किसान ने बनाई गन्ना की कलम (Sugarcane Bud) बनाने की मशीन

जब जैसी जरूरतें होती हैं, किसान उसी ढंग से ये चीजें जुटा लेते हैं. गन्ना फसल को खेत में लगाने के लिए ज्यादा लागत आती है और हजारों रुपए खर्च हो जाते हैं. ऐसे में छोटे किसानों का रुझान गन्ना उत्पादन की तरफ नहीं रहता.

‘आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है’ इस कहावत को नरसिंहपुर जिले के एक छोटे से किसान रोशनलाल विश्वकर्मा ने गन्ने की कलम बनाने की मशीन बना कर सच साबित कर दिया.

सकारात्मक सोच, मेहनत व लगन की बदौलत ही मध्य प्रदेश के जिला नरसिंहपुर के गांव मेख के 11वीं जमात पास 50 साला किसान रोशनलाल विश्वकर्मा ने खेती के क्षेत्र में किए गए अपने आविष्कारों से न केवल अपना बल्कि समूचे जिले का नाम रोशन कर दिया है.

रोशनलाल बताते हैं कि मेरे मन में यह खयाल आया कि जैसे खेत में आलू लगाते हैं तो क्यों न वैसे ही गन्ने के टुकड़े लगा कर देखा जाए. उन की ये तरकीब काम आ गई और ऐसा उन्होंने लगातार 1-2 साल किया. नतीजे अच्छे सामने आए.

इस तरह उन्होंने कम लागत में न सिर्फ गन्ने की कलम को तैयार किया बल्कि गन्ने की पैदावार आम उपज के मुकाबले 20 फीसदी ज्यादा हुई.

इतना ही नहीं, अब तक 1 एकड़ खेत में 35 से 40 क्विंटल गन्ना रोपना पड़ता था. ऐसे में रोशनलाल की नई तरकीब से 1 एकड़ खेत में केवल 3 से 4 क्विंटल गन्ने की कलम लगा कर ही अच्छी फसल मिलने लगी है.

रोशनलाल यहीं नहीं रुके. उन्होंने देखा कि हाथ से गन्ने की कलम बनाने का काम काफी मुश्किल है इसलिए उन्होंने ऐसी मशीन के बारे में सोचा जिस से ये काम आसान हो गए. इस के लिए उन्होंने खेती विशेषज्ञों और कृषि विज्ञान केंद्रों की सलाह भी ली. लोकल वर्कशौप और टूल फैक्टरी में वे जाते और मशीन बनाने के लिए जानकारियां इकट्ठा करने लगे.

गन्ना (Sugarcane)

आखिरकार वे ‘शुगरकेन बड चिपर’ मशीन बनाने में कामयाब हुए. सब से पहले उन्होंने हाथ से चलाने वाली मशीन को ईजाद किया, जिस का वजन केवल साढ़े 3 किलोग्राम के आसपास है और इस से 1 घंटे में 300 से 400 गन्ने की कलमें बनाई जा सकती हैं. धीरेधीरे इस मशीन में भी सुधार आता गया और इन्होंने हाथ की जगह पैर से चलने वाली मशीन बनाई जो एक घंटे में 800 गन्ने की कलमें बना सकती है.

आज रोशनलाल की बनाई मशीनें मध्य प्रदेश में तो बिक ही रही हैं, इस के अलावा महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, हरियाणा और दूसरे कई राज्यों में भी ये मशीनें बिक रही हैं. रोशनलाल की बनाई मशीन के विभिन्न मौडल 1,500 रुपए से शुरू होते हैं.

बचपन से ही पढ़ाई में औसत रहे रोशनलाल का दिमाग वैज्ञानिक सोच रखता था. जब वे 8वीं जमात में थे, तभी उन्होंने माचिस की तीलियों से बंदूक बनाई थी. इस का इस्तेमाल खेतों में शोर मचाते बंदरों को भगाने में किया जाता था.

रोशनलाल अपनी सोच व मेहनत से हर रोज नई चीजें बनाने में कभी कामयाब हुए तो कभी नाकाम. पर संघर्ष जारी रहा. बंदूक के बाद उन्होंने कई दूसरी मशीनें भी बनाईं लेकिन उन के सपनों को ऊंचाई मिली तो गन्ने के लिए बनाई गई मशीन से.

गन्ने की खेती को आसान बनाने के लिए रोशनलाल ने साल 2006 में एक ऐसी मशीन बनाई जो पूरे गन्ने को रोपने की जगह महज गन्ने की आंख निकाल सकती थी, बाकी बचे गन्ने का किसान गुड़ या शक्कर बनवा सकता था.

‘शुगरकेन बड चिपर’ नाम की इस मशीन को केवल सराहा ही नहीं गया, बल्कि साल 2009 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की मौजूदगी में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री द्वारा उन्हें सम्मानित भी किया गया था. इस के बाद उन्हें नाबार्ड अवार्ड 2012, जवाहरलाल नेहरू कृषि फैलो सम्मान 2014, यूनिक वर्ल्ड रिकौर्ड 2014 और 6वां केवीके अवार्ड जैसे सम्मानों से सम्मानित किया जाता रहा.

खेती के क्षेत्र में नई मशीन ‘शुगरकेन बड चिपर’ से भी सस्ती कोई ऐसी मशीन वे बनाना चाहते थे जो किसानों को कम लागत में पूरी व्यवस्था के साथ अच्छा मुनाफा भी दे सके. इस के लिए उन्होंने साल 2007 से ही काम शुरू कर दिया और एक ऐसी मशीन बना डाली जो गन्ने की आंखों की बोवनी ही नहीं बल्कि गन्ने की बोआई के लिए खेत में नाली बनाती, खाद भी देती, बीज को व्यवस्थित भी करती व बीज को मिट्टी से भी दबाती.

‘बड प्लांटर’ नाम की इस 5 खूबी वाली इस मशीन को 7 मार्च, 2015 को 8वां नैशनल इनोवेशन अवार्ड राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दिया.

रोशनलाल बताते हैं कि पहले उन्हें प्रति हेक्टेयर 4,000 से 5,000 रुपए का मुनाफा होता था, लेकिन अब इस नई मशीन से वे प्रति हेक्टेयर 80,000 से 1 लाख रुपए तक कमा लेते हैं.

मशीन बनाने के लिए रोशनलाल ने घर पर ही कार्यशाला बनाई है. ‘श्री जय अंबे स्टील फैब्रिकेशन’ नाम की इस कार्यशाला में गांव के 7 लोगों को रोजगार दिया गया है. इन के द्वारा इस क्षेत्र में स्वरोजगार व तकनीकी हस्तानांतरण का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है जो वाकई सराहनीय कदम है.

रोशनलाल की इन उपलब्धियों ने गांव वालों को उन की सोच बदलने के लिए मजबूर कर दिया है.

रोशनलाल की बनाई मशीनें किसानों के बीच सुपरहिट साबित हो रही हैं तो दूसरी ओर कई शुगर फैक्टरी और बड़े फार्महाउस भी उन से बिजली से चलने वाली मशीन बनाने की मांग करने लगे हैं.

रोशनलाल विश्वकर्मा से गन्ने की कलम लगाने वाली इस मशीन से संबंधित जानकारी उन के मोबाइल नंबर 9300724167 पर हासिल की जा सकती है.

गन्ना सुधार के लिए जैव प्रौद्योगिकी की बढ़ती भूमिका

गन्ना एक बारहमासी फसल है, जो 12 से 18 महीने की अवधि के बीच पक कर तैयार होती है. आमतौर पर भारत में 12 महीने के लिए गन्ना लगाया जाता है. इस को खेत में जनवरीफरवरी माह में रोपा जाता है. 16 से 18 महीने के लिए दक्षिण भारत के राज्यों में जैसे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में जुलाई से अगस्त माह में लगाया जाता है. इस के अलावा अक्तूबर से नवंबर माह में गन्ने को लगाया जा सकता है, जिस को पूर्व मौसमी 15 महीने की फसल के नाम से भी जाना जाता है.

भारत में 300 मिलियन तक गन्ने का उत्पादन होता है. तकरीबन 35 फीसदी मात्रा गुड़ व खांडसारी के कुल उत्पादन के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है. गन्ना उत्पादन कर्नाटक, तमिलनाडु की तुलना में उत्तर प्रदेश में प्रमुख रूप से किया जाता है.

देश में तकरीबन 4 करोड़ किसान अपनी जीविका के लिए गन्ने की खेती पर निर्भर हैं और इतने ही खेतिहर मजदूर भी, जो गन्ने के खेतों में काम कर के अपनी आजीविका चलाते हैं.

गन्ने के महत्त्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि देश में निर्मित सभी प्रमुख मीठे उत्पादों के लिए गन्ना एक प्रमुख कच्चा माल है. यही नहीं, इस का उपयोग खांडसारी उद्योग में भी किया जाता है.

उत्तर प्रदेश गन्ने की कुल गन्ना उपज का 35.81 फीसदी, महाराष्ट्र 25.4 फीसदी और तमिलनाडु 10.93 फीसदी पैदा करते हैं यानी ये तीनों राज्य देश के कुल गन्ने का 72 फीसदी उत्पादन करते हैं. इधर पिछले 2 दशकों से दक्षिण के राज्यों में गन्ने की उपज में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. इन राज्यों में प्रति हेक्टेयर गन्ने की उपज भी उत्तर भारत की तुलना में अधिक है. यही वजह है कि ज्यादातर नई चीनी मिलें इन राज्यों में लगाई गई हैं.

गन्ना एक फसल से अधिक

जब लोग गन्ने के बारे में सोचते हैं, तो तुरंत इसे टेबल शुगर के साथ जोड़ देते हैं. सब से लोकप्रिय स्वीटनर को कैमिकल रूप से सुक्रोज के रूप में भी जाना जाता है.

वास्तव में जीनस सैकरम की यह घास दुनियाभर में उत्पादित सुक्रोज का 80 फीसदी है, बाकी 20 फीसदी गन्ने से आती है.

सुक्रोज रस हासिल करने के लिए हर साल तकरीबन 2 बिलियन मीट्रिक टन गन्ना डंठल चीनी मिलों में पेराई के लिए दिया जाता है. लेकिन इस फसल के भीतर अन्य फसल की तुलना में शर्करा की मात्रा ज्यादा होती है. इसीलिए गन्ना किसान ज्यादा मात्रा में इसे उगा कर अपनी आमदनी बढ़ाते हैं.

पारंपरिक तकनीकों के साथ गन्ने में फाइबर से ले कर और भी विभिन्न तरीके के कैमिकल मिलते हैं, जो  बहुत ही लाभदायक होते हैं.

आधुनिक युग के दौर में जैव प्रौद्योगिकी के साथ इस फसल को अब और अधिक विविध तरीकों से उगाया और इस्तेमाल किया जा सकता है.

