मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने पशुपालन और डेयरी से जुड़े आंकड़ों किया जारी

नई दिल्ली : पशुपालन, मत्स्यपालन और डेयरी मंत्री परषोत्तम रूपाला ने पशुपालन और डेयरी से जुड़े आंकड़े जारी किए हैं, जिस में उन्होंने बताया कि किसानों के दरवाजे पर ही कृत्रिम गर्भाधान सेवाएं प्रदान की जा रही हैं, जिस के तहत 5.71करोड़ पशुओं को शामिल किया गया है, 7.10करोड़ कृत्रिम गर्भाधान किए जा चुके हैं और इस कार्यक्रम के अंतर्गत 3.74 करोड़ किसानों को लाभ हुआ है. वहीं देश में आईवीएफ प्रौद्योगिकी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, जिस के तहत के तहत अब तक 19248 भ्रूण पैदा किए गए और 8661 भ्रूण स्थानांतरित किए गए. साथ ही, 1343 बछड़ों का जन्म हुआ.

सैक्स सौर्टेड सीमेन या लिंग वर्गीकृत वीर्य तैयार करने का आंकड़ा

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि देश में 90 फीसदी तक सटीकता के साथ केवल मादा बछिया के जन्‍म के लिए सैक्स सौर्टेड सीमेन या लिंग वर्गीकृत वीर्य तैयार करना शुरू किया गया है. कार्यक्रम के अंतर्गत सुनिश्चित गर्भावस्था पर किसानों के लिए 750 रुपए या सौर्टेड सीमेन की लागत का 50 फीसदी सब्सिडी उपलब्ध है.

डीएनए आधारित जीनोमिक चयन

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने स्वदेशी नस्लों के विशिष्ट जानवरों के चयन के लिए इंडसचिप विकसित किया है और रेफरल आबादी तैयार करने के लिए चिप का उपयोग कर के 25,000 जानवरों का जीनोटाइप किया है. दुनिया में पहली बार भैंसों के जीनोमिक चयन के लिए बफचिप विकसित किया गया है और अब तक रेफरल आबादी बनाने के लिए 8,000 भैंसों का जीनोटाइप किया गया है.

पशु की पहचान और पता लगाने की क्षमता

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि 53.5 करोड़ जानवरों (मवेशी, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर) की पहचान और पंजीकरण 12 अंकों के यूआईडी नंबर के साथ पौलीयुरेथेन टैग का उपयोग कर के की जा रही है.

नस्‍ल का चयन

उन्होंने बताया कि गिर, शैवाल देशी नस्ल के मवेशियों और मुर्रा, मेहसाणा देशी नस्ल की भैंसों के लिए संतान परीक्षण कार्यक्रम लागू किया गया है.

राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन

उन्होंने बताया कि भारत सरकार के पशुपालन और डेयरी विभाग ने एनडीडीबी के साथ एक डिजिटल मिशन, “राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन” यानी एनडीएलएम शुरू किया है. इस से पशुओं की उर्वरता में सुधार करने, पशुओं और मनुष्यों दोनों को प्रभावित करने वाली बीमारियों को नियंत्रित करने, गुणवत्तापूर्ण पशुधन व घरेलू और निर्यात बाजार दोनों के लिए पशुधन सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी.

नस्ल वृद्धि फार्म

उन्होंने नस्ल वृद्धि फार्म योजना पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस योजना के तहत नस्ल वृद्धि फार्म की स्थापना के लिए निजी उद्यमियों को पूंजीगत लागत (भूमि लागत को छोड़ कर) पर 50 फीसदी (प्रति फार्म 2 करोड़ रुपए तक) की सब्सिडी प्रदान की जाती है. अब तक डीएएचडी ने 76 आवेदन स्वीकृत किए हैं और एनडीडीबी को सब्सिडी के रूप में 14.22 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है.

डेयरी विकास के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि किसानों को उपभोक्ता से जोड़ने वाले शीत श्रृंखला बुनियादी ढांचे सहित गुणवत्तापूर्ण दूध के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करना और उसे मजबूत करना. वर्ष 2014-15 से 2022-23 (20.06.2023) तक 28 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों में 3015.35 करोड़ रुपए (केंद्रीय हिस्सेदारी 2297.25 करोड़ रुपए) की कुल लागत के साथ 185 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई. योजना के तहत 20 जून, 2023 तक मंजूर नई परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए कुल 1769.29 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं. मंजूर परियोजनाओं के अंतर्गत 1314.42 करोड़ रुपए की राशि का उपयोग किया गया है.

डेयरी के कामों में लगी डेयरी सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों का सहयोग करना

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि गंभीर प्रतिकूल बाजार स्थितियों या प्राकृतिक आपदाओं के कारण संकट से निबटने के लिए डेयरी के कामों में लगी सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों को आसान कार्यशील पूंजी ऋण प्रदान कर के सहायता करना है. वर्ष 2020-21 से 30 अप्रैल, 2023 तक एनडीडीबी ने देशभर में 60 दुग्ध संघों के लिए 2 फीसदी प्रति वर्ष की दर से 37,008.89 करोड़ रुपए की कार्यशील पूंजी ऋण राशि के विरुद्ध 513.62 करोड़ रुपए की रियायती ब्याज सहायता राशि की मंजूरी दे दी और 373.30 करोड़ रुपए (नियमित रियायती ब्याज दर के रूप में 201.45 करोड़ रुपए और अतिरिक्त ब्याज अनुदान राशि के रूप में 171.85करोड़ रुपए) जारी किए हैं.

डेयरी, प्रसंस्करण और बुनियादी ढांचा विकास निधि (डीआईडीएफ)

दूध प्रसंस्करण, शीतलन और मूल्यवर्धित उत्पाद सुविधाओं आदि घटकों के लिए दूध प्रसंस्करण, शीतलन और मूल्य संवर्धन बुनियादी ढांचे का निर्माण/आधुनिकीकरण करना. डीआईडीएफ के तहत 31 मई, 2023 तक 6776.86 करोड़ रुपए के कुल परिव्यय के साथ 37 परियोजनाएं स्वीकृत की गईं और 4575.73 करोड़ रुपए के ऋण के मुकाबले 2353.20 करोड़ रुपए का ऋण वितरित किया गया है. रियायती ब्‍याज दर के रूप में नाबार्ड को 88.11 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है.

राष्ट्रीय पशुधन मिशन

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि इस योजना में मुख्‍य रूप से रोजगार सृजन, उद्यमिता विकास, प्रति पशु उर्वरता में वृद्धि और इस प्रकार मांस, बकरी के दूध, अंडे और ऊन के उत्पादन में वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है. राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत पहली बार केंद्र सरकार व्यक्तियों, एसएचजी, जेएलजी, एफपीओ, सेक्शन 8 कंपनियों, एफसीओ को हैचरी और ब्रूडर मदर इकाइयों के साथ पोल्ट्री फार्म स्थापित करने, भेड़ और बकरी की नस्‍लों की वृद्धि, फार्म, सूअरपालन फार्म और चारा एवं चारा इकाइयों के लिए सीधे 50 फीसदी सब्सिडी प्रदान कर रही है.

