कृषि यंत्र (Agricultural Machinery) से करें सीधी बोआई

आजकल ज्यादातर गेहूं, धान जैसी फसलों की कटाई कंबाइन हार्वेस्टर से की जाती है. हार्वेस्टर से फसल के सिर्फ ऊपरी हिस्से को ही काट लिया जाता है और बाकी अवशेष खेत में ही पड़ा रह जाता है. उस अवशेष को ज्यादातर किसान जला देते हैं जिस से आबोहवा भी दूषित होती है और खेत की मिट्टी को भी अच्छाखासा नुकसान होता है. साथ ही, खेत की मिट्टी के अनेक उपजाऊ तत्त्व खत्म हो जाते हैं.

वहीं दूसरी तरफ कुछ किसान ऐसे भी हैं जो समझदारी से काम लेते हैं. वे इन अवशेषों को खेत में न जला कर या तो इन्हें खेत में जोत कर खाद बना देते हैं या उस नरवाई वाले खेत में ही हैप्पी सीडर या जीरो टिलेज जैसी मशीनों से सीधे गेहूं की बोआई करते हैं. इस से उन्हें कई फायदे होते हैं.

पहला फायदा तो यह होता है कि इन कृषि यंत्रों के इस्तेमाल से बोआई करने पर फसल अवशेषों की जमीनों में मिल कर खाद बन जाती है. दूसरा फायदा यह होता है कि खेत तैयार करने के लिए कई बार जुताई करनी होती है तो जुताई का खर्चा बचता है. साथ ही, खेत में देने वाले पानी की भी बचत होती है. तीसरा फायदा समय की बचत होती है और बेहतर पैदावार भी मिलती है.

जीरो टिलेज यंत्र से बोआई

गेहूं की बोआई करने के लिए आमतौर पर खेत की कई बार जुताई करनी पड़ती है जिस में काफी समय बेकार हो जाता है. इस देरी से बचने के लिए धान कटने के बाद खेत में जीरो टिलेज मशीन से सीधे बोआई कर सकते हैं.

इस मशीन में साधारण सीड ड्रिल मशीन की तरह खाद और बीज के लिए अलगअलग 2 बौक्स लगे होते हैं. एक बौक्स में खाद भरी जाती है और दूसरे बौक्स में बीज भरा जाता है. इस यंत्र से 9 या 11 लाइनों में बोआई की जाती है.

बोआई करने के लिए मशीन में नीचे की तरफ नुकीले फाड़ लगे होते हैं जो बारीक लाइन में बीज बोने के लिए खुदाई करते चले जाते हैं. खादबीज वाले बक्सों से जुड़ी प्लास्टिक की लगी पाइपों के जरीए खाद व बीज खेत में गिरते चले जाते हैं. इस यंत्र में खादबीज तय दूरी पर सही मात्रा में गिरते हैं.

जीरो टिलेज का सब से बड़ा फायदा यह होता है कि धान की कटाई के बाद बिना खेत को जोते ही सीधे इस यंत्र की मदद से बोआई की जाती है जिस से खादबीज एकसाथ ही लग जाता है. दूसरा फायदा यह होता है कि खेत की जुताई न करने पर खेत में नमी बनी रहती है. फसल में कम पानी की जरूरत होती है.

इस यंत्र को 35 से 45 हौर्सपावर या इस से ज्यादा पावर के ट्रैक्टर के साथ इस्तेमाल किया जाता है.

कृषि यंत्र (Agricultural Machinery)

हैप्पी सीडर यंत्र से बोआई

इस यंत्र में जीरो टिलेज मशीन जैसे सभी गुण मौजूद हैं. इस की खासीयत यह है

कृषि मशीनरी (Agricultural Machinery) को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण 

उदयपुर : 2 मई, 2024. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के प्रसार शिक्षा निदेशालय द्वारा लघु एवं सीमांत किसान परिवारों में कृषि मशीनरी को बढ़ावा देने व कृषि में श्रम साध्य साधनों के उपयोग पर एकदिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र, चित्तौड़गढ़ पर किया गया. यह प्रशिक्षण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित परियोजना के अंतर्गत आयोजित किया गया.

प्रशिक्षण के आरंभ में निदेशक प्रसार शिक्षा एवं प्रोजैक्ट इंचार्ज डा. आरए कौशिक ने किसान महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा कि बढ़ती हुई आबादी को देखते हुए किसानों को जरूरत है सघन एवं सूक्ष्म अवधि वाली खेती की. इस के लिए उन्नत बीज, खाद एवं समय पर खेती के कामों को पूरा करने के लिए आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग करना जरूरी हो गया है. इन के खेती में उपयोग से मानव श्रम काफी कम हो जाता है.

अनुसंधानों के आधार पर कहा जा सकता है कि कृषि यंत्रों के उपयोग से खेइत के कामों में लगने वाले श्रम व समय को 20-30 फीसदी तक कम हो जाता है. इस के अतिरिक्त उर्वरकों, बीजों व रसायनों पर होने वाले खर्च में भी तकरीबन 15-20 फीसदी की कमी आ जाती है.

प्रशिक्षण की मुख्य वक्ता डा. हेमु राठौड़, वैज्ञानिक एक्रिप ने किसान महिलाओं के श्रम व साध्य साधनों के उपयोग पर प्रकाश डाला. साथ ही, उन्नत दरांती, मक्का छीलक यंत्र, मूंगफली छीलक यंत्र, ट्रांसप्लांटर, वेजीटेबल पिकिंग बैग, सोलर हेट, उंगली में पहने जाने वाली सब्जी कटर आदि पर प्रशिक्षण दिया. साथ ही, महिलाओं द्वारा उन के सुरक्षित उपयोग को भी सुनिश्चित किया गया.

प्रशिक्षण में डा. लतिका व्यास ने खेती में महिलाओं के योगदान पर चर्चा की और बताया कि कृषि में खेती की तैयारी से भंडारण तक की 90 फीसदी क्रियाएं महिलाओं द्वारा की जाती हैं. इसी दिशा में कृषि को और भी समृद्ध बनाने के लिए किसान महिलाओं के लिए प्रशिक्षण आयोजित किए जा रहे हैं.

डा. आरएल सोलंकी, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष, कृषि विज्ञान केंद्र, चित्तौड़गढ़ ने किसान महिलाओं को भूमि एवं मिट्टी की उर्वरकता बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रकार के तरीकों पर तकनीकी जानकारी दी.

प्रशिक्षण के दौरान आदर्श शर्मा, प्रोग्राम अफसर, डा. कुसुम शर्मा, डा. दीपा इंदौरिया, अभिलाषा, मदन गिरी व राजेश विश्नोई आदि ने भी विचार व्यक्त किए.

मूंगफली की थ्रैशर (Thresher) से करें गहाई

मूंगफली की फसल पकने के बाद उस की खुदाई कर ली जाती है. बाद में मूंगफली को पौधों की जड़ों से अलग करने के लिए उन्हें हाथ से तोड़ा जाता है या मूंगफली थ्रैशर के द्वारा अलग की जाती है. हाथ से तोड़ने के अलावा मूंगफली को अलग करने के लिए कुछ दूसरे तरीके भी अपनाए जाते हैं.

मूंगफली हाथ से तोड़ने में काफी समय भी लग जाता है. छोटे क्षेत्रफल के लिए तो यह ठीक है लेकिन देश में कई ऐसे इलाके हैं जहां मूंगफली की ज्यादा पैदावार ली जाती है. ऐसी जगह के लिए मूंगफली की गहाई के लिए मूंगफली थ्रैशर ही अच्छा जरीया है.

मूंगफली में खुदाई के बाद फसल को हवा लगने यानी सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है. इस के बाद दूसरे अनाजों की तरह ही मूंगफली की थ्रैशर से गहाई की जाती है. इस में मूंगफली पौधों से झड़ कर अलग हो जाती हैं जो मशीन में नीचे लगी छानने वाली ट्रे में गिरती रहती हैं और मशीन के दूसरी तरफ से उस के अवशेष निकलते रहते हैं.

