आलू फसल में पिछेती झुलसा, करें बचाव

हिसार : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला, हिमाचल प्रदेश द्वारा विकसित इंडोब्लाइटकास्ट पैन इंडिया मौडल से पिछेती झुलसा बीमारी का पूर्वानुमान लगाया गया है.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कांबोज ने कहा कि वैज्ञानिक फसलों में आने वाली समस्याओं के बारे में समय से पहले किसानों को लगातार सलाह दे रहे हैं. इसी कड़ी में आलू से संबंधित किसानों को सलाह दी जा रही है कि भविष्य में हिसार जिले में आलू की फसल में पिछेती झुलसा बीमारी आने की संभावना है.

करें फफूदीनाशक का छिड़काव

जिन किसानों ने आलू की फसल में अभी तक फफूंदनाशक दवा का छिड़काव नहीं किया है या जिन की आलू की फसल में पिछेती झुलसा बीमारी प्रकट नहीं हुई है, वे किसान भी मैन्कोजेब इंडोफील एन-45 या मैनजेब दवा 600 से 800 ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से फसल में छिड़काव करें. साथ ही, 10 दिन के अंतराल पर किसान आलू की फसल से जल निकासी का उचित प्रबंध करें और खेतों को खरपतवार रहित रखें.

कृषि महाविद्यालय के सब्जी विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डाक्टर एसके तेहलान ने कहा कि पिछेती झुलसा बीमारी फाइटोपथोरा इन्फेसटाइंस फफूंद के कारण होता है, जिस का प्रभाव पौधों के सभी भागों जैसे पत्तियों, तने व कंदों पर दिखाई पड़ता है. पिछेती झुलसा बीमारी का प्रांरभिक लक्षण आलू के पौधों की पत्तियों पर धब्बों के रूप में दिखाई देता है जो बाद में गहरे भूरे तथा बैगनी रंग में बदल जाता है.

उन्होंने आगे कहा कि किसानों को आलू की फसल को पिछेती झुलसा बीमारी से बचाने के लिए समयसमय पर फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव करते रहना चाहिए. साथ ही, फसल की निगरानी हर 10 दिन के अंदर करते रहना चाहिए.

वैज्ञानिक डाक्टर राकेश चुघ ने किसानों को आलू की फसल में पिछेती झुलसा बीमारी के लक्षण और रोकथाम की विस्तारपूर्वक जानकारी देते हुए बताया कि आलू के पौधों की पत्तियों पर यदि धब्बे दिखाई देते हैं तो उस के चारों तरफ हलके पीले रंग का घेरा भी बन जाता है. साथ ही, मौसम में बदलाव होने पर तापमान में अधिक नमी का होना और बादल छाए रहते हैं तो धब्बे बड़े होने लग जाते हैं, जिस से पत्तियों की निचली सतह पर फफूंद की परत जमने लगती है, इसलिए आलू किसान समय रहते फसल सुरक्षा का ध्यान रखें.

 मधुमक्खीपालन को बनाएं स्वरोजगार, मिल रही सरकारी मदद

हिसार: हरियाणा के भूमिहीन, बेरोजगार और अशिक्षित यानी अपढ़ ग्रामीण पुरुष व महिला किसानों को अब मधुमक्खीपालन के प्रति रुचि पैदा करने व छोटी मधुमक्खीपालन इकाई की स्थापना कर इसे स्वरोजगार के रूप में अपनाने में आर्थिक व तकनीकी मदद मिलेगी. इस के लिए चैधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और इंडियन औयल कारपोरेशन लिमिटेड के बीच एमओयू हुआ है.
कुलपति प्रो. बीआर कंबोज की उपस्थिति में विश्वविद्यालय की ओर से अनुसंधान निदेशक डा. जीतराम शर्मा और इंडियन औयल कारपोरेशन लिमिटेड की तरफ से उत्तरी क्षेत्रीय पाइपलाइन के कार्यकारी निदेशक एसके कनौजिया ने इस एमओयू पर हस्ताक्षर किए. इस दौरान इंडियन औयल कारपोरेशन लिमिटेड की तरफ से उत्तरी क्षेत्रीय पाइपलाइन से डिप्टी जनरल मैनेजर नीरज सिंह व मैनेजर अनुराग जायसवाल भी मौजूद रहे.

कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने कहा कि हरियाणा शहद उत्पादन में अग्रणी राज्यों में से एक है. मधुमक्खीपालन क्षेत्रों में हरियाणा राज्य पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है. प्रदेश के भूमिहीन, बेरोजगार, अशिक्षित व कम जोत वाले किसान मधुमक्खीपालन को रोजगार के रूप में अपना कर अपनी माली हालत को मजबूत कर सकते हैं.

उन्होंने आगे कहा कि योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों खासतौर पर महिलाओं में मधुमक्खीपालन को लोकप्रिय बना कर स्वरोजगार को स्थापित करना है. इस से प्रशिक्षण प्राप्त प्रतिभागी न केवल खुद रोजगार प्राप्त कर सकेंगे, अपितु दूसरों को भी रोजगार प्रदान करने में सक्षम होंगे.

उन्होंने यह भी बताया कि मधुमक्खीपालन अपनाने से किसानों व खासतौर पर महिलाओं के लिए आजीविका के साधन बढ़ेंगे, साथ ही स्वास्थ्य को भी लाभ मिलेगा.

इंडियन औयल कारपोरेशन लिमिटेड के उत्तरी क्षेत्रीय पाइपलाइन के कार्यकारी निदेशक एसके कनौजिया ने बताया कि हरियाणा में मधुमक्खीपालन में रोजगार के बेहतरीन अवसर हैं. हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय किसानों से सीधेतौर से जुड़ कर उन के उत्थान में अग्रणी भूमिका निभा रहा है.

उन्होंने यह भी कहा कि खासतौर पर महिला किसान मधुमक्खीपालन को अपना कर संतुलित आहार व पोषक तत्व सहित अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं. उन्होंने एमओयू पर खुशी जाहिर की, साथ ही सामाजिक दायित्व के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मिले सहयोग हेतु विश्वविद्यालय के कुलपति डा. बीआर कंबोज का आभार जताया.

कीट विज्ञान विभाग की अध्यक्ष एवं परियोजना अधिकारी डा. सुनीता यादव ने बताया कि हरियाणा के विभिन्न जिलों में वैज्ञानिक मधुमक्खीपालन और इस में विविधीकरण को अपनाने से स्थायी आर्थिक व पोषण सुरक्षा विषय पर आधारित मधुक्रांति योजना के तहत शुरुआती चरण में हरियाणा के 4 जिलों का चयन किया गया है, जिन में करनाल, कुरुक्षेत्र, झज्जर व सोनीपत शामिल हैं.

उन्होंने बताया कि चारों जिलों से कुल 120 बेरोजगार युवा, महिला प्रशिक्षुओं को मधुमक्खीपालन संबंधित प्रशिक्षण देने व उन्हें छोटी मधुमक्खीपालन इकाई की स्थापना कर इन्हें स्वरोजगार के रूप में अपनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा. प्रशिक्षुओं को मधुमक्खीपालन इकाई की स्थापना के लिए निःशुल्क किट व आवश्यक सामग्री भी उपलब्ध कराई जाएगी.

कृषि विज्ञान केंद्रों की देखरेख व उन की मदद से प्रशिक्षकों को उन के उत्पादों की मार्केटिंग करने में भी मदद की जाएगी. साथ ही, उन्हें मधुमक्खीपालन इकाइयों का भी भ्रमण करवाया जाएगा. उन्होंने बताया कि कुल 1,300 गरीब महिलाओं व बच्चों को निःशुल्क शहद वितरित किया जाएगा और शहद के गुणों व औषधीय लाभों को बता कर उन में जागरूकता पैदा की जाएगी.

