गरमियों में पशुओं की देखभाल और बीमारी से बचाव

खेतीबारी के साथसाथ किए जाने वाले कामों में पशुपालन भी किसानों को फायदा देने वाला काम है. खेतीबारी करने वाले किसानों को पशुओं के लिए चारा आसानी से उपलब्ध हो जाता है. साथ ही, पशुओं को रखने के लिए भी उन के पास भरपूर जगह होती है. सब से खास तो खुला वातावरण होता है जहां पशुओं की देखभाल आसानी से की जा सकती है.

गरमियों में दुधारू पशु दूध कम देने लगते हैं, इसलिए पशुओं से अच्छी मात्रा में दूध लेने के लिए जरूरी है कि उन्हें आरामदायक जगह में रखा जाए, संतुलित आहार दिया जाए, अनेक रोगों से रक्षा की जाए और मौसम के हिसाब से उस की देखरेख की जाए.

गरमी की शुरुआत होने पर जरूरी है कि पशुओं को गरमी के प्रकोप से बचाया जाए.

ध्यान रखें कि पशु धूप में बंधा न रह जाए, उसे छाया में पेड़ के नीचे बांधें या पशुशाला के अंदर रखें. पशुशाला के आसपास छायादार पेड़ लगे हों तो इस से पशुशाला ठंडी रहेगी. पशुशाला में फर्श आरामदायक रखें. अधिक गरमी होने पर पानी का छिड़काव करें. छत की ऊंचाई 10 फुट से ऊपर रखें. यदि छत टीन या सीमेंट चादर की है तो उस के ऊपर ज्वार, बाजरा के पूले या छप्पर बना कर रखें. ऐसा करने से पशुघर ठंडा रहता है.

पशुओं को ताजा पानी पिलाएं, दिन में 3 से 4 बार ताजा पानी पिलाना जरूरी है. ज्यादा गरमी होने पर पशु को कम से कम 1-2 बार नहलाएं. भूसे व दानों को खिलाने से पहले भिगो कर रखें. ऐसा करने से भोजन आसानी से पच जाएगा और गरमी का असर कम रहेगा.

गरमी के मौसम में हरे चारे का अपना अलग ही महत्त्व है. मार्चअप्रैल माह में मक्का, लोबिया, चरी, बाजरा बो देना चाहिए ताकि मईजून माह में इन का चारा पशुओं को मिल सके. गरमी के दिनों में पसीने के द्वारा पशुओं के शरीर से कुछ पोषक तत्त्व विशेषकर नमक बाहर निकलता रहता है. इस की पूर्ति के लिए खनिज मिश्रण 50 ग्राम प्रतिदिन प्रति पशु देना चाहिए.

छोटे कटड़ेकटडि़यों का खास ध्यान रखें. उन के पेट में कई तरह के कीड़े पड़ जाते हैं. उन को बाहर निकालने की दवाएं जैसे पिपराजीन, एल्बेंडाजोल पशु चिकित्सक की सलाह से नियमित रूप से दें.

गरमियों में पशुओं के शरीर पर चीचड़, जूं, कीलनी जैसे परजीवी हो जाते हैं. उन्हें न होने दें. उन से छुटकारे पाने के लिए दवाओं का इस्तेमाल पशु चिकित्सक की सलाह से ही करें. गरमी के दिनों में कई तरह के रोग भी पशुओं को लगते हैं, उन में प्रमुख निम्न हैं:

गरमी या लू लगना

किसी कारणवश पशु धूप में रह जाए या लू लग जाए तो वह गरमी का शिकार हो जाता है जिस के चलते उस के शरीर का तापमान बढ़ जाता है, पशु हांफने लगता है. वह सुस्त हो जाता है, चारा खाना छोड़ देता है और बैठ जाता है. ऐसे पशु को तुरंत छायादार व हवादार जगह पर बांधें, ठंडे पानी से नहलाएं, सिर पर गीला कपड़ा लपेटें और तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लें.

दस्त लग जाना

गरमी में पशु को दस्त काफी लगते हैं. पशु पतला गोबर करता है, भूख कम हो जाती है. दूध उत्पादन भी कम हो जाता है. इस के लिए साफसफाई का ध्यान रखें. सड़ागला चारा या दाना न खिलाएं. खाने की नांद या उस स्थान को साफ रखें. पशु को चावल का मांड़ ठंडा कर के पिलाएं और पशु चिकित्सक से संपर्क कर इलाज कराएं.

थनैला रोग यह रोग मुख्यत: गंदगी के कारण होता है जिस से अनेक तरह के कीटाणु थन के अंदर घुस कर संक्रमण करते हैं. इस की वजह से पशु के अयन व थनों पर सूजन हो जाती है. थन से मवाद, खून या फटा दूध निकलता है, पशु को दर्द महसूस होता है. एक थन से संक्रमण दूसरे  थन में भी जाने का अंदेशा रहता है.

खुरपकामुंहपका रोग

पशुओं में लगने वाले खास रोगों में खुरपका और मुंहपका हैं. यह रोग पशुओं में बहुत ही छोटे कीड़े द्वारा होता  है जिसे हम वैज्ञानिक भाषा में विषाणु या वायरस कहते हैं. यह रोग पशुओं में किसी भी मौसम में कभी भी लग सकता है.

इस रोग की चपेट में आने पर पशु दूध कम देने लगता है. मुंह के अंदर व होंठों पर छाले बन जाते हैं, धीरेधीरे ये बड़े हो कर जख्म बन जाते हैं. पशु जुगाली नहीं कर पाता, न ही भरपेट खा पाता है. पशु में कमजोरी आने लगती है.

खुरों के बीच में भी इसी तरह की समस्या हो जाती है. वहां जख्म बन जाने पर उस में कीड़े भी पड़ जाते हैं, जिस से पशु चलफिर नहीं पाता है.

अन्य पशुओं का करें बचाव :

बीमार पशु को अन्य पशुओं से अलग बांधें और उस का खानपान भी अलग करें वरना साथ में रखने पर स्वस्थ पशु को भी यह रोग हो सकता है.

इन बातों पर दें ध्यान

* बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से दूर रखें.

* बीमार पशु को इधरउधर घूमने न दें.

* बीमा पशु की सफाई का खास ध्यान रखें. उसे सूखे स्थान पर ही बांधें.

* ऐसे पशु की खरीदफरोख्त भी न करें, अन्यथा रोग फैलने का खतरा होता है.

* पशु को जहां बांध रखा है, वहां लार गिरती हो, वहां की जमीन पर कपड़े धोने का सोड़ा, चूना डालते हैं. अगर पक्की जगह है तो उसे फिनायल से समयसमय पर धो दें.

* पशु को आसानी से पचने वाला आहार दें.

* रोग होने पर तुरंत ही पशु चिकित्सक से संपर्क करें और उन की निगरानी में पशु का इलाज कराएं.

समय पर लगवाएं टीके

पशुओं को अनेक बीमारियों से बचाने के लिए समयसमय पर उन का टीकाकरण करवाएं. सरकार के पशुपालन विभाग द्वारा ये टीके मुफ्त लगाए जाते हैं.

पशुपालन में आप की थोड़ी सी लापरवाही बड़ी परेशानी का सबब बन सकती है, इसलिए सुरक्षा में ही बचाव है.

मई महीने में खेती के खास काम

इन दिनों रबी सीजन की खास फसलें भी कट चुकी होती हैं और बड़ी तादाद में खेत खाली हो जाते हैं. ऐसे समय में खेत की मिट्टी की जांच करवा लेनी चाहिए, जिस से आने वाली फसल में जांच की संस्तुति के आधार पर खाद, बीज और उर्वरक इस्तेमाल किए जा सकें.

इस के अलावा पशुओं के लिए ठंडक वाली जगह का इंतजाम करना चाहिए. गरमी से पशुओं का बचाव करना बहुत जरूरी है. पशुओं को कोई समस्या होने पर पशु डाक्टर को जरूर दिखाना चाहिए.

इस के अलावा खेती से संबंधित अनेक काम हैं, जिन के बारे में कुछ सुझाव दिए गए हैं. उन पर अमल करें और किसानों को खेती व पशुओं के साथसाथ गरमी से अपना भी बचाव करना जरूरी है.

* अनाज भंडारण वाले कमरे की साफसफाई कर मैलाथियान का छिड़काव करें. धूप में सुखाए हुए अनाज को छाया में ठंडा कर के ही भंडारण करना चाहिए.

