Apple Farming : मैदानी इलाकों में सेब की बागबानी

Apple Farming : सेब की बागबानी आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में ही की जाती है. इस वजह से सेब को पहाड़ी फल माना जाता है. भारत में सेब की बागबानी आमतौर पर हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर और उत्तराखंड में की जाती है. पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में भी अब सेब की बागबानी की जा रही है.

पहाड़ी इलाकों में ऊंचाई के मुताबिक सेब की अलगअलग प्रजातियां उगाई जाती हैं. इन प्रजातियों में फूल केवल उन्हीं दशाओं में होता है, जब उन को मौसम के मुताबिक 800 से 1500 घंटे की ठंडी इकाइयां यानी चिलिंग यूनिट्स मिल जाती हैं. ठंडी इकाइयों की गिनती तापमान के 7 डिगरी सैल्सियस से नीचे आने पर शुरू होती है. ठंड की उक्त परिस्थितियां केवल शीतोष्ण जलवायु में ही मुनासिब होती हैं इसलिए सेब की बागबानी को शीतोष्ण जलवायु के इलाके में किया जाता रहा है.

मैदानी इलाकों में सेब की बागबानी के लिए विदेशी शोध संस्थानों ने कुछ प्रजातियां ईजाद की थीं, पर उन का भारत की उपोष्ण जलवायु में जांच न होने के चलते इस के बारे में अभी तक जागरूकता नहीं थी.

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ (उत्तर प्रदेश) के पुराने परिसर पर डाक्टर अरविंद कुमार के मुताबिक, शोध अनुसंधान पर फलों पर आधारित कृषि प्रणाली विकसित करने के लिए अध्ययन किया गया. इस के तहत सेब की कम ठंडी वाली प्रजातियों जिन की फूल के लिए ठंडी इकाइयों की जरूरत केवल 250 से 300 घंटों की होती है, का परीक्षण उपोष्ण जलवायु में किया गया.

अध्ययन से हासिल नतीजों से यह भरम टूट गया कि सेब की बागबानी पहाड़ी इलाकों में ही की जा सकती है.

संस्थान में हुए अध्ययन के मुताबिक, अगर सही प्रजाति को चुन कर सेब की बागबानी उपोष्ण जलवायु इलाकों में की जाए तो कामयाबी मिल सकती है. यह अध्ययन उपोष्ण इलाकों में कृषि एवं बागबानी में विविधीकरण के एक नए विकल्प के तौर पर उभरा है.

मिट्टी व खेत की तैयारियां

बागबानी करने वाले किसानों को यह सलाह दी जाती है कि सेब लगाने से पहले मिट्टी जांच जरूर करानी चाहिए. इस से पोषक तत्त्वों की कमी को दूर करने के लिए जरूरी संशोधन का निर्धारण करने में मदद मिलेगी और मिट्टी का पीएच मान 6.0-7.0 हो, बेहतर है.

सेब के पौधों को अच्छी नमी और पोषक तत्त्वों की धारण क्षमता के साथ गहरी और अच्छी तरह से गीली बलुई मिट्टी की जरूरत होती है. पानी जमा नहीं होना चाहिए और उचित जल निकास वाली मिट्टी सेब की खेती के लिए मुनासिब होती है.

जाड़े के मौसम में इस प्रजाति को फूल के लिए जरूर 250-300 शीतलन इकाइयों यानी चिलिंग यूनिट्स चाहिए. इन्हें सूरज की रोशनी की कम से कम 6 घंटे की जरूरत होती है. इसलिए उत्तर या पूर्व दिशा से रोशनी की उपलब्धता में कोई व्यवधान नहीं होना चाहिए. उस जगह को चुनें.

मैदानी इलाकों में सेब की मुनासिब प्रजातियां

मैदानी इलाकों में बागबानी के लिए सेब की कई प्रजातियों के नाम हैं. इन प्रजातियों का प्रचारप्रसार और क्षेत्र विस्तार नहीं हो सका. इस की 2 मुख्य वजह थीं. पहली वजह यह कि इन प्रजातियों के मैदानी इलाकों में प्रक्षेत्र मूल्यांकन के आंकड़ों की अनुपलब्धता थी. इस अनुपलब्धता की वजह यह थी कि सेब व दूसरी शीतोष्ण फलों पर शोध करने वाले ज्यादातर संस्थान पर्वतीय इलाकों में सीमित हैं. दूसरी वजह यह कि इन की रोपण सामग्री की कमी.

कम ठंड की जरूरत वाली प्रजातियां : अन्ना, डौर्सेट गोल्डन, एचआरएमएन 99, इन भोमर, माइकल, बेवर्ली हिल्स, पार्लिंस ब्यूटी, ट्रौपिकल ब्यूटी, पेटिंगिल, तम्मा वगैरह. संस्थान में अन्ना, डौर्सेट गोल्डन व एचआरएमएन 99 प्रजाति के पौधों को लगाया गया है. उन पर हुए 3 सालों के अध्ययन से मिली जानकारी को बताया जा रहा है:

अन्ना : यह प्रजाति गरम जलवायु में अच्छी तरह से विकसित होती है और बहुत जल्दी पक कर तैयार होती है. पहाड़ी इलाकों में होने वाली सेब की प्रजातियों को फूल और फल के लिए कम से कम 500 घंटे की ठंडी इकाइयों की जरूरत होती है, जबकि इस प्रजाति को महज 250-300 घंटों की ठंडी इकाइयों की जरूरत होती है.

इस प्रजाति के पौधे प्रक्षेत्र रोपण के एक साल बाद फूल आना शुरू हो जाता है. फूल फरवरी माह के पहले हफ्ते से शुरू होता है जो तकरीबन एक माह तक चलता है. जून में ये फूल पक जाते हैं. फल देखने में गोल्डन डिलीशियस जैसे लगते हैं. यह जल्दी और अधिक फल वाली किस्म है. ताजा फलों के रूप में इन का इस्तेमाल सही रहता है. जून माह में सामान्य तापमान पर तकरीबन 7 दिनों तक इन का भंडारण किया जा सकता है.

डौर्सेट गोल्डन : यह सेब की गोल्डन डिलीशियस जैसी प्रजाति है जो गरम इलाकों के लिए विकसित की गई है. यहां ठंडे मौसम में 250 से 300 घंटों की ठंडी इकाइयां मिल सकें.

यह भी इजराइल द्वारा विकसित की गई प्रजाति है. दिखने में यह फूल बनने के समय में गुणों में और मैदानी मौसम के प्रति व्यवहार में अन्ना किस्म के समान है. इस का गोल्डन पीले सुनहरे रंग का है. हालांकि कभीकभी फलों की सतह पर गुलाबी रंग भी आता है जो उस के सौंदर्य को बढ़ाता है. यह खासतौर से ताजा खाने के लिए बहुत अच्छी और मीठी प्रजाति है. यह शुरुआती मौसम की फसल है. पेड़ का विस्तार मध्यम रहता है.

डौर्सेट गोल्डन किस्म को खासतौर से अन्ना सेब की बागबानी में परागणदाता किस्म के रूप में मान्यताप्राप्त है. इस में फूल आने का समय फरवरी माह के पहले हफ्ते से शुरू हो कर मार्च माह के पहले हफ्ते तक रहता है. इस वजह से यह अन्ना सेब के लिए अच्छी परागणदाता किस्म जानी जाती है.

अन्ना किस्म की सफल बागबानी में अगर उचित दूरी पर 20 फीसदी पौधे डौर्सेट गोल्डन प्रजाति के लगाए जाएं, जिस से पूरे बाग में उन के द्वारा पैदा परागकण मुहैया हो सकें तो नतीजे अच्छे आते हैं.

एचआरएमएन 99 : इस प्रजाति को हिमाचल प्रदेश के उन्नतशील किसान हरीमान शर्मा ने विकसित किया है. इसे शीतोष्ण, उपोष्ण व गरमी के 40 से 45 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान में भलीभांति किया जा सकता है. इस प्रजाति को ठंड की जरूरत नहीं होती है.

इस प्रजाति के फलों की क्वालिटी बढि़या है. इस को अनेक जलवायु और समुद्र तल से 1,800 फुट पर में भी उगाया जा सकता है. इस प्रजाति को अन्ना व डौर्सेट गोल्डन के मुकाबले कम ठंड की जरूरत होती है.

यह प्रजाति बहुत जल्दी पक कर तैयार होती है. पहाड़ी इलाकों में होने वाली सेब की प्रजातियों को फूल व फल के लिए कम से कम 500 घंटों की इकाइयों की जरूरत होती है, जबकि इस प्रजाति को कम घंटों की ठंडी इकाइयों की जरूरत होती है.