प्लांट जैनेटिक इंजीनियरिंग, नए जीन डालने व मौजूदा वाले को संशोधित करने की प्रक्रिया गन्ने को न केवल सुक्रोज के, बल्कि एक अधिक कुशल उत्पादक में बदलने की कोशिश की जा सकती है. साथ ही, जैव प्रौद्योगिकी विधि से प्राप्त गन्ना चिकित्सा, औद्योगिक उपयोगों व जैव ईंधन का प्रमुख विकल्प बन सकता है.

सुक्रोज उत्पाद को बढ़ावा

गन्ने की सुक्रोज सामग्री को बढ़ाने के लिए आनुवंशिक बदलाव किया जा रहा है. इस काम के लिए शर्करा उत्पादन से संबंधित जीन व उन का अनुक्रमण क्रम की सम?ा की जरूरत होती है. वैज्ञानिकों ने इन प्रक्रियाओं को बढ़ाने वाले प्रमुख एंजाइमों की पहचान की है, जिन्हें आनुवंशिक इंजीनियरिंग के द्वारा स्टैम 1 जीन में परिवर्तन के द्वारा सुक्रोज की मात्रा अधिक या कम की जा सकती है. इस से गन्ने के उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है.

गन्ने में सुक्रोज पैदावार को बढ़ावा देने के लिए आनुवंशिक शोध करना अहम है. उदाहरण के लिए, पहले कदम के रूप में दक्षिण अफ्रीकी वैज्ञानिकों ने आनुवंशिक रूप से एक विशेष एंजाइम 2 को गन्ने की जीनोम से निकाल दिया. इस प्रक्रिया को हम जीन नाक आउट के रूप में जानते हैं.

गन्ने से जैव ईंधन बनाना

सुक्रोज का व्यापक रूप से किण्वन के माध्यम से जैव ईंधन इथेनाल बनाने के लिए उपयोग किया जाता है. इथेनाल जीवाश्म ईंधन का एक विकल्प प्रदान करता है, जो पैट्रोलियम पर निर्भरता कम कर सकता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर अंकुश लगा सकता है.

इथेनाल उत्पादन के लिए जैव प्रौद्योगिकी गन्ने की पत्तियों और बैगास (कुचले हुए डंठल से बचे हुए अवशेष) में सैल्यूलोज का दोहन करने की प्रक्रिया प्रयोग में लाई जाती है.

सैल्यूलोज की जटिल रासायनिक संरचना को एंजाइमों द्वारा सरल शर्करा में बदला जा सकता है, जिसे इथेनाल में किण्वित किया जा सकता है.

आस्ट्रेलिया में शोधकर्ताओं ने गन्ने में माइक्रोबियल जीन डाला है, जिस से ट्रांसजैनिक पौधों को बनाया जा सकता है. इन ट्रांसजैनिक गन्ने की प्रजातियों में सैल्यूलोज डिग्रेडिंग एंजाइम का उत्पादन प्रमुख रूप से गन्ने की पत्तियों में होता रहता है. दोनों माध्यमों द्वारा सैल्यूलोजिक इथेनाल तकनीक को आगे बढ़ाया जा सकता है.

गन्ने में दूसरे प्रमुख उत्पादों के लिए जैव प्रौद्योगिकी

गन्ने को सूरज की रोशनी के माध्यम से बायोमास में बदलने के लिए खेती एक प्रमुख माध्यम है. वैज्ञानिक गन्ने को चिकित्सा और औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए कुछ पदार्थों के सहउत्पादन के लिए एक आदर्श पौधे के रूप में इस की उपयोगिता बढ़ जाती है.

इतना ही नहीं, गन्ने की कोशिकाओं के भीतर आनुवंशिक तंत्र को इन पदार्थों के उत्पादन के लिए निर्देशित किया जा सकता है, जिस से पूरे पौधे को जैव ईंधन में बदल दिया जाता है.

Sugarcane

फसल उत्पादकता में वृद्धि

उलट पर्यावरणीय हालात, कीटों से बचाने और दूसरे जीवों से हिफाजत के लिए जीनों को गन्ने में डाला जा सकता है. इंडोनेशिया में व्यावसायिक रूप से जारी पहला ट्रांसजैनिक गन्ना सूखा प्रतिरोधक किस्म है.

इस किस्म में बीटाइन के उत्पादन के लिए जिम्मेदार एक जीवाणु जीन होता है, एक यौगिक, जो पौधों की कोशिकाओं को स्थिर करता है, जब खेत में पानी की कमी होती है,

इस जीवाणु के जीन को जैनेटिक इंजीनियरिंग की तकनीक द्वारा गन्ने में डाला जाता है.

कीटों, रोग पैदा करने वाले रोगाणुओं और विषैले खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए ट्रांसजैनिक दृष्टिकोण विकसित किए गए हैं.

उदाहरण के लिए, एक मिट्टी के जीवाणु से एक जीन का परिचय गन्ने को स्टेबनेर कीड़ों से बचाता है और एक हानिकारक वायरस द्वारा गन्ने का संक्रमण वायरस से प्राप्त जीन को डालने से रोका जा सकता है.

गन्ना सुधार में मार्कर की उपयोगिता

नकदी फसल होने के चलते गन्ने के घटते उत्पादन को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. उन्नतशील रोग से रहित गन्ने की प्रजातियों का विकास कृषि वैज्ञानिकों के लिए चुनौती भरा काम है. बायोटैक्नोलौजी की मदद से वैज्ञानिक गन्ने की प्रजाति में सुधार के लिए काम कर रहे हैं.

विश्व के प्रगतिशील राष्ट्र अमेरिका, आस्ट्रेलिया में गन्ने की प्रजातियों के सुधार काफी लोकप्रिय हो रहे हैं. इन की सहायता से गन्ने की आनुवंशिक समस्याओं के समाधान में कामयाबी मिली है.

फिंगरप्रिंटिंग के माध्यम से गन्ने की विविध प्रजातियों की पहचान संबंधित सभी वैज्ञानिक सूचनाओं जैविक डेटाबेस को आसानी से सुरक्षित रखा जाता है. ऐसे शोध कामों की बदौलत ही पौधों को प्रक्षेत्र में उगाए जाने वाले खर्च से भी बचाया जा सकता है.

इन दिनों कृषि वैज्ञानिक फसलों के विविध स्वरूप जैसे नैनो बायोटैक्नोलौजी पर शोध काम में मार्कर को सब से भरोसेमंद माना गया है. वह दिन दूर नहीं, जब गन्ने को जाननेपहचानने के लिए विश्व को मार्कर का एक डिस्टल आधार जारी करने की जरूरत पड़ेगी और आने वाले समय में आणविक मार्कर को और क्वांटिटी के महत्त्व से गन्ना सुधार में क्रांति आएगी.

छत पर तैयार की गन्ने की पौध

गन्ने की फसल किसानों के लिए फायदा देने वाली फसल मानी जाती है. एक बार गन्ने की फसल लगाने के बाद 3 सालों तक गन्ने का उत्पादन होता रहता है. कम लागत और सामान्य देखभाल वाली इस फसल पर मौसम की मार भी ज्यादा नहीं पड़ती. परंपरागत तरीके से गन्ने की खेती करने से लागत अधिक और उत्पादन कम मिलता है. इस समस्या से निबटने के लिए किसान गन्ने की खेती में नएनए प्रयोग करने लगे हैं.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के एक किसान परिवार ने अपने घर की छत पर गन्ने की पौध तैयार कर के दूसरे किसानों के लिए भी एक मिसाल कायम की है. किसान द्वारा किए गए इस नवाचार को गांवकसबे के दूसरे किसान भी अपनाने लगे हैं.

आमतौर पर किसान फसल की पौध को खेत या खलिहान में तैयार करते हैं, पर खेतखलिहान में तैयार पौध को छुट्टा जानवरों और पशुपक्षियों द्वारा नुकसान पहुंचता है. इसी बात के मद्देनजर गाडरवारा तहसील के एक छोटे से गांव टेकापार के 2 सगे भाइयों भगवान सिंह राजपूत और कृष्णपाल सिंह राजपूत ने घर की छत पर गन्ने की पौध तैयार कर दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा देने का काम किया है.

अपने खेत की 6 एकड़ जमीन पर गन्ना लगाने के लिए दोनों किसानों ने यह नया तरीका अपनाया है. उन के बताए अनुसार खेतों में सीधे गन्ना लगाने से ज्यादा गन्ने की जरूरत पड़ती है और इस में से 10 से 20 फीसदी गन्ने की गांठों से अंकुरण नहीं होता है, जबकि गन्ने की एक आंख से इस तरह की पौध तैयार करने से 100 फीसदी गन्ने से पौधे उग आते हैं और फसल बीमारियों से भी पूरी तरह महफूज रहती है.

इस तरह तैयार की नर्सरी

किसान कृष्णपाल सिंह राजपूत ने बताया कि उन्होंने सब से पहले बडचिपर मशीन के प्रयोग से गन्ने से एक आंख वाले टुकडे़ लिए और बाकी गन्ने का उपयोग गुड़ बनाने में कर लिया. इस से बीज के रूप में गन्ने की मात्रा कम लगने से लागत में कमी आई.

छत पर प्लास्टिक ट्रे और पौली बैग में मिट्टी व जैविक खाद भर कर गन्ने की एक आंख को इस तरह रोपा जाता है कि आंख का ऊपरी हिस्सा दिखाई देता रहे. रोपे गए इस गन्ने की पौध में पानी देने औैर दवाओं के छिड़काव में उन्हें आसानी हुई.

लगभग एक सप्ताह में गन्ने की आंख से पौधे का अंकुरण हो जाता है. छत पर पौध लगाने से आवारा जानवरों से फसल की हिफाजत भी हो गई और अंकुरण भी अच्छा हुआ.

पहलेपहल तो इन भाइयों के इस काम को ले कर साथी किसानों ने उन का मजाक उड़ाया, लेकिन जब गन्ने की पौध तैयार हुई तो आसपास के गांव के किसानों की भीड़ लगने लगी.

बम्हौरी गांव के किसान कीरत सिंह पटेल कहते हैं कि छत पर पौध लगाने के इस नए तरीके से उन्हें भी प्रेरणा मिली है. वहीं दूसरी ओर किसान भगवान सिंह राजपूत गन्ने की नर्सरी की जानकारी देते हुए बताते हैं कि उन्हें शुगर मिल द्वारा बनाई गई गन्ने की नर्सरी को देख कर यह प्रेरणा मिली.

छत पर तैयार गन्ने के पौधे जब एक से डेढ़ माह के हो जाते हैं, तो उन्हें ट्रैक्टरट्रौली में भर कर खेतों में पहुंचाया जाता है. खेतों में 4-4 फुट की दूरी पर बनी घारों में 1-1 फुट के अंतर से पौधे रोपने का काम किया जा रहा है. इस विधि से तैयार गन्ने की यह फसल दूसरे किसानों के खेत में उगे गन्ने से बेहतर होती है.