* अनाज भंडारण के समय नमी का उचित स्तर सुनिश्चित कर लेना चाहिए. नमी का स्तर अनाज वाली फसलों में 12 फीसदी, तिलहनी फसलों में 8 फीसदी, दलहनी फसलों में 9 फीसदी और सोयाबीन आदि के दानों में 10 फीसदी से कम रहना चाहिए.

* फसल की कटाई के बाद खेत में फसल अवशेष भूल कर भी न जलाएं. इस से खेत के लाभदायक मित्र जीव नष्ट हो जाते हैं और फसल में शत्रु जीवों का प्रकोप बढ़ जाता है.

* फसल अवशेषों को पशु चारे के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है अथवा उन की कंपोस्टिंग कर के उत्तम किस्म की खाद बनाई जा सकती है. यदि ये दोनों संभव न हो सकें, तो उन्हें खेत में ही रोटावेटर की सहायता से महीन कर के मिट्टी में मिलाया जा सकता है, जो सड़ कर आगामी फसल में मृदा जीवांश कार्बन में योगदान करेंगे. कुछ किसान मशरूम उत्पादन के प्रयोग में भूसे को ले सकते हैं.

* खाली खेतों में गरमी की जुताई करें. इस से आगामी फसल में लगने वाले अनेक रोगों, कीटों और खरपतवारों की सुषुप्त अवस्थाएं सूर्य की तेज किरणों द्वारा नष्ट की जा सकती हैं. मृदाजनित रोगजनक और कीट व सूत्रकृमि की रोकथाम में यह कारगर उपाय है.

* ग्रीष्मकालीन उड़द और मूंग की आवश्यकतानुसार सिंचाई करें. इन फसलों में सफेद मक्खी और फुदका कीट नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 1 मिलीलिटर दवा का प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें. फलियों की तुड़ाई के बाद शेष फसल को खेत में पलट देने से यह हरी खाद का काम करती है.

* चारा फसलों में ज्वार, चरी व मक्का की बोआई करें. पूर्व में लगाई गई लोबिया की 60-70 दिन की अवस्था में मई माह में कटाई करें. आवश्यकतानुसार सिंचाई करें. सिंचित क्षेत्रों में अथवा खेत की मेंड़ों पर हाथी घास (संकर नेपियर घास) लगाएं.

* ग्रीष्मकालीन मक्का की बोआई के समय दीमक से ज्यादा प्रभावित खेतों में क्लोरोपायरीफास की 2.0 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से डालें.

* भिंडी और बैगन की फसल को फली छेदक कीट से बचाएं. इस के लिए नीम तेल 1500 पीपीएम 3.0 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

* भिंडी या लोबिया की फसल में पत्ती खाने वाले कीट से बचाने के लिए क्विनालफास 25 ईसी की 2.0 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

* बैगन में तना छेदक कीट से बचाव के लिए कर्ताफ हाईड्रोक्लोराइड की 1.0 ग्राम दवा का प्रति लिटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें.

* लौकी वर्ग की सब्जियों में फल मक्खी के नियंत्रण के लिए विषैले चारे का प्रयोग करना चाहिए. इस के लिए तकरीबन एक लिटर के चौड़े मुंह वाले डब्बे में एक लिटर पानी में मिथाइल यूजिनोल 1.5 मिलीलिटर व डाईक्लोरोवास 2.0 मिलीलिटर का प्रयोग करें. विषैले चारे को उचित अंतराल वाले स्थानों पर रखें और इसे 3-4 दिन के अंतराल पर बदलते रहें.

* लाल भृंग कीट की रोकथाम के लिए सुबह ओस पड़ने के समय पौधों पर राख का बुरकाव करने से कीट पौधों पर नहीं बैठते हैं. इस कीट का अधिक प्रकोप होने पर कार्बारिल 5 फीसदी के 20 किलोग्राम चूर्ण को राख में मिला कर सुबह के समय पौधों पर बुरकना चाहिए अथवा 0.2 फीसदी सेविन का छिड़काव करें.

* मिर्च में हरे फुदके के प्रबंधन के लिए नीम तेल 1500 पीपीएम की 3.0 मिलीलिटर दवा का प्रति लिटर पानी के साथ छिड़काव करें या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 5.0 मिलीलिटर दवा का प्रति 15 लिटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

* मिर्च में थ्रिप्स के प्रबंधन के लिए इमामैक्टिन बेंजोएट 5 फीसदी एसजी 6.0 ग्राम दवा का प्रति 15 लिटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें या स्पाइनोसेड 45 फीसदी एससी 5.0 मिलीलिटर दवा का प्रति 15 लिटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

* अदरक की बोआई 30×20 सैंटीमीटर पर 4 सैंटीमीटर की गहराई में करें. बोआई से पूर्व 20-25 ग्राम के टुकड़ों को कौपरऔक्सीक्लोराइड के 0.3 फीसदी घोल में 10 मिनट तक उपचारित करें.

* आम के गुम्मा रोग से ग्रसित पुष्प मंजरियों को काट कर जला दें अथवा गहरे गड्ढे में दबा दें. आम के फलों को गिरने से बचाने के लिए एल्फा नैफ्थलीन एसिटिक एसिड 4.5 एसएल के 20 मिलीलिटर को प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

* मिली बग नई कोंपलें, फूलों व फलों का रस चूस कर काफी नुकसान करती हैं. इन के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 1.0 मिलीलिटर दवा का प्रति लिटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें और नीचे गिरे या पेड़ों पर चढ़ रहे कीड़ों को इकट्ठा कर के मार दें और घास को साफ रखें.

* ब्लैक टिप रोग से फल बेढंगे व काले हो जाते हैं. इस के लिए बोरैक्स 0.6 फीसदी का छिड़काव करें. यदि तेला यानी हौपर फूल पर नजर आए, तो मैलाथियान 50 ईसी की 1.0 मिलीलिटर दवा का प्रति लिटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें.

* अप्रैल में नीबू का सिल्ला, लीप माइनर और सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 1 मिलीलिटर दवा का प्रति लिटर पानी के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए. तने और फलों का गलन रोग के लिए बोर्डो मिश्रण का उचित मात्रा में छिड़काव करें.

* अमरूद में अप्रैल माह में सिंचाई न करें. फूलों को तोड़ दें, ताकि फल मक्खी फूलों में अंडे न दे पाए. इस से फल सड़ जाते हैं.

* पपीते की नर्सरी के लिए एक क्विंटल देशी खाद मिला कर शैया तैयार करें. बीज को 1.0 ग्राम कैप्टान से उपचारित करें. जब पौधे उग आएं, तो 0.2 फीसदी कैप्टान का छिड़काव करें. इस से पौध आर्द्रगलन से बच जाएंगी.

* तरबूज में कीड़ों के लिए मैलाथियान 50 ईसी की 2.0 मिलीलिटर दवा का प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़कें. पाउडरी मिल्ड्यू रोग के लिए कार्बंडाजिम 2.0 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़कें. दवा छिड़कने से पहले फल तोड़ लें या फिर छिड़काव के 8 से 10 दिन बाद ही तोड़ें.

एमपी चरी, सूडान घास का बिना उपचारित बीज कहां से मिलेगा?

सवाल : एमपी चरी, सूडान घास का बिना उपचारित बीज कहां से मिलेगा?

-राकेश दूबे, एसएमएस द्वारा

जवाब : भारतीय चारागाह अनुसंधान संस्थान, झांसी में एमपी चरी और सूडान घास का बिना उपचारित बीज मिलता है. वहां से आप यह बीज खरीद सकते हैं.


सवाल : गन्ने की अच्छी खेती करने के लिए गन्ने में पोटाश किस समय मिलाना चाहिए? खेत तैयार करते समय या गन्ना जमाव के बाद?

-सुनील, एसएमएस द्वारा

जवाब : पोटाश को गन्ने के खेत में बोआई के समय ही देना चाहिए और जमाव के बाद यूरिया अथवा पानी में घुलने वाला उर्वरक का पत्तियों पर छिड़काव करना चाहिए.


सवाल : गन्ने की फसल में बहुत ज्यादा खरपतवार हो गया है. इस वजह से गन्ना पूरी तरह बाहर नहीं निकल रहा है और न ही पनप रहा है. कृपया खरपतवार खत्म करने के लिए कोई सटीक तरीका बताएं?

-रोहित, एसएमएस द्वारा

जवाब : गन्ने के खेत से खरपतवार खत्म करने के लिए गन्ना बोआई के बाद एट्राजीन का इस्तमाल करें.


सवाल : मैं अकसर मूंग की खेती करता हूं. उस में झुलसा बीमारी लग जाती है और पत्ते भी सूख जाते हैं. साथ ही पौधों की बढ़वार भी नहीं होती. इस समस्या के लिए मैं क्या करूं?

