जूनमहीने में खेती से जुड़े जरूरी काम

जून की तपती धूप में खेतों में काम करना वैसे तो बड़ा भारी काम लगता है, पर किसान ऐसा सोच भी नहीं सकते हैं क्योंकि उन्हें तो गरमी की तपन को नजरअंदाज कर के खेतों में काम करते रहना पड़ता है. आइए डालते हैं एक नजर इन खास कामों पर:

* धान की नर्सरी डालने के लिए धान की उम्दा प्रजाति को ही चुनें. अच्छी किस्म का चुनाव करने से फायदा भी ज्यादा होगा. प्रजाति का चयन करने में कृषि वैज्ञानिक की भी मदद ले सकते हैं.

* अगर आप ने धान की नर्सरी पिछले महीने यानी मई में ही डाल रखी हो, तो उस के पौधे 3-4 हफ्ते के होते ही रोपाई का काम करें. धान के पौधों की रोपाई 15-20 सैंटीमीटर के अंतर पर सीधी लाइन में करें. रोपाई के दौरान खयाल रखें कि एक जगह पर 2 या 3 पौधों की रोपाई करना सही रहता है.

* गन्ने के खेतों को सूखने नहीं देना चाहिए. जरूरत के मुताबिक गन्ने के खेतों की सिंचाई करते रहें, क्योंकि अच्छी फसल के लिए खेतों में नमी बराबर बनी रहनी चाहिए.

* सिंचाई के अलावा गन्ने के खेतों की निराईगुड़ाई भी जरूरत के मुताबिक करते रहें, ताकि खेतों में खरपतवार न पनपने पाएं.

*अपने गन्ने के खेतों की बाकायदा चैकिंग करें और देखें कि उन में रोगों या कीटों का हमला तो नहीं हुआ है. अगर ऐसा नजर आए, तो कृषि विज्ञान केंद्र के माहिर वैज्ञानिकों से सलाह ले कर मुनासिब दवाओं का इस्तेमाल करें.

* जून के गरमागरम महीने में ही अरहर की भी बोआई की जाती है. अरहर की बोआई में इस बात का खयाल रखें कि उस के बीजों को बोने से पहले कार्बंडाजिम से उपचारित करना जरूरी है. उपचारित करने से बीज महफूज रहते हैं और सही तरीके से समय पर अंकुरित होते हैं.

* हर इलाका बाजरा की खेती के लिए सही नहीं होता. अगर आप का इलाका बाजरा की खेती के लिए मुनासिब हो तो मौसम की पहली बारिश होने पर उस की बोआई करें.

* बाजरा बोने के लिए 5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. 50 सैंटीमीटर का फासला रखते हुए बोआई सीधी लाइन में करें.

* अगर ज्वार की बोआई करने का इरादा हो तो जून के आखिरी हफ्ते में करें.

* मूंगफली की बोआई भी जून माह के दौरान ही की जाती है. मूंगफली की बोआई के लिए 60-70 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लगते हैं. मूंगफली की बोआई भी तकरीबन 50 सैंटीमीटर के फासले पर सीधी लाइन में ही करनी चाहिए.

* अगर आप का एरिया सोयाबीन की खेती के लिए मुनासिब हो, तो उम्दा प्रजाति का चयन कर के जून में ही उस की बोआई करें.

* सोयाबीन की बोआई के लिए तकरीबन 80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से लगते हैं.

* सोयाबीन की बोआई भी तकरीबन 50 सैंटीमीटर के फासले पर सीधी लाइन में ही करनी चाहिए.

* अमूमन जून माह तक उड़द की फसल पक जाती है. अगर आप की उड़द की फसल पक कर तैयार हो, तो उस की कटाई का काम खत्म करें ताकि खेत को अगली फसल के लिए तैयार किया जा सके.

* अमूमन मूंग की फसल भी जून माह तक पक कर तैयार हो जाती है. मूंग की पकी हुई फलियां चुन कर तोड़ लें. यदि 80 फीसदी फसल पक चुकी हो तो बेहतर होगा कि उस की कटाई कर लें.

* जून का महीना सूरजमुखी की बोआई के लिए भी मुफीद रहता है. अगर सूरजमुखी बोने का मन हो, तो यह काम 15 तारीख तक निबटा दें. बोआई से पहले सूरजमुखी के बीजों को उपचारित करें, इस से फसल बेहतर होगी.

* आप ने अगर कपास लगा रखी हो, तो उस के खेतों का मुआयना करें. अगर जरूरत महसूस हो तो उस की सिंचाई करें. सिंचाई के बाद खेतों में नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा डालें.

* सिंचाई के अलावा कपास के खेतों की निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकालें. जरूरत के मुताबिक कीटों व रोगों के इलाज के लिए दवाओं का इस्तेमाल करें.

* पहले डाली गई तुरई की नर्सरी में पौधे तैयार हो चुके होंगे, लिहाजा उन की रोपाई करें. तुरई के पौधों की रोपाई 100×50 सैंटीमीटर के फासले पर करें.

* इसी महीने शरदकालीन बैगन की नर्सरी डालें. बोआई के लिए उम्दा प्रजाति के बीजों का इस्तेमाल करें. अच्छी प्रजाति का चयन करने से फसल बेहतर होती है और फायदा ज्यादा होता है.

* मिर्च के खेत सूखे दिखाई दें, तो उन की हलकी सिंचाई करें. सिंचाई के अलावा निराईगुड़ाई कर के खरपतवारों को निकाल दें.

* अगली फसल के लिए मिर्च की नर्सरी डालें. मिर्च की खेती में प्रति हेक्टेयर रोपाई के लिए डेढ़ किलोग्राम बीजों की जरूरत होती है.

* पकी मिर्चों की तोड़ाई कर के उन्हें मंडी भिजवाएं या सही तरीके से उन का भंडारण करें.

* आमतौर पर जून तक लहसुन की फसल तैयार हो जाती है. अगर आप के लहसुन की फसल भी तैयार हो चुकी हो, तो उस की खुदाई का काम खत्म करें.

* लहसुन की खुदाई के बाद फसल को 2-3 दिनों तक खेत में ही सूखने दें. सूखने के बाद लहसुन की गड्डियां बना कर उन्हें साफ व सूखी जगह पर स्टोर करें.

*अगर अदरक के खेत सूखे नजर आएं तो सिंचाई करें. इस के अलावा 50 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से डालें. यूरिया के इस्तेमाल से अदरक की फसल उम्दा होती है.

* हलदी के खेत भी अगर सूखे लगें, तो उन की भी सिंचाई करें. हलदी के खेतों में भी 50 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डालें, इस से फसल बेहतर होगी.

* जून महीने में ही रामदाना की भी बोआई की जाती है. इस फायदे वाली फसल की बोआई का काम 15 जून तक कर लेना चाहिए. इस की बोआई के लिए डेढ़ किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लगते हैं.

* मक्का हर लिहाज से बेहद उपयोगी होता है. इनसानों के साथसाथ यह जानवरों का भी पसंदीदा भोजन होता है. लिहाजा, मवेशियों के दाने के लिहाज से इस महीने मक्के की भी बोआई करें.

* मवेशियों के चारे के लिहाज से तमाम चारा फसलों की बोआई जून महीने में ही कर देनी चाहिए. ऐसा करने से चारे का क्रम बना रहता है और पशुपालकों को हरे चारे के लिए परेशान नहीं होना पड़ता.

