सूरन की खेती में समझदारी

सूरन यानी जिमीकंद की पहले गांवों में घूरे के आसपास, दालान या मकान के पीछे, बागबगीचों में थोड़ीबहुत बोआई की जाती थी, पर अब अच्छी उपज लेने के लिए वैज्ञानिक तरीका अपनाया जा रहा है.

सूरन की खेती लाभप्रद होती है. इस में औषधीय तत्त्व भी मौजूद होते हैं. इस का प्रयोग सब्जी और अचार के लिए ज्यादा होता है. सूरन की पकौड़ी भी खूब पसंद की जाती है.

सूरन की खेती में लाभ को देखते हुए किसान इस को उगाना पसंद कर रहे हैं. सही तरह से सूरन की खेती की जाए तो एक सीजन से एक बीघे में एक लाख रुपए तक कमाए जा सकते हैं. सब से अच्छी बात यह है कि सूरन की खेती में बहुत समय भी नहीं लगता. किसान चाहे तो उसी खेत में सहफसली कर के 3 फसलें भी उगा सकते हैं.

सूरन की खेती करने वाले किसानों का कहना है कि तमाम किसान इस की खेती बहुत बड़े पैमाने पर नहीं करते हैं. वे 1 या 2 बीघे में ही इस की खेती करते हैं और 1 लाख रुपए से ढाई लाख रुपए तक की बचत कर लेते हैं. किसानों के लिए अच्छी बात यह है कि इस की खेती में ज्यादा खर्च भी नहीं आता है.

वैसे, सूरन की खेती मुख्यत: पहाड़ी क्षेत्र में होती है, पर अब मैदानी क्षेत्र के किसान भी इस की खेती करने लगे हैं. किसानों के बीच काम करने वाला ‘पानी संस्थान’ किसानों को सूरन की खेती के लिए जागरूक कर रहा है.

सूरन की बोआई

सूरन की खेती करने वाले किसान गुरुदीन कहते हैं कि वे 2 साल से इस की खेती कर रहे हैं. एक बीघे में 5,000 रुपए से 8,000 रुपए तक खर्च आता है. इस की बिक्री कर 80,000 रुपए से ले कर 1 लाख रुपए तक की कमाई हो जाती है. अब इस के बेचने में कोई दिक्कत नहीं, क्योंकि हर सीजन में इस की सब्जी बनने लगी है. सब्जी के थोक व्यवसायी घर पर आ कर ही खरीद लेते हैं.

किसान बताते हैं कि इसे 30-40 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचा जाता है. सूरन को फरवरीमार्च महीने में खेत में बोया जाता है और सितंबरअक्तूबर महीने में इस की खुदाई कर ली जाती है.

खेत की जुताई ऐसी हो कि मिट्टी भुरभुरी हो जाए, 2-2 फुट पर नाली बना कर उस में कंपोस्ट खाद डालें. फिर 1-1 फुट की दूरी पर सूरन के टुकड़े गाड़ दें. इसे केवल 3 बार पानी चाहिए. जून महीने के बाद पानी की जरूरत नहीं होती.

सूरन का आकार बड़ा होने के लिए उचित देखभाल के साथसाथ समयसमय पर निराईगुड़ाई जरूर करें. 3 से 4 महीने में यह 3 से 4 किलोग्राम तक के वजन का हो जाता है.

सहफसली खेती लाभकारी

किसान चाहें तो इस के बीच के हिस्से में दूसरी सब्जी भी उगा सकते हैं. इस के खोदने के बाद आलू, चना, मटर आदि की खेती भी की जा सकती है. जरूरत इस बात की होती

है कि किसानों को परंपरागत तरीका छोड़ कर वैज्ञानिक विधि को अपनाना होगा. इस के महत्त्व को देखते हुए केंद्र और प्रदेश सरकार विभिन्न योजनाओं में शामिल कर खेती के लिए अनुदान दे कर प्रोत्साहित कर रही है.

सूरन की फसल गरम जलवायु में 25-35 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान के बीच होती है. आर्द्र जलवायु प्रारंभ में पत्तियों की वृद्धि में सहायक और कंद बनने की अवस्था में सूखी जलवायु उपयुक्त होती है. अच्छे बिखराव के साथ 1000-1500 मिलीमीटर वर्षा फसल वृद्धि व कंद उत्पादन में भी सहायक है.

सूरन की प्रमुख प्रजातियों में गजेंद्रा, संतरागाची, श्रीपद्मा, आजाद, श्रीआतिरा, एनडीए-9 आदि हैं. इन की उत्पादन क्षमता 40 टन से 100 टन प्रति हेक्टेयर है.

रोपण का समय

सूरन आमतौर पर 6 से 8 महीने में तैयार होने वाली फसल है. सिंचाई की सुविधा रहने पर इसे 15 मार्च से 15 मई के बीच लगाया जाता है. जहां पर पानी की सुविधा नहीं रहती, वहां जून के अंतिम सप्ताह में मानसून शुरू होने पर लगाया जाता है.

सूरन की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है. इस में उत्तम जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए. खेती योग्य भूमि तैयार करने के लिए 2 जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 3-4 जुताई देशी हल से अच्छी तरह कर के मिट्टी को भुरभुरा, मुलायम और समतल कर लेना चाहिए.

सूरन का उत्पादन लागत प्रति हेक्टेयर तकरीबन 3 लाख, 36 हजार रुपए है और आमदनी तकरीबन 12 लाख रुपए है.

शतावर खूबियों का खजाना

शतावर का पौधा 3-5 फुट ऊंचा होता है और यह लता के समान बढ़ता है. इस की शाखाएं पतली होती हैं. पत्तियां बारीक सूई के समान होती हैं, जो 1.0-2.5 सैंटीमीटर तक लंबी होती हैं. पुराने जमाने में गांव वाले इसे ‘नाहरकांटा’ नाम से पुकारते थे, क्योंकि इस की बेल की शाखाओं के हर पोर पर शेर के पंजे में मुडे़ हुए नाखून की तरह का कांटा रहता है.

शतावर लिलिएसी कुल का बहुवर्षीय पौधा है. इस का वानस्पतिक नाम एस्पेरेगस रैसीमोसस है. यह पौधा भारत के उष्ण व समशीतोष्ण राज्यों में 1200-1500 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है.

यह पौधा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ राज्यों में साल के मिश्रित वनों में पाया जाता है. बाजार की बढ़ती मांग की वजह से मध्य प्रदेश व उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में खासकर कुमाऊं इलाकों में इस की खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है.

Shatawarऔषधीय उपयोग : शतावर की जड़े मीठी और रस से भरी होती हैं. यह शीत वीर्य यानी ठंडक प्रदान करने वाली है. इस के अलावा कामोद्दीपक यानी सैक्स पावर बढ़ाने वाली होने के साथसाथ मेधाकारक यानी दिमाग को तेज करने वाली, जठराग्निवर्धक, पौष्टिकदायक यानी जल्दी पचने वाली है. अग्निदीपक, रुधिर विकार, गुल्म सूजन, स्निग्ध, आंखों के लिए फायदा पहुंचाने वाली, शुक्राणुवर्धक यानी शुक्राणु बढ़ाने वाली, दूध बढ़ाने वाली, बलकारक यानी मजबूती लाने वाली और अतिसार, वात, पित्तरक्त और शोध दूर करने वाली होती है.