गैरपरंपरागत नकदी फसलों की खेती

राजस्थान भारत का सब से बड़ा राज्य है और पिछड़े हुए राज्यों की कैटीगरी में आता है. यह राज्य भारत की उत्तरीपश्चिमी सीमा पर बसा है. यहां की पारिस्थितिकी और वातावरणीय हालात बहुत ही प्रतिकूल हैं और यहां पर कम और अनियमित बारिश, ज्यादा तापमान, चलायमान रेतीले टीबे, धूल भरी आंधियां वगैरह जैसे हालात आमतौर पर बने रहते हैं. यहां के ज्यादातर लोग खेती पर निर्भर रहते हैं और परंपरागत फसलों जैसे बाजरा, तिल वगैरह की खेती करते हैं.

ज्यादा गंभीर हालत और बारिश की अनियमितता के चलते इस इलाके के किसान हमेशा आशंकित और डरेसहमे रहते हैं. यहां अकाल जैसी आपदा का अंदेशा बना रहता है. कुछ गैरपरंपरागत फसलों जैसे सोनामुखी, जोजोबा, तुंबा वगैरह की खेती द्वारा इस इलाके के किसान न केवल बारिश की अनियमितता से होने वाले नुकसान से बच सकते हैं, वरना उन्हें इस से एक अच्छी आमदनी भी मिल सकती है. इन सभी के अलावा इन गैरपरंपरागत फसलों की खेती से परती जमीन में हरियाली भी लाई जा सकती है.

जोजोबा

JoJoba

 

जोजोबा या होहोबा के नाम से पुकारे जाने वाली इस मध्यम आकार की और सदा हरी रहने वाली  झाड़ी का वानस्पतिक नाम साइमोन्डीया चाइनेनसिस है और यह साइमोनडिएसी कुल का सदस्य है. यह द्विलिंगी प्रकृति की  झाड़ी मरू इलाके के विकटतम हालात में भी अच्छी तरह पनप सकती है. इस के नर व मादा पौधे में भेद महज पुष्पन के दौरान ही किया जा सकता है.

यह पादप मुख्य रूप से मैक्सिको व कैलिफोर्निया के सोनारन रेगिस्तान भूभाग का है और शुष्क अनुसंधान संस्थान, काजरी द्वारा भारत में लाया गया है. जोजोबा मुख्य रूप से इस के वसीय तेल के व्यापारिक महत्त्व के चलते उगाया जाता है.

खेती : इसे सब से पहले साल 1965 में सैंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट, काजरी द्वारा इजरायल से ला कर उगाया गया था. इस के पौधे रोपने के लिए बीजों का उपयोग किया जाता है.

बीजों को पौली बैग में लगा कर उगाया जाता है, परंतु कभीकभी सीधे ही रोपनी यानी नर्सरी में बीजारोपण भी किया जाता है. प्रयोगों द्वारा सीधे बीज रोपण से बहुत ही कम अंकुरण होने की पुष्टि के बाद इस की खेती के लिए पौली बैग में ही बीज रोपण किया जाता है.

बीजारोपण के लिए बीजों को ताजा पानी में 24 घंटे तक डुबो कर रखा जाता है और उस के बाद क्ले, मिट्टी व फार्मयार्ड मैन्योर यानी एफवाईएम के 1:1:1 के अनुपात के मिश्रण से भरी पौली बैग में बीजारोपण कर दिया जाता है.

बीजारोपण आमतौर पर अक्तूबर माह में किया जाता है और शुरू में दिन में 2 बार हलकी सिंचाई भी की जाती है. रोपणी में पौधे 8-9 माह में तैयार हो जाते हैं.

इस तरह रोपणी में तैयार पौधों को मानसून के दौरान 45×45×45 आकार के गड्ढों में 5 किलोग्राम फार्मयार्ड मैन्योर व कुछ कीटनाशी डाल कर रोप दिया जाता है. बडे़ पैमाने पर इस की खेती के लिए 4×3 का फासला रखा जाता है.

इस की खेती में नर व मादा पौधों का अनुपात 1:4 रखने के लिए ज्यादा पौधों नर या मादा को हटा लेते हैं.

शुरुआत में खरपतवारों को उखाड़ कर या नष्ट कर के इस की बढ़वार दर को बढ़ाया जा सकता है. जोजोबा में फल उत्पादन अप्रैलमई माह में शुरू हो जाता है. शुरूशुरू में फलोत्पादन बहुत कम होता है, पर यह धीरेधीरे बढ़ता जाता है और 10वें साल में औसत प्रति पौधे से 1 किलोग्राम बीजोत्पादन फलों से हासिल किया जा सकता है.

उपयोग : जोजोबा का मुख्य उपयोगी पदार्थ इस से मिलने वाला तेल है, जिस का इस्तेमाल कौस्मैटिक उद्योग के अलावा फार्मास्यूटिकल, स्नेहतक तेल व खाने वाले तेल के रूप में किया जाता है.

इस के अलावा विद्युत रोधी, आग प्रतिरोधी पदार्थ के साथ ही ट्रांसफार्मर में तेल के रूप में इस्तेमाल होता है. इस के तेल का उच्च क्विथनांक और गलनांक होता है और इस का श्रेय बिंदु भी 315 डिगरी सैंटीग्रेड है.

सोनामुखी

Sonamukhi

इस पौधे का वानस्पतिक नाम कैसिया अंगुस्टीफोलिया है. इसे अरब के फिजिशियनों द्वारा भारत में प्रवर्तित किया गया और इस के बाद इसे भारतीय, ब्रिटिश व दुनिया के दूसरे फार्मोकोपियास में शामिल किया गया.

यह हर तरह की जमीन में उग सकता है. इस में सेनोसाइड ए और बी ग्लाइकोसाइड नामक कैमिकल पदार्थ पाए जाते हैं. यह एक छोटी बहुवार्षिक शाकीय पादप है, जिसे पूरी फसल या मिश्रित फसल के रूप में परंपरागत फसलों के साथ उगाया जाता है.

खेती : इसे आमतौर पर बीजों द्वारा उगाया जाता है. बीजों की बोआई ड्रिलिंग द्वारा छिड़काव विधि से की जाती है, पर 30 डिगरी सैंटीग्रेड की दूरी पर बोआई करना सही रहता है. बारिश पर आधारित खेती की परिस्थितियों में आमतौर पर 27 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर और सिंचित इलाके में 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मुफीद रहते हैं.

बीजों की बोआई से पहले बीजों की सतह को अच्छी तरह रगड़ लेना चाहिए. बीजों को बोने के बाद अंकुरित बीजों में एक से दो बार निराईगुड़ाई करनी चाहिए. पुष्प वृंत की मोटाई, पौधे के निचले हिस्से की मोटाई के बराबर होने पर उसे काट लेते हैं. इस से पौधे में ज्यादा शाखाएं निकलती हैं और बढ़वार की दर भी बढ़ जाती है.

खेती में हलकी सिंचाई करना जरूरी है. ज्यादा बारिश भी नुकसानदायक होती है. सोनामुखी फसल की 2 माह बाद कटाई की जा सकती है, पर पत्तियों की कटाई 3 माह बाद करना उपयुक्त रहता है.