* अलबत्ता कौनकौन सी चारे की फसलें बोएं, इस का फैसला इलाके और आबोहवा के मुताबिक करना सही रहता है. इस में नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के पशु वैज्ञानिक की मदद ली जा सकती है.

* जून की आबोहवा इनसानों के लिए ही नहीं, बल्कि जानवरों के लिए भी खतरनाक होती है, लिहाजा इस महीने के दौरान अपने मवेशियों का खास खयाल रखें. उन्हें लू के कहर से बचा कर रखें.

* अपनी महंगी गायभैंसों को गरमी के कहर से बचाने का पूरा बंदोबस्त करें.

* पशुओं के लिए जरूरत के मुताबिक पंखों व कूलरों का इंतजाम करें.

* मवेशियों को दिन व दोपहर की कड़ी धूप से बचा कर रखें. रात के समय उन्हें खुले आसमान के नीचे बांधें.

* पशुओं को रात के दौरान खुले में बांधने से उन्हें ठंडीठंडी हवा का मजा तो जरूर मिलता है, मगर ऐसे में चोरों से सावधान रहना चाहिए. चोरों को रातोंरात मवेशियों को गायब करने में जरा भी दिक्कत नहीं होती.

* बेहतर यही होगा कि अपने पशुओं के आसपास आप खुद भी लाठी वगैरह ले कर सावधानीपूर्वक खुले में ही सोएं. हो सके तो पास में वफादार पालतू कुत्ता भी रखें.

* नाजुक परिंदों यानी मुरगेमुरगियों को भी गरमी व लू से बचाने के पूरे इंतजाम करें. जरूरत के मुताबिक पंखे या कूलर लगाएं.

* अपने तरीके से तमाम इंतजाम करने के बाद भी अगर मवेशी या मुरगामुरगी वगैरह बीमार व परेशान नजर आएं तो बगैर चूके जानवरों के डाक्टर की मदद लें यानी इलाज कराएं.

पशुओं का पौष्टिक आहार : अजोला की खेती

देश में पशुओं के लिए पौष्टिक चारे की किल्लत दिनोंदिन विकट रूप धारण करती जा रही है. ऐसे में वर्षभर हरे चारे की उपलब्धता भी संभव नहीं हो पाती है. पशुपालकों को वर्ष के अधिकांश महीनों में सूखे चारे के रूप में भूसा, बाजरा व पुआल से बना चारा ही खिलाना पड़ता है. जिस के साथ पशुपालकों को पौष्टिक चारे के रूप में पोषक आहार सरसों की खली, दड़ा, दलिया इत्यादि भी देना पड़ता है, जिस पर 15 से 30 रुपए प्रति किलोग्राम का खर्च आता है.

ऐसे में अगर पशुपालक दुधारू पशुओं का पालन कर रहा है, तो उस के पोषण का विशेष खयाल रखना पडता है. इस के लिए पोषण तत्वों से भरपूर चारे के ऊपर अत्यधिक खर्च करना पडता है. कभीकभी पोषक चारे व आहार देने के बावजूद भी दुधारू पशुओं से अपेक्षित दुग्ध उत्पादन नहीं मिल पाता है, जिस की वजह से पशुपालकों को कभीकभी नुकसान भी उठाना पड़ता है.

इस नजरिए से पोषक तत्वों से भरपूर माना जाने वाला अजोला फर्न न केवल पोषक तत्वों से भरपूर है, बल्कि इस से दुग्ध उत्पादन को बढ़ा कर उत्पादन लागत में कमी लाई जा सकती है. अजोला फर्न खिलाने से गाय के दूध में 15 फीसदी तक की वृद्धि दर्ज की गई है.

वैसे भी देश में हरे चारे का मुख्य स्रोत माने जाने वाले चारागाहों, वन क्षेत्रों व कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल तेजी से सिमट गया है, जिस की वजह से पशुओं के लिए हरे चारे का संकट भी बढ़ा है. इस की पूर्ति के लिए पशुपालक को दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए चारे दाने पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है.

ऐसी स्थिति में अजोला सस्ता सुपाच्य व पौष्टिक आहार के रूप में एक बेहतर चारा साबित हो रहा है, जिस पर महज 2 रुपए से कम प्रति किलोग्राम की लागत आती है.

मगर इस का व्यवसायिक उत्पादन फायदे का सौदा साबित हो रहा है.

अजोला किसी भी अन्य चारे से ज्यादा पौष्टिक होता है, जिस को खिलाने से दुधारू पशुओं के दूध की गुणवत्ता पहले से बेहतर हो जाती है.

अजोला में पशुओं के पोषण के लिए प्रमुख माने जाने वाले प्रोटीन, एमीनो एसिड, विटामिन ए, विटामिन बी12, बीटा कैरोटीन, विकासवर्धक सहायक तत्व फास्फोरस,पोटैशियम व मैग्नेशियम प्रचुर मात्रा में पाई जाती है. इस में शुष्क वजन के आधार पर 25-35 फीसदी प्रोटीन, 10-15 फीसदी खनिज व 7-10 फीसदी एमीनो एसिड के साथ वायो सक्रिय पदार्थ पाए जाते हैं, जिस की वजह से पशुओं में आयरन व कैल्शियम की आपूर्ति आसानी हो पाती है. इस में कार्बोहाइड्रेड व वसा की मात्रा बहुत कम होती है, जिस की वजह से पशु इसे आसानी से पचा सकते हैं. इसलिए इसे दुधारू पशुओं के साथसाथ मुरगियों, भेड़बकरियों, सूअर व खरगोशों को भी पौष्टिक चारों के रूप में दिया जा सकता है.

दुधारू पशुओं को प्रतिदिन सूखे चारे के साथ अजोला की खुराक दैनिक आहार के रूप में प्रतिदिन डेढ़ से 2 किलोग्राम की मात्रा में दिया जा सकता है. इस में हरे चारे नेपियर घास, लोबिया इत्यादि की अपेक्षा प्रोटीन की मात्रा 20 गुना से ज्यादा पाई गई है.

एक हेक्टेयर खेत से संकर नेपियर घास 250 टन, लोबिया 35 टन, ज्वार 40 टन, रिजिका 80 टन के रूप में वार्षिक का उत्पादन मिलता है, जबकि अजोला का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 750 टन वार्षिक है.

अजोला उत्पादन की विधि

अजोला का उत्पादन भी बहुत ही आसान है. इसे किसान अपनी खाली परती जमीन, घरों की छत, धान के खेतों इत्यादि में आसानी से उगा सकते हैं.

व्यावसायिक स्तर पर उगाने के लिए किसी छायादार का स्थान का चयन करना चाहिए. उस के उपरांत 2 मीटर लंबाई व 2 मीटर की चौड़ाई के साथ 30 सैंटीमीटर गहरे गड्ढे बनाने चाहिए. जिस में से पानी रोकने के लिए पराबैगनी किरणरोधी प्लास्टिक सीट से ढकाई की जाती है. धान के खेतों में इसे सीधेतौर पर उगाया जा सकता है.

सीमेंटयुक्त गड्ढे इस के लिए ज्यादा उपयुक्त होते हैं, क्योंकि इस में पानी रिसाव नहीं होता है. अगर 2×2 मीटर का गड्ढा बना कर अजोला का उत्पादन किया जा रहा है, तो प्रति गड्ढा 10-15 किलोग्राम मिट्टी की परत फैला कर उस में 10 लिटर पानी में 2 किलोग्राम गोबर व 30 ग्राम सुपर फास्फेट से बना घोल बेडसीट पर डाला जाता है. इस के उपरांत 10-12 सैंटीमीटर तक पानी भर दिया जाता है.

