धान फसल : प्रमुख रोग व कीट और उन का प्रबंधन

धान एक प्रमुख खाद्यान्न फसल है, जो पूरे विश्व की आधी से ज्यादा आबादी को भोजन प्रदान करती है. चावल के उत्पादन में सर्वप्रथम चीन के बाद भारत दूसरे नंबर पर आता है. भारत में धान की खेती लगभग 450 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जाती है. छोटी होती जोत एवं कृषि श्रमिक न मिल पाने के चलते और जैविक, अजैविक कारकों की वजह से धान की उत्पादकता में लगातार कमी आ रही है.

इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग, पहचान और उन के प्रबंधन के बारे में बता रहे हैं, जिस से कि किसान धान की फसल में उस रोग की समय से पहचान कर फसल का बचाव कर सकें.

1. झोंका रोग : यह धान की फसल का मुख्य रोग है, जो एक पाईरीकुलेरिया ओराइजी नामक फफूंद से फैलता है. इस रोग के लक्षण पौधे के सभी वायवीय भागों पर दिखाई देते हैं. परंतु सामान्य रूप से पत्तियां और पुष्प गुच्छ की ग्रीवा इस रोग से अधिक प्रभावित होती हैं. प्रारंभिक लक्षण में पौधे की निचली पत्तियों पर धब्बे दिखाई देते हैं. जब ये धब्बे बड़े हो जाते हैं, तो ये धब्बे नाव अथवा आंख की जैसी आकृति के जैसे हो जाते हैं. इन धब्बों के किनारे भूरे रंग के और मध्य वाला भाग राख जैसे रंग का होता है. बाद में धब्बे आपस में मिल कर पौधे के सभी हरे भागों को ढक लेते हैं, जिस से फसल जली हुई सी प्रतीत होती है.

रोग प्रबंधन

– रोगरोधी क़िस्मों का चयन करना चाहिए.
– बीज का चयन रोगरहित फसल से करना चाहिए.
– बीज को सदैव ट्राईकोडर्मा से उपचारित कर के ही बोना चाहिए.
– फसल की कटाई के बाद खेत में रोगी पौध अवशेषों एवं ठूठों इत्यादि को एकत्र कर के नष्ट कर देना चाहिए.
– फसल में रोग नियंत्रण के लिए बायोवेल का जैविक कवकनाशी बायो ट्रूपर की 500 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ में 120 से 150 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

2. जीवाणु झुलसा या झुलसा रोग : यह रोग जेंथोमोनास ओराईजी नामक जीवाणु से फैलता है. इसे साल 1908 में जापान में सब से पहले देखा गया था.

रोग की पहचान

पौधों की चोटी अवस्था से ले कर परिपक्व अवस्था तक यह रोग कभी भी लग सकता है. इस रोग में पत्तियां नोंक अथवा किनारों से शुरू हो कर मध्य भाग तक सूखने लगती हैं. सूखे हुए किनारे अनियमित एवं टेढ़ेमेढ़े या झुलसे हुए दिखाई देते हैं. इन सूखे हुए पीले पत्तों के साथसाथ राख़ के रंग के चकत्ते भी दिखाई देते हैं. संक्रमण की उग्र अवस्था में पत्ती सूख जाती है. बालियों में दाने नहीं पड़ते हैं.

रोग प्रबंधन

– शुद्ध एवं स्वस्थ बीजों का ही प्रयोग करें.
– बीजों को बोआई से पहले 2.5 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन और 25 ग्राम कौपरऔक्सीक्लोराइड के घोल में 12 घंटे तक डुबोएं.
– इस रोग के लगने की अवस्था में नत्रजन का प्रयोग कम कर दें.
– जिस खेत में रोग लगा हो, उस खेत का पानी किसी दूसरे खेत में न जाने दें. साथ ही, उस खेत में सिंचाई न करें.
– रोग को और अधिक फैलने से रोकने के लिए खेत में समुचित जल निकास की व्यवस्था की जानी चाहिए.

3. धान का भूरा धब्बा रोग : यह एक बीजजनित रोग है, जो हेलिमेंथो स्पोरियम ओराईजी नामक फफूंद द्वारा फैलता है. इस रोग की वजह से साल 1943 में बंगाल में अकाल पड़ गया था.

रोग की पहचान

इस रोग में पत्तियों पर गहरे कत्थई रंग के गोल अथवा अंडाकार धब्बे बन जाते हैं. इन धब्बों के चारों तरफ पीला घेरा बन जाता है और मध्य भाग पीलापन लिए हुए कत्थई रंग का होता है और पत्तियां झुलस जाती हैं. दानों पर भी भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. इस रोग का आक्रमण पौध अवस्था से ले कर दाने बनने की अवस्था तक होता है.

4. शीत झुलसा या आवरण झुलसा रोग : यह एक फफूंदजनित रोग है, जिस का रोग कारक राईजोक्टोनिया सोलेनाई है. पूर्व में इस रोग को अधिक महत्व का नहीं माना जाता था. अधिक पैदावार देने वाली एवं अधिक उर्वरक उपभोग करने वाली प्रजातियों के विकास से यह रोग धान के रोगों में अपना प्रमुख स्थान रखता है, जो कि उपज में 50 फीसदी तक नुकसान कर सकता है.

रोग की पहचान

इस रोग का संक्रमण नर्सरी से ही दिखना आरंभ हो जाता है, जिस से पौधे नीचे से सड़ने लगते हैं. मुख्य खेत में ये लक्षण कल्ले बनने की अंतिम अवस्था में प्रकट होते हैं. लीफ शीथ पर जल सतह के ऊपर से धब्बे बनने शुरू होते हैं. इन धब्बों की आकृति अनियमित और किनारा गहरा भूरा व बीच का भाग हलके रंग का होता है. पत्तियों पर घेरेदार धब्बे बनते हैं. अनुकूल परिस्थितियों में कई छोटेछोटे धब्बे मिल कर बड़ा धब्बा बनाते हैं. इस के कारण शीथ, तना, ध्वजा पत्ती पूरी तरह से ग्रसित हो जाती है और पौधे मर जाते हैं.

खेतों में यह रोग अगस्त एवं सितंबर माह में अधिक तीव्र दिखता है. संक्रमित पौधों में बाली कम निकलती है और दाने भी नहीं बनते हैं.

रोग प्रबंधन

– धान की रोगरोधी प्रजातियों को चुनें.
– शुद्ध एवं स्वस्थ बीजों का ही प्रयोग करें.
– बीजों को फफूंदनाशक से उपचारित कर के बोएं.
– मुख्य खेत एवं मेंड़ों को खरपतवार से मुक्त रखें.
– संतुलित उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए.
– नाइटोजन उर्वरकों को 2 या 3 बार में देना चाहिए.
– खेतों से फसल अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए.
– फसल में रोग नियंत्रण के लिए बायोवेल का जैविक कवकनाशी बायो ट्रूपर की 500 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ में 120 से 150 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

5. खैरा रोग : यह रोग जस्ता की कमी के कारण होता है. इस रोग के लगने पर पौधे की निचली पत्तियां पीली पड़नी शुरू हो जाती हैं और बाद में पत्तियों पर कत्थई रंग के अनियमित धब्बे उभरने लगते हैं. रोग की उग्र अवस्था में पौधे की पत्तियां पीली पड़ कर सूखने लगती हैं. कल्ले कम निकलते हैं और पौधों की बढ़वार रुक जाती है.

रोग प्रबंधन

– धान की फसल में यह रोग न लगे, उस के लिए 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति एकड़ की दर से रोपाई से पहले खेत की तैयारी के समय डालना चाहिए.
– रोग लगने के बाद इस की रोकथाम के लिए 2 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 1 किलोग्राम चूना 250 से 300 लिटर पानी में घोल कर प्रति एकड़ में छिड़काव करें. आवश्यकतानुसार 10 दिन के बाद फिर से स्प्रे करें.

