गिर गोवंश में नस्ल सुधार के लिए कृत्रिम गर्भाधान शुरू

अविकानगर : 21 जुलाई, 2023.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थान, केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर में गिर गोवंश के नस्ल सुधार के लिए कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम मालपुरा तहसील के विभिन्न गांव के किसानों के लिए शुरुआत की गई. संस्थान के फार्मर फर्स्ट प्रोजैक्ट एवं अनुसूचित जाति परियोजना द्वारा प्रायोजित एकदिवसीय कार्यक्रम में मालपुरा तहसील के 500 से ज्यादा किसानों ने भाग लिया.

आयोजन में भाकृअनुप-केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर में गिर गोवंश में नस्ल सुधार के लिए कृत्रिम गर्भाधान का शुभारंभ एवं कृषि उपयोगी सामग्री वितरण भी हुआ.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बद्रीनारायण चौधरी, अध्यक्ष, भारतीय किसान संघ एवं सदस्य, भाकृअनुप गवर्निंग बौडी ने बताया कि हमें गौमाता आधारित कृषि अर्थव्यवस्था बनानी है, क्योंकि गाय जैविक खेती के लिए सब से उत्तम पशु है. इस के पालन से हमारी विभिन्न ग्रामीण जरूरत की आवश्यकता पूरी होती है.

अविकानगर संस्थान के निदेशक ने उत्तम नस्ल के गाय के कृत्रिम गर्भाधान के लिए जो सीमन उपलब्ध कराया है, वह आने वाले समय में मालपुरा तहसील के किसानों के लिए दूध की पैदावार बढ़ाने में निश्चित ही सहायक सिद्ध होगा.

वे संस्थान के वैज्ञानिकों से यह भी निवेदन करते हैं कि यह जो गाय और अन्य आवारा जानवर हैं, इन का भी कुछ वैज्ञानिक तरीके से ऐसा उपाय किया जाए कि यह देश की अर्थव्यवस्था में काम आए.

भारतीय किसान संघ के संगठन मंत्री दिनेश कुलकर्णी ने संस्थान के निदेशक को धन्यवाद देते हुए बताया कि आप भेड़, बकरी व खरगोश पर काम कर रहे हैं. साथ ही, गांव की आवश्यकताओं को देखते हुए आप ने भैंस एवं गाय पर भी काम किया. इस प्रयास से गोवंशपालन भविष्य में लोगों को रोजगार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

उन्होंने उम्मीद जताई कि पशुधन के माध्यम से निश्चित ही गांव की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में संस्थान अपना बेहतर योगदान देगा.

उन्होंने आगे कहा कि खेती व पशुपालन से संबंधित जो भी वर्तमान समस्याएं हैं, उन को कम करने के लिए हमें दोबारा से जैविक खेती अपनानी पड़ेगी, जिस के माध्यम से जलवायु परिवर्तन से होने वाले विभिन्न दुष्परिणामों से बचा जा सकेगा.

डा. अरुण कुमार तोमर, निदेशक, भाकृअनुप-केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर, डा. सत्यवीर सिंह डांगी, प्रधान अन्वेषक, फार्मर फर्स्ट परियोजना, डा. पीपी रोहिल्ला, प्रधान वैज्ञानिक, अटारी, जोधपुर, डा. एनवी पाटिल, पूर्व निदेशक, केंद्रीय गोवंश संस्थान, मेरठ, टोडाराय सिंह, मालपुरा के विधायक, कन्हैया लाल चौधरी, सकराम चोपड़ा, प्रधान मालपुरा और गोपाल गुर्जर, पूर्व प्रधान, मालपुरा ने कार्यक्रम में भाग ले कर यहां उपस्थित किसानों को संबोधित किया.

अविशान भेड़पालन इकाई को गांव में स्थापित करने के लिए 2 प्रगतिशील किसान सुरेंद्र सिंह अवाना, बैरानाबिचुन, तहसील मोजमाबाद, जिला जयपुर एवं सतपाल सिंह चुंडावत, राजसमंद के साथ संस्थान ने एमओयू पर हस्ताक्षर किए. इस के माध्यम से अविशान भेड़पालन इकाई संस्थान द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी, साथ ही संस्थान के वैज्ञानिकों की देखरेख में वैज्ञानिक तरीके से अविशान भेड़ को देश के किसानों तक पहुंचाया जाएगा.

बछड़ों में दस्त

यह नवजात बछड़ों में होने वाली जीवाणुजनित एक बीमारी है. इस में बछड़े को पतले, सफेदपीले बदबूदार दस्त व सैप्टिसीमिया हो जाता है. बछड़े की आंखें धंस जाती हैं, शरीर में पानी की कमी हो जाती है और कमजोर हो कर निढाल सा बैठ या लेट जाता है. इस के चलते ज्यादातर बछड़ों की मौत हो जाती है. यह रोग एक माह की उम्र तक के बछड़ों को हो सकता है.

कारण

* यह बीमारी एस्चीरिचिया कोलाई नामक जीवाणु से होती है, जो ग्राम नैगेटिव होता है. इस जीवाणु के 2 सीरोटाइप होते हैं, जो आंत और रक्त के संक्रमण को फैलाते हैं. ये जीवाणु वातावरण में हर जगह पाए जाते हैं.

* जिन बछड़ों को खीस नहीं पिलाया गया हो या विटामिन ए की कमी हो अथवा शारीरिक कमजोरी हो, ऐसे बछड़ों में यह बीमारी लग सकती है. इस के अलावा अगर बछड़ों के रहने की जगह गंदी हो या खानपान में लापरवाही हो या ज्यादा बछड़ों को छोटी जगह में रखा गया हो व ज्यादा गरम या ठंडा वातावरण जैसी वजहों से भी यह रोग फैल सकता है.

* स्वस्थ पशु द्वारा रोगी पशु के गोबर से दूषित आहार व पानी का उपयोग करने से भी यह रोग फैलता है. इस के अलावा गर्भपात हुए भ्रूण, वैजाइनल डिस्चार्ज, नेवल इंफैक्शन से भी नवजात पशु में संक्रमण हो सकता है.

लक्षण

दरअसल, नीचे दिए गए लक्षणों के आधार पर बछड़ों में 3 प्रकार के दस्त होते हैं :

आंतरिक विषरक्तता काफ स्काउर

* इस में बछड़े को दस्त होता है, शरीर ठंडा व तापमान कम हो जाता है, हृदय गति कम हो जाती है, आंखों की श्लेष्मिक झिल्ली सफेद दिखाई देती है और बछड़ा निढाल हो कर कोमा की अवस्था में लेट जाता है या 2-6 घंटे में बछड़े की मौत हो जाती है.

सैप्टिसिमिक काफ स्काउर

* अकसर ऐसे लक्षण जन्म के बाद 4 दिनों तक ज्यादा होते हैं.

* बछड़ा दूध पीना बिलकुल बंद कर देता है, काफी सुस्त हो जाता है, हृदय गति कम हो जाती है, तापमान घटताबढ़ता रहता है. इस के चलते गठिया, लंगड़ापन, जोड़ों में सूजन व दर्द होता है.

* शरीर में कंपकंपाहट व आंखों का घूम जाना भी इस का लक्षण है.

आंतरिक काफ स्काउर

* यह दस्त जन्म के पहले 3 हफ्ते के दौरान होता है.

* पतले चिकनाई युक्त और सफेदपीले रंग का दस्त होता है.

* बारबार दस्त से बछड़े की पूंछ व पिछले पैर गोबर से सने रहते हैं.

* तापमान बढ़ जाता है, पल्स रेट भी बढ़ जाती है.

* बछड़ा बरतन में रखा दूध या गाय का दूध नहीं पीता है, जिस से डिहाइड्रेशन हो जाता है.

* बारबार दस्त लग जाने से पेट में काफी दर्द होता है और कमर भी मुड़ जाती है.

* यदि समय पर इलाज न हो, तो 3-5 दिन में बछड़े की मौत हो जाती है.

निदान

लक्षण व गोबर की जांच के आधार पर :

* सफेदपीले व बदबूदार दस्त जन्म के कुछ ही दिन के बाद हो जाता है.

