बोआई करना सही होता है. इस से बीज और उर्वरक की मात्रा भी कम लगती है. सीड ड्रिल से बोआई करने पर प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

किसान गेहूं की बोआई के समय प्रति हेक्टेयर की दर से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फेट व 40 किलोग्राम पोटाश का इस्तेमाल करें. अगर खेत में हरी खाद का इस्तेमाल किया गया है, तो केवल 40 किलोग्राम नाइट्रोजन बहुत है.

अगर आप ने मिट्टी की जांच कराई है और अगर उस में जस्ते की कमी पाई गई है, तो तो प्रति हेक्टेयर 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट को गेहूं की बोआई के पहले अंतिम जुताई के समय खेत में मिला दें.

जिन किसानों ने अगेती फसल के रूप में गेहूं की बोआई कर दी है, वे यह तय करें कि बोआई के 20-25 दिन बाद फसल की सिंचाई कर दें, साथ ही सिंचाई के 3-4 दिन बाद 40-60 किलोग्राम नाइट्रोजन की टौप ड्रैसिंग कर दें.

जौ की बोआई के लिए सब से सही समय 15 से 30 नवंबर तक का होता है. जौ के लिए प्रमाणित व उपचारित बीज का ही इस्तेमाल करें. इस के लिए प्रति हेक्टेयर खेत के लिए 15 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. जौ की बोआई के समय प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फास्फेट व 20 किलोग्राम पोटाश की जरूरत पड़ती है.

जौ की उन्नत किस्मों में ज्योति (के. 572/10), आजाद (के.125), के.141, हरीतिमा (के. 560), प्रीती (के. 409), जागृति (के. 287), एनडीबी 1445 (नरेंद्र जौ-7), लखन (के. 226), मंजुला (के. 329), आरएस 6, नरेंद्र जौ 192 (एनडीबी 209), नरेंद्र जौ 2 (एनडीबी 940), नरेंद्र जौ 3 (एनडीबी 1020), आरडी 2552, के. 603, एनडीबी 1173, के.1149 गीतांजली, नरेंद्र जौ 5 (एनडीबी 943) व उपासना शामिल हैं.

माल्ट के लिए नई प्रजाति डीडब्लू, आरबी 91 के अलावा प्रचलित प्रजातियों में प्रगति (के. 508), ऋतंभरा (के. 551), डीडब्लूआर 28, डीएल 88, रेखा (बीसीयू 73) का बोआई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

जिन किसानों को सरसों व लाही की बोआई किए 15-20 दिन बीत गए हों, वे फसल के घने होने की दशा में अतिरिक्त पौधों को खेत से निकाल कर विरलीकरण कर लें, क्योंकि फसल के घने होने की दशा में फसल का उत्पादन 20-30 फीसदी कम हो सकता है.

पौधों का विरलीकरण करते समय यह ध्यान दें कि पौध से पौध की दूरी 10-15 सैंटीमीटर हो, तो ज्यादा अच्छा होता है. फसल बोआई के 30 दिन बाद हलकी सिंचाई करना न भूलें. इस के बाद लाही के लिए 75 किलोग्राम नाइट्रोजन की टौप ड्रैसिंग करें.

सरसों को आरा मक्खी व माहू कीट से बचाने के लिए इमिडा क्लोरोप्रिड 17.8 फीसदी 300 मिलीलिटर मात्रा को 600 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें.

सरसों के पौधों को सफेद गेरुई व ?ालसा बीमारियों से बचाने के लिए प्रोपिकोनाजोल 25 फीसदी ईसी की 500 मिलीलिटर मात्रा को 600-800 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

इस महीने के दौरान तोरिया की फलियों में दाना भरता है. ऐसे में खेत में भरपूर नमी होनी चाहिए. नमी कम लगे तो तुरंत खेत की सिंचाई करें, ताकि फसल बढि़या हो.

नवंबर महीने में अरहर की फलियां पकने लगती हैं. अगर 75 फीसदी फलियां पक गई हों, तो कटाई का काम करें. अरहर की देरी से पकने वाली किस्मों पर अगर फलीछेदक कीट का हमला दिखाई दे, तो स्पाइनोसेड 5 फीसदी एससी की 750 मिलीलिटर मात्रा को 500 लिटर पानी में घोल कर छिड़कें. इस से फलीछेदक की रोकथाम हो सकेगी.

जिन किसानों ने चने की बोआई अक्तूबर के दूसरे या तीसरे हफ्ते तक कर दी थी, वे फसल की निराईगुड़ाई तय करें. इस के अलावा सिंचित क्षेत्रों में नवंबर के दूसरे हफ्ते तक चने की बोआई की जा सकती है.

किसानों ने अगर मटर की समय से बोआई कर दी है, तो फसल की निराई कर लें. बोआई के 40-45 दिन बाद पहली सिंचाई करें.

जो किसान मसूर की खेती करना चाहते हैं, वे 15 नवंबर तक ऐसा जरूर कर लें. मसूर की उन्नत प्रजातियों में शेखर 2, शेखर 3, पंत मसूर 4, पंत मसूर 5  या नरेंद्र मसूर 1 पीएल 2, वीएल मसूर 129, वीएल 133, वीएल 154, वीएल 125, पंत मसूर (पीएल 063), केएलबी 303, पूसा वैभव (एल 4147), आवीएल 31 और आपीएल 316 प्रमुख हैं. मसूर के एक हेक्टेयर खेत में 40 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. किसान प्रमाणित और शोधित बीज का ही इस्तेमाल करें.

कुसुम की खेती करने वाले किसान इस की बोआई मध्य नवंबर तक जरूर कर लें. कुसुम की सब से अच्छी प्रजाति के. 65 है, जो 180 से 190 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. इस में तेल की मात्रा 30 से 35 फीसदी पाई जाती है और औसत उपज 14 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. वहीं दूसरी प्रजाति मालवीय कुसुम 305 है, जो 160 दिन में पकती है. इस में तेल की मात्रा 36 प्रतिशत है. कुसुम के एक हेक्टेयर खेत के लिए 18-20 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

शीतकालीन मक्का की बोआई के लिए मध्य नवंबर का समय सब से मुफीद होता है. ऐसे में हर हाल में बोआई कर के बोआई के समय ही प्रति हेक्टेयर 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फेट, 40 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट भूमि में जरूर मिलाएं.

जो किसान अक्तूबर के महीने में आलू की बोआई नहीं कर पाए हैं, वे हर हाल में इस महीने के दूसरे हफ्ते तक बोआई खत्म कर लें. आलू की उन्नत प्रजातियों में कुफरी बहार, कुफरी बादशाह, कुफरी अशोका, कुफरी सतलज, कुफरी आनंद, लाल छिलके वाली कुफरी सिंदूरी और कुफरी लालिमा मुख्य हैं. प्रसंस्करण के लिए आलू की कुफरी चिप्सोना 1 और चिप्सोना 2 उपयुक्त प्रजातियां मानी गई हैं.

किचन गार्डन में फ्रैंचबीन, पालक, मेथी, धनिया, मूली की बोआई नवंबर महीने में की जा सकती है.

जो किसान वसंतग्रीष्म ऋतु में टमाटर की फसल लेना चाहते हैं, वे पौधशाला में नर्सरी तैयार करने के लिए बीज की बोआई कर दें. टमाटर की उन्नत प्रजातियों में पूसा रूबी, पंजाब छुहारा, पंत बहार उन्नत और पूसा हाईब्रिड 2, अविनाश 2, नवीन, रूपाली व रश्मि संकर किस्में अच्छी मानी गई हैं.