अजोला बीज के लिए अजोला कल्चर का निर्माण किया जाता है, जो किसी भी प्रतिष्ठित कृषि विश्वविद्यालय के मृदा, सूक्ष्म व जीव विज्ञान विभाग या कृषि संबंधी बड़ी दुकानों से खरीद जा सकता है.

किसान प्रति गड्ढे में आधा किलोग्राम से एक किलोग्राम अजोला कल्चर डाल सकते हैं, जो बहुत तेजी से पनपता है और 10-15 दिनों के भीतर पूरे गड्ढे को भर लेता है. इस गड्ढे से प्रत्येक दिन एक से दो किलोग्राम अजोला निकाल कर पशुओं को पौष्टिक चारे के रूप में खिलाया जा सकता है. गड्ढे से निकाले गए अजोला को पशुओं को खिलाने से पहले साफ पानी से धो लेना चाहिए, जिस से उस में से गोबर की दुर्गंध को दूर किया जा सकें.

अजोला का अच्छा उत्पादन लेने के लिए प्रत्येक हफ्ते प्रत्येक गड्ढे में एक किलोग्राम गोबर के साथ 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट डालते रहना चाहिए, जिस से अजोला का उत्पादन अच्छा मिलता रहता है.

अधिक उत्पादन के लिए इन बातों पर दें ध्यान

अजोला की खेती के लिए यह जरूर ध्यान दें कि जहां उस का उत्पादन किया जा रहा हो, वहां का तापमान 20-28 डिगरी सैल्सियस हो, क्योंकि यह तापमान इस की वृद्धि के लिए सब से उपयुक्त माना जाता है.

चूंकि यह तेजी से बढ़ने वाला फर्न है, इसलिए प्रत्येक दिन 1-2 किलोग्राम अजोला की निकासी सुनिश्चित होनी चाहिए. कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया, जनपद बस्ती में वरिष्ठ पशु विज्ञानी डा. डीके श्रीवास्तव का कहना है कि पशुओं की चारा समस्या से निबटने के लिए अजोला एक बेहतर उपाय साबित हो रहा है. ऐसे में कोई भी किसान इस की खेती के लिए कल्चर या बीज के लिए अपने नजदीकी कृषि विश्वविद्यालयों से संपर्क कर सकता है या केंद्रीय चारा उत्पादन फार्म बेंगलुरु, कर्नाटक के जरीए संपर्क कर खरीदा जा सकता है.

पशुपालन के क्षेत्र में बढ़ता पंजाब

पंजाब में गायभैंसों के अलावा भेड़बकरियों, सूअरों, ऊंटों, घोड़ों, मुरगी और टर्की पालने का काम भी किया जाताहै. इसी तरह मुरगीपालन, ब्रायलरपालन और अंडों का उत्पादन का काम भी बड़े पैमाने पर किया जाता है.

पशुपालन विभाग द्वारा राज्य के पशुओं के लिए तकरीबन 1400 पशु अस्पताल और 1500 पशु डिस्पैंसरियां मौजूद हैं. इस के अलावा वैटनरी पौलीक्लिनिक जिला स्तर पर हैं. भेड़ों, बकरियों, सूअरों, खरगोश, मुरगी, टर्की वगैरह पालने के लिए भी फार्म चल रहे हैं.

इन फार्मों में किसानों को अच्छी नस्ल के बच्चे कम कीमतों पर दिए जाते हैं और पशुओं में होने वाली खास बीमारी पहचान प्रयोगशाला (आरडीडीएल) जालंधर में चल रही है और यहां अलगअलग बीमारियों की पहचान और खोज की जाती है.

पशुपालन विभाग और पंजाब पशुधन विकास बोर्ड द्वारा अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं, जो इस तरह हैं:

नस्ल सुधार संबंधी योजनाएं :

पशुओं का दूध बढ़ाने के लिए यहां पशु नस्ल सुधार की दिशा में खास काम हो रहा है. पशु में नस्ल सुधार होने से दूध की पैदावार भी काफी बढ़ी है और किसानों को फायदा हुआ है.

कृत्रिम गर्भाधान (एआई) :

पशुपालन विभाग ने देशी गायों की नस्ल सुधारने के लिए खास प्रयास किए हैं. क्रौस ब्रीडिंग और नस्ल सुधार प्रोग्राम के तहत एचएफ जर्सी और साहीवाल जैसी गायों को उन्नत नस्लों के सांड़ों के वीर्य द्वारा गाभिन किया जाता है. इस के लिए किसानों को केवल 50 रुपए प्रति स्ट्रा खर्च करना पड़ता है.

विदेशी सीमन (वीर्य) :

पशुओं की नस्ल को और बेहतर बनाने के लिए विदेशी सीमन अमेरिका और कनाडा से मंगाया जाता है. इस में भी भारी सब्सिडी दी जाती है.

केवल बछिया वाला सीमन :

इस को ‘सैक्स्ड सीमन’ कहा जाता है और इस को विशेष विधियों से तैयार किया जाता है. इस में केवल बछिया पैदा करने वाले शुक्राणु होते हैं. इस स्कीम पर भारी सब्सिडी दी जाती है.

भ्रूण तबादला विधि :

इस के अंतर्गत बहुत उम्दा नस्ल के तैयार भ्रूण विदेशों से मंगवा कर अच्छी क्वालिटी के सांड़ पैदा करने की कोशिश की जा रही है, ताकि आने वाले समय में उच्च नस्ल के सांड़ों के टीके यहीं पर तैयार किए जा सकें. इन के अलावा गांवों की पंचायतों के लिए डेढ़ से 2 साल के मेहरू कटडे़ भी किसानों के लिए भारी सब्सिडी पर दिए जाते हैं.

बीमारियों से बचाव के टीके :

विभाग की तरफ से पशुओं को आम बीमारियों के अलावा छूत की बीमारियों से बचाव के लिए टीके समयसमय पर लगाए जाते हैं, जो इस तरह हैं:

मुंहपका और खुरपका के टीके :

ये टीके विभाग की तरफ से साल में 2 बार मुफ्त लगाए जाते हैं यानी इस की कोई भी कीमत पशुपालक से नहीं ली जाती.

गलघोंटू के टीके :

बरसात में होने वाली यह एक भयानक बीमारी है और इस से बचाव के लिए ये टीके नाममात्र की कीमत पर लगाए जाते हैं. इन के अलावा पशुओं में जांघ में सूजन और ब्रुसीलोसिस के टीके भी लगाए जाते हैं.

भेड़बकरियों के लिए इंटैरोटोकसीमिया बीमारी, मुरगियों के लिए रानीखेत, सूअर के लिए स्वाइन फीवर और कुत्तों के लिए हलकने से बचने के टीके सब्सिडी पर दिए जाते हैं.

पशुओं की प्रजनन संबंधी और दूसरी बीमारियों से बचाव और इलाज के लिए समयसमय पर विशेष पशु भलाई कैंप लगाए जाते हैं और इन कैंपों पर दवा और सलाह मुफ्त दी जाती है.

विभाग ओर से पशुपालन विभाग में सब्सिडी की योजनाएं निम्न हैं:

हरे चारे में योगदान :

दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए हरे चारे के योगदान को देखते हुए रबी और बरसात के हरे चारे के उन्नत बीज किसानों को दिए जाते हैं. किसानों को हरे चारे से साइलेज बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है और साइलोपिट बनाने के लिए अच्छीखासी सब्सिडी दी जाती है.