-अमन, एसएमएस द्वारा

जवाब : मूंग की फसल में पीला पत्ता रोग का प्रकोप अकसर पाया जाता है. अगर पत्ते पीले पड़ रहे हैं तो यह येलो मौजेक वायरस जनित रोग है. यह रस चूसने वाले कीड़े से फैलता है. अत: इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मिलीलिटर दवा 1 लिटर पानी में घोल कर फसल पर छिड़काव करें.


सवाल : गाय को दस्त लग गए हैं. पतला गोबर कर रही है लेकिन ज्यादा पतला भी नहीं है. उपाय बताएं?

-एसएमएस द्वारा

जवाब : गाय को दस्त लगे हैं तो गाय के पेट में कीट मारने की दवा पिलानी चाहिए. गाय के पेट में कीडे़ होने के कारण गाय का गोबर पतला आता है और आहार में हरा चारे के साथ सूखा चारा खिलाएं.


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रोचक जानकारी: मधुमक्खी मेहनती तो हैं, पर सोती नहीं

मधुमक्खी अपनी जिंदगी में कभी नहीं सोती हैं. ये इतनी मेहनती होती हैं कि पूछो मत… बेचारी एक बूंद शहद के लिए दूरदूर तक उड़ती हैं. आजकल तो फिर भी मधुमक्खी कम हो गई हैं, पर पहले मधुमक्खियों के छत्ते जगहजगह पेड़ों पर, दीवारों पर लटके मिल जाते थे.

आप के मन में भी उस समय कुछ सवाल आए होंगे, जब इन छत्तों को देखा होगा. चलिए, आज रोचक तथ्यों के माध्यम से मधुमक्खी से जुड़ी हर जानकारी से रूबरू कराते हैं :

* मधुमक्खियों की 20,000 से ज्यादा प्रजातियां हैं, लेकिन इन में से सिर्फ 5 प्रजातियां ही शहद बना सकती हैं.

* एक छत्ते में 20 हजार से 60 हजार मादा मधुमक्खियां, कुछ सौ नर मधुमक्खियां और 1 रानी मधुमक्खी होती है. इन का छत्ता मोम से बना होता है, जो इन के पेट की ग्रंथियों से निकलता है.

* मधुमक्खी धरती पर अकेली ऐसी कीट है, जिस के द्वारा बनाया गया भोजन मनुष्य द्वारा खाया जाता है.

* केवल मादा मधुमक्खी ही यानी वर्कर मधुमक्खियां शहद बना सकती हैं और डंक मार सकती हैं. नर मधुमक्खी तो केवल रानी के साथ सैक्स करने के लिए पैदा होती हैं.

* किसी आदमी को मारने के लिए मधुमक्खी के 100 डंक काफी हैं.

* मधुमक्खी शहद को पहले ही पचा देती है, इसलिए इसे हमारे खून तक पहुंचने में केवल 20 मिनट लगते हैं.

* मधुमक्खी 24 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से उड़ती है और एक सैकंड में 200 बार पंख हिलाती है. मतलब, हर मिनट 12,000 बार.

* कुत्तों की तरह मधुमक्खियों को भी बम ढूंढ़ना सिखाया जा सकता है. इन में 170 तरह के सूंघने वाले रिसेप्टर्स होते हैं, जबकि मच्छरों में सिर्फ 79.

* मधुमक्खी फूलों की तलाश में छत्ते से 10 किलोमीटर दूर तक चली जाती हैं. यह एक बार में 50 से 100 फूलों का रस अपने अंदर इकट्ठा कर सकती है. इन के पास एक एंटिना टाइप छड़ी होती है, जिस के जरीए ये फूलों से ‘नैक्टर’ चूस लेती है.

इन के पास 2 पेट होते हैं. कुछ नैक्टर तो एनर्जी देने के लिए इन के मेन पेट में चला जाता है और बाकी इन के दूसरे पेट में स्टोर हो जाता है. फिर आधे घंटे बाद ये इस का शहद बना कर मुंह के रास्ते बाहर निकाल देती हैं. इसे कुछ लोग उलटी भी कहते हैं.

(नोट: नैक्टर में 80 फीसदी पानी होता है, मगर शहद में केवल 18-20 फीसदी पानी होता है.)

* 1 किलोग्राम शहद बनाने के लिए मधुमक्खियों को लगभग 40 लाख फूलों का रस चूसना पड़ता है और 90,000 मील उड़ना पड़ता है. यह धरती के 3 चक्कर लगाने के बराबर है.

* पूरे साल मधुमक्खियों के छत्ते के आसपास का तापमान 33 डिगरी सैल्सियस रहता है. सर्दियों में जब तापमान गिरने लगता है, तो ये सभी आपस में बहुत नजदीक हो जाती हैं, ताकि गरमी बनाई जा सके. गरमियों में ये अपने पंखों से छत्ते को हवा देती हैं. आप कुछ दूरी पर खड़े हो कर इन के पंखों की ‘हम्म’ जैसी आवाज सुन सकते हैं.

* एक मधुमक्खी अपनी पूरी जिंदगी में चम्मच के 12वें हिस्से जितना ही शहद बना पाती है. इन की जिंदगी 45-120 दिन की होती है.

* नर मधुमक्खी सैक्स करने के बाद मर जाती है, क्योंकि सैक्स के आखिर में इन के अंडकोष फट जाते हैं.

* नर मधुमक्खी यानी ड्रोंस का कोई पिता नहीं होता, बल्कि सीधा दादा या माता होती है. क्योंकि ये अनफर्टिलाइज्ड एग्स से पैदा होते हैं. ये वो अंडे होते हैं, जो रानी मधुमक्खी बिना किसी नर की सहायता के खुद अकेले पैदा करती है, इसलिए इन का पिता नहीं होता, केवल माता होती है.

* शहद में ‘फ्रक्टोज’ की मात्रा ज्यादा होने की वजह से यह चीनी से भी 25 फीसदी ज्यादा मीठा होता है.

* शहद हजारों साल तक भी खराब नहीं होता. यह एकमात्र ऐसा फूड है, जिस के अंदर जिंदगी जीने के लिए जरूरी सभी चीजें पाई जाती हैं.

* हमें जीने के लिए 84 पोषक तत्त्वों की जरूरत होती है, जबकि शहद में 83 पोषक तत्त्व पाए जाते हैं. बस एक तत्त्व नहीं मिलता और वह है वसा. इस के बिना हम सांस ली गई औक्सीजन का भी प्रयोग नहीं कर सकते.

* यह अकेला ऐसा भोजन भी है, जिस के अंदर ‘पिनोसेम्ब्रिन’ नाम का एंटीऔक्सीडैंट पाया जाता है, जो दिमाग की गतिविधियां बढ़ाने में सहायक है.

* रानी मधुमक्खी पैदा नहीं होती, बल्कि यह बनाई जाती है. यह 3-4 दिन की होते ही सैक्स करने के लायक हो जाती है. ये नर मधुमक्खी को आकर्षित करने के लिए हवा में ‘फैरोमोन’ नाम का कैमिकल छोड़ती है, जिस से नर भागा चला आता है, फिर ये दोनों हवा में सैक्स करते हैं.

* रानी मधुमक्खी की उम्र 3 साल तक हो सकती है. यह छत्ते की अकेली ऐसी मैंबर है, जो अंडे पैदा करती है.

* यह सर्दियों में बहुत बिजी हो जाती है, क्योंकि इस समय छत्ते में मधुमक्खियों की जनसंख्या ज्यादा हो जाती है.

* ये जिंदगी में एक ही बार सैक्स करती है और अपने अंदर इतने स्पर्म इकट्ठा कर लेती है कि फिर उसी से पूरी जिंदगी अंडे देती है. यह एक दिन में 2,000 अंडे दे सकती है. मतलब, हर 45 सैकंड में एक.

* 28 ग्राम शहद से मधुमक्खी को इतनी ताकत मिल जाती है कि वह पूरी धरती का चक्कर लगा देगी.

* धरती पर मौजूद सभी जीवजंतुओं में से मधुमक्खियों की भाषा सब से कठिन है. साल 1973 में  ‘कार्ल वोन फ्रिच’ को इन की भाषा ‘द वागले डांस’ को सम  झने के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था.

* एक छत्ते में 2 रानी मधुमक्खी नहीं रह सकतीं, अगर रहेंगी भी तो केवल थोड़े समय के लिए. क्योंकि जब 2 रानी मधुमक्खी आपस में मिलती हैं, तो वे दोस्ती करने के बजाय एकदूसरे पर हमला करना पसंद करती हैं और यह तब तक जारी रहता है, जब तक एक की मौत न हो जाए.