इस प्रजाति के पौधे प्रक्षेत्र रोपण के 3 साल बाद फल देना शुरू कर देते हैं. फूल फरवरी माह के पहले हफ्ते में शुरू होता है, जो तकरीबन एक माह तक चलता है. फल जून में पक जाते हैं. फलों के पकने पर रंग का विकास हलकी पीली सतह के साथ होता है. इस प्रजाति की उपज 3 साल के बाद पौधे 1 क्विंटल फल प्रति पौधा देता है.

फलों की क्वालिटी

* जून माह में गरम मौसम में तैयार होने के चलते फलों में टीएसएस अच्छा पाया गया है. तकरीबन 15 डिगरी ब्रिक्स, जो कि फलों की क्वालिटी का एक द्योतक है. फलों का औसत वजन 200 ग्राम है. पीली सतह पर लाल आभा लिए इस फल की मांग को बढ़ाने वाली वजह है.

* जून माह में इन के ताजा फलों की उपलब्धता इस प्रजाति का सकारात्मक पहलू है क्योंकि उस वक्त बाजार में केवल शीतगृह का एक साल पुराना और कैमिकलों से उपचारित व महंगा सेब ही मिलता है.

* मैदानी इलाकों में सेब के पौधों पर फूल से परिपक्वता के दौरान किसी भी हानिकारक कीट या रोग का प्रकोप नहीं होता है. इस वजह से इन पर किसी कीटनाशक या फफूंदीनाशक का छिड़काव नहीं करना पड़ता. नतीजतन, कीटनाशकों से मुक्त फल मिलता है.

पौध रोपण का समय और तरीका : सर्दियों में पौधशाला से रोपण सामग्री लेने के बाद जल्दी रोपण कर देना चाहिए. रोपण के समय 20 से 25 सैंटीमीटर की गहराई व व्यास का एक छोटा गड्ढा भरे हुए गड्ढे के मध्य में बनाते हैं और पौधे को उस जगह पर सीधा खड़ा रख कर जड़ों को मिट्टी से ढक कर दबा दें और 2 फुट व्यास का थाला बना कर उन में हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए.

पौधा रोपते समय यह ध्यान रखें कि जड़ व सांकुर के जोड़ का स्थान जो कि एक गांठ के रूप में आसानी से दिखाई देता है, कभी भी जमीन में दबने न पाए. यह जोड़ का स्थान भूमि की सतह से कम से कम 10-15 सैंटीमीटर ऊपर रहना चाहिए. रोपने के तुरंत बाद मल्चिंग करने से पौधों की अच्छी बढ़वार होती है और खरपतवार की समस्या नहीं आती है.

पौध रोपण : रोपण के लिए चयनित जगह का बराबर करना जरूरी रहता है क्योंकि ये पौधे जलभराव की स्थिति को सह नहीं सकते हैं. मैदानी इलाकों में सेब की चयनित प्रजातियों को वर्गाकार विधि से 5×5 या 6×6 मीटर की दूरी पर लगाना चाहिए.

पौध रोपण के कम से कम एक माह पहले वांछित जगह पर गड्ढों की खुदाई 2×2×2 फुट कर के 20-25 दिनों के लिए छोड़ देना चाहिए. पौध रोपण के 10 दिन पहले इन गड्ढों में गोबर की सड़ी खाद 15-20 किलो मिला कर इन्हें भर देना चाहिए.

ध्यान रहे कि मिट्टी व खाद मिला कर भरने की सतह से कम से कम 10 सैंटीमीटर ऊपर रहे.

पौधे की बढ़वार : नए रोपित पौधों में नई पत्तियां तापमान में बढ़ोतरी के साथ फरवरी माह के पहले हफ्ते में आना शुरू हो जाता है और उन की बढ़वार तेजी से होती है. कभीकभी रोपण के तुरंत बाद नई पत्तियों के साथ पुष्प कलिकाएं भी आ जाती हैं, लेकिन इन से फल की बढ़वार नहीं हो पाती है.

फरवरी माह से यह वानस्पतिक बढ़वार सितंबर तक चलती है. अक्तूबर माह से पौधों में सुषुप्तावस्था के लक्षण आने लगते हैं और बढ़वार रुक जाती है. नवंबर से जनवरी माह तक पौधों की तकरीबन 60 फीसदी पत्तियां गिर जाती हैं.

पत्तियों के गिरने पर बागबान भाइयों को चिंता नहीं करनी चाहिए. यह इन पौधों की शीत ऋतु के समय न्यूनतम तापमान को सहने व अगले मौसम में फूल लाने के लिए एक स्वाभाविक प्रक्रिया है.

प्रक्षेत्र में पौधों की रोपित आयु एक साल होने के बाद उन की ऊंचाई तकरीबन 4 फुट और छत्रक फैलाव तकरीबन 2.5 फुट हो जाता है. इन पौधों में फरवरी में पुष्पकलिकाएं बनती हैं जिन पर फलों की बढ़वार होती है.

फरवरी में यदि पुष्पन के समय तेज आंधीतूफान या बारिश होती है, तो फलन पर बुरा असर पड़ता है. ये फल जून माह में उपयोग के लिए तैयार हो जाते हैं. पहले साल में प्रति पौधा 4-5 फल ही हासिल होते हैं. दूसरे साल में पौधे के छत्रक कैनोपी विकास के साथ इन की तादाद 50 और तीसरे साल में 300 हो जाती है.

फलों को पक्षियों से होता नुकसान

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में सेब की फसल जून माह में तैयार हो जाती है. इस दौरान दूसरी कोई फसल तैयार न होने के चलते पक्षियों के आकर्षण का केंद्र यह फल रहता है. किसी भी फल पर पक्षियों का हमला उस फल की क्वालिटी का द्योतक होता है.

इस समस्या से बचाव के लिए मई माह से बांस की संरचना प्लास्टिक की जाली द्वारा फलों से लदे पेड़ों को ढका जा सकता है.

पक्षियों को उड़ाने के लिए मजदूर रखना महंगा होता है इसलिए प्लास्टिक की जाली से पेड़ों को ढकना एक अच्छा विकल्प है. कई दूसरे फलों में भी यह प्रयोग किया जाता है. एक बार खरीदी गई यह जाली कई सालों तक इस्तेमाल में आ सकती है.

सेब में ऐसे करें रोगों पर नियंत्रण

पामा या स्कैब : शुरू में पत्तियों पर अनिश्चित परिधि वाले सूक्ष्म 3 से 6 मिलीमीटर व्यास के हलके से जैतूनी हरे धब्बे बनते हैं. बढ़ती अवस्था के साथ इन का रंग गहरा होता जाता है और अंत में ऊपरी सतह पर ये काले रंग के हो जाते हैं. उग्र संक्रमण होने पर पत्तियां कुंचित बैनी यानी सिकुड़ी हुई और बेआकार की हो जाती हैं. फलों पर भी हलके जैतूनी धब्बे बनते हैं जो बाद में गहरे भूरे, फिर काले हो जाते हैं. पुराने धब्बे में उन के किनारों पर त्वचा एक वलय के आकार में ऊपर उठ जाती है. शुरुआती अवस्था में ही भारी संक्रमण होने पर फल की पूरी सतह कार्क के समान हो जाती है और उस में गहरी दरारें पड़ जाती हैं.

रोकथाम : कवकनाशी रसायन जैसे कैप्टान 0.2 से 0.3 फीसदी, डोडीन 0.15 फीसदी या डोडीन+ ग्लोयोडीन 0.15 फीसदी +0.75 फीसदी या पोलीरान 0.15 फीसदी का कली खिलने पर या 7 से 10 दिन के अंतर पर 6 से 7 बार छिड़काव करें.

चूर्णिल आसिता :  पत्तियों पर वसंत मौसम में कवकजाल के छोटे धूसर या सफेद धब्बे दिखलाई पड़ते हैं. पत्तियों की निचली सतह पर धब्बे बनते हैं जिस से वे सिकुड़ कर मुड़ जाती हैं. पत्तियों से संक्रमण नई टहनियों पर फैलता है जिन पर पत्तियों के ही समान कवक बनते हैं. नए फलों पर संक्रमण होने से वे छोटे रह जाते हैं जबकि बाद की अवस्थाओं में संक्रमित फलों पर रुक्ष शल्क के लक्षण दिखलाई पड़ते हैं.