चारा काटने के लिए किसानों को चारा काटने की मशीन (पावर टोके) और हाथ टोके सब्सिडी पर दिए जाते हैं.

मिलती है ट्रेनिंग :

मुरगीपालन, भेड़पालन  बकरीपालन, सूअरपालन और टर्कीपालन के लिए ट्रेनिंग देने का इंतजाम विभाग द्वारा किया जाता है. बैकयार्ड पौल्ट्री ट्रेनिंग के लिए चूजे और  टर्की पालने के लिए बर्ड्स किसानों को दिए जाते हैं.

विभाग की तरफ से नाबार्ड की सहायता से पौल्ट्री कैपीटल वैंचर फंड स्कीम द्वारा मुरगी फार्म खोलने के लिए सब्सिडी और बाकी राशि बैंक से ऋण के रूप में दिलाई जाती है.

बैकयार्ड पौल्ट्री :

घर के अंदर सौ मुरगियों तक पालने को ‘बैकयार्ड मुरगीपालन’ कहा जाता है. किसानों को आरआईआर नस्ल के चूजे घरेलू मुरगीपालन के लिए सब्सिडी पर बेचे जाते हैं. यह चूजे बीमारीरहित होते हैं और इन के रखरखाव पर खर्चा भी कम आता है.

ब्रायलर फार्म :

चाबरो नस्ल के चूजे ब्रायलर फार्म के लिए किसानों को सब्सिडी पर दिए जाते हैं. ये काफी तेजी से बढ़ते हैं और इन में बीमारियां भी कम होती हैं.

पालें टर्की :

टर्की पालने में भी अनेक लोगों का अच्छा रुझान है. 6 हफ्ते के टर्की के चूजे 5 से 10 की यूनिटों में किसानों को सब्सिडी पर दिए जाते हैं.

बछड़ा खरीद की स्कीमें:

विभाग ओर से ज्यादा दूध देने वाली गाय और भैंसों के 6 महीने के ऊपर के बछड़े और कटडे़ खरीदे जाते हैं. ये बछड़े और कटड़े बेरोजगार नौजवानों को पालने के लिए सब्सिडी पर दिए जाते हैं.

इस से युवाओं को रोजगार तो मिलता ही है, वहीं दूध की पैदावार में बढ़ोतरी होती है.

सूअरपालन :

इस निजी उद्योग के लिए लोगों को उत्साहित करने की सूअरपालन की ट्रेनिंग दी जाती है. कम कीमत पर उन्नत नस्लों के सूअर के बच्चे भी किसानों को सब्सिडी पर दिए जाते हैं.

आरकेवीवाई स्कीम के तहत सूअर फार्म खोलने के लिए सब्सिडी और बैंकों की तरफ से कर्ज दिलाया जाता है. नस्ल को बेहतर बनाने के लिए वीर्य बाहर से मंगाया जाता है.

भेड़बकरीपालन :

विभाग की ओर से भेड़बकरीपालकों को उत्तम नस्ल के नर दिए जाते हैं, ताकि अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा हो सकें.

आरकेवीवाई स्कीम के तहत बकरीपालन और भेड़पालन के लिए सब्सिडी और बैंक की तरफ से कर्ज भी दिलाया जाता है.

पशुधन मेलों का आयोजन :

लोगों में अच्छी नस्ल के बढि़या जानवर पालने के शौक को पैदा करने के लिए समयसमय पर जिला स्तर और राज्य स्तर पर पशु मेलों का आयोजन किया जाता है.

इन मेलों में जीतने वाले पशुपालकों को ट्रौफी, सर्टिफिकेट और नकद पुरस्कार दिए जाते हैं. जिलों के मुकाबले में जीतने वाले पशुपालकों को राज्य स्तर और राष्ट्रीय मुकाबले के लिए ले जाया जाता है. राष्ट्रीय पशु धन चैपिंयनशिप के दौरान बाहर वाले राज्यों से पशु भी हिस्सा लेते हैं.

पशुओं में लंपी वायरस के नियंत्रण के लिए टीकाकरण का शुभारंभ

उदयपुर : 24 मई, 2023.
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर एवं पशुपालन विभाग, उदयपुर के संयुक्त तत्वाधान में स्मार्ट गांव मदार एवं ब्राह्मणों की हुंदर में एकदिवसीय पशुधन स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का आयोजन कुलपति डा. अजीत कुमार कनार्टक, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के मुख्य आतिथ्य में किया गया.

उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि स्मार्ट विलेज मदार एवं ब्राम्हणों की हुंदर में विश्वविद्यालय द्वारा किए गए सफल कार्याें को देखते हुये राज्यपाल द्वारा प्रशंसापत्र प्रदान किया गया.

उन्होंने आगे यह भी बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नवीन कृषि प्रौद्योगिकी एवं नवाचार को अपनाने की अपील की.

इस अवसर पर उन्होंने लंपी वायरस के नियंत्रण के लिए टीकाकरण कार्यक्रम का शुभारंभ किया और 98 पशुपालकों को मिनरल मिक्चर वितरित किया.

कार्यक्रम के आरंभ में निदेशक प्रसार शिक्षा, डा. आरए कौशिक ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि स्मार्ट गांव मदार एवं ब्राम्हणों की हुंदर को राज्यपाल द्वारा एक वर्ष की अवधि और बढ़ा दी गई, ताकि गांव का सर्वांगीण विकास हो सके.

डा. शक्ति सिंह, संयुक्त निदेशक, पशुपालन विभाग, उदयपुर ने बताया कि ग्रीष्मकाल में पशुओं को कैसे सुरक्षित रखा जाए एवं उन्हें किस प्रकार से उचित वातावरण उपलब्ध कराया जाए, ताकि पशुओं के स्वास्थ्य को स्वस्थ रखा जा सके.

उन्होंने बताया कि ग्रीष्मकाल में पशुओं में होने वाले रोगों के लिए उचित टीकाकरण करवाना अनिवार्य है.

उन्होंने यह भी बताया कि गत वर्ष भी लंपी वायरस पर नियंत्रण किया गया था. इस वर्ष भी इस रोग से बचाव के लिए विभाग द्वारा घरघर जा कर पशुओं का टीकाकरण किया जा रहा है.

डा. ओपी साहु, पशु चिकित्सा अधिकारी, पशुपालन विभाग, उदयपुर ने बताया कि इन पशुओं में होने वाले बाह्य एवं आंतरिक परजीवियों को नियंत्रण करने के लिए संक्षिप्त जानकारी दी.

शिविर में डा. पी. भटनागर, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष, कृषि विज्ञान केंद्र, बड़गांव ने बताया कि पशुओं के बांझपन का उपचार किए जाने की जरूरत है व इस समस्या के निदान के लिए कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा परियोजना चलाई जा रही है.

डा. सिद्धार्थ मिश्रा, विभागाध्यक्ष, पशु उत्पादन विभाग, राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर ने पशु प्रबंधन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि बकरियों की नस्ल सुधार के लिए सिरोही नस्ल के बकरे वितरित किया जाना प्रस्तावित है, ताकि नस्लों में सुधार कर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके.

डा. दत्रादेय, पशु चिकित्सक, बड़गांव, उदयपुर ने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए पशुओं में होने वाले रोगों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी. साथ ही, पशुओं में होने वाले रोगों की रोकथाम के लिए उचित दिशानिर्देश भी दिए.

