खरीफ (वर्षा ऋतु) में  प्याज की खेती

आमतौर पर प्याज की खेती रबी मौसम में की जाती है, पर खरीफ में भी प्याज का अच्छा उत्पादन किया जा सकता है, बशर्ते उचित प्रबंधन और खरीफ मौसम में उगाने वाली प्रजातियों का चयन सही तरीके से किया जाए

भूमि व खेत की तैयारी

प्याज की खेती बलुई दोमट भूमि व दोमट भूमि में की जाती है, जिस में कार्बनिक पदार्थों की पर्याप्त मात्रा हो. भूमि के चयन के साथसाथ खेत का चयन भी महत्त्वपूर्ण है.

प्याज की खेती ऐसे खेतों में ही की जाए, जिन में जल निकास की उचित सुविधा हो और वर्षा का पानी खेत में जमा न होने पाए.

भूमि की गहरी जुताई के बाद रोपाई करने के लिए 2-3 जताई कल्टीवेटर से कर के भुरभुरा बना लेना चाहिए.

खरीफ में उगाने वाली प्रजातियां

एग्रीफाउंड डार्क रैड : यह किस्म रोपाई के 90 से 110 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की औसत उपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है.

एन-53 : यह किस्म रोपाई के 110 से 120 दिन में तैयार होती है और 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन देती है.

अर्का निकेतन : यह किस्म 120 से 125 दिन बाद तैयार हो जाती है और तकरीबन 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार देती है.

अर्का कल्याण : यह रोपाई के 110 से 115 दिनों में तैयार होती है और 325 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार देती है.

पौध तैयार करने का समय व विधि

उक्त प्रजाति का चयन कर जुलाई के पहले हफ्ते तक नर्सरी की बोआई कर दें. देरी से बोआई करने पर उत्पादन प्रभावित होता है.

नर्सरी के लिए उपजाऊ, उपयुक्त जल निकास व सिंचाई की सुविधायुक्त भूमि का चयन करना चाहिए.

लगभग 3 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की पौध तैयार करने की जरूरत होती है. 3 मीटर लंबी और 1 मीटर चौड़ी व 15 सैंटीमीटर ऊंची नर्सरी बैड में 30 ग्राम बीज की बोआई करने से स्वस्थ पौध तैयार होती है. खरीफ  प्याज की नर्सरी बीज बोने से 45 से 50 दिन में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है.

खाद व उर्वरक

प्रति एकड़ क्षेत्रफल के लिए 100 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयारी के समय मिला देनी चाहिए. इस के अलावा 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 किलोग्राम फास्फोरस एवं 25 किलोग्राम पोटाश के साथ 10 किलोग्राम सल्फर बेंटोनाइट का प्रयोग करने से प्याज के बिल्व अच्छे आकार के बनते हैं.

नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा रोपाई से पहले और बाकी बची मात्रा को 2 बराबर भागों में बांट कर रोपाई के 30 और 45 दिन बाद टौप ड्रैसिंग के समय देनी चाहिए.

रोपण की दूरी

तैयार पौध की रोपाई लाइन से लाइन 15 सैंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 10 सैंटीमीटर पर करने से प्याज के बिल्वों का विकास अच्छा होता है.

खरपतवार पर नियंत्रण

खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए निकाईगुड़ाई सब से अच्छी विधा है. इस से भूमि में पोलापन आता है, जिस से प्याज के बिल्व बड़े आकार में बनते हैं.

खरपतवारनाशी के रूप में रोपाई के 2 से 3 दिन बाद तक पेंडीमैथलीन 3.3 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी या औक्सीफ्लोरफेन 250 मिलीलिटर मात्रा 200 लिटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ छिड़काव करने से खरपतवारों पर नियंत्रण होता है.

आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, बेलीपार, गोरखपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. एसपी सिंह के अनुसार, खरीफ (वर्षा) ऋतु में प्याज की खेती करने से अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है, क्योंकि खरीफ में प्याज की रोपाई अगस्त महीने में करते हैं, तो यह नवंबरदिसंबर महीने में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है.

लहसुन की खेती में कीटरोग रोकथाम

लहसुन की खेती में कीट व रोगों की रोकथाम कर अच्छा मुनाफा लिया जा सकता है. लहसुन जड़ वाली फसल है, इसलिए खासकर ध्यान रखें कि हमारे खेत की मिट्टी रोगरहित हो. अगर फिर भी पौधों में कीट व रोगों का प्रकोप दिखाई दे, तो समय रहते उन का उपचार करें.

लहसुन के खास कीट

माहू : इस के निम्फ और वयस्क दोनों ही पौधों से रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां किनारों से मुड़ जाती हैं. कीट की पंख वाली जाति लहसुन में वाइरसजनित रोग भी फैलाती है. ये चिपचिपा मधुरस पदार्थ अपने शरीर के बाहर निकालते हैं, जिस से पत्तियों के ऊपर काली फफूंद पनपती देखी जा सकती है, जिस से पौधों के भोजन बनाने की क्रिया पर असर पड़ता है.