सोनामुखी की पत्तियां व्यापारिक महत्त्व की होती हैं और उन्हें उचित तरीके से सुखाना व भंडारित करना चाहिए. सोनामुखी की पत्तियां और फलियों की जैविक क्षमता 5 सालों तक बरकरार रखी जा सकती है.

भारत में पैदा होने वाला सोनामुखी विदेशों में भेजा जाता है. सोनामुखी की फसल 2-3 साल तक खेत में खड़ी रह सकती है. इस की जडें़ बहुत गहरी जाती हैं और पादप तेज गरमी में भी खड़ा रह सकता है.

लैग्युमिनस कुल का पादप होने के चलते यह नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मददगार होता है और इस का स्वाद बहुत कड़वा होने के चलते इसे जानवर भी नहीं खाते हैं. सोनामुखी की फसल से 1-1.4 टन पत्तियां व 1.5 क्विंटल फली प्रति हेक्टेयर हासिल हो सकती है. सोनामुखी की खेती के लिए फरवरी से मार्च माह व जुलाई से अक्तूबर माह तक का समय यानी साल में 2 बार सही रहता है.

तुंबा

इसे वैज्ञानिक भाषा में सिटुलस कोलोसिंथिस कहते हैं. यह एक रेंगने वाला शाकीय पादप है, जो कुकुरबिटेसी कुल का सदस्य है. यह मूलत: अफ्रीका प्रायद्वीप का पादप है और तकरीबन पूरे भारत में पाया जाता है. यह मतीरे कुल का एक अहम सदस्य है और मरु इलाके के विकट हालात में भी अच्छी बढ़वार करने के अलावा माली रूप से भी उपयोगी है. इसी वजह से इसे मरु इलाके के रेगिस्तानी भूभाग के लिए उपयुक्त माना गया है.

तुंबा का पौधा बहुत तेजी से बढ़ता है और इस में 30 दिनों में ही पुष्पन शुरू हो जाता है और बोआई के 60 दिन बाद फलों का उत्पादन भी शुरू हो जाता है.

यह पौधा मिट्टी को बांधे रखने व रेतीले टीबों के स्थिरीकरण में मददगार है. इस के फलों में एक उपयोगी पदार्थ ग्लूकोसाइड कोलोसिंथिस होता है, जबकि बीजों में 20 फीसदी तेल व 11 फीसदी प्रोटीन होता है.

खेती : इस की बडे़ पैमाने पर खेती के लिए बीजों को 5 फीसदी सोडियम क्लोराइड घोल में डुबो देते हैं और उस में से कुछ देर बाद ऊपर तैरने वाले बीजों को जमा कर के गड्ढों में 20 सैंटीमीटर गहराई पर डाल कर 30-35 तापमान में बोआई करते हैं. 10-12 दिन बाद ही बीजों में अंकुरण शुरू हो जाता है.

बीजों की बोआई के लिए मानसून का समय उपयुक्त रहता है और देरी से बीजों की बोआई अगस्त माह के मध्य तक भी की जा सकती है. बीजों की बोआई ड्रिलिंग द्वारा खांचों में बोआई विधि से की जा सकती है या 120×120 सैंटीमीटर के गहरे गड्ढों में भी की जा सकती है. गड्ढों में बोआई के पहले 2 टन फार्मयार्ड मैन्योर और 5 किलोग्राम कीटनाशक प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलाना फायदेमंद रहता है.

खेती के लिए 2 बार खरपतवार उन्मूलन 20 दिन व 45 दिन बाद करना अच्छा रहता है. इस पर किसी खास कीट या रोग का हमला नहीं होता है, लेकिन कायिक अवस्था में पत्तियों पर कीटों का हमला देखा गया है और इसे कार्बारिल 0.2 फीसदी स्प्रे द्वारा काबू कर सकते हैं.

इस  के हरे फलों को जानवरों को खिलाया जाता है, जबकि पूरी तरह से पके हुए विकसित पीले फूलों को इकट्ठा कर के सुखाया जाता है और इन के बीज निकाले जाते हैं. अनुकूल हालात में 120 से 150 क्विंटल फल प्रति हेक्टेयर हासिल किए जा सकते हैं.

उपयोग : इस के फलों का औषधीय महत्त्व है. हमारे देशी चिकित्सा शास्त्र में इसे औषधि के रूप में काफी इस्तेमाल किया जाता है.

आमतौर पर इसे जुलाव के रूप में इस्तेमाल में लिया जाता है. इस के बीजों में 20 फीसदी प्रोटीन पाया जाता है. इस के तेल का उपयोग साबुन उद्योग के अलावा मोमबत्ती बनाने वगैरह में होता है.

राजस्थान में यह साबुन उद्योग के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होता है. इस के बीजों को साधारण नमक के साथ मिला कर रखने से इस का खारापन खत्म किया जा सकता है. सूखे बीज बाजरे के साथ मिश्रित कर पीसे जाते हैं और इस तरह का बना आटा गरीबों द्वारा अकाल में खाया जाता है.

इस तरह से इन गैरपरंपरागत नकदी फसलों की खेती कर के कम बारिश में भी उत्पाद हासिल किए जा सकते हैं. इन की खेती द्वारा इलाके में हरियाली के साथसाथ माली उन्नति भी हासिल की जा सकती है.

भेड़बकरी व खरगोशपालन की ली जानकारी

अविकानगरः केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर में एसएस जैन सुबोध पीजी कालेज, रामबाग सर्किल, जयपुर के 42 स्नातकोत्तर एवं स्नातक के छात्रों का एकदिवसीय शैक्षणिक भ्रमण कार्यक्रम अपनी फैकल्टी के डा. अनुराग जैन एवं डा. अनुरूपा गुप्ता के साथ आयोजित किया गया. छात्रों ने भ्रमण के दौरान संस्थान के दुंबा भेड़पालन के साथ खरगोशपालन इकाई का दौरा किया और बायोटैक्नोलौजी लैब में जा कर वहां के वैज्ञानिको के साथ संस्थान मे चल रहे शोध कार्यों को जाना.

इस दौरान छात्रों नें जानकारी ली कि कैसे वे संस्थान की सहायता से अपने पीजी रिसर्च प्रोजैक्ट पर काम कर सकते हैं.

एटिक सैंटर के तकनीकी कर्मचारी पिल्लू मीना द्वारा छात्रों को संस्थान का एकदिवसीय भ्रमण के तहत विभिन्न जगह जैसे वूल प्लांट, सैक्टर्स, फिजिलौजी आदि का भी भ्रमण कराया गया.

निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने सभी छात्रों को संबोधित किया कि आने वाले समय में आप के द्वारा देश के विभिन्न क्षेत्र में जा कर नए शोध को कर के देश को रिसर्च मे नई ऊंचाई देनी है.

उन्होंने छात्रों से आगे कहा कि आप संस्थान से अपने विषय की प्रैक्टिकल जानकारी सीख कर जाएं कि कैसे आप अपने कालेज की तालीम से देशहित में योगदान दे सकते हैं. सुबोध कालेज की फैकल्टी डा. अनुरूपा गुप्ता द्वारा भी भविष्य मे संस्थान के साथ जुड़ कर छात्रों के शोध कार्य में अवसर के बारे मंे विस्तार से निदेशक के साथ डिस्कशन किया गया.

दालों से मिलेगी अधिक उपज

नई दिल्ली: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तत्वावधान में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (एनएआरएस) ने दालों सहित विभिन्न फसलों की क्षेत्र विशिष्ट, उच्च उपज देने वाली और जलवायु के अनुकूल किस्में विकसित की हैं.