अब तक डीएएचडी ने 661 आवेदन स्वीकृत किए हैं और 236 लाभार्थियों को सब्सिडी के रूप में 50.96करोड़ रुपए जारी किए हैं.

पशुपालन बुनियादी ढांचा विकास निधि

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि व्यक्तिगत उद्यमियों, निजी कंपनियों, एमएसएमई, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और सेक्‍शन 8 कंपनियों द्वारा डेयरी प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन बुनियादी ढांचे, मांस प्रसंस्करण और पशु चारा संयंत्र मवेशी/भैंस/भेड़/बकरी/सूअर के लिए नस्ल सुधार टैक्‍ नोलौजी और नस्ल वृद्धि फार्म स्थापित करने और तकनीकी रूप से सहायताप्राप्त पोल्ट्री फार्म के लिए निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अब तक बैंकों द्वारा 309 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिन की कुल परियोजना लागत 7867.65 करोड़ रुपए है और कुल परियोजना लागत में से 5137.09 करोड़ रुपए सावधि ऋण है. रियायती ब्याज सहायता के रूप में 58.55 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है.

पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण कार्यक्रम

उन्होंने बताया कि टीकाकरण द्वारा आर्थिक और जूनोटिक महत्व के पशु रोगों की रोकथाम, नियंत्रण और रोकथाम के लिए अब तक इयर टैग किए गए पशुओं की कुल संख्या 25.04 करोड़ है. एफएमडी के दूसरे दौर में अब तक 24.18करोड़ पशुओं का टीकाकरण किया जा चुका है.

उन्होंने यह भी बताया कि एफएमडी टीकाकरण का तीसरा दौर चल रहा है और अब तक 4.66 करोड़ जानवरों को टीका लगाया जा चुका है. अब तक 2.9 करोड़ जानवरों को ब्रुसेला का टीका लगाया जा चुका है. 16 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 1960 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (एमवीयू) को हरी झंडी दिखाई गई है. 10 राज्‍यों में 1181 एमवीयू कार्यरत हैं.

पोल्ट्री किसानों के लिए सलाह

पोल्ट्री में आहार की आवश्यकता को 5 से 10 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और कृषि विश्वविद्यालय के द्वारा विकसित तकनीकों को अपना कर जैसे पोल्ट्री आहार में संपूरक आहार का प्रयोग करें, माइक्रोबियल एनएसपी एंजाइम का उपयोग, फाइटेज, प्रोटियेज, आवश्यक तेल और और्गेनिक एसिड का प्रयोग, पोल्ट्री के पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने के लिए प्रोबायोटिक, लिवर टौनिक इत्यादि का इस्तेमाल कर सकते हैं.

* मक्का और सोयाबीन की उत्पादन में कमी होने की स्थिति में या इन की उपलब्धता की कमी में पोल्ट्री में आहार में टूटे हुए चावल व बाजरा को 30 से 40 फीसदी और बिनौले की खली 10 से 12 फीसदी और सरसों की खली 5 से 8 फीसदी तक प्रयोग कर सकते हैं.

* गरमी का मौसम चल रहा है. गरमी में वृद्धि हो रही है, तो पोल्ट्री के दाने में थोड़ा पानी मिला कर या पानी से गीला कर के मुरगियों को देना चाहिए और आहार दिन में ठंडे समय में जैसे सुबह और शाम को देना चाहिए. जैसेजैसे तापमान बढ़ता है, मुरगी की ऊर्जा की आवश्यकता कम होती जाती है, इसलिए दाने में पोषक तत्त्वों की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए.

मुरगी के पानी में अतिरिक्त विटामिन संपूरक देना चाहिए.

* मुरगी को स्वच्छ व ठंडा पानी दें. पानी के बरतन साफ होने चाहिए. आमतौर मुरगियों को प्रति किलो दाने पर 2 लिटर पानी की आवश्यकता होती है. मुरगियों में पानी की आवश्यकता प्रति डिगरी तापमान बढ़ने पर 4 फीसदी तक बढ़ जाती है. मिट्टी के बरतन में पानी देना अधिक लाभदायक होता है.

* तापमान बढ़ने के साथसाथ हमें आवास के प्रबंधन की उचित देखभाल रखनी चाहिए. आवास की छत पर बाहर से सफेदी कर देनी चाहिए या उष्मा कुचालक शीट का प्रयोग कर सकते हैं. आवास कक्ष दोनों तरफ से छत 3 फुट बाहर निकली होनी चाहिए. मुरगियों  को गरम मौसम में खुली जगह देनी चाहिए. अधिक गरमी होने की स्थिति में पंखे, कूलर और एग्जास्ट पंखों का प्रयोग कर सकते हैं. आवास के दोनों तरफ बोरी के परदे लगा देने से और दिन में पानी का छिड़काव करना लाभदायक होता है. आवास के छप्पर पर हरी लताएं चढ़ा देनी चाहिए.

* मुरगीशाला में बिछावन की मोटाई 2 से 3 इंच रखनी चाहिए, बिछावन को समयसमय पर उलटतेपलटते रहना चाहिए. इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए.

पशुपालन व डेयरी फार्मिंग है किन ऊंचाइयों पर और क्या हैं सरकारी योजनाएं

नई दिल्ली : पशुपालन, मत्स्यपालन और डेयरी मंत्री परषोत्तम रूपाला ने पशुपालन और डेयरी से जुड़े आंकड़े जारी किए हैं, जिस में उन्होंने बताया कि किसानों के दरवाजे पर ही कृत्रिम गर्भाधान सेवाएं प्रदान की जा रही हैं, जिस के तहत 5.71करोड़ पशुओं को शामिल किया गया है, 7.10करोड़ कृत्रिम गर्भाधान किए जा चुके हैं और इस कार्यक्रम के अंतर्गत 3.74 करोड़ किसानों को लाभ हुआ है. वहीं देश में आईवीएफ प्रौद्योगिकी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, जिस के तहत के तहत अब तक 19248 भ्रूण पैदा किए गए और 8661 भ्रूण स्थानांतरित किए गए. साथ ही, 1343 बछड़ों का जन्म हुआ.

सैक्स सौर्टेड सीमेन या लिंग वर्गीकृत वीर्य तैयार करने का आंकड़ा

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि देश में 90 फीसदी तक सटीकता के साथ केवल मादा बछिया के जन्‍म के लिए सैक्स सौर्टेड सीमेन या लिंग वर्गीकृत वीर्य तैयार करना शुरू किया गया है. कार्यक्रम के अंतर्गत सुनिश्चित गर्भावस्था पर किसानों के लिए 750 रुपए या सौर्टेड सीमेन की लागत का 50 फीसदी सब्सिडी उपलब्ध है.