उन्होंने आगे बताया कि शिविर में 320 बड़े पशुओं का उपचार किया गया एवं 148 छोटे पशुओं को कृमिनाशी दवा पिलाई गई, जिस से 215 पशुपालकों को लाभान्वित किया गया.

डा. आरएस राठौड़, स्मार्ट विलेज समन्वयक, मप्रकृप्रौविवि, उदयपुर ने कार्यक्रम का संचालन किया. अंत में वहां उपस्थित सभी लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया.

बरसात के मौसम में पशुओं की देखभाल

गरमी के मौसम के बाद बारिश का मौसम आएगा. बारिश की फुहारें तन और मन को तरोताजा कर देती हैं. मनुष्य के साथसाथ पशुपक्षी भी नाच उठते हैं. प्रकृति खिल उठती है. हर तरफ हरियाली की चादर बिछ जाती है. यह तो तसवीर का उजला पक्ष है. अगर इस के दूसरे पक्ष को देखें तो जगहजगह कीचड़ और गंदगी, मच्छरमक्खियों की भरमार, मौसमी बीमारियों का प्रकोप, जहरीले जीवजंतु. ऐसे में जहां मनुष्य ही अनेक बीमारियों का शिकार हो जाता है, वहीं बेजबान पशुओं की तो बिसात ही क्या.

बरसात के दिनों में गरमी तो रहती ही है, साथ ही उमस भी हो जाती है या वातावरण की नमी कोढ़ में खाज का काम करती है.  इस मौसम में बैक्टीरिया बहुत जल्दी पनपते हैं. साथ ही, मच्छरमक्खी और पिस्सू का ब्रीडिंग सीजन भी यही होता है इसलिए उन की तादाद भी बढ़ जाती है. ऐसी स्थिति में संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है.

जानते हैं, बरसात के दिनों में पशुओं की खास देखभाल के कुछ आसान से उपाय:

आवास प्रबंधन

* सब से पहले तो पशु के ठहरने की जगह को ठीक करना होगा यानी आवास प्रबंधन में थोड़ा सा बदलाव करना होगा जैसे पशुशाला की जमीन बाकी जमीन से थोड़ी ऊंची रखनी चाहिए ताकि उस में पानी न भरे.

* पशुशाला में जमा पानी के निकलने का सही बंदोबस्त होना चाहिए.

* पशुशाला के बाहर भी बरसात का पानी जमा न होने पाए वरना मच्छरमक्खी और पिस्सू के पनपने से समस्या बढ़ सकती है.

* पशुशाला का फर्श सूखा और फिसलन रहित होना चाहिए.

* पशुशाला के फर्श और दीवारों में दरारें नहीं होनी चाहिए क्योंकि पिस्सू का ट्रीटमैंट करने के बाद वह पशु का शरीर तो छोड़ देगा, मगर इन दरारों में छिप जाएगा और जैसे ही पशु पर दवा का असर कम होगा, वह फिर से हमला कर सकता है.

दाना चारा प्रबंधन

* बरसात से पहले ही दाने और चारे का सही बंदोबस्त कर लेना चाहिए.

* ये चीजें नमीरहित जगह पर रखनी चाहिए. नमी रहने से दानेचारे में फफूंद लगने की संभावना बढ़ जाती है. सथ ही, फफूंद या फंगस से बीमारियां फैल सकती हैं.

अन्य सावधानियां

* पशु के अपशिष्ट पदार्थों यानी गोबरमूत्र वगैरह का सही तरीके से निबटान करना चाहिए. जहां तक हो सके, पशुशाला से अपशिष्ट पदार्थ दिन में कम से कम 2 बार हटवा देने चाहिए.

* बरसात से पहले ही पशु का संक्रामक और कृमिनाशक रोगों से बचाव के लिए टीकाकरण करवा लेना चाहिए क्योंकि बरसात में पशु हरे चारे के साथसाथ मिट्टी भी खा लेते हैं जो उन के पेट में कीड़ों की वजह बनती है. टीकाकरण 6-6 महीने के अंतराल पर यानी साल में 2 बार अवश्य ही लगवाना चाहिए.

* गलघोंटू, लंगड़ा, मुंहपका, खुरपका वगैरह जानलेवा बीमारियों के टीके भी लगवा लेने चाहिए. गलघोंटू और लंगड़ा बुखार बीमारियों में बचाव ही उपचार हैं. ये बीमारियां सीधे पशु के दिल पर असर करती हैं.

एक बार बीमारी होने के बाद पशु अगर बच्चा है तो उस में मृत्युदर बहुत ज्यादा होती है. अगर पशु व्यस्क है तो उस का प्रोडक्शन खत्म हो जाता है. कम से कम उस ब्यांत में तो नहीं ही होता है, आगे भी मुश्किल है.

* पिस्सुओं से फैलने वाली बीमारी में पशु को बुखार भी हो सकता है. उस के पेशाब में खून भी आ सकता है. इन से बचने के लिए पशुशाला की मिट्टी का ट्रीटमैंट जरूर करा लेना चाहिए.

* बरसात के मौसम में जहरीले जीवजंतु काटने पर इन का प्राइमरी ट्रीटमैंट कुछ भी नहीं होता. वैसे, ज्यादातर सांप जहरीले नहीं होते और इन के काटने पर पशु तो क्या, मनुष्य तक को कोई फर्क नहीं पड़ता.

* सांप के काटने पर झाड़फूंक जैसे अंधविश्वास से दूर रहना चाहिए. अकसर लोग कहते हैं कि झाड़फूंक से सांप का जहर उतर जाता है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं होता. सिर्फ करैट, वाइपर और कोबरा ये 3 किस्में ही सांप की जहरीली होती हैं और उन का इलाज सिर्फ माहिर डाक्टर के पास ही होता है, किसी ओझा या बाबा के पास नहीं.

सांप के काटने पर घाव को साबुन वगैरह से धोना या दंश वाली जगह को थोड़ा ऊपर से कस कर बांधना ये सब कहीसुनी बातें हैं. जितना जल्दी हो सके, डाक्टर से सलाह लेनी चाहिए. इन केसों में पशुओं का इलाज भी मनुष्यों की भांति ही किया जाता है.

(राजस्थान यूनिवर्सिटी औफ वेटेनरी ऐंड एनिमल साइंस, बीकानेर में मैडिसिन विभाग के असिस्टैंट प्रोफैसर सीता राम गुप्ता से हुई बातचीत के आधार पर.)

ब्रायलर की उन्नत नस्लों से अच्छा मुनाफा

ब्रायलर मुरगीपालन मांस के लिए किया जाता है. इस प्रजाति के मुरगे (चूजे) व मुरगी अंडे से निकलने के बाद तकरीबन 40 ग्राम वजन के होते हैं जिन की सही प्रकार से देखरेख की जाए और उन्हें सही समय पर दानापानी दिया जाए तो वे 6 हफ्ते में तकरीबन 1.5 से 2 किलोग्राम वजन तक के हो जाते हैं.

ब्रायलरपालन करने से पहले इस के बारे में तकनीकी जानकारी जरूर ले लें और ब्रायलर की सही प्रजाति का चयन करें.

सीएआरआई द्वारा विकसित की गई ब्रायलर प्रजातियां

कैरी विशाल (सफेद ब्रायलर) : यह सफेद रंग की एक ऐसी ब्रायलर मुरगी प्रजाति है जो मांस गुणवत्ता के?क्षेत्र में अच्छी नस्ल साबित हो रही है.