6. आभासी कंड या ध्वज कंड या हलदी रोग : यह रोग क्लेविसेप्स ओराईजी नामक फफूंद से फैलता है. पहले यह रोग ज्यादा महत्व का नहीं माना जाता था, बल्कि इसे किसान के लिए शुभ संकेत माना जाता था. परंतु अधिक पैदावार देने वाली एवं अधिक उर्वरक उपयोग करने वाली प्रजातियों के विकास और जलवायु परिवर्तन से अब यह रोग धान के रोगों में अपना प्रमुख स्थान रखता है, जो कि संक्रमण के अनुसार उपज में 2 फीसदी से ले कर 40 फीसदी तक नुकसान करता है.

रोग की पहचान

इस रोग के लक्षण पौधों की बालियों में केवल दानों पर ही दिखाई देते हैं. रोगजनक के विकसित हो जाने के कारण बाली में कहीं कहीं बिखरे हुए दाने बड़़े मखमल के समान चिकने हरे समूह में बदल जाते हैं, जो अनियमित रूप में गोल अंडाकार होते हैं. इन का रंग बाहरी और नारंगी पीला और मध्य में लगभग सफेद होता है. इस रोग से बाली में कुछ ही दाने प्रभावित होते हैं.

रोग प्रबंधन

– सदैव बीजोपचार कर के ही बोना चाहिए.
– खेत को खरपतवारमुक्त रखना चाहिए.
– खेत की तैयारी के वक्त खेत की सफाई कर उस की गहरी जुताई कर के तेज धूप लगने के लिए खुला छोड़ देना चाहिए.

– फसल में रोग नियंत्रण के लिए बायोवेल का जैविक कवकनाशी बायो ट्रूपर की 500 मिली. मात्रा का प्रति एकड़ में 120 से 150 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

न नर्सरी, न पलेवा, धान की सीधी बोआई

धान की सीधी बोआई 2 विधि से की जाती है. एक विधि में खेत तैयार कर सीड ड्रिल/मल्टी क्राप सुपर सीडर द्वारा बीज बोया जाता है. बोआई के समय खेत में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है, वहीं दूसरी विधि में खेत में लेव लगा कर अंकुरित बीजों को ड्रम सीडर द्वारा बोया जाता है. बोआई से पूर्व धान के खेत को यथासंभव समतल कर लेना चाहिए.

धान की सीधी बोआई करते समय बीज को 2-3 सैंटीमीटर गहराई पर ही बोना चाहिए. मशीन द्वारा सीधी बोआई में कतार से कतार की दूरी 18-22 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 5-10 सैंटीमीटर होती है.

इस विधि में वर्षा होने से पूर्व खेत तैयार कर सूखे खेत में धान की बिजाई की जाती है. अधिक उत्पादन के लिए इस विधि से बोआई व जुताई करने के उपरांत जून के प्रथम सप्ताह में बैलचालित बोआई यंत्र (नारी हल में पोरा लगा कर) अथवा ट्रैक्टरचालित सीड ड्रिल/सुपर सीडर/मल्टी क्राफ्ट सुपर सीडर द्वारा करें.

धान की सीधी बोआई तकनीक से लाभ

धान की कुल सिंचाई की आवश्यकता का लगभग 20 फीसदी पानी रोपाई के लिए खेत मचाने (लेव) में प्रयुक्त होता है. सीधी बोआई तकनीक अपनाने से 20 से 25 फीसदी तक पानी की बचत होती है, क्योंकि इस इस विधि से धान की बोआई करने पर खेत में लगातार पानी बनाए रखने की आवश्यकता नहीं पड़ती है.

सीधी बोआई करने से रोपाई की तुलना में 25-30 श्रमिक प्रति हेक्टेयर की बचत होती है. इस विधि में समय की बचत भी हो जाती है, क्योंकि इस विधि में धान की पौध तैयार और रोपाई करने की जरूरत नहीं पड़ती है. धान की नर्सरी उगाने, खेत मचाने और खेत में पौध रोपने का खर्च बच जाता है.

इस प्रकार सीधी बोआई में उत्पादन खर्च कम आता है. रोपाई वाली विधि की तुलना में इस तकनीक में ऊर्जा व ईंधन की बचत होती है. प्रति हेक्टेयर 35-40 लिटर डीजल की बचत होती है. समय से धान की बोआई हो जाती है. इस से इस की उपज अधिक मिलने की संभावना होती है.

धान की खेती रोपाई विधि से करने पर खेत की मचाई (लेव) करने की जरूरत पड़ती है, जिस से भूमि की भौतिक दशा पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, जबकि सीधी बोआई तकनीक से मिट्टी की भौतिक दशा पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है. इस विधि से किसान जीरो टिलेज मशीन/मल्टी सुपर सीडर में खाद व बीज डाल कर आसानी से बोआई कर सकते हैं. इस से बीज की बचत होती है और उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ती है.

सीधी बोआई का रोपित धान 10-15 दिन पहले तैयार हो जाता है, जिस से समय पर रबी फसलों की बोआई और भी आसानी से की जा सकती है.

अगस्त माह में निबटाएं खेती से जुड़े जरूरी काम

खेती के लिहाज से अगस्त का महीना किसानों के लिए खास है, क्योंकि मानसून जोरों पर होता है. वर्षा वाले क्षेत्रों में झमाझम बारिश होती है. या यह भी कह लें कि मानसून में बरसात की झड़ी लग जाती है. इस के चलते चारों तरफ हरियाली बढ़ जाती है.

अगस्त के महीने में होने वाली बारिश जहां फसलों के लिए फायदेमंद होती है, वहीं इस महीने कई तरह के कीड़ेमकोड़े भी पनपते हैं, जो फसल और पशुओं के साथसाथ इनसानी सेहत लिए भी नुकसानदायक हैं.

इस माह ज्यादा मच्छरों के पनपने से मलेरिया व डेंगू जैसी बीमारियां बढ़ जाती हैं, वहीं पशुओं में खुरपकामुंहपका रोग भी काफी हद तक बढ़ जाता है. फसलों में भी कीटों और बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है.

बारिश अधिक होने से फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों की तादाद में इजाफा हो जाता है, जो बोई गई फसल की पत्तियों से रस, फूल व फलों को अपना भोजन बनाते हैं. इस से पैदावार में काफी कमी आ जाती है.

ऐसे में अगर कीटों का प्रकोप फसल में दिखाई दे, तो अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के फसल सुरक्षा विशेषज्ञ से संपर्क कर समाधान पा सकते हैं.

इस माह फसल में बहुत सी बीमारियां फैलती हैं, जिस से उपज में भारी कमी के साथसाथ गुणवत्ता भी गिर जाती है. बीमारियों से बचने के लिए किसानों को रोगरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए और बीजोपचार का उपाय जरूर अपनाना चाहिए.

अगस्त के महीने में खेतों में बोई गई फसल के बीच और मेंड़ों पर घासफूस उग आते हैं, जो फसल की बढ़वार को रोक देते हैं, जिस से फसल का उत्पादन प्रभावित हो जाता है. ऐसे में यह सुनिश्चित कर लें कि फसल में खरपतवार बिलकुल न उगने पाएं. अगर खपतवार उग आए हों, तो निराईगुड़ाई कर के उन्हें फसल से निकाल दें. इन खरपतवारों के नियंत्रण से कीट व बीमारियों की रोकथाम में मदद मिलती है. साथ ही, यह भी ध्यान दें कि फसल में कोई रोगग्रस्त पौधा दिखाई दे, तो उसे फौरन निकाल कर नष्ट कर दें. इस से बीमारियों को पूरी फसल में फैलने से रोकने में मदद मिलती है.

