बड़े काम की खेती की मशीनें

पशु ताकत का इस्तेमाल खेती के कामों में दिनोंदिन कम हो रहा है, जिस के चलते इंजन, ट्रैक्टर, पावर टिलर व मोटरों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन ऐसा कहना ठीक होगा कि देश में सभी पावर साधनों का इस्तेमाल होता रहेगा.

खेती की मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक लंबी योजना तैयार कर के उसे लागू करना होगा. मौजूदा संसाधनों व सामाजिक और माली हालात को ध्यान में रखते हुए छोटे किसानों को सही फार्म मशीनरी के चुनाव पर ज्यादा बल देना होगा. देश के ज्यादातर किसान छोटे किसानों की कैटीगरी में आते हैं, जो ज्यादा पावर वाले व कीमती ट्रैक्टरों को नहीं खरीद सकते.

अगर बीज की बोआई और रोपाई वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो पैदावार में औसतन 15 फीसदी की बढ़वार होती है. अगर खरपतवार की रोकथाम, कटाईमड़ाई, सिंचाई और धान या गेहूं व दलहनी फसलों की मड़ाई में वैज्ञानिक तकरीकों को अपनाया जाए तो पैदावार में काफी बढ़ोतरी हो सकती है.

मशीनीकरण व पावर के इस्तेमाल से पैदावार का सीधा संबंध है. भारतीय खेती में पशु पावर और खेतिहर मजदूर शामिल हैं. फिर भी छोटे व मध्यम दर्जे के किसानों के लिए यह पावर पूरी नहीं है. अगर प्रति हेक्टेयर मुहैया पावर को देखा जाए तो विकसित देशों के मुकाबले अभी भी हम काफी पिछड़े हुए हैं.

आधुनिक फार्म मशीनरी के इस्तेमाल से ज्यादातर खेतों से साल में कम से कम 2 फसलें लेना मुमकिन हो गया है. इस के साथसाथ बढि़या मशीनों, बीज व खाद को सही गहराई और दूरी पर डाल कर किसान पैदावार बढ़ाने में काबिल हो सकते हैं. प्रसार व ट्रेनिंग की कमी से किसानों में खेती की मशीनों के प्रति जानकारी की कमी, समय पर बैंकों से लोन हासिल न होना और अच्छी फार्म मशीनरी का समय पर मुहैया न होना वगैरह कुछ ऐसी वजहें हैं, जिन से फार्म मशीनरी का फायदा किसानों को नहीं मिल पा रहा है.

खेती में मशीनों की बढ़ती हुई मांग को देखते हुए ज्यादातर मशीनरी बनाने वाले किसानों को अच्छे ट्रैक्टर व फार्म मशीनरी मुहैया कराने में मददगार हो रहे हैं. किसानों के लिए आधुनिक फार्म मशीनरी मुहैया कराने व मशीनों की मरम्मत व देखभाल की सुविधा देने के लिए पूरे देश में ग्रामीण कारीगर हैं. इन ग्रामीण कारीगरों को मरम्मत की आधुनिकतम सुविधा मुहैया कराने की जरूरत है.

खेती की पैदावार बढि़या मशीनों से कई गुना बढ़ाई जा सकती है जो ताकत का जरीया, अच्छे काम, काम करने वाले की थकान में कमी को ध्यान में रख कर मुमकिन हो सकता है. बहुत सी सरकारी व प्राइवेट कंपनियां और विश्वविद्यालय लगातार फार्म मशीनरी में सुधार का काम कर रहे हैं जो कि इनसानी थकान को कम व भविष्य में खेती के काम को पूरी तरह मशीनी तरीके से करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

बढि़या मशीनों द्वारा कम समय, पैसा, मेहनत और ऊर्जा का इस्तेमाल कर असरदार तरीके से कम थकान व बिना किसी नुकसान के खेती के काम को अंजाम दिया जा सकता है.

Machineहालांकि किसान बढि़या बीज, खाद, फसल हिफाजत के तरीके, सिंचाई व ताकत का इस्तेमाल कर के पैदावार को बढ़ा रहे हैं, लेकिन अभी भी खेती की मशीनों का इस्तेमाल जानकारी की कमी में कम ही कर रहे हैं. नई व बढि़या मशीनों का इस्तेमाल कर के फसलों की पैदावार को काफी तक बढ़ाया जा सकता है.

हमारे देश में खेत छोटेछोटे हैं. खेतों का आकार छोेटा होने की वजह से किसान बड़ीबड़ी व ज्यादा कीमती मशीनें खरीदने और उन का इस्तेमाल करने में नाकाम हैं.

फार्म मशीनरी का इस्तेमाल खेत और दूसरी बातों पर निर्भर करता है. बीज, खाद व कैमिकल बहुत ही खर्चीले तरीके हैं, जिन का इस्तेमाल कर के पैदावार ज्यादा की जाती है.

इस बात को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी हो गया है कि सुधरे व विकसित फार्म मशीनरी का इस्तेमाल किया जाए जो कि बीजों की बोआई की दर पर जरूरत के मुताबिक कंट्रोल व खेत में बोआई समय से करें.

इनसान व पशु पावर स्रोत पर निर्भरता को कम करने के लिए यह जरूरी है कि खेती के कामों को पूरा करने के लिए आधुनिक फार्म मशीनरी का इस्तेमाल किया जाए.

साल 2000-01 में पशु पावर 16.38 फीसदी तक कम हुई व मशीनी पावर में 83.62 की बढ़ोतरी साल 1971-72 के मुकाबले में हुई है. प्रति हेक्टेयर खेती के मजदूरों की संख्या में 0.82-1.44 फीसदी की बढ़वार हुई है, लेकिन फिर भी प्रति हेक्टेयर खेती के मजदूरों की प्रति घंटे पिछले सालों में कई फसलों के लिए कमी पाई गई है.

यह अनुमानित किया गया है कि कुल ऊर्जा का 66-80 फीसदी हिस्सा ग्रामीण इलाकोें में घरों की देखभाल और 16-25 फीसदी खेती उत्पादन में इस्तेमाल होता है.