सक्रिय घटक : इस की जड़ों में 1 व 4 शतावरिन कैमिकल पाया जाता है. शतावरिन 1 सार्सपोजिनिन का ग्लूकोसाइड होता है. इस के अलावा कंदीय जड़ों में म्यूसिलेज और काफी मात्रा में शर्करा पाई जाती है.

जमीन और जलवायु : शतावर की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी, जिस का पीएच मान 7-8 हो, अच्छी मानी गई है. साथ ही, जल निकास यानी पानी के निकलने का पुख्ता बंदोबस्त होना उचित रहता है. इस के लिए उष्ण व आर्द्र जलवायु बढि़या रहती है.

जिन इलाकों में तापमान 20-40 डिगरी सैंटीग्रेड रहता हो और तकरीबन सालाना बारिश 100-200 सैंटीमीटर तक होती है, खेती के लिए बहुत ही उत्तम होती है.

खेत की तैयारी : शतावर की खेती से पहले जमीन की हल द्वारा 2-3 बार अच्छी तरह जुताई कर लेनी चाहिए. उस के बाद 5 टन सड़ी हुई खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डाल कर खेत में फिर से जुताई कर देनी चाहिए.

प्रवर्धन : शतावर का प्रवर्धन बीजों द्वारा किया जाता है.

बोआई : शतावर की खेती के लिए बीजों द्वारा पौध तैयार की जाती है. नर्सरी के लिए 1×10 मीटर की क्यारियां बना कर बीजों की बोआई कर देनी चाहिए. बीजों को नर्सरी में बोेने से पहले जैविक तरीके से उपचारित कर लें, जिस से कवक, फफूंद वगैरह दूर हो जाएं.

बीजों की बोआई के लिए सब से बढि़या समय मईजून माह का होता है. इस तरह प्रति हेक्टेयर जमीन के लिए 15 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. तकरीबन 25 दिनों के बाद बीजों से अंकुरण हो जाता है.

अगस्त माह में जब पौधे की ऊंचाई तकरीबन 10-12 सैंटीमीटर की हो जाती है, तब पौधों को 60×60 सैंटीमीटर के अंतराल पर लगा देना चाहिए. कभीकभी जमीन के अंदर जड़ों से फिर से पौध तैयार हो जाती है, जिसे डिस्क कहते हैं. तकरीबन 20 दिनों में यह पौध भी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाती है. एक हेक्टेयर खेत के लिए तकरीबन 27,000 पौधों की जरूरत होती है.

 उर्वरक : शतावर प्रतिरोपण से पहले खेत में 25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस व 20 किलोग्राम पोटाश को 2 भागों में बांट कर के प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए. उक्त मिश्रण का आधा हिस्सा शुरू में अगस्त माह और बाकी बचा हिस्सा अगले से पहले अक्तूबरदिसंबर माह में डालना चाहिए.

सिंचाई : शतावर की फसल के लिए ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं होती है. शुरुआत के दिनों में प्रति सप्ताह और बाद में महीने में एक बार हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. ज्यादा सिंचाई से पौधे में पत्तियों की बढ़वार और हरापन तो बढ़ता ही है, परंतु जड़ों पर बुरा असर पड़ता है.

निराईगुड़ाई : शतावर की अच्छी पैदावार के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई करते रहना जरूरी है. महीने में एक बार हलकी निराईगुड़ाई कर के खेत से खरपतवार निकाल देने चाहिए.

Shatawarरोग, कीट और उन की रोकथाम :

शतावर की फसल पर वैसे तो रोगों व कीटों का हमला नहीं होता है. अगर ऐसा हो भी जाए, तो इस फसल पर कोई बुरा असर नहीं होता है.  फिर भी समयसमय पर कीटनाशकों का छिड़काव करते रहना चाहिए या फिर जड़ों को कवक से बचाने के लिए डाईथेन एम 45 का छिड़काव करना चाहिए.

दोहन व भंडारण : वैसे तो शतावर की फसल तकरीबन 18 से 20 महीने में तैयार हो जाती है. रोपण के अगले साल जब पौधा पीला पड़ने लगे, तो जड़ों की खुदाई कर लेनी चाहिए.

खुदाई के समय जड़ों में आर्द्रता 90 फीसदी रहती है. इसलिए जड़ों में चीरा लगा कर छिलका उतार देना चाहिए. उस के बाद जड़ों को धूप में सुखा कर बोरों में भर कर महफूज जगह पर रख देना चाहिए.

उत्पादन व उपज : शतावर की अच्छी फसल से तकरीबन 45-50 क्विंटल सूखी जडें़ प्रति हेक्टेयर हासिल होती हैं.

अतिरिक्त लाभ : 18 महीने की फसल से बीज की प्राप्ति नहीं होती. अगर बीज लेना हो तो कुछ पौधे छोड़ दें तो अगले साल से यानी 30 महीने बाद बीज प्रति पौधा 20-30 ग्राम हर साल प्राप्त होंगे.

जड़ों की खुदाई के समय आने वाली फसल के लिए डिस्क (जिस में जड़ के 1-2 ट्यूबर्स और तने का कुछ भाग शामिल होता है) को फिर से रोपित कर दें या नर्सरी की क्यारियों में सुरक्षित रख लें, जिस से आगामी बारिश के मौसम में रोपित कर सकें.

आलू की खेती और खास किस्म ‘कुफरी मोहन’

आलू की किस्म ‘कुफरी मोहन’ को केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला, हिमाचल प्रदेश ने ईजाद किया है, यह मध्यम अवधि वाली यानी 90 दिन में उगने वाली किस्म है. इस किस्म के कंद देखने में सफेद क्रीम रंग के, अंडाकार व एकरूपता लिए होते हैं.

यह किस्म पछेती अंगमारी यानी लेट ब्लाइट की प्रतिरोधी है. यह किस्म उत्तरी व पूर्वी मैदानों में उगाने के लिए सही पाई गई है. उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों में ‘कुफरी बहार’ और पूर्व मैदानी इलाकों में ‘कुफरी ज्योति’ की तुलना में यह किस्म ज्यादा उपज देती है. यह किस्म प्रति हेक्टेयर 40 क्विंटल तक उपज दे देती है.

ऐसी हो जलवायु

आलू के सफल उत्पादन के लिए ठंडी जलवायु की जरूरत होती है. आलू की ज्यादा पैदावार लेने के लिए कम तापमान की जरूरत होती है, क्योंकि 20 डिगरी सैल्सियस से ज्यादा तापमान पर कंदों का बनना रुक जाता है.

कम तापमान, मध्यम प्रकाश अवधि के दिनों और नाइट्रोजन की कमी वाली अवस्था में कंद की प्रक्रिया जल्दी शुरू हो जाती है. आलू की फसल पर पाले का बुरा असर पड़ता है.

चुनें सही जमीन

वैसे तो आलू को तमाम तरह की जमीनों में उगाया जा सकता है, पर इस की उच्च गुणवत्ता वाली ज्यादा पैदावार लेने के लिए सही जलनिकास वाली जीवांशयुक्त रेतीली दोमट जमीन अच्छी मानी गई है. जैसेजैसे जमीन के पीएच मान में बढ़ोतरी होती जाती है, वैसेवैसे ही पैदावार में कमी होती जाती है.