* कौक्सीडियोसिस, परजीवी संक्रमण व अन्य रोग की संभावना को खारिज करने के लिए गोबर की जांच करना जरूरी है.

उपचार

* बछड़े को मां के दूध के अलावा एक दिन तक किसी भी तरह का दूसरा आहार नहीं देना चाहिए. अगर वह मां का दूध थनों से पीए, तो पीने देना चाहिए.

* बछड़ों में मौत की वजह शरीर में पानी की कमी होती है, इसलिए शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के लिए 5 फीसदी कैक्स्ट्रोज सैलाइन इंजैक्शन 10-20 मिलीलिटर  प्रति किलोग्राम शरीर के भारानुसार नसों में देना चाहिए.

* एस्चेरिचिया कोलाई जीवाणु एंटीबायोटिक्स के प्रति काफी रेजिस्टैंट होते हैं, इसलिए गोबर की जांच कराने के बाद ही निम्न में से कोई एक उचित एंटीबायोटिक देनी चाहिए:

फ्यूरोजोलीडोन : 10 मिलीलिटर  प्रति किलोग्राम शरीर भारानुसार प्रतिदिन मुंह द्वारा 2 विभाजित मात्रा में 3-5 दिनों तक, 200 मिलीग्राम का बोतल उपलब्ध.

नौरफ्लौक्सासिन : 22 मिलीलिटर  प्रति किलोग्राम शरीर भारानुसार प्रतिदिन मुख द्वारा 2 विभाजित मात्रा में 3-5 दिनों तक, 400 मिलीग्राम की बोतल उपलब्ध.

एमौक्सीसलिनि : 10 मिलीलिटर  प्रति किलोग्राम शरीर भारानुसार प्रतिदिन मुख द्वारा 2 विभाजित मात्रा में 3-5 दिनों तक, 1.5 ग्राम की बोतल उपलब्ध.

टैट्रासाइक्लीन : 5-10 मिलीलिटर  प्रति किलोग्राम शरीर भारानुसार प्रतिदिन मुख द्वारा 3 विभाजित मात्रा में 3-5 दिनों तक, 500 मिलीग्राम की बोतल उपलब्ध.

औक्सीटैट्रासाइक्लीन : 5-10 मिलीलिटर प्रति किलोग्राम  शरीर भारानुसार प्रतिदिन अंत:पेशीय नसों में 5-6 दिनों तक, 50 मिलीग्राम प्रति मिलीलिटर, 30 मिलीलिटर की बोतल उपलब्ध.

* जिस एंटीबायोटिक का प्रयोग मुंह द्वारा किया गया है, उसी एंटीबायोटिक का प्रयोग इंजैक्शन द्वारा करना चाहिए.

इस के अलावा क्रोटीसोन दवा शौच से बचाने के लिए दिया जाता है (डैक्सामीथासोन : 10-30 मिलीग्राम (कुल मात्रा) अंत:पेशीय नसों में 4 मिलीग्राम प्रति मिलीलिटर).

* दवा इंडीजीनस एंटीडायरहियल्स देनी चाहिए. उपलब्धता – पाउडर, ब्रांड नाम- नैबलोन, डाइरडोन, डाईलाइट, डायरीना, बछड़ों के लिए मात्रा : 6-10 ग्राम दिन में 2 बार मुख द्वारा 3-5 दिनों तक.

* विटामिन ‘ए’ का इंजैक्शन लगाना चाहिए. उपलब्धता : 6 लाख आईयू प्रति 2 मिलीलिटर इंजैक्शन की शीशी, बछड़ों के लिए मात्रा : 0.5 से 1 मिलीलिटर अंत:पेशीय और एक सप्ताह बाद दोबारा लगाना चाहिए.

* बताई गई दवाओं का उपयोग पशु डाक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए.

रोकथाम

* गाय ब्याने के स्थान पर अच्छी तरह से सफाई होनी चाहिए.

* बछड़े को सही मात्रा में खीस पिलाना चाहिए.

* बछड़ों को अधिक संख्या में एकसाथ नहीं रखना चाहिए.

* बछड़ों के रहने की जगह हवादार और साफसुथरी होनी चाहिए.

* रोगी बछड़े के गोबर से आसपास के चारापानी को दूषित होने से बचाना चाहिए

बनना है लखपति तो करें उन्नत प्रजातियों की मछली का पालन

देश की बढ़ती आबादी और घटती खेती की जमीनें खाद्यान्न संकट बढ़ाने की ओर अग्रसर है. ऐसे में बेरोजगारी व भुखमरी दोनों के बढ़ने के आसार हैं. इस स्थिति में मत्स्यपालन का व्यवसाय न केवल रोजगार का अच्छा साधन साबित होता है, बल्कि खाद्यान्न समस्या के एक विकल्प के तौर पर भी अच्छा साबित हो सकता है.

देश में दिनोंदिन मछली खाने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है, इसलिए मछली की मांग में तेजी से उछाल आया है. ऐसे में अगर बेरोजगार युवा और किसान मछलीपालन का व्यवसाय वैज्ञानिक तरीके से करें, तो न केवल कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकता है, बल्कि देश के एक छोटे से हिस्से का पेट भरने में अपना महत्वपूर्ण योगदान भी दे सकता है.

मछलीपालन के लिए मुफीद प्रजातियों व उस में अपनाई जाने वाली पालन विधि पर यहां रोशनी डाली जा रही है.

Fish

तालाब का चयन

मछलीपालन के इच्छुक लोगों को सब से पहले मछलीपालन के लिए तालाब का चयन करना पड़ता है, इस के लिए ग्राम पंचायतों, नगरपालिकाओं द्वारा संरक्षित तालाबों को पट्टे पर ले कर पालन शुरू किया जा सकता है और दूसरा, जिन के पास एक बीघा से 2 हेक्टेयर तक जमीन उपलब्ध है. वह तालाब की खुदाई करवा कर मछलीपालन का व्यवसाय शुरू कर सकते हैं.

तालाब का चयन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि तालाब में वर्षभर 1-2 मीटर पानी जरूर भरा रहे. इस के लिए तालाब में जलापूर्ति का साधन अवश्य रखना चाहिए.

तालाब में मछली के बच्चे डालने से पूर्व यह सुनिश्चित कर लेना जरूरी होता है कि तालाब बाढ़ प्रभावित न हो और न ही उस के किनारे के बंधे कटेफटे हो.

मछलीपालन के पूर्व यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि तालाब का समतलीकरण हो चुका हो. इस के अलावा तालाब में पानी आनेजाने के स्थान पर जाली लगी हो, जिस से मछलियां व जलीय जीवजंतु तालाब में न आने पाए. तालाब के सुधार का कार्य जून महीने में पूरा कर लेना चाहिए.

तालाब की सफाई

मछलीपालन करने के पूर्व ही तालाब की सफाई सुनश्चित कर लेना होना होता है. इस में जलकुंभी, लेमना, अजोला, पिस्टिया, कमल, हाईड्रिला या नजाज को तालाब से निकाल कर विरलीकरण कर लेना चाहिए, क्योंकि यह पौधे तालाब का अधिकांश भाग घेरे रहते हैं, जिस से मछलियों की वृद्धि प्रभावित होती है.

इस बात का जरूर ध्यान दें कि तालाब में खरपतवार नियंत्रण के लिए रसायन का प्रयोग न किया जाए, क्योंकि इस से पानी विषैला हो कर मछलियों के लिए घातक साबित हो सकता है.

तालाब से अवांछनीय मछलियों की सफाई भी आवश्यक होती है. यह अवांछनीय मछलियां उन्नतशील मछलियों की वृद्धि को प्रभावित करती है. इस के लिए मत्स्य बीज को तालाब में छोड़ने से पहले तालाब में महुए की खली डाल देना चाहिए, जिस के प्रभाव से पढ़िन, मांगुर, सौर, सिंधि जैसी मछलियां मर कर ऊपर आ जाती हैं, जिन्हें जाल से छान कर बाहर निकाल देना उपयुक्त होता है. इस के 15 से 20 दिन बाद ही तालाब में मत्स्य बीज का छोड़ा जाना उपयुक्त होता है, क्योंकि तब तक तालाब से महुए की खली के विष का प्रभाव समाप्त हो जाता है.