डीएनए आधारित जीनोमिक चयन

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने स्वदेशी नस्लों के विशिष्ट जानवरों के चयन के लिए इंडसचिप विकसित किया है और रेफरल आबादी तैयार करने के लिए चिप का उपयोग कर के 25,000 जानवरों का जीनोटाइप किया है. दुनिया में पहली बार भैंसों के जीनोमिक चयन के लिए बफचिप विकसित किया गया है और अब तक रेफरल आबादी बनाने के लिए 8,000 भैंसों का जीनोटाइप किया गया है.

पशु की पहचान और पता लगाने की क्षमता

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि 53.5 करोड़ जानवरों (मवेशी, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर) की पहचान और पंजीकरण 12 अंकों के यूआईडी नंबर के साथ पौलीयुरेथेन टैग का उपयोग कर के की जा रही है.

नस्‍ल का चयन

उन्होंने बताया कि गिर, शैवाल देशी नस्ल के मवेशियों और मुर्रा, मेहसाणा देशी नस्ल की भैंसों के लिए संतान परीक्षण कार्यक्रम लागू किया गया है.

राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन

उन्होंने बताया कि भारत सरकार के पशुपालन और डेयरी विभाग ने एनडीडीबी के साथ एक डिजिटल मिशन, “राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन” यानी एनडीएलएम शुरू किया है. इस से पशुओं की उर्वरता में सुधार करने, पशुओं और मनुष्यों दोनों को प्रभावित करने वाली बीमारियों को नियंत्रित करने, गुणवत्तापूर्ण पशुधन व घरेलू और निर्यात बाजार दोनों के लिए पशुधन सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी.

नस्ल वृद्धि फार्म

उन्होंने नस्ल वृद्धि फार्म योजना पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस योजना के तहत नस्ल वृद्धि फार्म की स्थापना के लिए निजी उद्यमियों को पूंजीगत लागत (भूमि लागत को छोड़ कर) पर 50 फीसदी (प्रति फार्म 2 करोड़ रुपए तक) की सब्सिडी प्रदान की जाती है. अब तक डीएएचडी ने 76 आवेदन स्वीकृत किए हैं और एनडीडीबी को सब्सिडी के रूप में 14.22 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है.

डेयरी विकास के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि किसानों को उपभोक्ता से जोड़ने वाले शीत श्रृंखला बुनियादी ढांचे सहित गुणवत्तापूर्ण दूध के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करना और उसे मजबूत करना. वर्ष 2014-15 से 2022-23 (20.06.2023) तक 28 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों में 3015.35 करोड़ रुपए (केंद्रीय हिस्सेदारी 2297.25 करोड़ रुपए) की कुल लागत के साथ 185 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई. योजना के तहत 20 जून, 2023 तक मंजूर नई परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए कुल 1769.29 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं. मंजूर परियोजनाओं के अंतर्गत 1314.42 करोड़ रुपए की राशि का उपयोग किया गया है.

डेयरी के कामों में लगी डेयरी सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों का सहयोग करना

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि गंभीर प्रतिकूल बाजार स्थितियों या प्राकृतिक आपदाओं के कारण संकट से निबटने के लिए डेयरी के कामों में लगी सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों को आसान कार्यशील पूंजी ऋण प्रदान कर के सहायता करना है. वर्ष 2020-21 से 30 अप्रैल, 2023 तक एनडीडीबी ने देशभर में 60 दुग्ध संघों के लिए 2 फीसदी प्रति वर्ष की दर से 37,008.89 करोड़ रुपए की कार्यशील पूंजी ऋण राशि के विरुद्ध 513.62 करोड़ रुपए की रियायती ब्याज सहायता राशि की मंजूरी दे दी और 373.30 करोड़ रुपए (नियमित रियायती ब्याज दर के रूप में 201.45 करोड़ रुपए और अतिरिक्त ब्याज अनुदान राशि के रूप में 171.85करोड़ रुपए) जारी किए हैं.

डेयरी, प्रसंस्करण और बुनियादी ढांचा विकास निधि (डीआईडीएफ)

दूध प्रसंस्करण, शीतलन और मूल्यवर्धित उत्पाद सुविधाओं आदि घटकों के लिए दूध प्रसंस्करण, शीतलन और मूल्य संवर्धन बुनियादी ढांचे का निर्माण/आधुनिकीकरण करना. डीआईडीएफ के तहत 31 मई, 2023 तक 6776.86 करोड़ रुपए के कुल परिव्यय के साथ 37 परियोजनाएं स्वीकृत की गईं और 4575.73 करोड़ रुपए के ऋण के मुकाबले 2353.20 करोड़ रुपए का ऋण वितरित किया गया है. रियायती ब्‍याज दर के रूप में नाबार्ड को 88.11 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है.

राष्ट्रीय पशुधन मिशन

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि इस योजना में मुख्‍य रूप से रोजगार सृजन, उद्यमिता विकास, प्रति पशु उर्वरता में वृद्धि और इस प्रकार मांस, बकरी के दूध, अंडे और ऊन के उत्पादन में वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है. राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत पहली बार केंद्र सरकार व्यक्तियों, एसएचजी, जेएलजी, एफपीओ, सेक्शन 8 कंपनियों, एफसीओ को हैचरी और ब्रूडर मदर इकाइयों के साथ पोल्ट्री फार्म स्थापित करने, भेड़ और बकरी की नस्‍लों की वृद्धि, फार्म, सूअरपालन फार्म और चारा एवं चारा इकाइयों के लिए सीधे 50 फीसदी सब्सिडी प्रदान कर रही है.

अब तक डीएएचडी ने 661 आवेदन स्वीकृत किए हैं और 236 लाभार्थियों को सब्सिडी के रूप में 50.96करोड़ रुपए जारी किए हैं.

पशुपालन बुनियादी ढांचा विकास निधि

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने बताया कि व्यक्तिगत उद्यमियों, निजी कंपनियों, एमएसएमई, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और सेक्‍शन 8 कंपनियों द्वारा डेयरी प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन बुनियादी ढांचे, मांस प्रसंस्करण और पशु चारा संयंत्र मवेशी/भैंस/भेड़/बकरी/सूअर के लिए नस्ल सुधार टैक्‍ नोलौजी और नस्ल वृद्धि फार्म स्थापित करने और तकनीकी रूप से सहायताप्राप्त पोल्ट्री फार्म के लिए निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अब तक बैंकों द्वारा 309 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिन की कुल परियोजना लागत 7867.65 करोड़ रुपए है और कुल परियोजना लागत में से 5137.09 करोड़ रुपए सावधि ऋण है. रियायती ब्याज सहायता के रूप में 58.55 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है.

पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण कार्यक्रम

उन्होंने बताया कि टीकाकरण द्वारा आर्थिक और जूनोटिक महत्व के पशु रोगों की रोकथाम, नियंत्रण और रोकथाम के लिए अब तक इयर टैग किए गए पशुओं की कुल संख्या 25.04 करोड़ है. एफएमडी के दूसरे दौर में अब तक 24.18करोड़ पशुओं का टीकाकरण किया जा चुका है.