खेत की तैयारी

आलू के कंदों की बढ़वार जमीन के अंदर होती है इसलिए खेत की तैयारी का विशेष ध्यान देना होता है, जबकि ज्यादातर आलू उत्पादक इस ओर सही ध्यान नहीं देते हैं. इस के चलते उन्हें आलू की कम पैदावार मिलती है.

आलू के खेत की तैयारी बड़ी सावधानी से करनी चाहिए. पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें. उस के बाद दूसरीतीसरी जुताई हैरो या देशी हल से आरपार करें. आखिरी जुताई के बाद पाटा जरूर लगाएं ताकि मिट्टी भुरभुरी और समतल हो जाए और नमी बरकरार रहे.

मिट्टी का उपचार

एक हेक्टेयर खेत के लिए 25 किलोग्राम ऐश्वर्या जैविक खाद में 2.5 किलोग्राम प्रोटैक्टर (ट्राइकोडर्मा विरडी) मिला कर छाया में 2-3 दिन तक रखने के बाद मिट्टी में मिला कर जुताई कर दें. ऐसा करने पर आलू की पैदावार में बढ़ोतरी हो जाती है.

खाद और उर्वरक

आलू की भरपूर पैदावार लेने के लिए मिट्टी जांच बहुत ही जरूरी है, पर आलू उत्पादक इस ओर ध्यान नहीं देते हैं इसलिए मिट्टी जांच के बाद ही खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए.

अगर किसी कारणवश मिट्टी का उपचार न हो सके तो ऐसी हालत में कृषि विभाग द्वारा सिफारिश की गई मात्रा में खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए.

नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत की तैयारी के समय कूंड़ों में डालें. नाइट्रोजन की आधी बची मात्रा को बोआईर् के 25-30 दिन बाद डालें.

खेत की तैयारी के समय 15-20 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर की दर से डालनी चाहिए.

बोआई का सही समय

आलू की बोआई का सही समय उस की किस्म व जलवायु पर निर्भर करती है. उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों में आलू की मुख्य फसल की बोआई का सही समय सितंबर से नवंबर तक माना जाता है. लेकिन आलू की बोआई दिसंबर तक की जाती है.

बीज की मात्रा

आलू के कंदों की प्रति हेक्टेयर मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है जैसे कंदों का आकार, पंक्ति से पंक्ति की दूरी, पौधों की आपसी दूरी वगैरह.

आमतौर पर आलू की एक हेक्टेयर फसल बोने के लिए 15-20 क्विंटल कंद काफी हैं. आलू के कंदों का वजन 30-40 ग्राम होना चाहिए.

बीजोपचार

आलू की फसल को रोगों से बचाने के लिए कंदों को बोआई से पहले कार्बंडाजिम नामक दवा (1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) का घोल बना कर आधा घंटे तक डुबो कर रखें.

बीजोपचार के बाद कंदों को 3 फीसदी बोरिक एसिड (300 ग्राम प्रति 10 लिटर पानी) के घोल से उपचारित करें. एक बार बनाए गए घोल का 3 बार इस्तेमाल करें. इस के बाद दूसरा घोल बनाएं.

बीजोपचार के बाद कंदों को छाया में सुखा कर बोएं.

बोने की विधियां

भारत में आलू के कंदों को बोने के लिए कई विधियों का इस्तेमाल किया जाता है जो जमीन की किस्म, खेत में नमी, मजदूर और कृषि यंत्रों पर निर्भर करती है.

समतल जमीन में आलू बोना : इस विधि में खेत भलीभांति तैयार कर रस्सी की मदद से सीधी कतारें बना ली जाती हैं और आपसी दूरी 50-60 सैंटीमीटर रखी जाती है. कतारों में 15-20 सैंटीमीटर की दूरी पर कंद बो दिए जाते हैं. इन्हीं कतारों पर हैंड हो की मदद से उथले कूंड़ बना कर इन कूंड़ों में कंद बोने के बाद मिट्टी डाल कर खेत को समतल कर दिया जाता है.

मेंड़ों पर आलू के कंद बोना : खेत को तैयार करने के बाद 50-60 सैंटीमीटर की दूरी पर मेंड़ों को बनाया जाता है. उस के बाद 15-20 सैंटीमीटर की दूरी पर 4-5 सैंटीमीटर की गहराई पर कंद बो दिए जाते हैं.

आलू बोने के बाद मिट्टी चढ़ाना : इस विधि में 50-60 सैंटीमीटर की दूरी पर कतारें खींच ली जाती हैं. इस के बाद इन कतारों में 15-20 सैंटीमीटर की दूरी पर आलू के कंद रख दिए जाते हैं. इस के बाद फावड़े की मदद से इन कंदों को ढक दिया जाता है.

कृषि यंत्र से आलू की बोआई

इस के अलावा आजकल आलू बोआई में ट्रैक्टर चालित कृषि यंत्रों का भी इस्तेमाल होने लगा है, जो आलू की बोआई करने के साथसाथ मेड़ भी बनाते हैं, लेकिन ये कृषि यंत्र सभी किसानों की पहुंच में नहीं है. इसलिए खासकर छोटी जोत वाले किसान या तो किराए पर इन कृषि यंत्रों से काम करवाते हैं या पारंपरिक तरीके से आलू की बोआई करते हैं.

आलू बोने के लिए पूरे कंदों का ही इस्तेमाल करें , क्योंकि कटे हुए कंदों में फफूंदीजनित रोगों के लगने का डर रहता है. किसी कारणवश बोने के लिए बड़े कंदों का इस्तेमाल करना पड़े तो पौधे से पौधे की दूरी 30 सैंटीमीटर कर देनी चाहिए.

सिंचाई और जल निकास : आलू उत्पादन में सिंचाई एक महत्त्वपूर्ण काम है. इस ओर सही ध्यान देना जरूरी है.

* आलू के कंदों को हमेशा पलेवा कर के ही बोएं.

* पहली सिंचाई आलू के कंद बोने के 25 दिन बाद करनी चाहिए.

* अगर जमीन में नमी की कमी हो तो सिंचाई पहले भी की जा सकती है.

* पहली सिंचाई हलकी करनी चाहिए और बाद की सिंचाइयां गहरी करनी चाहिए, पर इस बात का ध्यान रखें कि मेंड़ें पूरी तरह से न डूबें.

* 15-20 दिन के बाद फिर सिंचाई करनी चाहिए.

* हलकी जमीन में 6-10 और भारी जमीन में 3-4 सिंचाइयों की जरूरत होती है.

* अगर किसी कारणवश आलू के खेत में पानी जमा हो जाए तो उसे निकालने का इंतजाम करें वरना फसल पीली पड़ कर खराब हो जाती है.

पौध संरक्षण उपाय

खरपतवार नियंत्रण : आलू की फसल के साथ तमाम तरह के खरपतवार उग आते हैं जो फसल के साथ पोषक तत्त्वों, नमी, धूप, स्थान वगैरह के लिए होड़ करते हैं. इस के अलावा कीड़ों व रोगों के लगने की आशंका भी बनी रहती है. इस के चलते फसल के विकास, बढ़ोतरी और उत्पादन पर उलटा असर पड़ता है.