मछलियों के उच्चतम बढ़वार के लिए मत्स्यपालन विभाग की प्रयोगशालाओं में तालाब की मिट्टी का परीक्षण अवश्य कराएं, जिस से तालाब में निर्धारित मात्रा में कार्बनिक व रासायनिक खादों के उपयोग का निर्धारण किया जा सके.

Fish

चूना एवं उर्वरक का प्रयोग

मछलीपालन वाले तालाब में चूने का प्रयोग जल का क्षारीयता में बढ़ोतरी करता है और अम्लीयता को संतुलित करता है. चूना तालाब में मछलियों को दूसरे जलीय जीव से भी सुरक्षित करता है. इस के लिए 250 किलोग्राम बुझा हुआ चूना प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए. तालाब में कार्बनिक संतुलन के लिए 10 टन गोबर प्रति हेक्टेयर की दर से एक वर्ष में प्रयोग करें. यह मात्रा 10 माह की समान मासिक किस्तों में हो. गोबर की खाद डालने के 15 दिन बाद रासायनिक खादों का प्रयोग करना चाहिए, जिस में यूरिया 200 किलोग्राम, सिंगिल सुपर फास्फेट 250 किलोग्राम व पोटाश 40 किलोग्राम प्रति हेक्टयर होना चाहिए.

मछलियों की प्रजातियों का चयन

मछलीपालन के लिए कभी भी एक तालाब में अकेली एक प्रजाति की मछली का चयन नहीं करना चाहिए, बल्कि उच्च उत्पादकता 2 से 6 प्रजातियों का चयन करना चाहिए, जिस से इन की बढ़वार और उत्पादन अच्छी मात्रा में मिलता है.

कतला

यह भारतीय मछली, जिसे स्थानीय भाषा में भाकुर कहा जाता है जो बहुत तेजी से बढ़ती है. इस मछली में भोजन को मांस में बदलने में उच्च क्षमता पाई जाती है. इसलिए इस का बाजार भाव हमेशा अच्छा रहा है. यह मछली खाने वालों की पसंदीदा मछली मानी जाती है. इस मछली का सिर बड़ा होता है. इस के मूंछें नहीं होती हैं. यह जल के ऊपरी सतह पर तैरने वाले प्लवकों को भोजन के रूप में खाती है.

यह मछली ज्यादातर तालाब के भोजन को ग्रहण कर लेती है, लेकिन कृत्रिम भोजन भी इन्हें प्रिय होता है. इसलिए तालाब में कृत्रिम भोजन का छिड़काव भी किया जा सकता है.

कतला की वृद्धिदर बहुत तेज है. यह पहले वर्ष में ही 12-14 इंच की लंबाई में बढ़ती है. इस का वजन 1 किलोग्राम से ले कर 1.25 किलोग्राम तक होता है.

एक कतला मछली 1 वर्ष में 1-2 किलोग्राम तक के वजन पर 15 रुपए की लागत लेती है, जबकि इस का बाजार भाव 100 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम होता है. इस प्रकार इस में 85 से 135 रुपया तक लाभ लिया जा सकता है.

सिल्वर कार्प

यह मछली मुख्यतः रूस एवं चीन में पाई जाती है. इस का पालन भारतीय किसानों के लिए अच्छी आमदनी का साधन बनी है.

सिल्वर कार्प लंबी व चपटे शरीर वाली मछली है. इस का सिर नुकीला व थूथन गोल होता है. यह मछलियां तालाब के सैवाल व सड़ेगले पदार्थों को खाती हैं. इन्हें अलग से मछलियों का चारा खिलाया जाना भी अच्छा होता है.

सिल्वर कार्प तालाब में बड़ी तेजी से बढ़ती है, जो 12 से 14 इंच तक की लंबाई में हो जाती है. एक वर्ष में इस का वजन 1.5 किलोग्राम से 1.8 किलोग्राम तक होता है, जिस में प्रति मछली मात्र 15 रुपए की लागत आती है.

रोहू

इस मछली का वैज्ञानिक नाम लेबियो रोहिता है. यह भारतीय प्रजाति की सब से तेज बढ़ने वाली प्रजातियों में गिनी जाती है. इस प्रजाति की मछलियां सभी प्रजाति में सब से स्वादिष्ठ मानी जाती है, इसलिए खाने वाले इसे सब से ज्यादा पंसद करते हैं.

यह मछली तालाब के अंदर के शैवाल जलीय पौधों की पत्तियों इत्यादि को खाती है. रोहू की वृद्धि दर कतला से थोड़ी कम है. यह अपने जीवनकाल में 3 फुट की लंबाई तक बढ़ सकती है, जिस का वजन एक किलोग्राम तक पाया जाता है.

उपरोक्त मछलियों का पालन सुनश्चित करने के लिए एक हेक्टेयर तालाब में 5,000 मत्स्य बीज या अंगुलिकाएं डालने की आवश्यकता पड़ती है.

मछलियों का पूरक आहार एवं वृद्धि का निरीक्षण

मछलियों की समुचित वृद्धि के लिए मूंगफली, सरसों या तिल की खरी को चावल के कन या गेहूं के चोकर के साथ बराबर मात्रा में मिला कर मछलियों के भार के 1 से 2 फीसदी की दर से देना चाहिए. अगर ग्रास कार्प मछली का पालन किया गया है, तो पानी की वनस्पतियों जैसे लेमना, हाइड्रिला, नाजाज, सिरेटो फाइलम या स्थलीय वनस्पतियों जैसे नेपियर , बरसीम या मक्के के पत्ते इत्यादि को जितना खाएं, उतनी मात्रा में प्रतिदिन देना चाहिए.

मछलियों के बीज तालाब में डालने के बाद प्रत्येक माह तालाब में जाल डाल कर उन के स्वास्थ्य व वृद्धि की जांच करते रहना चाहिए. अगर मछलियां परजीवी से प्रभावित हों, तो उन्हें पोटेशियम परमैगनेट यानी लाल दवा या नमक के घोल में डुबो कर तालाब में छोड़ें. मछलियों में लाल चकत्ते या घाव दिखाई दे तो अपने नजदीकी मत्स्य विभाग से जरूर संपर्क करें.

मछलियों की निकासी व बिक्री

मछलियों की उम्र जब 12-16 माह की हो जाए और उन का वजन 1-2 किलोग्राम हो, तो उन्हें तालाब से निकाल कर स्थानीय मंडी या बाजार में बेचा जा सकता है, जिस से मत्स्यपालक अच्छा लाभ कमा सकता है.

गरीबों की गाय है बकरी

सदियों से बकरियां ज्यादातर निर्बल, भूमिहीन, खेतिहर मजदूर, आर्थिक रूप से पिछड़े व सीमांत किसानों के लिए बहुत उपयोगी रही हैं. बकरीपालन एक ऐसा व्यवसाय है, जिसे बड़ा, मध्यम, छोटा व भूमिहीन किसान कम लागत और कम जगह में आसानी से कर सकता है.

बकरियां हमें दूध, मांस, खाल व खाद प्रदान करती हैं, जिसे जब चाहे, जहां चाहे आसानी से बेच कर पैसा कमा सकते हैं, इसलिए बकरी को गरीबों की गाय कहा जाता हैं.

* बकरीपालन से अच्छा मुनाफा लेने के लिए 10 बकरियों और एक बकरे से बकरीपालन यूनिट की शुरुआत करें.

* बकरियां 10 से 12 माह में बच्चे देने योग्य हो जाती हैं और आमतौर पर एक से ज्यादा बच्चे देती हैं.

* बकरे 12-15 माह की उम्र के बाद ही प्रजनन करने योग्य हो जाते हैं.

* बकरा और बकरी के बीच नजदीकी संबंध न होने दें, इसलिए इन को अलगअलग रखना चाहिए.

* बकरियों को गरम होने (गरमी में आने) के 10-12 और 24-26 घंटों के बीच 2 बार पाल दिलाएं.

* बकरी को बच्चा देने के 35 से 40 दिनों के बाद ही गरम होने (गरमी में आने) पर गाभिन कराएं.

* गाभिन बकरियों को गर्भावस्था के आखिरी डेढ़ महीने में चारे के अलावा कम से कम 200 से 300 ग्राम तक संतुलित दाना मिश्रण जरूर खिलाएं.