लहसुन की खेती करने वाले किसान अगर अभी तक लहसुन की बोआई न कर पाए हों, तो नवंबर महीने तक बोआई पूरी कर लें. उन्नत किस्मों में एग्रीफाउंड पार्वती (जी 313), टी 56-4. गोदावरी (सैलेक्शन 2), एग्रीफाउंड ह्वाइट (जी 41), यमुना सफेद (जी 1), भीमा पर्पल, भीमा ओंकार, यमुना सफेद (जी 282) प्रजाति उपयुक्त हैं. जिन किसानों ने अक्तूबर महीने में ही लहसुन की बोआई कर दी है, वे फसल की निराईगुड़ाई और सिंचाई कर लें.

इस अगेती तौर पर रोपे गए लहसुन के खेतों का बारीकी से मुआयना करें. अगर खेतों में सूखापन दिखाई दे, तो फौरन सिंचाई करें. सिंचाई के अलावा निराईगुड़ाई भी करें, ताकि खरपतवारों से नजात मिल सके.

प्याज की खेती करने वाले किसान नर्सरी में बीज की बोआई जरूर कर लें. एक हेक्टेयर में प्याज की रोपाई के लिए 8-10 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

आम के साथ ही दूसरे फलों के बाग की जुताई का नवंबर महीना सब से सही समय होता है. ऐसे में खरपतवार नष्ट कर दें.

आम के मिलीबग कीट के नियंत्रण के लिए फिप्रोनिल की 1 लिटर मात्रा को 600 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. इस के अलावा आम के पेड़ों में थालों की सफाई कर दें और सूखी व बीमार टहनियों को काट दें.

अमरूद में छाल खाने वाले कीड़ों की रोकथाम के लिए फिप्रोनिल की 1 लिटर मात्रा को 600 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

आंवला, नीबू, पपीता में सिंचाई करें. आंवले की तुड़ाई और मार्केटिंग का इंतजाम करें. केले में प्रति पौधा 55 ग्राम यूरिया का इस्तेमाल करें और 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें.

देशी गुलाब की कलम काट कर अगले साल के स्टाक के लिए क्यारियों में लगा दें. ग्लेडियोलस में मौसम के अनुसार हफ्ते में एक या 2 बार सिंचाई करें. रजनीगंधा के स्पाइक की कटाईछंटाई, पैकिंग, मार्केटिंग और पोषक तत्त्वों के मिश्रण का अंतिम चरणीय छिड़काव करें.

पिछले महीने लगाई गई सब्जियों के खेतों की जांच करें. उन में खरपतवार पनपते नजर आएं, तो निराईगुड़ाई के जरीए उन का खात्मा करें. जरूरत के मुताबिक सिंचाई भी करें.

सब्जियों के पौधों व फलों पर अगर कीड़ों या बीमारियों के लक्षण नजर आएं, तो कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिकों से सलाह लें.

नवंबर महीने में ठंड की हलकी शुरुआत हो चुकी होती है. ऐसे में अपने मवेशियों के ठंड से बचाव का खास खयाल रखें. गायभैंसों के बच्चों को सर्दी से बचाने का पूरा बंदोबस्त करें.

अपने मुरगेमुरगियों को भी सर्दी से महफूज रखने का इंतजाम करें. जरूरत पड़ने पर डाक्टर को बुलाना न भूलें.

हरे चारे के लिए बरसीम की खेती करने वाले किसान वरदान, मेस्कावी, बुंदेलखंड बरसीम 2 (जेएचबी 146), बुंदेलखंड बरसीम 3 (जेएचटीबी 146) की बोआई 15 नवंबर तक जरूर कर दें. इस के लिए प्रति हेक्टेयर 25-30 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. बोआई के लिए खेत में 5 सैंटीमीटर गहरा पानी भर कर उस के ऊपर बीज छिड़क देते हैं. बोआई के 24 घंटे बाद क्यारी से पानी निकाल देना चाहिए.

जो किसान पशुओं के चारे के लिए जई की बोआई करना चाहते हैं, वे केंट, ओएस 6, बुंदेल जई 99-2 (जेएचओ 99-2), यूपीओ 212, बुंदेल जई 822 (जेएचओ 822), बुंदेल जई 851 (जेएचओ 851) का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस के लिए एक हेक्टेयर खेत में 75 से 80 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. जई की बोआई का उचित समय नवंबर महीने के पहले पखवारे से ले कर आखिरी पखवारे तक का होता है.

नोट : लेख में कीटनाशकों के नाम कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के वैज्ञानिक फसल सुरक्षा डा. प्रेम शंकर द्वारा  सुझाए गए हैं. बागबानी व सब्जियों की खेती समेत दूसरी जानकारी कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के विशेषज्ञ  राघवेंद्र विक्रम सिंह द्वारा सुझाए गए हैं.

भैंसपालन में दें ध्यान मिलेगा बेहतर दूध उत्पादन

अगर आप भी डेरी कारोबार से जुड़े हुए हैं या फिर भैंसपालन शुरू करने जा रहे हैं, तो इन बातों को ध्यान में जरूर रखें. इस से आप को बेहतर दूध उत्पादन मिलेगा, साथ ही साथ अच्छा मुनाफा भी कमा पाएंगे :

* अच्छी नस्ल की भैंस का होना.

* संतुलित आहार.

* भैंस के लिए आरामदायक बाड़ा.

* भैंस हर साल बच्चा दे.

* रोग पर नियंत्रण.

भैंस की उन्नत नस्ल

पशुपालकों को भैंस पालने में हमेशा उन्नत नस्ल का चुनाव करना चाहिए. अगर भैंस की नस्ल अच्छी होगी, तो दूध का उत्पादन भी ज्यादा मिल पाएगा.

भैंस की कई उन्नत नस्लें जैसे मुर्रा, जाफराबादी, महसाना, पंधारपुरी, भदावरी आदि होती हैं. इन में से मुर्रा नस्ल की भैंस को सब से अधिक उत्पादन देने वाली नस्ल कहा जाता है.

मुर्रा नस्ल की भैंस के सींग मुड़े हुए होते हैं, जो देशी और दूसरी प्रजाति की भैंसों से दोगुना दूध दे सकती है. इस से रोज तकरीबन 15 से 20 लिटर तक दूध मिल सकता है. इस के दूध में फैट की मात्रा भी ज्यादा पाई जाती है, इसलिए इस की कीमत भी ज्यादा होती है.

खास बात यह है कि यह भैंस किसी भी तरह की जलवायु में रह सकती है. इस की देखभाल करना भी आसान होता है. इस को ज्यादातर पंजाब और हरियाणा राज्यों में पाला जाता है.

संतुलित आहार

पशुपालकों को उन्नत नस्ल के साथसाथ संतुलित आहार पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए. अगर भैंसों की चराई अच्छी होगी, तो उन से दूध उत्पादन भी अच्छा मिल पाएगा.

बता दें कि इन के संतुलित आहार में जौ, मक्का, गेहूं, बाजरा, सरसों की खल, मूंगफली की खल, बिनौला की खल, अलसी की खल आदि को शामिल करना चाहिए. इन संतुलित आहार को पशुपालक अपने पशुओं को दूध के मुताबिक खिला सकते हैं.

हर साल गाभिन हो भैंस

भैंस का हर साल गाभिन होना अच्छा रहता है. अगर भैंस हर साल गाभिन न हो, तो उस को डाक्टर को जरूर दिखा लेना चाहिए. इस के अलावा भैंस का वजन भी 350 किलोग्राम के आसपास होना चाहिए.

अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र में जा कर या फोन से संपर्क करें.

पशु आहार बनाने में गांव की महिलाएं कर रही हैं तरक्की

हमारे देश के गांवों में बसने वाली  आबादी की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा खेती और पशुपालन से आता है. इस वजह से देश की ज्यादातर गांवदेहात की आबादी पशुपालन से जुड़ी हुई है, लेकिन कभीकभी पशुपालकों द्वारा सही चारा प्रबंधन और पोषण प्रबंधन न हो पाने के चलते प्रति पशु पर्याप्त दूध नहीं मिल पाता है और न ही बीमारियों का सही तरीके से प्रबंधन हो पाता है.