उन्होंने यह भी बताया कि एफएमडी टीकाकरण का तीसरा दौर चल रहा है और अब तक 4.66 करोड़ जानवरों को टीका लगाया जा चुका है. अब तक 2.9 करोड़ जानवरों को ब्रुसेला का टीका लगाया जा चुका है. 16 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 1960 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (एमवीयू) को हरी झंडी दिखाई गई है. 10 राज्‍यों में 1181 एमवीयू कार्यरत हैं.

‘रिपोर्ट फिश डिजीज’ एप लौंच

नई दिल्ली : मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने नई दिल्ली में मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री डा. एल. मुरुगन की उपस्थिति में ‘रिपोर्ट फिश डिजीज’ नाम से एक एंड्रायड आधारित मोबाइल एप लौंच किया.

इस दौरान जेएन स्वैन, सचिव, मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय, डा. अभिलक्ष लिखी, ओएसडी, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय और डा. हिमांशु पाठक, सचिव, डीएआरई एवं महानिदेशक, आईसीएआर, नई दिल्ली भी मौजूद थे.

“डिजिटल इंडिया” के दृष्टिकोण में योगदान करते हुए, ‘रिपोर्ट फिश डिजीज’ को आईसीएआर-नेशनल ब्यूरो औफ फिश जेनेटिक रिसोर्सेज (एनबीएफजीआर), लखनऊ द्वारा विकसित किया गया है, इसीलिए जलीय पशु रोगों के लिए राष्ट्रीय निगरानी कार्यक्रम के तहत लौंच किया गया है.

मत्स्यपालन विभाग ने पीएमएमएसवाई योजना के तहत एनएसपीएएडी के दूसरे चरण के कार्यान्वयन के लिए 3 साल की अवधि के लिए 33.78 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं. इस एप के लौंच के साथ एनएसपीएएडी पारदर्शी रिपोर्टिंग के माध्यम से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने में सक्षम हो गया. एप कनेक्ट करने के लिए एक सेंट्रल मंच होगा और मछली किसानों, क्षेत्रस्तरीय अधिकारियों और मछली स्वास्थ्य विशेषज्ञों को निर्बाध रूप से एकीकृत करेगा. किसानों के सामने आने वाली बीमारी की समस्या, जिस पर पहले ध्यान नहीं दिया जाता था या रिपोर्ट नहीं की जाती थी, वह विशेषज्ञों तक पहुंच जाएगी और कम समय में समस्या का समाधान कुशल तरीके से किया जाएगा.

यह होगा लाभ

इस एप का उपयोग करने वाले किसान सीधे जिला मत्स्य अधिकारियों और वैज्ञानिकों से जुड़ सकेंगे. किसान और हितधारक इस एप के माध्यम से अपने खेतों पर फिनफिश, झींगा और मोलस्क की बीमारियों की स्वयं रिपोर्टिंग कर सकते हैं, जिस के लिए हमारे वैज्ञानिकों/विशेषज्ञों द्वारा किसानों को उसी एप के माध्यम से वैज्ञानिक तकनीकी सहायता प्रदान की जाएगी.

किसानों को प्रदान की जा रही प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और वैज्ञानिक सलाह से बीमारियों के कारण होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी और देश में मछली किसानों द्वारा बीमारी की रिपोर्टिंग को और मजबूत किया जाएगा.

नया भूसा कितना फायदेमद

किसान अकसर यह शिकायत करते मिल जाते हैं कि जब से उन्होंने नया भूसा खिलाना शुरू किया है, तब से कुछ पशुओं को दस्त लग गए हैं. नए भूसे में ऐसा क्या है, जिस के कारण पशु को दस्त लग जाते हैं? कुछ लोग कहते हैं कि नया भूसा गरमी करता है. गरमीसर्दी कुछ नहीं करता, आज आप को सम झाते हैं कि नए भूसे से पशुओं को दस्त क्यों लग जाते हैं.

खाद्यान्न फसलों को कीड़ेमकोड़ों से बचाने के लिए कई तरह के हरबीसाइड, इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड फसलों पर छिड़के जाते हैं. ये हरबीसाइड खरपतवार तो खत्म कर देते हैं और इंसैक्टिसाइड व पैस्टिसाइड फसलों को तो कीड़ों से बचा लेते हैं, मगर इन की रेजिड्यू भूसे के ऊपर लगी रह जाती है. यही भूसा जब पशु को खिलाया जाता है तो ये हरबीसाइड, इंसैक्टिसाइड

और पैस्टिसाइड पशु के पाचन तंत्र में पहुंच कर उसे डिस्टर्ब कर देते हैं और पशु को दस्त लग जाते हैं.

इन हरबीसाइड, इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड की मात्रा इतनी भी नहीं होती कि पशु मर ही जाए, मगर इतनी तो होती है कि उस का पाचन तंत्र खराब हो जाता है और उसे दस्त लग जाते हैं.

खेत में जो भी कैमिकल छिड़के जाते हैं, वे पौधे के अंदर या तो सीधे ही चले जाते हैं या फिर जब पौधा मिट्टी से अपना पोषण शामिल करता है तो उस समय ये सब कैमिकल पौधे के अंदर चले जाते हैं. वैसे तो इन का एक समय होता है जिस के बाद ये अपने आप ही डिऐक्टिवेट हो जाते हैं, मगर इन कैमिकल के डिऐक्टिवेट होने से पहले ही अगर वह भूसा पशुओं ने खाया तो ये सब कैमिकल उन के अंदर चले जाते हैं.

हरबीसाइड, इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड लिपोफिलिक होते हैं, जिस का मतलब है कि ये कैमिकल फैट के साथ घुलमिल जाते हैं. कभीकभी तो पशु के अंदर इन कैमिकलों की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि वे लिपोफिलिक होने के चलते पशु के दूध में पाए जाने वाले फैट के साथ जुड़ कर दूध तक में स्रावित होने लगते हैं और अगर पशु मांस के लिए पाला गया है तो ये कैमिकल मांस में जमा होने लगते हैं और जब इन पशुओं का दूध या मांस कोई उपभोग करता है तो ये कैमिकल उस को भी प्रभावित करते हैं.

एक किलोग्राम गेहूं भूसे में 1.1 मिलीग्राम से 1.2 मिलीग्राम तक एंडोसल्फान पाया गया है. ज्वार की कड़बी में 0.46 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम एंडोसल्फान पाया गया है. एंडोसल्फान दूध में तो स्रावित नहीं होता है, मगर यह पशु को जरूर प्रभावित करता है.

उत्तराखंड के कुमायूं की पहाडि़यों और तराई के क्षेत्रों से इकट्ठे किए गए दूध के नमूनों में क्लोरोपायरिफौस मैक्सिमम रेजिड्यू लिमिट से ज्यादा पाया गया.