थ्रैशर से गहाई करने पर मूंगफली का दाना भूसे में भी नहीं जाता और मूंगफली साफ निकलती है. मूंगफली गहाई का थ्रैशर गेहूं के थ्रैशर से थोड़ा अलग हट कर होता है.

मूंगफली थ्रैशर से दूसरी फसलें जैसे मूंग, मोठ, मसूर, धनिया की भी गहाई की जाती है. पंजाब की गिल एग्रो इंडस्ट्रीज इस तरह का थ्रैशर बनाती है. कंपनी का कहना है कि उन के इस थ्रैशर की राजस्थान में बहुत मांग है. यह थ्रैशर उम्दा तकनीक से भारतीय मानकों के हिसाब से बनाया गया है. दूसरे थ्रैशरों के मुकाबले इस में लगे भारी फ्लाईह्वील के चलते यह थ्रैशर लोड नहीं लेता है और डीजल भी कम खर्च होता है. साथ ही, इस के अच्छे नतीजे भी मिले हैं. यह भारत सरकार से मान्यताप्राप्त थ्रैशर है.

अधिक जानकारी के लिए गिल एग्रो कंपनी के फोन नंबर 09417066252 या 09317100008 पर बात कर के अधिक जानकारी ले सकते हैं.

इस के अलावा महाराष्ट्र की गणेश एग्रो इक्विपमैंट्स कंपनी ‘गणेश राज’ नाम से थ्रैशर बनाती है. उन के टोल फ्री नंबर 18001200313  या 91-2764-273442/ 267446 पर भी जानकारी ली जा सकती है.

कृषि मेले व प्रशिक्षण कार्यक्रम में मिलती है नई तकनीकों (New Technologies) की जानकारी

चिड़ावा (झुंझुनूं) : 1 मार्च, 2023. रामकृष्ण जयदयाल डालमिया सेवा संस्थान द्वारा आज संस्थान के खेलकूद परिसर में विशाल कृषि मेले का आयोजन हुआ, जिस में क्षेत्र के किसान, किसान महिलाएं, कृषि विषय का अध्ययन करने वाले छात्रछात्राएं, पशुपालकों सहित प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया. मेले में विभिन्न कंपनियों एंव सरकारी विभागों द्वारा लगाई गई कृषि आदानों, उपकरणों, नवीन कृषि यंत्रों, जैविक उत्पादों, जल संरक्षण सहित अन्य उपयोगी जानकारीपरक 35 स्टाल लगाए.

मेले में कृषि विशेषज्ञों द्वारा कृषि उत्पादन को बढ़ाने, परंपरागत खेती के स्थान पर अधिक आय देने वाली फसलों की बोआई करने, भोजन में मिलेट्स का उपयोग बढ़ाने जैसी जानकारी दी गई.

कृषि मेले के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर (जयपुर) के पूर्व कुलपति डा. प्रवीण सिंह राठौड़ ने कहा कि किसानों को अब जमीन के घटते क्षेत्रफल और गिरते भूजल स्तर पर विशेष ध्यान देना होगा. उन्होंने बताया कि निरंतर उवर्रकों के उपयोग से भूमि की गुणवत्ता एवं पोषक तत्वों की उपलब्धता में निरंतर गिरावट आ रही है. इसी प्रकार अधिक सिंचाई वाली फसलों की बोआई के कारण भूजल स्तर भी गिरता जा रहा है. राजस्थान के 216 ब्लौक ओवर एक्सप्लौटेड हो गए हैं.

यदि यही स्थिति रही तो सिंचाई के लिए दूर पेयजल के लिए हमें पानी की तलाश करनी होगी. उन्होंने सुझाव दिया कि किसानों को संतुलित उर्वरा प्रबंधन पर ध्यान देना होगा.

कायर्क्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रवासी उद्योगपति एंव ट्रस्टी रघुहरि डालमिया ने कहा कि देश को ऐसे किसानों की आवश्यकता है, जो देश की प्रगति में सहभागी बनें. किसानों ने जमीन को आबाद कर हम सब को भोजन के लिए अन्न उपलब्ध करवा कर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत की है.

उन्होंने मेले में आए किसानों से आग्रह किया कि वे मेेले में प्रदर्शित की गई नवीन तकनीकों के उपकरणों, जानकारी व अनुसंधानों के ज्ञान को कृषि उपज बढ़ाने में साझा करें.

उन्होंने यह भी कहा कि कृषि विद्यालय अथवा महाविद्यालय से आने वाले छात्रछात्राएं संस्थान द्वारा वर्षा जल संरक्षण, वृक्षारोपण व कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए अपनाई जा रही पद्धतियों का किसी भी दिन आ कर अवलोकन कर सकते हैं.

कृषि मेले में उद्यान विभाग झुंझुनूं के उपनिदेशक डा. शीशराम जाखड़ ने परंपरागत खेती के स्थान पर अधिक आय देने वाली नकदी फसलों की बोआई करने, बागान लगाने, परंपरागत सिंचाई पद्धति के स्थान पर फव्वारा, मिनी फव्वारा आदि पद्धतियों का उपयोग करने का सुझाव दिया.

पयार्वरण विकास एंव अध्ययन केंद्र के निदेशक डा. मनोहर सिंह राठौड़ ने किसानों को एकजुट होने व जागरूक हो कर खेती करने का सुझाव दिया.

स्वामी केशवानंद विश्वविद्यालय, बीकानेर के पूर्व निदेशक डा. हनुमान प्रसाद ने रामकृष्ण जयदयाल डालमिया सेवा संस्थान द्वारा वर्षा जल संरक्षण सहित किसानों की आर्थिक समृद्धि के लिए चलाई जा रही कायर्क्रमों की सराहना की और कहा कि वर्षा जल की उपलब्धि को देखते हुए हमें कम पानी के उपयोग वाली फसलों की बोआई करनी होगी.

किसान आयोग के सदस्य ओपी खेदड़ ने कहा कि मिलेट्स की पौष्टिकता को देखते हुए हमें इस का उपयोग बढ़ाना होगा. प्रगतिशील किसान मुकेश मांजू ने भी अपने विचार रखे.

मेले में प्रगतिशील किसानों के रूप में विद्याधर, सवाई सिंह, सुरेश, लालचंद, कुंजबिहारी को, ग्राम विकास समिति के लिए मालुपुरा की ग्राम जलग्रहण समिति को, पयार्वरण मित्र के रूप में राकेश बराला को और जलयोद्धा के रूप में रोहिताश बराला को प्रमाणपत्र व प्रतीक चिन्ह दे कर सम्मानित किया.

प्रारंभ में संस्थान के परियोजना प्रबंधक भूपेंद्र पालीवाल ने अतिथियों का स्वागत किया और संस्थान की प्रगति पर प्रकाश डाला. कार्यक्रम का संचालन मोनिका स्वामी द्वारा किया गया.

इस अवसर पर संस्थान के जल संसाधन समन्वयक संजय शर्मा, कृषि समन्वयक शुबेंद्र भट्ट, प्रशासनिक अधिकारी कुलदीप कुल्हार, अजय बलवदा, राकेश महला, सूरजभान रायला, नरेश, बलवान सिंह, अनिल सैनी, मान सिंह, जितेंद्र एवं सुनील उपस्थित रहे.

बायोडीकंपोजर: बनाए कचरों को जैविक खाद

इफको बायोडीकंपोजर एक लाभकारी सूक्ष्म जीवों का समूह है, जो फसल अवशेष, पशुओं के बिछावन, गोबर व दूसरे कचरे को जैविक खाद के रूप में तेजी से बदल कर खेती के लिए उपयोगी बना देता है.

* इफको बायोडीकंपोजर की एक बोतल से एक साल में एक लाख मीट्रिक टन से अधिक जैविक खाद का उत्पादन किया जा सकता है.

* 20 मिलीलिटर की पैकिंग में तरल रूप में उपलब्ध है.

इस से लाभ

* फसल अवशेषों को कंपोस्ट बनाने में उपयोगी.