इस नवाचार में राजपूत परिवार का युवा बेटा योगेश भी उन की मदद कर रहा है. योगेश का कहना है कि किसानों को परंपरागत खेती छोड़ नए प्रयोग करने होंगे, तभी उन्नत खेती की जा सकती है.

गन्ना फसल को रोगों से बचाएं

गन्ना लंबी अवधि वाली फसल है, जिस के कारण इस फसल में रोगों की संभावनाएं बनी रहती हैं. गन्ना फसल में ये रोग अपने क्षेत्रानुसार अलगअलग भी हो सकते हैं, इसलिए समय रहते रोगों का निदान जरूरी है, तभी हम अच्छी उपज भी ले सकेंगे.

लाल सड़न रोग ऐसे पहचानें लक्षण

* लाल सड़न एक फफूंदजनित रोग है. इस रोग के लक्षण अप्रैल से जून महीने तक पत्तियों के निचले भाग (लीफ शीथ के पास) से ऊपर की तरफ मध्य सिरे पर लाल रंग के धब्बे मोतियों की माला जैसे दिखते हैं.

* जुलाईअगस्त महीने मेें ग्रसित गन्ने की अगोले की तीसरी से चौथी पत्ती एक किनारे या दोनों किनारों से सूखना शुरू हो जाती है. नतीजतन, धीरेधीरे पूरा अगोला सूख जाता है.

* तने के अंदर का रंग लाल होने के साथ ही उस पर सफेद धब्बे भी दिखाई देते हैं. तना अंदर से सूंघने पर सिरके या अल्कोहल जैसी गंध आती है.

प्रबंधन के उपाय

* किसान अवमुक्त रोग रोधी गन्ना किस्म की ही बोआई करें.

* लाल सड़न रोग से अधिक प्रभावित क्षेत्रों में किस्म को. 0238 की बोआई न करें. इस के स्थान पर अन्य स्वीकृत गन्ना किस्म की रोगरहित नर्सरी तैयार कर बोआई का काम करें.

* बोआई के पहले कटे हुए गन्ने के टुकड़ों को 0.1 फीसदी कार्बंडजिम 50 डब्ल्यूपी या थियोफनेट मिथाइल 70 डब्ल्यूपी के साथ रासायनिक शोधन जरूर करें.

* मृदा का जैविक शोधन मुख्यत: ट्राइकोडर्मा या स्यूडोमोनास कल्चर से 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 100-200 किलोग्राम कंपोस्ट खाद में 20-25 फीसदी नमी के साथ मिला कर जरूर करें.

* बोआई के पहले कटे हुए गन्ने के टुकड़ों को सेट ट्रीटमैंट डिवाइस (0.1 फीसदी कार्बंडाजिम 50 डब्ल्यूपी या थियोफनेट मिथाइल 70 डब्ल्यूपी, 200 एचजीएमएम पर 15 मिनट) या हौट वाटर ट्रीटमैंट (52 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर 2 घंटे) या एमएचएटी (54 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान, 95-99 फीसदी आर्द्रता पर ढाई घंटे) के साथ शोधन जरूर करें.

* अप्रैल से जून माह तक अपने खेत की लगातार निगरानी करते रहें. पत्तियों के मध्य सिरे के नीचे रुद्राक्ष/मोती के माला जैसे धब्बे के आधार पर पहचान कर पौधों को जड़ सहित निकाल कर नष्ट कर दें और गड्ढे में 10 से 20 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर डाल कर ढक दें या 0.2 फीसदी थियोफनेट मिथाइल के घोल की ड्रैचिंग करें.

* रोग दिखाई देने पर ऊपर बताई गई प्रक्रिया जुलाईअगस्त महीने में भी लगातार जारी रखें.

* अप्रैल से जून महीने तक 0.1 फीसदी थियोफनेट मिथाइल 70 डब्ल्यूपी या कार्बंडाजिम 50 डब्ल्यूपी का पर्णीय छिड़काव करें.

* ज्यादा वर्षा होने पर लाल सड़न रोग से संक्रमित खेत का पानी किसी दूसरे खेत में रिसाव को रोकने के लिए उचित मेंड़ बनाएं.

* लाल सड़न रोग से प्रभावित क्षेत्रों में 10 फीसदी संक्रमण से ज्यादा वाले रोगग्रस्त फसल की पेड़ी न लें.

* लाल सड़न रोग से संक्रमित खेत में तुरंत कोई अन्य रोग रोधी गन्ना किस्म की बोआई कम से कम एक साल तक न करें और सुविधानुसार गेहूं, धान, हरी खाद या उपयुक्त फसलों के साथ फसलचक्र अपना कर ही बोआई करें.

* संक्रमित गन्ने की कटाई के बाद उस अवशेषों को खेत से पूरी तरह बाहर कर के नष्ट कर दें और गहरी जुताई कर फसलचक्र अपनाएं.

* अन्य प्रदेशों से बीज गन्ना लाने से पहले वैज्ञानिकों/शोध संस्थानों से अनुशंसा प्राप्त करनी चाहिए.

Suagrcaneपोक्का बोइंग रोग ऐसे पहचानें लक्षण

* यह फफूंदीजनित रोग है.

* इस रोग के स्पष्ट लक्षण विशेष रूप से जुलाई से सितंबर महीने (वर्षाकाल) तक प्रतीत होते हैं.

* पत्रफलक के पास की पत्तियों के ऊपरी व निचले भाग पर सिकुड़न के साथ सफेद धब्बे दिखाई देते हैं.

* चोटी की कोमल पत्तियां मुरझा कर काली सी पड़ जाती हैं और पत्ती का ऊपरी भाग सड़ कर गिर जाता है.

* ग्रसित अगोला के ठीक नीचे की पोरियों की संख्या अधिक व छोटी हो जाती हैं. पोरियों पर चाकू से कटे जैसे निशान भी दिखाई देते हैं.

प्रबंधन के उपाय

* किसी एक फफूंदीनाशक का घोल बना कर 15 दिन के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करें.

* इस रोग के लक्षण प्रतीत होते ही कार्बंडाजिम 50 डब्ल्यूपी का 0.1 फीसदी (400 ग्राम फफूंदीनाशक) का 400 लिटर पानी के साथ प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें.

* कौपर औक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी के 0.2 फीसदी (800 ग्राम फफूंदीनाशक) का 400 लिटर पानी के साथ प्रति एकड़ की दर से छिड़कें.

पत्ती की लालधारी व बैक्टीरियल टौप रौट रोग

ऐसे पहचानें लक्षण

* यह बैक्टीरियाजनित रोग है और इस रोग का असर जून से वर्षा ऋतु के अंत तक रहता है.

* पत्ती के मध्यशिरा के समानांतर गहरे लाल रंग की जलीय धारियां दिखाई देती हैं.

* इस के संक्रमण से गन्ने के अगोले के बीच की पत्तियां सूखने लगती हैं और बाद में पूरा अगोला ही सूख जाता है.

* पौधे के शिखर कलिका से तने का भीतरी भाग ऊपर से नीचे की ओर सड़ जाता है.

* गूदे के सड़ने से बहुत ज्यादा बदबू आती है और तरल पदार्थ सा प्रतीत होता है.

प्रबंधन के उपाय

* यांत्रिक प्रबंधन में संक्रमित पौधों को काट कर खेत से निकाल दें.

* रासायनिक प्रबंधन के लिए कौपर औक्सीक्लोराइड 50 डब्ल्यूपी का 0.2 फीसदी (800 ग्राम फफूंदीनाशक) और स्ट्रैप्टोसाइक्लिन का 0.01 फीसदी (40 ग्राम दवा) का 400 लिटर पानी के घोल के साथ प्रति एकड़ की दर से 15 दिन के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करें.

घासीय प्ररोह रोग

ऐसे पहचानें लक्षण

* यह रोग फाइटोप्लाज्मा द्वारा संक्रमित होता है. इस का प्रभाव वर्षाकाल में अधिक होता है.

* रोगी पौधों की पत्तियों का रंग सफेद हो जाता है.

* थानों की वृद्धि रुक जाती है. गन्ने बौने और पतले हो जाते हैं और ब्यांत बढ़ जाने से पूरा थान झाड़ीनुमा हो जाता है.

प्रबंधन के उपाय

* ग्रसित पौधों को खेत से निकाल कर दूर नष्ट करें.

* आर्द्र वायु उष्मोपचार शोधन तकनीकी के अंतर्गत बीज गन्ने को 54 डिगरी सैंटीग्रेड वायु का तापमान, 95-99 फीसदी आर्द्रता पर ढाई घंटे तक उपचारित करें.

* जल उष्मोपचार से बीज गन्ने को 52 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर 2 घंटे के लिए शोधन करें.

* रोग की अधिकता की दशा में वाहक कीट के नियंत्रण के लिए कीटनाशक इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 200 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर का 625 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

कंडुआ रोग

ऐसे पहचानें लक्षण

* यह फफूंदीजनित रोग है.

* रोगी पौधों की पत्तियां छोटी, नुकीली और पंखे के आकार की होती जाती हैं. गन्ना लंबा व पतला हो जाता है.

* गन्ने के अगोले के ऊपरी भाग से काला कोड़ा निकलता है, जो कि सफेद पतली झिल्ली द्वारा ढका होता है.

प्रबंधन के उपाय

* बोआई के समय गन्ने के टुकड़ों को प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी या कार्बंडाजिम 50 डब्ल्यूपी के 0.1 फीसदी घोल में 5-10 मिनट तक उपचारित करें.

* ग्रसित पौधों में बन रहे काले कोड़ों को बोरों से ढक कर खेत से निकाल कर दूर नष्ट करें.

* प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी के 0.1 फीसदी घोल का 15 दिनों के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करें.

* आर्द्र वायु उष्मोपचार या जल उष्मोपचार से शोधन करें.

उत्तर प्रदेश में गन्ना खेती की मौडर्न तकनीक

हमारे देश के कुल गन्ना क्षेत्रफल का तकरीबन 60 फीसदी हिस्सा उत्तर भारत के राज्यों में है, जबकि कुल गन्ना उत्पादन का महज 50 फीसदी हिस्सा ही इन राज्यों से मिलता है. इस की मुख्य वजह राष्ट्रीय गन्ना उत्पादकता स्तर 70 टन प्रति हेक्टेयर की अपेक्षा उत्तर भारतीय राज्यों में गन्ना उत्पादकता 55-60 टन प्रति हेक्टेयर से भी कम होना है, इसलिए यह जरूरी है कि इन राज्यों के लिए संस्तुत उन्नत गन्ना किस्में और उन्नत उत्पादन तकनीक अपना कर पेड़ी गन्ने की उत्पादकता को बढ़ाया जाए.