इसे उष्णकटिबंधीय जलवायु के मुताबिक अच्छी खूबियों के साथसाथ रंगीन नस्ल वाली मुरगी के रूप में भी विकसित किया गया है. यह नस्ल भारतीय जलवायु और प्रबंधन स्थितियों के अनुरूप है और बेहतर बढ़ोतरी दर और रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली नस्ल है.

उत्पादन की खासीयतें

* एक दिन के चूजे का वजन 43 ग्राम.

* 6 हफ्ते पर शरीर कावजन 1650 से 1700 ग्राम तक.

* 7 हफ्ते पर शरीर का वजन 2100 से 2150 ग्राम तक.

कैरी धनराज (रंगीन ब्रायलर) : चमकदार, रंगीन एकल कलगी कैरी धनराज की खूबी है. अधिक वजनदार, अच्छी शारीरिक बनावट और उम्दा आहार इस की खास विशेषताएं हैं. इस का मांस स्वादिष्ठ और अच्छी गुणवत्ता वाला है. अनेक रंगों में होने के कारण इन पक्षियों की मांग बाजार में बहुत ज्यादा है. इस से मुनाफा भी अच्छा मिलता है.

उत्पादन की खासीयतें

* एक दिन के चूजे का वजन 46 ग्राम.

* 6 हफ्ते पर शरीर का वजन 1500 से 1700 ग्राम.

* 7 हफ्ते पर शरीर का वजन 2000 से 2125 ग्राम.

इन नस्लों की अधिक जानकारी के लिए आप भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, उत्तर प्रदेश के इन फोन नंबरों 91-581-2300204, 2301220, 2303223 पर संपर्क कर सकते हैं.

गरमी में पशुओं को खिलाएं हरा चारा

भारत कृषि प्रधान देश है. इस में पशुपालन कृषि उत्पादन प्रक्रिया में सहभागी है. हमारा देश दुनियाभर में दूध उत्पादन के मामले में अव्वल है. यह वैज्ञानिकों और किसानों की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है.

पशुओं के रखरखाव में अकसर 60-65 फीसदी खर्च पालनेपोसने पर ही आता है. देश में साल में 2 बार हरे चारे की तंगी या कमी के मौके आते हैं, अप्रैलजून और नवंबरदिसंबर.

पशुपालक गरमी में मक्का, लोबिया ज्वार, बाजरा वगैरह वैज्ञानिक विधि से उगा कर कम लागत में ज्यादा पैदावार ले सकते हैं.

दलहनी चारे अधिक पौष्टिक होतेहैं, पर उन्हें ज्यादा नहीं खिलाना चाहिए क्योंकि इस से पशुओं में पेट फूलना या अफरा रोग हो जाता है.

पशुपालक एक दलहनी व गैरदलहनी वाली फसलों को मिला कर के अपने खेतों पर लगाएं. इस प्रकार के हरे चारे को पशुओं को खिलाने से पशुओं को कार्बोहाइड्रेट के साथसाथ प्रोटीन की आपूर्ति भी होती है. साथ ही, पशुओं की अच्छी बढ़ोतरी होने के साथसाथ दूध भी बढ़ जाता है.

जलवायु : ज्यादा हरा चारा हासिल करने के लिए पानी, हवा, सूरज की रोशनी और माकूल जलवायु की जरूरत होती है. सफल उत्पादन मौसम की अनुकूल व प्रतिकूल दोनों ही दशाओं पर निर्भर करता है. आमतौर पर 25-30 डिगरी सैल्सियस तापमान मक्का, ज्वार, बाजरा, लोबिया वगैरह के लिए उपयुक्त रहता है.

जमीन की तैयारी : सही जल निकास वाली दोमट या रेतीली मिट्टी इस की पैदावार के लिए सही रहती है. साथ ही, जमीन समतल होनी चाहिए. एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें व 2-3 गहरी जुताइयां देशी हल या कल्टीवेटर से करने के बाद जमीन को समतल कर लें.

बीज बोने का समय : चारे की फसल लाइन में करें. छोटे आकार के बीज जैसे बाजरा वगैरह की बोआई छिटकवां विधि से भी कर सकते हैं. चारा फसलों की बोआई मार्च से जुलाई माह तक कर सकते हैं.

फसल मिश्रण : चारे की फसल बोने पर साधारण बीज दर प्रति हेक्टेयर आधी कर देनी चाहिए. दलहनी व गैरदलहनी फसलों का ही मिश्रण बना कर पशुपालक उगाएं. इस से ज्यादा पैदावार होने के साथसाथ जमीन की उर्वराशक्ति भी बढ़ जाती है जैसे मक्का लोबिया, ज्वार, ग्वार वगैरह.

सिंचाई : गरमी में 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहने से चारे की बढ़वार अच्छी होती है. बारिश में जरूरत पड़ने पर ही सिंचाई करें.

खाद व उर्वरक डालने की विधि : आमतौर पर मिट्टी जांच के आधार पर ही खाद और उर्वरक डालें. 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद जुताई के समय खेत में ठीक से मिलाएं. फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा खड़ी फसल में डालें.

कटाई: एक काट वाली फसलों की कटाई 55-60 दिनों के बाद करें यानी फूल बनते समय कटाई करें जिस से अधिकतम पोषक तत्त्वों का फायदा मिल सके.

कई काट वाली फसलें जैसे ज्वार की पहली कटाई 35-40 दिन के बाद करें और बाद की कटाइयां 20-22 दिन बाद करें. काट वाली फसलों की कटाई जमीन से 5-7 सैंटीमीटर ऊपर से करनी चाहिए, जिस से जल्दी बढ़वार हो सके.

मुख्य चारा फसलों की जानकारी : गैरदलहनी फसलों में मक्का, ज्वार, बाजरा हैं व दलहनी फसलों में लोबिया, ग्वार का हरा चारा मिला कर खिलाने से पशु का दूध उत्पादन गरमी में कम नहीं होगा. साथ ही, पशु की प्रजनन क्षमता में भी सुधार होगा. इस तरह पशुपालक कम खर्च कर के ज्यादा आमदनी हासिल कर सकेंगे.

घी उत्पादन के लिए मुफीद भदावरी भैंस

किसान खेती के साथसाथ पशुपालन, डेरी, फूड प्रोसैसिंग जैसे कामों को कर के अधिकतम लाभ ले सकते हैं. ऐसे तमाम किसान हैं, जिन्होंने पशु पालन व डेरी का व्यवसाय को अपनाकर न केवल अपनी माली हालत में सुधार किया, बल्कि दूसरों के रोजगार मुहैया कराने का जरीया भी बने हैं. अगर आप दुधारू पशुओं के पालन की इच्छा रखते हैं, तो इस के साथसाथ डेरी और डेरी उत्पादों को तैयार कर ज्यादा मुनाफा ले सकते हैं.

वैसे तो देशी घी का व्यवसाय गाय या भैंस पाल कर किया जा सकता है. लेकिन भैंसों के दूध में वसा की मात्रा अधिक पाए जाने से यह घी के लिए ज्यादा मुफीद मानी जाती है.

देश में भैसों की प्रमुख रूप से 12 नस्लें हैं, लेकिन भदावरी नस्ल की भैंस के दूध में वसा की मात्रा अधिक होने की वजह से अन्य नस्लों की अपेक्षा इस के दूध में घी की मात्रा अधिक पाई जाती है.