* पशुओं के बिछावन, गोबर व दूसरे कचरे को जैविक खाद बनाने में उपयोगी.

* बीजोपचार कर के बीज से होने वाली विभिन्न बीमारियों की रोकथाम में उपयोगी.

* पर्णीय छिड़काव द्वारा विभिन्न कीट व बीमारियों की रोकथाम में उपयोगी.

* टपक सिंचाई पद्धति (ड्रिप सिंचाई)  द्वारा प्रयोग करने से मिट्टी की उर्वराशक्ति में बढ़ोतरी.

* इफको बायोडीकंपोजर के उपयोग करने से उत्पादन की लागत को कम कर के शुद्ध आमदनी को बढ़ाया जा सकता है.

उपयोग की विधि

इफको बायोडीकंपोजर के उपयोग के लिए सब से पहले बायोडीकंपोजर का घोल तैयार किया जाता है.

इफको बायोडीकंपोजर घोल तैयार करने की विधि

* एक प्लास्टिक के ड्रम में 200 लिटर पानी लें और इस में 2 किलोग्राम गुड़ को घोलें.

* बायोडीकंपोजर की एक शीशी (बोतल) को (शीशी में उपस्थिति सामग्री को बिना हाथ से छुए) ड्रम में घोलें.

* एक लकड़ी के डंडे की मदद से ड्रम के पानी में बायोडीकंपोजर को अच्छी तरह से मिला दें और ड्रम को एक कागज या कपड़े से ढक दें.

* घोल को प्रतिदिन 2 बार लकड़ी के डंडे से अच्छी तरह हिलाएं. 5 से 7 दिन में ड्रम के घोल की ऊपरी सतह पर झागदार परत बन जाएगी और घोल का रंग मटमैला हो जाएगा.

* अब यह घोल उपयोग के लिए तैयार है.

इसी घोल से बारबार बायोडीकंपोजर का घोल तैयार किया जा सकता है?.

* एक दूसरे प्लास्टिक ड्रम में तैयार किए घोल से 20 लिटर घोल और 2 किलोग्राम गुड़ को 200 लिटर पानी में मिला दें और बताई गई प्रक्रिया को 7 दिन तक दोहराएं.

7 दिन में दोबारा बायोडीकंपोजर का घोल  तैयार हो जाएगा. इस बायोडीकंपोजर के घोल का उपयोग फसल अवशेषों को कंपोस्ट बनाने, जैविक खाद बनाने, बीज के उपचार करने, पर्णीय छिड़काव करने व ड्रिप के द्वारा किया जा सकता है.

बायोडीकंपोजर घोल से फसल अवशेषों को कंपोस्ट बनाने की विधि

* फसल की कटाई के बाद खेत में बचे फसल अवशेषों पर 200 लिटर बायोडीकंपोजर के घोल का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव कर खेत में पानी भर दें.

* पानी की कमी वाले इलाकों में खेत में बचे फसल अवशेषों पर 200 लिटर बायोडीकंपोजर के घोल का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव कर छोड़ दें और जब किसान खेत में सिंचाई करते हैं, तो इन अवशेषों के विघटन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.

* इस तरह कुछ समय बाद सारे फसल अवशेष जैविक खाद में बदल जाते हैं.

बायोडीकंपोजर घोल से जैविक खाद बनाने की विधि

* एक टन कृषि अपशिष्ट, गोबर, रसोई के कचरे वगैरह का 18-20 सैंटीमीटर मोटी परत की जमीन पर ढेर बना लें.

* इस ढेर को बायोडीकंपोजर के घोल से गीला कर लें.

* इस परत पर उतनी ही मोटाई की एक दूसरी परत बिछा दें व दोबारा बायोडीकंपोजर के घोल से गीला कर दें.

* यह प्रक्रिया 3 से 4 बार दोहराएं व आखिरी परत के ऊपर एक बार दोबारा बायोडीकंपोजर के घोल से गीला कर दें.

* अच्छी और तीव्र गति से खाद बनने के लिए 7 दिन के अंतराल पर ढेर को उलटपलट करते रहें.

* खाद बनने के दौरान 60-65  प्रतिशत नमी बनाए रखें.

* जरूरत पड़ने पर ढेर पर और बायोडीकंपोजर के घोल को मिलाया जा सकता है.

* इस विधि से 30 से 40 दिनों में गुणवत्तायुक्त जैविक खाद उपयोग के लिए तैयार हो जाती है.

बायोडीकंपोजर घोल से बीजोपचार करने की विधि

* बोआई से पहले सभी तरह की फसलों के बीज पर 5 मिलीलिटर बायोडीकंपोजर के घोल का प्रति किलोग्राम बीज की दर से समान रूप से छिड़काव करें.

* उपचारित बीज को 30 मिनट तक छाया में सुखा कर बोआई करें.

बायोडीकंपोजर घोल का ड्रिप सिंचाई के द्वारा उपयोग

* 200 लिटर बायोडीकंपोजर के घोल का प्रति एकड़ की दर से ड्रिप द्वारा सिंचाई करें.

* बायोडीकंपोजर के उपयोग से मिट्टी मुलायम व नरम बन जाती है.

* खेत की जैविक, रासायनिक व भौतिक दशा सुधरती है और इस तरह खेत की उर्वराशक्ति बढ़ती है.

* सूक्ष्म जीवों की बढ़ोतरी होती है. एंजाइमों व कार्बनिक अम्लों का उत्पादन कर के फसल अवशेषों मे मौजूद पोषक तत्त्वों को मुक्त कर के फसलों को मुहैया कराता है.

बायोडीकंपोजर घोल का पर्णीय छिड़काव द्वारा उपयोग

* बायोडीकंपोजर के घोल और पानी का 1:3 अनुपात के घोल का पर्णीय छिड़काव करें.

* 200 लिटर (बायोडीकंपोजर के घोल+पानी) का प्रति एकड़ की दर से उपयोग करें.

* बायोडीकंपोजर के पर्णीय छिड़काव से कीटों व बीमारियों का नियंत्रण होता है.

गेहूं की कटाई: वायु प्रदूषण व समाधान

हर साल रबी की प्रमुख फसल गेहूं की कटाई के दौरान वायु में प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. खेतों में फसल के बचे अवशेष जलाए जाने से  बहुत ज्यादा हानिकारक कार्बनिक पार्टिकुलेट और विषैली गैसें वातावरण में फैल कर उसे प्रदूषित कर देती हैं, वहीं दूसरी ओर वायु गुणवत्ता सूचकांक गंभीर स्तर तक पहुंच जाता है और मिट्टी की उर्वरता में अत्यधिक कमी आती है.

वैसे तो सरकार द्वारा फसल के अवशेषों को जलाने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है और उल्लंघन करने वाले लोगों पर वायु (रोकथाम और प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के तहत कार्यवाही भी की जाती है, पर इस के बाद भी यह समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है.

कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण ने जहां शारीरिक श्रम को बहुत कम किया है, वहीं कई नई समस्याओं व चुनौतियों को जन्म भी दिया है. कुछ साल पहले जब किसान अपने हाथों से गेहूं की फसल की कटाई करते थे या श्रमिकों से कटाई करवाते थे, तो गेहूं की बालियों के साथ ही उस का तना भी काट लिया जाता था जो पशुओं को खिलाने के काम में लिया जाता था, लेकिन थ्रेशर आदि मशीनों से कटान के दौरान लंबा तना जिसे स्टौक या आम भाषा में नरई कहा जाता है, वह खेतों में ही रह जाता है.

अगली फसल बोने से पहले किसान को खेत तैयार करना होता है, जिस के लिए किसान जल्दबाजी और जानकारी की कमी के चलते सूख चुकी नरई/नरवाई को खेतों में ही जला देना सब से आसान व सस्ता रास्ता समझाते हैं.