अगर मधुमक्खियां धरती से खत्म हो जाएं तो…

रानी मधुमक्खी पैदा क्यों नहीं होती, यह बनाई क्यों जाती है?

वर्कर मधुमक्खियां मौजूदा रानी मक्खी के अंडे को फर्टिलाइज कर के मोम की 20 कोशिकाएं तैयार करती है. फिर युवा नर्स मधुमक्खियां, रानी के लार्वा से तैयार एक विशेष भोजन, जिसे ‘रौयल जैली’ कहा जाता है, की मदद से मोम के अंदर कोशिकाएं बनाती है. ये प्रकिया तब तक जारी रहती है, जब तक कोशिकाओं की लंबाई 25 मिलीमीटर तक न हो जाए. कोशिकाएं बनने की प्रकिया के 9 दिन बाद ये मोम की परत से पूरी तरह ढक दी जाती है. आगे चल कर इसी से रानी मधुमक्खी तैयार होती है.

यदि छत्ते की रानी मधुमक्खी मर जाए, तो क्या होगा?

रानी मधुमक्खी लगातार एक खास तरह का कैमिकल ‘फैरोमोंस’ निकालती रहती है. जब यह मर जाती है, तो काम करने वाली मधुमक्खियों को इस की महक मिलनी बंद हो जाती है, जिस से उन्हें पता चल जाता है कि रानी या तो मर गई या फिर छत्ता छोड़ कर चली गई. रानी मधुमक्खी के मरने से पूरे छत्ते का विनाश हो सकता है, क्योंकि यदि ये मर गई तो फिर नए अंडे कौन पैदा करेगा. इस की मौत के बाद काम करने वाली मधुमक्खियों को सिर्फ 3 दिन के अंदर कोशिका बना कर नई रानी मक्खी बनानी पड़ती है.

यदि धरती की सारी मधुमक्खी खत्म हो जाएं तो क्या होगा?

अगर ऐसा हुआ, तो मानव जीवन भी धीरेधीरे खत्म हो जाएगा, क्योंकि धरती पर मौजूद 90 फीसदी खाद्य वस्तुओं का उत्पादन करने में मधुमक्खियों का बहुत बड़ा हाथ है. बादाम, काजू, संतरा, पपीता, कपास, सेब, कौफी, खीरा, बैगन, अंगूर, कीवी, आम, भिंडी, आड़ू, नाशपाती, मिर्च, स्ट्राबेरी, किन्नू, अखरोट, तरबूज आदि का परागन मधुमक्खी द्वारा होता है, जबकि गेहूं, मक्का और चावल का परागण हवा द्वारा होता है. इन के मरने से 100 में से 70 फसल तो सीधे तौर पर नष्ट हो जाएंगी. यहां तक कि घास भी नहीं उग पाएगी.

महान वैज्ञानिक ‘अल्बर्ट आइंस्टीन’ ने भी कहा था कि अगर धरती से मधुमक्खियां खत्म हो गईं, तो मानव प्रजाति ज्यादा से ज्यादा 4 साल ही जीवित रहेगी.

आय और स्वरोजगार के लिए अपनाएं बकरीपालन

कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती, उत्तर प्रदेश ब बकरी के दूध की मांग दिनप्रतिदिन बढ़ रही है, क्योंकि इस में डेंगू रोग की प्रतिरोधक क्षमता है. बेरोजगार नौजवान और युवा लड़कियां, मजदूर, किसान और किसान महिलाएं बकरीपालन व्यवसाय को अपना कर अपनी माली हालत को सुधार सकते हैं.

पशुपालन विशेषज्ञ डा. डीके श्रीवास्तव ने जानकारी देते हुए कहा कि बकरीपालन को मुख्यत: मांस, दूध, बाल, खाल व खाद के लिए इस्तेमाल किया जाता है. जिले की जलवायु के अनुरूप बकरी की बरबरी, जमुनापारी, सिरोही व ब्लैक बंगाल उपयुक्त नस्लें हैं, जो दूध के साथ अच्छी क्वालिटी का मांस उपलब्ध कराती हैं और प्रत्येक ब्यांत में 2 बच्चे देती हैं.

बरबरी नस्ल की बकरियों में नर बच्चे ज्यादा पैदा होते हैं, जिन को मांस के लिए पाला जा सकता है. उन्होंने यह भी अवगत कराया कि बकरियों को चरना ज्यादा पसंद है, इसलिए इन्हें चराई के साथ ही साथ प्रतिदिन 250 ग्राम दाना मिश्रण भी खिलाना चाहिए. इस से बकरियों को आवश्यक पोषक तत्त्व जैसे प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज और विटामिन मिलते रहें और वे स्वस्थ रह कर कम अवधि में अधिक शरीर भार ग्रहण कर सकें.

बकरियों में किसी प्रकार की बीमारी होने पर निकट के पशु चिकित्सक से सलाह लें और उन की दी गई सलाह से ही इलाज कराएं.

पौध रोग विशेषज्ञ डा. प्रेम शंकर ने बताया कि बकरियों की सब से घातक बीमारी पीपीआर है, जो बहुत तेजी से फैलती है. इस बीमारी के कारण बकरियों की मौत भी हो जाती है. इस के बचाव के लिए प्रत्येक बकरी को पीपीआर का टीका समय से अवश्य लगवा देना चाहिए.

बकरियों को सदैव ताजा और साफ पानी ही पिलाना चाहिए, क्योंकि यदि बकरियां तालाब, गड्ढा, पोखरा आदि का गंदा पानी पीती हैं, तो उन के पेट में लिवर फ्लूक, गोलकृमि, फीताकृमि आदि अंत:परजीवी उत्पन्न हो जाएंगे, जो विभिन्न रोगों के वाहक होते हैं, जिस से बकरियों की उत्पादन क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. बकरियों को प्रत्येक 6 माह के अंतराल पर पेट के कीड़े मारने की दवा (गाभिन बकरी को छोड़ कर) अवश्य देनी चाहिए.

शस्य वैज्ञानिक डा. आरवी सिंह ने जानकारी दी कि बकरियों को हरा चारा ज्यादा पसंद है, इसलिए मौसम के अनुसार बरसीम, जई, लोबिया, मक्का व चरी की बोआई करें और बहुवर्षीय हरा चारा जैसे हाईब्रिड नैपियर घास के साथ ही साथ पीपल, पाकड़, गूलर, बबूल, बरगद व सहजन आदि के पौधों का रोपण करें, जिस से बकरियों को सालभर पर्याप्त हरा चारा मिलता रहे.

उन्होंने बकरीशाला की निरंतर साफसफाई करने पर जोर दिया. यदि बकरीशाला में गंदगी रहेगी, तो उस में उन के शरीर पर लगने वाले कीड़े जैसे जूं, किलनी, मक्खी आदि हो जाएंगे, जो उन का खून चूसेंगे, जिस से उन की उत्पादन क्षमता प्रभावित होगी. इसलिए जरूरी है कि बकरीशाला के आसपास गंदगी न इकट्ठा होने दें और बकरीशाला की पुताई के साथ ही साथ कीटनाशक का छिड़काव निरंतर करते रहें.

‘बकरीपालन’ विषय पर प्रशिक्षण का आयोजन

बस्ती : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा वित्त पोषित कृषि तकनीकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, रावतपुर, कानपुर, बस्ती केंद्र के अध्यक्ष प्रो. एसएन सिंह के दिशानिर्देश में आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती द्वारा क्षमता योजना के अंतर्गत ‘बकरीपालन’ विषय पर पिछले दिनों प्रशिक्षण का आयोजन किया गया.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में बकरीपालक, बेरोजगार नौजवान, किसान व किसान महिलाएं सम्मिलित हुईं. इस अवसर पर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के साथसाथ जेपी शुक्ला, निखिल सिंह, प्रहलाद सिंह, बनारसी व सीताराम आदि कार्मिक भी उपस्थित रहे.

पशुओं में खनिज लवण की महत्ता

पशुओं के लिए खनिज लवणों का उन के प्रजनन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है. शरीर में इन की कमी से तमाम तरह के रोग व समस्याएं पैदा हो जाती हैं. खनिज लवणों की कमी से पशुओं का प्रजनन तंत्र भी प्रभावित होता है, जिस से पशुओं में प्रजनन संबंधित विकार पैदा हो जाते हैं. जैसे, पशुओं का बारबार मद में आना, अधिक आयु हो जाने के बाद भी मद में न आना, ब्याने के बाद भी मद में न आना या देर से मद में आना या मद में आने के बाद मद का न रुकना वगैरह. इन विकारों के लिए उत्तरदायी कारणों में एक कारण खनिज लवणों की कमी भी है.