किसान खरीफ फसल के रूप में सब से ज्यादा खेती धान की करते हैं. रोपाई का काम अगस्त के महीने में पूरी तरह से पूरा हो चुका होता है. ऐसे में धान की फसल को पानी की ज्यादा जरूरत पड़ती है.

अगस्त के महीने में बारिश अच्छी होती है. ऐसी अवस्था में खेतों के चारों तरफ मेंड़ों को मजबूत करें, जिस से बरसात का पानी खेत से बह कर बाहर न जाने पाए. फसल में पर्याप्त नमी बनाए रखने के लिए उचित अंतराल पर सिंचाई करते रहें.

धान की रोपाई के 25-30 दिन बाद अधिक उपज वाली प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 30 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 65 किलोग्राम यूरिया और सुगंधित प्रजातियों में प्रति हेक्टेयर 15 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी 33 किलोग्राम यूरिया की टौप ड्रेसिंग करें. नाइट्रोजन की इतनी ही मात्रा की दूसरी व अंतिम टौप ड्रेसिंग रोपाई के 50-55 दिन बाद करनी चाहिए.

खैरा रोग की रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेयर की दर से 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 2.5 किलोग्राम चूना या 20 किलोग्राम यूरिया को 1,000 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

दानेदार यूरिया के नुकसान से बचने के लिए इफको के नैनो लिक्विड यूरिया का छिड़काव करें. इस से मिट्टी, पानी और वायु प्रदूषण में कमी आती है. साथ ही, फसल को पूरा नाइट्रोजन मिलता है, जिस से फसल की बढ़वार और उत्पादन दोनों बढ़ जाता है.

धान की फसल में फास्फोरस भी 2 बार दिया जा सकता है और जिंक डालना तो कदापि न भूलें, क्योंकि यदि जिंक नहीं दिया हो, तो 3 सप्ताह बाद धान की फसल पीली पड़ सकती है और पत्तों पर भूरे रंग के धब्बे आ जाते हैं.

तना गलन रोग पौधों के तनों को गला देता है. पौधे जमीन पर गिर पड़ते हैं और तना चीरने पर सफेद रूई जैसी फफूंद व काले रंग के पिंड पाए जाते हैं.

इस रोग की रोकथाम के लिए रोपाई से पहले खेतों और मेंड़ों पर पड़े पिंडों और ठूंठों को जला दें और खेत में हर हफ्ते पानी बदल दें. रोगग्रस्त खेत का पानी स्वस्थ खेत में न जाने दें.

ब्लास्ट रोग में पत्तियों पर धब्बे बनते हैं और तने पर गांठें चारों ओर से काली हो जाती हैं, बाद में पौधा गांठ से टूट जाता है.

इस रोग की रोकथाम के लिए लक्षण नजर आने पर प्रति एकड़ 200 ग्राम कार्बेन्डाजिम को 200 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

अगस्त में गन्ने को बांधें, ताकि फसल गिरने से बचे. क्योंकि इस माह काफी कीट व बीमारियां लगने का खतरा रहता है. अगोला बेधक, पायरिला, गुरदासपुर बोरर और जड़ बेधक कीटों का प्रकोप दिखने पर रोकथाम के लिए कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें.

अगस्त महीने में वर्षा का पानी मक्का के खेत में रुकने ना पाए. इस का निकास लगातार करते रहें. साथ ही, खरपतवार को खेत से बराबर निकालते रहें.

देर से बोआई वाली फसल में पौधे घुटनों की ऊंचाई पर आ गए होंगे. वहां नाइट्रोजन की दूसरी बार की मात्रा समय से देना न भूलें.

अगस्त महीने में बाजरे में फूल आने की स्थिति होती है. ऐसे समय खेत में नमी बनाए रखें. भारी वर्षा होने पर फालतू पानी तुरंत निकाल दें.

यह भी ध्यान रखें कि मूंग, उड़द, लोबिया, अरहर, सोयाबीन इस प्रकार की दलहनी फसलों में फूल आने पर मिट्टी में हलकी नमी बनाए रखें. इस से फूल झड़ेंगे नहीं और ज्यादा फलियां लगेंगी व दाने भी मोटे व स्वस्थ होंगे. परंतु खेतों में वर्षा का पानी नहीं रहना चाहिए. जलनिकास का अच्छा प्रबंध होना चाहिए.

जिन किसानों ने मूंगफली की फसल ले रखी है और अगर मूंगफली में फूल आने की अवस्था है, तो सिंचाई अवश्य करें. दूसरी सिंचाई फल लगने पर जरूरी है.

जिन किसानों ने बैगन व टमाटर की नर्सरी डाल रखी हो, अगर जुलाई के आखिर में पौधों की रोपाई नहीं कर पाए हैं, तो अगस्त में रोपाई का काम जरूर निबटा लें.

अगर रोपाई का काम जुलाई में ही पूरा कर लिया गया हो, तो अगस्त माह में खरपतवार नियंत्रण और खेत में उचित नमी बनाए रखें. अगर अतिरिक्त पानी हो, तो निकाल दें.

जिन किसानों ने खीरे की खेती कर रखी है या इस के अलावा भी दूसरी सब्जियां लगा रखी हैं, उन सब्जियों में फल छेदक कीड़ों के प्रकोप का खतरा बना रहता है. ऐसे में कीड़ों के नियंत्रण के लिए फसल सुरक्षा विशेषज्ञ से संपर्क करें.

पत्तागोभी व फूलगोभी की अगेती खेती करने वाले किसान अगस्त के अंत तक नर्सरी डाल दें. पत्तागोभी की उन्नत किस्मों में गोल्डन और पूसा मुक्ता व फूलगोभी की पूसा सिंथेटिक, पूसा सुभद्रा, पूसा हिम ज्योति किस्में चुनें.

बीज को उपचारित कर के ही बोएं. एक फुट चौड़े व सुविधानुसार लंबे व ऊंची नर्सरी बेड में डालें. बीच में अच्छी चौड़ी नालियां रखें.

नर्सरी में बीज डालने के पहले सड़ीगली खाद अच्छी मात्रा में मिलाएं. नर्सरी में बीज डालने के बाद उचित नमी बनाए रखें और धूप से भी बचाएं. अगस्त में डाली गई नर्सरी के पौध की रोपाई सितंबर माह में करें.

गाजर और मूली की अगेती खेती करने वाले किसान अगस्त में बोआई कर सकते हैं. गाजर की पूसा केसर और पूसा मेघाली किस्मों को 2-2.7 किलोग्राम बीज को एक फुट की दूरी पर लाइनों में आधा इंच गहरी लगाएं.

मूली की पूसा देशी किस्म का 3-4 किलोग्राम बीज एक फुट की दूरी पर लाइनों में और 6 इंच की दूरी रख कर लगाएं.

अगस्त का महीना नीबू व लीची में गूटी बांधने के लिए सब से मुफीद माना गया है. इस समय बगीचों से जल निकास और खरपतवार नियंत्रण पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है.

पपीते की खेती करने वाले किसान अगस्त माह के अंत तक पपीते की पौध भी गड्ढों में लगा सकते हैं. इस के लिए गड्ढे, अच्छी मिट्टी व देशी खाद से ऊपर तक भर लें.

अगस्त महीने में बबूल, शीशम और नीम बंजर भूमि में लगा सकते हैं. इन की लकड़ी ईंधन, उद्योगों का कच्चा माल, बिजली के खंबे, फर्नीचर बनाने के काम आते हैं और काफी लाभदायक हैं. बबूल व नीम भेड़बकरियों का चारा भी है.