Wheat

गेहूं की कटान और वातावरण प्रदूषण

गेहूं की कटाई के दौरान वायु में भूसे के कण उड़ने लगते हैं, जिस के चलते वायु में पार्टिकुलेट मैटर की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ जाती है और प्रदूषण सूचकांक में भारी बढ़ोतरी होती है. पार्टिकुलेट मैटर 10 तो आसानी से कुछ देर में सैटल हो जाते हैं पर बहुत ज्यादा छोटे कण, जिन्हें पार्टिकुलेट मैटर 2.5 कहा जाता है, वायु में बहुत लंबे समय तक तैरते रहते हैं व हवा के साथ उड़ कर कई वर्ग किलोमीटर तक के क्षेत्र में फैल कर उसे प्रभावित करते हैं. इन के चलते लोगों में खांसी, एलर्जी और सांस फूलने जैसी स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो जाती  हैं.

ऐसे में बच्चों, वृद्धों और सांस के मरीजों को सीधे धूल वाले स्थानों में नहीं जाना चाहिए और अगर जाना भी हो तो मुंह और नाक को मास्क या कपड़े से अच्छी तरह ढक कर ही बाहर निकलना चाहिए.

कृषि अवशिष्ट दहन और वायु प्रदूषण

नरई को खेतों में जला देने के कारण वायु प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है. वातावरण में हानिकारक कार्बन डाईऔक्साइड, कार्बन मोनोऔक्साइड, नाइट्रस औक्साइड, सल्फर डाईऔक्साइड  जैसी गैसों और कार्बनिक पार्टिकुलेट मैटर की मात्रा बहुत ज्यादा हानिकारक स्तर तक पहुंच जाती है.

वायु गुणवत्ता में गिरावट होने से लोगों की श्वसन क्रिया प्रभावित होती है. धुएं में कार्बन डाईऔक्साइड और कार्बन मोनोऔक्साइड की मात्रा काफी ज्यादा होती है, जो किसानों को खेत में ही बेहोश तक कर सकती है.

सल्फर डाईऔक्साइड और नाइट्रस औक्साइड गैसें अपनी अम्लीय प्रवृत्ति के चलते आंखों में और श्वसन तंत्र में जलन पैदा करती हैं. दमा व दूसरे श्वसन रोगों से ग्रसित लोगों को हानिकारक गैसों और छोटे कणों के चलते सांस लेने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. किसानों द्वारा फसल जलाने से एक ओर जहां प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है, वहीं भूसे के नष्ट हो जाने से पशुधन के लिए सूखे चारे का संकट खड़ा हो जाता है.

मिट्टी की उर्वरता पर गलत असर

गेहूं की कटाई के बाद खेतों में जलाए जा रहे गेहूं की फसल के अवशेष न केवल सेहत पर गलत असर डाल रहे हैं, बल्कि अवशिष्ट जलाने से मिट्टी की उर्वरता भी कम हो रही है.

आंकड़े बताते हैं कि गेहूं की फसल के एक टन अवशेष जलाने से 6 किलोग्राम नाइट्रोजन, एक किलोग्राम फास्फोरस, 11 किलोग्राम पोटाश व दूसरे सूक्ष्म तत्त्व जल कर नष्ट हो जाते हैं. इस के अलावा गेहूं की फसल के अवशेष जलाए जाने वाली जगह पर मिट्टी का तापमान बढ़ जाता है और उस मिट्टी में रहने वाले किसान के मित्र कीट भी मर जाते हैं और एक ग्राम मिट्टी में जो लगभग 20 करोड़ लाभकारी जीवाणु होते हैं, उन में से मात्र 15 लाख बचे रह जाते हैं.

अन्य समस्याएं

गेहूं के भूसे को खेतों में ही जला देने के कारण उठते धुंए से सड़क मार्ग से यात्रा करने वाले यात्रियों को बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता है. बहुत ज्यादा धुएं के चलते रात में वाहन संतुलन बिगड़ने के कारण दुर्घटनाएं होने का डर बना रहता है.

कानूनी प्रावधान

गेहूं का भूसा जलाना गैरकानूनी है. वायु प्रदूषण प्रतिबंध और नियत्रण अधिनियम 1981 की धारा 19 (5) के तहत इसे दंडनीय अपराध माना गया है. कानून की अनदेखी करने पर दोषी किसान आईपीसी की धारा 188 सहित वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम 1981 के तहत भी दंड का भागीदार होता है. तेजी से बढ़ रहे वायु प्रदूषण को ले कर नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) बहुत सख्त है.

कृषि अवशिष्टों को खेतों में ही जला दिए जाने की घटनाओं के निरीक्षण के लिए सैटेलाइट से मौनिटरिंग भी की जाती है, ताकि खेतों में फसलों के अवशेष आदि में आग लगाए जाने की स्थिति का तुरंत पता लगा कर उसे बुझाया जा सके. इस काम में कई राज्यों की सरकारें स्पेस एप्लीकेशन सैंटर आदि की मदद लेती हैं.

वैकल्पिक उपयोग

कृषि अवशिष्टों की समस्या का समाधान बिलकुल भी मुश्किल नहीं है. इस के अनेक वैकल्पिक उपयोग उपलब्ध हैं, जो बहुआयामी हैं, जिन्हें अपना कर वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सकता है व पशु आहार की उपलब्धता तय की जा सकती है, भूमि की उत्पादन क्षमता व उर्वरता को बढ़ाया जा सकता है और साथ ही बहुत ज्यादा मुनाफा भी कमाया जा सकता है

*    आजकल गेहूं की फसल को कंबाइन मशीन से कटान के बाद रीपर से उस का भूसा बना लेते हैं या फिर फसल अवशेषों को खेत में जोत कर खाद बनाई जाती है. फसल अवशेष जलाने के बजाय खेत में ही उस की जुताई करने से भूमि की ऊपजाऊ शक्ति बढ़ती है और खरपतवारों को रोकने में मदद मिलती है.

* भूसे को पशुधन के चारे के रूप में उपयोग तो किया ही जाता है, साथ ही कई स्थानों पर इसे मशरूम उत्पादन के लिए एक बेस के रूप में भी प्रयुक्त किया जाता है.

Wheat

* फसल अवशेषों का पल्प बना कर उस से डिस्पोजेबल और बायोडीग्रेडेबल थालियों, दौनों व गिलासों को बना कर लघु व माध्यमिक उद्यम इकाइयां लगा कर किया जा सकता है. बायोमास गैसीफिकेशन पावर जनरेशन तकनीक द्वारा फसल अवशिष्टों से विद्युत का उत्पादन किया जा सकता है.

*    पायरोलिसिस की एक विशिष्ट तकनीक द्वारा नरवाई और पराली से बायोचार का उत्पादन किया जा सकता है, जो एक बहुत अच्छा फ्यूल होने के साथ ही अच्छा उर्वरक भी होता है.

* हाल ही में भूसे का उपयोग पौलीयूरिथेन फोम बनाने के लिए स्पेन में किया गया है, जिस से निर्माण और औटोमोबाइल क्षेत्रों में सीलेंट के साथसाथ कई तरह के सामान व थर्मल और ध्वनिक इंसुलेटर बनाए जाते हैं.

* ‘फसल अवशेषों के इन-सीटू प्रबंधन के लिए कृषि में यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय क्षेत्रक योजना’ के तहत किसानों को इन-सीटू फसल अवशेष प्रबंधन के लिए मशीनों को खरीदने के लिए 50 प्रतिशत वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है. साथ ही, इन-सीटू फसल अवशेष प्रबंधन के लिए मशीनरी के कस्टम हायरिंग केंद्रों की स्थापना के लिए परियोजना लागत की 80 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है.

कृषि विभाग द्वारा समयसमय पर किसानों के मध्य जागरूकता अभियान भी चलाए जाते हैं, ताकि बहुपयोगी कृषि अवशिष्टों के जलने से होने वाले वायु प्रदूषण को समय रहते रोका जा सके, मिट्टी की प्राकृतिक उत्पादन क्षमता को बचाया जा सके और किसानों को फसल अवशेषों के प्रबंधन के विकल्पों की जानकारी दे कर सरकारी योजनाओं का फायदा लेने को बढ़ावा दिया जा सके.