ऐसे में पशुपालकों की पशु आहार से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए बिहार राज्य के समस्तीपुर जिले के चकलेवैनी ग्राम पंचायत की कैजिया गांव की महिलाओं ने स्थानीय स्तर पर पशु आहार बनाने का कारोबार शुरू कर आसपास के गांवों में पशुपालकों की पशु आहार से जुड़ी समस्या का निदान कर दिया है, जिस की बदौलत कैजिया गांव में चूल्हेचौके तक सिमटी रहने वाली घरेलू महिलाएं आज खुद की और पशुपालकों की तरक्की की कहानी तो लिख ही रही हैं, साथ ही साथ पशुपालकों की आमदनी बढ़ाने में मददगार भी साबित हो रही हैं.

छोटी बचत से हुई शुरुआत

पशु आहार बनाने से जुड़ी कैजिया गांव की महिलाओं को कुछ साल पहले तक घर से बाहर निकलने तक की मनाही थी, लेकिन आगा खान ग्राम समर्थन कार्यक्रम (भारत) द्वारा एक्सिस बैंक फाउंडेशन के सहयोग से इन गंवई महिलाओं को मजबूत बनाने के लिए स्वयंसहायता समूह से जोड़ कर बचत की आदतों को बढ़ावा देने की पहल शुरू की गई.

साहूकारों के चंगुल से मिली नजात

कैजिया गांव की इन महिलाओं ने मां संतोषी स्वयंसहायता समूह बनाया, जिस में पहले साल 12 महिलाएं ही जुड़ीं, जिस से जुड़ कर इन महिलाओं ने हर महीने 20 रुपए से ले कर 100 रुपए तक की बचत की शुरुआत की.

महिलाओं ने इस बचत के पैसों का इस्तेमाल अपने घर की जरूरतों और साहूकारों का कर्ज चुकता करने में किया, जिस से धीरेधीरे इन महिलाओं का परिवार साहूकारों के चंगुल से मुक्त हो गया. इस के बाद 3 साल में इस समूह से 18 महिलाएं जुड़ गईं.

महिलाओं की इस स्वयंसहायता समूह की साख को देख कर स्थानीय बैंक ने 2 लाख रुपए का लोन भी स्वीकृत किया है, जिस से समूह से जुड़ी महिलाएं व्यवसाय कर अपनी आमदनी को बढ़ा सकें.

इन महिलाओं ने बचत के दौरान यह महसूस किया कि उन्हें गांव में ही कुछ ऐसा व्यवसाय करना चाहिए, जिस से वह लाभ भी कमा सकें और उन के घर के पुरुषों का दूसरे शहरों में पलायन भी रुके. ऐसी दशा में इन महिलाओं ने आपस में तय किया कि उन के आसपास बकरीपालक और पशुपालकों की तादाद अधिक है. ऐसे में उन्होंने पाया कि पशुपालकों में अच्छी क्वालिटी के पशु आहार की मांग स्थानीय स्तर पर अधिक है. फिर क्या था, महिलाओं ने छोटे स्तर पर पशु आहार बनाने की मशीन लगाने का फैसला लिया.

इन महिलाओं ने एकेआरएसपीआई से अपनी यह मंशा सांझा की, तो एकेआरएसपीआई ने एक्सिस बैंक फाउंडेशन के सहयोग से उन के इस सपने को पूरा करने के लिए पशु आहार बनाने में उपयोग होने वाली मशीनरी को उपलब्ध कराने का फैसला लिया. इस पर कुल लागत तकरीबन 1 लाख, 97 हजार रुपए की आई. बाकी इस व्यवसाय में उपयोग आने वाले कच्चे माल को महिलाओं ने अपनी बचत के पैसों से खरीदारी करने का फैसला लिया.

समूह की महिलाएं पशु आहार बनाने के लिए खड़े दाने और चारा पीसने के लिए फीड ग्राइंडर मशीन, कैटल फीड मशीन, मिक्स करने के लिए मिक्सर मशीन, वजन करने के लिए वेट मशीन और थ्री फेज के बिजली कनैक्शन का उपयोग करती हैं.

उत्पादक समूह बना कर शुरू किया उत्पादन

कैजिया गांव की महिलाओं ने स्थानीय स्तर पर ही मां तारा उत्पादक समूह बना कर पशु आहार बनाने का काम शुरू किया है. चूंकि इन महिलाओं ने जब मशीनें लगाईं, तभी लौकडाउन लगा दिया गया. लेकिन मशीनें सप्लाई करने वाली कंपनी ने इन महिलाओं को मशीन चलाने और पशु आहार बनाने की औनलाइन ट्रेनिंग दी.

कम पढ़ीलिखी इन महिलाओं ने इसे बड़ी संजीदगी से सीखा और ये महिलाएं आज पशु आहार बनाने का काम कर रही हैं.

स्थानीय स्तर पर आसानी से मिलता है कच्चा माल

इस उत्पादक समूह की सचिव पूनम देवी ने बताया कि पशु आहार बनाने में उपयोग होने वाला कच्चा माल वाजिब दाम पर स्थानीय स्तर पर मिल जाता है. ऐसे में तैयार पशु आहार पशुपालकों को बाजार में उपलब्ध दूसरे ब्रांड की तुलना में सस्ता पड़ता है. इस वजह से उन के पशु आहार की मांग स्थानीय स्तर पर अधिक है.

समूह की कोषाध्यक्ष प्रमिला ने बताया कि पशु आहार बनाने में जिन चीजों का इस्तेमाल किया जाता है, उस में चोकर और खलियां, मोरिंगा पाउडर, मक्का, बाजरा, तेलयुक्त व तेलरहित चावल की पौलिश, मूंगफली, सोयाबीन, तिल्ली, सरसों, सूरजमुखी की खली, खनिज लवण, नमक, विटामिन व गुड़ प्रमुख हैं.

Ladli Award
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पोषक तत्त्वों का रखा जाता है खयाल

कैजिया गांव में स्थानीय स्तर पर महिलाओं द्वारा तैयार किए जा रहे पशु आहार में पर्याप्त मात्रा में खनिज लवण, वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, न्यूक्लिक एसिड, विटामिन की मात्रा उपलब्ध रहती है, जिस से बकरियां, गायभैंस अधिक समय तक और अधिक मात्रा में दूध देती हैं. इस महिला समूह द्वारा तैयार पशु आहार पशुओं को अधिक स्वादिष्ठ और पौष्टिक लगता है.

समूह की सदस्य रीना देवी ने बताया कि उन के समूह द्वारा तैयार किया जाने वाला पशु आहार आसानी से व जल्दी पच जाता है. इस से पशुओं का स्वास्थ्य ठीक रहता है और उन की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है. इस वजह से पशुओं में बीमारियां होने की संभावनाएं कम होती हैं.

उन्होंने आगे बताया कि उन के समूह द्वारा तैयार पशु आहार संतुलित होने से पशु की दूध देने की क्षमता बढ़ती है व अन्य पशु आहारों से सस्ता होने से दूध की प्रति लिटर लागत भी कम होती है.

उन्होंने यह भी बताया कि उन के उत्पाद में पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्त्व मौजूद होते हैं, जिस से पशुओं का ऋतु चक्र नियमित होता है और वह समय पर गर्भ धारण करती है.

लौकडाउन में बना मददगार

कैजिया गांव में भी कोरोना के चलते देश में लगे लौकडाउन की वजह से दूसरे शहरों में नौकरी करने वाले लोग अपने गांव लौट आए. इस दशा में उन के घरों की महिलाओं ने लौकडाउन के दौरान भी पशु आहार तैयार कर उस की मार्केटिंग कर अपने घर की माली हालत को बिगड़ने से बचाने में अहम भूमिका निभाई.