बिजली विभाग ने कुल बिजली का तकरीबन 85 फीसदी गांवों को मुहैया किया है. खेती में मशीनीकरण का हिस्सा तकरीबन 9-10 फीसदी तक है. खेती हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है जो कि कुल पैदावार का तकरीबन 25 फीसदी है.

पिछले 10 दशकों में फार्म मशीनरी का इस्तेमाल बहुत ही ज्यादा हुआ है. आज के समय में तकरीबन 126 लाख से अधिक ट्रैक्टर, लगभग 9650 कंबाइन, 38.8 लाख से अधिक थ्रेशर व 168 लाख से अधिक सिंचाई के पंप हैं. फार्म मशीनरी कई खेती के कामों जैसे जुताई, बोआई, फसल हिफाजत व गहाई, जोकि तकरीबन 41 फीसदी, 30 फीसदी, 35 फीसदी तक हर किसी के लिए है.

इन बातों को ध्यान में रखते हुए यह बहुत जरूरी है कि बढि़या फार्म मशीनरी को गंवई इलाके में खेती के कामों के लिए इस्तेमाल किया जाए, जिस से उत्पादकता को ज्यादा व फसलों की पैदावार में लगने वाले माली बजट को कम किया जाए.

सरकार द्वारा छोटे और मध्यम कैटीगरी के फार्म मशीनरी बनाने वाले को काफी सुविधाएं दी जा रही हैं. कईर् निर्माता किसानों के लिए ट्रेनिंग का भी प्रावधान रखते हैं, जिस से किसानों को फार्म मशीनरी के इस्तेमाल, देखभाल और मरम्मत की जानकारी हो सके.

पोटैटो डिगर से आलू की खुदाई

हमारे देश के कई हिस्सों में आलू की खुदाई शुरू हो चुकी है. लेकिन इस बार भी आलू की बंपर पैदावार के चलते किसानों को आलू की सही कीमत नहीं मिल पा रही है. यही वजह है कि कुछ किसानों ने तो कुछ दिनों के लिए अपने खेत से आलू की खुदाई रोक दी है. उन्हें इंतजार है कि आलू का बाजार भाव कुछ ठीक हो तो खुदाई करें.

हालांकि आलू की अगेती खेती लेने वाले किसान अपने खेत में आलू की फसल लेने के तुरंत बाद गेहूं की बोआई कर देते हैं. अभी जो बाजार में आलू आ रहा है, वह कच्चा होता है. उस का छिलका भी हलका रहता है, इसलिए इस में टिकाऊपन नहीं होता. इसे स्टोर कर के नहीं रखा जाता.

फरवरी महीने तक आलू पूरी तरह से तैयार होता है. इसे किसान बीज के लिए व आगे बेचने के लिए भी कोल्ड स्टोरेज में रखते हैं. इस के लिए किसान आलू की अलगअलग साइजों में छंटाई कर ग्रेडिंग कर के रखें, तो अच्छे दाम भी मिलते हैं और आगे के लिए स्टोर करने के लिए सुविधा रहती है.

आलू की फसल आने के बाद उस के रखरखाव की भी खासा जरूरत होती है, क्योंकि आलू को खुला रखने पर उस में हरापन आ जाता है.

आलू की फसल तैयार होने के बाद आलू की खुदाई मजदूरों द्वारा और आलू खुदाई यंत्र (पोटैटो डिगर) से की जाती है. हाथ से खुदाई करने पर काफी आलू कट जाते हैं और मंडी में आलू की सही कीमत नहीं मिलती है.

इसी काम को अगर आलू खोदने वाली मशीन से किया जाए, तो कम समय में आलू की खुदाई कर सकते हैं. मशीन के द्वारा आलू खुदाई करने पर आलू साफसुथरा भी निकलता है. उस के बाद आने वाली फसल की बोआई भी समय पर कर सकते हैं.

आलू की फसल खुदाई करने लायक होने पर आलू के पौधों को ऊपर से काट दें या उस पर खरपतवारनाशी दवा का छिड़काव कर दें, ताकि पौधों के पत्ते सूख जाएं और फसल की खुदाई ठीक से हो सके.

आलू खुदाई यंत्र

केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल द्वारा तैयार आलू खुदाई यंत्र एकसाथ 2 लाइनों की खुदाई करता है. इस यंत्र में 2 तवेदार फाल लगे होते हैं, जो मिट्टी को काटते हैं. इस में नीचे एक जालीदार यंत्र भी लगा होता है, जो मिट्टी में घुस कर आलू को मिट्टी के अंदर से निकाल कर बाहर करता है. साथ ही, इस यंत्र पर एक बैड लगा होता है, जिस पर जाल के घेरे से आलू निकल कर गिरते हैं.

यह बैड लगातार हिलता रहता है. इस बैड के हिलने से मिट्टी के ढेले टूट कर गिरते रहते हैं और साफ आलू खेत में मिट्टी की सतह पर गिरते हुए निकलते हैं. इस के बाद मजदूरों की सहायता से आलुओं को बीन कर खेत में जगहजगह इकट्ठा कर लिया जाता है.

संस्थान द्वारा निर्मित पोटैटो डिगर को 35 हौर्सपावर के ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर चलाया जाता है. एक हेक्टेयर जमीन की आलू खुदाई में 3 घंटे का समय लगता है और 12 लिटर डीजल की खपत होती है.

इस यंत्र की अधिक जानकारी के लिए आप केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, नवी बाग, भोपाल से संपर्क कर सकते हैं या आप अपने नजदीकी कृषि विभाग से भी आलू खुदाई यंत्र के बारे में जानकारी ले सकते हैं.

महेश एग्रो का पोटैटो डिगर

महेश एग्रो वर्क्स के पोटैटो डिगर में 56 इंच और 42 इंच के बैड लगे होते हैं. 2 लाइनों में आलुओं की खुदाई होती है. 45 हौर्सपावर के ट्रैक्टर में आलू खुदाई यंत्र को जोड़ कर चलाया जा सकता है.