आलू के खरपतवारों के नियंत्रण के लिए निराईगुड़ाई की जाती है, जबकि उन के जल्दी नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है.

 

माहू : यह कीट हरे या काले रंग का होता है जो 2 मिलीमीटर लंबा होता है. यह कीट पत्तियों और शाखाओं को चूसता है. इस कीट का ज्यादा प्रकोप होने पर पत्तियां नीचे की ओर मुड़ जाती हैं. इस के पंखदार कीट विषाणु रोग फैलाने में सहायक होते हैं.

इस कीट के नियंत्रण के लिए फोरेट 10जी नामक दवा प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई करते समय कूंड़ों में डालें.

हरा तेला : इस कीट के निम्फ और प्रौढ़ दोनों ही पौधों के कोमल अंगों का रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं. इस वजह से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं. इस कीट का अधिक प्रकोप होने पर पत्तियों के किनारे जल जाते हैं.

इस कीट के नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटाफास का 0.3 फीसदी घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

एपीलेकना कीट : यह कीट सफेद या सलेटी रंग का होता है. इस का शरीर मुड़ा हुआ व सिर भूरे रंग का होता है. यह कीट जमीन के अंदर रहता है जो पौधों की जड़ों को खाता है.

इस के अलावा यह कीट आलू के कंदों में उथले गोलाकार छेद बना देता है जिस के चलते कंदों के बाजार भाव पर बुरा असर पड़ता है.

इस कीट के नियंत्रण के लिए खेत की तैयारी के समय 30 किलोग्राम कार्बोफ्यूरान प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला देना चाहिए.

रोग नियंत्रण

अगेता झुलसा : यह रोग आल्टरनेरिया सोलेनाई नामक फफूंदी की वजह से होता है. नीचे की पत्तियां सब से पहले रोग का शिकार होती हैं. वहां से यह रोग ऊपर की ओर बढ़ता है. इस के चलते पत्तियों पर जहांतहां छोटेछोटे धब्बे उभर आते हैं जो बाद में भूरे या काले रंग के हो जाते हैं. नीचे की पत्तियां सूख कर गिरने लगती हैं. यह रोग कंद बनने से पहले लगता है.

इस रोग के नियंत्रण के लिए ‘डायथेन जैड 78’ 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से पत्तों पर छिड़काव करना चाहिए. यदि जरूरत हो तो 15 दिन के बाद दोबारा छिड़काव करना चाहिए.

शुष्क विगलन : यह रोग फ्यूजेरियम केरूलियम नामक फफूंदी के चलते फैलता है. यह रोग भंडारण के समय होता है. रोग की शुरुआती अवस्था में कंदों पर छोटेछोटे भूरे रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं, जो बाद में बढ़ कर चिपके दिखाई देते हैं. छिलका सिकुड़ जाता है.

अगर कंदों को बीज के लिए इस्तेमाल में लाना हो तो उन्हें ऐगालोल 3 (0.3 फीसदी) घोल से 10 मिनट तक उपचारित कर के बोएं.

भूरा विगलन : यह रोग स्यूडोमोनास सोलानेसियम नामक फफूंदी द्वारा फैलता है. नतीजतन, सारा पौधा मुरझा कर गिर जाता है. कंद काटने पर भूरे दिखाई देते हैं.

रोगरहित कंदों को बोने से इस रोग से छुटकारा पाया जा सकता है.

सामान्य स्कैब : यह रोग स्टेप्टोमाइसिन स्कैबीज नामक जीवाणु की वजह से फैलता है. इस रोग के कारण कंदों पर 3 मिलीमीटर गहरे और 1 सैंटीमीटर से कम व्यास के धब्बे दिखाई पड़ते हैं.

बोआई से पहले कंदों को 3 फीसदी बोरिक एसिड से आधा घंटे तक उपचारित करना चाहिए. लंबा फसल चक्र अपनाएं. बोआई के लिए सेहतमंद कंदों का इस्तेमाल करना चाहिए.

Alooकब करें खुदाई

जब आलू के पौधे की पत्तियां सूखने लगें तब उन की खुदाई करने के 2 हफ्ते पहले पौधों की शाखाओं को सतह से काट देना चाहिए. इस तकनीक को अपनाने से कंदों की त्वचा कठोर हो जाती है और खुदाई के समय कंदों की त्वचा उतरने की आशंका नहीं रहती है.

फसल तैयार होने पर आलू की खुदाई खुरपी, फावड़ा या पोटैटो डिगर से की जाती है.

रतालू देता है अधिक आमदनी

आम किसानों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने और आमदनी बढ़ाने के लिए परंपरागत खेती को छोड़ कर उन्नत खेती की तरफ ध्यान देना होगा. सरकार और कृषि विभाग इस के लिए आप को समयसमय पर जानकारी उपलब्ध कराते रहते हैं.

धौलपुर जिले के सरमथुरा क्षेत्र के बड़ागांव निवासी किसान जगदीश ने कृषि विभाग से प्रेरित हो कर कुछ ऐसा ही नया करने का फैसला किया और रतालू की खेती करना प्रारंभ किया. इस की खेती से प्रति बीघा 3 से 4 लाख रुपए तक आमदनी किसान को हो जाती है, जिस में 70 हजार से 1 लाख रुपए तक का खर्चा हो जाता है. शुद्ध लाभ लगभग ढाई लाख से 3 लाख रुपए प्रति बीघा मिल जाता है.

जगदीश ने बताया कि वो आने वाले दिनों में इस की खेती और बड़े स्तर पर करेंगे.

सहायक कृषि अधिकारी पिंटू लाल मीणा ने फील्ड का भ्रमण कर रोग, कीट और व्याधियों के नियंत्रण सहित अधिक उत्पादन लेने के लिए जरूरी सलाह दी. साथ ही, दूसरे किसान, जो रतालू की खेती करना चाहते हैं, उन को इस के बारे में पूरी जानकारी मुहैया करवाई, जो इस प्रकार है:

भूमि और जलवायु

यह उष्ण जलवायु की फसल है. उपजाऊ दोमट भूमि, जिस में पानी नहीं भरता हो, इस की खेती के लिए उपयुक्त रहती है. क्षारीय भूमि इस के लिए उपयुक्त नहीं है.

उपयुक्त किस्में

रंग के आधार पर इस की 2 फसलें प्रचलित हैं, सफेद और लाल.

खेत की तैयारी और बोआई

खेत की गहरी जुताई कर के क्यारियों में 50 सैंटीमीटर की दूरी पर डोलियां बना लेनी चाहिए. इन डोलियों पर 30 सैंटीमीटर की दूरी पर रतालू की बोआई करें. 50 ग्राम तक के टुकड़े 0.2 फीसदी मैंकोजेब के घोल में 5 मिनट तक उपचारित कर के बोआई के काम में लिए जाते हैं. प्रति हेक्टेयर 20 से 30 क्विंटल बीज की जरूरत होती है. रतालू के ऊपरी भाग के टुकड़े सब से अच्छी उपज देते हैं. इसे अप्रैल से जून माह तक बोया जाता है.