रोकथाम : माहू का प्रकोप होने पर पीले चिपचिपे ट्रैप का इस्तेमाल करें, जिस से माहू ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं. परभक्षी कौक्सीनेलिड्स या सिरफिड या क्राइसोपरला कार्निया को एकत्र कर 50,000-1,00,000 अंडे या सूंड़ी प्रति हेक्टेयर की दर से छोडे़ं. जरूरतानुसार डाईमिथोएट 30 ईसी या मैटासिस्टौक्स 25 ईसी 1.25-2.0 मिलीलिटर प्रति लिटर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

लहसुन का मैगट : मैगट पौधे के तने व शल्क कंद में घुस कर नुकसान पहुंचाते हैं. बड़े शल्क कंदों में 8 से 10 मैगट एकसाथ घुस कर उसे खोखला बना देते हैं.

रोकथाम: शुरुआत में रोगी खेत पर काटाप हाइड्रोक्लोराइड 4जी की 10 किलोग्राम मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में बिखेर कर सिंचाई कर दें. बढ़ते हुए पौधों पर मिथोमिल 40 एसपी की 1.0 किलोग्राम या ट्राईजोफास 40 ईसी की 750 मिलीलिटर मात्रा को 500-600 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने पर नए निकले हुए मैगट मर जाते हैं.

थ्रिप्स : इस कीट का हमला तापमान के बढ़ने के साथसाथ होता है व  मार्च महीने में इस का हमला ज्यादा दिखाई देता है. यह कीट पत्तियों से रस चूसता है, जिस से पत्तियां कमजोर हो जाती हैं और रोगी जगह पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं, जिस के कारण पत्तियां मुड़ जाती हैं.

रोकथाम : लहसुन की कीट रोधी प्रजातियां उगानी चाहिए. कीट के ज्यादा प्रकोप की दशा में 150 मिलीलिटर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल को 500-600 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

Garlicमाइट्स : इस कीट के प्रकोप से पत्ती का असर वाला भाग पीला हो जाता है और पत्तियां मुड़ी हुई निकलती हैं. वयस्क और शिशु कीट दोनों ही नई पत्तियों का रस चूस कर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं.

रोग के शुरू में सब से पहले पौधों की निचली पत्तियां तैलीय हो जाती हैं और बाद में पूरा पौधा तैलीय हो जाता है. रोगी पत्तियां छोटी हो जाती हैं और चमड़े की तरह दिखाई देती हैं. पत्तियां निचली तरफ से तांबे जैसी रंगत की दिखाई देती हैं. माइट का ज्यादा हमला होने से रोगी पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं और पूरा पौधा मुरझा कर सूख जाता है.

रोकथाम : रोगी पौधों के कंद व जड़ सहित उखाड़ कर नष्ट कर दें. घुलनशील गंधक 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या कैराथीन 500 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करें. मैटासिस्टौक्स छिड़कने से भी फायदा होता है.

लहसुन के रोग

विगलन : इस रोग का असर कंदों पर खेतों में या भंडारगृह दोनों में हो सकता है. खेत में रोगी पौधा पीला हो जाता है और जड़ें सड़ने लगती हैं.

कभीकभी रोग के लक्षण बाहर से नहीं दिखाई पड़ते हैं, लेकिन लहसुन की गर्दन के पास दबाने से कुछ शल्क मुलायम जान पड़ते हैं. बाद में ये शल्क भूरे रंग के हो जाते हैं. सूखे मौसम में शल्क धीरेधीरे सूख कर सिकुड़ जाते हैं, जिस की वजह से छिलका फट कर अलग हो जाता है.

रोकथाम : खेत को ट्राईकोडर्मा नामक जैव फफूंद की 2.5 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए. गरमी के महीनों में खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खुला छोड़ दें, जिस से कि कवक व अन्य रोग जनकों की मौत हो जाए. कंदों को बोआई से पहले 2.0 ग्राम कार्बंडाजिम का प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर उपचारित करें.

बैगनी धब्बा : इस रोग से लहसुन को काफी नुकसान होता है. इस रोग के लक्षण पत्तियों, कंदों पर उत्पन्न होते हैं, शुरू में छोटे धंसे हुए धब्बे बनते हैं, जो बाद में बड़े हो जाते हैं. धब्बे के बीच का भाग बैगनी रंग का हो जाता है. यदि आप उसे हाथों से छुएं तो काले रंग का चूर्ण हाथ में चिपका हुआ दिखाई देता है. रोगी पत्तियां झुलस कर गिर जाती हैं. रोगी पौधों से प्राप्त कंद सड़ने लगते हैं.

रोकथाम : 2-3 साल का सही फसल चक्र अपनाएं. रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैंकोजेब की 2.0 ग्राम मात्रा प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर 2 बार छिड़काव करें.

सफेद सड़न : इस बीमारी से कलियां सड़ने लगती हैं.

रोकथाम : जमीन को ट्राईकोडर्मा नामक जैव फफूंद की 2.5 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए. गरमी के महीनों में खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खुला छोड़ दें जिस से कि कवक व अन्य रोग जनकों की मौत हो जाए. कंदों को बोआई के पहले 2.0 ग्राम कार्बंडाजिम का प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर उपचारित करें.

कंद सड़न : इस बीमारी का हमला भंडारण में होता है.