रोकथाम : बेनोमिल अथवा थायाबेंडेजोल के 0.1 फीसदी घोल से मृदा मज्जन अथवा कली निकलने के समय से जुलाई के पूर्वार्द्ध तक 10 से 14 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें. बेनोमिल के छिड़काव से रोग नियंत्रण के साथसाथ पेड़ की वानस्पतिक बढ़वार पर भी अच्छा असर पड़ता है. कली निकलने के पहले 1:50 सांद्रता वाले गंधक चूना मिश्रण का छिड़काव भी रोग नियंत्रण में फायदेमंद है.

फाइटोफ्थेरा स्तंभ कैंकर : यह तने का रोग है जो 4-5 साल पुराने पेड़ों पर नीचे की शाखाओं पर पाया जाता है. छाल के मर जाने के चलते रोगग्रस्त इलाकों में नया रिसाव होता है जिस से छाल भलेठमी हो जाते हैं. कैंकर अंडाकार, पर कभीकभी अनियमित आकार के भी हो सकते हैं. संक्रमण के 1 से 2 साल के भीतर ही तना गल जाने के चलते पूरा पेड़ मर जाता है. कभीकभी फल विगलन रोग भी देखा जाता है.

रोकथाम : रोग प्रतिरोधी किस्मों के मूलवृंत्तों का इस्तेमाल करें. बाग से ढालों पर मेंड़ बनाएं ताकि बारिश का पानी रोगी से स्वस्थ पेड़ों में बह कर न जा सके.

Hybrid Tomato : संकर (हाइब्रिड) टमाटर की खेती

Hybrid Tomato : अति खूबसूरत चटक लाल रंग के गोलमटोल टमाटर देख कर सब्जी प्रेमियों की आंखों की चमक बढ़ जाती है. दैनिक जीवन में टमाटर की बहुत ज्यादा अहमियत होती है. हर सब्जी और सलाद में टमाटर का बढ़चढ़ कर योगदान होता है. बाजार में मिलने वाली टोमैटो सास या टोमैटो कैचप के दीवाने भी खूब होते हैं.

घर पर बनने वाली तरहतरह की टमाटर की चटनियां भी लाजवाब होती हैं. ज्यादातर तरकारियां बगैर टमाटर के फीकी महसूस होती हैं, इसीलिए मार्केट में टमाटर की प्यूरी भी खूब बिकती है. ताजे टमाटर मौजूद न होने की हालत में टमाटर की प्यूरी से काम चल जाता है.

टमाटर के इस्तेमालों को देखते हुए इस की खेती की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. किसान लोग बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती कर के खूब मुनाफा कमा सकते हैं, तो घरेलू तौर पर भी टमाटर के पौधे लगाना फायदेमंद रहता है. आजकल संकर टमाटरों का चलन काफी बढ़ गया है, लिहाजा संकर टमाटरों की खेती कामयाबी की कुंजी बन गई है.

माकूल आबोहवा

संकर टमाटर की खेती के लिए 21 डिगरी सेंटीग्रेड औसत तापमान सही रहता है. टमाटर की खेती के लिए पाला घातक होता है, लिहाजा इस के लिए पाले रहित मौसम होना जरूरी है. थोड़े गरम व हलकी धूप वाले मौसम में टमाटरों का सही विकास होता है. ऐसे मौसम में टमाटर सही तरीके से पक कर गहरे लाल हो जाते हैं और पैदावार भी अच्छी होती है.

नर्सरी की तैयारी और बोआई

टमाटर की नर्सरी के लिए 5-6 मीटर लंबी और 2 फुट चौड़ी क्यारियां ठीक होती हैं. क्यारियों की ऊंचाई भी करीब 20-25 सेंटीमीटर होनी चाहिए. क्यारी तैयार करते वक्त उस में से कंकड़पत्थर वगैरह निकाल देने चाहिए. क्यारी में पर्याप्त मात्रा में अच्छी तरह से सड़ी गोबर की खाद व बालू मिला कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए.

क्यारी को फाइटोलान, डायथेन एम 45 की 2 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर भिगोएं. इस के बाद क्यारी की पूरी लंबाई में 10-15 सेंटीमीटर के फासले पर लाइनें बनाएं, इन्हीं लाइनों में बीजों की बोआई करें.

बीजों को जमीन में जरा सा दबा कर बालू व भूसे से ढक दें और फुहारे से हलकी सिंचाई करें. अंकुरण होने तक रोजाना 2 बार क्यारी की सिंचाई करें. अंकुरण होने के बाद क्यारी से भूसा हटा दें. पौधों में 4-6 पत्तियां निकलने पर थाईमेट का इस्तेमाल करें. इस के बाद पौधों पर मेटासिस्टाक्स/ थायोडान की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

इस के अलावा डाइथेन एम 45 की 2 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर उस से भी छिड़काव करें.

बोआई का समय

उत्तरी भारत में जूनजुलाई में सर्दी के मौसम के लिए, नवंबर में गरमी की फसल के लिए और मार्च में बरसात की फसल के लिए  टमाटर की बोआई का माकूल समय होता है. महाराष्ट्र और मध्य भारत में मईजून, अगस्तसितंबर और दिसंबरजनवरी में टमाटर की बोआई की जाती है. पूर्व और दक्षिण भारत में पूरे साल टमाटर की खेती की जा सकती है.

बोआई का अंतर व बीज दर

टमाटर की खेती के लिए 100-120 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने चाहिए. बोआई करते वक्त लाइन से लाइन की दूरी 75 सेंटीमीटर रखनी चाहिए और पौधे से पौधे की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए.

खाद की मात्रा

खेत तैयार करते वक्त 15-20 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. पौधों की रोपाई से पहले 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 100 किलोग्राम फास्फोरस और 100 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाएं. रोपाई के 20 दिनों बाद 50 किलोग्राम नाइट्रोजन का इस्तेमाल करें. इसी क्रम में पहली तोड़ाई के बाद भी 50 किलोग्राम नाइट्रोजन का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

Hybrid Tomato

टमाटर के खास कीट

तेला/माहो/चुरदे : ये कीट टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाते हैं. बचाव के लिए 1 लीटर पानी में 2 मिलीलीटर आक्सीडेमेटान मिथाइल मिला कर छिड़काव करें.

सफेद मक्खी : यह भी टमाटर की फसल के लिए घातक होती है. इस से बचाव के लिए ट्रायजोफास की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

फलछेदक व तनाछेदक : कीड़े लगे फलों व डालियों को तोड़ कर नष्ट कर दें, क्योंकि ये कीड़े बहुत तेजी से बढ़ कर अन्य फलों और पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. इस के अलावा क्विनालफास/एंडोसल्फान की 3 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें. 3 ग्राम कार्बेराइल का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करने से भी फलछेदक व तनाछेदक कीटों पर काबू पाया जा सकता है.

अश विव्हील : यह कीड़ा भी टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है. इस का हमला होने पर बचाव के लिए बोआई के 15 दिनों बाद कार्बेफुरान 3 जी की 20 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

मकड़ी : मकड़ी भी टमाटर की फसल की दुश्मन होती है. बचाव के लिए 2.7 मिलीलीटर डायकोफाल का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें या सल्फर की 3 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

जड़गांठ की कृमियां : ये भी काफी घातक होती हैं. बचाव के लिए कार्बोफुरान 3जी की 20 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें या 12.5 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फोरेट 10 जी का इस्तेमाल करें.

टमाटर की खास बीमारियां

ब्लाइट : इस रोग से टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचता है. रोकथाम के लिए मैंकोजेब की 3 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

फुजारियन मुरझान : यह भी एक घातक रोग है. रोकथाम के लिए फसलों को बदलबदल कर खेती करें.

वायरल विकार : इस से बचाव के लिए वायरस वाहक पर नियंत्रण करना चाहिए.

संकर टमाटर की खास प्रजातियां

माही 401 (एमएचटीएम 401) : इस प्रजाति का पौधा लंबा होता है. इस में रोपाई के 80-85 दिनों बाद तैयार फल मिलने लगते हैं. अंडाकार आकार के इस टमाटर का औसत वजन करीब 75-85 ग्राम तक होता है. इस प्रजाति के टमाटर ठोस व उम्दा दर्जे के होते हैं. इन्हें दूर के बाजारों में भी भेजा जा सकता है.

माही गोट्या (एस 41) : इस प्रजाति के पौधे बढ़ कर ढाई से 3 फुट तक ऊंचे हो जाते हैं. इस प्रजाति के पौधों से रोपाई के 70-75 दिनों बाद तैयार फल मिलने लगते हैं. इस के फल गहरे लाल रंग के और अंडाकार आकार के होते हैं. फलों का औसत वजन 75-80 ग्राम होता है. देश के सभी इलाकों में उगाया जाने वाला यह टमाटर बाजार के लिहाज से उम्दा होता है.

