Workshop : प्याज एवं लहसुन पर अनुसंधान परियोजना की कार्यशाला

Workshop : भाकृअनुप-विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, हवालबाग, अल्मोड़ा में प्याज एवं लहसुन पर अखिल भारतीय नैटवर्क अनुसंधान परियोजना की 16वीं सालाना कार्यशाला का शुभारंभ अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (एआईओनआरपीओजी) के अंतर्गत किया गया. इस कार्यशाला के मुख्‍य अतिथि अजय टम्‍टा, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री ने अपने संबोधन में संस्थान के निदेशक एवं सभी वैज्ञानिकों को कृषि क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियों के लिए बधाई दी. उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए वैज्ञानिक अपने अनुभवों को साझा करेंगे.

मंत्री अजय टम्टा ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देशन में 29 मई से 12 जून, 2025 तक चलने वाली ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान : अनुसंधान किसान के द्वार’ कार्यक्रम में किसानों से अधिक से अधिक संख्या में भागीदारी कर कार्यक्रम को सफल बनाने का आह्वान किया.

इस कार्यशाला के अध्यक्ष डा. संजय कुमार सिंह, उपमहानिदेशक (बागबानी विज्ञान), भाकृअनुप ने बताया कि कार्यशाला के दौरान 3 साल के लिए बनाए जाने वाले इस कार्यक्रम में ‘किसानों को कैसे आगे बढ़ाया जाए’ विषय पर गहन चर्चा की जाएगी. उन के मुताबिक, देवभूमि में ऐसी क्षमता है कि यहां बेमौसमी एवं दुर्लभ सब्‍जी उत्‍पादन कर अत्यधिक लाभ लिया जा सकता है.

उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि हमारा देश आज प्याज एवं लहसुन की उत्पादकता में दूसरे स्थान पर है. यदि युवा तबका इस की खेती अच्छी क्वालिटी के बीज, तकनीकी एवं आधुनिक तरीका अपना कर करें, तो कम लागत पर अधिक मुनाफा ले सकते हैं.

इस से पूर्व संस्थान के निदेशक डा. लक्ष्‍मी कांत ने संस्थान की उपलब्धियां भी बताईं. उन्होंने कहा कि संस्थान द्वारा ही प्याज की पहली संकर किस्म वीएल प्‍याज 67 का विकास किया गया. उन्होंने बताया कि संस्थान द्वारा प्याज की 2 एवं लहसुन की 2 किस्मों का विकास कर उन्हें अधिसूचित किया गया और प्याज की 1 व लहसुन की 2 किस्मों का व्यावसायीकरण भी किया गया है.

इस दौरान डा. विजय महाजन, निदेशक, प्याज एवं लहसुन अनुसंधान निदेशालय, पुणे ने अखिल भारतीय प्याज एवं लहसुन परियोजना की सालाना उपलब्धियों से सभी को अवगत कराया.

इस संस्थान के 3 प्रकाशनों बुलबिल ऐज प्लांटिंग मैटिरियल: नोवल अप्रोच टू कल्‍टीवेट लौग डे गार्लिक इन नौर्थ वैस्‍टर्न हिमालयाज, पर्वतीय क्षेत्रों में प्‍याज का बीजोत्‍पादन एवं पर्वतीय इलाकों में लहसुन का बीज उत्पादन और प्याज एवं लहसुन अनुसंधान निदेशालय की पुस्तिका गाइडलाइंस फौर आइडेंटिफिकेशन औफ औनियन एंड गार्लिक वैरायटी/हाइब्रिड इवैल्‍यूएटेड अंडर एआईएनपीओआरजी फौर रिलीज का भी विमोचन किया गया.

प्रगतिशील किसानों को कार्यशाला के दौरान किया गया सम्मानित

इस अवसर पर अजय वर्मा, महापौर, अल्‍मोड़ा, डा. सुधाकर पांडे, सहायक महानिदेशक (बागबानी संभाग), भाकृअप, डा. केई लवांडे, पूर्व कुलपति, डा. बीएसकेकेवी, जलगांव एवं पूर्व निदेशक डीओजीआर, पुणे, डा. प्रवीण मलिक, सीईओ, एग्रीइनोवेट, नई दिल्‍ली, डा. संजय कुमार, डा. बीएस पाल, डा. विक्रमादित्य पांडे, डा. बीएस तोमर, डा. पीके गुप्ता एवं देश के विभिन्‍न संस्‍थानों और कृषि विश्वविद्यालयों के 70 से भी अधिक लोग उपस्थित रहे.

Convocation : पूसा में हुआ 63वां दीक्षांत समारोह

Convocation: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् – भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली का 63वां दीक्षांत समारोह पिछले दिनों 17 मार्च से 22 मार्च, 2025 को राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर (NASC) के भारत रत्न सी. सुब्रमण्यम हौल में आयोजित किया गया. इस दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री, शिवराज सिंह चौहान रहे.

इस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि केंद्रीय राज्य मंत्री (कृषि एवं किसान कल्याण) भगीरथ चौधरी और राम नाथ ठाकुर थे. इस अवसर पर कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक देवेश चतुर्वेदी, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के कुलपति एवं निदेशक डा. सीएच श्रीनिवास राव, डीन एवं संयुक्त निदेशक (शिक्षा) डा. अनुपमा सिंह, संयुक्त निदेशक (अनुसंधान), संयुक्त निदेशक (प्रसार), परियोजना निदेशक डब्ल्यूटीसी, संयुक्त निदेशक (प्रशासन), आईसीएआर के पूर्व महानिदेशक और पूसा संस्थान के पूर्व निदेशक एवं डीन भी उपस्थित थे.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (आईसीएआर) – भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) कृषि अनुसंधान, शिक्षा और प्रसार में नवाचार और उत्कृष्टता को प्रोत्साहित करने के लिए प्रसिद्ध है. हमारी पहल, रणनीतियां और नीतियां न केवल राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सावधानीपूर्वक तैयार की गई हैं, बल्कि वैश्विक अवसरों का लाभ उठाने के लिए भी केंद्रित हैं.

हम उन्नत तकनीकों और उच्च स्तरीय मानव संसाधन के माध्यम से विज्ञान और समाज में प्रगति को प्राथमिकता देते हैं. आईएआरआई ने 12 से अधिक दशकों में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में अनुसंधान और शिक्षा के लिए उत्कृष्टता के एक प्रतिष्ठित केंद्र के रूप में अपनी पहचान बनाई है. पूसा संस्थान के शैक्षणिक कार्यक्रम की यात्रा साल 1923 में शुरू हुई थी और पिछले एक सदी से इस ने अपनी गौरवशाली परंपरा को बनाए रखा है.