वर्ष 2014 के बाद से, देश में 14 दलहनी फसलों की कुल 369 किस्में जारी और अधिसूचित की गई हैं, जिन में सितंबर, 2023 तक बिहार के लिए 7 दलहनी फसलों की 24 किस्में शामिल हैं, जैसे काबुली चना की 6 किस्में, फील्डपी की 6 किस्में, अरहर की 6 किस्में, फैबाबीन की 3 किस्में, मूंग की 2 किस्में, उड़द की एक और मसूर की एक किस्में शामिल हैं.

किसानों को खेती के लिए नई उन्नत किस्मों के बीज जल्द से जल्द उपलब्ध कराने के लिए कई कदम उठाए गए हैं, जिन में उन्नत किस्मों के ब्रीडर बीज का उत्पादन और आपूर्ति. पिछले 5 वर्षों के दौरान, आईसीएआर द्वारा आधार और प्रमाणित बीज के डाउनस्ट्रीम गुणन के लिए विभिन्न सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीज उत्पादक एजेंसियों को 15.60 लाख क्विंटल दालों के ब्रीडर बीज का उत्पादन और आपूर्ति की गई.

इस के अलावा वर्ष 2016 में ब्रीडर बीज उत्पादन बढ़ाने के लिए 150 दलहन बीज हब और 12 केंद्रों की स्थापना की गई, जिन्होंने वर्ष 2016-17 से 2022-23 के दौरान 7.09 लाख गुणवत्ता वाले बीज और 21713 क्विंटल ब्रीडर बीज का उत्पादन और आपूर्ति की है. इसी के साथ 6.39 लाख गांवों को मिला कर कुल 1587.74 लाख क्विंटल गुणवत्ता वाले बीज का उत्पादन किया गया.

ग्राम स्तर पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने के लिए बीज ग्राम योजना के तहत वर्ष 2014-23 के दौरान 98.07 लाख किसानों को प्रशिक्षण दिया गया और वर्ष 2018-19 से 2022-23 के दौरान दालों के 6000 फ्रंट लाइन प्रदर्शनों और 1,51,873 क्लस्टर फ्रंटलाइन प्रदर्शनों के माध्यम से नई उच्च उपज वाली किस्मों के बीजों का वितरण किया गया.

गांवगांव पहुंचेगी गारंटी वाली गाड़ी

नई दिल्ली: 6 दिसंबर 2023. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार वर्ष 2047 तक देश को विकसित बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत है. इस दिशा में विभिन्न सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए 68 आदिवासी जिलों से शुरू हुई विकसित भारत संकल्प यात्रा का देशभर में प्रसार हो रहा है. प्रधानमंत्री ने इसे ‘मोदी की गारंटी वाली गाड़ी’ नाम दिया है, जिस से गांवों, कसबों और शहरों में रोज लाखों लोग जुड़ रहे हैं.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर विकसित भारत संकल्प यात्रा के सुचारु संचालन के लिए प्रतिदिन मानीटरिंग करते हुए राज्यों के साथ बैठकें कर रहे हैं. वे बैठकों के जरीए राज्यों के नोडल अधिकारियों व अन्य आला अधिकारियों से विकसित भारत संकल्प यात्रा की प्रगति की जानकारी ले रहे हैं.

उन का कहना है कि केंद्र सरकार यात्रा के जरीए 26 जनवरी, 2024 तक 2.6 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों के साथ दूसरे क्षेत्रों को कवर करने का प्रयास कर रही है.

2 दिन में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, दादरानगर हवेली, दमनदीव, लक्षद्वीप, अंडमान एवं निकोबार की बैठकें ले कर कहा कि यात्रा के माध्यम से योग्य लाभार्थियों को निश्चित रूप से लाभ मिलना चाहिए व योजनाओं को आम लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए.

प्रधानमंत्री के विजन के अनुसार, देश में किसान, महिला, युवा व गरीब 4 जातियां हैं, जिन्हें आगे बढ़ाते हुए देश का समग्र विकास ही लक्ष्य है. यात्रा के दौरान देशभर में समाज के हर तबके को विकसित भारत के संकल्प से जोड़ें और हर तबके का विकास हो, इन्हें सशक्त बनाएं और जीडीपी बढ़े, ताकि हमारा देश वर्ष 2047 तक सभी माने में पूरी तरह से विकसित बनाया जा सके.

विकसित भारत संकल्प यात्रा का शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 नवंबर, 2023 को खूंटी, झारखंड से किया. अभी 26 राज्यों व संघ शासित क्षेत्रों में यात्रा चल रही है. अभी तक तकरीबन 30,000 ग्राम पंचायतों को कवर किया जा चुका है, जहां तकरीबन 80 लाख लोगों ने हिस्सा ले कर विकसित भारत बनाने का संकल्प लिया.

यात्रा में डिजिटल रूप से सक्षम सूचना, शिक्षा एवं संचार (आईईसी) वैन तैनात की गई, जो सतत दौरा कर 17 से अधिक ग्रामीण योजनाओं व 5 आदिवासी योजनाओं के बारे में जागरूकता पैदा कर रही हैं. नगरीय निकायों में भी वैन 17 शहरी योजनाओं के बारे में जागरूकता का प्रसार कर रही हैं.

कार्यक्रमों के दौरान विभिन्न गतिविधियां व सेवाएं, जैसे सामान्य स्वास्थ्य शिविर, टीबी स्क्रीनिंग, स्किल सेल स्क्रीनिंग शिविर आदि भी की जा रही हैं. इन में भी लाखों लोग उत्साह से हिस्सा ले रहे हैं. कार्यक्रमों के दौरान पीएम उज्ज्वला नामांकन, माय भारत स्वयंसेवक पंजीकरण, आयुष्मान कार्ड का वितरण जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं. पोर्टल (विकसित भारत संकल्प वैबसाइट) विकसित की गई है, जो डैशबोर्ड व रिपोर्ट से कार्यक्रम के दौरान कैप्चर विभिन्न डेटा व फोटो और वीडियो प्रदर्शित करता है.

किसानों को मिले उन की भाषा में जानकारी

साल 1967 में देश में पड़े भीषण अकाल में बड़ी मात्रा में खाद्यान्न आयात करना पड़ा था. इस वजह से सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में अनुसंधान के काम पर जोर दिया गया. इस से एक तरफ सिंचित जमीन का क्षेत्रफल बढ़ने लगा, तो वहीं दूसरी तरफ कृषि क्षेत्र में विविधता लाने की कोशिश की जाने लगी.

इस काम को संगठित रूप देने के लिए साल 1929 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का गठन हुआ. केंद्र सरकार से जुड़े सभी संस्थानों को इस के तहत लाया गया. धीरेधीरे खाद्यान्न, फलसब्जी के साथ ही जानवरों के लिए भी अनुसंधान संस्थान खोले गए. लगातार अनुसंधान द्वारा खाद्यान्नों, फलों, सब्जियों की नई उपजाऊ किस्मों का विकास हुआ.

किसी काम को संगठित रूप देने से अधिक पैसा बनाने में कामयाबी मिली. परिषद की अगुआई में देश में हरित क्रांति आई. देश में खाद्यान्नों का रिकौर्ड उत्पादन शुरू हो गया, तेज गति से बढ़ती आबादी के बावजूद भी न सिर्फ खाद्यान्न, फलसब्जी के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता आई, बल्कि कुछ उत्पादों के निर्यात में भी हमें कामयाबी मिली.

इस समय देश की आबादी 135 करोड़ के पार हो चुकी है. इतनी विशाल आबादी को भी भोजन के लिए खाद्यान्न उपलब्ध है. ऐसी हालत तब है, जब खेती की जमीन धीरेधीरे घटती जा रही है.