* बकरियों को हमेशा ताजा व साफ पानी पिलाएं.

* हरे चारे के लिए मौसमी चारे जैसे लोबिया व सूडान चरी वगैरह की बोआई करें.

* बकरियों को कोमल पत्तियां खाना ज्यादा पसंद है, इसलिए पाकड़, पीपल, गूलर, सहजन, बबूल वगैरह पौधों का रोपण करें.

* खनिजों की कमी पूरी करने के लिए 20 ग्राम खनिज लवण मिश्रण प्रति पशु के हिसाब से रोजाना दें.

अब दूध भी और्गेनिक

हैल्थ इज वैल्थ यानी स्वास्थ्य ही धन है. यह कहावत दुनिया मानती है. आज हर तरफ और्गेनिक का बोलबाला है. सब्जी, फल, मसाले, दालें, आटा सभी कुछ और्गेनिक मिल रहा है और लोग भी और्गेनिक चीजों को खासा पसंद कर रहे हैं. इसी बीच अब और्गेनिक दूध का भी प्रचलन बढ़ रहा है. कई कंपनियां तो लोगों को और्गेनिक दूध मुहैया करा भी रही हैं.

क्या है और्गेनिक दूध

और्गेनिक का मतलब होता है 100 फीसदी नैचुरल यानी जिस चीज के उत्पादन में किसी भी रासायनिक वस्तु का इस्तेमाल नहीं किया गया हो. दूध गाय और भैंस से निकाला जाता है, तो फिर इस में और्गेनिक क्या है, यह बड़ा सवाल है.

दरअसल, और्गेनिक दूध पाने के लिए पशुओं को ऐसा चारा खिलाया जाता है, जिस का उत्पादन जैविक खाद से किया जाता है. इस के साथ ही इन जानवरों को किसी भी तरह का एंटीबायोटिक भी नहीं दिया जाता है.

और्गेनिक डेरी फार्म में स्वच्छंद घूमती हैं गाय

बड़े स्तर पर और्गेनिक दूध का उत्पादन करने के लिए खास तरह के डेरी फार्म की जरूरत होती है. ये डेरी फार्म कई एकड़ में फैले होते हैं. यहां एक हिस्से में पशुओं को रखने का इंतजाम होता है, वहीं कई बड़े हिस्से में पशुओं के लिए और्गेनिक तरीके से चारे का उत्पादन किया जाता है.

इन डेरी फार्मों पर पशुओं को रेडीमेड चारा नहीं खिलाया जाता, बल्कि फार्म में ही पैदा किया गया पौष्टिक व जैविक चारा खिलाया जाता है. जैविक चारा इसलिए कहते हैं, क्योंकि इसे उगाने में रासायनिक खादों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.

इतना ही नहीं, इन फार्मों में गायों को नैचुरल वातावरण में स्वच्छंद घूमने दिया जाता है और चरने दिया जाता है, इन्हें बांध कर नहीं रखा जाता है.

मशीन से दूध निकालना

और्गेनिक डेरी फार्म पर गायों का दूध निकालने में हाथ का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि दूध दुहने के लिए मशीनों का इस्तेमाल होता है. मशीन के जरीए दूध निकाल कर सीधे उसे चिलर प्लांट में ले जाया जाता है और फिर वहां से पैकिंग के बाद उपभोक्ताओं तक सप्लाई किया जाता है.

Organic Milk
Organic Milk

सेहत के लिए फायदेमंद

और्गेनिक दूध सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है. शोध से पता चला है कि और्गेनिक चारा खाने वाली गाय का दूध पीने से शरीर में पौलीअनसैचुरेटिड फैट में इजाफा होता है. इस फैट का सेवन दिल के लिए फायदेमंद होता है.

इस दूध में कोलैस्ट्रौल की मात्रा सामान्य दूध से दोगुनी होती है. एक नई रिसर्च में यह भी सामने आया है कि और्गेनिक दूध में ओमैगा 3 होता है, जो दिल के लिए अच्छा होता है.

भैंसपालन : अच्छी नस्ल और खानपान

गांवदेहात व शहरी इलाकों में दूध की जरूरत की सप्लाई के लिए आमतौर पर किसान गायभैंस पर ही निर्भर रहते हैं. कई बार अच्छी भैंस खरीद कर लाने के बाद भी हमें अच्छा दूध का उत्पादन नहीं मिल पाता है या कई बार भैंस दूध में रहने के बाद भी समय से गरम नहीं होती. इस के चलते किसानों को भारी आर्थिक नुकसान होता है.

सब से पहले भैंसपालन के लिए अच्छी नस्ल की भैंस का होना बेहद जरूरी है. पशुपालकों को भैंसपालन संबंधी जानकारी होने के साथ ही उस की अलगअलग प्रजातियों की जानकारी होनी चाहिए. इस के लिए आप मुर्रा भैंस को चुन सकते हैं. मुर्रा भैंस को पालने के लिए उसे संतुलित आहार देना भी बेहद जरूरी है. इस की पूरी और सटीक जानकारी होनी चाहिए.

पशुपालकों को चाहिए कि वे पशुओं के लिए एक बेहतर चारा तैयार करें. इस में दाने की तकरीबन 35 फीसदी मात्रा होनी चाहिए. इस के अलावा खली (सरसों की खली, मूंगफली की खली, अलसी की खली, बिनौला की खली) की मात्रा तकरीबन 30 किलोग्राम होनी चाहिए. इन में से कोई भी खली आप मिला सकते हैं.

इस के अलावा गेहूं का चोकर या चावल की पालिका भी 30 किलोग्राम प्रयोग करें.

2 किलोग्राम खाने वाला नमक और 3 किलोग्राम खनिज मिश्रण पाउडर मिला कर राशन की मात्रा को 100 किलोग्राम बना लें.

अब इस राशन को दूध के मुताबिक प्रति 2.5 लिटर दूध पर 1 किलोग्राम राशन जानवर को उपलब्ध कराएं. इस के अलावा एक से डेढ़ किलोग्राम राशन पशु के स्वास्थ्य के लिए दें. इस प्रकार आप का पशु दूध व स्वास्थ्य दोनों ही हिसाब से अच्छा हो जाएगा.

भैंस हर साल बच्चा दे

अगर भैंस ने हर साल बच्चा नहीं दिया, तो भैंस पर आने वाला रोजाना सवा सौ रुपए का खर्चा आप नहीं निकाल सकते हैं, इसीलिए भैंसपालक इस बात को ध्यान में रखें और अगर जरूरत पड़ती है, तो भैंस का इलाज भी नियमित रूप से पशु डाक्टर से करवाएं.

भैंसों के लिए आरामदायक बाड़ा

भैंसपालन के लिए सब से जरूरी बात है कि उन का रखरखाव साफसुथरा हो. उन के लिए आरामदायक बाड़ा बनाया जाना चाहिए. बाड़ा ऐसा हो, जो भैंस को सर्दी, गरमी व बरसात से बचा सके. बाड़े में कच्चा फर्श हो, लेकिन वह फिसलन भरा नहीं होना चाहिए. बाड़े में सीलन न हो और वह हवादार हो.

पशुओं के लिए साफ पानी पीने के लिए रखना चाहिए. अगर पशुओं को आराम मिलेगा, तो उन का दूध उत्पादन उतना ही बेहतर होगा.

भैंस की नस्लें

भैंस प्रमुख दुधारू पशु है. इस की अपनी भी कई तरह की प्रजातियां हैं. तो आइए जानते हैं कि ये नस्लें कौनकौन सी हैं :

मुर्रा भैंस

यह दूध देने वाली सब से उत्तम भैंस होती है. भारत और अन्य देशों में भी इस के बीज का कृत्रिम गर्भाधान में उपयोग किया जाता है.

यह भैंस प्रतिदिन 10-20 लिटर दूध दे देती है. इस के दूध में चिकनाई की मात्रा गाय के दूध से दोगुनी होती है. इस के दूध का इस्तेमाल दही, दूध, मट्ठा, लस्सी आदि में होता है.