पिछले साल स्नातकोत्तर विद्यालय का नाम बदल कर स्नातक विद्यालय किया गया था. अब तक, इस संस्थान ने कुल 11,731 छात्रों को डिग्रियां प्रदान की हैं, जिन में एसोसिएटशिप, एम.एससी., एम.टेक., और पीएच.डी. डिग्रियां शामिल हैं, साथ ही विभिन्न देशों के 512 अंतरराष्ट्रीय छात्रों को भी उपाधियां प्रदान की गई हैं. इस 63वें दीक्षांत समारोह के दौरान, कुल 399 छात्रों को उन की कड़ी मेहनत और सफलता के उपलक्ष्य में डिग्रियां प्रदान की गईं, जिन में 233 एम.एससी, 166 पीएच.डी, और 5 विदेशी छात्र शामिल हैं.

अनुसंधान की उपलब्धियां:

साल 2024 के दौरान, 10 विभिन्न फसलों में कुल 27 फसल किस्मों को विकसित और जारी किया गया. इन में 16 प्रजातियां और 11 संकर किस्में शामिल हैं.

आईसीएआर – आईएआरआई के द्वारा विकसित 10 जलवायु सहिष्णु और बायोफोर्टिफाइड फसल किस्मों को राष्ट्र को समर्पित किया गया. इन में 7 अनाज एवं मोटे अनाज, 2 दलहनी फसलें और 1 चारे की किस्म शामिल हैं.

Convocationआईएआरआई ने बासमती धान के उत्पादन और व्यापार में उत्कृष्ट योगदान दिया है, जिस में उन्नत किस्मों के विकास की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. पूसा बासमती किस्में, जैसे पूसा बासमती 1718, पूसा बासमती 1692, पूसा बासमती 1509 और जीवाणु झुलसा  व ब्लास्ट रोग प्रतिरोधी उन्नत बासमती किस्में पीबी 1847, पीबी 1885 और पीबी 1886, भारत से 5.2 मिलियन टन बासमती धान निर्यात में लगभग 90 फीसदी योगदान देती हैं. वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत को बासमती धान निर्यात से 48,389 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है. वहीं, अप्रैल, 2024 से नवंबर, 2024 के दौरान बासमती धान निर्यात से 31,488 करोड़ रुपए की आय हुई है.

बासमती धान की खेती के कारण भूजल स्तर पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए, आईएआरआई ने दो शाकनाशी सहिष्णु बासमती धान किस्में, पीबी 1979 और पीबी 1985, विकसित और जारी की हैं. ये किस्में प्रत्यक्ष बीजाई के लिए उपयुक्त हैं, जिस से गिरते भूजल स्तर की समस्या और रोपाई में किए गए धान से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलेगी.

इस के अलावा दो अल्पावधि गैरबासमती धान किस्में, पूसा 1824 और पूसा 2090 विकसित और जारी की गई हैं. ये किस्में फसल कटाई के बाद की कृषि गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय प्रदान करेगी. इस से खेतों की समय पर सफाई में सहायता मिलेगी, जिस से पर्यावरण प्रदूषण कम होगा और सिंधु गंगा के मैदान में गेहूं की अगली फसल की समय पर बोआई सुनिश्चित हो सकेगी. वर्तमान में आईएआरआई के अनुसार गेहूं किस्मों की खेती लगभग 9 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में की जा रही है, जिस से देश के अन्न भंडार में लगभग 40 मिलियन टन गेहूं का योगदान हो रहा है.

हमारे अनुसंधान कार्यक्रम ने पोषण सुरक्षा पर भी ध्यान केंद्रित किया है और 8 बायोफोर्टिफाइड फसल किस्में विकसित की हैं. एक ब्रेड गेहूं (एच आई 1665) और एक ड्यूरम गेहूं एच आई-8840  अधिक आयरन और जिंक युक्त जो केंद्रीय क्षेत्र के लिए, दो ब्रेड गेहूं किस्में उच्च प्रोटीन (एच डी 3390 उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र के लिए और एच डी 3410 दिल्लीएनसीआर क्षेत्रों के लिए ), 2 बायोफोर्टिफाइड मक्का संकर, जिन में एक बहुपोषक संकर, पूसा बायोफोर्टिफाइड मक्का संकर 5 शामिल है, जिस में α-टोकोफेरौल (21.60 पीपीएम), विटामिन ए (6.22 पीपीएम), हाई लाइसिन ( 4.93 फीसदी )  और ट्रिप्टोफैन ( 1.01फीसदी ) की उच्च मात्रा है, 2 डबल जीरो (शून्य इरूसिक एसिड और ग्लूकोसिनोलेट) सरसों किस्में – पूसा सरसों 35 और पूसा सरसों 36, 1 सोयाबीन किस्म (पूसा 21), जो कि कुनीट्ज कुन्तिज ट्रिप्सिन इन्हिबीटर (KTI) की कम मात्रा वाली किस्म है.

येलो वेन मोजेक वायरस प्रतिरोधी और एनेशन लीफ कर्ल वायरस प्रतिरोधक भिंडी की दो किस्में पूसा भिंडी-5 और डीओएच-1 विकसित किस्में और जारी की गई हैं. ये किस्में कीटनाशकों के उपयोग को कम करने और खेती की लागत को घटाने में मदद करेगी.

संरक्षित खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न सब्जी फसलों की उन्नत किस्में खीरा सीवी, पूसा पार्थेनोकार्पिक खीरा-6, पूसा पार्थेनोकार्पिक खीरा संकर-1, खरबूजा सीवी, पूसा सुनहरी और पूसा शारदा, टमाटर संकर पूसा रक्षित, पूसा चेरी टमाटर-1, करेला सीवी, पूसा संरक्षित करेला-2 और समर स्क्वैश सीवी, पूसा श्रेयस विकसित किस्में और जारी की गई हैं.

सब्जी फसलों की उन्नत गुणवत्ता वाली बीज उपलब्ध कराने के लिए, ब्रीडर बीज नियमित रूप से राष्ट्रीय बीज निगम और राष्ट्रीय बागबानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान को सप्लाई किए जा रहे हैं. वर्ष 2024-25 के दौरान, विभिन्न सब्जी किस्मों और संकरों के लिए 17 समझौता ज्ञापन निजी बीज कंपनियों के साथ हस्ताक्षरित किए गए हैं.

गेंदा की एक नई किस्म पूसा बहार और ग्लेडियोलस की मध्यम मौसम वाली किस्म पूसा सिंदूरी को केंद्रीय किस्म विमोचन समिति द्वारा जारी करने की सिफारिश की गई है. इस के साथ ही, देश में पहली बार, आम के दो बौने जड़वृक्ष पूसा मूलव्रंत-1 और पूसा मूलव्रंत-2 जारी किए गए हैं. ये जड़वृक्ष कलमी आम के पौधों की ऊंचाई को कम करने में सहायक होंगे और बागों के बेहतर प्रबंधन में मदद करेंगे.

आईसीएआर – आईएआरआई द्वारा छोटे किसानों के लिए 1.0  हेक्टेयर क्षेत्र का एकीकृत कृषि प्रणाली मौडल विकसित किया गया है, जिस में फसल उत्पादन, डेयरी, मछली पालन, बतख पालन, बायोगैस संयंत्र, फलदार वृक्ष और कृषि वानिकी को शामिल किया गया है. यह मौडल प्रति हेक्टेयर हर साल लगभग 3.8 लाख रुपए तक का शुद्ध लाभ उत्पन्न करने और 628 मानव दिवस का रोजगार सृजित करने की क्षमता रखता है.