महिला किसानों के हिसाब से बनते कृषि यंत्र

आज देश में खेती के काम में 35 फीसदी से ज्यादा भागीदारी महिलाओं की है और खेती के अनेक काम ऐसे हैं, जिन में कृषि यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है. खेती में काम आने वाले कृषि यंत्र आमतौर पर पुरुषों को ही ध्यान में रख कर बनाए जाते हैं, लेकिन अब कृषि यंत्र बनाने वाले महिलाओं को ध्यान में रख कर भी यंत्र बना रहे हैं, ताकि इन यंत्रों का इस्तेमाल खेतिहर महिलाएं आसानी से कर सकें.

जानकारों का कहना है कि आने वाले समय में खेती के कामों में महिलाओं की भागीदारी और बढ़ेगी, क्योंकि आजकल देखने में आ रहा है कि ज्यादातर नौजवान शहरों की तरफ आ रहे हैं. शहरों में आ कर वे कुछ रोजगार भी कर सकें.

इस के पीछे चाहे खेती में कम मुनाफे की वजह हो या कोई और वजह भी हो सकती है, क्योंकि खेती में खेत बोते समय और उस की कटाई के समय ही ज्यादा काम होता है. बीचबीच में खेती में निराईगड़ाई व पानी की उचित देखभाल की जरूरत होती है. इस काम में अब गांव की औरतें भी मर्दों का हाथ बंटाने लगी हैं. यही वजह है कि आने वाले समय में महिलाओं के मुताबिक ही कृषि यंत्रों को बनाया जाए, जिस से महिलाओं को उन्हें इस्तेमाल करने में आसानी हो.

खेती में महिलाओं की भागीदारी और कृषि यंत्र

खेतिहर महिलाओं पर किए गए एक शोध के मुताबिक, महिलाओं के लिए बनाए जाने वाले इन कृषि उपकरणों का डिजाइन तैयार करने में शरीर के 79 आयामों की पहचान की गई है. इस आधार पर तैयार किए गए.

ऐसे आधुनिक कृषि औजारों और उपकरणों का उपयोग महिलाएं काफी सहजता से कर सकती हैं.

महिलाओं के हिसाब से उपकरण

शोधकर्ताओं के मुताबिक, भारतीय महिला कृषि श्रमिकों की औसत ऊंचाई आमतौर पर 151.5 सैंटीमीटर और औसत वजन 46.3 किलोग्राम होता है. खेती के कामों में वजन उठाने संबंधी काम बहुत होते हैं. इन सब को ध्यान में रख कर इन कृषि उपकरणों को डिजाइन किया गया है.

उदाहरण के लिए, काम करते समय शरीर की प्रमुख मुद्राओं जैसे खडे़ हो कर, बैठ कर,  झुक कर वगैरह को ध्यान में रखते हुए 16 शक्तिमानकों का इस्तेमाल उपकरणों को डिजाइन करने में किया गया है.

इस के अलावा महिला श्रमिकों की ऊंचाई और वजन, काम करते समय अधिकतम औक्सिजन की खपत दर, दिल की गति की दर, हाथ की चौड़ाई, उंगलियों के व्यास, बैठ कर काम करने की ऊंचाई और कमर की चौड़ाई जैसी बातों को भी ध्यान में रखा गया है.

पुराने उपकरणों में बदलाव

महिलाओं की शारीरिक कूवत के आधार पर पुराने प्रचलित कृषि उपकरणों में बदलाव कर कई नए उपकरण बनाए गए हैं, ताकि उन्हें इस्तेमाल करने में सहूलियत हो.

इन में बीजोपचार, हस्त रिजर, उर्वरक ब्राडकास्टर, हाथ से चलने वाला बीज ड्रिल, नवीन डिबलर, रोटरी डिबलर, 3 पंक्तियों वाला चावल ट्रांसप्लांटर, 4 पंक्तियों वाला धान ड्रम सीडर, व्हील हो, कोनो वीडर, संशोधित हंसिया, मूंगफली स्ट्रिपर, पैरों से चलने वाला धान थ्रेशर, धान विनोवर, ट्यूबलर मक्का शेलर, रोटरी मक्का शेलर, टांगने वाला ग्रेन क्लीनर, बैठ कर प्रयोग करने वाला मूंगफली डिकोरटिकेटर, फल हार्वेस्टर, कपास स्टौक पुलर और नारियल डीहस्कर वगैरह खास हैं.

Women Farmerमहिलाओं को प्रशिक्षित करना जरूरी

केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल से जुडे़ प्रमुख अध्ययनकर्ता डाक्टर सीआर मेहता का कहना है कि इन उपकरणों के सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए महिला श्रमिकों को जागरूक और प्रशिक्षित करना  जरूरी है. साथ ही, निर्माताओं को ऐसे कृषि औजार बनाने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में मुहैया करना भी जरूरी है. उपकरण खरीदने के लिए बैंक और अन्य संगठनों से कर्ज लेने के लिए महिलाओं की सहायता भी जरूरी है.

शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि राज्य के कृषि विभागों को इस गतिविधि में मुख्य भूमिका निभानी होगी, क्योंकि उन की पहुंच देश के गंवई इलाकों तक आसानी से होती है. समयसमय पर वे लोग ऐसे आयोजन भी करते रहते हैं, जहां कृषि की जानकारी के लिए ढेरों किसान इकट्ठा होते हैं.

जरूरत है, इन महिलाओं की भागीदारी बढे़ और नईनई जानकारी ले कर खेती के काम को मशीनों के जरीए आसान बना सके.

मशीनों और उपकरणों की खरीद पर सब्सिडी

ट्रैक्टर : 20 पीटीओ हौर्सपावर तक के ट्रैक्टर की अनुमानित लागत 3.00 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए लागत का 35 फीसदी है यानी अधिकतम 1.00 लाख रुपए प्रति इकाई तक, जबकि पुरुषों के लिए लागत का महज 25 फीसदी है. मतलब, अधिकतम रुपए 0.75 लाख प्रति इकाई.

पावर टिलर : 8 हौर्सपावर से कम के पावर टिलर की अनुमानित लागत 1.00 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली सब्सिडी महिलाओं के लिए अधिकतम 0.50 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए अधिकतम 0.40 लाख रुपए प्रति इकाई.

वहीं दूसरी ओर 8 हौर्सपावर या उस से ज्यादा के पावर टिलर की लागत 1.50 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि इस पर मिलने वाली अधिकतम छूट 0.75 लाख रुपए प्रति इकाई है, वहीं पुरुषों के लिए अधिकतम 0.60 लाख रुपए प्रति इकाई.

Women Farmerट्रैक्टर व पावर टिलर से चलने वाले उपकरण (20 हौर्सपावर से कम) : भूमि विकास, जुताई और बीज की क्यारी बनाने के उपकरणों की अनुमानित लागत 0.30 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.15 लाख रुपए है, जबकि पुरुषों के लिए 0.12 लाख रुपए प्रति इकाई.

बोआई, रोपाई, कटाई औैर खुदाई के यंत्र की अनुमानित लागत 0.30 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट अधिकतम 0.15 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए रुपए 0.12 लाख प्रति इकाई.

प्लास्टिक मल्चिंग मशीन की लागत 0.70 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए 0.35 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.28 लाख रुपए प्रति इकाई.

पौध संरक्षण उपकरण

मैन्यूअल स्पे्रयर, नैपसैक यानी पैरों से चलने वाला प्रति स्प्रेयर (लागत 0.012 लाख रुपए प्रति इकाई), वहीं इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.006 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.005 लाख रुपए प्रति इकाई.

पावर चालित नैपसैक स्प्रेयर, पावर चालित ताइवानी स्पे्रयर की क्षमता वाले 8-12 लिटर की अनुमानित लागत मानक 0.062 लाख रुपए प्रति इकाईर् है.

इस पर मिलने वाली सब्सिडी यानी छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.031 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.025 लाख रुपए प्रति इकाई.