गन्ने की उत्पादकता बढ़ाने में खेत की तैयारी, बीज की गुणवत्ता व इस की मात्रा और बोआई विधि का खास असर पड़ता है. अगर इन में से किसी एक पर भी उचित ध्यान न दिया जाए, तो उपज प्रभावित हो सकती है.

गन्ने की उपज में कमी के विभिन्न कारणों में गन्ने की उन्नत तकनीक के प्रति किसानों में जानकारी की कमी, बढ़ती हुई उत्पादन लागत, लाभांश में कमी और कमजोर बाजार है, जो किसानों के सामने मुख्य मुद्दे बन गए हैं.

बढ़ती हुई गन्ने व चीनी मांग की आपूर्ति के लिए प्रति इकाई उत्पादकता बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प होगा, क्योंकि अब गन्ने के तहत क्षेत्रफल बढ़ाने की संभावना नहीं है. पिछले सालों के आंकड़ों से साफ है कि गन्ना उत्पादन और उत्पादकता में उतारचढ़ाव रहा है.

गन्ना उत्पादन बढ़ाने की उन्नत कृषि तकनीकों को अपना कर गन्ना किसान अपने खेतों में उत्पादन बढ़ाने के साथ गन्ना खेती से अधिक लाभ कमा सकते हैं.

गन्ने की संस्तुत किस्में

उत्तर भारतीय राज्यों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार और मध्य प्रदेश प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य हैं. इन राज्यों के लिए गन्ने की संस्तुत किस्में इस प्रकार हैं :

जल्दी पकने वाली किस्में : को.शा. 687, को.शा. 8436, को.शा. 88230, को.शा. 90265, को.शा. 95255. कोलख 94184, बी.ओ. 102 सी.ओ.एच. 92201, को.जे. 83, को. पंत 84211, को. 87263, को. 98014, को. 0238, को. 0118, को. 0124, को. 0239, को.शा. 96268, कोलख 9709.

मध्य व देर से पकने वाली किस्में : को.शा. 8432, को.शा. 92263, को.से. 92423, को.शा. 93278, को.शा. 91230, को.शा. 88216, को.शा. 96275, को.शा. 94257, बी.ओ. 110, बी.ओ. 91, बी.ओ. 128, कोजे 82, कोजे 84, को. 6304, को. 62175, को. पंत 90223, को.शा. 94270, कोह 119, को. पंत 97222, को.शा. 07250, को.से. 01434, यू.पी. 39, को. पंत 84212, यू.पी. 0097, को.शा. 97261, को.से. 96436.

खेत की तैयारी

जहां गन्ना बोया जाना है, उस खेत की पहली गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें. उस के बाद 3-4 जुताई हैरो या कल्टीवेटर से करें. हर जुताई के बाद पाटा जरूर लगाएं, जिस से मिट्टी नम व भुरभुरी हो जाए.

भूमि में पर्याप्त नमी के लिए बोने से पहले सिंचाई करें, विशेष रूप से जब समतल विधि से बोते हैं. खेत की तैयारी के दौरान शुरू में केवल नालियां खोदनी चाहिए. अन्य सभी काम जैसे बीज की बोआई, गन्ना काटना, उर्वरक एवं कीटनाशकों का छिड़काव, कूंड़ों में मिट्टी भराई आदि. कटर प्लांटर से बोआई करें. ऐसा करने से मिट्टी में नमी का नुकसान कम होने के साथ ही समय की भी बचत होती है.

उन्नत बीज का चयन

फसल की उपज बढ़ाने में स्वस्थ बीजों की बोआई का खासा महत्त्व है. उन्नतशील किस्म होते हुए भी यदि बीज की क्वालिटी का ध्यान नहीं रखा गया, तो उस किस्म की उपज क्षमता होने के बावजूद भी अच्छी उपज नहीं मिल सकती है.

बीज बोने के लिए जहां तक हो सके, गन्ने के ऊपरी एकतिहाई से दोतिहाई भाग को ही चुनना चाहिए, क्योंकि इस का जमाव जल्दी व अधिक होता है. गन्ने की उन्नतशील किस्म के बीज को स्वस्थ बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि उन के बोने से पहले बीज की छंटाई तक विशेष ध्यान रखना चाहिए.

बोने के लिए गन्ने के बीजों की आयु 10-12 माह ही होनी चाहिए. पेड़ी या गिरे हुए गन्ने को बोने के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए. गन्ना कटाई के तुरंत बाद ही बो देना चाहिए. यदि हो सके, तो गन्ने को 10-12 घंटे तक पानी में भिगोने के बाद ही बोएं.

बीज व मिट्टी उपचार

गन्ने को बीजजनित रोगों से बचाने के लिए उष्मोपचारित बीज की बोआई करनी चाहिए. इस के लिए संस्थान द्वारा विकसित आर्द्र उष्ण वायु यंत्र में गन्ने को 54 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर ढाई घंटे तक उपचारित करते हैं. इस से बीजजनित रोगों जैसे लाल सड़न, उकठा, कंडुवा, पेड़ी कुठन व घासीय प्ररोह के प्रकोप की संभावना बहुत कम हो जाती है.

इस यंत्र की सुविधाएं सभी चीनी मिलों में उपलब्ध हैं. इस के बाद गन्ने की 3 आंख वाले  टुकड़े को बावस्टीन की 200 ग्राम मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल कर 15-20 मिनट तक उपचारित करना चाहिए. ऐसा करने से जमाव जल्दी व अधिक होता है और भूमि में गन्ने के टुकड़े सड़ने से बच जाते हैं.

बोआई का उचित समय व बीज की मात्रा

गन्ने के अच्छे जमाव के लिए बोते समय 20 से 30 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान होना चाहिए. यह तापमान उत्तर प्रदेश व उत्तर भारत के अन्य राज्यों में 15 फरवरी से मार्च माह तक और

15 सितंबर से अक्तूबर माह तक रहता है, जिस में गन्ने की बोआई करने पर अधिकतम जमाव प्राप्त होता है. गन्ने की मोटाई के अनुसार 60-70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है.

गन्ने की बोआई विधि

समतल विधि : समतल विधि में बोने से पहले खेत की पहली गहरी जुताई करते हैं और 3-4 जुताई कल्टीवेटर से कर के खेत की अच्छी तैयारी के बाद देशी हल अथवा रिजर द्वारा कूंड़ बना लेना चाहिए.

इस विधि में शरदकालीन गन्ने में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 90 सैंटीमीटर, वसंतकालीन में 75 सैंटीमीटर और कूंड़ों की गहराई 7 से 10 सैंटीमीटर रखते हैं.

नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा कूंड़ों में मिला देते हैं. इस के बाद बोआई के लिए गन्ने की 3 आंख वाले टुकड़ों को फफूंदीनाशक जैसे बावस्टीन की 200 ग्राम मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल कर 15-20 मिनट तक उसे डुबाने के बाद बोते हैं. कटे हुए 3 आंख वाले गन्ने के टुकड़ों को कूंड़ों में सिरे से सिरा या आंख से आंख मिला कर इस प्रकार बोते हैं कि प्रति मीटर कूंड़ लंबाई में 4-5 टुकड़े आ जाएं.

बोने के बाद कूंड़ों में बोए गए टुकड़ों के ऊपर क्लोरोपाइरीफास की 5 लिटर मात्रा का 1500-1600 लिटर पानी में घोल बना कर हजारे द्वारा प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें और इस के बाद कूंड़ों को देशी हल या कुदाली से ढक कर पाटा लगा देना चाहिए.

इस विधि द्वारा बोआई करने से मिट्टी और बोए गन्ने के कटे टुकड़ों से नमी का नुकसान तेजी से होता है, इसलिए उचित सिंचाई की व्यवस्था वाले एरिया में इस विधि को अपनाएं.

Sugarcaneनाली विधि : समतल विधि में कम सिंचाई मिलने से गन्ने का अंकुरण तकरीबन 30 फीसदी तक ही होता है. सिंचाई की कमी की अवस्था में नाली विधि काफी उपयोगी होती है. नाली विधि में बोआई के बाद गन्ने का जमाव अपेक्षाकृत अधिक होता है.

नाली विधि द्वारा गन्ने की बोआई करने के लिए 20 सैंटीमीटर गहरी और 40 सैंटीमीटर चौड़ी नालियां बनाई जाती हैं. एक नाली और दूसरी समानांतर नाली के केंद्र से केंद्र की दूरी 90 सैंटीमीटर रखते हैं. नालियों में गोबर कंपोस्ट या प्रेसमड खाद डाल कर अच्छी तरह मिला देते हैं. गन्ने के 3 आंख वाले टुकड़ों की बोआई नालियों में करते हैं, उस के बाद 4-5 सैंटीमीटर मिट्टी डाल कर ढक देते हैं. बोआई के तुरंत बाद एक हलकी सिंचाई नालियों में करते हैं और ओट आने पर एक अंधी गुड़ाई कर देते हैं. इस से जमाव काफी अच्छा होता है.

गन्ना जमाव के बाद फसल की बढ़वार के हिसाब से नालियों में मिट्टी डालते जाते हैं. ऐसा करने से नाली के स्थान पर मेंड़ और मेंड़ के स्थान पर नाली बन जाती है, जो बारिश में जल निकास के काम आती है.

इस विधि द्वारा गन्ने की अच्छी उपज के साथसाथ पेड़ी की भरपूर उपज भी मिल जाती है. इस विधि में 70-75 फीसदी तक जमाव संभव है.

पौली बैग विधि : उन्नतशील किस्म के बीज की कमी की स्थिति में पौली बैग विधि भी बहुत कारगर है. इस विधि से प्रति हेक्टेयर 20 क्विंटल बीज की जरूरत होती है. गेहूं कटाई के बाद गन्ना बोआई करने वाले क्षेत्रों के लिए पौली बैग विधि से गन्ना बोआई कर के अधिक पैदावार ली जा सकती है, क्योंकि गेहूं कटाई के एक माह पूर्व ही उस की नर्सरी तैयार कर मुख्य खेत में बो दिया जाता है.

पौली बैग में नर्सरी तैयार करने के लिए सब से पहले मिट्टी का मिश्रण तैयार किया जाता है. मिट्टी, बालू और गोबर की खाद या कंपोस्ट की बराबरबराबर मात्रा ले कर अच्छी तरह मिलाते हैं. इस के बाद क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी की 10 मिलीलिटर मात्रा से एक क्विंटल मिट्टी के मिश्रण को उपचारित करते हैं.

इस उपचारित मिट्टी के मिश्रण को 5 इंच लंबी व 5 इंच चौड़ी साइज की पौलीथिन बैग में भरते हैं. पौलीथिन बैग में चारों ओर और नीचे से कुछ छेद कर देते हैं, जिस से सिंचाई के बाद अतिरिक्त पानी निकल जाए और गन्ने के टुकड़े सड़ने से बच जाएंगे.