यह प्रणाली अपशिष्ट पुनर्चक्रण और उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि इस में एक इकाई के उपउत्पादों को दूसरी इकाई के इनपुट के रूप में उपयोग किया जाता है, जिस से संसाधनों की दक्षता बढ़ती है.

इसी प्रकार से, आईसीएआर – आईएआरआई द्वारा सीमांत किसानों के लिए 0.4 हेक्टेयर क्षेत्र का एकीकृत कृषि प्रणाली मौडल विकसित किया गया है. इस मौडल में पौलीहाउस खेती, मशरूम उत्पादन, फसल उत्पादन और बागबानी एंटरप्राइज को शामिल किया गया है. यह मौडल 1.76 लाख रुपए प्रति एकड़ प्रति वर्ष तक का शुद्ध लाभ उत्पन्न करने की क्षमता रखता है.

आईसीएआर – आईएआरआई द्वारा विकसित पूसा एसटीएफआर मीटर एक कम लागत वाला, उपयोगकर्ता के अनुकूल, डिजिटल एंबेडेड सिस्टम और प्रोग्रामेबल उपकरण है. इस एक ही उपकरण के माध्यम से द्वितीयक और सूक्ष्म पोषक तत्वों सहित कुल 14 महत्वपूर्ण मृदा पैरामीटर का परीक्षण किया जा सकता है.

संस्थान द्वारा विकसित पूसा डिकंपोजर एक पर्यावरण अनुकूल और किफायती माइक्रोबियल समाधान है, जो फसल अवशेषों के इनसीटू और एक्ससीटू प्रबंधन के लिए प्रभावी है. यह खेत में ही फसल अवशेषों, विशेष रूप से पराली के तेजी से अपघटन को बढ़ावा देने के लिए विकसित किया गया है. कृषि अपशिष्ट को पौधों के पोषक तत्वों और ह्यूमस से भरपूर जैविक खाद में बदला जा सकता है. पूसा डिकंपोजर अब एक रेडी-टू-यूज पाउडर फार्मूलेशन में भी विकसित किया गया है, जो पूरी तरह से पानी में घुलनशील है और मशीन स्प्रेयर की मदद से आसानी से उपयोग किया जा सकता है.

आईसीएआर – आईएआरआई कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन वाली तकनीकों और इनपुट उपयोग दक्षता बढ़ाने वाली तकनीकों के विकास व पहचान पर कार्य कर रहा है, जिस से नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्त किया जा सके. नीम तेल लेपित यूरिया के उपयोग से नाइट्रस औक्साइड (N₂O) उत्सर्जन में लगभग 9 फीसदी की कमी लाई जा सकती है.

इसी तरह, ओलियोरेसिन लेपित यूरिया के उपयोग से धान में मीथेन उत्सर्जन 8.4 फीसदी और नाइट्रस औक्साइड (N₂O) उत्सर्जन 11.3 फीसदी तक कम हुआ है. गेहूं में नाइट्रस औक्साइड (N₂O) उत्सर्जन में 10.6 फीसदी की कमी देखी गई है. डायरेक्ट सीडेड राइस न केवल कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन वाली तकनीक है, बल्कि इस में पानी उपयोग दक्षता भी अधिक होती है.

आईएआरआई उत्तर-पश्चिम भारत में धान और गेहूं की पराली जलाने की निगरानी और भारत में फसल अवशेष जलाने की स्थिति का रोजाना थर्मल सैटेलाइट रिमोट सैंसिंग के माध्यम से विश्लेषण करता है. धान और गेहूं जलाने की घटनाओं पर दैनिक बुलेटिन तैयार कर केंद्र एवं राज्य सरकार के हितधारकों को भेजे जाते हैं, ताकि वे आवश्यक नीतिगत और प्रशासनिक कदम उठा सकें.

पूसा फार्म सन फ्रिज, जिसे आईएआरआई द्वारा विकसित किया गया है, एक औफ ग्रिड, बिना बैटरी वाला सौर ऊर्जा चालित प्रशीतित एवं वाष्पीकरणीय शीतलन संरचना है. इस तकनीक का उद्देश्य कृषि क्षेत्रों में सौर ऊर्जा आधारित कोल्ड स्टोरेज प्रदान करना है, जिस से नाशवंत कृषि उत्पादों का भंडारण किया जा सके.

“पूसा मीफ्लाई किट” और “पूसा क्यूफ्लाई किट” तैयार उपयोग किट है, जो क्रमशः फलों और कुकुरबिट सब्जियों में फल मक्खी के प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए विकसित की गई है. यह किट पराफेरोमोन इम्प्रेग्नेशन तकनीक का उपयोग कर के बैक्ट्रोसेरा प्रजाति की नर फल मक्खियों को आकर्षित और समाप्त करने में सक्षम है. एक बार लगाने पर, यह किट पूरे मौसम तक प्रभावी रहती है, जिस से फसल की गुणवत्ता एवं उत्पादन में वृद्धि होती है और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग को रोका जा सकता है.

“पूसा व्हाइटफ्लाई अट्रैक्टेंट” एक नवीन प्रलोभक (ल्यूर) है, जिसे खेतों और बागवानी फसलों में सफेद मक्खियों को आकर्षित करने के लिए विकसित और व्यावसायिक रूप से उपलब्ध कराया गया है. इसे पीले स्टिकी ट्रैप्स के साथ उपयोग किया जा सकता है और यह समेकित कीट प्रबंधन और जैविक कृषि का एक महत्वपूर्ण घटक है.

Convocation

संस्थान का पूसा समाचार है खास, 6 भाषाओं में मिलती है जानकारी:

संस्थान ने वीडियो आधारित विस्तार मौडल “पूसा समाचार” विकसित किया है, जिस का उद्देश्य दूरदराज के किसानों तक कृषि सलाह पहुंचाना है. यह एक साप्ताहिक कार्यक्रम है, जो हिंदी, तेलुगु, कन्नड़, तमिल, बांग्ला और उड़िया सहित छह भाषाओं में उपलब्ध है और हर शनिवार शाम 7 बजे यूट्यूब चैनल पर प्रसारित किया जाता है. इस की कुल दर्शक संख्या लगभग 1.3 मिलियन है.

पूसा व्हाट्सएप पर घर बैठे मिलती है सलाह:

‘पूसा व्हाट्सएप सलाह (9560297502) सेवा भी शुरू की गई है, जिस से किसान अपने प्रश्न पूछ सकते हैं और विशेषज्ञों से समाधान प्राप्त कर सकते हैं.