रोकथाम : इस की रोकथाम के लिए कंद को 2 फीसदी बोरिक अम्ल से उपचारित कर के भंडारण करना चाहिए. बीज के लिए यदि कंद को रखना हो तो 0.1 फीसदी मरक्यूरिक क्लोराइड से उपचारित कर के रखें. खड़ी फसल में मैंकोजेब की 2.0 ग्राम मात्रा का प्रति लिटर पानी की दर से छिड़काव करें.

फुटान : नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल से यह बीमारी फैलती है. इस के अलावा ज्यादा पानी या ज्यादा दूरी पर रोपाई की वजह से फुटान ज्यादा होता है. इस बीमारी से लहसुन कच्ची दशा में कई छोटेछोटे फुटान देता है, जिस से कलियों का भोजन पदार्थ वानस्पतिक बढ़वार में इस्तेमाल होता है.

रोकथाम : लहसुन की रोपाई कम दूरी पर करें और नाइट्रोजन व सिंचाई का इस्तेमाल ज्यादा न करें. ऐसे रोगी पौधों को देखते ही पौलीथिन की थैली से ढक कर सावधानीपूर्वक उखाड़ कर मिट्टी में दबा दें.

बीजों को बोने से पहले वीटावैक्स 2.5 ग्राम या टेबूकोनाजोल 1.0 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम की दर से उपारित करें.

लहसुन की खेती और खास प्रजातियां

लहसुन कंद वाली मसाला फसल है. इस में एलसिन नामक तत्त्व पाया जाता है, जिस के कारण इस में एक खास गंध व तीखा स्वाद होता है. इस का इस्तेमाल गले और पेट संबंधी बीमारियों के अलावा हाई ब्लड प्रेशर, पेटदर्द, फेफड़े के रोगों, कैंसर, गठिया, नपुंसकता और खून की बीमारी दूर करने के लिए किया जाता है.

आजकल लहसुन का प्रसंस्करण यानी प्रोसैस कर के पाउडर, पेस्ट व चिप्स तैयार करने की तमाम इकाइयां काम कर रही हैं, जो प्रसंस्करण किए गए उत्पादों को दूसरे देशों में बेच कर अच्छा मुनाफा कमा रही हैं.

जलवायु : लहसुन को ठंडी जलवायु की जरूरत होती है. वैसे तो लहसुन के लिए गरमी और सर्दी दोनों ही मौसम मुनासिब होते हैं, लेकिन ज्यादा गरम और लंबे दिन इस के कंद बनने के लिए सही नहीं रहते हैं. छोटे दिन इस के कंद बनने के लिए अच्छे माने जाते हैं. इस की सफल खेती के लिए 29 से 35 डिगरी सेल्सियस तापमान मुनासिब होता है.

खेत की तैयारी : इस के लिए जल निकास वाली दोमट मिट्टी बढि़या रहती है. भारी मिट्टी में इस के कंदों की सही बढ़ोतरी नहीं हो पाती है. मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 ठीक रहता है. 2-3 बार जुताई कर के खेत को अच्छी तरह एकसार कर के क्यारियां व सिंचाई की नालियां बना लेनी चाहिए.

अन्य किस्में : नासिक लहसुन, अगेती कुआरी, हिसार स्थानीय, जामनगर लहसुन, पूना लहसुन, मदुरई पर्वतीय व मैदानी लहसुन, वीएलजी 7 आदि स्थानीय किस्में हैं.

बोआई का समय : लहसुन की बोआई का सही समय अक्तूबर से नवंबर माह के बीच होता है.

बीज व बोआई : लहसुन की बोआई के लिए 5 से 6 क्विंटल कलियां बीजों की प्रति हेक्टेयर जरूरत होती है. बोआई से पहले कलियों को मैंकोजेब और कार्बंडाजिम दवा के घोल से उपचारित करना चाहिए.

लहसुन की बोआई कूंड़ों में बिखेर कर या डिबलिंग तरीके से की जाती है. कलियों को 5 से 7 सैंटीमीटर की गहराई में गाड़ कर ऊपर से हलकी मिट्टी से ढक देना चाहिए. बोते समय कलियों के पतले हिस्से को ऊपर ही रखते हैं. बीज से बीज की दूरी 8 सैंटीमीटर व कतार से कतार की दूरी 15 सैंटीमीटर रखना ठीक होता है. बड़े क्षेत्र में फसल बोने के लिए गार्लिक प्लांटर का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

खाद व उर्वरक : सामान्य तौर पर प्रति हेक्टेयर 20 से 25 टन सड़ी गोबर की खाद या कंपोस्ट या 5 से 8 टन वर्मी कंपोस्ट, 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस व 50 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है. इस के अलावा 175 किलोग्राम यूरिया, 109 किलोग्राम डाई अमोनियम फास्फेट व 83 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश की जरूरत होती है. गोबर की खाद, डीएपी व पोटाश की पूरी मात्रा और यूरिया की आधी मात्रा खेत की आखिरी तैयारी के समय मिला देनी चाहिए. बाकी बची यूरिया की मात्रा  खड़ी फसल में 30 से 40 दिनों बाद छिड़काव के साथ देनी चाहिए.

सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की मात्रा का इस्तेमाल करने से उपज में बढ़ोतरी होती है. 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर 3 साल में 1 बार इस्तेमाल करना चाहिए.

सिंचाई व जल निकास : बोआई के तुरंत बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. वानस्पतिक बढ़ोतरी के समय 7 से 8 दिनों के अंतर पर और फसल पकने के समय 10 से 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए, पर खेत में पानी नहीं भरने देना चाहिए.

निराईगुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण : जड़ों में हवा की सही मात्रा के लिए खुरपी या कुदाली द्वारा बोने के 25 से 30 दिनों बाद पहली निराईगुड़ाई व 45 से 50 दिनों बाद दूसरी निराईगुड़ाई करनी चाहिए.

Lahsun
Lahsun

खुदाई व लहसुन का सुखाना : जिस समय पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाएं और पौधा सूखने लग जाए तो सिंचाई बंद कर के खुदाई करनी चाहिए. इस के बाद गांठों को 3 से 4 दिनों तक छाया में सुखा लेते हैं. फिर 2 सैंटीमीटर छोड़ कर पत्तियों को कंदों से अलग कर लेते हैं. कंदों को भंडारण में पतली तह में रखते हैं. ध्यान रखें कि फर्श पर नमी न हो.

बढ़ोतरी नियामक का प्रयोग : लहसुन की उपज ज्यादा हो, इसलिए 0.05 मिलीलिटर प्लैनोफिक्स या 500 मिग्रा साइकोसिल या 0.05 मिलीलिटर इथेफान प्रति लिटर पानी में घोल बना कर बोआई के 60 से 90 दिनों बाद छिड़काव करना सही रहता है.

कंद की खुदाई से 2 हफ्ते पहले 3 ग्राम मैलिक हाइड्रोजाइड प्रति लिटर पानी का छिड़काव करने से भंडारण के समय अंकुरण नहीं होता है व कंद 10 महीने तक बिना नुकसान के रखे जा सकते हैं.

भंडारण : अच्छी तरह से सुखाए गए लहसुन को उन की छंटाई कर के हवादार घरों में रख सकते हैं. 5 से 6 महीने भंडारण से 15 से 20 फीसदी तक का नुकसान मुख्य रूप से सूखने से होता है. पत्तियां सहित बंडल बना कर रखने से कम नुकसान होता है.

सौंफ की खेती

भारत में सौंफ मसाले की एक खास फसल है. सौंफ का इस्तेमाल औषधि के रूप में भी किया जाता है. भारत में सौंफ की खेती खासतौर से राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और बिहार में होती है. यह सर्दी के मौसम में बोई जाने वाली फसल है. लेकिन जब सौंफ में फूल आने लगते हैं, तो उस समय पाले का असर इस पर पड़ता है. इसलिए इस का खास ध्यान रखना चाहिए. हलके ठंडे मौसम खासतौर से जनवरी से मार्च तक का समय इस की उपज व गुणवत्ता के लिए बहुत फायदेमंद रहता है. फूल आते समय लंबे समय तक बदली या अधिक नमी से बीमारियों को बढ़ावा मिलता है.

उन्नत किस्में :

आरएफ 143, आरएफ 125, आरएफ 125, आरएफ 101, आरएफ 205, जीएफ 11, जीएफ 1, जीएफ 2, पीएफ 35, एएफ 1.

खेत की तैयारी : सौंफ की खेती बलुई मिट्टी को छोड़ कर सभी प्रकार की जमीन में, जिस में जीवांश सही मात्रा में हों, की जा सकती है. लेकिन अच्छी पैदावार के लिए जल निकास की सुविधा वाली, दोमट व काली मिट्टी ठीक होती है. भारी व चिकनी मिट्टी के बजाय दोमट मिट्टी ज्यादा अच्छी रहती है.

खाद व उर्वरक : फसल की अच्छी बढ़वार के लिए जमीन में सही मात्रा में जैविक पदार्थ का होना जरूरी है. यदि इस की सही मात्रा जमीन में न हो, तो 10 से 15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर खेत की तैयारी से पहले डाल देनी चाहिए. इस के अलावा 90 किलोग्राम नाइट्रोजन व 40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए. 30 किलोग्राम नाइट्रोजन व फास्फोरस की पूरी मात्रा खेत की आखिरी जुताई के साथ डाल देनी चाहिए. बाकी बची नाइट्रोजन को 2 भागों में बांट कर 30 किलोग्राम बोआई के 45 दिन बाद व 30 किलोग्राम फूल आने के समय फसल की सिंचाई के साथ दें.

बीज की मात्रा व बोआई : सौंफ के लिए 8-10 किलोग्राम अच्छा बीज प्रति हेक्टेयर बोआई के लिए सही होता है. ज्यादातर बोआई छिटकवां विधि से की जाती है.

सौंफ की बोआई रोपण विधि द्वारा या सीधे कतारों में भी की जाती है. सीधी बोआई के लिए 8 से 10 किलोग्राम व रोपण विधि से करने पर 3 से 4 किलोग्राम बीज की प्रति हेक्टेयर जरूरत होती है.