माही अरविंद (एमएचटीएम 207) : इस प्रजाति के पौधे 75 से 80 सेंटीमीटर तक ऊंचे होते हैं. इन पौधों से रोपाई के 75-80 दिनों बाद तैयार फल मिलने लगते हैं. इस प्रजाति का फल अंडाकार और कसा हुआ लाल रंग का होता है. फलों का औसत वजन 80 से 90 ग्राम तक होता है. इसे भी भारत के किसी भी इलाके में उगाया जा सकता है.

कुल मिला कर संकर टमाटर की खेती किसानों के लिए बेहद फायदेमंद साबित होती है. इन उम्दा टमाटरों को सभी जगहों पर अच्छे दामों पर बेच कर भरपूर कमाई की जा सकती है.

Sweet Potato : शकरकंद की खेती

Sweet Potato  : शकरकंद में स्टार्च की भरपूर मात्रा होती है, इसलिए इस का प्रयोग शरीर में ऊर्जा बढ़ाने के लिए किया जाता है. इसे भूख मिटाने के लिए सब से उपयोगी माना जाता है. शकरकंद की खेती वैसे तो पूरे भारत में की जाती है, लेकिन ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में इस की खेती सब से अधिक होती है. शकरकंद की खेती में भारत दुनिया में छठे स्थान पर आता है.

इस की खेती के लिए 21 से 26 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान सब से सही माना जाता है. यह शीतोष्ण व समशीतोष्ण जलवायु में उगाई जाने वाली फसल है. इसे 75 से 150 सेंटीमीटर बारिश की हर साल जरूरत पड़ती है.

भूमि का चयन : शकरकंद की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है, क्योंकि ऐसी मिट्टी में कंदों की बढ़वार अच्छी तरह से हो पाती है. शकरकंद की खेती के लिए जमीन से पानी के निकलने का अच्छा इंतजाम होना चाहिए.

इस की बोआई से पहले  खेत की 1 बार मिट्टी पलटने वाले हल या रोटावेटर से जुताई करनी चाहिए. उस के बाद 2 जुताई कल्टीवेटर से कर के खेत को छोटीछोटी समतल क्यारियों में बांट लेना चाहिए. उस के बाद मिट्टी को भुरभुरी बना कर उस में प्रति हेक्टेयर 150 से 200 क्विंटल गोबर की खाद मिला लेना फसल उत्पादन के लिए अच्छा होता है.

प्रजातियों का चयन : शकरकंद की प्रमुख प्रजातियों में पूसा लाल, पूसा सुनहरी, पूसा सफेद, सफेद सुनहरी लाल, श्री मद्र एस 10101, नरेंद्र शकरकंद 9, एच 41, केवी 4, सीओआईपी 1, राजेश शकरकंद 92, एच 42 (1) खास हैं.

शकरकंद की रोपाई : इस की रोपाई से पहले मई या जून महीने में इस की लताओं से नर्सरी तैयार की जाती है. अगस्त से सितंबर तक तैयार लताओं की कटिंग कर के मेंड़ों या समतल जगह पर रोपाई की जाती है. इस की कटिंग की रोपाई के लिए लाइन से लाइन की दूरी 60 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखी जाती है. जमीन में इस की कटिंग को 6-8 सेंटीमीटर की गहराई पर रोपा जाता है.

रोपाई के समय यह ध्यान देना चाहिए कि बेल की कटिंग 60-90 सेंटीमीटर से कम न हो. काटी गई बेल को मिट्टी में दबा दिया जाता है. 1 हेक्टेयर खेत के लिए शकरकंद की 6-7 क्विंटल बेल या 59000 टुकड़ों की जरूरत पड़ती है.

खाद की मात्रा : शकरकंद की खेती के लिए 1 हेक्टेयर खेत में 150 से 200 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद व 50-60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस और 100-120 किलोग्राम पोटाश की जरूरत पड़ती है. नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की आधी मात्रा आखिरी जुताई के समय व शेष आधी मात्रा बोआई के 30 दिनों बाद देते हैं. इस के कंदों की बढ़त के लिए जैविक खाद ज्यादा अच्छी होती है.

सिंचाई : शकरकंद की बेलों की कटिंग की रोपाई के 4-5 दिनों बाद पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद बारिश की मात्रा को देखते हुए 10-15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए. शकरकंद के खेत की तब तक निराईगुड़ाई जरूरी है, जब तक कि इस की फसल खेत को ढक न ले.

कीट व बीमारियों की रोकथाम : कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा. प्रेमशंकर के अनुसार शकरकंद की फसल में सब से ज्यादा प्रकोप पत्ती खाने वाली सूंड़ी का होता है. यह कीट बरसात में फसल को नुकसान पहुंचाता है. ये शकरकंद की पत्तियों को खा कर छलनी कर देते हैं, जिस से पत्तियां भोजन नहीं बना पाती हैं और फसल की बढ़त रुक जाती है. इस कीट की रोकथाम के लिए नीम के काढ़े का 250 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए. इस के अलावा पीविल नाम का कीट इस के कंदों में घुस कर कंदों बेकार कर देता है. इस की रोकथाम के लिए सब से अच्छा उपाय बोआई के समय कंदशोधन होता है.

शकरकंद की फसल में 2 रोगों का हमला ज्यादातर देखा गया है, जिस में पहला तनासड़न है, जोकि फ्यूजेरियम आक्सीसपोरम नामक फफूंदी के कारण होता है. इस रोग की वजह से फसल के तने में सड़न आ जाने से फसल बेकार हो जाती है. इस की रोकथाम के लिए रोग न लगने वाली फसल का चुनाव करना सही होता है. शकरकंद की फसल में दूसरा रोग कलीसड़न का है, जिस में कंदों की सतह पर धुंधले काले रंग के धब्बे बन जाते हैं, जिस की वजह से पौधे मर जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए 250 मिलीलीटर नीम के काढ़े का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए.

खुदाई व भंडारण : शकरकंद की खुदाई उस की रोपाई के समय पर निर्भर करती है. जुलाई महीने में रोपी गई फसल की खुदाई नवंबर महीने में की जा सकती है. जब पत्तियां पीली पड़ कर सूखने लगें, तो फावड़े या कुदाल से फसल की खुदाई कर के उस पर लगी मिट्टी को साफ करें. फिर किसी छायादार व हवादार जगह पर स्टोर करें.

Green Manure : ढैंचे की खेती से बढ़ाएं मिट्टी की उर्वरता

Green Manure : भारतीय किसानों द्वारा अपने खेतों में बोई गई फसलों से ज्यादा उत्पादन हासिल करने के लिए अंधाधुंध रासायनिक खादों व उर्वरकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिस की वजह से मिट्टी में जीवाश्म की मात्रा में दिनोंदिन कमी होती जा रही है और मिट्टी ऊसर होने की कगार पर पहुंचती जा रही है. ऐसी हालत से बचने व फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को ऐसे उर्वरकों का इस्तेमाल करना होगा, जिन से मिट्टी में मौजूद लाभदायक जीवाणुओं को कोई हानि न पहुंचे.

खेत में जीवाश्म की मात्रा को बढ़ाने और उर्वरा शक्ति के विकास में जैविक व हरी खादों का इस्तेमाल काफी फायदेमंद होता है. हरी खाद के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली ढैंचे की फसल न केवल खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है, बल्कि फसल उत्पादन को बढ़ा कर लागत में भी कमी लाती है. ढैंचा एक ऐसी फसल है, जिसे खेत में बोआई के 55-60 दिनों बाद हल से पलट कर मिट्टी में दबा दिया जाता है. ढैंचे की बोआई उसी खेत में की जाती है, जिस में हरी खाद का इस्तेमाल करना हो. इस के नाजुक पौधों को बोआई के 55-60 दिनों बाद जुताई कर के खेत में मिला कर पानी भर दिया जाता है. ढैंचे की फसल थोड़ी नमी पाने के बाद ही सड़ना शुरू हो जाती है.

ढैंचे की हरी खाद से मिट्टी को भरपूर मात्रा में नाइट्रोजन मिलता है, जिस से खेत में पोषक तत्त्वों का संरक्षण होता है और मिट्टी में नाइट्रोजन के स्थिरीकरण के साथ ही क्षारीय व लवणीय मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है. ढैंचे से अन्य हरी खादों के मुकाबले नाइट्रोजन की ज्यादा मात्रा मिलती है.