शहरों का क्षेत्रफल आजादी के समय 7 फीसदी से बढ़ कर 35 फीसदी हो गया है. यह वृद्धि क्षेत्र में व्यापक काम के चलते हुई है.

देश में किसानों का अनुसंधान संस्थानों से सीधा जुड़ाव हुआ है. इन संस्थानों के वैज्ञानिक नियमित अंतराल पर इलाके और गांवों का दौरा करते रहते हैं और किसानों से रूबरू हो कर उन को तकनीकी जानकारी देते हैं.

इस तरह के अनुसंधान और प्रसार के काम में भाषा की अहम भूमिका होती है. तकरीबन 200 सालों के ब्रिटिश राज के होने की वजह से भाषा के रूप में अंगरेजी का बोलबाला देश के सभी क्षेत्रों में अभी तक गहराई से बना हुआ है. शिक्षा विशेष रूप से कृषि शिक्षा व अनुसंधान के क्षेत्र में आज भी अंगरेजी महत्त्वपूर्ण भाषा बनी हुई है.

अनुसंधान के काम और लेखनी में लगभग अंगरेजी का ही प्रयोग हो रहा है, जिस का साहित्यिक महत्त्व है, पर इस की जांच खेत में और किसानों के बीच में होती है.

ऐसी स्थिति में भारतीय भाषाएं खासकर मान्याताप्राप्त भाषाओं का महत्त्व काफी बढ़ जाता है. अगर इन भाषाओं के जरीए बातचीत नहीं की जाएगी, तो किसानों को जो फायदा होना चाहिए, वह नहीं मिल सकेगा. यदि उन की भाषा में किसानों को जानकारी दी जाती है, तो वे अच्छी तरह से सम झ सकेंगे और तकनीक अपनाने में भी उन को कोई हिचक नहीं होगी.

भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में मान्यताप्राप्त भाषाओं की संख्या 22 है. हिंदी देश के तकरीबन 57 फीसदी भूभाग में बोली व सम झी जाने वाली भाषा है.

भारत में हिंदीभाषी राज्यों का निर्धारण भाषा के आधार पर हुआ है और उन सभी राज्यों में राज सरकार के काम स्थानीय भाषा में ही होते हैं. इन सभी मान्यताप्राप्त भाषाओं का अपनाअपना प्रभाव क्षेत्र में है और इस में साहित्य का काम भी लगातार हो रहा है. इन में से ज्यादातर भाषाओं के अपने शब्दकोश हैं और फिल्में भी बनाई जा रही हैं, खासतौर पर तमिल, बंगला, मलयालम, मराठी व तेलुगु फिल्म उद्योग अपनेअपने क्षेत्र में बहुत ही लोकप्रिय है.

इस के अलावा उडि़या, असमी, पंजाबी भोजपुरी, नागपुरी वगैरह भाषाओं में भी फिल्में लगातार बन रही हैं और पसंद भी की जा रही हैं.

ऐसी हालत में कृषि अनुसंधान को स्थानीय भाषा से जोड़ना समय की जरूरत है, ताकि हम अपनी उपलब्धियों को किसानों तक आसानी से पहुंचा सकें. हालांकि मान्यताप्राप्त भाषाओं में कुछ भाषाएं ऐसी हैं, जिन का प्रभाव क्षेत्र बहुत ही सिमटा हुआ है, लेकिन ज्यादातर भाषाएं बड़े क्षेत्रों में फैली हैं और कार्यालय के काम से ले कर दिनभर के काम तक निरंतर प्रयोग की जा रही हैं.

अगर हमें अनुसंधान की उपलब्धियों से किसानों को जोड़ना है तो यह जरूरी है कि अपनी बातों को उन की भाषा और बोली में उन तक पहुंचाया जाए, यह बहुत कठिन नहीं है.

देश में सब से पहले हिंदी का नाम आता है और कृषि से जुड़े साहित्य भी हिंदी में लगातार तैयार हो रहे हैं. भारतीय किसान संघ परिषद के ज्यादातर संस्थानों में प्रशिक्षण सामग्री और संबंधित फसल से जुड़ी अनुसंधान संबंधी उपलब्धियां हिंदी में ही मौजूद हैं. इसे और भी बढ़ावा देने की जरूरत है. हमेशा यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि प्रस्तुतीकरण और भी सुगम भाषा में हो.

परिषद के सभी संस्थानों में राजभाषा प्रकोष्ठ की मदद से भी काम किया जा रहा है. हिंदी भाषी वैज्ञानिक शोध भी सराहनीय योगदान दे रहे हैं. इस के बावजूद हिंदी में छपने वाले शोध साहित्य कम हैं.

कुछ वैज्ञानिक संगठनों, संस्थानों द्वारा हिंदी में शोध पत्रिकाएं छप रही हैं और कुछ एक और काम करने के लिए लगातार संघर्षरत हैं और आगे बढ़ रही हैं.

इस क्षेत्र में प्रगति संतोषजनक है, पर हिंदी के प्रभाव क्षेत्र को देखने के बाद यह काफी कम प्रतीत होता है. इस के लिए कृषि वैज्ञानिकों को पहल करनी होगी. उन्हें मौलिक अनुसंधान में हिंदी व भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना होगा, तभी किसान उस का फायदा उठा सकेंगे.

इसी तरह कई अन्य मान्यताप्राप्त भारतीय भाषाएं ऐसी हैं, जिन का प्रभाव अपने क्षेत्र में तो बड़ा है ही, साथ ही, वे अपने क्षेत्र में लोगों की जिंदगी से सांस्कृतिक व भावनात्मक रूप से बहुत गहराई से जुड़ी हैं. जिस तरह से हिंदीभाषियों के पास हिंदी में अनुसंधान संबंधी किसी सामग्री के साथ अपनी बातें पहुंचाई जा सकती हैं, वैसे दूसरी भारतीय भाषाओं में भी धान की उपलब्धियों को रूपांतरित कर उसी प्रभाव क्षेत्र तक पहुंचाया जा सकता है.

कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में भी व्यापक रूप से अंगरेजी का ही प्रयोग हो रहा है, पर प्रशासन का मकसद किसान हैं और किसानों की आबादी कई गुना ज्यादा है. वे गंवई इलाके में रहते हैं. इसलिए कृषि अनुसंधान संगठनों को इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है. अगर मौलिक रूप से इन भाषाओं के काम करने में थोड़ी कठिनाई हो, तो अनुवाद एक बेहतर साधन है. इस के द्वारा हम उन भाषाओं में बेहतरीन साहित्य तैयार कर सकते हैं, जिन का फायदा किसानों को मिले.

कृषि वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे हिंदी भाषा के साथ सकारात्मक सोच से काम करें, जिस से हिंदी में साहित्य को आगे बढ़ने का मौका तो मिलेगा ही और अपनी बात को किसानों तक आसानी से पहुंचाया जा सकेगा. इस से प्रदेश व देश की उत्पादकता में काफी अंतर देखने को मिलेगा.

हमारा मानना है कि हिंदी साहित्य अभी भी किसानों के अंदर बहुत अच्छी पैठ बनाए हुए है, इसलिए वैज्ञानिकों को अपनी करनी और कथनी में अंतर करना होगा. किसानों तक आसान भाषा में साहित्य को पहुंचाने के लिए अपना समर्थन करना होगा. इस के लिए जरूरत केवल सामाजिक क्रांति के साथसाथ वैज्ञानिकों को वैचारिक क्रांति में बदलाव लाने की है. यदि हम अपनी वैचारिक क्रांति में बदलाव लाएंगे, तो हिंदी साहित्य को आसानी से किसानों में लोकप्रिय बना सकेंगे.