खाद व उर्वरक

खेत तैयार करते समय प्रति हेक्टेयर 200 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 100 किलोग्राम पोटाश डोलियां बनाने से पहले जमीन में दें.

इस के अलावा 50 किलोग्राम नाइट्रोजन 2 समान भागों में कर के फसल लगाने के 2 व 3 महीने बाद पौधे के चारों ओर डाल दें.

सिंचाई व निराईगुड़ाई

पहली सिंचाई बोआई के तुरंत बाद करें. फसल को कुल 15 से 25 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है. डोलियों पर गुड़ाई कर के मिट्टी चढ़ानी चाहिए. आवश्यकतानुसार निराई भी करते रहें.

खुदाई और उपज

फसल 8 से 9 महीने में तैयार हो जाती है. रतालू के प्रत्येक पौधे को खोद कर निकाला जाता है.

उपज 250 क्विंटल से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है.

खरीफ (वर्षा ऋतु) में  प्याज की खेती

आमतौर पर प्याज की खेती रबी मौसम में की जाती है, पर खरीफ में भी प्याज का अच्छा उत्पादन किया जा सकता है, बशर्ते उचित प्रबंधन और खरीफ मौसम में उगाने वाली प्रजातियों का चयन सही तरीके से किया जाए

भूमि व खेत की तैयारी

प्याज की खेती बलुई दोमट भूमि व दोमट भूमि में की जाती है, जिस में कार्बनिक पदार्थों की पर्याप्त मात्रा हो. भूमि के चयन के साथसाथ खेत का चयन भी महत्त्वपूर्ण है.

प्याज की खेती ऐसे खेतों में ही की जाए, जिन में जल निकास की उचित सुविधा हो और वर्षा का पानी खेत में जमा न होने पाए.

भूमि की गहरी जुताई के बाद रोपाई करने के लिए 2-3 जताई कल्टीवेटर से कर के भुरभुरा बना लेना चाहिए.

खरीफ में उगाने वाली प्रजातियां

एग्रीफाउंड डार्क रैड : यह किस्म रोपाई के 90 से 110 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. इस की औसत उपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है.

एन-53 : यह किस्म रोपाई के 110 से 120 दिन में तैयार होती है और 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन देती है.

अर्का निकेतन : यह किस्म 120 से 125 दिन बाद तैयार हो जाती है और तकरीबन 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार देती है.

अर्का कल्याण : यह रोपाई के 110 से 115 दिनों में तैयार होती है और 325 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार देती है.

पौध तैयार करने का समय व विधि

उक्त प्रजाति का चयन कर जुलाई के पहले हफ्ते तक नर्सरी की बोआई कर दें. देरी से बोआई करने पर उत्पादन प्रभावित होता है.

नर्सरी के लिए उपजाऊ, उपयुक्त जल निकास व सिंचाई की सुविधायुक्त भूमि का चयन करना चाहिए.

लगभग 3 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की पौध तैयार करने की जरूरत होती है. 3 मीटर लंबी और 1 मीटर चौड़ी व 15 सैंटीमीटर ऊंची नर्सरी बैड में 30 ग्राम बीज की बोआई करने से स्वस्थ पौध तैयार होती है. खरीफ  प्याज की नर्सरी बीज बोने से 45 से 50 दिन में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है.

खाद व उर्वरक

प्रति एकड़ क्षेत्रफल के लिए 100 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयारी के समय मिला देनी चाहिए. इस के अलावा 40 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 किलोग्राम फास्फोरस एवं 25 किलोग्राम पोटाश के साथ 10 किलोग्राम सल्फर बेंटोनाइट का प्रयोग करने से प्याज के बिल्व अच्छे आकार के बनते हैं.

नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा रोपाई से पहले और बाकी बची मात्रा को 2 बराबर भागों में बांट कर रोपाई के 30 और 45 दिन बाद टौप ड्रैसिंग के समय देनी चाहिए.

रोपण की दूरी

तैयार पौध की रोपाई लाइन से लाइन 15 सैंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 10 सैंटीमीटर पर करने से प्याज के बिल्वों का विकास अच्छा होता है.

खरपतवार पर नियंत्रण

खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए निकाईगुड़ाई सब से अच्छी विधा है. इस से भूमि में पोलापन आता है, जिस से प्याज के बिल्व बड़े आकार में बनते हैं.

खरपतवारनाशी के रूप में रोपाई के 2 से 3 दिन बाद तक पेंडीमैथलीन 3.3 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी या औक्सीफ्लोरफेन 250 मिलीलिटर मात्रा 200 लिटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ छिड़काव करने से खरपतवारों पर नियंत्रण होता है.

आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, बेलीपार, गोरखपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. एसपी सिंह के अनुसार, खरीफ (वर्षा) ऋतु में प्याज की खेती करने से अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है, क्योंकि खरीफ में प्याज की रोपाई अगस्त महीने में करते हैं, तो यह नवंबरदिसंबर महीने में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है.

अदरक की वैज्ञानिक विधि से खेती

इम्यूनिटी बूस्टर के रूप में जिन सब्जियों का अधिक उपयोग हो सकता है, उन की बाजार में लगातार मांग बढ़ती जा रही है. इन्हीं में से एक अदरक है, जिस की बाजार में अच्छी कीमत मिलती है .

कैसी हो मिट्टी

अदरक की खेती शुरू करने के लिए अच्छी मिट्टी का चुनाव करना चाहिए. इस के लिए जल निकास वाली भुरभुरी दोमट मिट्टी अच्छी रहती है, जिस में अधिक उत्पादन प्राप्त होता है.

उन्नत प्रजातियां

सुप्रभा, सुरुचि, सुरभि, वरद, हिमगिरी, बरुआसागर आदि अच्छी प्रजातियां हैं.

कितनी रखें बीज की मात्रा

14 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है. बीज हमेशा स्वस्थ हों और हर कंद में कम से कम 2 से 4 आंखें हों. उसे ही बोआई के लिए उपयोग करना चाहिए.

बोआई का समय

मईजून में सिंचित व असिंचित दोनों क्षेत्रों में इस की खेती शुरू की जा सकती है.

कैसे बोएं बीज

अदरक की खेती करने के लिए कतार की दूरी 25 से 30 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. इस से खेत में पौधों की संख्या अधिक होगी और उत्पादन अच्छा प्राप्त होगा.

खेत में करें मल्चिंग

बोआई के बाद सूखी पत्तियों वाली या खरपतवार से नालियों को ढकें. इस से जमाव अच्छा होगा.

कब चढ़ाएं मिट्टी

बीज बोआई के 3 या 4 महीने बाद पहली बार मिट्टी चढ़ानी चाहिए. इस के बाद कंद को ढकने के लिए 1 या 2 बार मिट्टी चढ़ाना जरूरी होता है.

पौध रक्षा कैसे करें

कीट शूट बोरर, जिस को प्ररोह बेधक भी कहा जाता है, के छेद कर काटने से पौधे सूख जाते हैं. इस के उपचार के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी 1.2 लिटर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करना चाहिए.