ढैंचे की उन्नत किस्में : ढैंचे में खनिज पदार्थों की मौजूदगी, नाइट्रोजन की अच्छी मात्रा व बोई गई फसलों पर अच्छे असर को देखते हुए इस की कुछ किस्में अनुकूल मानी गई हैं, जिन में सस्बेनीया, एजिप्टिका, यस रोसट्रेटा व एस एक्वेलेटा खास हैं.

हरी खाद के लिए अनुकूल मिट्टी : वैसे तो हरी खाद के लिए ढैंचे की बोआई किसी भी तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन जलमग्न, क्षारीय, लवणीय व सामान्य मिट्टियों में ढैंचे की फसल लगाने से अच्छी गुणवत्ता वाली हरी खाद मिलती है.

बोआई का समय व बीज की मात्रा : ढैंचे की बोआई से पहले खेत की 1 बार जुताई कर लेनी चाहिए. इस के बाद प्रति हेक्टेयर 35-50 किलोग्राम बीज का इस्तेमाल करना चाहिए. ढैंचे की बोआई अप्रैल के अंतिम हफ्ते से ले कर जून के अंतिम हफ्ते तक की जाती है. बोआई के 10 से 15 दिनों के बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. जब फसल 20 दिनों की हो जाए, तो 25 किलोग्राम यूरिया का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. इस से फसल में नाइट्रोजन की मात्रा बनने में मदद मिलती है.

फसल की पलटाई : जब ढैंचे  की फसल की लंबाई 2 से ढाई फुट की हो जाए तो इसे हल द्वारा खेत में पलट देना चाहिए. इस के बाद ढैंचे की फसल सड़नी शरू हो जाती है, जिस से मिट्टी की उर्वरा कूवत बढ़ने के साथ ही सूक्ष्म पोषक तत्त्वों व सूक्ष्म जीवाणुओं की तादाद भी बढ़ती है. इस से मिट्टी की संरचना में सुधार होता है और बोई गई फसल की जड़ों का फैलाव बेहतर होता है. हरी खाद मिट्टी की जलधारण कूवत को बढ़ा कर नमी को लंबे समय तक बनाए रखने में मददगार होती है. हरी खाद को दबाने के बाद बोई गई धान की फसल में कुछ प्रजातियों के खरपतवार न के बराबर होते हैं. इस प्रकार खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रयोग किए जाने वाले खरपतवारनाशी के कुप्रभाव से मिट्टी को बचाने में मदद मिलती है.

इस प्रकार बेहद कम लागत और मेहनत से हम अपनी मिट्टी की उर्वरा ताकत को बढ़ाने के लिए ढैंचे की फसल को हरी खाद के रूप में इस्तेमाल कर के रासायनिक उर्वरकों पर होने वाले खर्च में कमी ला सकते हैं और मिट्टी को रासायनिक उर्वरकों के प्रभाव से बचा सकते हैं.

Agricultural Machinery : जुताई व बोआई यंत्र – कम लागत, अधिक उत्पादन

Agricultural Machinery : किसान अपनी रबी की फसल ले चुके हैं. अब खरीफ फसलों की तैयारी पर काम चल रहा है. कुछ किसान तो अपने खेतों में फसल बो चुके हैं. किसान अपने बीज को बोआई यंत्र से बो सकते हैं, क्योंकि यंत्रों से बिजाई करने से बीज बरबाद नहीं होते हैं.

पावर टिलर चालित जुताई व बोआई यंत्र

यह यंत्र खेत की तैयारी के साथसाथ बोआई भी करता है इस से खाद भी साथ ही डाल सकते हैं.

इस यंत्र को 10 से 12 हार्स पावर के टिलर के साथ जोड़ कर चलाया जाता है. इस यंत्र की अनुमानित कीमत 15000 रुपए से 18000 रुपए है.

इस यंत्र से गेहूं, सोयाबीन, चना, ज्वार, मक्का की बोआई कर सकते हैं.

इस यंत्र को खरीदने के लिए आप कृषि अभियांत्रिकी संस्थान के फोन नं. 0755-2521133, 2521139, 2521142 पर संपर्क कर सकते हैं.

जांगड़ा की बिजाई मशीन

सब्जियों की बोआई हेतु महावीर जांगड़ा की यह बिजाई मशीन खासी लोकप्रिय है. खेत तैयार करने के बाद इस मशीन से बिजाई करने पर बीज उचित मात्रा में लगते हैं. साथ ही यह मशीन खुद मेंड़ बनाती है और बिजाई करती है. यह मशीन 2 मौडल में उपलब्ध है :

* 2 बेड वाली बिजाई मशीन :  यह मशीन 8 लाइन में बिजाई करती है और इसे 35 से 40 हार्स पावर के ट्रैक्टर से चलाया जाता है. इस बिजाई मशीन की कीमत लगभग 52000 रुपए है.

* 3 बेड वाली बिजाई मशीन :  यह मशीन 12 लाइनों में बिजाई करती है और इसे 50 हार्स पावर के ट्रैक्टर से चलाया जाता है. इस की कीमत लगभग 72000 रुपए है.

इस मशीन से बोई जाने वाली खास फसलें :

* फूलगोभी, पत्तागोभी, सरसों, राई, शलगम.

* गाजर, मूली, धनिया, पालक, मेथी, हरा प्याज, मूंग, जीरा, टमाटर.

* भिंडी, मटर, मक्का, चना, कपास, टिंडा, तोरी, फ्रांसबीन, घीया, तरबूज.

जो भी किसान इस मशीन को लेना चाहें वे महावीर जांगड़ा से उन के फोन नंबर 09896822103, 9813048612 पर संपर्क कर सकते हैं.

Drip Irrigation : खेती में पानी बचाने की तकनीक : ड्रिप या टपक सिंचाई

Drip Irrigation : सारी दुनिया में अपनाई जा रही ड्रिप प्रणाली से हमारे किसानों का संबंध बहुत पुराना है. पहले गरमी के दिनों में हमारे घरों के आंगन की तुलसी के पौधे के ऊपर मिट्टी के घड़े की तली में बारीक छेद कर के उस में पानी भर कर टांग दिया जाता था. वैसे ड्रिप प्रणाली का किसानी में व्यापक प्रयोग 1960 के दशक में इजरायल में किया गया, जिसे बाद में आस्ट्रेलिया और अमेरिका ने बखूबी अपनाया. ड्रिप सिंचाई के जरीए आज अमेरिका में 10 लाख हेक्टेयर रकबे में खेती होती है, जिस के बाद भारत और फिर स्पेन और इजरायल का स्थान है.

ड्रिप यानी टपक सिंचाई, सिंचाई का वह तरीका है जिस में पानी धीरेधीरे बूंदबूंद कर के फसलों की जड़ों में कम मोटाई के प्लास्टिक के पाइप से दिया जाता है. इस तरीके में पानी का इस्तेमाल कम से कम होता है. सिंचाई का यह तरीका सूखे इलाकों के लिए बेहद उपयोगी होता है, जहां इस का इस्तेमाल फल के बगीचों की सिंचाई के लिए किया जाता है. टपक सिंचाई ने लवणीय जमीन पर फलों के बगीचों को कामयाब बनाया है. इस सिंचाई विधि में खाद को घोल के रूप में दिया जाता है. टपक सिंचाई उन इलाकों के लिए बहुत ही सही है, जहां पानी की कमी होती है.

पिछले 15 सालों से भारत में ड्रिप सिंचाई से साढ़े 3 लाख हेक्टेयर जमीन में सिंचाई हो रही है, जिस में सब से अधिक महाराष्ट्र में 94000 हेक्टेयर, कर्नाटक में 66000 हेक्टेयर और तमिलनाडु में 55000 हेक्टेयर की सिंचाई की जा रही है.

ड्रिप सिंचाई पर आधारित खेती को अपनाए जाने की कई वजहें हैं. भारत की कुल जमीन के रकबे का महज 45 फीसदी भाग ही अभी तक सिंचाई सुविधा के तहत आता है, जबकि खेती में पानी का इस्तेमाल कुल पानी के इस्तेमाल का 83 फीसदी है. घरेलू उपयोग, उद्योग और ऊर्जा यानी बिजली के सेक्टर में पानी की खपत बढ़ने से जाहिर है कि खेती के लिए पानी की मौजूदगी पर आने वाले समय में दबाव और बढ़ेगा. पानी के संकट का एक मुख्य कारण जमीन के पानी के स्तर का लगातार गिरते जाना भी है.