रोपण विधि से बोआई के लिए जुलाईअगस्त में 100 वर्गमीटर क्षेत्र में पौध शैय्या लगाई जाती है और सितंबर में रोपाई की जाती है. इस की बोआई बीच सितंबर से बीच अक्तूबर तक की जाती है. बोआई 40 से 50 सैंटीमीटर के फासले पर कतारों में हल के पीछे कूंड़ों में 2-3 सैंटीमीटर की गहराई पर करें. पौधों को पौधशाला में सावधानी से उठाएं, जिस से जड़ों को नुकसान नहीं हो. रोपाई दोपहर के बाद गरमी कम होने पर करें और उस के तुरंत बाद सिंचाई करें. सीधी बोआई में बोआई के 7 से 8 दिन बाद दूसरी हलकी सिंचाई करें, जिस से अंकुरण पूरा हो जाए.

बोआई का समय : इस की बोआई का सही समय 15 सितंबर के आसपास होता है.

सिंचाई : सौंफ को ज्यादा सिंचाई की जरूरत होती है. बोआई के समय खेत में नमी कम हो तो बोआई के 3-4 दिन बाद हलकी सिंचाई करनी चाहिए, जिस से बीज जम जाएं. सिंचाई करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि पानी का बहाव तेज न हो, नहीं तो बीज बह कर किनारों पर इकट्ठा हो जाएंगे.

दूसरी सिंचाई बोआई के 12 से 15 दिन बाद करनी चाहिए, जिस से बीजों का अंकुरण पूरा हो जाए. इस के बाद सर्दियों में 15 से 20 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए. फूल आने के बाद फसल को पानी की कमी नहीं होनी चाहिए.

खरपतवार पर नियंत्रण : सौंफ में शुरुआती बढ़वार धीमी होती है और लाइन व पौधों की दूरी ज्यादा होने से खरपतवारों का असर ज्यादा होता है. इस में खरपतवार नियंत्रण के लिए पहली निराई व गुड़ाई 30 दिन बाद जब पौधे 5 सैंटीमीटर लंबे हो जाएं तब करें. इस समय लाइनों के अंदर पौधे से पौधे के बीच की दूरी भी 20 सैंटीमीटर कर दें. इस के बाद जरूरत के मुताबिक 1 से 2 बार निराई व गुड़ाई कर के फसल को पूरी तरह से खरपतवारों से दूर रख सकते हैं. पेंडीमिथेलीन 1.0 किलोग्राम को 600 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से सौंफ की बोआई के बाद, मगर उगने से पहले छिड़काव कर के इसे खरपतवारों से दूर रखा जा सकता है.

खास कीट : फसल पर एफिड (माहू), थ्रिप्स, पर्णजीवी, मक्खी व माइट्स (बरूथी) वगैरह कीट खासतौर से हमला करते हैं.

एफिड : इस के प्रौढ़ व बच्चे पौधों की मुलायम पत्तियों व फूलों से रस चूसते हैं, साथ ही मधुरस छोड़ने से पौधों पर काली फफूंद जम जाती है. कीट लगे पौधे कमजोर हो जाते हैं. दाने सिकुड़ जाने से उपज और गुणवत्ता में कमी हो जाती है.

काक्सीनेला परभक्षी कीट इस की संख्या को कुछ हद तक नियंत्रित रखते हैं. जरूरत होने पर इन मित्र कीटों (परभक्षी व मधुमक्खियां) की सुरक्षा रखते हुए केवल सिफारिश की गई दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए. निगरानी के लिए चिपचिपे पाश काम में लें. काक्सीनेला न मिलने पर नीम से बने (निंबोली अर्क 5 फीसदी या तेल ईसी 0.03) कीटनाशी का छिड़काव कीट के लगने पर करें.

माइट्स (बरूथी) : यह भी बहुत ही छोटा जीव है, जो पत्तियों पर घूम कर रस चूसता है, जिस से पौधे पीले पड़ जाते हैं और दाने कम व सिकुड़े हुए बनते हैं. इस से गुणवत्ता व उपज की कमी हो जाती है.

थ्रिप्स (पर्णजीवी) : यह बहुत ही छोटा कीट है, जो कोमल व नई पत्तियों से रस चूसता है. कीट लगी पत्तियों पर धब्बे बन जाते हैं व पत्तियां पीली पड़ जाती हैं.

सौंफ मधुमक्खियों द्वारा परागित फसल है. इस की फसल पर पेस्टीसाइड्स का इस्तेमाल सोचसमझ कर करना चाहिए. सुरक्षित (जैविक, पादपजनित) कीटनाशी दवाओं का इस्तेमाल केवल जरूरत के मुताबिक ही किया जाना चाहिए.

सौंफ के रोग

छाछिया (पाउडरी मिल्ड्यू) : यह रोग इरीसाईफी पोलीगोनी नामक कवक से होता है. इस रोग में पत्तियों, टहनियों पर सफेद चूर्ण दिखाई देता है, जो बाद में पूरे पौधे पर फैल जाता है. इस के अधिक फैलने से उत्पादन व गुणवत्ता पर असर पड़ता है.