नर्सरी तैयार करने के लिए गन्ने के ऊपरी दोतिहाई भाग को ले कर इस में से एक आंख वाले टुकड़े काट लिए जाते हैं. इन के कटे हुए टुकड़ों को 50 लिटर पानी में 100 ग्राम बावस्टीन मिला कर 15-20 मिनट तक डुबो कर रखा जाता है. इस के बाद पौलीथिन बैग में उपचारित मिट्टी भर देते हैं और टुकड़ों को पौलीथिन बैग में लंबवत अवस्था में इस प्रकार रखते हैं कि आंख ऊपर की ओर रहे और एक हलकी सिंचाई कर देते हैं.

पौली बैग नर्सरी में 5-6 दिन के अंतराल पर पानी का छिड़काव करते हैं. 3-4 सप्ताह में अच्छा जमाव हो जाता है और 3-4 पत्तियां निकल आती हैं, जिन की लंबाई तकरीबन 6 इंच होती है.

रोपाई से पूर्व पौधों की ऊपरी पत्तियों को 2-3 सैंटीमीटर काट देना चाहिए. ऐसा करने से पौधों द्वारा पानी कम लगता है. तैयार खेत में जिन पौधों को बोना है, 90 सैंटीमीटर की दूरी पर रिजर द्वारा कूंड़ बना लेते हैं. इन कूंड़ों में 45 सैंटीमीटर की दूरी पर पौधों की बोआई करें.

इस प्रकार एक बार में तकरीबन 25,000-28,000 पौधे लगते हैं. बोने के बाद तुरंत सिंचाई करनी चाहिए. बोआई के बाद 8-10 दिन बाद खेत का निरीक्षण करें. यदि किसी स्थान पर पौधे सूख गए हों अथवा मर गए हों, उस स्थान पर फिर से नए पौधों की रोपाई कर देनी चाहिए.

रिंग पिट विधि : इस विधि द्वारा गन्ना बोने से पहले तैयार खेत में मेंड़ के किनारे लंबाई व चौड़ाई में 60 सैंटीमीटर जगह छोड़ कर बाकी पूरे खेत में 105 सैंटीमीटर की दूरी पर लंबाई और चौड़ाई में रस्सी की सहायता से लाइन बनाते हैं और कटान बिंदुओं पर 75 सैंटीमीटर व्यास वाले गड्ढे बना लेते हैं. गड्ढे की गहराई तकरीबन 30 सैंटीमीटर रखते हैं.

इस विधि से एक हेक्टेयर खेत में तकरीबन 9,000 गड्ढे बन जाते हैं. प्रत्येक गड्ढे में 3 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद के साथ 20 ग्राम डीएपी, 8 ग्राम यूरिया, 16 ग्राम पोटाश और 2 ग्राम जिंक सल्फेट मिट्टी के साथ अच्छी तरह मिला देते हैं.

खाद और उर्वरक मिलाने के बाद हर गड्ढे में 2 आंख वाले 20 टुकड़ों को साइकिल के पहिए में लगी तीलियों की तरह बिछा देते हैं, फिर इन टुकड़ों पर क्लोरोपाइरीफास 20 फीसदी का 5 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 1,500-1,600 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़क देते हैं और इन टुकड़ों को भुरभुरी मिट्टी से 5-6 सैंटीमीटर तक ढक देते हैं और बोने के तुरंत बाद एक हलकी सिंचाई कर देते हैं.

उचित ओट आने पर इन गड्ढों की हलकी गुड़ाई करनी चाहिए, जिस से कड़ी परत टूट कर मुलायम हो जाए. उस के बाद जब गन्ने में 4 पत्तियों की अवस्था आ जाए, तो गड्ढे की भराई धीरेधीरे कर दें.

मिट्टी की पहली भराई करते समय गड्ढे में 16 ग्राम यूरिया प्रति गड्ढा डाल दें. जून के अंतिम सप्ताह या वर्षा पूर्व फ्यूरोडान 3 जी की 4 ग्राम और यूरिया 16 ग्राम प्रति गड्ढे में डाल कर बची हुई मिट्टी गड्ढे में भर कर एकसार कर दें. इस विधि को अपना कर किसान प्रति हेक्टेयर 150 टन प्रति हेक्टेयर गन्ना उपज प्राप्त कर सकते हैं.

कटर प्लांटर द्वारा गन्ने की बोआई : कटर प्लांटर से बोआई करने पर एक दिन में तकरीबन 1.5-2.0 हेक्टेयर खेत की बोआई हो जाती है. इस यंत्र द्वारा गन्ना बोआई की सभी क्रियाएं जैसे कूंड़ खुलना, उर्वरक का पड़ना, गन्ने के टुकड़े कट कर गिरना, कीटनाशी दवाओं का पड़ना, कूंड़ों का ढकना और पाटा होना एकसाथ हो जाता है.

इस यंत्र से 35-40 फीसदी तक बोआई लागत में कमी आ जाती है. बोआई से संबंधित सभी क्रियाएं एकसाथ होने के कारण जमाव में तकरीबन 8-10 फीसदी की वृद्धि पाई गई है.

उर्वरक प्रबंधन

100 टन की पैदावार के लिए गन्ने की फसल 208 किलोग्राम नाइट्रोजन, 63 किलोग्राम फास्फोरस, 280 किलोग्राम पोटैशियम, 34 किलोग्राम लोहा, 12 किलोग्राम मैगनीज, 0.6 किलोग्राम जस्ता एवं 0.2 किलोग्राम तांबा आदि तत्त्व मिट्टी से लेती है. इस प्रकार मिट्टी जांच के अनुसार ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए.

आमतौर पर गन्ने की भरपूर उपज लेने के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर संस्तुत किया गया है. फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा बोते समय कूंड़ों में और बाकी बची नाइट्रोजन की मात्रा को बराबरबराबर 2 बार में टौप ड्रैसिंग द्वारा बोने के 90 दिनों के अंदर डाल देना चाहिए.

यदि समेकित पोषक तत्त्व प्रबंधन किया जाए, तो गन्ने की उपज में बढ़ोतरी के साथसाथ जमीन की उर्वरता भी बनी रहती है. अत: संस्तुत उर्वरक की मात्रा को आधी कार्बनिक व आधी अकार्बनिक तत्त्वों से दी जाए, तो फसल वृद्धि के साथसाथ जमीन की उर्वरता भी बनी रहती है.

जल निकास का उचित प्रबंधन

उत्तर भारत में गन्ने की फसल से भरपूर उपज लेने के लिए 5 सिंचाई बारिश होने से पहले और 2 सिंचाई बारिश के बाद करने की जरूरत रहती है. पानी की उपलब्धता के अनुसार यदि 4 सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध है, तो पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी सिंचाई क्रमश: जमाव पूरा होने पर पहली, दूसरी व तीसरी कल्ले निकलने की अवस्थाओं पर करनी चाहिए. यदि 3 सिंचाइयों के लिए पानी उपलब्ध है, तो  सिंचाई पहले, दूसरे और तीसरे कल्ले निकलते समय करनी चाहिए. यदि 2 सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध है, तो ये सिंचाई दूसरे और तीसरे कल्ले निकलते समय करनी चाहिए.

एकांतर नाली विधि द्वारा सिंचाई : इस विधि में पूरे खेत की सिंचाई करने के बजाय एक पंक्ति छोड़ कर पानी लगाया जाता है. इस के लिए हर दूसरी पंक्ति के खाली स्थान में 25 सैंटीमीटर चौड़ी और 15 सैंटीमीटर गहरी नाली बना ली जाती है, जिस में सिंचाई के लिए पानी भर दिया जाता है.

एकांतर नाली विधि द्वारा सिंचाई करने से सामान्य उपज तो मिलती ही है, साथ ही साथ सिंचाई में भी 36 फीसदी तक पानी की बचत हो जाती है. इस बचे हुए पानी को दूसरी फसलों की सिंचाई कर के उपज में बढ़ोतरी और अधिक लाभ लिया जा सकता है.

फसल सुरक्षा

फसल को भूमिजनित कीटों से बचाने के लिए बोआई के समय बने कूंड़ों में बोए गए गन्ने के टुकड़ों पर 5 लिटर क्लोरोपाइरीफास (1 लिटर सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर) को 1,500-1,600 लिटर पानी में घोल कर फव्वारे द्वारा डालना चाहिए, वहीं चोटी बेधक कीट की रोकथाम के लिए जून के अंतिम सप्ताह में फ्यूराडान की 33 किलोग्राम (1 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर) का प्रयोग गन्ने की जड़ों के पास करना चाहिए.

मिट्टी चढ़ाना व बंधाई करना

गन्ने की फसल को गिरने से बचाने के लिए जून के अंतिम सप्ताह या जुलाई के पहले सप्ताह में गन्ने की जड़ों पर मिट्टी चढ़ाएं. अगस्त माह में पहली बंधाई पंक्तियों में खड़े प्रत्येक थान की अलगअलग करें. दूसरी बंधाई सितंबर में 2 आमनेसामने के थानों को आपस में मिला कर करें. ऐसा करने से वर्षा ऋतु में तेज हवा के बावजूद भी गन्ना कम गिरेगा, जिस से उपज में कमी नहीं आएगी.

नकदी फसल है गन्ना

की वर्ड : फार्म एन फूड आर्टिकल, गन्ना नकदी  का प्रमुख स्रोत है, क्योंकि दुनियाभर में 80 फीसदी चीनी गन्ने से ही बनती है. गन्ना उत्पादन में दुनियाभर में भारत का दूसरा स्थान है.

यदि पूरे देश में गन्ने की खेती में उत्तर भारत की हिस्सेदारी देखी जाए, तो यह कुल क्षेत्रफल का 55 फीसदी है. उत्तर प्रदेश की बात की जाए, तो वहां 40 से 45 दिनों में गन्ने की खेती होती है. तकरीबन 40,00,000 किसान सीधेतौर पर गन्ने की खेती से जुड़े हुए हैं.

गन्ने के साथ लें अंत:फसल

शरदकालीन में फसली खेती के लिए गेहूं, मटर, आलू, लाही, राई, प्याज, मसूर, धनिया, लहसुन, मूली, गोभी, शलजम, चुकंदर की खेती आज भी की जा सकती है. अब स्थिति ऐसी आ गई है कि नई किस्मों से उपज दक्षिण भारत की तरह और चीनी की रिकवरी महाराष्ट्र की तरह हो रही है.