भदावरी भैंस

यह ज्यादातर उत्तर भारत के कई इलाकों में देखी जा सकती है. इस के अलावा यह मथुरा, आगरा, इटावा आदि जगह पर आप को देखने को मिल सकती है. इस के दूध में 14 से 18 फीसदी तक फैट शामिल होता है.

मेहसाना भैंस

यह भैंस एक ब्यांत में 1,200 से 1,500 लिटर दूध देती है. यह गुजरात के मेहसाणा जिले में पाई जाती है.

यह भैंस काफी बेहतर होती है. इस में प्रजनन की कोई भी समस्या नहीं होती है. इस को मुर्रा भैंस से क्रौस करवा कर दूध उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है.

जाफराबादी भैंस

यह भैंस मुख्य रूप से गुजरात राज्य में मिलती है. इस भैंस का सिर काफी भारी होता है. इस के सींग नीचे की ओर झुके हुए होते हैं. यह शरीर में भी काफी भारी होती है. इस भैंस के दूध में काफी मात्रा में वसा पाई जाती है.

Animal Food

भैंसपालन के लिए आहार की विशेषताएं

* भैंस के लिए आहार बेहद ही संतुलित होना चाहिए. इस के लिए दाना मिश्रण में प्रोटीन और ऊर्जा के स्रोतों व खनिज लवणों का पूरी तरह से समावेश होना चाहिए.

* आहार पूरी तरह से पौष्टिक और स्वादिष्ठ होना चाहिए और इस में कोई बदबू नहीं आनी चाहिए.

* दाना मिश्रण में ज्यादा से ज्यादा प्रकार के दाने और खलों को मिलाना चाहिए.

* आहार पूरी तरह से सुपाच्य होना चाहिए. किसी भी रूप में कब्ज करने वाले या दस्त करने वाले चारे को पशु को नहीं खिलाना चाहिए.

* भैंस को भरपेट खाना खिलाना चाहिए. उस का पेट काफी बड़ा होता है. उस को पूरा पेट भरने पर ही संतुष्टि मिलती है. अगर भैंस का पेट खाली रह जाता है, तो वह मिट्टी, चिथड़े और गंदी चीजें खाना शुरू कर देती है.

* भैंस के चारे में हरा चारा ज्यादा मात्रा में होना चाहिए, ताकि वह पौष्टिक रहे.

* भैंस के चारे में अचानक बदलाव न करें. यदि कोई भी बदलाव करना है, तो पहले वाले आहार के साथ मिला कर उस में धीरेधीरे बदलाव करें.

* भैंस को ऐसे समय पर खाना खिलाएं, जिस से कि वह लंबे समय तक भूखी न रहे यानी उस के खाने का एक नियत समय रखें और आहार में बारबार बदलाव न करें.

भैंस के लिए उपयुक्त चारा

भैंस के लिए हम 2 तरह से आहार को बांट सकते हैं, जो कि काफी फायदेमंद होता है.

चारा और दाना : चारे में रेशेयुक्त तत्त्वों की मात्रा शुष्क भार के आधार पर 18 फीसदी से ज्यादा होती है. पचनीय तत्त्वों की मात्रा 60 फीसदी से कम होती है.

सूखा चारा : चारे में नमी की मात्रा यदि 10-12 फीसदी से कम है, तो यह सूखे चारे की श्रेणी में आता है. इस में गेहूं का भूसा, धान का पुआल, ज्वार, बाजरा और मक्का, कड़वी आदि है. इन की गणना घटिया चारे के रूप में होती है, जो कि केवल पेट भरने का काम करता है.

हरा चारा : यदि हरे चारे में पानी की मात्रा  80 फीसदी हो, तो इसे हरा व रसीला चारा कहते हैं. पशुओं के लिए यह हरा चारा 2 प्रकार का होता है, दलहनी और बिना दाल वाला.

दलहनी चारे में बरसीम, रिजका, ग्वार, लोबिया आदि आते हैं. इन में प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होती है. ये अत्यधिक पौष्टिक व उत्तम गुणवत्ता वाले होते हैं, वहीं बिना दाल वाले चारे में ज्वार, बाजरा, मक्का, जई, अगोला और हरी घास आदि आते हैं. दलहनी चारे की अपेक्षा इन में प्रोटीन की मात्रा कम होती है.

अगर इस प्रकार से पशुपालक भैंसपालन करेंगे, तो निश्चित ही अपने पशु से लाभ पा सकते हैं.

मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों के माध्यम से घरों पर पशु चिकित्सा सेवा

नई दिल्ली : पशुपालन और डेयरी विभाग ने आजादी का अमृत महोत्सव के भाग के रूप में कौमन सर्विस सेंटर (सीएससी) नेटवर्क के माध्यम से पशुजन्य रोग पर एक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया. सीएससी नेटवर्क के माध्यम से जुड़े देशभर के डेढ़ लाख से अधिक किसानों ने जागरूकता कार्यक्रम में भाग लिया.

पशुपालन और डेयरी विभाग की सचिव अलका उपाध्याय ने इस अवसर पर किसानों को संबोधित किया और पशुजन्य बीमारी से जुड़े जोखिमों और पशुधन क्षेत्र और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर इस के प्रभाव पर जोर दिया.

उन्होंने कहा कि विभाग राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) लागू कर रहा है, जो दो प्रमुख प्रचलित पशुजन्य रोग के नियंत्रण के लिए सितंबर, 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई एक प्रमुख योजना है. एफएमडी के लिए 100 फीसदी भैंस, भेड़, बकरी और सूअर और 4-8 महीने की 100 फीसदी गोजातीय बछड़ी को खुरपकामुंहपका रोग और ब्रुसेलोसिस का टीका लगा रहा है.

Animal Healthcare
Animal Healthcare

विभाग एंथ्रेक्स और रेबीज जैसी पशुजन्य बीमारियों के खिलाफ टीकाकरण और ‘आकस्मिक और विदेशी बीमारियों के नियंत्रण’ के लिए राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों की सहायता भी कर रहा है. सामाजिक व आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए विभाग रोग के निदान, उपचार, छोटी सर्जरी और बीमार जानवरों की देखभाल और प्रबंधन आदि में जागरूकता के लिए मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (एमवीयूएस) के माध्यम से किसानों के दरवाजे पर पशु चिकित्सा सेवा प्रदान कर रहा है.

पशुपालन और डेयरी सचिव ने दोहराया कि पशुपालन और डेयरी विभाग किसानों के घरों पर गुणवत्तापूर्ण सेवाएं प्रदान करने और पशु रोगों के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए बेहतर पशु चिकित्सा स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता/पहुंच बढ़ाने की खातिर सभी हितधारकों के साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध है.

उन्होंने वर्तमान परिदृश्य में जूनोसिस (पशुजन्य) रोगों से जुड़े जोखिम को नियंत्रित करने में ‘वन हेल्थ’ अवधारणा के महत्व पर भी प्रकाश डाला.

उन्होंने पशुजन्य बीमारी, टीकाकरण कार्यक्रम और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण बीमारियों और अन्य आकस्मिक और विदेशी बीमारियों के उन्मूलन और नियंत्रण के लिए विभाग द्वारा कार्यान्वित की जा रही योजनाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी.

विभाग के अधिकारियों द्वारा प्रस्तुतीकरण के माध्यम से उपस्थित लोगों को ‘जूनोसिस के जोखिम और रोकथाम’ और ‘रेबीज की रोकथाम और नियंत्रण’ के बारे में पूरी जानकारी दी गई.

सालभर हरे चारे के लिए उत्तम है गिनी घास की खेती

पशुपालकों के लिए हरे चारे की उपलब्धता का संकट पशुपालन की कठिनाइयों के लिहाज से एक प्रमुख समस्या मानी जाती है, जबकि पशुओं के समुचित विकास और अधिक दुग्ध के लिए प्रचुर मात्रा वाले पोषक तत्व से युक्त हरा चारा खिलाना बेहद जरूरी होता है.

पशुपालकों के लिए साल के कुछ महीने ऐसे होते हैं, जिस में वह आसानी से हरे चारे की उपलब्धता कर लेता है. लेकिन गरमियों के महीनों में अधिक पानी व सिंचाई के अभाव में पशुओं के लिए आवश्यक मात्रा में हरा चारा उगा पाना कठिनाई भरा होता है. इन परिस्थियों में पशुपालकों को हरे चारे के संकट से उबारने में बहुवर्षीय चारे की प्रजातियां बेहद फायदेमंद साबित होती हैं.