खनिज लवण हैं क्या?

किसी भी वस्तु के जलने पर जो राख बचती है, उसे भस्म या खनिज कहते हैं. यह बहुत ही थोड़ी मात्रा में प्रत्येक प्रकार के चारेदाने और शरीर के अकसर सभी अंगों में पाए जाते हैं.

प्राकृतिक रूप से तकरीबन 40 प्रकार के खनिज जीवजंतुओं के शरीर में पाए जाते हैं, लेकिन इस में से कुछ बहुत ही उपयोगी हैं, जिन की आवश्यकता पशु के आहार में होती है. शरीर की आवश्यकता के अनुसार खनिजों को 2 भागों में बांटते हैं. एक, जो खनिज लवण पशुओं के लिए अधिक मात्रा में आवश्यक है, जिन की मात्रा को हम ग्राम या प्रतिशत में जाहिर करते हैं, इन को प्रमुख खनिज कहते हैं. जैसे कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, सल्फर, मैगनीशियम और क्लोरीन.

दूसरे खनिज लवण वे होते हैं, जो पशु शरीर के लिए बहुत सूक्ष्म मात्रा में आवश्यक होते हैं, जिस को हम पीपीएम में जाहिर करते हैं, ऐसे खनिजों को सूक्ष्म या विरल खनिज कहते हैं, जैसे लोहा, जिंक, कोबाल्ट, कौपर, आयोडीन, मैगनीज, मौलीब्डेनम, सेलेनियम, निकल, सिलिकौन, टिन, वेनडियम.

यद्यपि दूसरे सूक्ष्म खनिज जैसे एल्यूमीनियम, आर्सेनिक, बेरियम, बोरोन, ग्रोमीन, कैडमियम भी शरीर में पाए जाते हैं, लेकिन शरीर में इस की भूमिका के बारे में अभी तक स्पष्ट जानकारी नहीं है.

इस प्रकार कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, सल्फर, मैगनीशियम, क्लोरीन, लोहा, तांबा, कोबाल्ट, मैगनीज, जिंक, आयोडीन आदि पशुओं के लिए आवश्यक खनिज लवण हैं, जो जीवन व स्वास्थ्य रक्षा के लिए आवश्यक हैं.

शरीर में पशुओं के लिए खनिज लवण के सामान्य काम की बात की जाए, तो कैल्शियम व फास्फोरस दांत व हड्डियों के बनने में आवश्यक हैं. दुधारू पशुओं के खून में कैल्शियम की कमी से दुग्ध ज्वर हो जाता है. सोडियम, पोटैशियम व क्लोरीन शरीर के द्रवों में परिसारक दबाव को ठीक बनाए रखते हैं और उन में अन्य गुणों का संतुलन स्थापित करते हैं.

खून में पोटैशियम, कैल्शियम और सोडियम का समुचित अनुपात हृदय की गति और अन्य चिकनी मांसपेशियों को उत्तेजित करने व उन में संकुचन की क्रिया को पूरा करने के लिए आवश्यक है.

लौह लवण लाल रक्त कणों में हीमोग्लोबिन बनाने में आवश्यक होता है, जिस के कारण खून में औक्सीजन लेने की शक्ति पैदा होती है. इस के अलावा पशुओं के लिए खनिज लवण या तो शरीर के कुछ आवश्यक भाग को बनाते हैं या एंजाइम पद्धति के आवश्यक तत्त्व बनाते हैं. इस के अतिरिक्त इन के कुछ विशेष काम भी होते हैं.

प्रजनन क्षमता को प्रभावित करने वाले पशुओं के लिए खनिज लवण की बात की जाए, तो बाजार में कई तरह के उत्पाद उपलब्ध हैं. ये मुख्यत: कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, तांबा, कोबाल्ट, मैगनीज, आयोडीन और जिंक हैं. इन तत्त्वों की कमी से पशुओं में मदहीनता अथवा बारबार मद में आना व गर्भधारण न करने की समस्याएं आती हैं.

आहार में कैल्शियम की कमी के कारण अंडाणु का निषेचन कठिन होता है और गर्भाशय पीला व शिथिल हो जाता है.

पशुओं के आहार में फास्फोरस की कमी से पशुओं में अंडोत्सर्ग कम होता है, इसलिए पशु का गर्भपात हो जाता है. अन्य सूक्ष्म खनिज लवण भी पशुओं में अंडोत्पादन, शुक्राणु उत्पादन, निषेचन, भ्रूण के विकास व बच्चा पैदा होने तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

मुरगियों में अंडा उत्पादन के लिए कैल्शियम सहित अन्य खनिज लवण बहुत आवश्यक हैं. इन के आहार में कैल्शियम की कमी से अच्छी गुणवत्ता वाले अंडे का उत्पादन प्रभावित होता है.

चारे में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, मिनरल्स और विटामिनों की क्षमता बढ़ाने और कमी पूरी करने के लिए भी खनिजों को नियमित रूप से देने पर उत्पादकता में कम से कम 25 फीसदी की बढ़ोतरी होती है, वजन तेजी से बढ़ता है, रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ती है और चारे पर भी खर्च कम आता है.

पशुपालकों को चाहिए कि इस तरह की समस्याओं को दूर रखने के लिए पशुओं को संतुलित आहार दें अर्थात पशुओं के दाने व चारे में शर्करा या कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण और विटामिनों का संतुलित मात्रा में होना बहुत जरूरी होता है. इन पोषक तत्त्वों के असंतुलित होने के कारण ही कुपोषण से जुड़े रोग पैदा होते हैं.

पशुओं के आहार में सूखे चारे के साथसाथ हरे चारे का होना आवश्यक है. केवल हरा चारा या केवल सूखा चारा नहीं देना चाहिए, कम से कम दोतिहाई सूखा चारा और एकतिहाई हरा चारा होना चाहिए.

जहां तक दाना देने की बात है, तो कोई एक प्रकार का दाना या खली नहीं देनी चाहिए, बल्कि इन का मिश्रण होना चाहिए.

यदि एक क्विंटल दाना तैयार करना है, तो 25 किलोग्राम खली, 35 किलोग्राम चोकर, 35 किलोग्राम मोटे अनाज का दलिया, 3 किलोग्राम खनिज लवण व 2 किलोग्राम नमक ले कर अच्छी तरह से मिला लेना चाहिए.

प्रौढ़ पशुओं को निर्वाह के लिए ऐसे मिश्रित दाने की एक नियमित मात्रा व अन्य कामों जैसे प्रजनन व गर्भ के लिए 1.5 किलोग्राम और दूध उत्पादन के लिए ढाई से 3 किलोग्राम दूध पर 1 किलोग्राम दाना निर्वाहक आहार के अतिरिक्त देना चाहिए.

इस प्रकार से दिए गए आहार से पशुओं में खनिज लवणों की कमी की अधिकांशत: पूर्ति हो जाती है, लेकिन फिर भी इन में से कुछ सूक्ष्म खनिज लवणों की कमी की पूर्ति नहीं हो पाती है, जिस के लिए पशुओं को अलग से खनिज लवण देने की आवश्यकता होती है, जो कि काफी लाभदायक और तेजी से नतीजा  देने वाला है, जिस को 60-70 ग्राम प्रतिदिन प्रति प्रौढ़ पशु को देना चाहिए.

बकरीपालन के फायदे

सवाल : क्या बकरीपालन फायदे का काम है? इस बारे में खासखास बातें बताएं?

-शीना मंजरी, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

जवाब : बकरी सभी तरह की जलवायु में रह सकती है. बकरीपालन पर ज्यादा खर्च नहीं आता, इसलिए यह एक बेहतर व्यवसाय है. हमारे देश में बकरीपालन कुटीर धंधे के रूप में किया जा रहा है.

व्यावसायिक तौर पर बकरीपालन करने के लिए हमें उन की उन्नत नस्लों के बारे में पता होना जरूरी है. बकरी के चारे, प्रजनन, इलाज व रखरखाव वगैरह के बारे में आप अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से पूरी जानकारी ले सकती हैं. जब से डेंगू के मरीजों को बकरी का दूध दिया जाने लगा है, तब से बकरी पालने का फायदा बढ़ गया है.