पावर नैपसैक स्प्रेयर या पावर चालित ताइवानी स्पे्रयर की क्षमता वाले 12-16 लिटर की अनुमानित लागत मानक 0.078 लाख रुपए प्रति इकाईर् है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.038 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.03 लाख रुपए प्रति इकाई.

पावर नैपसैक स्पे्रयर या पावर चालित ताइवानी स्पे्रयर की क्षमता 16 लिटर से ज्यादा की अनुमानित लागत 0.20 लाख रुपए प्रति इकाई है, वहीं इस पर मिलने वाली सब्सिडी यानी छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.10 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.08 लाख रुपए प्रति इकाई.

ट्रैक्टरधारक या फिर चालित स्पे्रयर 20 हौर्सपावर से कम की अनुमानित लागत 0.20 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.10 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.08 लाख रुपए प्रति इकाई.

ट्रैक्टर रखने वाले या चलाने वाले स्पे्रयर 35 हौर्सपावर से ज्यादा की लागत मानक 1.28 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर महिलाओं के लिए लागत का 50 फीसदी यानी अधिकतम 0.63 लाख रुपए प्रति इकाई, जबकि पुरुषों के लिए लागत का 40 फीसदी यानी अधिकतम 0.50 लाख रुपए प्रति इकाई.

पर्यावरण हितैषी लाइट ट्रैप की लागत 0.088 लाख रुपए प्रति इकाई है. इस पर मिलने वाली छूट महिलाओं के लिए अधिकतम 0.014 लाख रुपए प्रति इकाई है, जबकि पुरुषों के लिए 0.12 लाख रुपए प्रति इकाई है.

किसानों के लिए हितकारी योजनाएं

बस्ती: उपकृषि निदेशक, बस्ती की अध्यक्षता में ‘किसान दिवस’ बैठक का आयोजन विकास भवन सभागार में किया गया, जिस में जनपद के विभिन्न विभागों के अधिकारियों एवं उन के प्रतिनिधियों के साथ ही प्रगतिशील किसानों ने प्रतिभाग किया.

सब से पहले उपकृषि निदेशक, बस्ती द्वारा ‘किसान दिवस’ बैठक की कार्यवाही शुरू की गई, जिस में पिछले ‘किसान दिवस’ में आई शिकायतों के निस्तारण की स्थिति संबंधित अधिकारियों द्वारा किसानों को विस्तार से बताई गई.

गेहूंसरसों फसल पर दी जानकारी

कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया के वैज्ञानिक डा. वीबी सिंह ने बताया कि सरसों के बीज का शोधन डीएपी0से यदि की गई है, तो वह फसल अच्छी होती है.

उन्होंने बताया कि किसान अपने फसलों में पोटाश/नैनो यूरिया/डीएपी यदि संभव हो, तो इफको का ही प्रयोग करें. गेहूं व सरसों में जल विलेय उर्वरक 18:18:18 या 19:19:19 प्रति एकड़ में 2 किलोग्राम छिड़काव पानी में मिला कर करें और जब गेहूं रेड़े या दाने आना शुरू हों, तब 0-0-50-0 डालना चाहिए.

वैज्ञानिक डा. वीबी सिंह ने बताया कि गेहूं सामान्य मिट्टी में कम से कम 3 बार सिंचाई अवश्य करनी चाहिए और सरसों में हर 65 दिन पर सिंचाई करने से पैदावार बढ़ती है.

समय पर गन्ना भुगतान

मुंडेरवा चीनी मिल के मुख्य गन्ना प्रबंधक कुलदीप द्विवेदी ने बताया कि पिछले वर्ष का समस्त गन्ना मूल्य भुगतान मिल द्वारा कर दिया गया है. वर्तमान वित्तीय वर्ष में 31 दिसंबर, 2023 तक का भी भुगतान कर दिया गया है एवं 10 जनवरी, 2024 तक का गन्ना मूल्य भुगतान 22 जनवरी, 2024 तक कर दिया जाएगा.

समय पर करें बिजली बिल का भुगतान

अधिशाषी अभियंता, विद्युत वितरण खंड-3 के महेंद्र कुमार मिश्रा ने बताया कि ऐसे जो एकमुश्त समाधान योजना का लाभ नहीं ले सके हैं और उन का बिल 10000 रुपए से अधिक है, वह बिना देरी किए अपने बकाया बिल का भुगतान कर दें, अन्यथा की स्थिति में प्रर्वतन दल द्वारा अभियान चलाया जा रहा है, जिस में लाइन का विच्छेदन भी किया जा सकता है. वर्तमान में कुल 1,42,000 घरेलू उपभाक्ताओं का बिजली बिल 10000 रुपए से ज्यादा है.

रेशम कीट उत्पादन पर जानकारी

सहायक निदेशक, रेशम नीतेश सिंह ने बताया कि रेशम कीट उत्पादन की साल में 4 फसलें ली जा सकती हैं, जिस से किसान कम से कम 40-45 हजार शून्य लागत में अतिरक्ति आमदनी कर सकते हैं.

उन्होंने आगे बताया कि सहतूत के पौधे फ्री में मिलते हैं और इन्हें खेतों के चारों तरफ मेंड़ों पर लगा कर अच्छी आमदनी की जा सकती है. वर्तमान में ’’सिल्क समग्र’’ योजना संचालित है, जिस में जो किसान अधिक उत्पादन करते हैं, उन्हें विभाग द्वारा प्रोत्साहन के रूप में शेरी कल्चर गृह बनाने पर अनुदान दिया जाता है और बंगाल एवं मैसूर में प्रशिक्षण भी कराया जाता है. रेशम कीटपालन करने से बिना लागत के अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है.

’’प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’’ पर दी जानकारी

अधिकारी,मत्स्य संदीप कुमार वर्मा ने बताया कि यदि मछलीपालन का कार्य व्यावसायिक रूप से किया जाए, तो इस से अच्छी आमदनी की जा सकती है. वर्तमान समय में ’’प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’’ संचालित है, जिस में तालाब निर्माण के लिए 1/2 हेक्टेयर से ले कर 2 हेक्टेयर तक किया जा सकता है. 11 लाख रुपए की परियोजना लागत पर महिला/ अनुसूचित जाति को 60 फीसदी एवं अन्य को 40 फीसदी अनुदान देय है. इस समय मछलीपालन नई तकनीक से सीमेंटेड टैंक बनवा कर किया जाता है, जिस पर साढ़े 7 लाख से ले कर 50 लाख रुपए तक की परियोजना लागत पर विभाग द्वारा अनुदान दिया जाता है. साथ ही, इस के विपणन के लिए छोटे से ले कर बड़े किसानों को साइकिल/मोटरसाइकिल/3 व्हीलर एवं रेफ्रिजरेटर वैन विभाग द्वारा दिया जाता है.

पाले से करें फसल बचाव

जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने बताया कि इस समय शीतलहर चल रही है एवं फसलों में पाला लगने की संभावना बनी हुई है, इस से बचने के लिए शाम के समय बोरिंग से सिंचाई की जाए, तो जमीन का तापमान 3 से 4 डिगरी बढ़ जाता है, क्योंकि ओस की बूंदें जम कर बर्फ में बदल जाती हैं. इस से बचाव के लिए खेत के उत्तरपश्चिम दिशा में आग जलाने से तापमान में वृद्धि की जा सकती है. खेतों में सल्फ्यूरिक एसिड का छिड़काव प्रति लिटर 1,000 लिटर पानी में मिला कर किया जा सकता है.

माहू की करें रोकथाम

उन्होंने आगे यह भी बताया कि जब धूप निकलना शुरू हो, तो माहू का प्रकोप फसलों पर होना शुरू हो जाएगा और धूप के कारण माहू सीधे बच्चे देना शुरू कर देते हैं, जिस से 2-3 दिन में ही कीड़े फसलों का रस चूस लेते हैं, इस से बचाव के लिए सामान्य कीटनाशक का प्रयोग किया जा सकता है.

यदि कीटनाशक का प्रयोग न करना हो, तो काली मिर्च एवं लाल मिर्च पाउडर पानी में घोल कर या नीम तेल का छिड़काव किया जा सकता है. यदि खेत में पाला लग गया है, तो यूरिया एवं डीएपी का छिड़काव किया जा सकता है.