कृषि मेले में मिली ढेरों जानकारी :

संस्थान ने नवीनतम तकनीकों के प्रदर्शन और हितधारकों के बीच परस्पर सीखने को बढ़ावा देने के लिए वार्षिक पूसा कृषि विज्ञान मेला आयोजित किया. इस वर्ष, यह मेला दिनांक 22 फरवरी से 24 फरवरी, 2025 के दौरान आयोजित किया गया था. इस का मुख्य विषय “उन्नत कृषि – विकसित भारत” था. इस मेले में एक लाख से अधिक किसानों और अन्य हितधारकों ने भाग लिया था.

किसानों को मिला सम्मान:
संस्थान ने 41 किसानों को उन के नवाचारों के लिए “आईएआरआई फैलो” और “आईएआरआई इनोवेटिव फार्मर्स” के रूप में सम्मानित किया.

मिट्टी की सेहत को सुधारने पर चर्चा करेंगे देशभर के मृदा वैज्ञानिक

उदयपुर : 5 फरवरी, 2025  को मृदा संसाधन मानचित्रण और प्रबंधन की नवीनतम तकनीक पर आधारित 21 दिवसीय शीतकालीन प्रशिक्षण उदयपुर व नागपुर केंद्रों पर आरंभ हुआ. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा घोषित राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो क्षेत्रीय केंद्र, उदयपुर व नागपुर में आयोजित इस प्रशिक्षण में देशभर के 50 से ज्यादा मृदा वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं.

क्षेत्रीय केंद्र, उदयपुर में आयोजित उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक थे, जबकि नागपुर केंद्र के समारोह में मुख्य अतिथि परिमल सिंह, परियोजना निदेशक, नानाजी देशमुख कृषि संजीवनी प्रकल्प (पोकरा) महाराष्ट्र थे. इस समारोह में नागपुर केंद्र औनलाइन जुड़ा.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि देश को आजाद हुए 78 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन किसान आज भी पारंपरिक विधियों से कृषि व इस के मूलाधार मिट्टी को संरक्षित किए हुए है. आजादी के बाद हाल के वर्षों में तकनीक के मामले में भारत ने अद्वितीय सफलता हासिल की है. इन में एआई, रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस), डिजिटल मृदा मानचित्रण (डीएसएम) जैसे उपकरण एवं मृदा संसाधन प्रबंधन की जटिलताओं से निबटने के लिए स्थानिक डाटा का उपयोग करते हैं.

ये प्रौद्योगिकियों मिट्टी के गुणों के विस्तृत विश्लेषण, मिट्टी की प्रक्रियाओं की मौडलिंग और स्थाई भूमि प्रबंधन के लिए रणनीतियों के विकास की सुविधा प्रदान करती हैं. उन्होंने कहा कि मैन्युअल से उच्च तकनीक के जरीए खेती करना किसान के लिए चुनौतीपूर्ण काम है, लेकिन हमारे देश के युवा वैज्ञानिकों की टीम दोनों में तालमेल बिठाने में सक्षम है. इस से किसान व कृषि क्षेत्र में तरक्की सुनिश्चित है.

विशिष्ट अतिथि, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक एवं क्षेत्रीय केंद्र, नई दिल्ली के प्रमुख डा. जेपी शर्मा ने कहा कि यह कार्यक्रम मृदा सर्वेक्षण, भूआकृति पहचान और भूस्थानिक उपकरणों के बारे में व्यावहारिक जानकारी देगा.

जल संसाधन एवं पर्यावरण इंजीनियरिंग, भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के प्रो. शेखरमुद्दू ने कहा कि इस प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को मृदा संसाधन मानचित्रण और प्रबंधन में मूल्यवान कौशल प्राप्त होगा. इस से वे मृदा आधारित विकास कार्यक्रमों और टिकाऊ भूमि प्रबंधन में प्रभावी रूप से योगदान करने में सक्षम होंगे.

निदेशक, नागपुर, डा. एनजी पाटिल ने कहा कि मृदा या मिट्टी एक बेहद महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, जो स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र को आधार प्रदान करता है. साथ ही कृषि, वानिकी और पर्यावरणीय स्थिरता की आधारशिला के रूप में काम करता है.

प्रधान वैज्ञानिक एवं पाठ्यक्रम प्रमुख क्षेत्रीय केंद्र, उदयपुर के डा. आरपी शर्मा ने बताया कि इस  दीर्घकालिक प्रशिक्षण में न केवल राजस्थान, बल्कि पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और ओड़िसा से मृदा वैज्ञानिक अपनेअपने क्षेत्र की मिट्टी की संरचना व संरक्षण की दिशा में अपनाई जा रही तकनीक पर गहन विचारविमर्श करेंगे, ताकि किसानों के लिए तैयार की जाने वाली पौलिसी को नई दिशा दी जा सके.

राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो क्षेत्रीय केंद्र, उदयपुर के प्रमुख एवं  प्रधान वैज्ञानिक डा. बीएल मीना ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि डा. बृजेश यादव, वैज्ञानिक ने धन्यवाद ज्ञापित किया.

प्रशिक्षण में इन पर रहेगा फोकस

मृदा-भूमि रूप संबंधों और मृदा निर्माण पर उन के प्रभाव को समझना, आधुनिक मृदा सर्वेक्षण तकनीकों और भूमि संसाधन सूची विधियों की खोज, रिमोट सेंसिंग (आरएस), जीआईएस और डिजिटल मृदा मानचित्रण (डीएसएम) में जानकारी बढ़ाना, गूगल अर्थ इंजन और भूसांख्यिकी में व्यावहारिक प्रशिक्षण, मिट्टी और जल संरक्षण, भूमि उपयोग नियोजन और टिकाऊ प्रबंधन में भूस्थानिक तकनीकों का प्रयोग आदि.

इस के अलावा मृदा निर्माण के कारक एवं प्रक्रियाओं को समझना, क्षेत्र भ्रमण, मिट्टी की प्रोफाइल का अध्ययन व गुणों का अवलोकन, मृदा संसाधन प्रबंधन में उपग्रह डाटा और उन का अनुप्रयोग, मृदा सर्वेक्षण डेटा व्याख्या.

भूमि संसाधन सूची के लिए मृदा सर्वेक्षण तकनीक को समझना, मृदा एवं जल संरक्षण और भूमि उपयोगनियोजन आदि.

कृषि भूमि बनेगी उपजाऊ, जानें कैसे?

कृषि भूमि में जैविक कार्बन की उपस्थिति की नियमित रूप से मृदा स्वास्थ्य कार्ड (एसएचसी) के माध्यम से जांच की जाती है. योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार, मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए राज्यों को 3 साल में एक बार मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनाना होगा. अब तक 24.60 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनाए जा चुके हैं.

मिट्टी में जैविक कार्बन में कमी के प्रमुख कारण हैं :

(i) दोषपूर्ण प्रथाएं जैसे रासायनिक उर्वरक का अविवेकपूर्ण या अत्यधिक उपयोग, बारबार जुताई, ठूंठ जलाना, अतिचारण और कटाव.

(ii) बारहमासी वनस्पतियों की जगह एकल फसल और चारागाह उगाना.