किसानों को बेहतर ट्रेनिंग देने के साथसाथ बेहतर किस्म के बीज के उपयोग से गन्ने की पैदावार में बढ़ोतरी नहीं होती. इस के लिए कुछ और बातों का भी ध्यान रखना पड़ता है, जैसे उस की बोआई कैसे की जाए, पौधों से पौधों की दूरी कितनी होनी चाहिए, खादपानी, निराईगुड़ाई, खरपतवार नियंत्रण, गन्ने की बधाई वगैरह की जानकारी होना भी बेहद जरूरी है. इस के लिए जिला एवं कृषि विज्ञान केंद्रों के कृषि वैज्ञानिकों की मदद से किसानों को ट्रेनिंग दी जाती है.

किसानों को ट्रेनिंग देने के साथसाथ उन की देखरेख में कृषि विश्वविद्यालय भी काम कर रहा है.

गन्ने के साथ सहफसल खेती के लिए कम समय में पकने वाली फसलों को चुना जाना चाहिए, जो इलाके की जलवायु, मिट्टी की उपजाऊ कूवत और स्थानीय मौसम भी अनुकूल हो, जिन में बढ़वार प्रतिस्पर्धा न हो और जिस की छाया से गन्न्ना फसल पर उलटा असर न पड़े.

बसंतकालीन गन्ने की खेती के साथ सहफसल खेती करनी है, तो उस के साथ उड़द, मूंग, भिंडी, लोबिया व हरी खाद वाली फसलों को लिया जा सकता है.

नर्सरी में तैयार गन्ने से बढ़ेगी कमाई

गन्ने की एक आंख की गोटी काट लें. गन्ना बीज को शोधित करने के लिए थायो सीनेट मिथाइल अथवा विश टीन की निर्धारित मात्रा के घोल में गन्ने के इन टुकड़ों को बरतनों में डुबो दिया जाता है. आधे घंटे तक डुबोने के बाद इन गन्ने के टुकड़ों को बाहर निकाल लिया जाता है. 18 से 20 वर्गमीटर समतल जमीन पर उर्वरक की बोरियां या प्लास्टिक शीट बिछा कर गोबर की सड़ी खाद एक से डेढ़ सैंटीमीटर मोटी बिछा दें. इस मिट्टी के ऊपर गन्ने के टुकड़ों को सीधी कतार में रख कर कम मात्रा में मिट्टी उन के ऊपर डाल दें.

जरूरत पड़ने पर पानी का छिड़काव कर दें. 20 से 30 दिन में पौधे निकलने शुरू हो जाएंगे. इन पौधों को सीधे खेत में लगाया जा सकेगा. इस से खेत में पौधों की तादाद समान रूप से होगी, जिस से उत्पादन भी अच्छा मिलेगा.

दक्षिण भारत के किसान गन्ने की प्रति हेक्टेयर 80 से 85 टन पैदावार करते हैं, जबकि उत्तर भारत के किसानों की प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार महज 70 टन ही होती है. यही नहीं, गन्ने से चीनी की रिकवरी में उत्तर भारत के किसान महाराष्ट्र के किसानों से पिछड़ जाते हैं. महाराष्ट्र में उपज करने की चीनी की रिकवरी जहां  12 से 13 फीसदी है, वहीं उत्तर भारत में काफी कम थी, लेकिन प्रजाति 238 आने के बाद यहां की रिकवरी भी तकरीबन 13 फीसदी के करीब पहुंच गई है. इस प्रजाति ने किसानों के बीच गन्ने की खेती को और अधिक करने की ओर आकर्षित किया है.

लेकिन अब उत्तर भारत के किसानों के हालात में सुधार आने वाला है, क्योंकि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने ऐसे उन्नत बीजों का विकास किया है, जो न केवल भरपूर फसल देने में सक्षम है, बल्कि इस से चीनी की रिकवरी भी पहले की तुलना में ज्यादा हो सकेगी.

इन बीजों की उपलब्धता सभी किसानों को मुहैया कराने व खेती की तकनीकी और तरीकों से किसानों को अवगत कराने के लिए कृषि विश्वविद्यालय के टिशू कल्चर लैब के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को ट्रेंड किया जा रहा है.

डाक्टर आरएस सेंगर की अगुआई में उत्तर भारत के लिए विशेष रूप से विकसित कुछ किस्मों में सुधार का काम लगातार चल रहा है. सालों के अनुसंधान के बाद ऐसी किस्में तैयार की गई हैं, जिस से न केवल बेहतर उत्पादन मिल सकेगा, बल्कि इस में चीनी की रिकवरी भी काफी अच्छी हो सकेगी.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रजाति 238 से अधिक पैदावार लेने के लिए सब से पहले नर्सरी तैयार की जा रही है.

गन्ने की खेती में ध्यान रखने योग्य बातें

* जहां पानी रुकता हो, वहां पानी के निकलने का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए.

* खाली जगहोंमें पहले से अंकुरित गन्ने के पेड़ों से गैस फिलिंग करनी चाहिए.

* अंत:फसल काटने के बाद जल्दी ही गन्ने में सिंचाई व नाइट्रोजन की टौप ड्रैसिंग कर के गुड़ाई कर देनी चाहिए.

* अंत:फसल के लिए अलग से संस्तुत की गई मात्रा के मुताबिक उर्वरकों को दिया जाना चाहिए.

गन्ने की खेती में नवाचार

गन्ने की फसल एक वहुवर्षीय फसल है, जिस में किसान हर साल एक हेक्टेयर रकबे में एक लाख से ले कर डेढ़ लाख रुपए तक का मुनाफा कमा सकते हैं. गन्ना एक प्रमुख व्यावसायिक फसल है. विषम हालात में भी गन्ने की फसल को बहुत अधिक प्रभावित नहीं कर पाती. इन्हीं सब वजहों से गन्ने की खेती अपनेआप में सरक्षित व लाभ की खेती है.

गन्ने की फसल पूरे उत्तर भारत के किसानों के लिए लाभकारी नकदी फसल है, जो किसानों की आमदनी बढ़ाने में कारगर साबित हुई है. यही वजह है कि 3-4 सालों से सोयाबीन की फसल से नुकसान उठा रहे किसान अब गन्ना फसल की ओर आकर्षित हुए हैं. कम लागत और सामान्य देखभाल के चलते गन्ने की 3 वर्षीय फसल ने किसानों की जिंदगी में मिठास घोलने का काम किया.

हालांकि आज भी देश के कई किसान गन्ने की परंपरागत खेती को ही अपनाए हुए हैं. गन्ना फसल के उचित दाम न मिलने के कारण किसान ज्यादा फायदा नहीं ले पा रहे हैं.

ऐसे में आज के दौर में गन्ने की खेती में नवाचार कर के ज्यादा से ज्यादा फायदा लेने की ओर ध्यान देना जरूरी हो गया है. गन्ना फसल को मिल मालिकों को औनेपौने

दामों पर बेचने के बजाय उस के अलगअलग उत्पाद तैयार कर बाजार में भेजने से आमदनी बढ़ाई जा सकती है.

उन्नत तकनीक से करें बीज तैयार

गन्ने की फसल बोने के लिए खेत में खड़ी गन्ना फसल को बीज के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय किसान नए तौरतरीकों का इस्तेमाल कर बीज तैयार कर अपना उत्पादन बढ़ा सकते हैं.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुरजिले के किसान राकेश दुबे गन्ना उत्पादन करने वाले जागरूक किसानों में से एक हैं. खास बात यह है कि खेती करते समय इन्होंने कई नए तौरतरीकों को खुद ही खोज निकाला है.

गन्ने की पौध के लिए नर्सरी तैयार करने के लिए राकेश दुबे द्वारा ईजाद की गई सैट बंडल तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिस में नर्सरी तैयार करने के लिए मिट्टी का उपयोग नहीं किया जाता. एक आंख के टुकड़ों को 200 लिटर पानी और 100 ग्राम शहद के घोल में डुबो कर पौलीथिन बैग में पैक कर के एक अंधेरे कमरे में रख दिया जाता है. तीसरे दिन इस में जडे़ं और अंकुर निकल आते हैं और इन आंखों को 7वें दिन खेत मे रोपित कर दिया जाता है.

इस विधि के अलावा कोकोपिट और पौधशाला ट्रे विधि का प्रयोग भी किया जाता है. सैट बंडल तकनीक से उत्पादन 92 फीसदी तक मिलता है. इस विधि से गन्ना लगाने में ढाई क्विंटल बीज और 1,200 रुपए प्रति एकड़ का मजदूरी का खर्च आता है. इस तरीके से 12,000 से ले कर 20,000 रुपए तक प्रति एकड़ बचत होती है.

खेतों में नर्सरी पौधे लगाने से एक पौधे से कई कंसे निकलते हैं, जिस से गन्ने का उत्पादन 2 से 3 गुना बढ़ जाता है. राकेश दुबे गन्ने की 6 से 7 किस्मों का इस्तेमाल करते हैं. इस में 86032, 3102, 238, 8005, 1001, संकेश्वर 92, 93 खास किस्में हैं.

गन्ने की बोआई में बीज की मात्रा कम करने का तरीका बताते हुए वे कहते हैं कि पिछले 3 साल से वे एक आंख के टुकड़ों की मदद से नर्सरी तैयार कर गन्ने की बोआई कर रहे हैं. प्रति एकड़ खेत में केवल 4,800 पौधों की जरूरत होती है, जिस में केवल ढाई क्विंटल बीज लगता है.

नर्सरी विधि से गन्ना लगाने पर पौध से पौध की दूरी का खास खयाल रखा जाता है. गन्ने के इस खेत में और भी कई तरह की सहफसल ले सकते हैं. इस तरह से एक फसल की लागत में दूसरी फसलें भी ली जा सकती हैं. जहां पर पौधा लगा होता है, वहीं पर खाद दी जाती है, जिस से खाद का उपयोग भी सीमित मात्रा में होता है.

Jaggeryगन्ना के जैविक उत्पाद

देश में कई ऐसे गन्ना किसान हैं, जो अपनी फसल के लिए मेहनत तो बहुत करते हैं, लेकिन गन्ने की परंपरागत खेती कर के ज्यादा आमदनी नहीं ले पाते हैं और गन्ने की खेती को घाटे का सौदा मान लेते हैं. किसान गन्ने की जैविक खेती कर के अच्छी आमदनी ले सकते हैं.

मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के दोनी गांव के एक प्रगतिशील किसान अभिषेक चंदेल गन्ने की खेती करने वाले अपने इलाके के कामयाब किसानों में एक हैं, जिन्होंने बाजार में सीधे गन्ना न बेच कर उस के जैविक उत्पाद बना कर बेचना शुरू किया और बीते साल 14 एकड़ जमीन में उगाए गन्ने का गुड़ बेच कर लागत निकाल कर 20 लाख रुपए से ज्यादा का मुनाफा कमाया है.