प्रकाश पोटैटो डिगर

यह मशीन भी सभी प्रकार के आलू खुदाई के लिए उत्तम है. 35 हौर्सपावर या उस से अधिक क्षमता वाले ट्रैक्टर के साथ इसे चलाया जाता है. मशीन में डबल जाल लगा होने के कारण आलू भी साफसुथरा निकलता है.

नवभारत इंडस्ट्रीज के प्रकाश ब्रांड के कृषि यंत्र आज भी खेती के क्षेत्र में अच्छी पकड़ बना रहे हैं.

इस के अलावा अनेक पोटैटो डिगर बाजार में मौजूद हैं. इस के लिए आप कृषि विभाग या अपने नजदीकी कृषि यंत्र निर्माता से पता कर सकते हैं.

उत्तराखंड की जमरानी परियोजना

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति (सीसीईए) ने जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग के प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना-त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (पीएमकेएसवाई-एआईबीपी) के तहत उत्तराखंड की जमरानी बांध बहुद्देशीय परियोजना को शामिल करने की मंजूरी दे दी है.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मार्च, 2028 तक 2,584.10 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाली परियोजना को पूरा करने के लिए उत्तराखंड को 1,557.18 करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता को मंजूरी दी है. इस परियोजना में उत्तराखंड के नैनीताल जिले में राम गंगा नदी की सहायक नदी गोला नदी पर जमरानी गांव के पास एक बांध के निर्माण की परिकल्पना की गई है. यह बांध मौजूदा गोला बैराज को अपनी 40.5 किलोमीटर लंबी नहर प्रणाली और 244 किलोमीटर लंबी नहर प्रणाली के माध्यम से पानी देगा, जो वर्ष 1981 में पूरा हुआ था.

इस परियोजना में उत्तराखंड के नैनीताल और उधम सिंह नगर जिलों और उत्तर प्रदेश के रामपुर और बरेली जिलों में 57,065 हेक्टेयर (उत्तराखंड में 9,458 हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश में 47,607 हेक्टेयर) की अतिरिक्त सिंचाई की परिकल्पना की गई है. 2 नई फीडर नहरों के निर्माण के अलावा 207 किलोमीटर मौजूदा नहरों का नवीनीकरण किया जाना है और परियोजना के तहत 278 किलोमीटर पक्के फील्ड चैनल भी क्रियान्वित किए जाने हैं. इस के अलावा इस परियोजना में 14 मेगावाट की जल विद्युत उत्पादन के साथसाथ हल्द्वानी और आसपास के क्षेत्रों में 42.70 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) पीने के पानी के प्रावधान की भी परिकल्पना की गई है, जिस से 10.65 लाख से अधिक आबादी लाभान्वित होगी.

परियोजना के सिंचाई लाभों का एक बड़ा हिस्सा पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश को भी होगा. दोनों राज्यों के बीच लागत/लाभ साझाकरण 2017 में हस्ताक्षरित एक समझौता ज्ञापन के अनुसार किया जाना है. हालांकि पीने का पानी और बिजली लाभ उपलब्ध होंगे. ये पूरी तरह से उत्तराखंड के लिए ही परिकल्पित हैं.

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) : यह सिंचाई योजना वर्ष 2015-16 के दौरान शुरू की गई थी, जिस का उद्देश्य खेत पर पानी की पहुंच को बढ़ाना और सुनिश्चित सिंचाई के तहत खेती योग्य क्षेत्र का विस्तार करना, खेत में पानी के उपयोग की दक्षता में सुधार करना, स्थायी जल संरक्षण पद्धतियों को लागू करना आदि है.

भारत सरकार ने दिसंबर, 2021 में वर्ष 2021-26 के दौरान पीएमकेएसवाई के कार्यान्वयन को 93,068.56 करोड़ रुपए (37,454 करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता) के समग्र परिव्यय के साथ मंजूरी दी थी.

पीएमकेएसवाई का त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी) घटक प्रमुख और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं के माध्यम से
सिंचाई क्षमता के निर्माण से संबंधित है.
पीएमकेएसवाई-एआईबीपी के तहत अब तक 53 परियोजनाएं पूरी की जा चुकी हैं और 25.14 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता सृजित हुई है. वर्ष 2021-22 के बाद पीएमकेएसवाई के एआईबीपी घटक के अंतर्गत अब तक 6 परियोजनाओं को शामिल किया गया था. जमरानी बांध बहुद्देशीय परियोजना एआईबीपी के अंतर्गत शामिल होने वाली 7वीं परियोजना है.

उन्नत तकनीकी के समावेश से उत्पादन लागत करें कम

गांव में आज भी कृषि ही आजीविका का मुख्य साधन है. लगातार हो रहे अनुसंधान और नई किस्मों के आने से कृषि के स्तर में विकास हुआ है, लेकिन अब किसानों को खाद, बीज, दवाइयों, कृषि औजारों, पानी, बिजली आदि पर अधिक खर्च करना पड़ रहा है.

खेती आज किसान के लिए घाटे का सौदा होती जा रही है, इसलिए इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. भविष्य को ध्यान में रखते हुए, इस को मुनाफे में बदलने की आवश्यकता है.

भारत में कृषि पर सब्सिडी 10 फीसदी से भी कम है. अमेरिका व अन्य देशों में कृषि सब्सिडी भारत की अपेक्षा ज्यादा है. वहां उन्नत तकनीक के कारण उत्पादन लागत भी कम आती है यही कारण है कि विदेशी वस्तुएं भारतीय वर्षों की अपेक्षा काफी सस्ती होती है.

अप्रैल 2005 से विश्व व्यापार संगठन की संधि पूरी तरह से लागू होने से पूरे विश्व की कृषि एक बड़ी मंडी का रूप धारण कर चुकी है. वहीं वर्तमान सरकार ने भी किसानों की आमदनी दुगनी करने के लिए कई कदम उठाए हैं. उन का लाभ भी किसानों को मिल रहा है ऐसी स्थिति में किसानों के लिए जरूरी है कि वे अंतरराष्टीय कृषि प्रतिस्पर्धा में कम लागत से अधिक उत्पादन ले कर उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार करें जिस से विश्व बाजार में अच्छा मूल्य मिल सके और उन की साख भी बनी रहे.