रोकथाम : गंधक चूर्ण का 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करें या घुलनशील गंधक का 2 ग्राम प्रति लिटर पानी या केराथेन एलसी का 1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें. अगर जरूरत महसूस करें तो 15 दिन बाद इस का दोबारा छिड़काव करें.

जड़ व तना गलन : यह रोग स्क्लेरोटिनिया स्क्लेरोटियोरम व फ्यूजेरियम सोलेनाई नामक कवक से होता है. इस रोग से तना नीचे मुलायम हो जाता है व जड़ गल जाती है. जड़ों पर छोटेबड़े काले रंग के स्कलेरोशिया दिखाई देते हैं.

रोकथाम : बोआई से पहले बीजों को कार्बंडाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार कर के बोआई करनी चाहिए या केप्टान 2 ग्राम प्रति लिटर पानी के हिसाब से जमीन उपचारित करनी चाहिए. ट्राइकोडर्मा विरिडी मित्र फफूंद 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद में मिला कर बोआई से पहले मिट्टी में देने से रोग में कमी होती है.

झुलसा (ब्लाइट) : सौंफ की फसल में झुलसा रोग रेमुलेरिया व आल्टरनेरिया नाम के कवक से होता है. धीरेधीरे ये काले रंग में बदल जाते हैं. पत्तियों से तने व बीजों पर इस का प्रकोप बढ़ता है. संक्रमण के बाद यदि नमी लगातार बनी रहे तो रोग बढ़ जाता है.

रोग लगे पौधों पर या तो बीज नहीं बनते या बहुत कम और छोटे आकार के बनते हैं. बीजों की गुणवत्ता घट जाती है. अगर नियंत्रण न रखा जाए तो फसल को बहुत नुकसान होता है.

रोकथाम : स्वस्थ बीजों को बोने के काम में लीजिए. फसल में ज्यादा सिंचाई न करें. इस रोग के लगने की शुरुआत में फसल पर मेंकोजेब 0.2 फीसदी के घोल का छिड़काव करें. जरूरत के हिसाब से 10 से 15 दिनों बाद छिड़काव दोहराएं. झुलसा रोग रोधी आरएफ 15, आरएफ 18, आरएफ 21, आरएफ 31, जीएफ 2 सौंफ बोएं.

कटाई : सौंफ के दाने गुच्छों में आते हैं. एक ही पौधे के सब गुच्छे एकसाथ नहीं पकते हैं. लिहाजा, कटाई एकसाथ नहीं हो सकती है. जैसे ही दानों का रंग हरे से पीला होने लगे तो गुच्छों को तोड़ लेना चाहिए. सौंफ की अच्छी पैदावार के लिए फसल को ज्यादा पक कर पीला नहीं पड़ने देना चाहिए. सूखते समय बारबार पलटते रहना चाहिए वरना फफूंद लग सकती है.

अच्छी किस्म की चबाने (खाने) में काम आने वाली सौंफ पैदा करने के लिए, जब दाने का आकार पूरे विकसित दानों की तुलना में आधा होता है, तब छत्रकों की कटाई कर के साफ जगह पर छाया में फैला कर सुखाना चाहिए. इस विधि से लखनऊ 1 किस्म की सौंफ प्राप्त होती है. बोआई के लिए बीज प्राप्त करने के लिए मुख्य छत्रकों के दाने जब पूरी तरह पक कर पीले पड़ने लगें तभी काटना चाहिए.

उपज : सौंफ की अच्छी तरह से खेती की जाए, तो 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पूरी तरह विकसित व हरे दाने वाली सौंफ की उपज हासिल की जा सकती है. साधारण सौंफ की 5 से 7.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज हासिल की जा सकती है.

मिर्च की फसल में लगने वाले कीट और रोग

मिर्च एक ऐसा मसाला है, जो लोगों की जिंदगी को तीखा और चटपटा बना देता है. यह हर घर की रसोई में पाई जाती है, इसलिए दुनियाभर में इस की मांग बनी रहती है. बहुत से किसान इस की खेतीबारी से रोजीरोटी कमाते हैं. पर इस में कुछ कीट और रोग ऐसे लग जाते हैं, जो फसल को नुकसान पहुंचाते हैं. आइए, जानते हैं उन के बारे में :

पीली माइट कीट

यह पीले रंग की छोटी माइट है. यह आकार में इतनी छोटी होती है, जो आसानी से दिखाई नहीं देती है. इस का प्रकोप होने पर परर्ण कुंचन (लीफ कर्ल) की तरह पत्तों में सिकुड़न आ जाती है.

इस कीट के शिशु और प्रौण दोनों ही पत्तियों का रस चूस कर हानि पहुंचाते हैं. इस का अत्यधिक प्रकोप होने पर पौधों की बढ़वार एकदम रुक जाती है और फलनेफूलने की क्षमता अकसर समाप्त हो जाती है.

मिर्च का रसाद कीट (थ्रिप्स)

प्रौण कीट 1 मिलीमीटर से कम लंबा, कोमल और हलके पीले रंग का होता है. इस के पंख झालरदार होते  हैं. ये अल्पायु कीट पंखरहित होते हैं. ये सैकड़ों की संख्या में पौधों की पत्तियों की निचली सतह पर छिपे रहते हैं और कभीकभी ऊपरी सतह पर भी पाए जाते हैं.