खाद व उर्वरक कितना दें

अदरक की खेती में खाद और उर्वरक की मात्रा को संतुलित रूप से देना चाहिए. गोबर की खाद 300 क्विंटल, नाइट्रोजन 75 किलोग्राम 3 बार में बोआई के समय देना चाहिए, उस के बाद 45-45 दिनों में इस को डाल देना चाहिए. फास्फोरस 75 किलोग्राम बोआई करते समय खेत में मिला देना चाहिए.

पत्तियों का पीला होना और यह पीलापन बढ़ कर कंद तक धीरेधीरे पहुंच जाता है. साथ ही, पत्तियां सूख जाती हैं. इस वजह से कंद सड़ने लगता है. इस के उपचार के लिए डिटेन एम-40 पौइंट 3 फीसदी गोल में 30 मिनट तक बीज को दबा कर रखें. उस के बाद इस को बोआई के लिए इस्तेमाल करें तो इस रोग से फसल को बचाया जा सकता है.

बोआई के 6 से 8 महीने बाद जब पौधे पीले पड़ कर सूखने लगें तो खुदाई कर सकते हैं. उत्पादन 125 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होता है. खुदाई करने के बाद अदरक को छायादार जगह पर 2-3 दिन के लिए सुखाने के लिए रख देना चाहिए और उस के बाद भंडारण की व्यवस्था करें.

इस के भंडारण के लिए छायादार जगह पर 5×5 फुट गहराई व चौड़ाई का गड्ढा खोद कर नीचे धान की भूसी या रेत बिछा कर अदरक को शंक्वाकार में जमा कर रखना चाहिए और ऊपर हवा के लिए जालीदार ढक्कन बना कर रखना चाहिए.

समयसमय पर निगरानी भी करते रहना चाहिए. ध्यान रखें कि बारिश होने पर गड्ढे के अंदर पानी न जाए. यदि पानी चला गया तो अदरक सड़ जाएगा.

अच्छा अदरक काफी तीखा, गरम, शक्तिवर्धक, वातनाशक व कृमिनाशक होता है. उत्तम किस्म के अदरक के कमरे से और पंजे के आकार जिस में 75 से 100 ग्राम तक वजन और 8 से 10 गांठें होनी चाहिए.

इस प्रकार के अदरक को काफी अच्छा माना जाता है और बाजार में उस की कीमत भी अच्छी मिलती है, इसलिए किसानों को अदरक की खेती शुरू करनी चाहिए, जिस से उन की आमदनी में बढ़ोतरी होगी और इस को आसानी से बाजार में बेचा भी जा सकेगा.

अरबी और बंडा की खेती

अरबी और बंडा की सब्जी खाने में लजीज तो होती ही है, पोषक तत्त्वों से भी भरपूर होती है. इन की फसल अच्छी लेनी हो तो, इस के लिए किसानों को इस में लगने वाले कीटों और रोगों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि उन का समय रहते इलाज हो सके. अरवी में लगने वाले खास कीट और रोग :

सूंड़ी कीट

इस के प्रोन पतले और भूरे रंग के तकरीबन 16 मिलीमीटर से 18 मिलीमीटर लंबे होते हैं. इस का ऊपरी पंख कत्थई रंग का होता है, जिस पर सफेद लहरदार धारियां पाई जाती हैं. पिछले पंख सफेद रंग के होते हैं.

पूरी तरह विकसित सूंड़ी का शरीर कोमल व पीलापन लिए हुए हरा व भूरा होता है. इस के शरीर पर कहींकहीं रोएं होते हैं.

पीठ पर दोनों ओर 1-1 पीली धारी होती है और एक पीली धारी शरीर के निचले भाग में दोनों तरफ होती है. दाएं, बाएं और धारी के ऊपर एक काला नवचंद्रक होता है. सूंड़ी के सिर व टांगों का रंग काला होता है. जुलाई और अगस्त माह में इस कीट का प्रकोप अधिक होता है.  इस की सूंड़ी पत्तियों को खा कर हानि पहुंचाती हैं.

प्रबंधन : कीटग्रस्त खेत के चारों तरफ नालियां खोद कर विषयुक्त पानी भर देना चाहिए.

यदि खेत में कीट नहीं आया है तो नीम तेल 1,500 पीपीएम की 50 मिलीलिटर दवा और एक पाउच शैंपू प्रति 15 लिटर पानी में घोल बना कर 15-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करते रहें.

यदि खेत में कीट आ गया है, तो प्रोफेनोफास 25 ईसी की 25 मिलीलिटर दवा और एक पाउच शैंपू प्रति 15 लिटर पानी में घोल बना कर तुरंत छिड़काव करें.

झुलसा रोग

बारिश शुरू होते ही पत्तियों पर भूरे धब्बे पड़ जाते हैं. पत्तियां और डंठल गलने लगते हैं.

प्रबंधन : इस रोग के प्रबंधन के लिए 2.0 ग्राम कार्बंडाजिम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से बीज शोधन कर के ही बोएं.

यदि रोग फसल पर आ गया है तो मैंकोजेब एम-45 की 45 ग्राम दवा और एक पाउच शैंपू प्रति 15 लिटर पानी में घोल बना कर तुरंत छिड़काव करें.

फाइटोप्थोरा झुलसा रोग

यह प्रमुख रोग है. इस में पत्तियों पर भूरे रंग के जलीय धब्बे बनते हैं, जो पत्तियों को ?ालसा देते हैं. कभीकभी पत्तियां किनारे की तरफ से भी ?ालसने लगती हैं. इस रोग से कंद भी प्रभावित होते हैं. वातावरण में नमी होने पर यह रोग उग्र रूप धारण कर लेता है.

प्रबंधन : इस रोग के लक्षण दिखते ही या आसमान में बदली होने पर तुरंत रिडोमिल एमजेड 78 की 30 ग्राम दवा और एक पाउच शैंपू प्रति 15 लिटर पानी में घोल बना कर तुरंत छिड़काव करें.

लहसुन की खेती में कीटरोग रोकथाम

लहसुन की खेती में कीट व रोगों की रोकथाम कर अच्छा मुनाफा लिया जा सकता है. लहसुन जड़ वाली फसल है, इसलिए खासकर ध्यान रखें कि हमारे खेत की मिट्टी रोगरहित हो. अगर फिर भी पौधों में कीट व रोगों का प्रकोप दिखाई दे, तो समय रहते उन का उपचार करें.

लहसुन के खास कीट

माहू : इस के निम्फ और वयस्क दोनों ही पौधों से रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां किनारों से मुड़ जाती हैं. कीट की पंख वाली जाति लहसुन में वाइरसजनित रोग भी फैलाती है. ये चिपचिपा मधुरस पदार्थ अपने शरीर के बाहर निकालते हैं, जिस से पत्तियों के ऊपर काली फफूंद पनपती देखी जा सकती है, जिस से पौधों के भोजन बनाने की क्रिया पर असर पड़ता है.

रोकथाम : माहू का प्रकोप होने पर पीले चिपचिपे ट्रैप का इस्तेमाल करें, जिस से माहू ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं. परभक्षी कौक्सीनेलिड्स या सिरफिड या क्राइसोपरला कार्निया को एकत्र कर 50,000-1,00,000 अंडे या सूंड़ी प्रति हेक्टेयर की दर से छोडे़ं. जरूरतानुसार डाईमिथोएट 30 ईसी या मैटासिस्टौक्स 25 ईसी 1.25-2.0 मिलीलिटर प्रति लिटर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

लहसुन का मैगट : मैगट पौधे के तने व शल्क कंद में घुस कर नुकसान पहुंचाते हैं. बड़े शल्क कंदों में 8 से 10 मैगट एकसाथ घुस कर उसे खोखला बना देते हैं.