यहां पर बताई जा रही विविध तकनीकों को अपना कर अधिक उपज ग्रहण कर सकते हैं जिस से किसान की लागत कम आएगी और मुनाफा बढ़ेगा.

मिट्टी की जांच कराएं

खेती करने से पहले खेत की मिट्टी की प्रयोगशाला में जांच अवश्य करानी चाहिए. मृदा रिपोर्ट के आधार पर फसलों का चुनाव करें एवं मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की आवश्यकता के आधार पर खाद व पोषक तत्व डालें. सही जानकारी होने से खर्च में कमी आएगी और मृदा में सुधार होगा, जिस से उत्पादन अच्छा प्राप्त होगा.

प्रमाणित बीजों का करें प्रयोग

बीजों की पारंपरिक विधि को छोड़ कर, किसान प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें. बीज को 2 से 3 ग्राम कार्बंडाजिम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार कर लें. इस से कई बीमारियों से छुटकारा मिलता है. नर्सरी डालने से पहले नर्सरी का उपचार अवश्य कर लें, ज्यादातर बीमारियां और कीड़े नर्सरी से फैलते हैं. पौधे लगाते समय यह ध्यान रखें कि वे रोगी ना हो और उपचारित कर के ही पौधों की रोपाई करें. यदि नर्सरी अच्छी होगी तो निश्चित रूप से फसल भी अच्छी होगी.

उचित समय पर करें बुवाई

किसी भी फसल की सही समय पर बुवाई अति आवश्यक है. यदि किसी कारण से बुआई में देरी हो जाए तो फसल उत्पादन पर खर्चा तो उतना ही जाता है, लेकिन पैदावार जरूर कम हो जाती है. गेहूं की देरी से बुवाई करने पर 4 किलोग्राम प्रति दिन प्रति बीघा की दर से पैदावार में कमी देखी गई है. अगेती और पछेती किस्मों का भी ध्यान रखना चाहिए। वर्षा ना होने पर यदि बुआई में देरी हो जाए तो पछेती किस्मों को लगा कर पूरा लाभ लिया जा सकता है.

सहयोगी फसलें उगाएं

एक ही खेत में एक से अधिक फसलें उगाने की पुरानी परंपरा है, जैसे गेहूंचना एक साथ उगाना. मुख्य फसल की दो पंक्तियों के बीच में जल्दी पकने और बढ़ने वाली फसलें बोई जा सकती हैं. स्तंभ आकार औषधि पौधे जो बड़े हैं, उन के नीचे बेल वाली जैसे करेला आदि की फसलें लगा सकते हैं. छाया की आवश्यकता वाली फसलें अदरक, सफेद मूसली, अश्वगंधा, हल्दी आदि लगा कर अधिकतम भूमि का प्रयोग कर के, उत्पाद की गुणवत्ता के साथसाथ शुद्ध लाभ बढ़ाया जा सकता है. किसी कारणवश एक फसल खराब भी हो जाए तो उस के नुकसान की भरपाई दूसरी फसल की उपज से हो जाती है. अत: जहां तक संभव हो सहफसली खेती पर ध्यान देना चाहिए. आजकल किसान गन्ने के साथ सहफसली खेती ले कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं.

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फसल चक्र में दलहनी फसलों का करें समावेश

लगातार धान गेहूं और आलू की खेती करने से भूमि की उर्वरा शक्ति कमजोर हो जाती है. इसलिए फसल चक्र में दाल वाली फसलें शामिल करने से प्रति बीघा 25 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन खाद की वृद्धि के साथसाथ भूमि की उपजाऊ शक्ति भी बढ़ती है. इसलिए फसल चक्र को जरूर अपनाना चाहिए.

पौधों की उचित संख्या लगाएं

खेत में पौधों की संख्या का उपज पर सीधा असर पड़ता है. बीज की उचित मात्रा और सही गहराई पर बोने से उपज में बढ़ोतरी होती है. छिटकवां विधि से बिजाई ना कर के, लाइनों में बिजाई करनी चाहिए. इस से खरपतवार निकालने में आसानी रहती है और यदि पौधों की संख्या अधिक हो तो उन की छटाई कर के अधिक उपज ली जा सकती है.

संतुलित मात्रा में करें खाद का प्रयोग

किसान जरूरत से अधिक खाद डालते हैं, इस से पैसे का नुकसान होने के साथसाथ कीड़ों तथा बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ जाता है. अधिकतर कृषक सही जानकारी के अभाव में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित मात्रा में प्रयोग न करके एक ही खाद डाल देते हैं. वैज्ञानिकों की सिफारिश के अनुसार खाद डालने के समय मात्रा और विधि का हमेशा ध्यान रखना चाहिए. बुवाई से पहले बीज को बायोफर्टिलाइजर्स से उपचारित कर के नाइट्रोजन फास्फोरस और पोटाश का फसल आवश्यकता की संस्तुति के आधार पर प्रयोग किया जा सकता है. इस के अलावा लोहा, जिंक और मैग्नीशियम आदि सूक्ष्म तत्त्वों का आवश्यकतानुसार प्रयोग करें, जिस से बीमारी और कीड़े कम लगते हैं. इस से कम खर्च में अधिक उत्पादन लिया जा सकता है.

पानी का करें उचित प्रयोग

वर्षा के पानी को इकट्ठा कर के किसान सिंचाई के लिए प्रयोग कर सकते हैं. गहरी जुताई और मेड बंदी से खेत में पानी रोका जा सकता है. कम पानी चाहने वाली किस्मों को बढ़ावा देना चाहिए. वर्षा के पानी को इकट्ठा न कर पाने के अभाव में 50 से 60 प्रतिशत का पानी बेकार चला जाता है. इस से भूमि बंजर और खेती के अयोग्य हो जाती है. आधुनिक सिंचाई के तरीकों में फव्वारा और ड्रिप सिंचाई का फसल और जमीन के अनुरूप इस्तेमाल करना चाहिए, इस से पानी की बचत होती है तथा फसल को उस की आवश्यकतानुसार पानी मिल जाता है.