बहुवर्षीय हरे चारे में से एक गिनी घास की खेती इस लिहाज से फायदेमंद साबित होती है. हरे चारे के इस बहुवर्षीय फसल में पानी और सिंचाई की आवश्यकता दूसरे चारे की फसलों की अपेक्षा कम होती है. इस की फसल कम नमी की अवस्था में भी बड़ी तेजी से वृद्धि करती है.

गिनी घास में उपलब्ध पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा और उस का स्वाद दुधारू पशुओं में दूध बढ़ाने में कारगर साबित होता है. गिनी घास की खेती आसान तरीकों से की जा सकती है. इस के लिए दोमट या बलुई दोमट उपयुक्त होती है, जिस में जलनिकासी की उचित व्यवस्था होना जरूरी है.

गिनी घास की फसल के लिए अम्लीय व क्षारीय मिट्टी उपयुक्त नहीं होती है. गिनी घास की फसल को छायादार स्थानों, मेंड़ों, नहरों के किनारे पर भी आसानी से उगाया जा सकता है.

गिनी घास की फसल लेने के लिए इस की बोआई सीधे बीज द्वारा, तने की कटिंग द्वारा या जड़ों की रोपाई कर की जा सकती है.

पोषक तत्वों की उपलब्धता

विषयवस्तु विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह के अनुसार, गिनी घास में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्वों की उपलब्धता पाई जाती है. इस में रेशा 28.36 फीसदी, प्रोटीन 6.10 फीसदी, फास्फोरस 0.29 फीसदी, कैल्शियम 0.29 फीसदी, मैग्नीशियम 0.38 फीसदी व पत्तों की पाचन क्षमता 55.58 फीसदी की मात्रा उपलब्ध होती है, जो पशुओं के विकास व दुधारू पशओं में दूध बढ़ाने में सहायक होती है.

नर्सरी तैयार करना

गिनी घास की रोपाई जड़ों से करना ज्यादा उपयुक्त होता है, क्योंकि इस से पौधे से पौधे की दूरी व लाइन से लाइन की दूरी का निर्धारण आसानी से किया जा सकता है. जड़ों से रोपाई के लिए सब से पहले इस की नर्सरी तैयार करें. एक हेक्टेयर खेत में जड़ों की रोपाई के लिए 3.4 किलोग्राम बीज की आवश्यकता नर्सरी डालने के लिए होती है.

नर्सरी डालने का सब से उपयुक्त समय अप्रैलमई माह का होता है. इस के लिए 6 मीटर लंबे और 1 मीटर चौड़ी 10-20 क्यारियां बनानी पड़ती हैं. इन क्यारियों में बीज डालने के पहले गोबर की कंपोस्ट खाद मिलाना नर्सरी उठने में सहायक होता है. नर्सरी में बीज डालने के उपरांत नर्सरी की फव्वारे से सिंचाई करते रहें.

बोआई का उचित समय

विषयवस्तु विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह बताते हैं कि गिनी घास चारे की ऐसी फसल है, जिसे वर्षभर में कभी भी बोया या रोपा जा सकता है. फिर भी सर्दी के मौसम में गिनी घास की रोपाई करने से बचना चाहिए. गिनी घास की रोपाई का सब से उपयुक्त समय वर्षा ऋतु का होता है.
गिनी घास की बोआई या रोपाई के पहले खेत की एक जुताई रोटावेटर या हैरो से करने के पश्चात दूसरी जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए.

अगर फसल की बोआई बीज से की जा रही है, तो बीज को एक से डेढ़ सैंटीमीटर गहराई में डालें. तने की कटिंग की रोपाई की दशा में कटिंग कम से कम 3 माह पुराना होना जरूरी है.

कटिंग के समय यह ध्यान दें कि जमीन के भीतर आधे से अधिक गाड़ देना चाहिए. खेत में रोपी गई इस कटिंग में जो गांठ जमीन के अंदर होती है, उसी से जड़ें निकलती हैं, जबकि ऊपरी गांठ से तना निकलता है.

गिनी घास की रोपाई करते समय पौध से पौध की दूरी 50 सैंटीमीटर व लाइन से लाइन की दूरी 100 सैंटीमीटर रखना न भूलें.

अगर इसे अन्य फसलों के साथ रोपा जा रहा है, तो यह दूरी और बढ़ा देनी चाहिए. यह दूरी 100 से 250 सैंटीमीटर तक हो जाती है. दूसरी फसलों के साथ लेने की अवस्था में इसे बोई गई फसल के 2 लाइनों के बीच में बोया जाता है. एक हेक्टेयर खेत के लिए गिनी घास की 40,000 से 50,000 जड़ों की जरूरत पड़ती है.

गिनी घास की उन्नत प्रजातियां

गिनी घास की प्रजातियां, जो ज्यादा प्रचलित हैं, उन में कोयंबदूर- 1, कोयंबदूर- 2, डीजीजी-1, बुंदेल गिनी-1, बुंदेल गिनी-2, बुंदेल गिनी- 4, मकौनी, गटन, पीजीजी-1, पीजीजी-9 पीजीजी-14, पीजीजी-19, पीजीजी-101 व हेमिल प्रमुख हैं.

खाद एवं उर्वरक

विषयवस्तु विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह के अनुसार, हरे चारे की फसल के लिए गोबर की सड़ी खाद, कंपोस्ट खाद या केंचुआ खाद ज्यादा फायदेमंद होती है. अधिक चारा उत्पादन के लिए बोआई के पहले ही 200 से 250 क्विंटल तक गोबर की सड़ी खाद का उपयोग एक हेक्टेयर खेत के लिए करें.

जब जड़ों की रोपाई खेत में की जा रही हो, तब 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस व 40 किलोग्राम पोटाश की मात्रा का उपयोग प्रति हेक्टेयर की दर से पौधों की जड़ों को देना चाहिए. इस के उपरांत प्रति हेक्टेयर की दर से हर कटाई के बाद 40 किलोग्राम नाइट्रोजन व 10 किलोग्राम फास्फोरस की मात्रा फसल को देनी चाहिए.

सिंचाई

गिनी घास की जड़ों की रोपाई खेत में करने के तुरंत बाद पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद बारिश न होने की अवस्था में 10-15 दिन के अंतराल पर नियमित सिंचाई करते रहें. फसल में उग आए अनावश्यक खरपतवार को समयसमय पर निकालते रहना जरूरी है.

कटाई व उत्पादन

गिनी घास की पहली कटाई फसल रोपे जाने के 2 से 3 तीन माह बाद से शुरू किया जाता है. इस के बाद की नियमित कटाई 30-45 दिन के अंतराल पर की जा सकती है या फसल की लंबाई लगभग 5 फुट के करीब हो जाए तो भी फसल को जमीन से 15 सैंटीमीटर के ऊपर से काटा जा सकता है. सर्दियों की पहली कटाई जमीन से सटा कर करनी चाहिए. इस से फसल में खराब तने अपनेआप हट जाते हैं.

गिनी घास की फसल उत्तर व मध्य भारत के लिहाज से वर्षभर में 5-7 बार व दक्षिण भारत में पूरे वर्ष ली जा सकती है तो 7-8 बार तक हो सकती है.

गिनी घास की उन्नत प्रजातियों की फसल लेने की दशा में औसत उत्पादन 200 से 250 क्विंटल हरा चारा प्रति हेक्टेयर प्रति कटाई प्राप्त होता है. इस प्रकार वर्ष का औसत उत्पादन 1,200 से 1,300 क्विंटल तक प्राप्त हो सकता है.

गिनी घास की खेती के बारे में अधिक जानकारी व बीज के लिए भारतीय घास और चारा अनुसंधान संस्थान (आईजीएफआरआई) (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), ग्वालियर रोड, झांसी – 284003 (उत्तर प्रदेश) से संपर्क किया जा सकता है.