Farmingअगस्त महीने के शुरुआती हफ्ते तक धान की रोपाई का काम पूरा हो चुका होता है. ऐसे में किसान अपने ट्रैक्टर और लेव लगाने वाले यंत्रों की साफसफाई करें. अगर इन का रखरखाव ठीक से नहीं होता है, तो खेती के कामों पर काफी बुरा असर पड़ता है.

ट्रैक्टर में सही ग्रेड के तेल और वास्तविक स्पेयर पार्ट का ही उपयोग करें. इस के अलावा इंजन में तेल के स्तर को जांचते रहें. समयसमय पर एयर क्लीनर को साफ करते रहें. ट्रैक्टर के टायरों में हवा के दबाव को देखें. अगर दबाव कम है, तो टायरों में हवा भरवा लें. ट्रैक्टर में लगे बैटरी के पानी के स्तर को भी जांच लें. साथ ही, गियर बौक्स में तेल के स्तर को देख लें. क्लच शाफ्ट और बेयरिंग, ब्रेक कंट्रोल, पंखे का वाशर, सामने के पहिए का हब, टाई राड और रेडियस क्रास आदि पर ग्रीस लगा लें.

ध्यान रखने योग्य बातें

– अगस्त के महीने में चारे की फसलों जैसे ज्वार, बाजरा, नेपियर, बरबटी आदि की नियमित कटाई की जाती है.

– सूरजमुखी की फसल खाली खेतों में लगाते हैं.

– इस महीने के आखरी दिनों में रामतिल की फसल लगाते हैं.

– गन्ने एवं मूंगफली की निदाई करते हैं एवं गुड़ाई करते हैं. उस के बाद उस पर मिट्टी चढ़ाई जाती है.

– धान की फसल में उर्वरक डालें.

– धान, ज्वार, अरहर, मूंग, उड़द, मक्का, सोयाबीन इत्यादि फसलों के खरपतवार निकाल दें और गुड़ाई करें.

– मूंगफली में फूल लगने शुरू हो जाने के बाद मिट्टी चढ़ाते हैं.

– अगर मक्के की फसल तैयार हो गई है, तो भुट्टे तोड़ लें. उस के बाद फिर खेत को रबी की फसल के लिए तैयार करते हैं.

– आम और अमरूद के नए बगीचे इस माह लगाते हैं. पपीता में खाद देते हैं. भिंडी और बरबटी की तुड़ाई करते हैं. सभी फसलों को कीटनाशक, फंफूदीनाशक दवाओं द्वारा कीड़ों व बीमारियों से बचाते हैं.

(नोट : यह लेख वैज्ञानिक, प्रसार, राघवेंद्र विक्रम सिंह, विशेषज्ञ फसल सुरक्षा डा. प्रेम शंकर व कृषि विज्ञान केंद्र, सुल्तानपुर में वैज्ञानिक कृषि अभियांत्रिकी वरुण कुमार से हुई बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है.)

ड्रम सीडर से सीधे बोआई

धान की रोप  में काफी लागत और मजदूरों की कमी के चलते किसानों को तमाम कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और फायदा कम ले पाते हैं. लागत कम करने के लिए ड्रम सीडर का प्रयोग काफी उपयोगी है.

प्रो. रवि प्रकाश मौर्य ने बताया कि धान की सीधी बोआई वाली एक मशीन वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई है, जिसे पैडी ड्रम सीडर कहते हैं.  जो किसान किसी वजह से धान की नर्सरी नहीं डाल पाए हैं, वे धान की कम अवधि की प्रजाति की बोआई सीधे ड्रम सीडर से कर सकते हैं. यह बहुत ही सस्ती और आसान तकनीक है. इस की बनावट बिलकुल आसान है.

उन्होंने कहा कि यह मशीन मानवचालित है. 6 किलोग्राम वजन व 170 सैंटीमीटर लंबी यह मशीन है. बीज भरने के लिए 4 से 6 प्लास्टिक के खोखले ड्रम लगे रहते हैं, जो एक बेलन पर बंधे रहते हैं. ड्रम में 2 पंक्तियों पर 9 मिलीमीटर व्यास के छेद बने होते हैं.

Machinesड्रम की एक परिधि में बराबर की दूरी पर कुल 15 छेद होते हैं. 50 फीसदी छेद बंद रहते हैं. बीज का गिराव गुरुत्वाकर्षण के कारण इन्हीं छेदों के द्वारा होता है. बेलन के दोनों किनारों पर  पहिए लगे होते हैं. इन का व्यास 60 सैंटीमीटर होता है, ताकि ड्रम पर्याप्त ऊंचाई पर रहे.

मशीन को खींचने के लिए एक हत्था लगा रहता है. आधे छेद बंद रहने पर मशीन द्वारा सूखा बीज दर 25 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रयोग किया जाता है. पूरे छेद खुले होने पर 55 से 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है.

प्रत्येक ड्रम  के लिए अलगअलग ढक्कन बना होता है, जिस में बीज भरा जाता है. मशीन में पूर्व अंकुरित धान का बीज प्रयोग में लाते हैं. बोआई के समय लेव लगे हुए समतल खेत में 2 से 2.5 इंच पानी होना आवश्यक है.

एक दिन में ड्रम सीडर से 1 से 1.40 हेक्टेयर खेत में बोआई की जाती है. ड्रम सीडर की उपयोगिता धान की रोपाई न करने से बढ़ जाती है. इस में नर्सरी तैयार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है. 20 सैंटीमीटर की दूरी पर पंक्तिबद्ध बीज का जमाव होता है, जिस से फसल का विकास अच्छा होता है और निराई व अन्य क्रियाओं में सुगमता होती है. वहीं फसल सुरक्षा पर कम खर्च आता है.

फसल 10 से 15 दिन पहले पक जाती है, जिस से अगली फसल गेहूं की बोआई समय पर संभव होती है और उस का उत्पादन अच्छा मिलता है. पहली सिंचाई 3-4 दिन बाद हलकी व धीरेधीरे शाम के समय करें.

श्रीविधि तकनीक से धान की खेती

यह धान की खेती की ऐसी तकनीक है, जिस में बीज, पानी, खाद और मानव श्रम का समुचित तरीके से इंतजाम करना शामिल है, जिस का मकसद प्रति इकाई क्षेत्रफल में ज्यादा से ज्यादा उत्पादकता बढ़ाना है.

जमीन का चुनाव

इस विधि में खासतौर से जमीन, पानी और दूसरे पोषक तत्त्वों के बेहतर इंतजाम से पौधे की जड़ों के ज्यादा से ज्यादा विकास पर जोर दिया जाता है. इस के लिए जमीन में अंत:कर्षण क्रियाएं समयसमय पर जरूर करनी चाहिए, ताकि जमीन में नमी बनी रहे, जो सूक्ष्म जीवाणुओं की सक्रियता बढ़ाने में मददगार होती है.

धान की खेती सभी तरह की जमीन में की जा सकती है, फिर भी इस के लिए दोमट चिकनी मिट्टी, पानी सोखने की ज्यादा कूवत वाली और ज्यादा जैविक तत्त्वों से भरपूर वाली जमीन अच्छी मानी जाती है, जिस की जल धारण की कूवत ज्यादा हो.

नर्सरी की तैयारी

परंपरागत विधि से धान की खेती एक एकड़ क्षेत्रफल में करने के लिए 12-16 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है, पर श्री विधि में एक एकड़ धान की खेती के लिए सिर्फ 2 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. इस के लिए 400 वर्गफुट की जगह पर नर्सरी तैयार की जाती है.