शतावर खूबियों का खजाना

शतावर का पौधा 3-5 फुट ऊंचा होता है और यह लता के समान बढ़ता है. इस की शाखाएं पतली होती हैं. पत्तियां बारीक सूई के समान होती हैं, जो 1.0-2.5 सैंटीमीटर तक लंबी होती हैं. पुराने जमाने में गांव वाले इसे ‘नाहरकांटा’ नाम से पुकारते थे, क्योंकि इस की बेल की शाखाओं के हर पोर पर शेर के पंजे में मुडे़ हुए नाखून की तरह का कांटा रहता है.

शतावर लिलिएसी कुल का बहुवर्षीय पौधा है. इस का वानस्पतिक नाम एस्पेरेगस रैसीमोसस है. यह पौधा भारत के उष्ण व समशीतोष्ण राज्यों में 1200-1500 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है.

यह पौधा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्यों में साल के मिश्रित वनों में पाया जाता है. बाजार की बढ़ती मांग की वजह से मध्य प्रदेश व उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में खासकर कुमाऊं इलाकों में इस की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है.

Shatawarऔषधीय उपयोग : शतावर की जड़े मीठी और रस से भरी होती हैं. यह शीत वीर्य यानी ठंडक प्रदान करने वाली है. इस के अलावा कामोद्दीपक यानी सैक्स पावर बढ़ाने वाली होने के साथसाथ मेधाकारक यानी दिमाग को तेज करने वाली, जठराग्निवर्धक, पौष्टिकदायक यानी जल्दी पचने वाली है. अग्निदीपक, रुधिर विकार, गुल्म सूजन, स्निग्ध, आंखों के लिए फायदा पहुंचाने वाली, शुक्राणुवर्धक यानी शुक्राणु बढ़ाने वाली, दूध बढ़ाने वाली, बलकारक यानी मजबूती लाने वाली और अतिसार, वात, पित्तरक्त और शोध दूर करने वाली होती है.

सक्रिय घटक : इस की जड़ों में 1 व 4 शतावरिन कैमिकल पाया जाता है. शतावरिन 1 सार्सपोजिनिन का ग्लूकोसाइड होता है. इस के अलावा कंदीय जड़ों में म्यूसिलेज और काफी मात्रा में शर्करा पाई जाती है.

जमीन और जलवायु : शतावर की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी, जिस का पीएच मान 7-8 हो, अच्छी मानी गई है. साथ ही, जल निकास यानी पानी के निकलने का पुख्ता बंदोबस्त होना उचित रहता है. इस के लिए उष्ण व आर्द्र जलवायु बढि़या रहती है.

जिन इलाकों में तापमान 20-40 डिगरी सैंटीग्रेड रहता हो और तकरीबन सालाना बारिश 100-200 सैंटीमीटर तक होती है, खेती के लिए बहुत ही उत्तम होती है.

खेत की तैयारी : शतावर की खेती से पहले जमीन की हल द्वारा 2-3 बार अच्छी तरह जुताई कर लेनी चाहिए. उस के बाद 5 टन सड़ी हुई खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डाल कर खेत में फिर से जुताई कर देनी चाहिए.

प्रवर्धन : शतावर का प्रवर्धन बीजों द्वारा किया जाता है.

बोआई : शतावर की खेती के लिए बीजों द्वारा पौध तैयार की जाती है. नर्सरी के लिए 1×10 मीटर की क्यारियां बना कर बीजों की बोआई कर देनी चाहिए. बीजों को नर्सरी में बोेने से पहले जैविक तरीके से उपचारित कर लें, जिस से कवक, फफूंद वगैरह दूर हो जाएं.

बीजों की बोआई के लिए सब से बढि़या समय मईजून माह का होता है. इस तरह प्रति हेक्टेयर जमीन के लिए 15 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. तकरीबन 25 दिनों के बाद बीजों से अंकुरण हो जाता है.

अगस्त माह में जब पौधे की ऊंचाई तकरीबन 10-12 सैंटीमीटर की हो जाती है, तब पौधों को 60×60 सैंटीमीटर के अंतराल पर लगा देना चाहिए. कभीकभी जमीन के अंदर जड़ों से फिर से पौध तैयार हो जाती है, जिसे डिस्क कहते हैं. तकरीबन 20 दिनों में यह पौध भी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाती है. एक हेक्टेयर खेत के लिए तकरीबन 27,000 पौधों की जरूरत होती है.

 उर्वरक : शतावर प्रतिरोपण से पहले खेत में 25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस व 20 किलोग्राम पोटाश को 2 भागों में बांट कर के प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए. उक्त मिश्रण का आधा हिस्सा शुरू में अगस्त माह और बाकी बचा हिस्सा अगले से पहले अक्तूबरदिसंबर माह में डालना चाहिए.

सिंचाई : शतावर की फसल के लिए ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं होती है. शुरुआत के दिनों में प्रति सप्ताह और बाद में महीने में एक बार हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. ज्यादा सिंचाई से पौधे में पत्तियों की बढ़वार और हरापन तो बढ़ता ही है, परंतु जड़ों पर बुरा असर पड़ता है.

निराईगुड़ाई : शतावर की अच्छी पैदावार के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई करते रहना जरूरी है. महीने में एक बार हलकी निराईगुड़ाई कर के खेत से खरपतवार निकाल देने चाहिए.

Shatawarरोग, कीट और उन की रोकथाम :

शतावर की फसल पर वैसे तो रोगों व कीटों का हमला नहीं होता है. अगर ऐसा हो भी जाए, तो इस फसल पर कोई बुरा असर नहीं होता है.  फिर भी समयसमय पर कीटनाशकों का छिड़काव करते रहना चाहिए या फिर जड़ों को कवक से बचाने के लिए डाईथेन एम 45 का छिड़काव करना चाहिए.

दोहन व भंडारण : वैसे तो शतावर की फसल तकरीबन 18 से 20 महीने में तैयार हो जाती है. रोपण के अगले साल जब पौधा पीला पड़ने लगे, तो जड़ों की खुदाई कर लेनी चाहिए.

खुदाई के समय जड़ों में आर्द्रता 90 फीसदी रहती है. इसलिए जड़ों में चीरा लगा कर छिलका उतार देना चाहिए. उस के बाद जड़ों को धूप में सुखा कर बोरों में भर कर महफूज जगह पर रख देना चाहिए.

उत्पादन व उपज : शतावर की अच्छी फसल से तकरीबन 45-50 क्विंटल सूखी जडें़ प्रति हेक्टेयर हासिल होती हैं.

अतिरिक्त लाभ : 18 महीने की फसल से बीज की प्राप्ति नहीं होती. अगर बीज लेना हो तो कुछ पौधे छोड़ दें तो अगले साल से यानी 30 महीने बाद बीज प्रति पौधा 20-30 ग्राम हर साल प्राप्त होंगे.

जड़ों की खुदाई के समय आने वाली फसल के लिए डिस्क (जिस में जड़ के 1-2 ट्यूबर्स और तने का कुछ भाग शामिल होता है) को फिर से रोपित कर दें या नर्सरी की क्यारियों में सुरक्षित रख लें, जिस से आगामी बारिश के मौसम में रोपित कर सकें.