कंपोस्ट गोबर और हरी खाद का करें प्रयोग

खेतों में घास पात के अवशेषों से कंपोस्ट तैयार की जा सकती है. गोबर की खाद में 0.5 प्रतिशत नाइट्रोजन 0.25 प्रतिशत फास्फोरस और 0.5 प्रतिशत पोटाश की मात्रा होती है, साथ ही भूमि की भौतिक दशा में भी सुधार होता है. वर्ष में एक बार हरी खाद का प्रयोग करने से आगामी फसल में एक तिहाई खाद कम डालनी पड़ती है. गेहूं की कटाई के बाद अप्रैल में 2 से 3 किलोग्राम प्रति बीघा हरी खाद को बो दें और 40 से 50 दिन बाद उस की जुताई कर के अगली फसल उगाएं.

फसल विविधीकरण और समन्वित कृषि प्रणाली को अपनाएं

परंपरागत फसलों से जहां कम आमदनी होती है, वही सब्जी, फलों, मसालों, औषधीय और सुगंधित फसलों की खेती कर के अधिक आय अर्जित की जा सकती हैं. खेती के अतिरिक्त अन्य कार्य से जैसे-पिगरी, पोल्ट्री, मधुमक्खी पालन, रेशम कीट पालन, मछली पालन, मशरूम उत्पादन एक दूसरे के पूरक हैं इन में अतिरिक्त आमदनी होगी उत्पादन लागत में कमी होगी. वैज्ञानिक तरीके अपना कर कम लागत में अधिक पैदावार ली जा सकती है. अधिक उत्पादन की लालसा में किसी के वैज्ञानिक दौर में कृषक अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशक, खरपतवार नाशक, और हारमोंस का प्रयोग कर के प्रदूषण और उत्पादन की गुणवत्ता के साथसाथ अपने धन भी नाश करते हैं. कृषि के बदलते परिवेश में जरूरी है कि ऐसी टिकाऊ खेती करें जिस में उपलब्ध सीमित संसाधनों का कम लागत में प्रयोग कर के उत्तम गुणवत्ता वाला अधिक उत्पादन हो और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर हमारी पकड़ मजबूत हो सके. इन बातों को ध्यान में रख कर यदि हम खेती किसानी करेंगे तो निश्चित रूप से हमें उत्पादन अच्छा प्राप्त होगा और बाजार में उस की कीमत भी अच्छी मिलेगी.

इस के अलावा किसानों को कार्बनिक खेती पर अर्थात प्राकृतिक खेती पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि उस से कम लागत में अच्छा मुनाफा मिल जाता है. इस के लिए वर्मी कंपोस्ट और नीम या मूंगफली आदि की खली के प्रयोग से मिट्टी में जीवाणुओं की वृद्धि होती है. प्राकृतिक पदार्थों में गोमूत्र, नीम, धतूरा और तंबाकू का प्रयोग करें. कीड़ों बीमारियों का समन्वित प्रबंधन रासायनिक दवाओं से करने पर उत्पाद का दाम कम मिलता है, अत: कार्बनिक दवाओं का ही प्रयोग करें. कीड़ों और बीमारियों की रोकथाम के लिए कर्षण क्रियाओं की भौतिक और जैविक विधियों का अधिकतम प्रयोग करना चाहिए. गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें और प्रतिरोधी प्रजातियां ही लगाएं. जीवाणुओं तथा प्राकृतिक भक्षक कीटों का प्रयोग करें. ट्रैप का प्रयोग कर के कीड़ों को एकत्रित कर के नष्ट किया जा सकता है. इस से लागत भी कम आएगी और उत्पाद की कीमत भी अच्छी मिलेगी.

कृषि यंत्रों से करें फसल अवशेष प्रबंधन

फसल कटाई के बाद फसलों की जड़ें खेत में रह जाती हैं, जिन्हें खेत में मिलाना या उखाड़ना मुश्किल काम होता है. इस काम में काफी मेहनत और खर्चा भी होता है. इस फसल अवशेषों का प्रबंधन कृषि यंत्रों से किया जाए, तो किसान के लिए यह काम आसान हो जाता है.

‘शक्तिमान’ के नाम से कृषि यंत्र बनाने वाली ‘तीर्थ एग्रो टैक्नोलौजी’ कंपनी का कहना है कि हाथ से खेत में फसल के डंठल का सफाया करने के लिए प्रति एकड़ 4 एकड़ जनशक्ति की जरूरत पड़ती है. खेत की फसल के डंठल को बाहर खींचने, काटने, जमा करने और सुखाने व जलाने का काम बड़ा मुश्किल है और समय लेने वाला है. साथ ही, यह तौरतरीका ईंधन संसाधनों को बरबाद करने वाला भी है.

मोबाइल श्रेडर

इस काम को आसान बनाने वाला कृषि यंत्र मोबाइल श्रेडर है. इस यंत्र से कटी हुई डंठल, फसल अवशेष खेत में फैला कर मिला सकते हैं. इस के अलावा ट्रौली में भी इकट्ठा कर सकते हैं. ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस मोबाइल श्रेडर से इन कृषि अवशेषों से पेपर पल्प व लकड़ी को औद्योगिक इकाइयों में भी उपयोग में लाया जा सकता है.

यह मोबाइल श्रेडर यंत्र फसल में जड़ों को बारीक काट कर खेत में फैलाने में सक्षम है. नष्ट किए गए फसल अवशेषों से खेत में ही जैविक खाद बनाई जा सकती है, जिस से खेत की मिट्टी में भी सुधार होता है. मिट्टी में नमी बनी रहती है और खेत में घासफूस, खरपतवार की रोकथाम होती है.