हैदराबाद के आसपास के क्षेत्रों से इकट्ठे किए गए दूध के नमूनों में डाइमेथोएट पाया गया.

कैसे नुकसान पहुंचाते हैं

हरबीसाइड, इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड के कारण बड़े पशुओं का गोबर पतला हो सकता है. छोटे पशुओं को दस्त लग सकते हैं. दुधारू पशुओं का दूध उत्पादन घट सकता है और उन की प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है.

पशुओं के हीट में न आने की समस्या आ सकती है. गर्भवती मादाओं में गर्भपात हो सकता है. पशुओं का लिवर और किडनी तक खराब हो सकते हैं. इन कैमिकल के कारण पशु की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है, और तो और कैंसर तक हो सकता है.

बचने के उपाय

* कैमिकल की जगह बायोपैस्टिसाइड ही उपयोग में लाए जाएं.

* अगर इन कैमिकल का उपयोग करना मजबूरी हो तो इन का छिड़काव करने के तुरंत बाद फसल को पशुओं को खाने के लिए न दिया जाए.

* नए भूसे को तुरंत ही पशुओं को खिलाना शुरू नहीं करना है, बल्कि कम से कम 2 महीने बाद ही उसे पशुओं को खाने के लिए देना है, ताकि उस के ऊपर अगर कोई कैमिकल लगा भी है, तो वह डिऐक्टिवेट हो जाए.

* अगर ताजा भूसा खिलाना मजबूरी हो तो उसे रातभर पानी में भिगोने के बाद ही पशुओं को खाने को दें. जिस पानी में भूसा भिगोया जाएगा उस में से कुछ पानी तो भूसा सोख ही लेगा और बाकी बचे पानी को फेंक दें.

सरकार द्वारा बैन किए गए इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करना है

जो इंसैक्टिसाइड और पैस्टिसाइड बैन कर दिए गए हैं, उन के नाम हैं :

    • एलाक्लोर
    • एल्डीकार्ब
    • एल्ड्रिन
    • बेंजीन हैक्साक्लोराइड (बीएचसी)
    • कैल्शियम साइनाइड
    • कैप्टाफोल
    • कार्बारिल
    • कार्बोड्यूरान
    • क्लोर्डेन
    • क्लोरोबेंजाइलेट
    • साइब्रोमोक्लोरोप्रोपेन
    • कौपर एसीटोआसैनाइट
    • डाईएल्ड्रिन
    • डाईक्लोरोवास
    • ऐंड्रीन
    • इथाइलीन डाईब्रोमाइड (ईडीबी)
    • इथाइल मर्करी क्लोराइड (ईएमसी)
    • इथाइल पैराथियोन
    • फेनारिमोल
    • फेंथियोन
    • हैप्टाक्लोर
    • लाईन्यूरौन
    • मिथोक्सिइथाइल मरकरी क्लोराइड (एमईएमसी)
    • मिथाइल पैराथियोन
    • मैलिक हैडराजाइड (एमएच)
    •  मेनाडोन
    • मेथामोल
    • निकोटीन सल्फेट
    • नाइट्रोफेन
    • फोरेट
    • फौस्डिमिडोन
    • सोडियम साइनाइड
    • टौक्साफेन
    • ट्राईक्लोरो एसिटिक एसिड

विश्व दुग्ध दिवस : एक जरूरी दिन

1   जून को पूरी दुनिया में ‘विश्व दुग्ध दिवस’ का आयोजन किया जाता है. ‘विश्व दुग्ध दिवस’ मनाने की शुरुआत एफएओ द्वारा साल 2001 में की गई थी, ताकि दूध को वैश्विक खाद्य का दर्जा दिलाया जा सके.

नवजात के लिए दूध को सर्वोत्तम आहार माना गया है, क्योंकि दूध में वे सब पोषक तत्त्व मौजूद हैं, जो किसी भी नवजात के पोषण के लिए जरूरी होते हैं.

नवजात ही नहीं, बल्कि सभी आयु वर्ग के लोगों को दूध का उपयोग करते रहना चाहिए, क्योंकि दूध के अंदर 33 प्रकार के पोषक तत्त्व पाए जाते हैं, जो मानव शरीर के लिए बहुत जरूरी होते हैं.

वर्तमान में हमारे देश में दूध की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 394 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन से भी ज्यादा है. भारत का दुग्ध उत्पादन में दुनिया में पहला नंबर है और 20वीं पशु गणना के मुताबिक हमारे देश में साल 2018-19 में दूध का कुल उत्पादन 18.775 करोड़ टन रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 6.5 फीसदी ज्यादा है.

विदेशी व संकर नस्ल की गायों का औसत उत्पादन 7.95 किलोग्राम प्रतिदिन और देशी व अवर्गीकृत गायों का औसत उत्पादन 3.01 किलोग्राम प्रतिदिन रहा, जो पिछले साल की अपेक्षा क्रमश: 8.7 फीसदी और 5.7 फीसदी ज्यादा है.

दूध उत्पादन में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश (तेलंगाना सहित) और गुजरात टौप 5 में हैं और भारत के कुल दूध उत्पादन का 53.1 फीसदी ये 5 राज्य ही पैदा करते हैं.

दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान, मेरठ के वैज्ञानिक लगातार नई खोज कर रहे हैं और प्रसार गतिविधियों द्वारा उन को किसानों तक पहुंचा रहे हैं. इसी सिलसिले में सीआईआरसी गौधनवाणी नाम के 10 ह्वाट्सएप ग्रुप बनाए हुए हैं.

इन ग्रुप में पशुपालन से संबंधित नवीनतम जानकारियां रोजाना भेजी जाती हैं. इन ग्रुप का सदस्य बनने के लिए सदस्य बनना चाहने वाले का नाम, ह्वाट्सएप नंबर और पता इस मोबाइल नंबर 9933221103 पर ह्वाट्सएप करना होता है.

‘विश्व दुग्ध दिवस’ पर किसान और पशुपालक भी बधाई के पात्र हैं, क्योंकि उन्हीं की कोशिशों से भारत दुनियाभर में दूध उत्पादन में नंबर एक पर है.

अभी भी हमारे देश की प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता दुनिया के आंकड़े से कम है, इसलिए हमें इस साल भी पशु की उत्पादकता और दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए कोशिश करते रहना है और इस काम में केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक आप के साथ हैं. आप अपनी पशुपालन से संबंधित समस्याओं के निवारण के लिए हमारे वैज्ञानिकों से कभी भी सलाह ले सकते हैं.

कमाई का जरीया है बरबरी बकरीपालन

बस्ती जिले के कप्तानगंज ब्लौक के कोइलपुरा गांव के पकडियहवा पुरवे के रहने वाले 28 वर्षीय दीनानाथ एक हाथ से विकलांग हैं. उन के पास खेती की जमीन न के बराबर है. 15 वर्ष पहले उन के परिवार में कुल जमापूजी के नाम पर महज 2 बकरियां थीं, जिस से दीनानाथ के परिवार का खर्चा मुश्किल से ही चल पाता था.