जैविक गुड़ की मार्केटिंग खुद करनी पड़ती है. भाव भी अच्छा मिलने से मुनाफा ज्यादा होता है. जैविक गन्ने की लागत भी कम आती है. अभी सब से ज्यादा इन का गुड़ चंडीगढ़ जाता है. हैदराबाद, जयपुर, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान में भी इस की काफी मांग है. मध्य प्रदेश के इस जैविक गुड़ की मांग दुबई और श्रीलंका जैसे देशों में भी है.

भारतीय गन्ना सब से महंगा

नई दिल्ली: अंतर्राष्ट्रीय चीनी संगठन (आईएसओ) ने अपनी 63वीं परिषद बैठक में घोषणा की कि भारत वर्ष 2024 के लिए संगठन का अध्यक्ष होगा. इस संगठन का मुख्यालय लंदन में है. वैश्विक चीनी क्षेत्र का नेतृत्व करना देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि है और यह इस क्षेत्र में देश के बढ़ते कद को दर्शाता है.

आईएसओ परिषद बैठक में भाग लेते हुए भारत के खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने कहा कि भारत 2024 में आईएसओ की अपनी अध्यक्षता की अवधि के दौरान सभी सदस्य देशों से समर्थन और सहयोग चाहता है और गन्ने की खेती, चीनी और इथेनाल उत्पादन में अधिक टिकाऊ प्रथाओं को अपनाने और उपउत्पादों के बेहतर उपयोग के लिए सभी सदस्य देशों को एकसाथ लाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है.

भारत दुनिया में चीनी का सब से बड़ा उपभोक्ता और दूसरा सब से बड़ा उत्पादक देश रहा है. वैश्विक चीनी खपत में लगभग 15 फीसदी हिस्सेदारी और चीनी के लगभग 20 फीसदी उत्पादन के साथ, भारतीय चीनी रुझान वैश्विक बाजारों को बहुत प्रभावित करते हैं. यह अग्रणी स्थिति भारत को अंतर्राष्ट्रीय चीनी संगठन (आईएसओ) का नेतृत्व करने के लिए सब से उपयुक्त राष्ट्र बनाती है, जो चीनी और संबंधित उत्पादों पर शीर्ष अंतर्राष्ट्रीय निकाय है. इस के लगभग 90 देश सदस्य हैं.

चीनी बाजार में विश्व के पश्चिमी गोलार्ध में ब्राजील तो पूर्वी गोलार्ध में भारत अग्रणी है. अब, अमेरिका और ब्राजील के बाद इथेनाल उत्पादन में दुनिया का तीसरा सब से बड़ा देश होने के नाते भारत ने हरित ऊर्जा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और घरेलू बाजार में अधिशेष चीनी की चुनौतियों को जीवाश्म ईंधन आयात के समाधान में बदलने की क्षमता दिखाई है और इसे सीओपी 26 लक्ष्यों को पूरा करने के लिए एक उपकरण के रूप में पेश किया है.

उल्लेखनीय है कि भारत में इथेनाल मिश्रण साल 2019-20 में 5 फीसदी से बढ़ कर साल 2022-23 में 12 फीसदी हो गया है, जबकि इसी अवधि के दौरान उत्पादन 173 करोड़ लिटर से बढ़ कर 500 करोड़ लिटर से अधिक हो गया है.

भारतीय चीनी उद्योग ने पूरे व्यापार मौडल को टिकाऊ और लाभदायक बनाने के लिए इस के आधुनिकीकरण और विस्तार के साथसाथ अतिरिक्त राजस्व धाराओं का सृजन करने के लिए अपने सहउत्पादों की क्षमता के दोहन के लिए विविधीकरण में एक लंबा सफर तय किया है. इस ने कोविड महामारी के दौरान अपनी मिलों का संचालन कर के अपनी मजबूती साबित की है, जबकि देश लौकडाउन का सामना कर रहा था और देश में मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त हैंड सैनिटाइजर का उत्पादन कर के आगे बढ़ रहा था.

भारत को अपने किसानों के लिए उच्चतम गन्ना मूल्य का भुगतानकर्ता होने का एक अनूठा गौरव प्राप्त है और अब भी यह बिना किसी सरकारी वित्तीय सहायता के आत्मनिर्भर तरीके से काम करने और लाभ कमाने में पर्याप्त रूप से सक्षम है. सरकार और चीनी उद्योग के बीच तालमेल ने भारतीय चीनी उद्योग को फिर से जीवंत करना और देश में हरित ऊर्जा में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में बदलना संभव बना दिया है. किसानों के लंबित गन्ना बकाए का युग अब बीते जमाने की बात हो गई है.

पिछले सीजन 2022-23 के 98 फीसदी से अधिक गन्ना बकाया का भुगतान पहले ही किया जा चुका है और पिछले गन्ना मौसम के 99.9 फीसदी से अधिक गन्ना बकाया का भुगतान हो चुका है. इस प्रकार, भारत में गन्ना बकाया लंबित राशि अब तक के सब से निचले स्तर पर है.

भारत ने न केवल किसानों और उद्योग का ध्यान रख कर, बल्कि उपभोक्ताओं को भी आगे रख कर मिसाल कायम की है. घरेलू चीनी खुदरा कीमतें स्थिर हैं. जहां वैश्विक कीमतें एक वर्ष में लगभग 40 फीसदी बढ़ जाती हैं, वहीं भारत चीनी उद्योग पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना पिछले साल से 5 फीसदी की वृद्धि के भीतर चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने में सक्षम रहा है.

तकनीकी पक्ष पर भी, राष्ट्रीय चीनी संस्थान, कानपुर ने अपना विस्तार किया है और इस क्षेत्र में नवीनतम प्रौद्योगिकियों और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने के लिए इंडोनेशिया, नाईजीरिया, मिस्र, फिजी सहित कई देशों के साथ सहयोग कर रहा है.

शरदकालीन गन्ने की वैज्ञानिक खेती

शरदकालीन गन्ने की खेती जो किसान भाई करना चाहते हैं तो इस के लिए सही समय अक्तूबरनवंबर माह का होता है. गन्ना घास समूह का पौधा है. इस का इस्तेमाल बहुद्देश्यीय फसल के रूप में चीनी उत्पादन के साथसाथ अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों जैसे कि पेपर, इथेनाल और दूसरे एल्कोहल से बनने वाले कैमिकल, पशु खाद्यों, एंटीबायोटिक्स, पार्टीकल बोर्ड, जैव उर्वरक व बिजली पैदा करने के लिए कच्चे पदार्थ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

गन्ने को खासतौर पर व्यापारिक चीनी उत्पादन करने वाली फसल के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है, जो कि दुनिया में उत्पादित होने वाली चीनी के उत्पादन में तकरीबन 80 फीसदी योगदान देता है. गन्ने की खेती दुनियाभर में पुराने समय से ही होती आ रही है, पर 20वीं सदी में इस फसल को एक नकदी फसल में रूप में पहचान मिली है.

भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि आधारित होने के चलते गन्ने का इस में खासा योगदान है. गन्ने के क्षेत्र, उत्पादन व उत्पादकता में भारत दुनियाभर में दूसरे नंबर पर है. वर्तमान में गन्ना उत्पादन में भारत की विश्व में शीर्ष देशों में गिनती होती है. वैसे, ब्राजील व क्यूबा भी भारत के तकरीबन बराबर ही गन्ना पैदा करते हैं. भारत में 4 करोड़ किसान रोजीरोटी के लिए गन्ने की खेती पर निर्भर हैं और इतने ही खेतिहर मजदूर निर्भर हैं.

गन्ने के महत्त्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि देश में निर्मित सभी प्रमुख मीठे उत्पादों के लिए गन्ना एक प्रमुख कच्चा माल है. इतना ही नहीं, इस का इस्तेमाल खांड़सारी उद्योग में भी किया जाता है.

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, पंजाब, हरियाणा मुख्य गन्ना उत्पादक राज्य हैं. मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और असम के कुछ इलाकों में भी गन्ना पैदा किया जाता है, लेकिन इन राज्यों में उत्पादकता बहुत कम है. इस के अलावा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात में भी गन्ने का उत्पादन किया जाता है.

कुल उत्पादित गन्ने का 40 फीसदी हिस्सा चीनी बनाने में इस्तेमाल किया जाता है. उत्तर प्रदेश देश की कुल गन्ना उपज का 35.8 फीसदी, महाराष्ट्र, 25.4 फीसदी और तमिलनाडु 10.3 फीसदी पैदा करते हैं यानी ये तीनों राज्य देश के कुल गन्ना उत्पादन का 72 फीसदी उत्पादन करते हैं.

गन्ने के बीज का चयन करते समय यह ध्यान रखें कि गन्ना बीज उन्नत प्रजाति का हो, शुद्ध हो व रोगरहित होना चाहिए. गन्ने की आंख पूरी तरह विकसित और फूली हुई हो. जिस गन्ने का छोटा कोर हो, फूल आ गए हों, आंखें अंकुरित हों या जड़ें निकली हों, ऐसा गन्ना बीज उपयोग न करें.

शरदकालीन गन्ने की बोआई के लिए अक्तूबर माह का पहला पखवाड़ा सही है. बोआई के लिए पिछले साल सर्दी में बोए गए गन्ने के बीज लेना अच्छा रहेगा. बोने से पहले खेत की तैयारी के समय ट्राईकोडर्मा मिला हुआ प्रेसमड गोबर की खाद 10 टन प्रति हेक्टेयर का प्रयोग जरूर करें.

कैसे बचाएं कीटों से

जिन खेतों में दीमक की समस्या है या फिर पेड़ी अंकुर बेधक कीटों की समस्या ज्यादा होती है, वहां पर इस की रोकथाम के लिए क्लोरोपाइरीफास 6.2 ईसी 5 लिटर प्रति हेक्टेयर या फ्लोरैंटो नीपोल 8.5 ईसी 500 से 600 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर का 1,500 से 1,600 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

गन्ने की खेती के लिए जैव उर्वरक : शोध के बाद वैज्ञानिकों ने पाया है कि गन्ने की खेती के लिए जैव उर्वरक काफी फायदेमंद साबित होते हैं. सही माने में देखा जाए तो जैविक खाद लाभकारी जीवाणुओं का ऐसा जीवंत समूह है जिन को बीज जड़ों या मिट्टी में प्रयोग करने पर पौधे को अधिक मात्रा में पोषक तत्त्व मिलने लगते हैं. साथ ही, मिट्टी की जीवाणु क्रियाशीलता व सामान्य स्वास्थ्य में भी बढ़वार देखी गई है.

गन्ने की खेती के लिए जीवाणु वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन स्तर का प्रवर्तन कर उसे पौधों के लायक बना देते हैं. साथ ही, यह पौधे के लिए वृद्धि हार्मोन बनाते हैं. अकसर देखा गया है कि एसीटोबैक्टर, एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम वगैरह ऐसे जीवाणु हैं, जो गन्ने की खेती को फायदा पहुंचाते हैं.