अब पुरुषों पर निर्भर नहीं

समूह की सचिव पूनम ने बताया कि कभी हम घर के पुरुष सदस्यों पर निर्भर हुआ करते थे और आज हमारे यहां के पुरुष नौकरी कर पशु आहार की मार्केटिंग में जुटे हुए हैं. इस से इन का दूसरे शहरों की तरफ पलायन तो रुका ही है, साथ ही स्थानीय लैवल पर रोजगार मिलने में भी मदद मिली है.

आमदनी बढ़ाने में हुई सफल

एकेआरएसपीआई के बिहार प्रदेश के रीजनल मैनेजर सुनील कुमार पांडेय ने बताया कि कैजिया गांव की ये महिलाएं छोटे और बड़े पशुओं के लिए खुद ही मिनरल आहार तैयार करती हैं, जिस पर प्रति किलोग्राम तकरीबन 20 से 25 रुपए की लागत आती है, जिसे वह आसानी से 35 रुपए की दर से बेच लेती हैं. इस प्लांट की जो सब से बड़ी खूबी है वह है, इस प्लांट का संचालन खुद महिलाएं ही करती हैं.

उन्होंने बताया कि गांव की कम पढ़ीलिखी महिलाओं ने पशु आहार बनाने के कारोबार में कामयाबी पा कर यह साबित कर दिया है कि आज के दौर में महिलाएं किसी से कमतर नहीं रहीं.

गंवई महिलाओं के लोकल लैवल पर पशु आहार बनाने के कारोबार की कामयाबी के मसले पर एकेआरएसपीआई के बिहार में कृषि प्रबंधक डा. बसंत कुमार ने बताया कि समस्तीपुर के ज्यादातर गांवों में लोग पशुपालन के कारोबार से जुड़े हुए हैं.

उन्होंने यह भी बताया कि पशुओं से अधिक दूध उत्पादन के लिए और बीमारियों से बचाव के लिए पशुओं को संतुलित पशु आहार खिलाया जाना जरूरी हो जाता है. ऐसे में पोषक तत्त्वों से युक्त गुणवत्तापूर्ण और सस्ता पशु आहार लोकल लैवल पर मिलना पशुपालकों के लिए चुनौतीपूर्ण था. ऐसे में चकलेवैनी ग्राम पंचायत के कैजिया गांव की महिलाओं ने लोकल लैवल पर पशु आहार बनाने का कारोबार शुरू कर पशुपालकों की समस्या को काफी हद तक कम करने का काम किया है.

उन्होंने यह भी बताया कि महिलाएं पशु आहार बना कर अपने घर की आमदनी बढ़ाने में खासा मददगार साबित हुई हैं.

खेती को व्यापार से जोड़ें किसान और रोजगार पैदा करें

हिसार : 11 अक्तूबर.
किसान देख कर तकनीक को जल्दी सीखता है, दुनिया के अंदर क्या चल रहा है, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार आ रही नई तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने के लिए भविष्य में इस किसान मेले का और भी विस्तार किया जाएगा, जिस में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के साथ कृषि से जुड़े हर विभाग व निजी संस्थान एक पटल पर आ कर किसानों की आय बढ़ाने का काम करेंगे.

ये विचार हरियाणा के कृषि मंत्री जयप्रकाश दलाल ने कहे. कार्यक्रम की अध्यक्षता हकृवि के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने की. मेले के दूसरे दिन ‘श्री अन्न एक सुपर फूड’ विषय पर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विभिन्न सत्रों में उपस्थित किसानों को मोटे अनाज से बने व्यंजनों को थाली में शामिल करने के लिए प्रेरित किया.

कृषि मंत्री जेपी दलाल ने कहा कि मुझे खुशी है कि इस मेले के दौरान 47 सम्मानित किसानों को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रपति भवन में भोज के लिए न्योता दिया है. इस से साबित होता है कि यह सरकार किसानों की हितैषी है.

कृषि मंत्री जेपी दलाल ने मेले में उपस्थित किसानों की संख्या देख कर कहा कि यह किसान मेला बहुत महत्वपूर्ण कार्यक्रम है, जिसे हम भविष्य में और विस्तार देंगे, ताकि अधिक से अधिक किसानों को लाभ हो सके.

Farmersउन्होंने यह भी कहा कि किसानों की खेती को व्यापार से जोड़ना होगा, ताकि वे आत्मनिर्भर बनें और रोजगार पैदा करें.

वहीं हरियाणा ने झींगा उत्पादन में देश में अलग पहचान बनाई है. विश्वविद्यालय द्वारा बनाए गए उत्पादों पर किसानों को बहुत विश्वास है, जिस का उदाहरण इस मेले के दौरान लाभान्वित हुए किसान हैं. सरकार खेती को लाभान्वित बनाने के लिए किसानों के समूह बना कर उन्हें एफपीओ के माध्यम से सरकारी योजनाओं का लाभ लेते हुए नवीनतम तकनीक से जोड़ने का प्रयास कर रही है. इस कदम पर सरकार ने देश में 10 हजार एफपीओ बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है.

उन्होंने आगे कहा कि सरकार की तरफ से बाजरा, ज्वार व अन्य मिलेट्स पर भी अधिक ध्यान दिया जा रहा है, ताकि इन से बने पौष्टिक आहार के सेवन से किसानों व आमजन को स्वास्थ्य लाभ मिल सके. वर्तमान समय में तकनीकी के इस्तेमाल को देखते हुए कृषि विभाग ऐसा प्लेटफार्म देने का प्रयास करेगा, जिस से किसान सीधे तौर पर वैज्ञानिकों से जुड़ कर खेती में आने वाली समस्याओं का समाधान प्राप्त कर सकेगा.

किसानों के सवाल विश्वविद्यालय को करते हैं नए अनुसंधानों के लिए प्रेरित

Farmersकुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने कहा कि जब से हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय बना है, तब से किसान मेले का आयोजन करवा रहा है. विश्वविद्यालय 6 लाख किसानों से मोबाइल एप के माध्यम से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है. इसी कड़ी में मौसम विज्ञान विभाग इन किसानों तक मौसम की पूर्वानुमान जानकारी लगातार पहुंचा रहा है, जिस से किसानों को सिंचाई, उर्वरक प्रबंधन, कीटनाशकों का छिड़काव व अन्य कृषि क्रियाएं समय पर करने से संबंधित निर्णय लेने में मदद मिल रही है.

इस विश्वविद्यालय की खास बात है कि जो काम होता है, वो सीधा किसानों तक पहुंचाया जाता है. उन्होंने किसानों की प्रश्नोत्तरी को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि किसानों के द्वारा पूछे गए नए सवाल हमारे लिए शोध के विषय हैं और उन की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए नए शोध किए जा रहे हैं.

उन्होंने मेले को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यहां हरियाणा सहित दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड आदि राज्यों से किसान पहुंचते हैं और मेले का लाभ उठाते हैं. सभी के साथ मिल कर विश्वविद्यालय का लक्ष्य किसानों के जीवन में सुधार लाना है.

मोटे अनाजों को बढ़ावा

उन्होंने मोटे अनाज का स्वास्थ्य में लाभ बताते हुए कहा कि मोटे अनाज के शोध कार्यों में विश्वविद्यालय अग्रसर है और सरकार ने बाजरे के आटे को भी जीएसटी से मुक्त किया हुआ है.

कुलपति डा. बीआर कंबोज ने बताया कि वर्ष 2023 को मोटे अनाजों के वर्ष के तौर पर मनाया जा रहा है. विश्वविद्यालय द्वारा तैयार की गई बायोफोर्टीफाइड किस्मों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हाल ही में विश्वविद्यालय ने बाजरे की ऐसी किस्में विकसित की हैं, जो कि लौह तत्व व जिंक से भरपूर है व आमजन को विभिन्न बीमारियों व कुपोषण से नजात दिलाएगी. इस के अलावा मोटे अनाजों से विभिन्न मूल्य संवर्धित उत्पाद बनाने की तकनीक विकसित करने का काम हो रहा है.