भैंस की भदावरी नस्ल का पालन उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में किया जाता है. भैसों की यह प्रजाति विलुप्त होने के कगार पर है. सरकार द्वारा इसे बचाने के लिए कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है. इस नस्ल की भैंसों की संख्या देश में बहुत कम हो गई है, जिसे अब सुरक्षित करने की भी जरूरत है.

भदावरी नस्ल की भैंस के दूध में वसा की मात्रा 12-13 फीसदी के करीब पाई जाती है, जो उस के
खानपान के अनुसार 6-14 फीसदी तक पाई जाती है.

भदावरी भैंस के पशुपालकों के अनुसार, अगर भदावरी नस्ल की कोई भैंस प्रतिदिन 5 लिटर दूध दे तो 8 दिन में 5 किलोग्राम शुद्ध देशी घी प्राप्त किया जा सकता है, जो 12.5 फीसदी वसा के बराबर है. यह किसी भी नस्ल की भैंस में पाए जाने वाली वसा की फीसदी से ज्यादा है.

भदावरी नस्ल की भैंसों के दूध में औसत 8.2 फीसदी वसा, 19 फीसदी ठोस तत्व, 4.11 फीसदी प्रोटीन, 205.72 मिग्रा. कैल्शियम, 140.90 मिग्रा. फास्फोरस, 3.82 माइक्रोग्राम जिंक, 0.24 माइकोग्राम कौपर व 0.117 माइक्रोग्राम मैंगनीज पाया जाता है.

भदावरी भैंस की विशेषता

भदावरी नस्ल की भैंसों का कद मध्यम छोटा होता है, जिस का शरीर नुकीला, छोटा सिर, छोटी और मजबूत टांगें, काले खुर, एकसमान पुट्ठे, कौपर या हलके भूरे रंग की पलकें और काले रंग के लंबे सींग होते हैं. इन के शरीर पर बाल कम होते हैं. इन की टांगें छोटी व मजबूत होती हैं. घुटने के नीचे का हिस्सा हलका पीला व सफेद रंग का होता है. सिर के अगले हिस्से पर आंखों के ऊपर वाला भाग सफेदी लिए होता है. गरदन के निचले भाग पर दो सफेद धारियां होती हैं. इन की सींगें तलवार के आकार की होती हैं. यह प्रति ब्यांत में औसतन 800-1,000 लिटर दूध देती है. भदावरी नस्ल के वयस्क पशुओं का औसत भाग 300-400 किलोग्राम होता है. छोटा आकार व कम भार की वजह से इन का आहार अन्य भैसों की नस्लों की अपेक्षा काफी कम होता है. इसे कम संसाधनों में किसानों, पशुपालकों व भूमिहीन पशुपालकों द्वारा आसानी से पाला जा सकता है. जो भी मिल जाए, उस को खा कर अपना गुजारा कर लेने की वजह से इन की खाद्य परिवर्तन क्षमता अधिक है. इस नस्ल की भैंसों में कई बीमारियों की प्रतिरोधक क्षमता पाई जाती है. भदावरी भैंस के बच्चों की मृत्यु दर अन्य भैसों की प्रजातियों की तुलना में बहुत कम है.

चारा प्रबंधन

भदावरी नस्ल की भैंसों को चारा दें. उन के चारे में ऊर्जा, प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, विटामिन ए की प्रचुर मात्रा होनी चाहिए. इस नस्ल की भैंसों को जरूरत के मुताबिक ही चारा खिलाएं. इस से इन के दूध उत्पादन छमता में गिरावट नहीं आने पाती है और इन का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है. इन के चारे में दानों का विशेष खयाल रखना चाहिए. इस के लिए मक्की, जौ, जई, बाजरा, गेहूं का मिश्रण खिलाना चाहिए.

चारे के खुराक का मिश्रण बनाने के लिए तेल के बीजों की खली, जिस में मूंगफली, तिल, सोयाबीन, अलसी, सरसों, सूरजमुखी की खली का मिश्रण दिया जा सकता है. इसी के साथ गेहूं का चोकर, चावल का कन, नमक और अन्य खनिज पदार्थ मिला कर खिलाना लाभदायक होता है.

दुग्ध उत्पादन

भदावरी नस्ल की अपेक्षा मुर्रा भैसों की तुलना में दूध तो थोड़ा कम देती है, लेकिन दूध में वसा का अधिक फीसद विषम परिस्थितियों में रहने की क्षमता, बच्चों का कम मृत्यु दर और तुलनात्मक रूप से कम आहार की आवश्यकता आदि गुणों के कारण यह नस्ल किसानों में काफी लोकप्रिय है.

भदावरी भैंस का औसत दुग्ध उत्पादन 4-5 लिटर प्रतिदिन है, लेकिन अच्छे पशु प्रबंधन द्वारा 8-10 लिटर दूध प्रतिदिन प्राप्त किया जा सकता है.

भदावरी भैंस एक ब्यांत में (लगभग 300 दिन) अधिकतम 1,200 से 1,800 लिटर दूध देती है. इस तरह अगर माना जाए, तो प्रतिदिन औसत दूध उत्पादन के आधार पर इस नस्ल के एक ब्यांत की अवधि लगभग 280 दिन की होती है.

ऐसे करें अधिक घी उत्पादन

पशुपालन से जुड़े विशेषज्ञों और किसानों के अनुसार भदावरी भैंसों से अधिक घी उत्पादन के लिए पशुपालक अगर कुछ विशेष चीजों पर ध्यान दें, तो घी उत्पादन को और भी बढ़ाया जा सकता है. इस के लिए पशुपालक भदावरी नस्ल की इन भैंसों को हरे चारे और सूखे चारे का संतुलित आहार दे कर भी दूध में घी की मात्रा को बढ़ा सकते हैं.

सिर्फ हरा चारा खिलाने से दूध और उस में घी की मात्रा नहीं बढ़ती है, बल्कि हरे चारे से दूध तो बढ़ता है, लेकिन उस में चर्बी कम हो जाती है. ऐसे में इस नस्ल की भैंस को 60 फीसदी हरा चारा और 40 फीसदी सूखा चारा मिला कर खिलाना चाहिए, और अचानक पशु आहार में बदलाव न करें.

थनों से दूध निकालते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पड़वा को आखिरी में आने वाला दूध न पिलाएं, क्योंकि घी की मात्रा आखिरी में आने वाले दूध में सर्वाधिक होती है.

इस नस्ल की भैंसों के बारे में अधिक जानकारी के लिए आप अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक पशुपालन से संपर्क कर जानकारी प्राप्त कर सकते है.

पशुपालकों को अब घर बैठे मिलेगी पशु इलाज की सुविधा

मध्य प्रदेश में अब पशुओं के इलाज के लिए औन काल एंबुलेंस सेवा शुरू हो गई है. मतलब, अब घर बैठे ही पशुपालक इस एंबुलेंस को अपने घर बुला सकेंगे. इस के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश को 406 पशु एंबुलेंस का तोहफा दिया है. हर एंबुलेंस में एक पशु चिकित्सक और सहायक उपलब्ध होंगे. आपात स्थिति में पशुओं के इलाज के लिए टोल फ्री नंबर 1962 जारी किया गया है. यह एंबुलेंस सेवा प्रदेश के हर हिस्से में मिलेगी.

बीमार पशु को अस्पताल तक ले जाना ही अपनेआप में एक बड़ी समस्या थी. लेकिन, अब इन एंबुलेंसके आने से पशु चिकित्सालय स्वयं पशुपालक के दरवाजे पर होगा. पशुपालक को केवल दिए गए टोल फ्री नंबर 1962 पर बात करनी होगी.