जैविक खाद के बेअसर होने की वजह : प्रभावहीन जीवाणुओं का उपयोग, जीवाणु तादाद में कम होना, अनचाहे जीवाणुओं का ज्यादा होना, जीवाणु खाद को उच्च तापमान या सूरज की रोशनी में रखना, अनुशंसित विधि का ठीक से प्रयोग न करना, जीवाणु खाद को कैमिकल खाद के साथ प्रयोग करना, इस्तेमाल के समय मिट्टी में तेज तापमान या कम पानी का होना, मिट्टी का ज्यादा क्षारीय और अम्लीय होना, फास्फोरस और पोटैशियम की अनुपलब्धता और मिट्टी में जीवाणुओं व वायरस का अधिक होना भी उत्पादन को प्रभावित करता है.

कितनी करें सिंचाई : यह बात सही है कि जैविक खाद कैमिकल खाद की जगह नहीं ले सकती, लेकिन किसान अगर दोनों का सही मात्रा में अपनी खेती में इस्तेमाल करते हैं, तो माली फायदे के साथ में पानी भी दूषित नहीं हो सकेगा.

जैविक खाद का इस्तेमाल करना किसानों के लिए हितकारी ही नहीं, लाभकारी भी होगा. उष्णकटिबंधीय इलाकों में पहले 35 दिनों तक हर 7वें दिन, 36 से 110 दिनों के दौरान हर 10वें दिन, बेहद बढ़वार की अवस्था के दौरान 7वें दिन और पूरी तरह पकने की अवस्था के दौरान हर 15 दिन बाद सिंचाई की जानी चाहिए. इन दोनों को बारिश होने के मुताबिक अनुकूलित करना पड़ता है. गन्ने की खेती में तकरीबन 30 से 40 सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है.

कम पानी में कैसे हो खेती

गन्ना एक से अधिक पानी की जरूरत वाली फसल है. एक टन गन्ने के उत्पादन के लिए तकरीबन 250 टन पानी की जरूरत होती है. वैसे तो बिना उत्पादन में कमी लाए पानी की जरूरत को अपनेआप में कम नहीं किया जा सकता है, मगर सिंचाई के लिए पानी की जरूरत में कमी पानी को उस के स्रोत से पाइपलाइन के द्वारा खेत जड़ क्षेत्र तक ला कर रास्ते में होने वाले रिसाव के कारण नुकसान को रोक कर या फिर सूक्ष्म सिंचाई विधियों को अपना कर लाई जा सकती है.

जब पानी की कमी के हालात हों, तब हर दूसरे हफ्ते में पानी से सिंचाई की जा सकती है या फिर मल्च का प्रयोग कर के पानी की जरूरत में कमी लाई जा सकती है. सूखे के हालात में 2.5 फीसदी यूरिया, 2.5 फीसदी म्यूरेट औफ पोटाश के घोल को पाक्षिक अंतराल पर 3 से 4 बार छिड़काव कर उस के प्रभाव को कम किया जा सकता है.

पानी के सही प्रयोग के लिए टपक सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त रखना बेहद जरूरी है. इस के लिए समयसमय पर पानी की नालियों के अंत के ढक्कन खोल कर इन में से पानी को तेजी से बह कर साफ करें. टपक प्रणाली के अंदर की सतह पर जमे पदार्थ को हटाने के लिए 30 फीसदी हाइड्रोक्लोरिक एसिड को इंजैक्ट करें. जब सिंचाई के पानी का स्रोत नदी, नहर और खुला कुआं वगैरह हों, तो व्यक्ति कवच वगैरह के लिए 1 पीपीएम ब्लीचिंग पाउडर से  साफ करना चाहिए. एसिड उपचार और साफ करते समय यह पानी की क्वालिटी पर निर्भर करती है.

Sugarcane

उन्नत प्रजातियां

जल्दी पकने वाली प्रजातियां : कोषा 681, कोषा 8436, कोषा 90265, कोषा 88230, कोषा 95435, कोषा 95255, कोषा 96258, कोसे 91232, कोसे 95436, कोएच 92201, कोजा 64 प्रमुख हैं.

मध्यम और देर से पकने वाली प्रजातियां : कोशा 7918, कोशा 8432, कोशा 767, कोशा 8439, कोशा 88216, कोशा 90269, कोशा 92263, कोशा 87220, कोशा 87222, कोशा 97225, कोपंत 84212, कोपंत 90223, यूपी 22, यूपी 9529, कोसे 92234, कोसे 91423, कोसे 95427, कोसे 96436 खास हैं.

सीमित सिंचित इलाकों के लिए : कोशा 767, कोशा 802, कोशा 7918, कोशा 8118 व यूपी 5 वगैरह हैं.

जलभराव वाले इलाकों के लिए : कोशा 767, कोशा 8001, कोशा 8016, कोशा 8118, कोशा 8099, कोशा 8206, कोशा 8207, कोशा 8119, कोशा 95255, कोसे 96436, यूपी 1, कोशा 9530 वगैरह हैं.

ऊसर जमीन के लिए : को 1158, कोशा 767 खास हैं.

गन्ने के साथ लें दूसरी फसल भी

गन्ने की शुद्ध फसल में गन्ने की बोआई 75 सैंटीमीटर और आलू, राई, चना, सरसों के साथ मिलवां फसल में 90 सैंटीमीटर की दूरी पर बोना चाहिए. एक आंख का टुकड़ा लगाने पर प्रति एकड़ 10 क्विंटल बीज लगेगा. 2 आंख के टुकड़े लगाने पर 20 क्विंटल बीज लगेगा.

पौलीबैग यानी पौलीथिन के उपयोग से बीज की बचत होगी और ज्यादा उत्पादन मिलेगा. बीजोपचार के बाद ही बीज बोएं. 205 ग्राम अर्टन या 500 ग्राम इक्वल को 100 लिटर पानी में घोल कर उस में तकरीबन 25 क्विंटल गन्ने के टुकड़े उपचारित किए जा सकते हैं.

जैविक उपचार प्रति एकड़ 1 लिटर एसीटोबैक्टर प्लस 1 लिटर पीएसबी का 100 लिटर पानी में घोल बना कर रासायनिक बीजोपचार के बाद गन्ने के टुकड़ों को सूखने के बाद सही घोल में 30 मिनट तक डुबो कर उपचार करने के बाद ही बोआई करें.

गन्ने को भी दें खादउर्वरक : गन्ने में खादउर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी जांच के आधार पर जरूरत के मुताबिक पोषक तत्त्वों का उपयोग कर के उर्वरक खर्च में बचत कर सकते हैं. अगर मिट्टी जांच न हुई हो तो बोआई के समय प्रति हेक्टेयर 60 से 75 किलोग्राम नाइट्रोजन, 70 से 80 किलोग्राम फास्फोरस, 20 से 40 किलोग्राम पोटाश व 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए.

गन्ने की लगाई तकरीबन 10 फीसदी फसल खराब होने की मुख्य वजह फसल को दी गई खाद के साथ पोटाश की सही मात्रा का उपलब्ध न होना है.

शोधों से पता चला है कि गन्ने की खेती में अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए प्रति एकड़ तकरीबन 33 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है, इसलिए गन्ने की खेती में पोटाश का प्रयोग जरूर करें.

गन्ने की खेती में कीर्तिमान

भारत में ज्यादातर किसान खेती से परेशान हैं. ऐसे में वे मजबूरी में खेती कर रहे हैं. इस की मुख्य वजह कहीं न कहीं उन की उपज का सही दाम न मिल पाना है, जिस के चलते उन्हें लगातार घाटा हो रहा है. फिर भी कुछ ऐसे किसान हैं, जो जरा कर के खेतीबारी कर रहे हैं.

कृषि में नया प्रयोग एक सार्थक प्रयास सच साबित हो रहा है. ऐसे ही एक किसान हैं अचल मिश्रा. उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के रहने वाले अचल मिश्रा ने कृषि में नया कीर्तिमान बनाया है.

देश की राजधानी से तकरीबन 450 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश का चीनी का कटोरा कहा जाने वाला जिला लखीमपुर खीरी के पलिया इलाके के मड़ई पुरवा के रहने वाले अचल मिश्रा तकरीबन 80 एकड़ भूमि पर गन्ने की खेती करते हैं. वे गन्ने में प्रति एकड़ गन्ना उत्पादन भी काफी अच्छा लेते हैं. नईनई विधियों को आजमा कर उपज बढ़ाने के लिए वे उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती में हमेशा प्रथम स्थान हासिल करते हैं.

लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध काल्विन डिगरी कालेज से बैरिस्टरी में स्नातक अचल मिश्रा अपने विश्वविद्यालय से गोल्ड मैडलिस्ट भी रह चुके हैं. पढ़ाई के बाद नौकरी करने के बजाय खेती को ही अपना व्यवसाय बनाया और अपने गांव लौट कर परंपरागत खेती को छोड़ कर आधुनिक विधि से करना शुरू किया.

Sugarcane
Sugarcane

पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ से बात करते हुए अचल मिश्रा बताते हैं, ‘‘हम ने साल 2006 से गन्ने की खेती को नईनई वैज्ञानिक विधि से करना शुरू किया. मौजदू समय में मेरे खेत में भी 18 से 20 फुट तक का गन्ना होता है. उपज की बात करें, तो 1,050 से 1,200 क्विंटल प्रति एकड़ होती है. गन्ने की खेती में पिछले 5 सालों से लगातार मुझे प्रथम पुरस्कार मिल रहा है.’’

साल 2018 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राज्यों से प्रगतिशील किसानों को प्रधानमंत्री कार्यालय, दिल्ली में आमंत्रित किया था. उस में गन्ने की खेती करने वाले वे अकेले किसान थे.

गन्ने के साथसाथ तैयार करते हैं गन्ने की नर्सरी

Sugarcane
Sugarcane

अचल मिश्रा बताते हैं कि एक एकड़ खेत में उच्च कोटि की गन्ने की नर्सरी भी तैयार की. उन्होंने बताया कि कोलख 14201 गन्ने के बीज की नर्सरी बटचिप विधि से तकरीबन एक लाख पौध तैयार कर के 12 लाख रुपए कमाए. इस बार वे गन्ने की नर्सरी का काम बड़े पैमाने पर करने जा रहे हैं.

 

 

फार्म को बनाया टूरिस्ट प्लेस

अचल मिश्रा ने अपने फार्म को ‘यूएस गन्ना आश्रम’ के नाम से शानदार फार्महाउस तैयार कर रखा है. आश्रम में आने वाले अतिथियों को शुद्ध जैविक विधि से तैयार सागसब्जियां, देशी मोटे अनाज की रोटियां खाने को मिलती हैं, जिस का स्वाद चखने के लिए बहुत दूरदूर से लोग आते हैं.