नवाचार अपनाएं किसान

उन्होंने किसानों को नवाचार अपनाते हुए एकीकृत कृषि प्रणाली, जिस में कृषि के साथसाथ अन्य उद्यम जैसे मशरूम, मधुमक्खी, मशरूम, बागबानी, सब्जी उत्पादन, नकदी फसल, चारा फसल, पशुपालन, मुरगीपालन व मत्स्यपालन को शामिल कर के कृषि में जोखिम को कम करने व लाभदायक व्यवसाय बनाने की सलाह दी.

पशुपालन विभाग के चेयरमैन धर्मबीर मिर्जापुर ने भी सरकार द्वारा किसानों के हित में चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी किसानों को दी.

मेले में दूसरे दिन ‘मिलेट एक सुपर फूड और प्राकृतिक खेती’ विषय पर विभिन्न सत्र आयोजित किए गए, जिस में डा. हरिओम, डा. देवव्रत, डा. वीना सांगवान, डा. पम्मी और डा. उमेंद्र दत्त ने अपनेअपने विषयों पर जानकारी दी.

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों व कृषि विभागों द्वारा लगाई गई स्टालों का मुख्य अतिथि सहित अन्य अधिकारियों ने अवलोकन भी किया.

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, हरियाणा के महानिदेशक डा. नरहरि बांगड़ ने धन्यवाद पारित किया. इस दौरान शमशेर सिंह खरकड़ा, विश्वविद्यालय के कुलसचिव डा. बलवान सिंह मंडल, मेला अधिकारी मीतू धनखड़ व अन्य अधिकारी मंच पर उपस्थित रहे.

कछुओं के 955 बच्चों को बचाया

भोपाल : राजस्व आसूचना निदेशालय (डीआरआई) ने एक ही दिन में नागपुर, भोपाल और चेन्नई में गंगा में रहने वाले विभिन्न प्रजातियों के कछुओं के 955 जीवित बच्चों के साथ 6 लोगों को पकड़ा.

गंगा में रहने वाले कछुओं, जिन में से कुछ को आईयूसीएन की रैड लिस्ट और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I एवं II के तहत खतरे में/करीब संकटग्रस्त प्रजातियों के रूप में निर्दिष्ट किया गया है, की अवैध तस्करी और व्यापार में शामिल एक सिंडिकेट के बारे में डीआरआई (राजस्व आसूचना निदेशालय) के अधिकारियों द्वारा खुफिया जानकारी जुटाई गई थी. अवैध व्यापार और घटता प्राकृतिक निवास स्थान इन प्रजातियों के लिए बड़ा खतरा है.

डीआरआई के अधिकारियों ने देश में विभिन्न स्थानों पर अपराधियों को एकसाथ पकड़ने और कछुओं को बचाने के लिए एक जटिल और अखिल भारतीय योजना तैयार की है.

Turtlesअधिकारियों के पूरे देश में चले सम्मिलित प्रयासों के परिणामस्वरूप 30 सितंबर को नागपुर, भोपाल और चेन्नई में कुल 6 व्यक्तियों को पकड़ा गया और कछुओं की विभिन्न प्रजातियों के 955 जीवित बच्चों को बरामद किया गया. बचाए गए गंगा के कछुओं की प्रजातियां इंडियन टेंट टर्टल, इंडियन फ्लैपशेल टर्टल, क्राउन रिवर टर्टल, ब्लैक स्पौटेड/पौंड टर्टल और ब्राउन रूफ्ड टर्टल हैं.

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत प्रारंभिक जब्ती के बाद, अपराधियों और गंगा के कछुओं को आगे की जांच के लिए संबंधित वन विभागों को सौंप दिया गया.
यह आपरेशन पिछले महीनों से जारी ऐसे ही अन्य कार्रवाईयों की श्रंखला का हिस्सा है, क्योंकि डीआरआई पर्यावरण को संरक्षित रखने और अवैध वन्यजीव तस्करी से निबटने के अपने संकल्प को जारी रखे हुए है.

बता दें कि आईयूसीएल की रैड लिस्ट और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I और II के तहत खतरे में/संकटग्रस्त प्रजातियों के रूप में निर्दिष्ट किया गया है. साथ ही, अवैध व्यापार, मांस के लिए अत्यधिक शिकार और घटते प्राकृतिक निवास स्थान इन प्रजातियों के अस्तित्व के लिए बड़े खतरे हैं.

अक्तूबर महीने में खेतीबारी से जुड़े काम

यह महीना खेतीबारी के नजरिए से बहुत खास होता है. इस महीने में जहां खरीफ की अधिकांश फसलों की कटाई और मड़ाई का काम जोरशोर से किया जाता है, वहीं रबी के सीजन में ली जाने वाली फसलों की रोपाई और बोआई का काम भी तेजी पर होता है.

किसान खेती, बागबानी, मछलीपालन, मधुमक्खीपालन, पशुपालन, मशरूम उत्पादन आदि से अच्छी पैदावार और लाभ लेने के लिए इन कामों को अक्तूबर महीने में समय से निबटाएं.

अगर आप ने अपने धान की फसल की कटाई कंबाइन से कराई है, तो पराली न जलाएं. इस से मिट्टी में मौजूद पोषक तत्त्व व लाभदायक कीट नष्ट हो जाते हैं.

पराली प्रबंधन यानी फसल अवशेष प्रबंधन के लिए स्ट्रा चौपर, सुपर सीडर, स्ट्रा बेलर, स्ट्रा रीपर, रीपर कम बाइंडर, श्रब मास्टर, रोटरी स्लेशर, कटर कम स्प्रैडर जैसे यंत्रों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

यह ध्यान रखें कि अक्तूबर महीने में फसल की कटाई के बाद अधिकांश खेत खाली हो चुके होते हैं और किसान रबी के सीजन में ली जाने वाली फसलों की बोआई की तैयारी कर रहे होते हैं. ऐसी अवस्था में मिट्टी में संतुलित उर्वरकों की मात्रा के प्रयोग को ध्यान में रखते हुए खाली खेत से मिट्टी के नमूने ले कर मृदा जांच प्रयोगशाला अवश्य भेज दें. इस से मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम, सल्फर, जिंक, लोहा, तांबा,  मैंगनीज व अन्य सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की दी जाने वाली मात्रा का पता चल जाता है. खरीफ की फसलों की मड़ाई के उपरांत उचित भंडारण के लिए नई बोरियों का प्रयोग करें.

अक्तूबर महीने में खेतीबारी से जुड़े यंत्रों का उपयोग ज्यादा होता है. ऐसे में प्रतिदिन काम शुरू करने से पहले व बाद में यंत्रों की साफसफाई कर लेनी चाहिए. जरूरत पड़ने पर पानी से भी सफाई करें. काम करने से पहले व बाद में यंत्रों के नटबोल्ट की जांच जरूर करें. नटबोल्ट को तुरंत दुरुस्त कर दें. मशीन के बैयरिंग व दूसरे घूमने वाले भागों में मोबिल औयल व ग्रीस जरूर डालें. समयसमय पर यंत्रों की सर्विस का काम जरूर कराएं.

अक्तूबर महीने में धान की बालियों का रस चूसने वाले गंधीबग कीट का रस चूस लेने के कारण दाने नहीं बनते हैं, जिस से बालियां सफेद दिखाई देने लगती हैं. इस की रोकथाम के लिए ट्राइजोफास या मेथोमिल 1 लिटर मात्रा को 500 लिटर से 600 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से फूल आने के समय छिड़काव करें.

इस माह धान में भूरे फुदके का प्रकोप भी देखा गया है, जिस में पौधे से रस चूस लेने के कारण पौधे सूख कर गिर जाते हैं और फसल झुलस सी जाती है. ऐसे में इस की रोकथाम के लिए खेत से पानी निकाल दें व नीम औयल 2.5 लिटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

चूहों के नियंत्रण के लिए जिंक फास्फाइड से बने चारे अथवा एल्युमिनियम फास्फेट की गोली का प्रयोग करें.