(iii) मिट्टी के भौतिक व रासायनिक गुण जैसे मिट्टी का घनत्व, उच्च बजरी सामग्री, मिट्टी का कटाव और मिट्टी में पानी की कम मात्रा/खराब नमी संरक्षण उपाय.

इस समस्या के समाधान के लिए सरकार किसानों को मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता कार्ड जारी करने के लिए मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता योजना लागू कर रही है. मृदा स्वास्थ्य कार्ड मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा का विवरण देते हैं और मिट्टी में जैविक कार्बन एवं स्वास्थ्य में सुधार के लिए जैविक खादों एवं जैव उर्वरकों के साथसाथ द्वितीयक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों सहित रासायनिक उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन पर किसानों को सलाह दी जाती है.

सरकार सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) और पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए मिशन और्गेनिक वैल्यू चेन डवलपमेंट (एमओवीसीडीएनईआर) के माध्यम से मिट्टी के जैविक कार्बन में सुधार के लिए जैविक खेती को भी बढ़ावा दे रही है.

परंपरागत कृषि विकास योजना और पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए मिशन और्गेनिक वैल्यू चेन डवलपमेंट के अंतर्गत किसानों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से 3 साल की अवधि के लिए 15,000 रुपए प्रति हेक्टेयर की सहायता प्रदान की जाती है, जिस में मुख्य रूप से जैव उर्वरक शामिल हैं.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 25 नवंबर, 2024 को बायोमास मल्चिंग, बहुफसल प्रणाली, मिट्टी की जैविक सामग्री, मिट्टी की संरचना, पोषण में सुधार, मिट्टी की जल धारण क्षमता को बढ़ाने के लिए खेत पर बने प्राकृतिक खेती जैव इनपुट के उपयोग जैसे कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमएनएफ) को भी मंजूरी दी है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने वर्षा जल के बहाव के कारण मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए कई स्थान, विशिष्ट जैव इंजीनियरिंग उपाय, हवा के कटाव को रोकने के लिए रेत के टीलों को स्थिर करने और आश्रय बेल्ट तकनीक और समस्याग्रस्त मिट्टी के लिए सुधार तकनीक विकसित की है, जो मिट्टी में जैविक कार्बन को बढ़ाती है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद 16 राज्यों में 20 केंद्रों के साथ “जैविक खेती पर नैटवर्क परियोजना (एनपीओएफ)” को लागू कर रहा है. इस कार्यक्रम के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 16 राज्यों के लिए उपयुक्त 68 फसल प्रणालियों के लिए स्थान विशिष्ट जैविक खेती पैकेज विकसित किए हैं, जिन्हें विभिन्न केंद्रीय/राज्य योजनाओं के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है.

सिंचाई एवं जल प्रबंधन परियोजना की बैठक

उदयपुर : 24 अक्तूबर, 2024. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशालय के सभागार में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् की अनुसंधान परियोजनाओं की मध्य एवं पश्चिमी क्षेत्र की दोदिवसीय समीक्षा दल बैठक का शुभारंभ हुआ. इस बैठक में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की सिंचाई जल प्रबंधन परियोजना की पांचवर्षीय कार्यों की समीक्षा की गई, जिस में देश के 7 विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्र के वैज्ञानिक अपने कार्यों की प्रगति की समीक्षा के लिए प्रतिवेदन प्रस्तुत किया.

डा. अजीत कुमार कर्नाटक, कुलपति, मप्रकृप्रौविवि, उदयपुर ने अपना संदेश साझा करते हुए बताया कि पंचवर्षीय समीक्षा दल बैठक अनुसंधान कार्यों के मूल्यांकन एवं समीक्षा हेतु एक अतिमहत्वपूर्ण बैठक होती है. इस उच्चस्तरीय समीक्षा दल के सदस्य काफी अनुभवी, पूर्व कुलपति एवं पूर्व निदेशक व अधिष्ठाता स्तर के अधिकारी होते हैं. समीक्षा दल की बैठक में विगत 5 सालों के अनुसंधान कार्यों की समीक्षा की जाती है और आने वाले समय में अनुसंधान कार्य को दिशा प्रदान की जाती है.

उन्होंने कहा कि मेवाड़ की ख्याति महाराणा प्रताप के साथसाथ उच्च कोटि के जल संचयन, संरक्षण एवं प्रबंधन तकनीक से है, जिस का उल्लेख मेवाड़ ऐतिहासिक लेखक चक्रपाणी मिश्रा ने अपने ग्रंथ विश्व वल्लभ में किया है.

कार्यक्रम एवं समीक्षा दल के अध्यक्ष डा. वीएन शारदा, पूर्व निदेशक, भारतीय जल प्रबंधन संस्थान, भुवनेश्वर एवं भूतपूर्व सदस्य एएसआरबी ने सिंचाई जल की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए विभिन्न नदी, नहर एवं जलाशयों के संयुक्त अनुसंधान की महती जरूरत के बारे में बताया. उन्होंने आईडब्ल्यूएम पर एआईसीआरपी के उद्देश्यों को फिर से तैयार करने और कृषि पारिस्थितिकीय क्षेत्रों के आधार पर काम को सिंक्रनाइज करने का सुझाव दिया. सिंचाई जल प्रबंधन के सभी एआईसीआरपी केंद्रों को अपने कृषि पारिस्थितिकीय क्षेत्रों में समस्याओं की पहचान करनी चाहिए और फिर विषयों के आधार पर प्रयोग की योजना बनानी चाहिए. प्रयोगों या परियोजनाओं की योजना बनाते या तैयार करते समय कृषि पारिस्थितिकी क्षेत्र के संबंधित केंद्र की सिंचाई और जल संसाधनों के दशकवार आधारभूत डेटा की आवश्यकता होगी.

उन्होंने यह भी बताया कि प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता कम हो रही है, इसलिए उपलब्ध पानी का विवेकपूर्ण उपयोग और विभिन्न क्षेत्रों के बीच पानी का वितरण बहुत महत्वपूर्ण है.

डा. अरविन्द वर्मा, अनुसंधान निदेशक ने समीक्षा दल के सदस्यों एवं विभिन्न अनुसंधान केंद्रों से पधारे हुए परियोजना प्रभारियों एवं वैज्ञानिकों का स्वागत करते हुए कहा कि कृषि के लिए जल एक महत्वपूर्ण इनपुट है. इस के राजस्थान के परिपेक्ष में विवेकपूर्ण उपयोग के बारे में विस्तार से बताया. सिंचाई जल प्रबंधन (आईडब्ल्यूएम) परियोजना द्वारा तैयार किया गया वाटर बजट राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया.

अनुसंधान निदेशक डा. अरविंद वर्मा ने राजस्थान के परिपेक्ष में परियोजना की उपलब्धता को साझा किया एवं जल प्रबंधन पर किसान उपयोगी सिफारिशों की उपयोगिता एवं फसल जल उपलब्धता पर बताया. साथ ही उन्होंने बताया कि परियोजना के प्रभारी डा. पीके सिंह ने अनुसंधान आलेख को आस्ट्रेलिया में पढ़ा और डा. केके यादव ने आस्ट्रेलिया एवं वियतनाम में अनुसंधान आलेखों को पढ़ा.