कोलंबो स्थित इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के अनुसार साल 2025 तक विश्व की एकतिहाई आबादी पानी की कमी से जूझ रही होगी. विश्व में मौजूद इस्तेमाल लायक पानी का महज 4 फीसदी पानी भारत में है, जबकि भारत की आबादी दुनिया की आबादी का 16 फीसदी है. जाहिर है कि पानी का दबाव बढ़ता जा रहा है. ऐसे में जरूरी है कि खेती में भी पानी के इस्तेमाल को ले कर नई तकनीकों को आजमाया जाए. ड्रिप यानी टपक बूंद सिंचाई तकनीक में पानी की हर बूंद के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल समेत कई लाभ हैं.

टपक सिंचाई के लिए मुफीद फसलें: ड्रिप या टपक सिंचाई कतार वाली फसलों, पेड़ व लता फसलों के मामले में बेहद मुनासिब होती है, जहां एक या उस से ज्यादा निकास को हर पौधे तक पहुंचाया जाता है. ड्रिप सिंचाई को आमतौर पर अधिक कीमत वाली फसलों के लिए अपनाया जाता है, क्योंकि इस सिंचाई के तरीके को अपनाने में खर्च ज्यादा आता है. टपक सिंचाई का इस्तेमाल आमतौर पर फार्म, व्यावसायिक हरित गृहों और घरों के बगीचों में किया जाता है.

ड्रिप सिंचाई लंबी दूरी वाली फसलों के लिए बेहद मुफीद होती है. सेब, अंगूर, संतरा, नीबू, केला, अमरूद, शहतूत, खजूर, अनार, नारियल, बेर, आम आदि फल वाली फसलों की सिंचाई ड्रिप सिंचाई विधि से की जा सकती है. इन के अलावा टमाटर, बैगन, खीरा, लौकी, कद्दू, फूलगोभी, बंदगोभी, भिंडी, आलू, प्याज वगैरह कई सब्जी फसलों की सिंचाई भी टपक सिंचाई विधि से की जा सकती है. अन्य फसलों जैसे कपास, गन्ना, मक्का, मूंगफली, गुलाब व रजनीगंधा वगैरह को ड्रिप सिंचाई विधि से सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है.

ड्रिप सिंचाई पर एक रिपोर्ट : कर्नाटक के गन्ना किसानों पर हुए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि वहां के 10.85 लाख हेक्टेयर रकबे में उगाए जाने वाले गन्ने के लिए बहाव प्रणाली वाली खेती में सिंचाई के लिए 330 टीएमसीएफटी पानी की जरूरत होगी, जबकि इतने ही रकबे में ड्रिप सिंचाई तकनीक से महज 144 टीएमसीएफटी पानी की जरूरत होती है. पानी की 186 टीएमसीएफटी मात्रा का ही नहीं, बल्कि इस की सिंचाई में लगने वाली बिजली में 450 करोड़ रुपए की बचत का अनुमान किया गया जो कुल मिला कर 1200 मेगावाट के बराबर होगी.

अब बात पैदावार की करें तो इतने ही रकबे में फ्लड सिंचाई के जरीए प्रति हेक्टेयर 35 टन की पैदावार होती है, जबकि ड्रिप सिंचाई के जरीए 68 टन तक की पैदावार हासिल की जा सकती है. अकेले गन्ने की पैदावार में लगभग 95 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है, जिस का बाजारी कीमतों पर प्रति एकड़ कुल लाभ 65 हजार रुपए से अधिक बैठता है.

Drip Irrigation

ड्रिप सिंचाई तकनीक के लाभ : ड्रिप सिंचाई तकनीक को सब्जियों,  फलों और तमाम फसलों में बड़ी सफलता के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है. इस तकनीक में पानी के स्टोरेज टैंक से एक खास दबाव पर 2-20 लीटर प्रति घंटे की दर से पानी को जमीन की सतह पर पाइपों के जाल से पौधों के पास बने छेदों से टपकते हुए पहुंचाया जाता है. इस प्रणाली में जमीन में नमी बनाए रखने में मदद मिलती है.

ड्रिप सिंचाई प्रणाली में पानी का बेहतर इस्तेमाल ही नहीं होता, बल्कि पानी की खपत में 45 फीसदी कमी आ जाती है. उर्वरकों और कीटनाशकों को ड्रिप प्रणाली में सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है. सिंचाई के पुराने तरीकों में पोषण उपयोग क्षमता 60 फीसदी से कम रहती है, जबकि ड्रिप प्रणाली में 90 फीसदी से ज्यादा है.

आम सिंचाई में पौधों को अधिक पानी मिलने से पानी के जमीन के भीतर रिसाव से 50 फीसदी तक उर्वरक घुल कर मिट्टी के निचले स्तरों में जा पहुंचते हैं, जबकि ड्रिप प्रणाली में रिसाव के जरीए उर्वरकों की हानि महज 10 फीसदी होती है. सब से खास बात यह है कि उर्वरकों के रिसाव से जमीन के अंदर का पानी खराब होता है. ड्रिप सिंचाई से उर्वरकों की खपत में 20 फीसदी की कमी के साथ पैदावार में 20-90 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है. ड्रिप सिंचाई से किसान अपनी फसल की लागत को कम करने के साथसाथ भूमिगत जल को भी गंदा होने से बचा सकते हैं.

ड्रिप सिंचाई से पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को अपनी संख्या को बढ़ाने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता है, जिस से पौधों की सुरक्षा बढ़ती है और कीटनाशकों की खपत कम हो जाती है. नाली प्रणाली से सिंचाई करने पर पानी के बहाव के साथ मिट्टी का कटाव होता है, जबकि ड्रिप प्रणाली में मिट्टी का कटाव नहीं होता है. इस से मिट्टी की उर्वरता और उस की परतों को कोई नुकसान नहीं होता है.

ड्रिप सिंचाई प्रणाली में सिंचाई के लिए खेतों की असमान सतह होना बाधक नहीं है, जबकि नाली सिंचाई में किसानों को खेत को समतल बनाने में खर्च करना पड़ता है. ड्रिप प्रणाली में सिंचाई में मेहनत कम लगती है. ड्रिप सिंचाई के दौरान भूमि सूखी होने के कारण फसलों की तोड़ाई में परेशानी नहीं होती है.

ड्रिप सिंचाई की सुविधा और ढांचे को तैयार करने के लिए केंद्र व विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा सब्सिडी दी जाती है.

Kala Namak Rice : कालानमक धान की उन्नत किस्मों की खेती

Kala Namak Rice : कालानमक धान अपनी महक व गुणवत्ता की वजह से काफी महंगा होता है. इसीलिए कम पैदावार के बावजूद किसानों द्वारा इस की खेती की जाती है. कालानमक धान की पुरानी प्रजातियों में ज्यादा समय में कम पैदावार होती थी. इन के पौधे लंबे होने की वजह से अकसर गिर जाते थे और इन्हें पानी की भी ज्यादा जरूरत होती थी. इन्हीं वजहों से इस की खेती के रकबे में काफी कमी आ गई.

इन समस्याओं को देखते हुए भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने शोध कर के कालानमक 101, कालानमक 102 व कालानमक 103 नाम की बौनी सुगंधित व अधिक उपज देने वाली प्रजातियां विकसित की हैं. ये प्रजातियां न केवल अधिक उपज देंगी, बल्कि कम समय में तैयार भी हो जाएंगी. कालानमक की इन प्रजातियों में कुपोषण को दूर करने वाले तमाम सूक्ष्म पोषक तत्त्व मौजूद हैं, जो कुपोषण को दूर करने में बेहद कारगर सिद्ध होंगे. इन प्रजातियों में निम्नलिखित खूबियां पाई गई हैं:

* इन में आयरन 29.09 फीसदी व जिंक 31.01 फीसदी पाया जाता है, जो पहले से मौजूद खुशबूदार प्रजातियों से ज्यादा है.

* कालानमक की इन प्रजातियों में कुपोषण से लड़ने की कूवत ज्यादा होती है.

* इन का चावल सफेद व खुशबूदार होता है.

* इन की पैदावार कालानमक की पुरानी किस्मों से डेढ़ गुना ज्यादा है. इन में 20 अक्तूबर के करीब बाली आती है और नवंबर के अंत तक फसल पक कर तैयार हो जाती है. इस तरह ये पुराने कालानमक की प्रजातियों से 2 हफ्ते तक का कम समय लेती हैं.

* इन के पौधों की ऊंचाई 100 से 110 सेंटीमीटर होती है और बालियां 20-25 सेंटीमीटर तक लंबी होती हैं.

* इन्हें किसी भी साधारण कुटाई मशीन से कुटाई कर के चावल निकाला जा सकता है.

* इस चावल का औसत बाजार भाव 55-60 रुपए प्रति किलोग्राम है और इस में कुपोषण से लड़ने की कूवत होती है.