जिला कृषि रक्षा अधिकारी रतन शंकर ओझा ने किसानों से अपील की कि रसायनों का कम से कम प्रयोग करें. यदि खेती से संबंधित कोई समस्या आती है, तो कृषि विभाग द्वारा संचालित सहभागी फसल निगरानी या निदान प्रणाली भी कहते हैं, पर फोन/व्हाट्सअप/मैसेज द्वारा समस्या का समाधान 24 से 48 घंटे के भीतर कर दिया जाता है, जिस का नंबर 9452257111 या 9452247111 है.

कृषि यंत्र खरीदने वाले किसानों के लिए जानकारी

उपसंभागीय कृषि प्रसार अधिकारी हरेंद्र प्रसाद ने बताया कि जिन किसानों के यंत्रों का टोकन कंफर्म हो गया है, वह अपने बिल/वाउचर पोर्टल पर अपलोड कर दें. 17 जनवरी, 2024 का सोलर पंप के लक्ष्य के अंदर समस्त टोकन कंफर्म कर दिए गए हैं. किसान बाकी की धनराशि टोकन जनरेट कर के औनलाइन/औफलाइन जमा कर सकते हैं.

अन्त में उप एलकृषि निदेशक ने द्वारा उपस्थित सदस्यों/किसानों को ‘किसान दिवस’ में प्रतिभाग करने के लिए धन्यवाद ज्ञापित कर किसान दिवस का समापन की घोषणा की गई.

गन्ने की खेती को आसान बनाते यंत्र

आमतौर पर गन्ने की बोआई शरदकाल में 15 अक्तूबर से 15 नवंबर माह के बीच या वसंत के मौसम में 15 फरवरी से 15 मार्च तक की जाती है. पहले साल गन्ना बीज से फसल बोआई की जाती है, उस के बाद अगले 2 सालों तक फसल काटने के बाद ठूंठ बचते हैं, उन ठूंठों में से दोबारा अंकुरण होता है और पैदावार मिलती है. इसे पेड़ी या खूंटी फसल कहते हैं.

पहली बार फसल पैदावार के मुकाबले दूसरे व तीसरे साल फसल उपज में कुछ कमी आ जाती है, लेकिन अगर फसल प्रबंधन का खास ध्यान रखा जाए तो ये फसलें भी पहले साल जैसी पैदावार दे सकती हैं.

गन्ने की खेती में काम आने वाले कृषि यंत्रों का प्रयोग कर किसान अपनी लागत में तो कमी ला ही सकता है, बल्कि अधिक मुनाफा भी कमा सकता है.

गन्ना लोडर

यह यंत्र गन्ने की कटाई के पश्चात इसे मिल पर पहुंचाने के लिए ट्रौली में लोड करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है. यह यंत्र 55 हौर्सपावर की क्षमता या इस से अधिक क्षमता वाले ट्रैक्टरों के हाइड्रोलिक के सहारे से संचालित होता है, जो 5 मीटर की ऊंचाई पर गन्ने को आसानी से लोड कर देता है. इस के मजबूत स्टील फ्रेमों से एक बार में अधिक गन्ने को लादा जा सकता है.

गन्ना लोडर से जहां कटाई के बाद गन्ने की क्षति को कम किया जा सकता है, वहीं 90 फीसदी मानव श्रम में कमी लाते हुए लागत में भी कमी लाई जा सकती है. इस मशीन की बाजार में अनुमानित कीमत 4 लाख रुपए से ले कर 6 लाख रुपए तक है.

गन्ने की खेती में रिजर

यह गन्ने की बोआई में प्रयोग आने वाला एक यंत्र है, जो ट्रैक्टर में कल्टीवेटर की तरह फिट किया जाता है. यह किसी भी सामान्य क्षमता के ट्रैक्टर से जोड़ कर चलाया जा सकता है.

यह मशीन गन्ने की बोआई के लिए निर्धारित दूरी पर नालियां बनाता है. गहराई का निर्धारण ट्रैक्टर चालक द्वारा किया जाता है. इस मशीन में श्रम शक्ति की अधिक आवश्यकता होती है. इस से 8 घंटे में 2 एकड़ खेत की बोआई में 15-20 आदमियों की जरूरत होती है.

इस मशीन से बोआई में पहले गन्ने को टुकड़ों में काटा जाता है. साथ ही, इस की कटाई के बाद टुकड़े की नालियों में रोपाई की जाती है, फिर ऊपर से खाद का बुरकाव किया जाता है. इस के उपरांत इन नालियों को गिरा कर पाटा लगाया जाता है. इस यंत्र से बोआई करने में लागत व श्रम अधिक लगता है. इस यंत्र की अनुमानित कीमत 50,000 रुपए है.

गन्ने की खेती में पावर वीडर

गन्ने की फसल की गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रयोग किया जाने वाला यह यंत्र मानव श्रम में बचत का अच्छा साधन है. इस यंत्र की कीमत 70,000 से एक लाख रुपए तक है, जो डीजल इंजन से संचालित होता है.

इस यंत्र में 2 हत्थे लगे होते हैं. इस मशीन द्वारा किसान एक दिन में तकरीबन एक एकड़ खेत की गुड़ाई आसानी से कर सकता है.

प्रगतिशील किसान राममूर्ति मिश्र ने 2 एकड़ खेत में गन्ना बोया है. वे पावर वीडर के द्वारा गन्ने की खेती में गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण के ऊपर होने वाले मानव श्रम के खर्च में 80 फीसदी कमी लाने में सफल रहे हैं.

उन का कहना है कि पावर वीडर से गुड़ाई करने में प्रतिघंटा एक लिटर डीजल की खपत है, जिस पर महज 300 रुपए खर्च होता है और श्रमिकों से गुड़ाई कराने में एक एकड़ में 25 श्रमिकों की जरूरत पड़ती है, जिस पर तकरीबन 10,000 रुपए का खर्चा आता है. इस तरह न केवल किसान मशीनों का प्रयोग कर गन्ने की खेती को आसान बना सकते हैं, बल्कि लाभदायक भी बना सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए इस पते पर संपर्क कर सकते हैं :

सूरत सिंह, श्रीजी हैवी प्रोजैक्ट वर्क्स लि., शुगर केंद्र्र क्राप सोल्यूशन, ए-504, अंधेरीकुर्ला रोड, अंधेरी ईस्ट मुंबई-400049, मोबाइल नंबर  है: 9416853266.

पराली से प्रदूषण जमीनी स्तर पर हो काम तभी फायदे में होगा किसान

हमारे देश की राजधानी दिल्ली व आसपास के इलाकों में पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को लेकर खूब होहल्ला मचा. यह केवल इसी साल की बात नहीं है, पिछले कई सालों से धान की कटाई होने के बाद और इसे जलाने को ले कर प्रदेश की सरकारों में एकदूसरे पर आरोप लगाने का दौर चलता है और देश की अदालत को भी इस में अपना दखल देना पड़ता है. आखिरकार नतीजा भी कुछ खास नहीं निकलता और समय के साथ और मौसम में बदलाव होने पर यह मामला अपनेआप खत्म हो जाता है.

हां, इस प्रदूषित वातावरण के माहौल को ले कर राजनीतिक दलों में जरूर बन आती है, जो एकदूसरे पर कीचड़ उछालने का काम करते हैं और लेदे कर निशाना किसानों को बनाते हैं.

पराली प्रदूषण को ले कर देश की राजधानी दिल्ली में नियम लागू कर दिए जाते हैं, जिस में आम जनता जरूर परेशान होती है, पर नतीजा नहीं निकलता. भवन निर्माण जैसे कामों पर रोक लगा दी जाती है. इस का फायदा वे सरकारी कर्मचारी उठाते हैं, जो लोगों से अच्छीखासी रकम वसूलते हैं और चोरीछिपे यह काम भी चलता है.