धान की कटाई करने से एक हफ्ता पहले खेत से पानी निकाल दें. जब पौधे पीले पड़ने लगें व बालियां लगभग पक जाएं, तो समय से फसल की कटाई कर लें.

गेहूं की अगेती फसल लेने वाले किसान अक्तूबर के आखिरी हफ्ते से बोआई शुरू कर सकते हैं. इस के लिए उपयुक्त किस्में एचयूडब्लू-533, के-8027, के-9351, एचडी-2888, के-8962, के-9465, के-1317 वगैरह हैं.

जौ की अगेती फसल लेने के लिए किसान 15 अक्तूबर के बाद से बोआई शुरू कर सकते हैं. इस के लिए उन्नत छिलके वाली प्रजातियों में ज्योति (के-572/10), आजाद (के-125), हरित (के-560), प्रीति, जाग्रति, लखन, मंजुला, नरेंद्र जी-1 व 2 और 3, आरडी 2552 शामिल हैं, जबकि छिलकारहित प्रजातियों में गीतांजली (के-1149), नरेंद्र जौ 5 व उपासना व एनडीवी 934 जैसी प्रजातियां शामिल हैं. माल्ट के लिए के-508, ऋतंभरा (के-551), रेखा, डीएल-88, बीसीयू-3, डीडब्ल्यूआर-2 आदि प्रजातियां उपयुक्त पाई गई हैं.

शरदकालीन गन्ने की खेती के लिए अक्तूबर का महीना सही होता है. शरदकालीन गन्ने के बीज के पिछले साल शरद ऋतु में बोए गए गन्ने से बीज प्राप्त करें. शरदकालीन गन्ना बोआई में लाइनें 2 फुट दूर रखें. यदि लाइनों की दूरी 3 फुट रखते हैं, तो बीच में आलू की फसल भी ली जा सकती है.

Farmingगन्ने को खेत में बोने से पहले थिरम व कार्बोक्सिन दोनों 37.5 फीसदी डब्ल्यूपी 250 ग्राम मात्रा 100 लिटर पानी में घोल कर उस से 25 क्विंटल गन्ने के टुकड़े उपचारित किए जा सकते हैं.

जिन किसानों ने कपास की खेती की है, वे देशी कपास की चुनाई 8-10 दिन के अंतर पर करते रहें. अक्तूबर में अमेरिकन कपास भी चुनाई के लिए तैयार हो जाती है. चुनी हुई कपास को सूखे गोदामों में रखें.

जो किसान शीतकालीन मक्का की खेती करना चाहते हैं, वे उपयुक्त सिंचाई वाली जगहों पर अक्तूबर महीने के अंत तक बोआई जरूर कर लें. मक्के की संकर प्रजातियों के लिए प्रति हेक्टेयर 18-20 किलोग्राम व अन्य प्रजातियों के लिए 20-25 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.

जो किसान चने की खेती करना चाहते हैं, वे चने की बोआई अक्तूबर महीने के दूसरे पखवारे से शुरू कर दें. चने की बोआई के लिए उन्नत प्रजातियों में पीडीजी-3 व 4, जीपीएफ-2, पीवीजी-1, जीएल-769, सी-235, एच-208, जी-24, हरियाणा चना 1 व 3 गौरव पूसा 256, राधे, के-850, पूसा-208, पूसा- 547, ऊसर क्षेत्र में बोआई के लिए करनाल चना-1 शामिल हैं.

इस के अलावा काबुली चना की एच-144, गोरा हिसारी, हरियाणा काबली-1, वीजी-1073, एल-771, एल-770, पूसा-1003, पूसा 5023, चमत्कार, शुभ्रा किस्मों की बोआई की जा सकती है. इस के लिए एक हेक्टेयर खेत में 70 किलोग्राम से 90 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

चने की फसल को उकठा रोग से बचाने के लिए ढाई किलोग्राम ट्राइकोडर्मा को 50 किलोग्राम गोबर की खाद में मिला कर कल्चर तैयार कर लें. इस तैयार कल्चर को एक हफ्ता पहले खेत में मिला दें. साथ ही, ट्राइकोडर्मा की 10 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज का उपचार करना चाहिए और फसल को बीमारयों से बचाने के लिए 1.7 ग्राम वाविस्टीन और 1.7 ग्राम थिरम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें.

फसल को दीमक से बचाने के लिए ब्युवेरिया बैसियाना की ढाई किलोग्राम मात्रा को 50 किलोग्राम गोबर में मिला कर मिट्टी उपचारित करें. चने के बीजों को ढाई ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से राइजोबियम जैव खाद से उपचारित कर के ही बोआई करें.

जिन किसानों ने अरहर की अगेती फसल ले रखी है, वे फसल को फली छेदक कीट से बचाने के लिए इंडोक्साकार्ब 14.8 ईसी 325 मिलीलिटर 500-600 लिटर पानी में मिला कर 15-20 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करें. अरहर में 70 फीसदी फलियां लगने पर स्पाइनोसेड 5 फीसदी एससी की 750 मिलीलिटर मात्रा को 500 लिटर पानी में घोल कर छिड़कें. इस से फली छेदक कीट की रोकथाम हो सकेगी.

मसूर की बोआई अक्तूबर के अंत से नवंबर के दूसरे हफ्ते तक बो दें. इस की उन्नत किस्में एल-9-12, सपना, गरिमा, एलएल-699 व 147 है. इस के बीज को राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर के ही बोएं.

जो किसान दाल वाली मटर की किस्मों की खेती करना चाहते हैं, वे अक्तूबर के आखिरी हफ्ते से इस की बोआई शुरू कर दें. इस की उन्नत किस्मों में फील्ड पी-48, पीजी-3, अपर्णा, जयंती, उत्तरा व टाइप-163 रचना, पंत मटर-5, मालवीय मटर-2, मालवीय मटर-15, शिखा व सपना प्रमुख हैं. बीमारियों से बचाव के लिए वाविस्टीन से बीजोपचार करें और मटर राइजोबियम जैव खाद से उपचारित करें.

अक्तूबर के आखिरी हफ्ते से नवंबर के पहले हफ्ते तक अलसी की बोआई का उचित समय होता है. इस फसल को चिकनी दोमट मिट्टी, अच्छे जल निकास वाली और धान की फसल के बाद उगाया जाता है.

अलसी की गरिमा, श्वेता, शुभ्रा, लक्ष्मी-27, पद्मिनी, शेखर, शारदा, मऊ आजाद, गौरव, शिखा, रश्मि, पार्वती, रुचि, के-2, एलसी-2023 व एलसी-74 किस्मों की बोआई की जा सकती है. इस के 20 किलोग्राम बीज को 50 ग्राम थिरम व कार्बाक्सिन मिश्रण से उपचारित करें.

मूंगफली की खेती करने वाले किसान फलियों की वृद्धि की अवस्था पर सिंचाई करें, इस से फसल खुदाई भी आसान हो जाती है. इस के अलावा इस पर विशेष ध्यान दें कि मानसून खत्म होने के बाद चेपा नाम का कीट मूंगफली के पौधों का रस चूसता है, जिस की रोकथाम के लिए 1 लिटर फिब्रोनिल 25 फीसदी ईसी को 500-600 लिटर पानी में मिला कर छिड़कें.

अक्तूबर महीने का पहला पखवारा राई की बोआई के लिए सब से उपयुक्त माना जाता है. इस समय बोआई के लिए उन्नत प्रजातियों में वरुणा, नरेंद्र राई-8501, शिवानी, पूसा बोल्ड, कांति, पूसा महक, पूसा अग्रणी उपयुक्त होती हैं.  अक्तूबर महीने में बोआई के लिए सरसों की पूसा तारक, पूसा विजय, पूसा सरसों 22, पूसा करिश्मा, पूसा बोल्ड, पूसा सरसों-27 उपयुक्त पाई गई हैं.