जमीन का चयन : कालानमक की इन प्रजातियों की खेती उन सभी प्रकार की जमीनों में की जा सकती है, जहां सिंचाई के साधन मौजूद हों. वैसे इन प्रजातियों के लिए दोमट, मटियार व काली मिट्टी ज्यादा मुफीद मानी जाती है.

बीज दर व नर्सरी : कालानमक की इन उन्नत प्रजातियों की 1 हेक्टेयर खेत में रोपाई के लिए 25-30 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. इन प्रजातियों की नर्सरी को अन्य प्रजातियों के मुकाबले देर से यानी जून के आखिरी हफ्ते से जुलाई के दूसरे हफ्ते तक डालना अच्छा रहता है. 1 हेक्टेयर रकबे के लिए 800 से 1000 वर्गमीटर में नर्सरी डालना सही होता है. नर्सरी की बोआई से पहले तैयार किए गए खेत में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस व 50 किलोग्राम पोटाश की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से डाली जाती है. अगर नर्सरी में जिंक या लोहे की कमी दिखाई पड़े तो 0.5 फीसदी जिंक सल्फेट व 0.2 फीसदी फेरस सल्फेट के घोल का छिड़काव करना अच्छा होता है.

Kala Dhan

प्रजातियां : भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (फिलीपींस) द्वारा विकसित की गई कालानमक की बौनी व अधिक उत्पादन देने वाली प्रजातियों में कालानमक 101, कालानमक 102 व कालानमक 103 को सब से ज्यादा मुफीद माना गया है. इन प्रजातियों में सब से अच्छा नतीजा कालानमक 101 का रहा है. ये तीनों प्रजातियां खुशबू से भरपूर होती हैं.

बीज शोधन : कालानमक की इन प्रजातियों को रोगों व कीड़ों से बचाने के लिए बीजों को शोधित किया जाना जरूरी होता है. जिस खेत में जीवाणु झुलसा या जीवाणु धारी रोग की समस्या पाई जाती है, वहां 25 किलोग्राम बीजों के लिए 4 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन को पानी में मिला कर उस में बीजों को रात भर भिगो देना चाहिए. दूसरे दिन नर्सरी में डालने से पहले भिगोए गए बीजों को छाया में सुखा लेना चाहिए. अगर पौधों में झुलसा की समस्या नहीं आती हो तो 25 किलोग्राम बीजों को रात भर पानी में भिगोने के बाद दूसरे दिन पानी से छान लें. इस के बाद 75 ग्राम थीरम या 50 ग्राम कार्बेंडाजिम को 8-10 लीटर पानी में घोल कर बीजों में मिला दें. इस के बाद भिगोए गए बीजों को छाया में अंकुरित कर के नर्सरी में डालें.

नर्सरी में बीजों को डालने के 21-25 दिनों के बाद अच्छी तरह से पलेवा किए गए खेत में इस की रोपाई करनी चाहिए. कालानमक की ये प्रजातियां बौनी होने की वजह से गिरती नहीं हैं. पौधों की रोपाई 3-4 सेंटीमीटर से ज्यादा गहराई पर नहीं करनी चाहिए, वरना कल्ले कम निकलते हैं और उपज कम हो जाती है. पौधों से पौधों की दूरी 2×10 सेंटीमीटर व एक स्थान पर पौधों की संख्या 2-3 रखनी चाहिए.

खाद व उर्वरक : इन प्रजातियों के लिए 1 हेक्टेयर खेत में 100-120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस व 60 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है. खेत की जुताई के दौरान ही प्रति हेक्टेयर की दर से 10-15 टन गोबर की सड़ी खाद का इस्तेमाल करना उत्पादन के लिए अच्छा होता है. इसी दौरान 20-25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना अच्छा होता है.

सिंचाई : कालानमक की इन प्रजातियों को सही मात्रा में नमी की जरूरत होती है. कम बारिश की हालत में नियमित अंतरात पर सिंचाई करते रहें, ताकि खेत की नमी न सूखने पाए. वैसे कालानमक की इन प्रजातियों में 30-60 सेंटीमीटर अस्थायी पानी भी पैदावार के लिए अच्छा माना जाता है. खेत में ज्यादा पानी न लगने पाए इसलिए जलनिकासी का इंतजाम अच्छा होना चाहिए. रोपाई के 1 हफ्ते बाद कल्ले फूटने, बाली निकलने, फूल खिलने और दाना बनते समय खेत में सही मात्रा में पानी होना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण : धान की फसल के लिए खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी होता है, क्योंकि फसल में खरपतवार उग आने से पैदावार घट जाती है. धान की फसल पर रसायनों का असर कम करने के लिए खरपतवार नियंत्रण के लिए बिना रसायनों का प्रयोग किए ही यांत्रिक विधि से खरपतवार नियंत्रण किया जाना ज्यादा सही माना जाता है. इस के लिए खुरपी या पैडीवीयर का इस्तेमाल किया जा सकता है.

अगर रासायनिक विधि से खरपतवार का नियंत्रण करना है, तो चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए ब्यूटाक्लोर 5 फीसदी ग्रेन्यूल, 30-40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या बेंथ्योकार्ब 10 फीसदी ग्रेन्यूल 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. इस के अलावा विस्पाइरीबैक सोडियम या एनीलोफास का इस्तेमाल भी खरपतवार नियंत्रण के लिए रोपाई के 3-4 दिनों के अंदर करना चाहिए. अगर दानेदार रसायनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो यह ध्यान रखना चाहिए कि खेत में काफी मात्रा में पानी भरा हो.

बीमारियां व कीट नियंत्रण : अगर धान की नर्सरी डालते समय बीजशोधन किया गया है, तो फसल में बीमारियों के लगने की संभावना नहीं होती है. धान की फसल में जिन कीटों का प्रकोप पाया जाता है, उन में दीमक, पत्ती लपेटक कीट, गंधीबग, बाली काटने वाला कीट, गोभगिडार, हरा फुदका, भूरा फुदका, सफेद पीठ वाला फुदका, हिस्पा व नरई कीट खास हैं, लेकिन कालानमक की इन प्रजातियों में इन कीटों का प्रकोप बहुत कम देखा गया है.

अगर ऊपर बताए गए कीटों का प्रकोप दिखाई पड़ता है, तो अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के कीट रोग नियंत्रण विशेषज्ञ से संपर्क कर के कीटों पर काबू पाया जा सकता है.

उत्पादन : कालानमक की इन प्रजातियों की फसल की कटाई 85-90 फीसदी दानों के पक जाने के बाद की जाती है. काटी गई फसल की मड़ाई के लिए छायादार व हवादार जगह का चुनाव करें. इस से कुटाई के दौरान चावल के टूटने की संभावना नहीं होती है. कालानमक की इन प्रजातियों की औसत उपज 50-55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई गई है. ज्यादा जानकारी के लिए किसान कृषि विज्ञान केंद्र बंजरिया, बस्ती के विषय वस्तु विशेषज्ञ, राघवेंद्र सिंह के मोबाइल नंबर 9415670596 या 9838070596 पर संपर्क कर सकते हैं.

Lac Insect : ‘राष्ट्रीय लाख कीट दिवस’ का आयोजन

Lac Insect : राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर के कीट विज्ञान विभाग में लाख कीट आनुवंशिक संरक्षण पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा प्रायोजित नेटवर्क परियोजना के तहत चौथा ‘राष्ट्रीय लाख कीट दिवस’ मनाया गया. इस मौके पर लाख संसाधन उत्पादन पर ‘एकदिवसीय छात्र संवाद सहप्रशिक्षण कार्यशाला’ का आयोजन किया गया और इस में कृषि संकाय के स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी के 125 से अधिक छात्रों ने हिस्सा लिया.

इस मौके पर परियोजना अधिकारी डा. हेमंत स्वामी ने लाख कीट के जीवनचक्र एवं उन के पोषक वृक्ष लाख की खेती कैसे की जाए व किसान अपनी आय को कैसे बढ़ा सकते हैं, के बारे में जानकारी दी.

इस कार्यशाला में डा.एमके महला, प्रोफैसर, कीट विज्ञान ने सौंदर्य प्रसाधन, भोजन, फार्मास्यूटिकल्स, इत्र, वार्निश, पेंट, पौलिश, आभूषण और कपड़ा रंगाई जैसे उद्योगों में लाख और इस के उपउत्पादों यानी राल, मोम और डाई के उपयोग के बारे में बताया. साथ ही, उन्होंने विभिन्न मेजबान पौधों पर लाख कीट की वैज्ञानिक खेती के लिए उन्नत तकनीकों के बारे में भी जानकारी दी.