खीरे की खेती कर के तिगुना ज्यादा कमाएं

बढ़ती आमदनी और सेहत के प्रति सजग रहने के साथ खानपान में बदलाव आया है. जहां पहले सामान्य खाना खाया जाता था, अब खाने की थाली में सलाद ने भी अपनी जगह बना ली है. सलाद में मुख्य रूप से खीरे का ज्यादा उपयोग किया जाता है. इस की वजह से खीरे की मांग पूरे साल बनी रहती है. यही वजह है कि खीरे के दाम पूरे साल 20 से 30 रुपए प्रति किलोग्राम के आसपास बने रहते हैं.

सामान्य फसलों के मुकाबले खीरे की खेती से तिगुनी आमदनी हासिल कर सकते हैं और अगर खीरे की खेती मचान यानी टे्रलिस तरीके से की जाए तो आमदनी और ज्यादा बढ़ सकती है.

आमतौर पर खीरे की खेती जून या जुलाई माह में शुरू की जाती है, लेकिन अक्तूबर माह में भी इस की बोआई कर सकते हैं, जिस से पूरी सर्दी खीरे की फसल मिलती रहती है. खीरे की खेती के लिए हाईब्रिड लोंग या ह्वाइट लोंग किस्म के बीजों का उपयोग करना चाहिए. बीज बोने से पहले एक एकड़ खेत में तकरीबन 10 टन कंपोस्ट या वर्मी कंपोस्ट खाद जरूर डालें, ताकि पौधों को पर्याप्त पोषक तत्त्व मिल सकें और अंकुरण भी ज्यादा से ज्यादा हो सके.

बोआई के तकरीबन 10 दिन बाद जब बीज अंकुरित हो कर पौधों का रूप लेने लगे तो हलकी सिंचाई करें. तकरीबन एक माह बाद फल आने शुरू हो जाते हैं. फल आने से पहले खेत में 10 किलोग्राम नाइट्रोजन, 10 किलोग्राम फास्फोरस और 10 किलोग्राम पोटाश एक एकड़ खेत के हिसाब से डालें. यदि जमीन में पोषक तत्त्वों की कमी है, तो सल्फर का उपयोग कर सकते हैं. सल्फर के उपयोग से फलों का आकार बड़ा होगा और चमकदार नजर आएंगे.

वैसे, बेलदार सब्जी वाली फसलों की खेती के लिए मचान पद्धति अधिक उपयोगी मानी गई है. इस पद्धति के द्वारा फल खराब नहीं होते और सीधे व चमकीले रहने के चलते इन का बाजार में भाव भी ज्यादा मिलता है. साथ ही, मचान खेती पद्धति में रोग लगने की संभावना भी काफी कम होती है और पानी की जरूरत भी सामान्य के मुकाबले तकरीबन 25 फीसदी कम हो जाती है. मचान पद्धति के फल सीधे व चमकीले होने की वजह से बाजार में ज्यादा भाव में बिकते हैं.

केले में कीट व रोगों की रोकथाम

वैज्ञानिक तरीके से केले की खेती कैसे करें और केले से अच्छी उपज लेने के लिए केले की फसल में लगने वाले कीट व रोगों के बारे में जानकारी व उन की रोकथाम कैसे की जाए इस विषय पर जाने कुछ खास बातें :

प्रकंद छेदक कीट

इस प्रकंद छेदक कीट का वैज्ञानिक नाम कौस्मोपोलाइट्स सौडिडस है. इस कीट का प्रकोप पौध लगाने के 1 या 2 महीने बाद शुरू हो जाता है.

शुरू में इस कीट के ग्रब तने में छेद कर तने को खाते हैं, जो बाद में राइजोम की तरफ चले जाते हैं. इस के प्रकोप से पौधों की बढ़वार मंद पड़ जाती है. पौधे बीमार से लगने लगते हैं और उन की पत्तियों पर पीली धारियां उभर आती हैं. इस कीट के अधिक प्रकोप से पत्ती और धार का आकार छोटा हो जाता है.

रोकथाम

*           स्वस्थ सकर का ही चुनाव करें.

*           एक ही खेत में लगातार केले की फसल न लें.

*           सकर को रोपने से पहले 0.1 फीसदी क्विनालफास के घोल में डुबोएं.

*           रोपण के समय क्लोरोपायरीफास चूर्ण प्रति गड्ढे की दर से मिट्टी में मिलाएं.

*           प्रभावित और सूखी पत्तियों को काट कर जला दें.

*           कार्बोफ्यूरान 20 ग्राम प्रति पौधा के उपयोग से इस कीट का प्रभावी नियंत्रण होता है.

तना बेधक कीट

इस कीट का वैज्ञानिक नाम ओडोपोरस लांगिकोल्लिस है. इस कीट के प्रकोप से पत्तियां धीरेधीरे पीली पड़नी शुरू हो जाती हैं, बाद में तने पर पिन के सिर के आकार के छेद दिखाई पड़ने लगते हैं. उस के बाद तने से गोंद जैसा लिसलिसा पदार्थ निकलना शुरू हो जाता है. ग्रब शुरू में पर्णवृंत को खाते हैं, बाद में तने में लंबी सुरंग बना देते हैं, जो बाद में सड़ कर बदबू पैदा करती है.

इस कीट के अधिक प्रकोप से पौधों पर फूल नहीं आते हैं अथवा फूलों की तादाद बहुत कम हो जाती है. धार का आकार बहुत छोटा रह जाता है और फलों का विकास अच्छी प्रकार से नहीं हो पाता है.

रोकथाम

* प्रभावित पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें.

* प्रकंद छेदक कीट के नियंत्रण में जो सुझाव दिए गए हैं, उन्हें अपनाएं.

माहू कीट

इस कीट का वैज्ञानिक नाम पेंटालोनिया नाईग्रोनर्वोसा है. यह कीट पौधों से रस चूस कर पौधों की बढ़वार को प्रभावित करता है और शीर्ष गुच्छ रोग पैदा करने वाले विषाणु को फैलाता है.

रोकथाम

(1) प्रभावित पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें.

(2) प्रभावित क्षेत्रों में पेड़ी फसल न लें.

(3) डाईमिथोएट 2 मिलीलिटर प्रति लिटर की दर से पानी में घोल कर छिड़काव करें.

सिगाटोका पत्ती धब्बा रोग

यह रोग स्यूडोसर्कोस्पोरा म्यूसी नामक फफूंद से होता है. इस रोग की शुरुआत में पत्ती की बाहरी सतह पर पीले धब्बे बनना शुरू हो कर बाद में लंबी काली धारियों के रूप में बदल जाते हैं और कालांतर में बड़ेबड़े धब्बों का रूप ले लेते हैं.

इस प्रकार के धब्बे पत्तियों के किनारे और आगे के हिस्से में अधिक पाए जाते हैं. संवेदनशील किस्मों में 2-3 पत्तियों को छोड़ कर बाकी सभी पत्तियां इस रोग से ग्रसित हो कर सूख जाती हैं. साथ ही, फलों का आकार भी छोटा रह जाता है. समय से पहले ही फल पक जाते हैं और उन की क्वालिटी कम हो जाती है. वातावरण में आर्द्रता अधिक होने और औसत तापमान कम होने के चलते इस रोग का प्रकोप अधिक होता है.

नियंत्रण

* खेत को खरपतवारों से मुक्त रखें.

* खेत में जल निकास का समुचित प्रबंध रखें.

* रोग व कीटों से प्रभावित सूखी पत्तियों को काट कर जला देना चाहिए.