शिशु और प्रौण कीट मार्च से नवंबर माह तक मिर्च की पत्तियों का रस चूस कर हानि पहुंचाते हैं, जिस से पत्तियां मुड़ जाती हैं और ऊपरी भाग सूख जाता है.

प्रबंधन : यदि फसल में दोनों कीट नहीं आए हैं, तो नीम तेल 1500 पीपीएम की 3 मिलीलिटर दवा प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 15-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करते रहें.

यदि दोनों कीट आ गए हैं, तो इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 10 मिलीलिटर दवा प्रति 15 लिटर पानी में घोल बना कर तुरंत छिड़काव करें.

आर्द्र गलन रोग

अंकुरण का कम होना, बीज का अंकुरण से पहले गल जाना, नर्सरी में अंकुरण के बाद पौधा सड़ कर गिरने लगता है आदि इस बीमारी की प्रमुख लक्षण हैं.

प्रबंधन : बीज का उपचार बोने से पहले थीरम 2.0 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से बीज को शोधित कर के बोना चाहिए.

जमाव होने के बाद 2 ग्राम कौपर औक्सीक्लोराइड को प्रति लिटर पानी में घोल बना कर नर्सरी में पौधों पर छिड़काव करना चाहिए.

शीर्ष मरण रोग (डाई बैक) या फल सड़न

इस में पौधों के शीर्ष का भाग और शाखाएं ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती हैं. ऐसे पौधों के फल सड़ने लगते हैं और पौधे बौने रह कर सूख जाते हैं.

प्रबंधन : बीज को कार्बंडाजिम के 2.5 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोएं.

खड़ी फसल में लक्षण दिखाई पड़ते ही मैंकोजेब एम 45 की 3 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी में घोल बना कर तुरंत छिड़काव करें.

बुकनी रोग

इस में पत्तियों के निचले भाग पर सफेद चूर्ण जम जाता है, जिस से प्रभावित पौधे मुरझाने  लगते हैं.

प्रबंधन : इस रोग की रोकथाम के लिए रोग रोधी किस्म का चयन करें. रोग का प्रकोप होने पर सल्फैक्स 3 ग्राम को प्रति लिटर पानी में घोल कर 10 दिन के अंतराल पर 2 से 3 बार छिड़काव करें.

गुरुचा या पत्ती मरोड़ रोग

यह बीमारी विषाणुजनित होती है, जो सफेद मक्खी द्वारा एक पौधे से दूसरे पौधे पर पहुंचाई जाती है.

इस रोग के प्रकोप से पत्तियां सिकुड़ कर कुरूप हो जाती हैं. प्रभावित पौधे में फल कम या नहीं लगता है.

प्रबंधन : इस रोग रोधी पौधों को उखाड़ दें और गड्ढा खोद कर इन बीमार पौधों को मिट्टी में दबा देना चाहिए.

सफेद मक्खी पर अच्छी तरह से नियंत्रण पाने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 10 मिलीलिटर दवा प्रति 15 लिटर पानी में घोल बना कर तुरंत छिड़काव करें.

अधिक जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद के वैज्ञानिकों से संपर्क करें.

अदरक की खेती

आमतौर पर अदरक की खेती  सभी प्रकार की जमीन में  की जा सकती है. लेकिन उचित जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी, जिस में जीवांश की अच्छी मात्रा हो, अदरक की खेती के लिए उपयुक्त होती है. इस की अच्छी पैदावार के लिए जमीन का पीएच मान 5.0 से 6.0 के बीच होना चाहिए.

खेत की तैयारी

खेती योग्य भूमि तैयार करने के लिए 1-2 जुताई मिट्टी पलटने और 2-3 जुताई देशी हल से करनी चाहिए. मिट्टी को अच्छी तरह से समतल व भुरभुरा कर लेना चाहिए.

प्रमुख प्रजाति

सुप्रभा, सुरभि, रजाता, हिमगिरि, महिमा आदि खास प्रजाति हैं. इस के अलावा किसान लोकल प्रजाति का भी चयन खेती हेतु प्रयोग करते हैं.

बोआई का समय

अदरक की बोआई का सब से उचित समय 20 अप्रैल से 25 मई तक अच्छा माना जाता है.

बोआई के पहले डाईथेन एम 45 के 0.30 फीसदी के घोल से इस के कंदों को अच्छी तरह से उपचारित कर लेना चाहिए और छाया में सुखा लेना चाहिए.

बीज की मात्रा

अदरक की बोआई के लिए कंदों के आकार के अनुसार 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है.

बोने की नाली विधि

इस विधि का प्रयोग सभी प्रकार की जमीनों में की जा सकती है. पहले से तैयार खेत में 60 या 40 सैंटीमीटर की दूरी पर मेंड़ या नाली को हल या फावड़े से तैयार किया जाता है और बीजों को 5 से 6 सैंटीमीटर की गहराई में बोया जाता है व ऊपर से मिट्टी चढ़ा दी जाती है.

तैयार पैदावार

अदरक की फसल की अच्छी तरह सिंचाईं, निराई और देखभाल समयसमय पर की जाए, तो 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार मिलती है.