इस मोबाइल श्रेडर यंत्र को 40 हौर्सपावर या अधिक पावर वाले टै्रक्टर के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है, जो एक घंटे में एक एकड़ खेत को कवर कर सकता है.

अधिक जानकारी के लिए फोन नंबर 91-2827661637 पर संपर्क कर सकते हैं.

‘रोटरी मल्चर’ बनाए फसल अवशेष का चूरा

धान, गन्ना जैसी फसलों की कटाई के बाद उस में बहुत मात्रा में फसल अवशेष रह जाते हैं, जिन में बहुत से किसान आग लगा देते हैं, जो खेत की मिट्टी के साथसाथ पर्यावरण को भी खराब करते हैं, इसलिए इस तरह के अवशेषों को खेत में न जला कर उन का खेत में ही खाद बना दिया जाए तो वह खेती में जैविक खाद का काम करते हैं, जिस से खेती में होने वाले खर्च में भी कमी आती है और फसल पैदावार भी अच्छी मिलती है.

रोटरी मल्चर से करें यह काम : फसल अवशेषों का बारीक काटने व खेत से निकालने के लिए रोटरी मल्चर बेहतर कृषि यंत्र है. यह फसल के अवशेष, गन्ने के कूड़े को खरपतवार को खेत में ही बारीकबारीक काट कर खेत में मिला देता है. यह खेत में पानी की होने वाली कमी को भी रोकता है. मिट्टी में नमी बनी रहती है. खरपतवार में भी कमी आती है.

सेलर ड्रायर से सुखाएं फूलफल और सब्जियां

देश में फूल पैदा करने वाले किसानों के लिए सूखे फूलों का कारोबार फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि विदेशों में सूखे फूलों की खासी मांग है. उन्हें अनेक तरह की सजावट के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

फूलों को सुखाने के लिए अनेक तरीके हैं, लेकिन इस काम को आधुनिक यंत्रों के जरीए किया जाए तो अच्छे नतीजे मिलते हैं. पारंपरिक तरीके से सुखाए गए फूल अपनी कसौटी पर खरे नहीं उतरते, वे या तो बेडौल हो जाते हैं, रंग में भी हलकापन आ जाता.

आधुनिक तकनीक से फूलों को सुखाने के लिए सोलर ड्रायर का इस्तेमाल किया जा सकता है.

सोलर ड्रायर यंत्र

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के वैज्ञानिक डा. पीके शर्मा के अनुसार, सोलर ड्रायर फूलों को सुखाने का एक आधुनिक यंत्र है. इस के इस्तेमाल से फूलों के रंग और आकार की गुणवत्ता बनी रहती है, जबकि धूप में सुखाए गए फूलों की गुणवत्ता में कमी आ जाती है, क्योंकि बाहरी वातावरण में उतारचढ़ाव होता रहता है, जबकि इस सोलर ड्रायर में तकनीकी रूप से उचित तापमान बना रहता है. इस में फूलों को सुखाने की दर 65 से 70 फीसदी तक ज्यादा पाई गई है.

सोलर ड्रायर की बनावट

फूलों को सुखाने वाला यह यंत्र जस्ते की परत वाली लोहे की चादर, हलके स्टील, लोहे के एंगल, जाली आदि से बनाया हुआ है.

ड्रायर में 2 चैंबर होते हैं, एक हीटिंग चैंबर और दूसरा ड्राइंग चैंबर. ड्राइंग चैंबर में फूलों के भंडारण के लिए 4 भाग बनाए गए हैं और ड्रायर का कुल भंडारण 3.4 वर्गमीटर है.

ड्रायर को ढकने के लिए कांच की शीट लगाई गई है, जिस के द्वारा सूरज की रोशनी अंदर जा कर गरमी पैदा कर सके और इस ड्रायर के अंदरूनी हिस्से को काले रंग से रंग दिया गया है, जिस से वह ज्यादा से ज्यादा गरमी ले सके.

कृषि वैज्ञानिक पीके शर्मा के अनुसार, यह ड्रायर सौर ऊर्जा से चलने वाला यंत्र है. इस के अंदर छोटेछोटे आकार के काले रंग में रंगे गए गोल पत्थर भी रखे गए हैं. चैंबर की गरमी बढ़ाने में एग्जौस्ट फैन भी लगाए हैं जो अंदर की नमी को बाहर निकालते हैं. मौसम में धूप न होने के समय या रात के समय भी इस में गरमी बनी रहती है.

आमतौर पर खुले हुए मौसम में पारंपरिक तरीके से गुलाब के फूलों को सुखाने में तकरीबन 54-55 घंटे लगते हैं, वहीं सोलर ड्रायर द्वारा इन को 33 घंटों में ही सुखाया जा सकता है.

इसी तरह गेंदे के फूल को धूप में सुखाने पर 48 घंटे लगते हैं, वहीं सोलर ड्रायर से महज 27 घंटे में सुखाया जा सकता है. इस तकनीक से सुखाए गए फूलों की अच्छी गुणवत्ता बनी रहती है.

सोलर ड्रायर से फूलों के अलावा उन्हें टहनियों सहित भी सुखाया जाता है. उन्हीं की ज्यादा मांग होती है. फूल सुखाने में सावधानी जरूर बरतें, जिस से उन का रंग, आकार बना रहे.

इस तरह के फूलों का इस्तेमाल घर की सजावट, ग्रीटिंग कार्ड, कलैंडर, वाल हैंगिंग जैसी सामग्री बनाने के लिए होता है.

इस सोलर ड्रायर से दूसरी फलसब्जियां व औषधीय फसलों को सुखा सकते हैं. इस यंत्र में खास बात है कि तय तापमान पर तय समय पर सही तरह से इन चीजों को सुखाया जा सकता है.