16 मई से 22 मई तक ‘उत्पादक कीट संरक्षण सप्ताह’ और ‘राष्ट्रीय लाख कीट दिवस’ के अवसर पर डा. अमित त्रिवेदी, क्षेत्रीय निदेशक अनुसंधान, डा. वीरेंद्र सिंह, प्रोफैसर, उद्यान विभाग और डा. रमेश बाबू, विभागाध्यक्ष, कीट विज्ञान विभाग ने इन उत्पादक कीड़ों के संरक्षण, परागणकों, भौतिक डीकंपोजर, जैव नियंत्रण एजेंटों आदि के रूप में प्राकृतिक जैव विविधता की सुरक्षा में उन की भूमिका पर प्रकाश डाला. साथ ही, यह भी बताया कि कैसे स्थानीय किसानों के बीच लाख की खेती को लोकप्रिय बनाना है और प्रोत्साहित करना है, क्योंकि जहां लाख की खेती छोड़ दी गई है, वहां निवास स्थान नष्ट हो गए हैं, वहां लाख के कीट और संबंधित जीवजंतु लुप्त हो गए हैं.

इस आयोजन के दौरान कीट पर निबंध प्रतियोगिता व प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया व विजेताओं को प्रमाणपत्र वितरित किए गए.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान राष्ट्रीय विस्तार कार्यक्रम कार्यशाला

नई दिल्ली : भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा खरीफ 2024 की ट्रांसफर औफ टैक्नोलौजी (ToT) गतिविधियों की समीक्षा कार्यशाला का सफल आयोजन 16, मई 2025 को वर्चुअल माध्यम से किया गया.

इस कार्यशाला की अध्यक्षता आईएआरआई के निदेशक डा. सीएच श्रीनिवास राव ने की. इस अवसर पर आईसीएआर संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, झांसी स्थित केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय और 16 स्वयंसेवी संगठनों सहित विभिन्न हितधारकों ने हिस्सा लिया.

यह पहल आईएआरआई का प्रमुख साझेदारी कार्यक्रम है, जिस का उद्देश्य प्रगतिशील कृषि अनुसंधान और जमीनी स्तर पर उस के कार्यान्वयन के बीच की खाई को पाटना है. उल्लेखनीय है कि इस साल 3 नए स्वयंसेवी संगठनों को कार्यक्रम में शामिल किया गया, जो विभिन्न जलवायु क्षेत्रों और सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इस से कार्यक्रम की पहुंच और समावेशिता को और अधिक बल मिला है.

इस कार्यशाला को संबोधित करते हुए डा. सीएच श्रीनिवास राव ने कहा कि तकनीकी जानकारी के प्रसार के जरीए भारत के किसानों को मजबूत बनाया जा सकता है, जिस से कृषि का सतत विकास संभव है. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अनुसंधान संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों और स्वयंसेवी संगठनों की यह अनोखी साझेदारी ही किसानों तक सही समय पर सही तकनीक पहुंचाने का मूलमंत्र है.

उन्होंने सभी सहभागियों की सक्रिय भागीदारी और योगदान की सराहना की और बताया कि कार्यशाला में 28 विस्तृत प्रस्तुतियां दी गईं, जिन में पूर्व सीजन की उपलब्धियां और आगामी सीजन की योजनाएं शामिल थीं. डा. सीएच श्रीनिवास राव ने सभी हितधारकों से इस गति को बनाए रखने और आईएआरआई की नवीनतम किस्मों एवं तकनीकों के प्रभावी हस्तांतरण को सुनिश्चित करने का आग्रह किया.

उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार तकनीकों को ढालने के लिए मजबूत फीडबैक तंत्र और सहभागी दृष्टिकोण को अपनाना आवश्यक है. उन्होंने आगे कहा कि भारतीय कृषि का भविष्य साझेदारी आधारित नवाचार और खेतस्तर की सहभागिता में शामिल है. आईएआरआई इस आंदोलन का नेतृत्व वैज्ञानिक उत्कृष्टता और जमीनी भागीदारी के साथ करता रहेगा.

इस कार्यक्रम की शुरुआत में डा. एके सिंह, प्रभारी, कैटैट, आईएआरआई ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया और डा. आरएन पडारिया, संयुक्त निदेशक (प्रसार), आईएआरआई ने कार्यक्रम की रूपरेखा एवं रणनीतिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया.

इस कार्यशाला के अंतर्गत एक विशेष संवाद सत्र भी आयोजित किया गया, जिस में प्रतिभागियों ने अपने अनुभव और सुझाव साझा किए. कार्यशाला का समापन तकनीकी हस्तांतरण में कार्यक्षमता, समावेशिता और नवाचार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी, के साथ हुआ, जिस से आईएआरआई की कृषि विकास और विस्तार क्षेत्र में लीडरशिप की भूमिका और मजबूत होगी.

Biological Technology : जैविक तकनीक को मिला वैश्विक पुरस्कार

Biological Technology : ब्राजील की अग्रणी कृषि वैज्ञानिक डा. मारियांगेला हुंग्रिया दा कुन्हा को साल 2025 का प्रतिष्ठित ‘विश्व खाद्य पुरस्कार’ दिए जाने की घोषणा वैश्विक जैविक कृषि जगत के लिए एक प्रेरणास्पद क्षण है. इस अवार्ड को “कृषि का नोबेल पुरस्कार” भी कहा जाता है.

जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण पर उन के काम ने ब्राजील को हर साल तकरीबन 25 अरब अमेरिकी डालर की रासायनिक उर्वरक लागत से छुटकारा दिलाया है.

इस अवसर पर जहां हम ब्राजील की इस वैज्ञानिक को हार्दिक बधाई देते हैं, वहीं यह तथ्य भी सामने लाना जरूरी है कि भारत में इस दिशा में व्यावहारिक और पूरी तरह से सफल मौडल पिछले 3 दशकों से विकसित किया जा चुका है.

मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सैंटर, कोंडागांव, छत्तीसगढ़ में हम ने सालों की मेहनत और शोध से एक ऐसी तकनीक को मूर्त रूप दिया है, जिस में बहुवर्षीय पेड़ विशेष रूप से आस्ट्रेलियाई मूल के “अकेशिया” प्रजाति के पौधों को विशेष पद्धति से विकसित कर के उस की जड़ों में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को प्राकृतिक रूप से स्थिर कर मिट्टी में लगाया जाता है. इस की पत्तियों से बनने वाला ग्रीन कंपोस्ट अतिरिक्त लाभ प्रदान करता है, जिस से कि स्पीडो के साथ लगाए जाने वाली तकरीबन सभी प्रकार की अंतर्वत्ति फसलों को कुछ समय बाद पचासों साल तक किसी भी प्रकार की रासायनिक अथवा प्राकृतिक खाद अलग से देने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

“नेचुरल ग्रीनहाउस मौडल” के नाम से चर्चित यह तकनीक आज देश के 16 से अधिक राज्यों के प्रगतिशील किसान अपने खेतों में अपना चुके हैं. इस से न केवल रासायनिक नाइट्रोजन खाद पर निर्भरता खत्म हो रही है, बल्कि भारत सरकार द्वारा हर साल दी जाने वाली 45 से 50 हजार करोड़ की नाइट्रोजन उर्वरक सब्सिडी पर भी बड़ी बचत संभव हो रही है. भारत जैसे देश, जो रासायनिक उर्वरकों के लिए कच्चा माल आयात करता है, के लिए यह विदेशी मुद्रा की सीधी बचत करता है.

हमारा मानना है कि जिस तकनीक पर अब वैश्विक स्तर पर पुरस्कार मिल रहा है, उस पर भारत पहले ही काम कर चुका है और एक प्रमाणित, व्यावहारिक मौडल अपने देश में ही उपलब्ध है. भारत सरकार यदि समय रहते इस तकनीक को समर्थन देती, तो आज यह पुरस्कार भारत को भी मिल सकता था.

हमें यह पुरस्कार न मिलने का कोई अफसोस नहीं है, किंतु अब जबकि इस तकनीक को वैश्विक मान्यता मिल चुकी है, भारत सरकार और नीति बनाने वालों से हमारी अपेक्षा है कि वे इस देशज तकनीक को प्राथमिकता दें, इस का प्रसार करें और किसानों को रासायनिक उर्वरकों के जाल से नजात दिलाएं. यह न केवल किसानों की आत्मनिर्भरता, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक सुरक्षा और पर्यावरणीय संरक्षण के लिए भी जरूरी है.