भारत दुनिया में अंडा उत्पादन में तीसरे स्थान पर

नई दिल्ली : भारत के पास पशुधन और मुरगीपालन के विशाल संसाधन हैं, जो ग्रामीण जनता की सामाजिक और आर्थिक स्थितियों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. पशुधन आजीविका कमाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह आय में वृद्धि करता है, रोजगार के अवसर प्रदान करता है. पशुपालन के माध्यम से कृषि में विविधता ग्रामीण आय में वृद्धि के प्रमुख चालकों में से एक है.

केंद्रीय मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि पशुपालन और डेयरी विभाग ने प्रति पशु उत्पादकता में सुधार के लिए पिछले 9 वर्षों के दौरान अनेक महत्वपूर्ण पहल की हैं. उत्पादकता में वृद्धि से घरेलू बाजार और निर्यात बाजार के लिए अधिक दूध, मांस और पशुधन उत्पादों के उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी.

poultry

उन्होंने आगे कहा कि विभाग प्रमुख पशुधन रोगों के पूरी तरह नियंत्रण, उन्मूलन और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए अनेक कार्यक्रम लागू कर रहा है. विभाग पशुधन क्षेत्र के माध्यम से विशेष रूप से किसानों की आय बढ़ाने में मदद करने के सामान्य उद्देश्य से अन्य मंत्रालयों और हितधारकों के साथ मिल कर तालमेल करने के प्रयास कर रहा है.

पशुपालन और डेयरी विभाग सभी हितधारकों के साथ काम करने के लिए प्रतिबद्ध है और वह किसानों के दरवाजे पर गुणवत्तापूर्ण सेवाएं प्रदान करने के लिए अधिकतम सहायता प्रदान करेगा.

पशुधन का जारी किया आंकड़ा

केंद्रीय मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने पशुधन क्षेत्र के आंकड़े जारी करते हुए बताया कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का एक महत्वपूर्ण उपक्षेत्र है. यह वर्ष 2014-15 से 2020-21 के दौरान (स्थिर कीमतों पर) 7.93 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ा है. कुल कृषि और संबद्ध क्षेत्र में पशुधन का योगदान सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) (स्थिर कीमतों पर) 24.38 फीसदी (2014-15) से बढ़ कर 30.87 फीसदी (2020-21) हो गया है. भारत में पशुधन क्षेत्र का योगदान 2020-21 में कुल जीवीए का 6.2 फीसदी है.

पशुधन जनसंख्या पर भी साझा किए आंकड़े

उन्होंने 20वीं पशुधन जनगणना के आंकड़े जारी कर बताया कि देश में लगभग 303.76 मिलियन गोजातीय (मवेशी, भैंस, मिथुन और याक), 74.26 मिलियन भेड़, 148.88 मिलियन बकरियां, 9.06 मिलियन सूअर और लगभग 851.81 मिलियन मुरगियां हैं, वहीं डेयरी देश की सब से बड़ी कृषि वस्तु है, जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में 5 फीसदी योगदान देती है और 8 करोड़ से अधिक किसानों को सीधे रोजगार देती है.

उन्होंने यह भी बताया कि भारत दूध उत्पादन में पहले स्थान पर है, जो वैश्विक दूध उत्पादन में 23 फीसदी का योगदान देता है. पिछले 8 वर्षों में दूध उत्पादन में 51.05 फीसदी की वृद्धि हुई है, जो वर्ष 2014-15 के दौरान 146.3 मिलियन टन से बढ़ कर 2021-22 के दौरान 221.06 मिलियन टन पर पहुंच गई. दूध उत्पादन पिछले 8 वर्षों में 6.1 फीसदी की वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ रहा है, जबकि विश्व दूध उत्पादन प्रति वर्ष केवल 1.2 फीसदी की दर से बढ़ा है. वर्ष 2021-22 में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 444 ग्राम प्रति दिन है, जबकि वर्ष 2021 के दौरान विश्व औसत 394 ग्राम प्रतिदिन है.

अंडा एवं मांस उत्पादन के उत्पादन पर दी जानकारी

उन्होंने कहा कि फूड एंड एग्रीकल्‍चर और्गनाइजेशन कारपोरेट स्टैटिस्टिकल डेटाबेस (एफएओएसटीएटी) उत्पादन डेटा (2020) के अनुसार, भारत दुनिया में अंडा उत्पादन में तीसरे और मांस उत्पादन में 8वें स्थान पर है. देश में अंडा उत्पादन वर्ष 2014-15 में 78.48 बिलियन से बढ़ कर वर्ष 2021-22 में 129.60 बिलियन हो गया है. देश में अंडे का उत्पादन 7.4 फीसदी प्रति वर्ष की दर (सीएजीआर) पर बढ़ रहा है. वर्ष 2021-22 में अंडे की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 95अंडे प्रति वर्ष है. देश में मांस उत्पादन वर्ष 2014-15 में 6.69 मिलियन टन से बढ़ कर वर्ष 2021-22 में 9.29 मिलियन टन हो गया.

जुलाई महीने  के खेती से जुड़े जरूरी काम

खरीफ की खेती के नजरिए से सब से अहम खेती धान की होती है. जो किसान धान की नर्सरी समय से डाल चुके होते हैं, वह धान की रोपाई जुलाई के पहले हफ्ते से शुरू कर सकते हैं. देर से नर्सरी डालने वाले किसान नर्सरी में पौधों के 20 से 30 दिन के हो जाने पर ही रोपाई करें.

धान की शीघ्र पकने वाली प्रजातियों की रोपाई जुलाई के दूसरे पखवाड़े तक की जा सकती है. जिन किसानों ने कालानमक धान, बासमती जैसी सुगंधित प्रजातियों की नर्सरी डाली है, वह रोपाई का काम जुलाई महीने के अंत तक निबटा लें.

धान के पौधों की रोपाई के समय यह ध्यान रखें कि कतार से कतार की दूरी 20 सैंटीमीटर रखी जाए और एक जगह पर एकसाथ 2 से 3 पौधे लगाएं.

जिन किसानों ने ढैंचा की फसल बो रखी है, वह रोपाई के 3 दिन पूर्व ही उसे मिट्टी पलटने वाले हल से पलट कर सड़ने के लिए खेत में पानी भर दें.

खेत में उर्वरक का प्रयोग मिट्टी जांच के आधार पर ही करें. जिन किसानों ने खेत की मिट्टी की जांच नहीं करवाई है, वे अधिक उपज वाली फसलों में रोपाई के पहले प्रति हेक्टेयर की दर से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन के साथ 60 किलोग्राम फास्फेट व 60 किलोग्राम पोटाश को लेव लगाते समय खेत में मिला दें.

धान की रोपाई से पहले 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक सल्फेट खेत में जरूर मिलाएं, लेकिन यह ध्यान रखें कि फास्फोरस वाले उर्वरक के साथ जिंक सल्फेट कभी न मिलाएं.

जब भी खेत में दानेदार रसायनों का प्रयोग करें, तो उस के पूर्व यह पक्का कर लें कि खेत में 2 से 3 सैंटीमीटर पानी भरा हो.

अगर किसान धान की फसल में नैनो यूरिया का प्रयोग करते हैं, तो उर्वरकों पर लागत में काफी कमी लाई जा सकती है.

किसान को अगर खेत में खैरा रोग का प्रकोप दिखाई पड़े, तो प्रति हेक्टेयर 20 से 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट व ढाई किलोग्राम चूने को 800 लिटर पानी में मिला कर घोल बना लें और इस घोल का छिड़काव रोगग्रस्त फसल पर करें.

जिन किसानों ने मक्के की बोआई समय से कर दी हो, वह बोने के 15 दिन बाद फसल की पहली निराईगुड़ाई का काम पूरा करें. इसी के साथ दूसरी गुड़ाई फसल के 30 से 35 दिन के हो जाने पर करें.

मक्के की पौध जब घुटने के बराबर हो जाए, तो पौधों को 40 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 87 किलोग्राम यूरिया कतारों के बीच में डालें.

ज्वार की बोआई का काम किसान जुलाई महीने की 15 तारीख तक निबटा लें. एक हेक्टेयर खेत के लिए ज्वार की 10 से 15 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

ध्यान रखें कि ज्वार के बीज की कतार से कतार की दूरी 45 सैंटीमीटर व बीज की दूरी 15 से 20 सैंटीमीटर पर की जाए.