नर्सरी बनाने के समय बहुत सावधानी बरतनी चाहिए. इस विधि से 10-14 दिन में पौध का रोपण किया जाता है. नर्सरी की क्यारी बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्यारी खेत के बीच या कोने में बनाई जाए, जहां पौध रोपण करना है. लंबाई हालात के मुताबिक व बैड की ऊंचाई आधार तल से 6 इंच होनी चाहिए.

पहली परत : 1 इंच गोबर की सड़ी खाद.

दूसरी परत : 1-1.5 इंच बारीक मिट्टी.

तीसरी परत : 1 इंच सड़ी गोबर की खाद.

चौथी परत : 2-5 इंच बारीक मिट्टी.

मल्चिंग : 3-4 दिन तक.

नर्सरी में रासायनिक खाद के बजाय गोबर की सड़ी खाद का इस्तेमाल करना चाहिए. इस से मिट्टी मुलायम रहने से पौध को बिना नुकसान पहुंचाए खेत तक ले जाया जाता है.

नर्सरी में बीज की बोआई

शोधित बीज को हाथ से लाइन बना कर 1-1 कर के लाइन से बोया जाता है और उस पर एक हलकी परत सड़ी गोबर की खाद डाली जाती है और आखिर में नर्सरी बैड को पुआल से ढक दिया जाता है. बीज जमने के बाद पुआल को हटा दिया जाता है.

पुआल हटाने के बाद सुबहशाम रोजाना हलकी सिंचाई जरूर करें. सिंचाई करते समय यह सावधानी बरतनी चाहिए कि बीज मिट्टी से बाहर न निकले.

Paddy Farming

खेत की तैयारी

इस विधि में दूसरी फसलों की तरह खेत की तैयारी की जाती है. खेत की जुताई करने के बाद पाटा लगा देते हैं. इस के बाद मार्कर यंत्र से खेत में लाइन बनाते हैं या फिर रस्सी की मदद से खेत में 25×25 सैंटीमीटर या 30×30 सैंटीमीटर पर लाइन खींच लेते हैं. जहां कटान होता है, वहीं पर प्रति हिल एक पौध की रोपाई की जाती है. इस विधि में परंपरागत विधि की तुलना में प्रति पौधा ज्यादा कड़े निकलते हैं.

पौध रोपण और सावधानियां

क्यारी में बीज बोने के बाद तकरीबन 10-14 दिन की पौध को सावधानी से निकाल कर 1-1 कर के मुख्य खेत में आधे घंटे के अंदर सावधानी से रोपना चाहिए और खेत में 2 सैंटीमीटर से अधिक पानी नहीं भरा होना चाहिए.

पौध की तैयारी

पौधे से पौधे की दूरी 25×25 सैंटीमीटर रखनी चाहिए और एक हिल पर एक ही पौध रोपना चाहिए. अगर जमीन की उर्वराशक्ति अधिक हो तो पौधे से पौधे की दूरी 30×30 सैंटीमीटर बढ़ा सकते हैं.

खरपतवार नियंत्रण और जड़ों का विकास

अच्छे पौधे विकसित हों, इस के लिए खेत में नमी बनाए रखें. बहुत ज्यादा पानी न भरें और जमीन में रंद्रावकाश अच्छा रखने के लिए खेत में कोनोवीडर से निराईगुड़ाई करें. जरूरत के हिसाब से ही पानी दें, जिस से पानी की बचत होगी.

सिंचाई

इस विधि में जरूरत के हिसाब से एक तय समय के बाद सिंचाई करते हैं, जिस से खेत में नमी बनाए रखने के साथसाथ जमीन में वायु का संचार अच्छा रहे. खेत में 1-2 सैंटीमीटर से ज्यादा पानी नहीं देना चाहिए. पानी की कमी को ध्यान में रख कर इस तकनीक की अहमियत और ज्यादा बढ़ गई है.

गोबर की खाद या कंपोस्ट का इस्तेमाल

इस विधि में धान की ज्यादा उपज लेने के लिए कार्बनिक खादों जैसे गोबर की खाद या कंपोस्ट का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना चाहिए. कार्बनिक खाद मुहैया न होने पर जमीन की उर्वराशक्ति की जांच के आधार पर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस तरह कीजिए धान में खरपतवार प्रबंधन

धान की फसल में पाए जाने वाले प्रमुख खरपतवार घास, सावां, टोडी बट्टा या गुरही, रागीया, मोथा, जंगली धान या करघा, केबघास, बंदराबंदरी, दूब (एकदलीय घास कुल के), गारखमुडी, विलजा, अगिया, जलकुंभी, कैना, कनकी, हजार दाना और जंगली जूट हैं. इन खरपतवारों के नियंत्रण के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाएं :

* जहां खेत में मिट्टी का लेव बना कर और पानी भर कर धान को रोपा या बोया जाता है, वहां जो खरपतवार भूमि तैयार करने से पहले उग आते हैं, वे लेव बनाते समय जड़ से उखाड़ कर कीचड़ में दबसड़ जाते हैं. इस के बाद मिट्टी को 5 सैंटीमीटर या अधिक पानी से भरा रखने पर नए व पुराने खरपतवार कम पनप पाते हैं.

* बीज छिटकवां धान, जिस में बियासी नहीं की जाती हो, वहां बोआई के तुरंत बाद या नई जमीन में या सूखी भूमि में बोनी के बाद, पानी बरसने के फौरन बाद ब्यूटाक्लोर 2.5 लिटर प्रति हेक्टेयर सक्रिय तत्त्व का छिड़काव 500 लिटर पानी में घोल कर करने से तकरीबन 20 से 25 दिनों तक खरपतवार नहीं उगते हैं. खड़ी फसल में 2 बार 20-25 दिनों और 40-45 दिनों की अवस्था पर निराई करें.

* बीज छिटकवां धान, जहां बोया जाता हो, वहां बोने करने के बाद 7 दिनों के भीतर निराई और गुड़ाई किया जाना चाहिए. दूसरी निराई 25-30 दिनों पर करनी चाहिए. बोने के समय पर पानी उपलब्ध होने पर निराई करनी चाहिए. बोआई के 40-45 दिन बाद बोना नहीं चाहिए.

* धान के खेत में खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक विधियां ज्यादा कारगर साबित हुई हैं.

* धान के खेत में नोमिनो गोल्ड खरपतवारनाशक छिड़कें. इस के सिर्फ एक ही छिड़काव में सभी प्रमुख खरपतवारों (डिला मोथा, छतरी वाला मोथा, फिम्बीस्टाइलिस), घुई (मोथा के विभिन्न प्रकार का पान पत्ता), पानी घास, पीले फूल वाली बूंटी मिर्च, बूंटी चार पत्ती, सफेद फूस वाली बूंटी (चौड़ी पत्ती) और घास (स्वांकी, स्वांक और कनकी) को नियंत्रित करता है.

* इस खरपतवारनाशक को खरपतवार निकलने के बाद 10-25 दिन के बीच में इस्तेमाल कर सकते हैं. यह खरपतवारनाशक सीधे बोए गए धान, धान की नर्सरी और रोपित धान, सभी में प्रभावी खरपतवार नियंत्रण करता है.

* यह खरपतवारनाशक धान की फसल के लिए पूरी तरह सुरक्षित है और धान को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है. एक हेक्टेयर में नोमिनो गोल्ड खरपतवारनाशक दवा की 200 से 300 मिलीलिटर को 450 से 500 लिटर पानी में मिलाएं और खेत में से पानी निकाल कर खरपतवारनाशक दवा का छिड़काव करें, ताकि खरपतवार पर दवा का इस्तेमाल हो सके.

* खरपतवारनाशी दवा का छिड़काव करने के 2-3 दिन बाद दोबारा खेत में पानी भर दें और कम से कम 3-5 सैंटीमीटर पानी खड़ा रहने दें.