एक हाथ से विकलांग होने की वजह से दीनानाथ मेहनतमजदूरी भी नहीं कर सकते थे. इसलिए घर की महिलाएं मेहनतमजदूरी कर के परिवार चला रही थीं. एक दिन उन्होंने सोचा कि क्यों न बकरियों की संस्था बना कर बकरीपालन का व्यवसाय शुरू किया जाए. इस के लिए उन्हें जरूरत थी सही जानकारी की. ऐसे में उन्होंने गांव से 3 किलोमीटर दूर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया से संपर्क किया, जहां उन्हें कृषि वैज्ञानिकों ने बरबरी नस्ल के बकरीपालन की सलाह दी, क्योंकि बरबरी नस्ल की बकरियों को कम जगह, कम श्रम, कम पूंजी में पाला जा सकता है.

दीनानाथ को वैज्ञानिकों की बात जम गई. उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र से 2 बकरियां खरीद लीं और उन्हें घर ले आए. जब इन बकरियों के प्रजनन का समय आया, तो दीनानाथ ने पुनः बकरियों को कृषि विज्ञान केंद्र ले जा कर बकरियों का प्रजनन कराया. आखिर दीनानाथ की बकरियों ने सालभर में 2 बार 2-2 बच्चे दिए. इस तरह सालभर में दीनानाथ के पास 10 बकरियां हो गईं. अब पूरे जोश के साथ दीनानाथ ने बकरियों की देखरेख शुरू कर दी थी.

दीनानाथ की बकरियों के वजन में जहां तेजी से वृद्धि हो रही थी, वहीं इन बकरियों को देशी प्रजाति की अपेक्षा चारा व दाना भी कम देना पड़ रहा था.

आखिर दूसरा साल बीतने के बाद दीनानाथ के पास 10 बकरियों से 40 बकरियां हो गईं और चौथा साल बीततेबीतते 160 बकरियां हो चुकी थीं.

दीनानाथ ने इन बकरियों को 1,000 रुपए से ले कर 3,000 रुपए की दर से 80 बकरियों को बेच कर 2 लाख, 40 हजार रुपए प्राप्त किए, जिस से उन्होंने बकरियों के रहने के लिए सुरक्षित बाड़े का निर्माण कराया. साथ ही, अपने कच्चे घर को पक्का बनवा लिया.

दीनानाथ का कहना है कि देशी प्रजाति की अपेक्षा बरबरी नस्ल की बकरी का पालन लाभ का सौदा है, क्योंकि दूसरी प्रजातियों की अपेक्षा इन के शरीर से बदबू नहीं आती है. इसलिए बाजार में इस नस्ल की प्रजातियों की मांग ज्यादा होती है. बरबरी नस्ल की खासियत ही है कि एक बकरी से सालभर में 4 बच्चे मिलते हैं, जो कम समय में ही प्रौढ़ हो जाते हैं.

दीनानाथ का कहना है कि क्या हुआ मैं एक हाथ से अक्षम हूं. मेरी इस कमी को इन बकरियों ने दूर कर दिया. मेरे पास सालभर पहले 2 देशी बकरियां हुआ करती थीं, लेकिन मैं ने सही समय पर बरबरी बकरियों के नस्ल को पालने के लिए चुना. मेरे पास भले ही खेती की जमीन नहीं है, लेकिन इन बकरियों के पालने से मेरे पास खाने, पहनने व रहने की कोई कमी नहीं है.

दीनानाथ ने साबित कर दिया कि थोड़ी सी पूंजी लगा कर अगर बकरीपालन का व्यवसाय शुरू किया जाए, तो यह अच्छी आय का स्रोत साबित हो सकती है.

सालभर हरे चारे के लिए उत्तम है गिनी घास की खेती

पशुपालकों के लिए हरे चारे की उपलब्धता का संकट पशुपालन की कठिनाइयों के लिहाज से एक प्रमुख समस्या मानी जाती है, जबकि पशुओं के समुचित विकास और अधिक दुग्ध के लिए प्रचुर मात्रा वाले पोषक तत्व से युक्त हरा चारा खिलाना बेहद जरूरी होता है.

पशुपालकों के लिए साल के कुछ महीने ऐसे होते हैं, जिस में वह आसानी से हरे चारे की उपलब्धता कर लेता है. लेकिन गरमियों के महीनों में अधिक पानी व सिंचाई के अभाव में पशुओं के लिए आवश्यक मात्रा में हरा चारा उगा पाना कठिनाई भरा होता है. इन परिस्थियों में पशुपालकों को हरे चारे के संकट से उबारने में बहुवर्षीय चारे की प्रजातियां बेहद फायदेमंद साबित होती हैं.

बहुवर्षीय हरे चारे में से एक गिनी घास की खेती इस लिहाज से फायदेमंद साबित होती है. हरे चारे के इस बहुवर्षीय फसल में पानी और सिंचाई की आवश्यकता दूसरे चारे की फसलों की अपेक्षा कम होती है. इस की फसल कम नमी की अवस्था में भी बड़ी तेजी से वृद्धि करती है.

गिनी घास में उपलब्ध पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा और उस का स्वाद दुधारू पशुओं में दूध बढ़ाने में कारगर साबित होता है. गिनी घास की खेती आसान तरीकों से की जा सकती है. इस के लिए दोमट या बलुई दोमट उपयुक्त होती है, जिस में जलनिकासी की उचित व्यवस्था होना जरूरी है.

गिनी घास की फसल के लिए अम्लीय व क्षारीय मिट्टी उपयुक्त नहीं होती है. गिनी घास की फसल को छायादार स्थानों, मेंड़ों, नहरों के किनारे पर भी आसानी से उगाया जा सकता है.

गिनी घास की फसल लेने के लिए इस की बोआई सीधे बीज द्वारा, तने की कटिंग द्वारा या जड़ों की रोपाई कर की जा सकती है.

पोषक तत्वों की उपलब्धता

विषयवस्तु विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह के अनुसार, गिनी घास में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्वों की उपलब्धता पाई जाती है. इस में रेशा 28.36 फीसदी, प्रोटीन 6.10 फीसदी, फास्फोरस 0.29 फीसदी, कैल्शियम 0.29 फीसदी, मैग्नीशियम 0.38 फीसदी व पत्तों की पाचन क्षमता 55.58 फीसदी की मात्रा उपलब्ध होती है, जो पशुओं के विकास व दुधारू पशओं में दूध बढ़ाने में सहायक होती है.

नर्सरी तैयार करना

गिनी घास की रोपाई जड़ों से करना ज्यादा उपयुक्त होता है, क्योंकि इस से पौधे से पौधे की दूरी व लाइन से लाइन की दूरी का निर्धारण आसानी से किया जा सकता है. जड़ों से रोपाई के लिए सब से पहले इस की नर्सरी तैयार करें. एक हेक्टेयर खेत में जड़ों की रोपाई के लिए 3.4 किलोग्राम बीज की आवश्यकता नर्सरी डालने के लिए होती है.