फसल कटाई में कृषि यंत्रों का इस्तेमाल

फसल की कटाई किसान खुद करते हैं या फिर मजदूरी दे कर फसल को कटवाते हैं. इस के अलावा अब कई तरह की मशीनें भी लोगों के पास आ गई हैं, जिन से फसल कटवाना और भी आसान हो गया है. मशीनों से काम करने पर समय भी काफी कम लगता है.  रीपर, कंबाइन व हारवेस्टर वगैरह ऐसी ही मशीनें हैं.  बड़े पैमाने पर धान व गेहूं की खेती करने वाले किसान हार्वेस्टर जैसे बड़े कृषि यंत्रों का उपयोग करते हैं. लेकिन मझले व कम जोत वाले किसानों के लिए भी अनेक कृषि यंत्र मौजदू हैं.

बीसीएस आटोमैटिड रीपर (स्वचालित) :

यह रीपर यंत्र फसल की कटाई करने के साथसाथ उस के बंडल भी बनाता है. इस यंत्र के इस्तेमाल से मजदूरों की काफी बचत हो जाती है. इस रीपर यंत्र से धान, सोयाबीन, धनिया, हरा चारा वगैरह भी काट सकते हैं.

इस यंत्र में 10 हौर्सपावर का इंजन लगा होता है. यह मशीन एक घंटे में तकरीबन एक एकड़ फसल को काट कर उस के बंडल भी साथसाथ बांध देती है. इतने काम में ईंधन खपत एक लिटर प्रति एकड़ होती है.

इस मशीन को चलाना बेहद आसान है. इस पर एक ही आदमी बैठ कर आराम से फसल काट सकता है. इस में कुल 5 गियर होते हैं जिस में 4 गियर आगे और एक गियर पीछे के लिए लगा होता है.

इस के अलावा बीसीएस कंपनी का ट्रैक्टरचालित रीपर बाइंडर भी आता है. इस की कुछ अधिक कीमत है. ये यंत्र सभी छोटेबड़े शहरों में मिल सकते हैं.

ज्यादा जानकारी के लिए आप बीसीएस कृषि यंत्र निर्माता कंपनी के मोबाइल नंबर  09872874743 / 09872874745 पर बात कर सकते हैं.

कामको पावर रीपर :

इस के 2 मौडल हैं. पहला मौडल केआर 120 एच है. इन्हें पैट्रोल व डीजल दोनों से चलाया जा सकता है. पैट्रोल से ईंधन की खपत 800 मिलीलिटर प्रति घंटा है, वहीं डीजल से चलाने पर ईंधन की खपत अधिक होती है. यह 2 घंटे में एक एकड़ फसल की कटाई करता है. यह जमीन से 5 सैंटीमीटर से 25 सैंटीमीटर की ऊंचाई तक यानी 1.2 मीटर की चौड़ाई में फसल की कटाई करता है.

अशोका रीपर बाइंडर :

इस यंत्र को 35 हौर्सपावर से 40 हौर्सपावर के ट्रैक्टर के साथ आसानी से जोड़ कर चलाया जाता है और 3 घंटे में एक हेक्टेयर फसल की कटाई के साथसाथ बंधाई भी करता है.

इस यंत्र में हाइड्रोलिक सिस्टम होने के कारण इस यंत्र को अपनी सुविधानुसार ऊपरनीचे किया जा सकता है. मशीन को ट्रैक्टर के साथ जोड़ने के बाद कटाई करते समय 5 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक चलाया जा सकता है.

ज्यादा जानकारी के लिए आप कंपनी के मोबाइल नंबर 09412636370 पर जानकारी ली जा सकती है.

सरदार रीपर :

अनेक फसलों की कटाई करने वाला इन का मल्टीक्रौप सुपर डीलक्स मौडल 841 है. ज्यादा जानकारी के लिए आप मोबाइल नंबर 9814447143 पर बात कर सकते हैं.

इन कृषि यंत्र निर्माताओं के अलावा अनेक लोग ऐसे यंत्र बना रहे हैं, जिन में गुरु पावर रीपर, किसान क्राफ्ट, लोहन पावर रीपर वगैरह हैं. आप अपने नजदीकी कृषि यंत्र विक्रेता या नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से भी रीपर से जुड़ी जानकारी ले सकते हैं.

धान की कटाई और रखरखाव

देश में लगभग 50 फीसदी से ज्यादा  लोग चावल का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन धान की कटाई से ले कर उस का सही ढंग से रखरखाव करने तक लगभग 10 फीसदी धान का नुकसान किसानों को होता है. इस की सब से बड़ी वजह किसानों को सही जानकारी न होना है.

फसल की कटाई और इस के बाद होने वाले नुकसान को कम करने की जरूरत आज के समय में पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है.

आमतौर पर देखा जाता है कि कटाई, मड़ाई, सुखाना और फिर फसल को रखने के दौरान नुकसान ज्यादा होता है. इस नुकसान से बचने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाना जरूरी है. इन्हीं कुछ तरीकों के बारे में हम आप को बता रहे हैं, जिस से आप की मेहनत की कमाई बेकार न जाए.

धान की कटाई

Farming Machines

 

 

 

 

 

 

 

धान की कटाई किसान खुद करते हैं या फिर मजदूरी दे कर फसल को कटवाते हैं. इस के अलावा अब कई तरह की मशीनें भी लोगों के पास आ गई हैं, जिन से फसल कटवाना और भी आसान हो गया है. मशीनों से काम करने पर समय भी काफी कम लगता है.  रीपर, कंबाइन व हारवेस्टर वगैरह ऐसी ही मशीनें हैं. मजदूरों से फसल की कटाई कराने में इसलिए ज्यादा समय लगता है, क्योंकि मजदूर धान की कटाई पारंपरिक तरीके यानी हंसिया से करते हैं. इस में ज्यादा समय लगता है, लेकिन फायदा भी ज्यादा होता है.