* खरपतवारनाशक दवा का छिड़काव करने के 6 घंटे में ही अपना काम शुरू कर देता है. 6 घंटे बाद बरसात आने पर भी खरपतवार नियंत्रण पर कोई असर नहीं पड़ता. इस खरपतवारनाशी को दूसरे पौधरक्षक रसायनों के साथ मिश्रण के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है और इस का धान पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है.

फसल कटाई में कृषि यंत्रों का इस्तेमाल

फसल की कटाई किसान खुद करते हैं या फिर मजदूरी दे कर फसल को कटवाते हैं. इस के अलावा अब कई तरह की मशीनें भी लोगों के पास आ गई हैं, जिन से फसल कटवाना और भी आसान हो गया है. मशीनों से काम करने पर समय भी काफी कम लगता है.  रीपर, कंबाइन व हारवेस्टर वगैरह ऐसी ही मशीनें हैं.  बड़े पैमाने पर धान व गेहूं की खेती करने वाले किसान हार्वेस्टर जैसे बड़े कृषि यंत्रों का उपयोग करते हैं. लेकिन मझले व कम जोत वाले किसानों के लिए भी अनेक कृषि यंत्र मौजदू हैं.

बीसीएस आटोमैटिड रीपर (स्वचालित) :

यह रीपर यंत्र फसल की कटाई करने के साथसाथ उस के बंडल भी बनाता है. इस यंत्र के इस्तेमाल से मजदूरों की काफी बचत हो जाती है. इस रीपर यंत्र से धान, सोयाबीन, धनिया, हरा चारा वगैरह भी काट सकते हैं.

इस यंत्र में 10 हौर्सपावर का इंजन लगा होता है. यह मशीन एक घंटे में तकरीबन एक एकड़ फसल को काट कर उस के बंडल भी साथसाथ बांध देती है. इतने काम में ईंधन खपत एक लिटर प्रति एकड़ होती है.

इस मशीन को चलाना बेहद आसान है. इस पर एक ही आदमी बैठ कर आराम से फसल काट सकता है. इस में कुल 5 गियर होते हैं जिस में 4 गियर आगे और एक गियर पीछे के लिए लगा होता है.

इस के अलावा बीसीएस कंपनी का ट्रैक्टरचालित रीपर बाइंडर भी आता है. इस की कुछ अधिक कीमत है. ये यंत्र सभी छोटेबड़े शहरों में मिल सकते हैं.

ज्यादा जानकारी के लिए आप बीसीएस कृषि यंत्र निर्माता कंपनी के मोबाइल नंबर  09872874743 / 09872874745 पर बात कर सकते हैं.

कामको पावर रीपर :

इस के 2 मौडल हैं. पहला मौडल केआर 120 एच है. इन्हें पैट्रोल व डीजल दोनों से चलाया जा सकता है. पैट्रोल से ईंधन की खपत 800 मिलीलिटर प्रति घंटा है, वहीं डीजल से चलाने पर ईंधन की खपत अधिक होती है. यह 2 घंटे में एक एकड़ फसल की कटाई करता है. यह जमीन से 5 सैंटीमीटर से 25 सैंटीमीटर की ऊंचाई तक यानी 1.2 मीटर की चौड़ाई में फसल की कटाई करता है.

अशोका रीपर बाइंडर :

इस यंत्र को 35 हौर्सपावर से 40 हौर्सपावर के ट्रैक्टर के साथ आसानी से जोड़ कर चलाया जाता है और 3 घंटे में एक हेक्टेयर फसल की कटाई के साथसाथ बंधाई भी करता है.

इस यंत्र में हाइड्रोलिक सिस्टम होने के कारण इस यंत्र को अपनी सुविधानुसार ऊपरनीचे किया जा सकता है. मशीन को ट्रैक्टर के साथ जोड़ने के बाद कटाई करते समय 5 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक चलाया जा सकता है.

ज्यादा जानकारी के लिए आप कंपनी के मोबाइल नंबर 09412636370 पर जानकारी ली जा सकती है.

सरदार रीपर :

अनेक फसलों की कटाई करने वाला इन का मल्टीक्रौप सुपर डीलक्स मौडल 841 है. ज्यादा जानकारी के लिए आप मोबाइल नंबर 9814447143 पर बात कर सकते हैं.

इन कृषि यंत्र निर्माताओं के अलावा अनेक लोग ऐसे यंत्र बना रहे हैं, जिन में गुरु पावर रीपर, किसान क्राफ्ट, लोहन पावर रीपर वगैरह हैं. आप अपने नजदीकी कृषि यंत्र विक्रेता या नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से भी रीपर से जुड़ी जानकारी ले सकते हैं.

धान की कटाई और रखरखाव

देश में लगभग 50 फीसदी से ज्यादा  लोग चावल का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन धान की कटाई से ले कर उस का सही ढंग से रखरखाव करने तक लगभग 10 फीसदी धान का नुकसान किसानों को होता है. इस की सब से बड़ी वजह किसानों को सही जानकारी न होना है.

फसल की कटाई और इस के बाद होने वाले नुकसान को कम करने की जरूरत आज के समय में पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है.

आमतौर पर देखा जाता है कि कटाई, मड़ाई, सुखाना और फिर फसल को रखने के दौरान नुकसान ज्यादा होता है. इस नुकसान से बचने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाना जरूरी है. इन्हीं कुछ तरीकों के बारे में हम आप को बता रहे हैं, जिस से आप की मेहनत की कमाई बेकार न जाए.

धान की कटाई

Farming Machines

 

 

 

 

 

 

 

धान की कटाई किसान खुद करते हैं या फिर मजदूरी दे कर फसल को कटवाते हैं. इस के अलावा अब कई तरह की मशीनें भी लोगों के पास आ गई हैं, जिन से फसल कटवाना और भी आसान हो गया है. मशीनों से काम करने पर समय भी काफी कम लगता है.  रीपर, कंबाइन व हारवेस्टर वगैरह ऐसी ही मशीनें हैं. मजदूरों से फसल की कटाई कराने में इसलिए ज्यादा समय लगता है, क्योंकि मजदूर धान की कटाई पारंपरिक तरीके यानी हंसिया से करते हैं. इस में ज्यादा समय लगता है, लेकिन फायदा भी ज्यादा होता है.

मशीनों में रीपर और ट्रैक्टर से चलने वाला यंत्र कंबाइन का इस्तेमाल धान की कटाई में किया जाता है. मशीन धान काट कर लाइन में लगा देती है, जिसे बाद में इकट्ठा करने में आसानी रहती है. कंबाइन यंत्र से धान की कटाई जमीन से काफी ऊपर से की जाती है और कटाई के साथसाथ मड़ाई और ओसाई भी हो जाती है. कटाई की कंबाइन मशीनें कई तरह की आती हैं, कुछ सस्ती और कुछ महंगी भी. कंबाइन से धान की कटाई में पुआल का नुकसान होता है और काफी धान टूट भी जाता है.

धान टूटने से किसानों को उस की सही कीमत नहीं मिल पाती, जिस से बाजार कीमत से कम में धान बेचना किसानों की मजबूरी बन जाती है, लेकिन कंबाइन यंत्र से कटाई काफी जल्दी होती है, जिस से समय की बचत होती है और लागत भी कम आती है.

धान की मड़ाई व ओसाई

धान कीबालियों यानी पुआल से बीजों को अलग करना मड़ाई कहलाता है. मड़ाई का काम मजदूरों, पशुओं और मशीनों से भी किया जाता है. मड़ाई का काम फसल कटाई के बाद जितनी जल्दी हो सके कर लेना चाहिए.