सवाल : मेरे बगीचे में संतरे के 20 पेड़ हैं, जो 6-7 साल के हो चुके हैं. इन में पहली बार तकरीबन सौ फल लगे हैं, जो नीबू से भी ज्यादा खट्टे हैं. ऐसा क्यों हुआ? क्या ये खट्टे से मीठे हो सकते हैं?

-अभिषेक राज, विदिशा, मध्य प्रदेश

जवाब : आप ने यह नहीं बताया कि किस मौसम में फल आए थे. आमतौर पर सर्दी के मौसम के फलों में खटास कुछ ज्यादा ही होती है, पर गरमी वाले फल मीठे होते हैं. वैसे, यह प्रजाति भी ऐसी हो सकती है, जो खट्टी हो.


सवाल : मैं अपने बाग में अंगूर लगाना चाहती हूं. कृपया जानकारी दें?

-मोनिका, मेरठ, उत्तर प्रदेश

जवाब : आप ने यह नहीं बताया कि आप का किस फल का बाग है, जिस में आप अंगूर लगाना चाहती हैं. आम, लीची, अमरूद व जामुन वगैरह के बाग में अंगूर नहीं लगाया जा सकता.


सवाल : मैं भिंडी की खेती करना चाहता हूं. इस बारे में जानकारी दें?

-दिनेश कुमार, मुरादनगर, उत्तर प्रदेश

जवाब : पूसा ए 4, परभनी क्रांति, पूसा मखमली, पूसा सावनी, अर्का अनामिका व हिसार उन्नत वगैरह भिंडी की उन्नतशील किस्में हैं. भिंडी की बोआई का समय फरवरीमार्च होता है.

बोआई के लिए खरीफ मौसम में 8-10 किलोग्राम व जायद मौसम में 18-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. जायद में 80-100 क्विंटल व खरीफ में 150-180 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज हासिल होती है. ज्यादा जानकारी हेतु अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें.


खेतीकिसानी से जुड़े सवाल आप हमें अपने नाम, पते और मोबाइल नंबर के साथ ईमेल farmnfood@delhipress.in  पर भेज सकते हैं.   

पशुपालन के लिए कुछ जरूरी जानकारी

हमारे देश में पशुपालन बड़े पैमाने पर किया जाता है और आज का समय ऐसा नहीं रह गया कि खेतीकिसानी करने वाले लोग ही पशुपालन करते हों. आज पशुपालन आमदनी का अच्छा जरीया है, जिसे अन्य लोग भी कर रहे हैं.

आज के समय पशुपालन के लिए सरकार द्वारा भी अनेक योजनाएं चलाई जा हैं जो लोगों के लिए मददगार साबित हो रही हैं. जरूरत है केवल उन की जानकारी पशुपालक होनी चाहिए.

इस के अलावा आज तकनीकी का दौर है, इसलिए नईनई जानकारियां मिलती रहती हैं. पशु वैज्ञानिकों तक पहुंचना भी आसान है. अनेक ह्वाट्सएप ग्रुपों पर भी पशुपालन के बारे में जानकारी मिलती रहती है, इसलिए पशुपालन को सही तरीके से किया जाए तो यह बेहतर रोजगार भी बन सकता है. केवल जरूरत है इन छोटीछोटी बातों का ध्यान रखना :

पशुधन प्रबंधन

पशु बाड़े में सफाई का खास ध्यान रखें. धुलाई के लिए उचित रसायन जैसे कि सोडियम कार्बोनेट (4 फीसदी)/ सोडियम हाइपोक्लोराइट (1 फीसदी) के घोल का प्रयोग करें. पशुओं को स्वच्छ पानी उपलब्ध होना चाहिए तथा पानी को स्वच्छ रखने के लिए नांद की समयसमय पर चूने से पुताई करें.

यदि किसी पशु में संक्रामक रोग के लक्षण दिखाई दें तो उसे अन्य पशुओं से तुरंत अलग कर दें तथा तुरंत पशु डाक्टर से सलाह लें.

पशुओं पर गरमी का तनाव कम करने के लिए शैड में पंखे/फोगर आदि की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि पशु स्वस्थ रहें और उत्पादन भी बना रहे.

पशुपोषण प्रबंधन

पशुपालक घर में उपलब्ध आहार अवयवों को मिला कर संतुलित रातिब मिश्रण बना सकते हैं. इस रातिब मिश्रण में अनाज की मात्रा बढ़ा कर 40 फीसदी तक कर दें तथा इस में 2 फीसदी खनिज मिश्रण और 1 फीसदी नमक जरूर मिलाएं.

अगर रातिब में खनिज मिश्रण नहीं मिलाया है तो हर एक पशु को कम से कम 50 ग्राम उत्तम गुणवत्ता का खनिज मिश्रण अथवा पशु चाटन/यूरियाखनिज ईंट (यूएमएमबी) अवश्य दें. नया भूसा रातभर भिगोने के बाद ही पशुओं को खिलाएं.

पशु के ब्याने से 2 महीने पहले उस का दूध सुखा दें व पशु को पौष्टिक हरा चारा व दाना मिश्रण दें. इस अवस्था में जितनी अच्छी देखरेख होगी, उतना ही ब्याने के बाद अच्छा दूध उत्पादन होगा.

प्रजनन प्रबंधन

ग्रीष्मकाल में मद के लक्षणों को पहचानने के लिए सुबह और शाम पशु पर निगरानी रखें. पशु यदि सुबह गरमी में आया है तो उसी दिन शाम को और यदि शाम में आया है तो अगले दिन सुबह कृत्रिम गर्भाधान करवा लें.

जिस पशु में कृत्रिम गर्भाधान होना है उसे बाकी पशुओं से पहले ही अलग बांध लें, ताकि तकनीशियन/पेरावेट कम अवधि में अपना काम पूरा कर सके. तकनीशियन द्वारा पशु को छूने से पहले व उस के बाद साबुन से हाथों की सफाई पर ध्यान दें.

मदहीनता के निवारण हेतु पशु के आहार में खनिज मिश्रण व कौपर, कोबाल्ट और आयरन की ये गोलियां रोज मिलाएं व पेट के कीड़ों की दवा दें.

गाभिन पशुओं में 7वें व 8वें महीने से फूला दिखने की शिकायत से बचने हेतु गर्भावस्था के अंतिम तिमाही में अत्यधिक वसा वाला आहार न दें व कैल्शियम, फास्फोरस और सेलेनियम की पूर्ति खनिज मिश्रणों द्वारा करें.

पशु के योनिद्वार को साफ रखें व जब तक डाक्टर सलाह न दे, बाहर निकले हुए अंगों पर ठंडे पानी का छिड़काव करें. बैठने का स्थान ऐसा चयन करें कि पशु का पिछला हिस्सा उठा हुआ हो.

ब्यांत के 12-24 घंटे के बाद जेर न गिरने की अवस्था में पशु को रिपलेंटा (50 ग्राम, दिन में 2 बार) इन्वोलोन या यूटेरोटोन जैसे सीरप (पहले दिन 200 मिलीलिटर व फिर 100 मिलीलिटर 3 से 5 दिन तक) दें. अगर इन दवाओं से जेर न गिरे तो पशु डाक्टर से सलाह लें.

घर के पिछवाड़े मुरगीपालन: एक्स्ट्रा आमदनी का जरिया

पारंपरिक मुरगीपालन यानी बैकयार्ड मुरगीपालन या फिर घर के पिछवाड़े मुरगीपालन की यह पद्धति भारत में प्राचीन काल से ही प्रचलित है. इस में आमतौर पर 5-10 मुरगियों को एक परिवार द्वारा पाला जाता है, जो घर और उस के आसपास में अनाज के गिरे दाने, झाड़फूस के कीड़ेमकोड़े, घास की कोमल पत्तियां, घर की जूठन आदि खा कर पेट भरती हैं. मुरगियों को पालने में किसी खास घर की जरूरत नहीं होती है और न्यूनतम खर्च पर मुरगियां पाली जा सकती हैं.

यह जानकारी कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के केंद्राध्यक्ष प्रो. एसएन सिंह ने मुरगीपालन प्रशिक्षण में प्रशिक्षणार्थियों को दी. उन्होंने कहा कि सालभर में प्रति व्यक्ति 180 अंडा और 11 किलोग्राम मांस के सापेक्ष महज 70 अंडा व 3.8 किलोग्राम मांस ही उपलब्ध हो पा रहा है.

बैकयार्ड मुरगीपालन से ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को न केवल न्यूनतम खर्च पर मांस और अंडे के रूप में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन उपलब्ध हो जाता है, बल्कि कुछ मात्रा में मांस व अंडा बेच कर कुछ ऐक्स्ट्रा आमदनी भी हासिल की जा सकती है.