हलदी की खेती, फायदे का सौदा

हलदी का इस्तेमाल काफी समय से अलगअलग तरीके से किया जाता रहा हैं, क्योंकि इस में रंग, महक और की औषधीय गुण पाए जाते हैं. ‘प्रसार्ड ट्रस्ट’, मल्हनी, भाटपार, रानी देवरिया के डायरैक्टर प्रो. रवि प्रकाश मौर्य (रिटायर्ड सीनियर कृषि वैज्ञानिक) ने बताया कि भोजन में खुशबू और रंग लाने के अलावा हलदी का मक्खन, पनीर, अचार आदि खाने के सामान में इस्तेमाल करते हैं. यह भूख बढ़ाने वाली और उत्तम पाचक में सहायक होती है. इस का रंगाई के काम और कई दवाओं में भी इस्तेमाल होता है. कौस्मैटिक का सामान बनाने में भी इस का इस्तेमाल किया जाता है.

परिवार के लिए जरूरी

एक सामान्य परिवार को रोजाना 15-20 ग्राम हलदी की जरूरत रहती है. इस तरह से महीने मे 600 ग्राम और साल में 7 किलोग्राम सूखी हलदी की जरूरत होती है.

मिलावटी हलदी की पहचान

बाजार में ज्यादातर मिलावटी हलदी आ रही है, जिस में पीला रंग मिला रहता हैेै. अगर हलदी का दाग कपडे़ पर लगता है, तो साबुन से धोने पर उस का रंग लाल हो जाता है और धूप में डालने पर दाग हट जाता है. अगर हलदी में मिलावट है तो दाग बना रहता है.

मिलावट से बचने के लिए यहां कम क्षेत्रफल एक बिस्वा/कट्ठा (125 वर्गमीटर) जगह में हलदी की खेती करने की तकनीकी जानकारी दी जा रही है.

खेत की मिट्टी

हलदी की खेती करने के लिए दोमट मिट्टी, जिस में जीवांश की मात्रा ज्यादा हो, बहुत बढ़िया रहती है.

हलदी की मुख्य प्रजातियां ,अवधि और उत्पादकता

राजेंद्र सोनिया, सुवर्णा, सुगंधा, नरेंद्र हलदी -1, 2, 3, 98 और नरेंद्र सरयू आदि मुख्य किस्में हैं, जो 200 से 270 दिन में पक कर तैयार होती हैं.
इन की उत्पादन क्षमता 250 से 300 किलोग्राम प्रति बिस्वा है और सूखने पर 25 फीसदी हलदी मिलती है.

बोआई का समय और खेत की तैयारी

हलदी की रोपाई का उचित समय मध्य मई से जून का महीना होता है. बोआई करने से पहले खेत की 4-5 जुताई कर के उसे पाटा लगा कर मिट्टी को भुरभुरा व समतल कर लेना चाहिए.

बीज की मात्रा और बोआई की विधि

25 से 30 किलोग्राम प्रकंद प्रति बिस्वा लगता है. हर प्रकंद में कम से कम 2-3 आंख होनी चाहिए. 5 सैंटीमीटर गहरी नाली में 30 सैंटीमीटर कतार से कतार और 20 सैंटीमीटर प्रकंद की दूरी रख कर रोपाई करें.

सिंचाई

हलदी की फसल में रोपाई के 20-25 दिन बाद हलकी सिंचाई की जरूरत पड़ती है. गरमी में 7 दिन के अंतर पर और सर्दी में 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए.

खाद और उर्वरक

मृदा परीक्षण के आधार पर खाद और उर्वरक का प्रयोग करें. 250 किलोग्राम कंपोस्ट या गोबर की खूब सड़ी हुई खाद प्रति बिस्वा की दर से जमीन में मिला देनी चाहिए. रासायनिक उर्वरक सिंगल सुपर फास्फेट 6.25 किलोग्राम और म्यूरेट औफ पोटाश 1.06 किलोग्राम रोपाई के समय जमीन में मिला दें. यूरिया की 1.37 किलोग्राम मात्रा 2 बार रोपाई के 45 और 90 दिन बाद मिट्टी चढ़ाते समय डालें.

मल्चिंग और अंत:फसल

हलदी की रोपाई के बाद हरी पत्तियां और सूखी घास क्यारियों के ऊपर फैला देनी चाहिए. अंतःफसल के रूप में बगीचों में आम, कटहल, अमरूद लगा कर ऐक्स्ट्रा आमदनी हासिल की जा सकती है.

हलदी की खुदाई

हलदी फसल की खुदाई 7 से 10 माह में की जाती है. यह सब बोई गई प्रजाति पर निर्भर करता है. आमतौर पर जनवरी से मार्च के मध्य तब खुदाई की जाती है, जब पत्तियां पीली पड़ जाएं और ऊपर से सूखना शुरू कर दें.

खुदाई के पहले खेत में घूम कर निरीक्षण कर लें कि कौनकौन से पौधे बीमार हैं. उन की निशानदेही कर अलग से खुदाई कर के अलग कर दें और बाकी को अलग अगले साल के बीज हेतु रखें. खुदाई कर हलदी छाया में सुखा कर मिट्टी आदि साफ कर लें.