मड़ाई के लिए तारों से बने ड्रम का भी इस्तेमाल होता है. धान के पौधों को ड्रम पर इस तरह रखा जाता है कि बालियां तार को छूती रहें और ड्रम को पैर से घुमाया जाता है.

मड़ाई के बाद धान के बीजों के साथ भूसा, धूल के कण और पुआल के टुकड़े रह जाते हैं. इसे हटाने के लिए धान की ओसाई की जाती है. ओसाई का काम उस समय भी किया जाता है, जब हवा चल रही हो. यदि हवा बंद हो जाए, तब 2 लोग चादर को तेजी के साथ झलते हैं, जिस से हवा निकलती है और ओसाई हो जाती है.

धान की कटाई 20-22 फीसदी नमी रहने पर की जाती है, लेकिन इतनी नमी में धान को रखा नहीं जा सकता है. इसलिए धान की नमी कम करना बहुत जरूरी है. इस के लिए धान को  घर की छतों के फर्श, चटाई, तिरपाल, प्लास्टिक शीट वगैरह पर फैला कर कई दिनों तक धान के बीजों को सुखाया जाता है. धान को ज्यादा तेज धूप में नहीं सुखाना चाहिए. सुखाने के लिए सीमेंट के फर्श और तिरपाल का इस्तेमाल करना चाहिए.

धान का भंडारण

भंडारण के पहले धान में नमी की मात्रा देख लेनी चाहिए. यदि आप को अधिक समय के लिए भंडारण करना है, तो नमी की मात्रा 12 फीसदी और कम समय के लिए 14 फीसदी होनी चाहिए.

भंडारण से पहले या बाद में धान का कीटों से बचाव करना भी जरूरी है. भंडारण के लिए कई तरह के ड्रम या कोठी इस्तेमाल किए जाते हैं. ये मिट्टी, लकड़ी, बांस, जूट की बोरियों, ईंटों व कपड़े वगैरह से बनाए जाते हैं, लेकिन इस तकनीक से ज्यादा समय तक भंडारण करना संभव नहीं है, क्योंकि इन में हवा जाने की कोई जगह नहीं होती.

कटाई के समय इन बातों का रखें ध्यान

* धान की कटाई के लिए 20-22 फीसदी नमी सही रहती है. इस से ज्यादा नमी होने पर चावल कम मिलता है और कच्चे, टूटे और कम गुणवत्ता वाले दाने ज्यादा मात्रा में होते हैं. कम नमी होने पर कटाई करने से मिलिंग के दौरान धान टूट कर गिरने लगता है.

* यदि खेत में पानी भरा हो तो कटाई से 7-10 दिन पहले पानी निकाल देना चाहिए, जिस से कटाई आसानी से हो सके.

* कटाई के समय धान की सभी बालियों को एक दिशा में रखना चाहिए ताकि मड़ाई में दिक्कत न हो.

* कटाई के बाद धान को बारिश और ओस से बचाना चाहिए.

* धान की किस्मों के अनुसार कटाई करवानी चाहिए, जैसे अगेती किस्में 110-115 दिनों बाद, मध्यम किस्में 120-130 दिनों बाद और देर से पकने वाली किस्में लगभग 130 दिनों के बाद काटने लायक हो जाती हैं.

धान की नर्सरी प्रबंधन

खरीफ में धान की फसल की खास अहमियत है. धान की ज्यादा पैदावार लेने के लिए बहुत से कारक उत्तरदायी हैं, जिन में से अच्छे बीज का चुनाव, नर्सरी में पौध की देखरेख, रोपाई की विधि, पोषक तत्त्व प्रबंधन, पानी की उपलब्धता खास हैं. स्वस्थ व निरोगी पौध तैयार करने के लिए यह जरूरी है कि जरूरी उम्र की पौध की रोपाई की जाए इस से धान की फसल से भरपूर पैदावार मिल सकती है.

आमतौर पर संकर धान की नर्सरी 21 दिनों व दूसरी प्रजातियों की नर्सरी 25 दिनों में तैयार हो जाती है. तैयार नर्सरी की रोपाई अगर एक हफ्ते के अंदर हो जाए तो पौधों में कल्लों की तादाद ज्यादा निकलती है, जो पैदावार बढ़ाने में सहायक होती है.

खेत का चुनाव

धान की पौध ऐसे खेत में डालनी चाहिए जो सिंचाई के स्रोत के पास हो. धान की खेती के लिए पानी रोकने की क्षमता रखने वाली चिकनी या मटियार मिट्टी वाले इलाके ज्यादा सही रहते हैं. सिंचाई की सुविधा मुहैया होने पर धान हलकी भूमि में भी कामयाबी के साथ उगाया जा सकता है.

खेत की तैयारी

नर्सरी के लिए चुने हुए खेत की जुताई करने के बाद पाटा चला कर जमीन को समतल कर लेना चाहिए. पौध तैयार करने के लिए खेत में 2-3 सैंटीमीटर पानी भर कर 2-3 बार जुताई करें, ताकि मिट्टी लेह युक्त हो जाए और खरपतवार नष्ट हो जाएं.

आखिरी जुताई के बाद पाटा लगा कर खेत को समतल करें, ताकि खेत में अच्छी तरह लेह बन जाए, जो पौध की रोपाई के लिए उखाड़ने में मदद मिले और जड़ों का नुकसान कम हो.

नर्सरी के लिए खाद

पौध तैयार करने के लिए 1.25 मीटर चौड़ी व 8 मीटर लंबी क्यारियां बना लें और प्रति क्यारी (10 वर्गमीटर) 225 ग्राम यूरिया, 400 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 65-70 ग्राम पोटाश मिलाएं. यह ध्यान रहे कि पौध  जितनी स्वस्थ होगी, उतनी ही अच्छी उपज मिलेगी.

बोआई का समय

जून महीने के पहले हफ्ते से आखिरी हफ्ते तक बीज की बोआई करें, जबकि सुगंधित प्रजातियों की नर्सरी जून के तीसरे हफ्ते में डालें.

बीज की मात्रा

एक एकड़ क्षेत्रफल की रोपाई के लिए धान की महीन चावल वाली किस्मों का 12  किलोग्राम, मध्य दाने वाली किस्मों का 14 किलोग्राम और मोटे दाने वाली किस्मों का 16 किलोग्राम बीज सही होता है, जबकि संकर प्रजातियों के लिए प्रति एकड़ 7-8 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.

बीजोपचार

जीवाणु  झुलसा की समस्या वाले क्षेत्रों में 25 किलोग्राम बीज को 4 ग्राम स्टै्रप्टोसाइक्लीन दवा में मिला कर रातभर पानी में भिगोएं. दूसरे दिन बीज को छाया में सुखा कर नर्सरी डालें.

जहां इस रोग की समस्या न हो उस क्षेत्र में बीज को 12 घंटे तक पानी में भिगोएं और पौधशाला में बोआई से पहले बीज को कार्बेंडाजिम या थीरम की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलोगाम बीज की दर से उपचारित करें और उस के बाद बीज को समतल छायादार जगह पर फैला दें व भीगी जूट की बोरियों से ढक दें. बोरियों के ऊपर पानी का छिड़काव करें, जिस से नमी बनी रहे.

24 घंटे के बाद बीज अंकुरित हो जाएगा, फिर अंकुरित बीज की समान रूप से बोआई कर दें. ध्यान रखें कि बीज की बोआई शाम को करें, ताकि अगर तापमान ज्यादा हो तो अंकुरण नष्ट न होने पाए.

नर्सरी की देखरेख

अंकुरित बीज की बोआई के 2-3 दिनों के बाद पौधशाला में सिंचाई करें. खैरा रोग से बचाव के लिए एक सुरक्षात्मक छिड़काव  500 ग्राम जिंक सल्फेट को 2 किलोग्राम यूरिया या 250 ग्राम बु झे हुए चूने के साथ 100 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति 1000 वर्गमीटर क्षेत्रफल की दर से पहला छिड़काव बोआई के 10 दिन बाद और दूसरा छिड़काव 20 दिन बाद करना चाहिए.