रोकथाम: शुरुआत में रोगी खेत पर काटाप हाइड्रोक्लोराइड 4जी की 10 किलोग्राम मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में बिखेर कर सिंचाई कर दें. बढ़ते हुए पौधों पर मिथोमिल 40 एसपी की 1.0 किलोग्राम या ट्राईजोफास 40 ईसी की 750 मिलीलिटर मात्रा को 500-600 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने पर नए निकले हुए मैगट मर जाते हैं.

थ्रिप्स : इस कीट का हमला तापमान के बढ़ने के साथसाथ होता है व  मार्च महीने में इस का हमला ज्यादा दिखाई देता है. यह कीट पत्तियों से रस चूसता है, जिस से पत्तियां कमजोर हो जाती हैं और रोगी जगह पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं, जिस के कारण पत्तियां मुड़ जाती हैं.

रोकथाम : लहसुन की कीट रोधी प्रजातियां उगानी चाहिए. कीट के ज्यादा प्रकोप की दशा में 150 मिलीलिटर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल को 500-600 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

Garlicमाइट्स : इस कीट के प्रकोप से पत्ती का असर वाला भाग पीला हो जाता है और पत्तियां मुड़ी हुई निकलती हैं. वयस्क और शिशु कीट दोनों ही नई पत्तियों का रस चूस कर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं.

रोग के शुरू में सब से पहले पौधों की निचली पत्तियां तैलीय हो जाती हैं और बाद में पूरा पौधा तैलीय हो जाता है. रोगी पत्तियां छोटी हो जाती हैं और चमड़े की तरह दिखाई देती हैं. पत्तियां निचली तरफ से तांबे जैसी रंगत की दिखाई देती हैं. माइट का ज्यादा हमला होने से रोगी पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं और पूरा पौधा मुरझा कर सूख जाता है.

रोकथाम : रोगी पौधों के कंद व जड़ सहित उखाड़ कर नष्ट कर दें. घुलनशील गंधक 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या कैराथीन 500 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करें. मैटासिस्टौक्स छिड़कने से भी फायदा होता है.

लहसुन के रोग

विगलन : इस रोग का असर कंदों पर खेतों में या भंडारगृह दोनों में हो सकता है. खेत में रोगी पौधा पीला हो जाता है और जड़ें सड़ने लगती हैं.

कभीकभी रोग के लक्षण बाहर से नहीं दिखाई पड़ते हैं, लेकिन लहसुन की गर्दन के पास दबाने से कुछ शल्क मुलायम जान पड़ते हैं. बाद में ये शल्क भूरे रंग के हो जाते हैं. सूखे मौसम में शल्क धीरेधीरे सूख कर सिकुड़ जाते हैं, जिस की वजह से छिलका फट कर अलग हो जाता है.

रोकथाम : खेत को ट्राईकोडर्मा नामक जैव फफूंद की 2.5 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए. गरमी के महीनों में खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खुला छोड़ दें, जिस से कि कवक व अन्य रोग जनकों की मौत हो जाए. कंदों को बोआई से पहले 2.0 ग्राम कार्बंडाजिम का प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर उपचारित करें.

बैगनी धब्बा : इस रोग से लहसुन को काफी नुकसान होता है. इस रोग के लक्षण पत्तियों, कंदों पर उत्पन्न होते हैं, शुरू में छोटे धंसे हुए धब्बे बनते हैं, जो बाद में बड़े हो जाते हैं. धब्बे के बीच का भाग बैगनी रंग का हो जाता है. यदि आप उसे हाथों से छुएं तो काले रंग का चूर्ण हाथ में चिपका हुआ दिखाई देता है. रोगी पत्तियां झुलस कर गिर जाती हैं. रोगी पौधों से प्राप्त कंद सड़ने लगते हैं.

रोकथाम : 2-3 साल का सही फसल चक्र अपनाएं. रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैंकोजेब की 2.0 ग्राम मात्रा प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर 2 बार छिड़काव करें.

सफेद सड़न : इस बीमारी से कलियां सड़ने लगती हैं.

रोकथाम : जमीन को ट्राईकोडर्मा नामक जैव फफूंद की 2.5 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए. गरमी के महीनों में खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खुला छोड़ दें जिस से कि कवक व अन्य रोग जनकों की मौत हो जाए. कंदों को बोआई के पहले 2.0 ग्राम कार्बंडाजिम का प्रति लिटर पानी की दर से घोल बना कर उपचारित करें.

कंद सड़न : इस बीमारी का हमला भंडारण में होता है.

रोकथाम : इस की रोकथाम के लिए कंद को 2 फीसदी बोरिक अम्ल से उपचारित कर के भंडारण करना चाहिए. बीज के लिए यदि कंद को रखना हो तो 0.1 फीसदी मरक्यूरिक क्लोराइड से उपचारित कर के रखें. खड़ी फसल में मैंकोजेब की 2.0 ग्राम मात्रा का प्रति लिटर पानी की दर से छिड़काव करें.

फुटान : नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल से यह बीमारी फैलती है. इस के अलावा ज्यादा पानी या ज्यादा दूरी पर रोपाई की वजह से फुटान ज्यादा होता है. इस बीमारी से लहसुन कच्ची दशा में कई छोटेछोटे फुटान देता है, जिस से कलियों का भोजन पदार्थ वानस्पतिक बढ़वार में इस्तेमाल होता है.

रोकथाम : लहसुन की रोपाई कम दूरी पर करें और नाइट्रोजन व सिंचाई का इस्तेमाल ज्यादा न करें. ऐसे रोगी पौधों को देखते ही पौलीथिन की थैली से ढक कर सावधानीपूर्वक उखाड़ कर मिट्टी में दबा दें.

बीजों को बोने से पहले वीटावैक्स 2.5 ग्राम या टेबूकोनाजोल 1.0 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम की दर से उपारित करें.

अदरक की खेती

आमतौर पर अदरक की खेती  सभी प्रकार की जमीन में  की जा सकती है. लेकिन उचित जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी, जिस में जीवांश की अच्छी मात्रा हो, अदरक की खेती के लिए उपयुक्त होती है. इस की अच्छी पैदावार के लिए जमीन का पीएच मान 5.0 से 6.0 के बीच होना चाहिए.

खेत की तैयारी

खेती योग्य भूमि तैयार करने के लिए 1-2 जुताई मिट्टी पलटने और 2-3 जुताई देशी हल से करनी चाहिए. मिट्टी को अच्छी तरह से समतल व भुरभुरा कर लेना चाहिए.

प्रमुख प्रजाति

सुप्रभा, सुरभि, रजाता, हिमगिरि, महिमा आदि खास प्रजाति हैं. इस के अलावा किसान लोकल प्रजाति का भी चयन खेती हेतु प्रयोग करते हैं.

बोआई का समय

अदरक की बोआई का सब से उचित समय 20 अप्रैल से 25 मई तक अच्छा माना जाता है.