प्याज की नर्सरी अक्तूबर के दूसरे हफ्ते से नवंबर के दूसरे हफ्ते के बीच डालें. इस के लिए ऊंचा बैड बनाएं. इस की उन्नत किस्मों में भीमा सुपर, भीमा गहरा लाल, भीमा लाल, भीमा श्वेता, भीमा शुभ्रा, अलो ग्रनों, पूसा रैड, पूसा रतनार, पूसा ह्वाइट पलैट, पूसा ह्वाइट राउंड व पूसा माधवी शामिल हैं.

टमाटर की खेती के लिए अक्तूबर में नर्सरी डालें, जिस से उस के पौधों को नवंबर के दूसरे हफ्ते तक रोपा जा सके. इस की उन्नत किस्मों में नामधारी-4266 पूसा रूबी, पूसा अर्ली ड्वार्फ, पूसा-120, मारग्लोब, पंजाब छुआरा, सलैक्शन-120, पंत बहार, अर्का विकास, हिसार अरुणा (सलैक्शन-7), एचएस-101, सीओ-3, सलैक्शन-152, पंजाब केसरी, पंत टी-1, अर्का सौरभ, एस-32, डीटी-10. संकर किस्में कर्नाटक हाईब्रिड, रश्मि, सोनाली, पूसा हाईब्रिड-1, पूसा हाईब्रिड-2, एआरटीएच-1 या 2 या 3, एचओई-606, एनए-601, बीएसएस-20, अविनाश-2, एमटीएच-6 शामिल हैं.

अक्तूबर के महीने में फूलगोभी की पूसा स्नोबाल-1, पूसा स्नोबाल-2, स्नोबाल-16 व पूसा स्नोबाल के-1 किस्में नर्सरी में बोई जा सकती हैं. इन किस्मों को नर्सरी में डाले जाने के 4 हफ्ते बाद खेत में रोपा जा सकता है.

गांठगोभी की रोपाई पूरे महीने 30×20 सैंटीमीटर के अंतराल पर करें और रोपाई के समय प्रति हेक्टेयर 35 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फेट व 50 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग करें.

अक्तूबर का महीना पालक व मेथी की बोआई व सितंबर में बोई गई फसल की कटाई के लिए सब से उपयुक्त होता है. पालक  पूसा भारती, मेथी-पूसा अर्ली बंचिंग अच्छी होती है. सितंबर में बोई गई फसल को बोआई के 30 दिन बाद काट सकते हैं.

मूलीगाजर अक्तूबर में बोई जा सकती हैं. मूली की ह्वाइट आइसकिल, रैपिड रैड ह्वाइट टिप्ड, स्कारलेट ग्लोब, पूसा हिमानी, गाजर की पूसा रुधिरा (लाल), पूसा वसुधा (संकर), पूसा आसिता (काली) की बोआई करें.

आलू की अगेती किस्मों में कुफरी अशोका, कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी जवाहर की बोआई 10 अक्तूबर तक और मध्य एवं पछेती फसल के लिए कुफरी बादशाह, कुफरी सतलज, कुफरी पुखराज, कुफरी लालिमा की बोआई 15-25 अक्तूबर तक करें.

लहसुन को अक्तूबर महीने में लगाएं. इस की उन्नत किस्में भीमा ओंकार, भीमा पर्पल, यमुना सफेद (जी-1), एग्रीफाउंड ह्वाइट (जी- 41), गोदावरी (सलैक्शन-2), टी- 56-4, एग्रीफाउंड पार्वती (जी- 313) हैं.

मटर की अगेती किस्मों के लिए प्रति हेक्टेयर 120-150 किलोग्राम बीज का प्रयोग करें. सब्जी मटर के लिए बोआई के समय प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फेट और 40 किलोग्राम पोटाश का प्रयोग करें.

अक्तूबर महीने में पपीता की रोपाई करें और पहले रोपे गए पपीते को तना गलन रोग से बचाने के लिए मैंकोजेब 65 फीसदी व कार्बंडाजिम 12 फीसदी डब्ल्यूपीसी की 1.2 किलोग्राम मात्रा को 600 लिटर पानी में घोल कर 2 छिड़काव.

आंवला में शूट गाल मेकर से ग्रस्त टहनियों को काट कर जला दें. केला प्रति पौधा 55 ग्राम यूरिया, 155 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 200 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश का प्रयोग कर खेत में मिला दें.

अक्तूबर महीने में लीची की मकड़ी यानी लीची माइट की रोकथाम के लिए समयसमय पर ग्रसित पत्तियों व टहनियों को काट कर जला देना चाहिए. नई कोंपलों के आने से पहले प्रोपारगाइट 57 फीसदी ईसी की 1 लिटर मात्रा को 500 लिटर पानी में घोल बना कर 7-10 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव लाभप्रद पाया गया है.

केला में पौधों के नीचे पुआल अथवा गन्ने की पत्ती की 8 सैंटीमीटर मोटी परत बिछा देनी चाहिए. इस से सिंचाई की संख्या में 40 फीसदी की कमी हो जाती है, खरपतवार नहीं उगते और उपज हुआ भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ जाती है.

काजू के पौधों को प्रारंभिक अवस्था में अच्छा ढांचा देने की जरूरत होती है. उपयुक्त काटछांट के द्वारा पौधों को अच्छा ढांचा देने के बाद फसल तोड़ाई के बाद सूखे, रोग एवं कीट ग्रसित शाखाओं को कैंची से काटते रहें.

अंगूर में मैंकोजेब 65 फीसदी व कार्बंडाजिम 12 फीसदी डब्ल्यूपीसी की 1.2 किलोग्राम मात्रा को 600 लिटर पानी में घोल कर एंथ्रेक्नोज की रोकथाम के लिए छिड़कें.

फूलों की खेती के लिए सब से अच्छा महीना अक्तूबर होता है. इस महीने कई तरह के फूलों की खेती की शुरुआत होती है, जो सर्दियों में अच्छी उपज देते हैं.

Farmingइस महीने में ग्लेडियोलस की पूसा शुभम, पूसा किरन, पूसा मनमोहक, पूसा विदुषी, पूसा सृजन व पूसा उन्नति किस्मों की बोआई करें. ग्लेडियोलस के लिए बीज दर 1.5 लाख कंद/ हेक्टेयर रखें. ग्लेडियोलस के कंदों को 2 ग्राम बाविस्टीन 1 लिटर पानी की दर से घोल बना कर 10-15 मिनट तक डुबो कर उपचारित करने के बाद 20-30×20 सैंटीमीटर पर 8-10 सैंटीमीटर की गहराई में रोपाई करें. रोपाई से पहले क्यारियों में प्रति वर्गमीटर 5 ग्राम कार्बोफ्यूरान जरूर मिलाएं.

गुलाब के पौधों की कटाईछंटाई कर कटे हुए भागों पर डाईथेन एम 45 का 2 ग्राम प्रति लिटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें.

पशुपालन से जुड़े किसान अपने पशुओं को खुरपका व मुंहपका का टीका जरूर लगवाएं. पशुओं को कृमिनाशक दवा पिलाएं. समयसमय पर गर्भ परीक्षण और बांझपन चिकित्सा व जांच कराते रहें. स्वच्छ दुग्ध उत्पादन के लिए पशुओं, स्वयं, वातावरण और बरतनों की स्वच्छता का खयाल जरूर रखें.

मुरगीपालन से जुड़े लोग मुरगियों व चूजों के लिए पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था करें. संतुलित आहार निर्धारित मात्रा में दें. कृमिनाशक दवा पिलवाएं और बिछावन को नियमित रूप से पलटते रहें.