सफेदा रोग के नियंत्रण के लिए 400 ग्राम फेरस सल्फेट को 2 किलोग्राम यूरिया के साथ 100 लिटर पानी में घोल बना कर 1,000 वर्गमीटर क्षेत्रफल में छिड़काव करें.

धान की सीधी बोआई

धान की सीधी बोआई एक प्राकृतिक संसाधन संरक्षण तकनीक है, जिस में उचित नमी पर यथासंभव खेत की कम जुताई कर के अथवा बिना जोते हुए भी खेतों में जरूरत के मुताबिक खरपतवारनाशी का प्रयोग कर जीरो टिल मशीन से सीधी बोआई की जाती है.

जिन किसानों ने अपने गेहूं की कटाई कंबाइन से की हो, वे बिना फसल अवशेष जलाए धान की सीधी बोआई हैप्पी सीडर या टर्बो सीडर से कर सकते हैं. इस तकनीक से लागत में बचत होती है और फसल समय से तैयार हो जाती है.

उपयुक्त क्षेत्र

* उन क्षेत्रों में, जहां सिंचाई के लिए पानी की कमी हो, जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ वगैरह.

* वे राज्य, जहां जलभराव के हालात हों, उदाहरण के लिए, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, असम व पश्चिम बंगाल.

* उन राज्य में, जहां वर्षा आधारित खेती होती हो, जैसे ओडिशा, झारखंड, उत्तरपूर्वी राज्य.

सीधी बोआई के लाभ

* श्रमिकों की आवश्यकता में 30-40 प्रतिशत की कमी.

* पानी की 20-30 प्रतिशत बचत.

* उर्वरक उपभोग क्षमता में वृद्धि.

* समय से पहले (दिन 7-10) फसल तैयार, जिस से आगे बोई जाने वाली फसल की समय से बोआई.

* ऊर्जा की बचत (50-60 प्रतिशत डीजल).

* मीथेन उत्सर्जन में कमी, जिस से पर्यावरण सुरक्षा में इजाफा.

* उत्पादन लागत में 3,000-4,000 रुपए/प्रति हेक्टेयर की कमी.

बोआई का समय

सही समय पर फसल की बोआई एक बढि़या काम करती है, इसलिए सीधी बोआई वाले धान की फसल को मानसून आने के 10-15 दिन पहले बो देना चाहिए, जिस से फसल वर्षा शुरू होने तक 3-4 पंक्तियों वाली अवस्था में हो जाए. इस से पौधों की जड़ों की बढ़वार अच्छी होगी तथा ये खरपतवारों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे.

प्रजातियों का चयन

सीधी बोआई के लिए ऐसी प्रजातियों का चयन करें, जो अच्छी बढ़वार के साथसाथ खरपतवारों से भी प्रतिस्पर्धा कर सकें. जैसे पूसा सुगंध 5, पूसा बासमती 1121, पीएचबी 71, नरेंद्र 97, एमटीयू 1010, एचयूआर 3022, आरएमडी (आर)-1, सहभागी धान, सीआर धान 40, सीआर धान 100, सीआर धान 101 आदि.

बोने की विधि

यदि जीरो कम फर्टिसीड ड्रिल से बोआई करते हैं, तो इस के लिए महीन दानों वाली प्रजातियों (बासमती) के लिए 15-20 किलोग्राम, मोटे दाने वाली प्रजाति के लिए 20-25 किलोग्राम और संकर प्रजातियों के लिए 8-10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज पर्याप्त रहता है. पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 सैंटीमीटर उपयुक्त रहती है. बीज को सही गहराई पर बोने से फसल का अंकुरण अच्छा होता है, इसलिए बीज को 2-3 सैंटीमीटर गहराई पर ही बोना चाहिए. बोआई से पहले बीजों को पानी में 8-10 घंटे (सीड प्राइमिंग) भिगो कर छायादार जगह पर सुखा लें, जिस से बीजों के जैव रसायनों में अनुकूल परिवर्तन होता है और अंकुरण में वृद्धि होती है.

बीजों को बोआई से पहले 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज को बाविस्टीन या थीरम से उपचारित जरूर करें, जिस से मृदा व बीजजनित रोगों में कमी पाई जाती है.

उर्वरक प्रबंध

100-150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश व 25 किलोग्राम जिंक प्रति हेक्टेयर का प्रयोग करें.

नाइट्रोजन की एकतिहाई और फास्फोरस, पोटाश और जिंक की पूरी मात्रा बोआई के समय और शेष नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा बोआई के 30 दिन बाद और शेष बची हुई मात्रा बोआई के 55 दिन बाद दें. यदि मृदा में लोह तत्त्व की कमी हो, तो आयरन सल्फेट (19) का 0.5 प्रतिशत घोल बना कर 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें.

खरपतवार प्रबंधन

खरपतवारों की रोकथाम के लिए बोआई से एक हफ्ता पहले ग्लाईफोसेट नामक खरपतवारनाशी (1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सक्रिय तत्त्व) का प्रयोग करें. बोआई के 1-2 दिन के अंतराल पर पेंडिमिथेलिन (सक्रिय तत्त्व 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) और 20-25 दिन के अंतराल पर बिसपायरीबैक (नोमनी गोल्ड) की 25 ग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें.

कीट/सूत्रकृमि प्रबंधन

यदि फसल में सूत्रकृमि का प्रकोप हो, तब बोआई के 30-40 दिन के अंतराल में कार्बोफ्यूरान (सक्रिय तत्त्व 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) छिड़कें. तना छेदक की रोकथाम के लिए बोआई के 25-30 दिन बाद करटप हाइड्रोक्लोराइड का 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सक्रिय तत्त्व का छिड़काव करना चाहिए.

धान की उन्नतशील प्रजातियां

शीघ्र पकने वाली प्रजातियां : नरेंद्र 80, नरेंद्र 97, पंत धान 12, शुष्क सम्राट, नरेंद्र लालमति, मालवीय धान-2, शियाट्स धान-5, मालवीय धान-2, मालवीय धान-917, को-51.

मध्यम देर से पकने वाली : नरेंद्र-359, पंत धान 4, सरजू-52, नरेंद्र धान-2064, नरेंद्र धान-2065, मालवीय धान-1, शियाट्स धान-1, शियाट्स धान-2, शियाट्स धान-4, मालवीय धान-36, पंत धान-10.

देर से पकने वाली प्रजातियां : महसूरी, शियाट्स धान-3.

सुगंधित धान की प्रजातियां : कस्तूरी टाइप-3, पूसा बासमती-1, बासमती-370, हरियाणा बासमती-1, मालवीय सुगंध, नरेंद्र सुगंध, वल्लभ बासमती-22, तरावड़ी बासमती, पूसा बासमती-1509.

ऊसर के लिए उपयुक्त प्रजातियां : ऊसर धान-1, सीएसआर-10, नरेंद्र ऊसर धान-2, ऊसर धान-3, सीएसआर-30, सीएसआर-36, सीएसआर-43, नरेंद्र ऊसर धान 2008, नरेंद्र ऊसर धान-2009.

निचले और जलभराव क्षेत्रों के लिए : सवर्णा (एमटीयू 7029), एनडीआर 8002, जलमग्न, मधुकर, जलप्रिया, जललहरी, एनडीजीआर 201, बाढ़ अवरोधी, सवर्णा सब-1, नरेंद्र मयंक, नरेंद्र जल पुष्प, नरेंद्र नारायणी.