राज्य स्तरीय काल सेंटर से जुड़ी रहेंगी एंबुलेंस

पशु चिकित्सा एंबुलेंस केंद्र और राज्य शासन की संयुक्त योजना है. इस पर तकरीबन 77 करोड़ रुपए हर साल खर्च होंगे. इस में केंद्र और राज्य सरकार क्रमश: 60 और 40 फीसदी खर्च करेंगी. एंबुलेंस में पशु उपचार, शल्य चिकित्सा, कृत्रिम गर्भाधान, रोग परीक्षण की सुविधा रहेगी.

जरूरत पड़ने पर काल सेंटर के टोल फ्री नंबर 1962 पर फोन कर के पशुपालक अपने घर पर ही पशु चिकित्सा का लाभ उठा सकेंगे. एंबुलेस राज्य स्तरीय काल सेंटर से जुड़ी रहेंगी. एंबुलेंस की मौनिटरिंग जीपीएस के जरीए की जाएगी.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रदेश में गोवंश की हत्या पर प्रतिबंध लगाया गया है. गोहत्या करने वाले को 7 साल और अवैध परिवहन पर कारावास का प्रावधान है. गोवंश के अवैध परिवहन में लिप्त वाहनों को जब्त किया जाएगा.

गाय पालने वालों को मिलेगा फायदा

प्राकृतिक खेती में पशुओं का खासा किरदार है. गोमूत्र और गोबर से ही घनामृत और जीवामृत बनते हैं. प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को गाय पालने के लिए 900 रुपए प्रतिमाह दिए जाएंगे. इस माह 22,000 किसानों को योजना की किस्त जारी की जाएगी. जनजातीय भाईबहनों को गाय
पालने के लिए गाय खरीदने पर 90 फीसदी सब्सिडी उपलब्ध कराई जाएगी. गोबर, गोमूत्र सहित अन्य उत्पादों के व्यवसाय को लाभकारी बनाने के लिए भी राज्य सरकार प्रयासरत है.

गाय के गोबर से सीएनजी बनाने के प्रोजैक्ट पर जबलपुर में काम जारी है. प्रदेश में अलगअलग स्थानों पर गोवर्धन प्लांट लगा कर गोबर खरीदने की व्यवस्था की जाएगी, इस से सीएनजी निर्मित होगी.

गोशालाओं में बने पेंट को मिलेगा बढ़ावा

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि गोशालाओं में बनाए जाने वाले प्राकृतिक पेंट का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत लेवल के शासकीय भवनों में करने की नीति बनाई जाएगी. इस से गोबर और गोमूत्र के व्यवसाय को प्रोत्साहन मिलेगा. प्रदेश में 8 गोसदन और दो गोवंश वन्य विहार विकसित किए जाएंगे.

एंबुलेस संचालन का जिम्मा गोसेवक संस्था को सौंपा जाएगा. पंजीकृत गोशालाओं को बिजली के बिल की समस्या न आए और इस से गाय की सेवा में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो, इस के लिए उपयुक्त नीति बनाए जाएगी. गोशालाओं में भूसे की पर्याप्त व्यवस्था के लिए राशि का पुनर्निर्धारण किया जाएगा.

जिलों में अपर कलक्टर करेंगे गोशालाओं का प्रबंधन

प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रदेश में हर ग्राम पंचायत में गोशाला के बजाय बड़ी गोशालाएं विकसित करने पर भी राज्य शासन विचार कर रहा है. गोशालाओं के सुचारु प्रबंधन के उद्देश्य से 4-5 ग्राम पंचायतों के लिए एक बड़ी गोशाला विकसित की जाएगी. प्राथमिक तौर पर प्रदेश में कुछ स्थानों पर मौडल के रूप में ऐसी गोशाला विकसित की जाएगी. इन गोशालाओं की व्यवस्था की जिम्मेदारी कोई संस्था ले सकती हैऔर संस्था को राज्य शासन द्वारा वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी. जिन गोशालाओं के साथ जमीनें संलग्न हैं और उन जमीनों पर यदि अतिक्रमण है, तो उन्हें तत्काल अतिक्रमण मुक्त कराया जाएगा.

गोशालाओं की समस्याओं के त्वरित समाधान और उन के बेहतर प्रबंधन के लिए जिला स्तर पर अपर कलक्टर स्तर के अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी.

बस्ती जिले में स्थित राप्ती हैचरी बनेगा प्रदेश का सब से बड़ा मत्स्य उत्पादन केंद्र

बस्ती : उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद में स्थित प्रदेश के दूसरे सब से बड़े मत्स्य बीज उत्पादन केंद्र राप्ती हैचरी का औचक निरीक्षण करने पहुंचे मत्स्य विभाग के कैबिनेट मंत्री डा. संजय कुमार निषाद ने इस केंद्र के सुविधाओं का जायजा लेते हुए मत्स्य उत्पादन के प्रगति को जाना.

इस मौके पर उन्होंने बताया कि राप्ती हैचरी मत्स्य बीज उत्पादन में प्रदेश के दूसरे स्थान पर है और इस को प्रथम स्थान पर लाने का प्रयास किया जा रहा है.

निरीक्षण के दौरान मौजूद कर्मियों ने प्रगति की जानकारी देते हुए मंत्री डा. संजय कुमार निषाद को बताया कि राप्ती हैचरी में कुल 6 प्रकार की ब्रीडिंग (प्रजाति) कराई जाती है, जिस में मेजर क्राप्स (रोहू, कतला, नैन), ग्रास क्राप्स, सिल्वर क्राप्स और कामन क्राप्स की ब्रीडिंग राप्ती हैचरी में कराई जाती है.

इस मौके पर पत्रकारों के सवालों का जबाब देते हुए उन्होंने बताया कि कुल 50 लाख मत्स्य बीजों उत्पादन इस साल राप्ती हैचरी में किया गया है और कामन क्राप्स के मत्स्य बीजों की सप्लाई की भी जारी है.

उन्होंने यह भी बताया कि मौजूदा समय में 15 लाख, 71 हजार छोटे मत्स्य बीजों और 54 हजार बड़े मत्स्य बीजों की सप्लाई हो चुकी है.

उन्होंने पत्रकारों के सवालों का जबाब देते हुए बताया कि राप्ती हैचरी कुल 37 एकड़ के क्षेत्रफल में फैला है, जिस में कुल 39 तालाब (पोखरे) बनाए गए हैं और इस के सुचारु संचालन के लिए 20 हार्सपावर की 2 मोटर राप्ती हैचरी में काम कर रही है.

निरीक्षण के दौरान मंत्री डा. संजय कुमार निषाद ने कुछ खामियां भी पाई हैं, जिन्हें सुधारने का निर्देश जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को दिया.

उन्होंने बताया कि पूर्व की सरकारों के मत्स्य विभाग को ले कर ढुलमुल रवैए में प्रदेश में मत्स्य विभाग को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, किंतु प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मत्स्य उत्पादन को ले कर सक्रिय रूप से जोर दिया जा रहा है, जिस के परिणाम है कि प्रदेश में मत्स्य उत्पादन को काफी बढ़ावा मिला है. राप्ती हैचरी में बाउंड्री और फैंसिंग की आवश्यकता है, मत्स्य बीजों को पक्षियों से बचाने के लिए बर्ड नेट (जाल) और पानी की सुचारु और बेहतर सप्लाई के लिए सरयू नहर से लिंक करने की आवश्यकता है, जिसे पूरा किया जाएगा.