पशुपालन विशेषज्ञ डा. डीके श्रीवास्तव ने बताया कि घर के पिछवाड़े मुरगीपालन के लिए किसी ऐक्स्ट्रा जमीन और श्रम की जरूरत नहीं होती है. इस में एकदिवसीय चूजों की खरीद के लिए बहुत ही कम पैसों की जरूरत होती है

मुरगियां अवशिष्ट पदार्थों व कीड़ेमकोड़ों को उच्च प्रोटीन वाले अंडे व मांस में बदल कर न केवल खाद्य सुरक्षा, बल्कि स्वच्छ प्रर्यावरण, खाद के द्वारा भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ाने और ग्रामीण इलाकों में माली रूप से पिछड़े किसानों, बेरोजगार नौजवानों को स्वरोजगार दे कर स्वावलंबी बनाती हैं.
उन्होंने कहा कि घर के पिछवाड़े मुरगीपालन के लिए कड़कनाथ, वनराजा, ग्राम प्रिया, गिरि राजा, कैरी निर्भीक, कैरी श्यामा, हितकारी, उपकारी व कैरी प्रिया आदि नस्लें उपयुक्त हैं, जिन से सालभर में 180-200 अंडे और 8-10 हफ्ते में 1.00-1.25 किलोग्राम तक शारीरिक वजन प्राप्त कर लेती हैं.

पौध रोग वैज्ञानिक डा. प्रेम शंकर ने बताया  कि देशी मुरगियों में रोग बहुत ही कम लगते हैं, फिर भी बचाव के लिए मरेक्स, लसोटा, गंवोरो आदि का टीका अवश्य लगवाना चाहिए. कुछ रोग मुरगियों में बहुत तेजी से पनपते हैं और कम समय में ही मुरगियां मर जाती हैं, इसलिए इलाज से बचाव बेहतर है.
उन्होंने कहा कि मुरगियों को हमेशा ताजा व साफ पानी पिलाना चाहिए और उसे फिटकरी व एक्वाफ्रेस (5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में घोल कर) से उपचारित कर के ही पिलाएं.

वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. आरवी सिंह ने बायोसिक्योरिटी पर चर्चा करते हुए कहा कि मुरगीशाला में किसी भी व्यक्ति को सीधे अंदर न जाने दें. अंदर जाने वाले व्यक्ति को फार्मलीन से सेनेटाइज कराने के बाद ही जूता, चप्पल, कपड़ों को बदल कर मुरगीशाला में जाने से बाहर के रोग अंदर नहीं जा पाएंगे और मुरगियां सुरक्षित रह कर अधिक उत्पादन दे सकेंगी.

पशुओं की लंपी स्किन डिजीज : कारण और निवारण

आजकल फैली लंपी स्किन डिजीज के कारण पशुओं और पशुपालकों को बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. इस रोग के कारण पशुओं की उत्पादकता कम हो जाने के साथसाथ पशु हानि का भी सामना करना पड़ रहा है. हाल ही में राजस्थान में लंपी स्किन डिजीज के कारण हजारों गाएं बेमौत मर गई हैं. गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में भी उक्त रोग (एलएसडी) की घटनाओं की खबरें हैं.

भारत में लंपी स्किन डिजीज का पहला मामला अगस्त, 2019 में ओडिशा के 5 जिलों में दर्ज किया गया था, जहां कुलमिला कर 2,539 पशुओं में से 182 पशु इस रोग से ग्रसित पाए गए और बीमारी की दर 7.16 फीसदी आंकी गई, मगर इन में से कोई भी पशु हताहत नहीं हुआ. तब से यह रोग केरल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों सहित पूरे देश में फैल चुका है.

रोग की वजह, लक्षण, रोगजनन और निदान

लंपी स्किन डिजीज यानी एलएसडी गोवंशी पशुओं और भैंसों का एक अत्यधिक संक्रामक रोग है, जो कैप्रीपौक्स वायरस के चलते होता है. इस के कारण संक्रमित पशुओं की त्वचा पर गांठें बन जाती हैं. यह वायरस पौक्सविरिडे परिवार का सदस्य है, जो मुख्यत: पशुओं और पक्षियों में संक्रमण की वजह बनता है.

इस रोग में त्वचा के ऊपर गोलगोल गांठें बन जाती हैं, जो आकार में 0.5 सैंटीमीटर से 5 सैंटीमीटर व्यास की हो सकती हैं. इस रोग के कारण लसिका ग्रंथियों में भी सूजन आ जाती है, नाक से स्राव बहता रहता है, पशु को बुखार हो जाता है और पशु के पूरे शरीर में अकड़न हो जाती है. संक्रमित पशुओं के अंगों में सूजन आ जाती है और लंगड़ापन भी हो सकता है. इस के अतिरिक्त यह रोग शारीरिक कमजोरी, कम दूध देना, बांझपन, गर्भपात और कभीकभी मौत की वजह बनता है. दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन घट जाता है और पशुपालक को माली नुकसान पहुंचता है.

वैसे तो इस रोग में मृत्युदर आमतौर पर कम है, मगर पहले से ही कमजोर पशुओं में रोग की अधिकता अथवा द्वितीयक संक्रमण के कारण पशु की मौत तक हो सकती है. यह रोग एक वायरस द्वारा फैलता है, मगर इस के फैलने का प्रमुख माध्यम काटने वाले कीड़े जैसे मच्छर, मक्खी और चिंचडि़यां या किलनियां ही हैं. इन कीटों के काटने से यह वायरस संक्रमित पशु से स्वस्थ पशु तक पहुंच जाता है और स्वस्थ पशु भी संक्रमित हो जाता है. इस के अलावा यह संक्रमित पशुओं के स्वस्थ पशुओं से संपर्क में होने के कारण व दूषित चारे से भी फैल सकता है.

लंपी स्किन डिजीज पैदा करने वाला वायरस कीटों के काटने से मेजबान पशु की त्वचा से होता हुआ शरीर में प्रवेश करता है. यह वायरस गैस्ट्रो आंत्र पथ के माध्यम से भी पशु शरीर में प्रवेश कर सकता है. इस के बाद यह वायरस लसिका ग्रंथियों (लिम्फ नोड्स) में पहुंच जाता है, जिस से लसिका ग्रंथि शोथ (लिम्फैडेनाइटिस) हो जाता है. वायरस त्वचा पर सूजन वाले नोड्यूल के विकास के साथ विशिष्ट कोशिका और रक्त वाहिकाओं की दीवारों में तेजी से गुणन करने के कारण त्वचा के घावों का कारण बनता है. एक बार संक्रमित होने के बाद यह वायरस पशु शरीर में 2 से 5 सप्ताह तक रह सकता है. इस रोग में पशुओं को तेज बुखार होता है, जो 105 से 107 डिगरी फारेनहाइट तक पहुंच जाता है.

पशु की नाक से लगातार स्राव गिरता रहता है और दूध उत्पादन में गिरावट आती है. पशुओं की त्वचा की गांठें मुख्यत: सिर, गरदन और थन पर विकसित होती हैं. मुंह और नाक की श्लेष्मा झिल्ली पर भी नोड्यूल विकसित होते हैं. छोटी गांठें इलाज के दौरान ठीक हो जाती हैं, जबकि बड़ी गांठों की कोशिकाएं निर्जीव हो जाती हैं और कुछ समय बाद वे सख्त होने लगती हैं. कभीकभी गांठों में मवाद भी बन जाता है और वे फूट जाती हैं, जिस के कारण इन गांठों पर मक्खियां बैठने लगती हैं और उन में कीड़े पड़ जाते हैं. साथ ही, दूसरे जीवाणु संक्रमण भी हो जाते हैं, जो स्थिति को और भी गंभीर बना देते हैं.

संक्रमित पशु को पुन: ठीक होने में कई महीने भी लग सकते हैं. प्रभावित पशु अकसर कमजोर हो जाते हैं और पेट से होने वाली गायों में गर्भपात भी हो सकता है. माथे, पलकों, कान, थूथन, नासिका, थन, शरीर के सभी अंगों पर उभरी त्वचा की गांठों को देख कर भी समझा जा सकता है कि पशु लंपी स्किन डिजीज वायरस से ग्रसित है. फिर भी रोग की और अधिक पुष्टि के लिए त्वचा से लिए गए नमूनों की बायोप्सी कर के भी इस रोग का पता लगाया जा सकता है.