परियोजना के वैज्ञानिक डा. मनजीत सिंह को परियोजना के अंतर्गत छाली गांव में एनिकट निर्माण के लिए उपराष्ट्रपति से सेगी अवार्ड प्राप्त हुआ.

डा. एसएन पांडा, सदस्य, क्यूआरटी ने अपने परिचयात्मक भाषण में कहा कि पानी की गुणवत्ता में गिरावट के साथ प्राकृतिक संसाधन तेजी से घट रहे हैं, जो आजकल एक गंभीर चिंता का विषय है. उन्होंने सुझाव दिया कि सतही जल और भूजल संसाधनों से संबंधित समस्याओं को अलगथलग करने के बजाय समग्रता में निबटाया जाना चाहिए.

उन्होंने जल संसाधन प्रबंधन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग और सैंसर के अनुप्रयोग पर भी जोर दिया. उन्होंने जोन और क्षेत्र के अनुसार समस्याओं की पहचान करने का भी सुझाव दिया.

डा. पीके सिंह, पूर्व अधिष्ठाता एवं परियोजना प्रभारी, सिंचाई जल प्रबंधन ने बताया कि यहां से विकसित प्लास्टिक लाइनिंग पौंड की अनुशंसा राष्ट्रपति द्वारा की गई और इस को देश के सभी कृषि विज्ञान केंद्रों पर लागू करने की सिफारिश की गई.

इस अवसर पर मध्य एवं पश्चिमी क्षेत्र में संचालित परियोजनाओं के परियोजना समन्वयकों ने अपनी अनुसंधान परियोजनाओं का संक्षिप्त प्रतिवेदन प्रस्तुत किया. कार्यक्रम के दौरान अतिथियों द्वारा भूमि जल एटलस एवं दो तकनीकी बुलैटिन का विमोचन किया गया. डा. केके यादव, विभागाध्यक्ष एवं परियोजना प्रभारी ने पधारे हुए अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों का धन्यवाद प्रेषित किया. कार्यक्रम का संचालन डा. एससी मीणा, आचार्य, मृदा विज्ञान विभाग ने किया.

भारतीय बीज विज्ञान संस्थान में बीज उत्पादन कार्यशाला

मऊ : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-भारतीय बीज विज्ञान संस्थान, कुशमौर, मऊ में 28 अगस्त से 30 अगस्त तक चले तीनदिवसीय ‘कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम’ का 30 अगस्त, 2024 को समापन समारोह आयोजित किया गया.

निदेशक डा. संजय कुमार के दिशानिर्देशन में चल रहा यह कार्यक्रम कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंध अभिकरण (ATMA), कैमूर, बिहार द्वारा प्रायोजित किया गया. कार्यक्रम के अंतिम दिन किसानों को वैज्ञानिक डा. विनेश बनोथ ने संकर बीज उत्पादन तकनीकी पर जानकारी दी.

संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र, बेंगलुरु से औनलाइन माध्यम द्वारा वैज्ञानिक डा. अंजिथा जौर्ज और डा. मंजनगौड़ा ने किसानों को बीज भंडारण, कीट प्रबंधन और मोटे अनाज की खेती से अवगत कराया. वहीं डा. गिरीश सी. एवं डा. शांताराजा ने भी गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन तकनीकों के विभिन्न विषयों पर अपने व्याख्यान दिए.

प्रधान वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार सिंह एवं वैज्ञानिक डा. आलोक कुमार ने किसानों के साथ उन की शंकाओं और सवालों पर समाधान देते हुए चर्चा की.

कार्यक्रम के समापन समारोह में किसानों से प्रशिक्षण के विषय में प्रतिक्रिया ली गई. निदेशक डा. संजय कुमार ने किसानों को आगे भी ऐसे कार्यक्रम में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहित किया. कार्यक्रम के समन्वयक वैज्ञानिक डा. आलोक कुमार ने कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम की रिपोर्ट प्रस्तुत की. किसानों को सफलतापूर्वक प्रशिक्षण पूरा करने के लिए सर्टिफिकेट प्रदान किया गया. कार्यक्रम के समन्वयक वैज्ञानिक डा. पवित्रा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन दे कर कार्यक्रम समाप्त हुआ.

कार्यक्रम के समन्वयक संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार सिंह ने बताया कि भारतीय बीज विज्ञान संस्थान, कुशमौर में गेहूं (HD 2967, DBW 187, HD 3249, DBW 303), सरसों (गिरिराज), मटर (IPFD 9-3), और चना (पूसा 3043) के उच्च गुणवत्ता बीज उपलब्ध हैं. उन्होंने किसानों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि किसान न केवल संस्थान से गुणवत्तायुक्त बीज ले सकते हैं, बल्कि बीज उत्पादन की प्रभावी तकनीकों के लिए भी संस्थान से संपर्क कर सकते हैं.

कृषि शिक्षा पर केंद्र सरकार का फोकस : शिवराज सिंह चौहान, कृषि मंत्री

 नई दिल्ली :  14 अगस्त, 2024. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कृषि और संबद्ध विज्ञान में उच्च शिक्षा के लिए आसियानभारत फैलोशिप लांच की. आईसीएआर कन्वेंशन सैंटर, राष्ट्रीय कृषि विज्ञान केंद्र परिसर, पूसा, नई दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर और भागीरथ चौधरी भी उपस्थित थे.

यहां केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आसियान देशों का जिक्र करते हुए कहा कि हम सब एक हैं और एकदूसरे के बिना हमारा काम नहीं चल सकता. कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. आज भी हमारी एक बड़ी आबादी खेती से ही रोजगार प्राप्त करती है. आज कृषि के सामने जलवायु परिवर्तन सहित कई चुनौतियां हैं. भारत ने सदैव कृषि को प्रधानता दी है.

उन्होंने आगे कहा कि समस्याओं के समाधान में कृषि शिक्षा की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. सरकार ने पिछले समय में कृषि शिक्षा पर बहुत ध्यान दिया है, फोकस किया है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद इस काम में गंभीरता से लगी हुई है. देश में 66 राज्य कृषि विश्वविद्यालय, 4 डीम्ड विश्वविद्यालय, 3 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय और कृषि संकाय वाले 4 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, जिन की देखरेख आईसीएआर द्वारा की जाती है.

उन्होंने कहा कि ये संस्थान स्नातक से ले कर डाक्टरेट तक कई तरह के पाठ्यक्रम प्रदान करते हैं, जिन में कृषि, बागबानी, पशुपालन, मत्स्यपालन, पशु चिकित्सा, कृषि इंजीनियरिंग आदि शामिल हैं. वे कृषि विज्ञान में महत्वपूर्ण शोध भी करते हैं और किसानों व हितधारकों को सेवाएं प्रदान करते हैं. उच्च कृषि शिक्षा के लिए छात्रों को आकर्षित करने व कृषि और संबद्ध विज्ञान विषयों में शिक्षण और अनुसंधान में शैक्षिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए, आईसीएआर यूजी, पीजी और पीएचडी के छात्रों को परिषद द्वारा विकसित निर्धारित मानदंडों के आधार पर विभिन्न छात्रवृत्ति प्रदान कर के सहायता करता है.