पशुओं के लिए उत्तम हरे चारे के प्रबंध के लिए अक्तूबर महीने में जिन चारा फसलों की बोआई की जाती है, उस में रिजका घास प्रमुख मानी जाती है. रिजका की उन्नत किस्में लुसर्न-9, एलएल कंपोजिट-7 और लुसर्न-टी है. यह किस्म चारे की अहम दलहनी फसल है, जो जून महीने तक हरा चारा देती है. इसे बरसीम की अपेक्षा सिंचाई की जरूरत कम होती है. इसे अक्तूबर से नवंबर महीने के मध्य तक बोया जा सकता है.

बरसीम की बोआई 15 अक्तूबर से शुरू करें. बरसीम की बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर में 25-30 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. बोआई के पहले प्रति हेक्टेयर 20-30 किलोग्राम नाइट्रोजन व 80 किलोग्राम फास्फेट का प्रयोग करें.

किसान हरे चारे के लिए जई की बोआई अक्तूबर के पहले पखवारे से ले कर नवंबर महीने तक कर सकते हैं. उन्नत किस्मों में ओएल-9, कैंट व हरियाणा जई है. बीज की बोआई के समय खेत में उपयुक्त नमी रहना जरूरी है.

औषधीय फसल ईसबगोल की खेती करने वाले किसान 17 अक्तूबर से 7 नवंबर के बीच इस की बोआई कर सकते हैं. बोआई के पहले बीज उपचारित करना न भूलें. 3 किलोग्राम बीज को 9 ग्राम थिरम से उपचारित किया जाता है.

नोट- लेख में कीटनाशकों के नाम कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के वैज्ञानिक फसल सुरक्षा डा. प्रेम शंकर द्वारा सुझाए गए हैं, वहीं कृषि यंत्रों के रखरखाव से जुड़ी जानकारी विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केंद्र, सुलतानपुर के वैज्ञानिक कृषि अभियंत्रण इं. वरुण कुमार द्वारा सुझाए गए हैं. बागबानी व सब्जियों की खेती से जुड़ी जानकारी कृषि विज्ञान केंद्र, चंदौली के उद्यान विशेषज्ञ डा. दिनेश यादव द्वारा सुझाई गई है.

पशु स्वास्थ्य शिविर में पशुपालक हुए लाभान्वित

अविकानगर : भाकृअनुप-केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर की फार्मर फर्स्ट परियोजना के अंतर्गत गांव अरनिया तहसील- मालपुरा जिला- टोंक में पशु स्वास्थ्य शिविर एवं जागरूकता के लिए किसानवैज्ञानिक संवाद का आयोजन 23 सितंबर, 2023 की सुबह संस्थान की ओर से आयोजित किया गया.

पशु स्वास्थ्य शिविर में कुल 280 (35 बकरी, 150 भेड़, 55 भैंस, 40 गाय एवं अन्य शिविर में आए पशु) पशुओं का अविकानगर के पशु चिकित्सक डा. दुष्यंत कुमार शर्मा के निर्देशन में उपचार एवं विभिन्न प्रकार की मौसम आधारित निःशुल्क दवाओं, मिनरल्स मिक्सर पाउडर व ईंट आदि का परामर्श दे कर 100 से ज्यादा पशुपालक किसानों को लाभान्वित किया गया.

फार्मर फर्स्ट परियोजना के प्रधान अन्वेषक डा. सत्यवीर सिंह दांगी ने बताया कि परियोजना के द्वारा मालपुरा तहसील के 6 चयनित गांव अरनिया, बस्सी, ढेचवास गरजेड़ा, चोसला व सोडा में खेती, बागबानी एवं पशुपालन में उन्नत तकनीकियों का प्रदर्शन किसानों के द्वार व गांव में किया जा रहा है.
चयनित गांव मे सभी तरह की खेती, पशुपालन आधारित व्यवसाय को बढ़ावा दे कर उन में उधमिता के विकास को बढ़ावा देने का काम परियोजना द्वारा दिया जा रहा है. पशु स्वास्थ्य शिविर एवं किसानवैज्ञानिक संवाद में पधारे मुख्य अतिथि कन्हैया लाल चौधरी मालपुरा- टोडारायसिंह विधानसभा विधायक द्वारा भी भारत सरकार द्वारा संचालित विभिन्न कृषि एवं पशुपालन आधारित योजनाओं के बारे में विस्तार से किसानों को समझाया और बताया कि वर्तमान में खेती की आधुनिक तकनीकियों को अपना कर ही अधिक से अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है.

Animal Healthअविकानगर संस्थान के निदेशक द्वारा मालपुरा तहसील के विभिन्न गांवों में संस्थान द्वारा किए जा रहे प्रयासों के लिए मुख्य अतिथि ने भूरिभूरि प्रशंसा की.

संवाद में पधारे पशुपालक किसानों को संबोधित करते हुए निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने बताया कि खेती एवं पशुपालन को शहरी आबादी की आवश्यकता के हिसाब से उद्यमिता का विकास गांव में कर के सीधे उपभोक्ता तक पहुंचा कर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है. गांव के जितने भी शिक्षित नौजवान हैं, उन से मेरा निवेदन है कि आने वाला समय शुद्ध और्गेनिक खेती एवं पशुपालन आधारित उत्पाद का होगा. इसलिए आप गांव में सहकारिता का निर्माण कर के अपने उत्पादों को नजदीकी शहरों में पहुंचाएं. जब उत्पाद का मूल्य कम मिले, तो विभिन्न मूल्य संवर्धित उत्पादों का निर्माण कर के अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है. शहरों मे ऐसे स्टार्टअप का विकास करें कि अपने उत्पाद का अपने खुद के द्वारा विकसित स्टार्टअप में उपयोग कर बाजार की बदलाव मार्केट प्रणाली से बचाव कर के अच्छा मुनाफा कमाया जा सके.

पशु स्वास्थ्य शिविर में अविकानगर के वैज्ञानिक डा. अमर सिंह मीना, डा. अरविंद सोनी, डा. रंगलाल मीना, डा. अजित सिंह महला, इंद्रभूषण कुमार, मुख्य प्रशासनिक अधिकारी, अरावली वेटरनरी कालेज के इंटर्नशिप स्टूडेंट्स एवं फार्मर फर्स्ट परियोजना के समस्त स्टाफ द्वारा भाग ले कर पशु स्वास्थ्य शिविर में पधारे किसानों को स्वास्थ्य प्रबंधन, पोषण प्रबंधन, पशु प्रजनन एवं चारा आदि पर विस्तार से जानकारी दी गई.

Animal Healthपशु प्रजनन विशेषज्ञ डा. अजीत सिंह महला ने बताया कि अरनिया गांव में सभी तरह के जानवरों में मिनरल मिक्सचर पाउडर एवं ईंट में मिलने वाले विभिन्न माइक्रोन्यूट्रिएंट की बहुत कमी है. इस के कारण जानवर समय पर ताव में नहीं आ कर समय पर प्रग्नेंट नहीं हो कर बच्चे नहीं दे रहे हैं. इसलिए सभी गांव वालों से निवेदन है कि सभी तरह के पशुधन को समयसमय पर मिनरल्स मिक्सचर पाउडर एवं ईंट जरूर खिलाएं, जिस से उन के शरीर में मिनरल्स की कमी न हो.

अरनिया गांव के बाशिंदे एवं चैनपुरा ग्राम पंचायत सरपंच प्रतिनिधि दयाल दास स्वामी ने संस्थान निदेशक को धन्यवाद देते हुए पंचायत के बाकी गांव को भी गोद लेने के निवेदन के साथ इस तरह के प्रोग्राम को गांव में अधिक से अधिक आयोजित करने पर जोर दिया, जिस से कि गांव के लोगों को खेती एवं पशुपालन व्यवसाय के माध्यम से आजीविका बढ़ाई जा सके.