बाजरा की खेती करने वाले किसान उन्नत प्रजातियों के बीज का प्रयोग करें. इस में आईसीएमवी-155, डब्ल्यूसीसी-75, राज-171, पूसा-322, पूसा-23 और आईसीएमएच-451 जैसी किस्मों का चयन करें.

बाजरे की बोआई 15 जुलाई के बाद से पूरे महीने की जा सकती है. इस के लिए एक हेक्टेयर में 4-5 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

जो किसान मूंग और उड़द की खेती करते हैं, उस के लिए जुलाई का महीना उपयुक्त माना जाता है. इस के लिए एक हेक्टेयर खेत में 12 से 15 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है.

उड़द या मूंग को खेत में बोने के पूर्व राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना न भूलें. बीज को खेत में बोते समय 15 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फेट और 20 किलोग्राम गंधक का प्रयोग करें.

जिन किसानों ने अरहर बो दी है, वे बोआई के 20 से 30 दिन बाद फसल की निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकाल दें.

जिन किसानों ने अभी तक अरहर नहीं बोई है, वे जुलाई महीने के पहले सप्ताह तक बोआई का काम निबटा लें. इस की अगेती उन्नत प्रजातियां पारस, टाइप-21, पूसा-992, उपास-120, वहीं देर से पकने वाली प्रजातियां पूसा-9, नरेंद्र अरहर-1, आजाद अरहर-1, मालवीय विकास और मालवीय चमत्कार हैं.

अरहर को खेत में बोने से पहले बीज को 2 ग्राम थीरम या एक ग्राम कार्बंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिए.

बीज को खेत में बोने से पूर्व ही राइजोबियम कल्चर के एक पैकेट को 10 किलोग्राम बीज को शोधित कर के बोआई कर देनी चाहिए.

सोयाबीन की बोआई के लिए जुलाई के दूसरे सप्ताह तक का समय उपयुक्त होता है. बीज को खेत में बोने के पूर्व उसे राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना न भूलें. इस की उन्नत किस्में जेएस-335, जेएस-93-05, जेएस- 95-60, एनआरसी-86, पूसा-16, पूसा-20, पीके-416 है.

जो किसान मूंगफली की खेती करते हैं, वह बोआई का काम जुलाई महीने के पहले हफ्ते तक पूरा कर लें. इस की उन्नत किस्में एचएनजी-10, गिरनार-2, प्रकाश, अंबर, उत्कर्ष, टीजी-37, जीजी-14 व 21, एचएनजी-69 व 123, राज मूंगफली-1, टीबीजी-39, प्रताप मूंगफली-1 व 2, जेजीएन-3 व 23, एके-159, जीजी-8 आदि हैं.

जिन किसानों ने गन्ने की फसल ले रखी है, वह फसल में मिट्टी चढ़ाने का काम पूरा कर लें. वहीं सूरजमुखी की खेती करने वाले किसान बोआई का काम इस महीने के दूसरे हफ्ते तक निबटा लें. सूरजमुखी के पौधे जब 15-20 दिन के हो जाएं, तो फालतू पौधों को निकाल कर पौधों की दूरी लगभग 20 सैंटीमीटर तक कर दें.

जो किसान पशुपालन से जुड़े हुए हैं, वे चारे के लिए लोबिया, ग्वार, मक्का, ज्वार, बाजरा व बहुकटाई वाली चरी की बोआई कर लें.

जुलाई के महीने में बैगन, मिर्च और अगेती फूलगोभी की रोपाई की जा सकती है. ठंड में ली जाने वाली टमाटर की फसल के लिए बैड बना कर नर्सरी डालें.

खरीफ सीजन के लिए बोए जाने वाले प्याज के लिए प्रति हेक्टेयर की दर से 12 से 15 किलोग्राम बीज का प्रयोग करते हुए 10 जुलाई तक नर्सरी डाल दें.

जो किसान साग की खेती करते हैं, वे चौलाई की बोआई पूरे महीने कर सकते हैं. एक हेक्टेयर में चौलाई के 2-3 किलोग्राम  बीज की जरूरत पड़ती है.

जिन किसानों ने भिंडी की बोआई जून महीने में कर दी है, वे फसल में 76 से 87 किलोग्राम की दर से यूरिया दें. बरसात वाली भिंडी की बोआई जुलाई महीने में की जा सकती है.

सब्जी की खेती करने वाले लौकी, खीरा, चिकनी तोरई, करेला, टिंडा की बोआई कर सकते हैं.

जिन किसानों ने लतावर्गीय सब्जियों की बोआई जून महीने में कर दी हो, वे बरसात के पानी से फसल को होने वाले नुकसान से मचान बना कर सहारा दें.

जिन किसानों ने अदरक और हलदी की फसल ले रखी है, वे बोआई के 40 दिन बाद प्रति हेक्टेयर की दर से हलदी में 87 किलोग्राम व अदरक में 54 किलोग्राम यूरिया दें. वहीं सूरन की फसल लेने वाले किसान जुलाई महीने में फसल की बोआई के 60 दिन बाद 130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया दें.

जुलाई का महीना कुंदरू की रोपाई के लिए उपयुक्त होता है. इस की रोपाई पौध से पौध और कतार से कतार की दूरी 3 मीटर रखते हुए करनी चाहिए. कुंदरू में नर और मादा अलगअलग होते हैं, इसलिए भरपूर उपज के लिए 9 मादा पौधों के बीच में एक नर पौध जरूर लगाएं.

जुलाई का महीना फलदार पौधों की रोपाई के लिए सब से मुफीद होता है. इस महीने में आम, अमरूद, लीची, आंवला, कटहल, नीबू, जामुन, बेर, केला, पपीता की रोपाई की जा सकती है.

जो किसान नर्सरी का व्यवसाय करना चाहते हैं, वे लीची और नीबू में गूटी बांध सकते हैं.

जिन किसानों ने गुलाब की फसल ले रखी है, वे फसल से वर्षा जल निकास का उचित प्रबंध कर लें. रजनीगंधा की खेती करने वाले किसान फसल से खरपतवार निकाल कर पोषक तत्त्वों के घोल का छिड़काव करें. इसी के साथ ही समयसमय पर रजनीगंधा के पुष्प डंडियों की तुड़ाई का काम पूरा कर लें.

जो किसान औषधीय और सगंध पौधों की खेती करना चाहते हैं, वे औषधीय गुणों से भरपूर लैमनग्रास की खेती कर सकते हैं. लैमनग्रास की एक बार फसल लगाने के बाद किसान 4-5 साल तक पैदावार ले सकते हैं. इस के अलावा सतावर की रोपाई भी जुलाई महीने में की जाती है.

किसान कई गुणों से भरपूर ब्राह्मी की रोपाई भी जुलाई महीने में कर सकते हैं. इस का उपयोग कब्ज, गठिया, रक्तशुद्धी, दिमाग को तेज करने व याददाश्त को बढ़ाने में बहुतायत होता है. इस से कैंसर, एनीमिया, दमा, किडनी और मिरगी जैसी बीमारियों के इलाज के लिए दवाएं भी बनाई जाती हैं.

जो किसान कौंच की खेती करना चाहते हैं, वे इस के बीजों की बोआई 15 जुलाई तक जरूर कर दें. इस के लिए प्रति एकड़ 6 से 8 किलोग्राम की दर से बीज की आवश्यकता होती है.

इसी के साथ एलोवेरा की रोपाई के लिए सब से मुफीद समय जुलाई से अगस्त माह का होता है. इस मौसम में रोपाई करने से पौधे पूरी तरह जीवित रहते हैं और बढ़वार अच्छी होती है.

पशुपालक अपने पशुओं को गलघोंटू और लंगडि़या बुखार का टीका जरूर लगवा लें. इसी के साथ ही पशुओं को पीत में कीड़े मारने की की दवा खिलाएं.

पशुओं के चारे में खडि़या मिलाना सुनिश्चित करें. बरसात के महीने में लगने वाली सीलन से अपने मुरगेमुरगियों को बचाने का उचित प्रबंध करें. साथ ही, मुरगीखाने में रोशनी की उचित व्यवस्था करें.