ये छात्रवृत्ति आईसीएआर कोटा सीटों, आईसीएआर प्रवेश परीक्षा द्वारा कृषि विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाले छात्रों को प्रदान की जाती हैं. आईसीएआर एयू प्रणाली की क्षमता और योग्यता को अब दुनियाभर में मान्यता मिल चुकी है. कई विकासशील देशों के छात्र भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में विकसित अनुसंधान और शिक्षण सुविधाओं से आकर्षित हो कर लाभान्वित हो रहे हैं.

उन्होंने बताया कि भारत सहित विकासशील देशों में निजी क्षेत्र में अधिक नौकरियां पैदा हो रही हैं, इसलिए विकासशील देशों के छात्रों में भारतीय कृषि को समझने के लिए भारत आ कर अध्ययन करने की रुचि बढ़ रही है. भारत में उन के उच्च अध्ययन का समर्थन करने के लिए, आईसीएआर द्वारा नेताजी सुभाष फैलोशिप, भारतअफ्रीका फैलोशिप, भारतअफगानिस्तान फैलोशिप, बिम्सटेक फैलोशिप जैसे कई कार्यक्रम/फैलोशिप शुरू किए गए हैं.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि आसियानभारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ और उस के बाद इस पर निर्मित ‘इंडोपैसिफिक विजन’ की आधारशिला है. भारत आसियान एकता, आसियान केंद्रीयता, इंडोपैसिफिक पर आसियान के दृष्टिकोण का समर्थन करता है. हमारे लिए आसियान के साथ राजनीतिक, आर्थिक, सुरक्षा सहयोग सर्वोच्च प्राथमिकता है. भारत आसियान और पूर्वी एशिया शिखर मंचों को जो प्राथमिकता देता है, वह पिछले साल हमारे जी-20 शिखर सम्मेलन की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री मोदी की जकार्ता यात्रा से साफ है. उन्होंने 12 सूत्रीय योजना की घोषणा की थी, जिस पर काफी हद तक अमल किया गया है.

मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत और आसियान के सदस्य देशों के बीच कृषि सहयोग की अपार संभावनाएं हैं, क्योंकि आसियान व भारत कृषि जलवायु क्षेत्रों के मामले में बहुत समानताएं साझा करते हैं. अब कृषि और वानिकी में आसियानभारत सहयोग के लिए कृषि व संबद्ध विज्ञान में उच्च शिक्षा के लिए आसियानभारत फैलोशिप आरंभ की जा रही है. फैलोशिप विशेष रूप से कृषि और संबद्ध विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में शक्तियों की पूर्ति और क्षमता का दोहन करने के लिए साझा हितों के नए और उभरते क्षेत्रों में स्नातकोत्तर कार्यक्रम के लिए है. इस से आसियान सदस्य देशों के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शोध आधारित शिक्षा प्राप्त करने में मदद मिलेगी, जिस से भारत और आसियान समुदाय एकदूसरे के करीब आएंगे व आसियान देशों से आने वाले छात्रों के बीच जानकारी के अंतर-सांस्कृतिक और अंतर्राष्ट्रीय आदानप्रदान के लिए मंच प्रदान होगा.

फैलोशिप से आसियान राष्ट्रीयता के छात्रों को आईसीएआर व कृषि विश्वविद्यालय प्रणालियों के तहत सर्वश्रेष्ठ भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में, जरूरत अनुसार, पहचाने गए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में कृषि व संबद्ध विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के लिए सहायता प्रदान की जाएगी.

इस के अलावा भाग लेने वाले संस्थानों के भारतीय संकाय सदस्यों की आसियान सदस्य देशों में परिचयात्मक यात्राओं के माध्यम से आसियान क्षमता निर्माण में सहायता प्रदान की जाएगी. इस से कृषि और संबद्ध विज्ञान क्षेत्र के विकास के लिए आसियान में विशेषज्ञ मानव संसाधन के एक पूल के निर्माण को बढ़ावा मिलेगा.
उन्होंने आगे कहा कि भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा पेश किए जाने वाले मास्टर्स प्रोग्राम छात्रों को अत्याधुनिक शोध से परिचित कराएंगे, उन्हें भविष्य के नवाचारों के लिए तैयार करेंगे. साथ ही, देश में दीर्घकालिक डिगरी कोर्स शोधकर्ताओं को लंबे समय तक जुड़े रहने में मदद कर सकता है और आसियान व भारत को कृषि से संबंधित मुद्दों को बेहतर तरीके से समझने में मदद कर सकता है. शैक्षणिक वर्ष 2024-25 से कृषि और संबद्ध विज्ञान में मास्टर डिगरी के लिए आसियान सदस्य देशों के छात्रों को 50 फैलोशिप (प्रति वर्ष 10) प्रदान की जाएंगी. परियोजना 5 साल के लिए आसियानभारत कोष के तहत वित्त पोषण के लिए मंजूर की गई है, जिस में फैलोशिप, प्रवेश शुल्क, रहने का खर्च व आकस्मिकता शामिल है.

तिलहनी फसलों (Oilseed Crops) पर अनुसंधान , बढ़ेगी पैदावार

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने 31 मई, 2024 को तिलहनी फसलों में अनुसंधान को गति प्रदान करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान, राजेंद्र नगर, हैदराबाद से सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर किए. इस अवसर पर डा. अजीत कुमार कर्नाटक, कुलपति, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने कहा कि हमारे राष्ट्र ने खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है, परंतु तिलहन व दलहन फसलों में आज भी हमें उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है. हमारी संपूर्ण जनसंख्या को तिलहन व दलहन आपूर्ति के लिए हमें इन का आयात करना पड़ता है.

डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक उपज देने वाली किस्मों की आवश्यकता बताई. साथ ही, उन्होंने कहा कि तिलहनी फसलों के पैकेज एंड प्रैक्टिस में सुधार अत्यंत आवश्यकता है एवं उच्च कोटि के अनुसंधान द्वारा तिलहनी फसलों के हर पहलू पर नई तकनीकी किसानों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए.

इस अवसर पर डा. रवि कुमार माथुर, निदेशक, भारतीय तिलहन अनुसंधान केंद्र ने कहा कि इस सहमतिपत्र के हस्ताक्षर के बाद दोनों ही संस्थाओं में तिलहनी फसलों पर संयुक्त रूप से अनुसंधान किए जा सकेंगे. दोनों संस्थाओं के विशेषज्ञ, वैज्ञानिक एवं विद्यार्थी उपलब्ध संसाधनों का लाभ उठा सकेंगे.