नर्सरी डालने का सब से उपयुक्त समय अप्रैलमई माह का होता है. इस के लिए 6 मीटर लंबे और 1 मीटर चौड़ी 10-20 क्यारियां बनानी पड़ती हैं. इन क्यारियों में बीज डालने के पहले गोबर की कंपोस्ट खाद मिलाना नर्सरी उठने में सहायक होता है. नर्सरी में बीज डालने के उपरांत नर्सरी की फव्वारे से सिंचाई करते रहें.

बोआई का उचित समय

विषयवस्तु विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह बताते हैं कि गिनी घास चारे की ऐसी फसल है, जिसे वर्षभर में कभी भी बोया या रोपा जा सकता है. फिर भी सर्दी के मौसम में गिनी घास की रोपाई करने से बचना चाहिए. गिनी घास की रोपाई का सब से उपयुक्त समय वर्षा ऋतु का होता है.
गिनी घास की बोआई या रोपाई के पहले खेत की एक जुताई रोटावेटर या हैरो से करने के पश्चात दूसरी जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए.

अगर फसल की बोआई बीज से की जा रही है, तो बीज को एक से डेढ़ सैंटीमीटर गहराई में डालें. तने की कटिंग की रोपाई की दशा में कटिंग कम से कम 3 माह पुराना होना जरूरी है.

कटिंग के समय यह ध्यान दें कि जमीन के भीतर आधे से अधिक गाड़ देना चाहिए. खेत में रोपी गई इस कटिंग में जो गांठ जमीन के अंदर होती है, उसी से जड़ें निकलती हैं, जबकि ऊपरी गांठ से तना निकलता है.

गिनी घास की रोपाई करते समय पौध से पौध की दूरी 50 सैंटीमीटर व लाइन से लाइन की दूरी 100 सैंटीमीटर रखना न भूलें.

अगर इसे अन्य फसलों के साथ रोपा जा रहा है, तो यह दूरी और बढ़ा देनी चाहिए. यह दूरी 100 से 250 सैंटीमीटर तक हो जाती है. दूसरी फसलों के साथ लेने की अवस्था में इसे बोई गई फसल के 2 लाइनों के बीच में बोया जाता है. एक हेक्टेयर खेत के लिए गिनी घास की 40,000 से 50,000 जड़ों की जरूरत पड़ती है.

गिनी घास की उन्नत प्रजातियां

गिनी घास की प्रजातियां, जो ज्यादा प्रचलित हैं, उन में कोयंबदूर- 1, कोयंबदूर- 2, डीजीजी-1, बुंदेल गिनी-1, बुंदेल गिनी-2, बुंदेल गिनी- 4, मकौनी, गटन, पीजीजी-1, पीजीजी-9 पीजीजी-14, पीजीजी-19, पीजीजी-101 व हेमिल प्रमुख हैं.

खाद एवं उर्वरक

विषयवस्तु विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह के अनुसार, हरे चारे की फसल के लिए गोबर की सड़ी खाद, कंपोस्ट खाद या केंचुआ खाद ज्यादा फायदेमंद होती है. अधिक चारा उत्पादन के लिए बोआई के पहले ही 200 से 250 क्विंटल तक गोबर की सड़ी खाद का उपयोग एक हेक्टेयर खेत के लिए करें.

जब जड़ों की रोपाई खेत में की जा रही हो, तब 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस व 40 किलोग्राम पोटाश की मात्रा का उपयोग प्रति हेक्टेयर की दर से पौधों की जड़ों को देना चाहिए. इस के उपरांत प्रति हेक्टेयर की दर से हर कटाई के बाद 40 किलोग्राम नाइट्रोजन व 10 किलोग्राम फास्फोरस की मात्रा फसल को देनी चाहिए.

सिंचाई

गिनी घास की जड़ों की रोपाई खेत में करने के तुरंत बाद पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद बारिश न होने की अवस्था में 10-15 दिन के अंतराल पर नियमित सिंचाई करते रहें. फसल में उग आए अनावश्यक खरपतवार को समयसमय पर निकालते रहना जरूरी है.

कटाई व उत्पादन

गिनी घास की पहली कटाई फसल रोपे जाने के 2 से 3 तीन माह बाद से शुरू किया जाता है. इस के बाद की नियमित कटाई 30-45 दिन के अंतराल पर की जा सकती है या फसल की लंबाई लगभग 5 फुट के करीब हो जाए तो भी फसल को जमीन से 15 सैंटीमीटर के ऊपर से काटा जा सकता है. सर्दियों की पहली कटाई जमीन से सटा कर करनी चाहिए. इस से फसल में खराब तने अपनेआप हट जाते हैं.

गिनी घास की फसल उत्तर व मध्य भारत के लिहाज से वर्षभर में 5-7 बार व दक्षिण भारत में पूरे वर्ष ली जा सकती है तो 7-8 बार तक हो सकती है.

गिनी घास की उन्नत प्रजातियों की फसल लेने की दशा में औसत उत्पादन 200 से 250 क्विंटल हरा चारा प्रति हेक्टेयर प्रति कटाई प्राप्त होता है. इस प्रकार वर्ष का औसत उत्पादन 1,200 से 1,300 क्विंटल तक प्राप्त हो सकता है.

गिनी घास की खेती के बारे में अधिक जानकारी व बीज के लिए भारतीय घास और चारा अनुसंधान संस्थान (आईजीएफआरआई) (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), ग्वालियर रोड, झांसी – 284003 (उत्तर प्रदेश) से संपर्क किया जा सकता है.

पशुओं का देखभाल

पेट के कीड़ों से बचाव

आंत में पाए जाने परजीवी अथवा अंत:परजीवी पशुओं के शरीर के अंदर पाए जाते हैं और परजीवी कृमि भौतिक संरचना के आधार पर 2 प्रकार के होते हैं. पहले चपटे व पत्ती के आकार के, जिन्हें हम पर्णकृमि और फीताकृमि कहते हैं. दूसरे गोलकृमि, जो आकार में लंबे, गोल और बेलनाकार होते हैं.

पर्णकृमि

ये परजीवी पत्ती के आकार की संरचना लिए होने के कारण पर्णकृमि कहलाते हैं.

इस वर्ग में फैशियोला, एम्फीस्टोम और सिस्टोसोम पशुओं को नुकसान पहुंचाने वाली मुख्य प्रजातियां हैं.

ये पशुओं के उत्पादन को कम करने के अतिरिक्त एनीमिया, ऊतक क्षति जैसी गंभीर बीमारियां उत्पन्न करते हैं.

फीताकृमि

इस परजीवी का शरीर चपटा होता है. इन का आकार कुछ मिलीमीटर से ले कर अनेक मीटर तक लंबा हो सकता है. इन का चपटे शरीर और लंबे आकार के कारण इन्हें फीताकृमि भी कहा जाता है.