बोआई के पहले डाईथेन एम 45 के 0.30 फीसदी के घोल से इस के कंदों को अच्छी तरह से उपचारित कर लेना चाहिए और छाया में सुखा लेना चाहिए.

बीज की मात्रा

अदरक की बोआई के लिए कंदों के आकार के अनुसार 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है.

बोने की नाली विधि

इस विधि का प्रयोग सभी प्रकार की जमीनों में की जा सकती है. पहले से तैयार खेत में 60 या 40 सैंटीमीटर की दूरी पर मेंड़ या नाली को हल या फावड़े से तैयार किया जाता है और बीजों को 5 से 6 सैंटीमीटर की गहराई में बोया जाता है व ऊपर से मिट्टी चढ़ा दी जाती है.

तैयार पैदावार

अदरक की फसल की अच्छी तरह सिंचाईं, निराई और देखभाल समयसमय पर की जाए, तो 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार मिलती है.

शकरकंद की वैज्ञानिक और उन्नत खेती

स्टार्च की मात्रा से भरपूर

शकरकंद ज्यादातर शरीर में ऊर्जा बढ़ाने के लिए उपयोग में लाई जाती है. इसलिए इसे व्रत व भूख मिटाने के लिए सब से उपयोगी माना जाता है.

शकरकंद की खेती वैसे तो पूरे भारत में की जाती है, लेकिन ओडिसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में इस की खेती सब से अधिक होती है. शकरकंद की खेती में भारत विश्व में 6वें स्थान पर आता है. इस की खेती के लिए 21 से 26 डिगरी तापमान सब से उपयुक्त माना जाता है.

यह शीतोष्ण व समशीतोष्ण जलवायु में उगाई जाने वाली फसल है. इस की खेती के लिए 75 से 150 सैंटीमीटर वर्षा प्रतिवर्ष की आवश्यकता पड़ती है.

भूमि का चयन : शकरकंद की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सब से उपयुक्त होती है, क्योंकि ऐसी मिट्टी में कंद की बढ़वार अच्छे से हो पाती है. पानी के निकलने का पुख्ता बंदोबस्त होना चाहिए. इस की बोआई के पहले खेत को एक बार मिट्टी पलटने वाले या हैरो से जुताई करनी चाहिए. उस के बाद 2 जुताई कल्टीवेटर से कर के खेत को छोटीछोटी सममतल क्यारियों में बांट लेना चाहिए. मिट्टी को भुरभुरी बना कर उस में प्रति हेक्टेयर 150 से 200 क्विंटल गोबर की खाद मिला लेना फसल उत्पादन के लिए अच्छा होता है.

प्रजातियों का चयन : शकरकंद की 2 तरह की प्रजातियां पाई जाती हैं, जिस में कुछ लाल व कुछ सफेद रंग की होती हैं. लाल प्रजाति की मांग बाजार में ज्यादा है, इसलिए इस का रेट भी किसानों को अच्छा मिलता है.

शकरकंद की प्रमुख प्रजातियों में पूसा लाल, पूसा सुनहरी, पूसा सफेद, सफेद सुनहरी लाल, नरेंद्र-9, एच-41, केवी- 4, सीओआईपी-1, राजेश-92, व एच 42 प्रमुख हैं.

शकरकंद की रोपाई : रोपाई के पहले मईजून माह में इस की लताओं से नर्सरी तैयार की जाती है और अगस्त से सितंबर माह तक तैयार लता की कटिंग कर के मेंड़ों या समतल जगह पर रोपाई की जाती है. इस के कटिंग की रोपाई के लिए लाइन से लाइन की दूरी 60 सैंटीमीटर व पौध से पौध की दूरी 30 सैंटीमीटर रखी जाती है. जमीन में इस के लता की कटिंग को 6-8 सैंटीमीटर की गहराई पर रोपा जाता है.

रोपाई के समय यह ध्यान देना चाहिए कि बेल की कटिंग 60-90 सैंटीमीटर से कम न हो. काटी गई बेल को मिट्टी में दबा दिया जाता है. एक हेक्टेयर खेत के लिए शकरकंद के 6.7 क्विंटल बेल या 59,000 टुकडों की आवश्यकता पड़ती है.

खाद की मात्रा : इस फसल की खेती के लिए एक हेक्टेयर खेत में 150 से 200 क्विटंल गोबर की सडी खाद व 50-60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस और 100-120 किलोग्राम पोटाश की जरूरत पड़ती है.

गोबर की खाद की पूरी मात्रा बोआई के पहले खेत में मिला दी जाती है, जबकि नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की आधी मात्रा आखिरी जुताई के समय व बाकी बची आधी मात्रा बोआई के 30 दिन बाद देते हैं. इस के कंद के विकास के लिए जैविक खाद ज्यादा उपयुक्त होती है.

सिंचाई : शकरकंद के बेलों की कटिंग के रोपाई के 4-5 दिन बाद पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद वर्षा को देखते हुए 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए. शकरकंद के खेत की तब तक निराईगुड़ाई जरूरी है, जब तक इस की फसल खेत को ढक न ले.

कीट व बीमारियों की रोकथाम : कृषि विज्ञान केंद्र में वैज्ञानिक डा. प्रेमशंकर के मुताबिक, शकरकंद की फसल में सब से ज्यादा प्रकोप पत्ती खाने वाली सुंडी का होता है. यह कीट वर्षा ऋतु में फसल को हानि पहुंचाता है. शकरकंद की पत्तियों को खा कर ये कीट छलनी कर देते हैं, जिस से पत्तियां भोजन नहीं बना कर पाती हैं और फसल का विकास रुक जाता है.

इस कीट की रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा 250 मिलीलिटर प्रति एकड़ छिड़काव करना चाहिए. इस के अलावा शकरकंद में पीविल नाम का कीट इस के कंदों में घुस कर इसे बेकार कर देता है. इस की रोकथाम के लिए सब से अच्छा उपाय बोआई के समय कंदशोधन होता है.

शकरकंद की फसल में 2 बीमारियों का प्रकोप ज्यादातर देखा गया है, जिस में पहला है तना सड़न, जो कि फ्यूजेरियम औक्सीपोरम नामक फंफूदी के चलते होता है. इस बीमारी की वजह से फसल के तने में सड़न आ जाने से फसल बेकार हो जाती है. इस की रोकथाम के लिए बीमारी अवरोधक फसल का चुनाव करना उचित होता है. इस की फसल में दूसरी बीमारी कली सड़न की है. इस में कंदों की सतह पर धुंधले काले रंग के धब्बे बन जाते हैं. इस वजह से पौधे मर जाते हैं. इस के लिए 250 मिलीलिटर नीम के काढ़े को प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए.

खुदाई व भंडारण : शकरकंद की खुदाई उस के रोपाई के समय पर निर्भर करती है. जुलाई माह में रोपी गई फसल की खुदाई नवंबर माह में की जा सकती है. इस की खुदाई का उचित अंदाज इस बात से भी लगाया जाता है कि जब पत्तियां पीली पड़ कर सूखने लगें, तो फावड़े या कुदाल से फसल की खुदाई कर उस पर लगी मिट्टियों को साफ कर किसी छायादार व हवादार स्थान पर भंडारण कर देना चाहिए.