सहमतिपत्र के अनुसार, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के छात्र हैदराबाद जा कर तिलहनी फसलों पर उच्च कोटि का अनुसंधान वहां के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में कर सकेंगे. डा. अरविंद वर्मा, अनुसंधान निदेशक, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने इस अवसर पर सहमतिपत्र की विभिन्न तकनीकी पहलुओं पर चर्चा की. उन्होंने बताया कि भारतीय तिलहन अनुसंधान केंद्र मुख्य रूप से 6 तिलहनी फसलों जैसे अरंडी, अलसी, तिल, कुसुम, सूरजमुखी एवं नाइजर पर अनुसंधान कर रही है.

यह सभी फैसले जलवायु अनुकूलित फैसले हैं और वर्तमान में बढ़ती हुई स्वास्थ्य जागरूकता को देखते हुए इन सभी तिलहनी फसलों की मांग बहुत अधिक है, जिस से कि इन फसलों में अनुसंधान व उत्पादन बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं. ऐसे में इस सहमतिपत्र के अनुसार, दोनों संस्थान अनुसंधान, शिक्षण व प्रसार के क्षेत्र में संयुक्त रूप से काम कर राष्ट्र के तिलहन उत्पादन को बढ़ाने में अपना अतुलनीय योगदान दे सकते हैं. सहमतिपत्र पर हस्ताक्षर के समय विश्वविद्यालय की वरिष्ठ अधिकारी व परिषद के सदस्य भी उपस्थित रहे.

कृषि की जानकारी पंचायत स्तर तक किसानों को पहुंचे

नई दिल्ली: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) और कौमन सर्विसेज सैंटर (सीएससी) ईगवर्नेंस सर्विस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किया गया. डा. यूएस गौतम, उपमहानिदेशक (कृषि विस्तार), भाकृअनुप और सुबोध मिश्रा, वाइस प्रैसिडेंट, सीएससी-एसपीवी ने इस एएमयू पर हस्ताक्षर किए.

डा. यूएस गौतम ने कहा कि सीएससी सैंटर के माध्यम से जिला स्तर पर केवीके से प्राप्त सूचना को पंचायत स्तर तक किसानों को पहुंचाना है. उन्होंने कहा कि सीएससी के 5 लाख से ज्यादा सर्विस सैंटर हैं, जिस के माध्यम से टैली पशु चिकित्सा जैसे प्रोग्राम के साथसाथ प्लांट प्रोटैक्शन, हौर्टिकल्चर और होम साइंस एवं मेकैनाइजेशन जैसे क्षेत्र में टैलीकम्यूनिकेशन प्रोग्राम शुरू करने का परिषद का लक्ष्य है, जिस से ज्यादा से ज्यादा लोगों के साथ हमारा संपर्क बने.

उपमहानिदेशक डा. यूएस गौतम ने कहा कि इस एमओयू के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोग तकनीकी फायदा ले सकेंगे और इस का कृषि में उपयोग कर अपनी आय को बढ़ा सकेंगे. सीएसी सैंटर के माध्यम से कृषि से संबंधित सूचना, जैसे, खेत में कब पानी डालना है, कौन से खेत में कीटनाशक का कब छिड़काव करना है, ये सभी सूचना उचित समय पर किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा, जिस से कृषि क्षेत्र में क्रांति लाई जा सके.

उपमहानिदेशक डा. यूएस गौतम ने आगे यह भी बताया कि अभी 5 लाख सीएससी सैंटर हैं. यदि प्रत्येक केंद्र से सौ लोगों को भी जोड़ा जाए, तो एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी. भाकृअनुप का प्लान है कि देश के 11 करोड़ किसानों को केवीके से, किसान सारथी से और सीएससी से जोड़ा जाए, जिस से केवीके और आत्मा के काम को जमीनी स्तर तक पहुंचाया जा सके.

इस अवसर पर भाकृअनुप के सहायक महानिदेशक, निदेशक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे.

किसानों पर केंद्रित करें लाभ – अर्जुन मुंडा

नई दिल्ली: 29 जनवरी 2024. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और जनजातीय कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा ने कृषि भवन, नई दिल्ली में कृषि क्षेत्र में स्वैच्छिक कार्बन बाजार के लिए फ्रेमवर्क एवं कृषि वानिकी नर्सरी के एक्रेडिटेशन प्रोटोकाल का विमोचन किया. इस अवसर पर कृषि सचिव मनोज आहुजा, डेयर के सचिव व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक सहित केंद्र एवं राज्यों के मंत्रालयों व कृषि से संबद्ध विभिन्न संगठनों के वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित थे, वहीं अनेक हितधारक वर्चुअल भी जुड़े थे.

इस मौके पर केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने छोटेमझोले किसानों को कार्बन क्रेडिट का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित करने की दृष्टि से देश के कृषि क्षेत्र में स्वैच्छिक कार्बन बाजार (वीसीएम) को बढ़ावा देने का फ्रेमवर्क तैयार किया है. किसानों को कार्बन बाजार से परिचित कराने से उन्हें फायदा होने के साथ ही पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने में भी तेजी आएगी.

उन्होंने किसानों के हित में कार्बन बाजार को बढ़ावा देने के लिए केंद्र व राज्यों के संबंधित मंत्रालयों सहित अन्य संबद्ध संगठनों से सहयोग का अनुरोध किया. उन्होंने कहा कि सुदूरवर्ती क्षेत्रों के किसानों के साथ मिल कर उन के लिए सुविधाजनक ढंग से इस दिशा में काम किया जाना चाहिए व समाधान के साथ ही हमारे किसानों पर इस का लाभ केंद्रित करने की जरूरत है.

 

Farming

 

यह प्रथम सोपान है, जिस में कदम बढ़ाते हुए हम सब की सहभागिता सुनिश्चित करना चाहते हैं. ग्लोबल वार्मिंग जैसी वैश्विक चुनौतियां हम सब के सामने हैं, ऐसे में सावधानी से काम करते हुए आगे बढ़ना है. उन्होंने आईसीएआर से इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने व अच्छा काम अच्छे ढंग से करने को कहा.

मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि देश में कृषि क्षेत्र अर्थव्यवस्था व करोड़ों लोगों की आजीविका में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है. देश के कार्यबल का 54.6 फीसदी कृषि व संबद्ध क्षेत्रों की गतिविधियों में लगा हुआ है. जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 18.6 फीसदी है, वहीं 139.3 मिलियन हेक्टेयर, देश के कुल भौगोलिक में से बोया गया क्षेत्र है. इस महत्व के मद्देनजर सतत विकास के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मंत्रालय ने कई कदम उठाए हैं.

उन्होंने आगे कहा कि कृषि वानिकी नर्सरी के एक्रेडिटेशन प्रोटोकाल, देश में कृषि वानिकी को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर रोपण सामग्री के उत्पादन और प्रमाणीकरण के लिए संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करेंगे.

उन्होंने सभी हितधारकों से कहा कि वे उसे अपनाएं, ताकि गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री से सुनिश्चित रिटर्न मिल सके व राष्ट्रीय कृषि वानिकी नीति के उद्देश्य व लक्ष्य प्राप्त किए जा सकें. साथ ही, प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग करने का आग्रह किया.