यह परजीवी ज्यादातर पशुओं की भोजन नाल में पाए जाते हैं और पशुओं के पोषण तत्त्वों का उपयोग कर पशुओं को नुकसान पहुंचाते हैं.

इन के लार्वा पशुओं के विभिन्न अंगों में सिस्ट आदि बनाते हैं और हानि पहुंचाते हैं. जैसे, हाईडेटिड सिस्ट, सिस्टीसरकोसिस आदि.

गोलकृमि

इन परजीवी का शरीर बेलनाकार होने के कारण इन्हें गोलकृमि कहते हैं.

यह परजीवी पशुओं में विभिन्न रोग जैसे रूधिर चूसने के कारण अनीमिया, भोजन इस्तेमाल न करने के कारण कमजोरी, फेफड़ों में होने के कारण निमोनिया, आंखों में होने के कारण अंधापन, गांठ बनना, अंगों व ऊतकों को नष्ट करना आदि अवस्था उत्पन्न कर सकते हैं.

सुझाव

हर 3 महीने के अंतराल पर पशुओं को पेट के कीड़ों की दवा दें.

पशुओं का टीकाकरण करवाने से पहले पशुओं को आंत के कीड़ों की दवा जरूर दें.

पशुओं के गोबर की जांच कराने के बाद ही पेट के कीड़ों की दवा दें. गोबर की जांच आप अपने नजदीकी पशु चिकित्सक से करवा सकते हैं. माचिस की डब्बी में या छोटी डब्बी में ताजा गोबर जांच के लिए ले कर जाएं.

आंत के परजीवियों का उपचार समय से उचित मात्रा में प्रभावी औषिधियों का प्रयोग और पशु विशेषज्ञ/पशु चिकित्सक की देखरेख में किया जाना चाहिए.

नई दवा और टीकाकरण के लिए नंदी नाम से नए पोर्टल की शुरुआत

नई दिल्ली : केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने कृषि भवन, नई दिल्ली में नई दवा और टीकाकरण प्रणाली के लिए एनओसी मंजूरी पोर्टल ‘नंदी’ की शुरुआत की. इस पोर्टल से डीएएचडी केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन के सुगम पोर्टल के साथ बिना किसी रोकटोक के, अधिक सुव्‍यवस्थित तरीके से पशु चिकित्सा उत्पाद प्रस्तावों का मूल्यांकन और जांच करने के लिए पारदर्शिता के साथ नियामक अनुमोदन प्रक्रिया को सरल बनाएगा.

मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी) के उत्कृष्ट कार्य की सराहना की और इस पहल को डिजिटल इंडिया को आगे बढ़ाने और पशुधन एवं पशुधन उद्योग के कल्‍याण को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया.

नंदी पोर्टल की शुरुआत पशु टीकाकरण कवरेज पहल और मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयों (एमवीयू) के बाद एक और उल्लेखनीय कार्य है. यह पहल व्यावसायिक दृष्टिकोण से भी शोधकर्ताओं और उद्योगों को मूल्यवान सहायता प्रदान करेगी.

यह पहल पशुपालकों में जागरूकता बढ़ाने और लौजिस्टिकल सुविधाओं में सुधार से दवाओं की खपत में वृद्धि होगी.

केंद्रीय मंत्री पुरषोत्तम रूपाला ने एक मजबूत प्रणाली स्थापित करने के लिए कुछ महीनों तक पोर्टल के कार्यों की बारीकी से निगरानी करने के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने नंदी पोर्टल के विकास में सीडीएसी सहित सभी हितधारकों के योगदान की सराहना की.

मत्स्यपालन राज्य मंत्री डा. संजीव बालियान बोले

इस अवसर पर पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन राज्य मंत्री डा. संजीव बालियान ने डिजिटल इंडिया मिशन के साथ तालमेल के लिए विभाग के प्रयासों की सराहना की और कहा कि पशु चिकित्सा टीकों का न केवल पशु स्वास्थ्य और उत्पादन पर, बल्कि सुरक्षित खाद्य आपूर्ति बढ़ाने और पशु से मानव में संक्रामक रोगों के संचरण को रोकने से मानव स्वास्थ्य पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा है और पड़ रहा है. यह हमारे पूरे इकोसिस्‍टम का एक हिस्सा है. पशुओं को स्वस्थ रखना और टीकों व दवाओं की नियमित आपूर्ति बनाए रखना महत्वपूर्ण है.

डीएएचडी नियामक अनुमोदन प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से सुविधाजनक बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है, जो देश में पशु चिकित्सा दवाओं और टीकों की उपलब्धता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

डीएएचडी पीएसए (भारत सरकार) की अध्यक्षता में पशु स्वास्थ्य के लिए अधिकार प्राप्त समिति (ईसीएएच) जैसी अधिकार प्राप्त समितियों की स्थापना के माध्यम से नियामक प्रक्रिया में सुधार करने की दिशा में काम कर रहा है, जो भारत में लचीली, किसान केंद्रित पशु स्वास्थ्य प्रणाली बनाने और भारत के पशुधन क्षेत्र की दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित करने के लिए परिवर्तन करने की दिशा में काम कर रही है. ईसीएएच के तहत, नियामक उपसमिति, जिस में उद्योग और शिक्षा जगत के विभिन्न पशु चिकित्सा विशेषज्ञ शामिल हैं, का गठन व्यापक रूप से विचारविमर्श करने, कुशलतापूर्वक कार्यवाही करने और विभाग में पशु चिकित्सा वैक्सीन/जैविक/दवाओं की प्रस्तुति पर सिफारिश/नीति इनपुट प्रदान करने के लक्ष्य के साथ किया गया है.

पशु दवाओं और टीकों की मंजूरी के लिए नियामक प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए नंदी (नई दवा और टीकाकरण प्रणाली के लिए एनओसी मंजूरी) विभाग ने डिजिटल की भावना को आगे बढ़ाते हुए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के साथ समन्वय कर के प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू की गई डिजिटल इंडिया की भावना के अनुरूप सीडीएसी के जरीए नंदी पोर्टल विकसित किया और आईटी प्रणालियों का लाभ उठा कर न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन का सार ग्रहण किया.

नंदी विनियामक प्रक्रिया में तेजी लाने और मजबूत करने के लिए डिजाइन की गई एक निर्बाध इंटरकनैक्टेड प्रणाली के माध्यम से विभिन्न सरकारी विभागों, संस्थानों और उद्योग के बीच त्वरित एवं आसान समन्वय को सक्षम कर के विकास और नवाचार लाएगा.

पोर्टल में विभागों, समितियों/उपसमिति और आवेदकों के बीच शुरू से अंत तक समन्वय के लिए अंतर्निहित विशेषताएं हैं.

नंदी (नई दवा और टीकाकरण प्रणाली के लिए एनओसी मंजूरी) की शुरुआत के साथ डीएएचडी अपनी पशु महामारी तैयारी पहल (एपीपीआई) के हिस्से के रूप में निर्धारित हस्तक्षेपों को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.