प्रयोगशाला में वायरस न्यूट्रिलाइजेशन टैस्ट, इनडायरैक्ट फ्लोरेसैंस टैस्ट, अगार जेल इम्यूनोडिफ्यूजन टैस्ट, एलिसा और वैस्टर्न ब्लौट टैस्ट सहित विभिन्न परीक्षणों का उपयोग कर के इस वायरस का निदान किया जाता है. इस रोग से ग्रसित पशुओं की मृत्यु होने पर शव विच्छेदन करने पर ऊपर वर्णित एपिडर्मल और म्यूकोसल घाव स्पष्ट दिखाई देते हैं. श्वास की नली और जठरांत्र संबंधी मार्ग की अंदरूनी सतह में अल्सर पाया जा सकता है. हलके भूरे रंग के पिंडों से युक्त फेफड़े के घाव भी देखे जा सकते हैं. रोग का निवारण, उपचार और नियंत्रण लंपी स्किन डिजीज से बचने के लिए पशुओं का टीकाकरण बहुत ही आवश्यक है. संक्रमण की स्थिति में पशुओं के शरीर पर बनी गांठों में घाव होने पर द्वितीयक जीवाणु संक्रमण को रोकने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं से उपचार किया जाता है.

साथ ही, घावों पर मक्खियों को न बैठने देने के लिए कोई भी मक्खीरोधी दवा लगाई जाती है और घावों की ड्रैसिंग की जाती है. पशु को बुखार होने पर एंटीपाईरेटिक दवाएं दी जाती हैं. इस के अलावा शरीर की सूजन उतारने और दर्द कम करने के लिए सूजनरोधी और दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं. पशुओं की भूख बढ़ाने के लिए पाचक चूर्ण, प्रीबायोटिक और मल्टीविटामिन दवाएं दी जाती हैं. इस रोग से ग्रसित पशुओं को तरल चारा, हरा नरम सुपाच्य मौसमी चारा और अच्छी क्वालिटी का अधिक प्रोटीनयुक्त दाना रातिब, गुड़ आदि खिलाने की सिफारिश की जाती है. पशु की त्वचा पर बनी गांठों में घाव होने पर उसे किसी भी एंटीसैप्टिक दवा से साफ कर के कोई भी हर्बल स्प्रे या हर्बल मलहम या एंटीसैप्टिक एलोपैथिक मलहम लगा कर ड्रैसिंग करनी चाहिए.

इस के साथ ही पशु को लेवामिसोल, जो कि एक इम्यूनोमौड्यूलेटरी दवा है, का इंजेक्शन लगाया जा सकता है. साथ ही, एंटीहिस्टामाइन की 10 मिलीलिटर दवा प्रतिदिन 3 दिन तक दी जा सकती है. घावों में द्वितीयक जीवाणु संक्रमण की रोकथाम के लिए एंटीबायोटिक्स जैसे एमोक्सिलिन 10-12 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर भार की दर से बीमार पशु को दी जा सकती है. पशुपालक इन औषधियों का उपयोग योग्य पशु चिकित्सक की सलाह पर ही करें, जो कि पशु की वास्तविक स्थिति के अनुसार दवाएं बता सकते हैं. जहां तक मुमकिन हो, संक्रमित जानवर का उपचार खिलाने वाली दवा और त्वचीय मलहम इत्यादि के माध्यम से किया जाना चाहिए, ताकि उपचार प्रक्रियाओं के माध्यम से बीमारी के प्रसार और उपचार के दौरान उपचार के सामान और कर्मियों के संदूषण से बचा जा सके. इस रोग के स्वदेशी उपचार (आयुर्वेदिक उपचार) के अंतर्गत वे सब जड़ीबूटियां दी जा सकती हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती हैं. पान के पत्ते-10 नग, काली मिर्च-10 ग्राम, नमक-10 ग्राम ले कर उन्हें पीस लें और थोड़े से गुड़ के साथ मिलाएं. पहले दिन हर 3 घंटे में एक खुराक खिलाएं. दूसरे दिन से आगामी 2 सप्ताह तक प्रतिदिन 3 खुराकें खिलाएं. इस नुसखे से अप्रत्याशित लाभ बतलाया गया है.

इसी तरह एक अन्य स्वदेशी पद्यति में : लहसुन-2 पोथी, काली मिर्च-10 ग्राम, धनिया-10 ग्राम, जीरा-10 ग्राम, हलदी का पाउडर-10 ग्राम, चिरायता पाउडर-30 ग्राम, ताजा तुलसी पत्ता-1 मुट्ठी, तेज पत्ता-10 ग्राम, पान के पत्ते-5 नग, बेल पत्ता-1 मुट्ठी, गुड़-100 ग्राम को एक जगह घोंट कर 2 सप्ताह तक रोज 3 खुराकें खिलाने को कहा गया है.

इस से भी पशु की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होने और पशु के शीघ्र स्वस्थ होने की संभावना है. पशु के शरीर पर बनी गांठों में हुए घावों की ड्रैसिंग करने के लिए : हलदी पाउडर-20 ग्राम, हरित मंजरी के पत्ते-1 मुट्ठी, मेहंदी के पत्ते-1 मुट्ठी, तुलसी के पत्ते-1 मुट्ठी, नीम के पत्ते-1 मुट्ठी, लहसुन-10 पोथी को नारियल या तिल का तेल-500 मिलीलिटर में मिला कर पेस्ट बना कर पशु के शरीर पर बनी गांठों में हुए घावों पर लगाया जा सकता है.

इस रोग की रोकथाम के लिए सभी स्वस्थ पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराएं. उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में प्रवेश करने से पहले आयातित पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराएं. प्रभावित क्षेत्र से आनेजाने वाले लोगों की आवाजाही प्रतिबंधित रखें. पशुपालकों और प्रभावित पशुओं की देखभाल करने वालों को स्वस्थ पशुओं से दूर रहने की सलाह दें. संक्रमित जानवर से निबटने वाले व्यक्ति दस्ताने और चेहरे पर मास्क पहनें और हर समय स्वच्छ और कीटाणुशोधन उपाय करें.

इन सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. संक्रमित गांवों की पहचान करें, ताकि एक विशिष्ट क्षेत्र में एहतियाती योजना बनाई जा सके और प्रभावित गांव के आसपास 5 किलोमीटर तक के गांवों में रिंग टीकाकरण किया जा सके. पशुओं की किसी भी असामान्य बीमारी की सूचना नजदीकी पशु चिकित्सालय को जरूर दें. पशुशाला का नियमित अंतराल पर कीटाणुशोधन करें और स्वस्थ पशुओं को भी बाह्य परजीवीनाशक लगा कर बाह्य परजीवी मुक्त करते रहें. मच्छर, मक्खियों, चिंचड़ी, पिस्सू आदि वैक्टर को नियंत्रित करने के लिए पशुशाला, सामान्य चराई क्षेत्र, जानवरों के इकट्ठा होने वाले स्थानों और जानवरों की आवाजाही के रास्तों पर कीटनाशकों का छिड़काव करें.

इस रोग से संक्रमित पशु की मृत्यु होने पर मृतक पशु के शव को गहरे गड्ढे में चूने एवं नमक के साथ दबा देना चाहिए. ऐसे पशुओं के मृत शरीर को खुले में नहीं फेंकना चाहिए. मृत पशु को दफनाने का स्थान आवासीय क्षेत्र, पशु आवास एवं जल स्रोतों से दूर होना चाहिए. मृत पशु के परिवहन के लिए प्रयोग किए गए वाहन व जिस पशु आवास में वह पशु रखा गया था, को सोडियम हाईपोक्लोराइड के 2-3 फीसदी के घोल से विसंक्रमित करना चाहिए.

मृत पशु के चारे, दाने को विसंक्रमित कर जला कर नष्ट कर देना चाहिए. वैसे तो मनुष्यों में इस रोग के फैलने का जोखिम लगभग न के बराबर है, फिर भी संक्रमण के खतरे से बचने के लिए दूध को पीने से पहले भलीभांति उबाल लेना चाहिए. संक्रमित पशु के कच्चे दूध के सेवन से बचना चाहिए और लाने व ले जाने से बचा जाना चाहिए. लंपी स्किन डिजीज ने देश के कई हिस्सों में महामारी का रूप ले लिया है. टीकाकरण ही इस रोग से बचाव का एकमात्र प्रभावी उपाय है. विषाणुजनित रोग होने के कारण रोग लाक्षणिक उपचार ही संभव है. अच्छे खानपान प्रबंधन और साफसफाई के द्वारा भी जल्द ही इस रोग पर काबू पाया जा सकता है.