* कवकनाशी जैसे कार्बंडाजिम 1 ग्राम प्रति लिटर अथवा कवच 2 ग्राम प्रति लिटर या सन 0.7 मिलीलिटर प्रति लिटर की दर से छिड़काव करें.

पर्ण धब्बा रोग

यह रोग ग्लोइयोस्पोरियम म्यूसी और टोट्राईकम ग्लोइयोस्पोरियोडियम नामक विषाणु से होता है. इस रोग में पत्तियों के सिरे पर हलके भूरे अथवा काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं. बाद में पत्तियां सूख जाती हैं और उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है.

नियंत्रण

कार्बंडाजिम 1 ग्राम या कवच 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

उकठा रोग

यह रोग फ्यूजेरियम औक्सीस्पोरम किस्म की यूबेंस नामक फफूंद से होता है. इस रोग के लक्षण पौध लगाने के 5-8 माह के बीच दिखाई देने लगते हैं. पुरानी पत्तियों में पीलापन पत्तियों के किनारे से शुरू हो कर मध्य सिरे की ओर बढ़ता है. बाद में पत्तियों का रंग पीला पड़ जाता है. प्रभावित पत्तियां तने के चारों ओर गोलाई में लटक जाती हैं. तने का निचला हिस्सा लंबाई में फट जाता है. प्रभावित पौधे के तने और कंद को लंबवत काटने पर वैस्क्युलर ऊतक लाल से ले कर भूरे रंग के दिखाई देने के 1 से 2 माह के भीतर पौधा मर जाता है.

नियंत्रण

* रोपण से पूर्व कंद को कार्बंडाजिम 1 ग्राम प्रति लिटर पानी के घोल में डुबो कर रोपें.

* रोपण के 5 माह बाद से कार्बंडाजिम 1 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर 2 माह में एक बार टोआ दें.

टिप ओवर रोग

यह रोग इर्विनया केरोटोवोरा नामक जीवाणु की वजह से होता है. इस रोग में राइजोम में सड़न पैदा होती है, प्रभावित तंतु मुलायम हो जाता है और पत्तियां पीली पड़ जाती हैं.

नियंत्रण

स्टै्रप्टोसाइक्लिन 759 पीपीएम कौपर औक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

सिगार गलन रोग

यह रोग वर्टीसिलियम थियोब्रामी नामक फफूंद से होता है. यह रोग बारिश में अधिक प्रभावी रहता है. बिना पके फलों के अग्र भाग से काली भूरी सड़न शुरू हो कर धीरेधीरे 2.0-2.5 सैंटीमीटर आगे तक फलों को प्रभावित करती है. प्रभावित भाग जली हुई सिगार जैसा दिखता है. इस के चलते यह सिगार गलन रोग के नाम से जाना जाता है.

नियंत्रण

इस रोग की रोकथाम के लिए फल बनने की अवस्था पर थायोफेनेटमिथाइल या बिटरटेनाल 1 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

शीर्ष विषाणु रोग

यह रोग विषाणु द्वारा पनपता है. इस रोग में पत्तियों की भीतरी मध्य सिरा की द्वितीयक नसों के साथ गहरी धारियां शुरुआती लक्षण के रूप में दिखाई देती हैं. ये असामान्य लक्षण गहरे रंग की रेखाओं में 2.5 सैंटीमीटर या अधिक अनियमित रूप से पत्तियों के किनारों के साथ होते हैं.

पत्तियों का आकार बहुत ही छोटा हो जाता है, जो असामान्य रूप से ऊपर की ओर गुच्छों के रूप में निकलती हैं. इस रोग से प्रभावित पत्तियों से तैयार पौधों की बढ़वार बहुत ही कम होती है, जिन में फूल नहीं आते हैं. इस विषाणु का फैलाव माहू कीट द्वारा होता है.

रोकथाम

* रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ दें.

* रोग फैलाने वाले कीट माहू की रोकथाम करें.

* माहू के नियंत्रण के लिए डाईमिथोएट 2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

केले का धारी

विषाणु रोग

यह रोग विषाणु द्वारा फैलता है. इस रोग में पत्तियों पर छोटेछोटे पीले धब्बे बनते हैं, बाद में सुनहरी पीली धारियों का विकास और पीली धारियों वाली पत्तियां सड़न पैदा करने वाली हो जाती हैं. इस रोग के चलते उत्पादन में 30-40 फीसदी तक का नुकसान हो सकता है. यह रोग मिली बग द्वारा फैलता है.

रोकथाम

* रोगरहित सकर का रोपण करें.

* मिली बग कीट का नियंत्रण करें.

नेमाटोड

नेमाटोड द्वारा केला उत्पादन में लगभग 20 फीसदी का नुकसान होता है. केला आमतौर पर बुरोइंग नेमाटोड रेडोफोलस सिमिलिस, लीजन नेमाटोड, प्रैटिलेंकस काफफिर्ड, स्पाइरल नेमाटोड, हैलाकोटीलेप्चस मल्टीसिनकट्स और सिस्ट नेमाटोड, हेटेरोठोरा स्पी के हमले से होता है.

लक्षण

सूत्रकृमि के संक्रमण से पौधों की बढ़वार मंद पड़ जाती है, तना पतला रह जाता है, पत्तियों पर धब्बे बन जाते हैं. धार का आकार बहुत छोटा रह जाता है. सूत्रकृमि के लक्षण जड़ों और कंदों पर अधिक साफ होते हैं. सूत्रकृमि से प्रभावित पौधे खेत में नमी होने पर थोड़ी तेज हवा से ही गिर जाते हैं.

रोकथाम

* सूत्रकृमि प्रभावित क्षेत्रों से रोपण सामग्री का चयन न करें.

* गन्ना या धान फसल चक्रअपनाएं.

* सनई, धनिया व गेंदा को अंत:फसल के रूप में उगाएं.

* नीम केक 400 ग्राम प्रति पौधा

रोपण के समय और रोपण के 4 माह बाद प्रयोग करें.

* रोपण के समय और उस के बाद

3 माह के अंतराल से कार्बोफ्यूरान 20 ग्राम प्रति पौधे की दर से इस्तेमाल करें.

तुड़ाई

फलों की तुड़ाई किस्म, बाजार और परिवहन के साधन वगैरह पर निर्भर करती है. केले की बौनी किस्में 12 से 15 माह बाद और ऊंची किस्में 15 से 18 माह बाद तोड़ने योग्य हो जाती हैं. सामान्यत: फल की धारियों के पूरी तरह गोल होने पर गुच्छों की तुड़ाई तेज धारदार हंसिए से करनी चाहिए. केले को दूर के बाजारों में भेजने के लिए जब उन का तीनचौथाई भाग पक जाए, तो उन्हें काट लेना चाहिए.

पकाना

केला एक क्लाईमैक्टेरिक फल है, जिसे सही अवस्था में पौधे से तोड़ने के बाद पकाया जाता है. केले को पकाने के लिए इथेलिन गैस का उपयोग किया जाता है. इथेलिन गैस फलों को पकाने का एक हार्मोन है, जो फलों के अंदर सांस के छोड़ने की क्रिया को बढ़ा कर उन की परिपक्वता में तेजी लाता है. केले को एक बंद कमरे में इकट्ठा कर 15-18 डिगरी तापमान पर इथेलिन (1000 पीपीएम) से 24 घंटे तक फलों को उपचार कर के पकाया जाता है.

पैकिंग

केले को आकार के अनुसार श्रेणीकरण कर उन्हें अलगअलग गत्ते के 5 फीसदी छेदों वाले छोटेछोटे (12-13 किग्रा) डब्बों में भर कर बाजार भेजना चाहिए.