प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर भी रोक लगाई जाती है, लेकिन लेदे कर चोरीछिपे वह भी चलती है और जब कभी ऊपर से बड़े अधिकारियों का दबाव आता है तो बिचौलियों के माध्यम से फैक्टरी मालिकों को पहले ही आगाह कर दिया जाता है कि फलां दिन फलां समय अधिकारियों का दौरा है, इसलिए फैक्टरियां बंद रखें.

कहने का मतलब है कि सरकार का काम नियम बनाना है, लेकिन उस को अमलीजामा पहनाना सरकारी मुलाजिमों का काम है, इसलिए सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, चाहे वे आम आदमी हो या सरकारी मुलाजिम, सरकार हो या किसान, तभी इस तरह की समस्या का समाधान संभव है.

किसानों का कहना है कि धान की फसल कटाई और गेहूं बोआई के बीच का समय कम रहा है और सभी किसानों के पास ऐसे संसाधन नहीं हैं जो पराली को इतने कम समय में ठिकाने लगा सकें. ज्यादातर किसानों की पहुंच ऐसे कृषि यंत्रों या ऐसी तकनीक तक नहीं है, जो पराली नष्ट करने में काम आते हैं.

पराली की खाद बनाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने अनेक तरीके बताए हैं. उस की जानकारी भी समय पर किसानों तक नहीं पहुंच पाती. इस दिशा में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा पराली से खाद बनाने के लिए वेस्ट डीकंपोजर व पूसा संस्थान, नई दिल्ली द्वारा कैप्सूल बनाए हैं, जिन में बहुत ज्यादा असरकारक बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, जो तय समय में पराली को सड़ा कर खाद बनाने का काम करते हैं.

4 कैप्सूल से 1 एकड़ की पराली बनेगी खाद

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली के कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कैप्सूल तैयार किया है, जिस की कीमत महज 5 रुपए है. इस के 4 कैप्सूल ही एक एकड़ खेत की पराली को खाद बनाने में सक्षम है. इस के इस्तेमाल से पराली की खाद तो बनती ही है, इस के अलावा जमीन में नमी भी बनी रहती है. यह कैप्सूल जो एक तरफ तो पराली को सड़ा कर खाद बनाते हैं, वहीं दूसरी तरफ खेत की मिट्टी को उपजाऊ भी बनाते हैं.

कैसे इस्तेमाल करें 

कृषि वैज्ञानिक युद्धवीर सिंह के मुताबिक, सब से पहले हमें 150 ग्राम पुराना गुड़ लेना है. उसे पानी में उबालना है. उबालते समय उस में जो भी गंदगी आती है, उसे निकाल कर फेंक देना है. फिर उस घोल को ठंडा कर के लगभग 5 लिटर पानी में घोल देना है. इस में लगभग 50 ग्राम बेसन भी घोल कर मिला दें. इस के बाद इस में पूसा संस्थान से खरीदे गए 4 कैप्सूलों को खोल कर उसी घोल में मिला दें. इस काम के लिए बड़े आकार यानी चौड़ाई वाला प्लास्टिक या मिट्टी का बरतन लेना है.

अब इस घोल को हलके गरमाहट वाले किसी स्थान पर लगभग 5 दिनों के लिए रख दें. अगले दिन इस घोल की ऊपरी सतह पर एक परत जम जाएगी. इस परत को डंडे की मदद से उसी घोल में फिर मिला देना है. यह प्रक्रिया लगातार 5 दिनों तक करनी है. इस तरीके से आप का कंपोस्ट घोल तैयार हो जाएगा. यह

5 लिटर घोल लगभग 10 क्विंटल पराली को खाद बनाने के लिए काफी है.

अब इस तैयार घोल को आप खेत में फैली पराली पर छिड़क दें. फिर खेत में रोटावेटर चला दें. लगातार 20-25 दिनों में पराली की खाद बन जाएगी. इस के अलावा सिंचाई द्वारा भी इस घोल को पानी में डाल सकते हैं. यह घोल समान रूप से पानी में मिल कर पराली वाले खेतों में पहुंच जाए. 20-25 दिनों में ही पराली को खाद में बदल देते हैं.

कृषि यंत्रों का होना जरूरी

Paraliइस काम में कृषि यंत्रों का होना बेहद जरूरी है जो पराली को खेत में मिला सके. उन्नत किस्म के कृषि यंत्रों को किसानों तक पहुंचाने के लिए कस्टम हायरिंग सैंटर बनाए गए हैं, जिन्हें किसान समितियों द्वारा मिल कर चलाया जा रहा है. इस स्कीम के तहत 80 फीसदी अनुदान पर यह यंत्र किसानों की समितियों को मुहैया कराए जाते हैं, जिन्हें किसान अपनी खेती में तो इस्तेमाल करेंगे ही, बल्कि दूसरे किसानों के लिए भी यंत्र किराए पर दे सकेंगे.

पराली में काम आने वाले यंत्रों में मल्चर, एमबी प्लाऊ, रोटावेटर व सीडर है, जो पराली को काट कर मिट्टी में दबा देते हैं या अवशेषों को जमीन में दबा देते हैं. जीरो टिलेज या हैप्पी सीडर जैसे यंत्र से धान के कटने के बाद खेत में गेहूं की सीधे बोआई कर सकते हैं. हैप्पी सीडर यंत्र धान की पराली को छोटेछोटे टुकड़ों में काट कर खेत में मिला देता है, जिस की खाद बन जाती है और साथ ही, गेहूं की बोआई भी करता है. इस तरीके से किसान के एकसाथ 2 काम हो जाते हैं.

क्या कहते हैं कृषि मंत्री

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि प्रदूषण एक बहुत बड़ी समस्या है औैर चिंता की बात है. सभी लोग इस मसले पर गंभीर हैं खासकर दिल्ली व एनसीआर में बुरे हालात बने हैं. इस सिलसिले में पराली प्रोसैस के लिए कृषि मंत्रालय ने एक स्कीम तैयार की है. इस के तहत किसानों को अनुदान पर ऐसे कृषि यंत्रों को उपलब्ध कराया जा रहा है, जो इस समस्या के समाधान का सहायक है.

20 रुपए में वेस्ट डीकंपोजर से खाद

20 रुपए में मिलने वाले इस वेस्ट डीकंपोजर को गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में स्थित नैशनल सैंटर औफ आर्गेनिक फार्मिंग द्वारा तैयार किया गया है. इस के इस्तेमाल से लगभग 30 से 40 दिनों में यह पराली की खाद बना देता है.

यह वेस्ट डीकंपोजर पर्यावरण और किसान दोनों के लिए फायदेमंद है. खाद बनाने के साथसाथ खेत की मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और दीमक वगैरह में भी खेत का बचाव करता है और खेत में नमी बनाए रखता है.

इस का इस्तेमाल करने के लिए एक बडे़ प्लास्टिक के ड्रम में 200 लिटर पानी भर लें और इस में डीकंपोजर की डब्बी को खोल कर मिला दें. इसे किसी छायादार जगह पर रख लें. फिर 3 दिनों तक इस घोल को सुबहशाम रोज डंडे से मिला दिया करें. इस के बाद 11-12 दिनों तक इसे ऐसे ही छोड़ दें. यह घोल तैयार हो जाएगा औैर अच्छे नतीजों के लिए इस घोल को बनाते समय इस में गुड़ व बेसन भी मिला सकते हैं.

तैयार इस घोल को पहले की तरह ही पानी के जरीए खेत में पहुंचाना है, जो पराली को सड़ा कर खाद बना देगा.

कृषि यंत्र पैडी स्ट्रा चौपर

हार्वेस्टर मशीनें धान की कटाईर् में खेत की सतह से लगभग 1 फुट की ऊंचाई पर करती हैं, बाकी फसल अवशेष खेत में खड़ा रह जाता है जो किसानों के लिए समस्या बन जाता है. इस के समाधान के लिए पैडी स्ट्रा चौपर यंत्र है जो खेत में खड़ी पराली को छोटेछोटे टुकड़ों में काट देता है. इस यंत्र को ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर चलाया जाता है. यंत्र की कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपए है.