मशीनों में रीपर और ट्रैक्टर से चलने वाला यंत्र कंबाइन का इस्तेमाल धान की कटाई में किया जाता है. मशीन धान काट कर लाइन में लगा देती है, जिसे बाद में इकट्ठा करने में आसानी रहती है. कंबाइन यंत्र से धान की कटाई जमीन से काफी ऊपर से की जाती है और कटाई के साथसाथ मड़ाई और ओसाई भी हो जाती है. कटाई की कंबाइन मशीनें कई तरह की आती हैं, कुछ सस्ती और कुछ महंगी भी. कंबाइन से धान की कटाई में पुआल का नुकसान होता है और काफी धान टूट भी जाता है.

धान टूटने से किसानों को उस की सही कीमत नहीं मिल पाती, जिस से बाजार कीमत से कम में धान बेचना किसानों की मजबूरी बन जाती है, लेकिन कंबाइन यंत्र से कटाई काफी जल्दी होती है, जिस से समय की बचत होती है और लागत भी कम आती है.

धान की मड़ाई व ओसाई

धान कीबालियों यानी पुआल से बीजों को अलग करना मड़ाई कहलाता है. मड़ाई का काम मजदूरों, पशुओं और मशीनों से भी किया जाता है. मड़ाई का काम फसल कटाई के बाद जितनी जल्दी हो सके कर लेना चाहिए.

मड़ाई के लिए तारों से बने ड्रम का भी इस्तेमाल होता है. धान के पौधों को ड्रम पर इस तरह रखा जाता है कि बालियां तार को छूती रहें और ड्रम को पैर से घुमाया जाता है.

मड़ाई के बाद धान के बीजों के साथ भूसा, धूल के कण और पुआल के टुकड़े रह जाते हैं. इसे हटाने के लिए धान की ओसाई की जाती है. ओसाई का काम उस समय भी किया जाता है, जब हवा चल रही हो. यदि हवा बंद हो जाए, तब 2 लोग चादर को तेजी के साथ झलते हैं, जिस से हवा निकलती है और ओसाई हो जाती है.

धान की कटाई 20-22 फीसदी नमी रहने पर की जाती है, लेकिन इतनी नमी में धान को रखा नहीं जा सकता है. इसलिए धान की नमी कम करना बहुत जरूरी है. इस के लिए धान को  घर की छतों के फर्श, चटाई, तिरपाल, प्लास्टिक शीट वगैरह पर फैला कर कई दिनों तक धान के बीजों को सुखाया जाता है. धान को ज्यादा तेज धूप में नहीं सुखाना चाहिए. सुखाने के लिए सीमेंट के फर्श और तिरपाल का इस्तेमाल करना चाहिए.

धान का भंडारण

भंडारण के पहले धान में नमी की मात्रा देख लेनी चाहिए. यदि आप को अधिक समय के लिए भंडारण करना है, तो नमी की मात्रा 12 फीसदी और कम समय के लिए 14 फीसदी होनी चाहिए.

भंडारण से पहले या बाद में धान का कीटों से बचाव करना भी जरूरी है. भंडारण के लिए कई तरह के ड्रम या कोठी इस्तेमाल किए जाते हैं. ये मिट्टी, लकड़ी, बांस, जूट की बोरियों, ईंटों व कपड़े वगैरह से बनाए जाते हैं, लेकिन इस तकनीक से ज्यादा समय तक भंडारण करना संभव नहीं है, क्योंकि इन में हवा जाने की कोई जगह नहीं होती.

कटाई के समय इन बातों का रखें ध्यान

* धान की कटाई के लिए 20-22 फीसदी नमी सही रहती है. इस से ज्यादा नमी होने पर चावल कम मिलता है और कच्चे, टूटे और कम गुणवत्ता वाले दाने ज्यादा मात्रा में होते हैं. कम नमी होने पर कटाई करने से मिलिंग के दौरान धान टूट कर गिरने लगता है.

* यदि खेत में पानी भरा हो तो कटाई से 7-10 दिन पहले पानी निकाल देना चाहिए, जिस से कटाई आसानी से हो सके.

* कटाई के समय धान की सभी बालियों को एक दिशा में रखना चाहिए ताकि मड़ाई में दिक्कत न हो.

* कटाई के बाद धान को बारिश और ओस से बचाना चाहिए.

* धान की किस्मों के अनुसार कटाई करवानी चाहिए, जैसे अगेती किस्में 110-115 दिनों बाद, मध्यम किस्में 120-130 दिनों बाद और देर से पकने वाली किस्में लगभग 130 दिनों के बाद काटने लायक हो जाती हैं.

फार्मट्रैक पावरमैक्स ट्रैक्टर रिव्यू

आज बाजार में अनेक हौर्सपावर के ट्रैक्टर मौजूद हैं, लेकिन जरूरत इस बात की है कि किसान अपनी जरूरत के अनुसार ही ट्रैक्टर खरीदें. यहां फार्मट्रैक 60 ट्रैक्टर के बारे में कुछ जानकारी दी जा रही है, जो किसानों के लिए मददगार हो सकती है.

फार्मट्रैक 60 पावरमैक्स

आज देशभर में अनेक ब्रांड के ट्रैक्टर बाजार में मौजूद हैं. सभी की अपनीअपनी खासीयतें हैं. मजबूत ट्रैक्टरों में फार्मट्रैक की पावरमैक्स सीरीज किसानों के बीच खासा पसंदीदा ब्रांड है.

फार्मट्रैक पावरमैक्स सीरीज में 50 से 60 एचपी तक ट्रैक्टरों की विस्तृत रेंज शामिल है. इस ट्रैक्टर के फ्रंट में 90 किलोग्राम का बंपर दिया गया है. फ्रंट में काफी बड़ी रेडिएटर ग्रिल दी हुई है. ग्रिल के ऊपर बोनट पर फार्मट्रैक और पावर की ब्रांडिंग की गई है. फ्रंट लाइट साइड माउंटेड है, जो एलईडी डीआरएल बल्ब के साथ हैलोजन टाइप में आती है.

इस ट्रैक्टर में इंजन की हीट को किसानों तक पहुंचने से रोकने के लिए हीट गार्ड दिए गए हैं. ट्रैक्टर में सिंगल यूनिट बोनट दिया गया है, जिसे खोलना और बंद करना बेहद आसान है. इंजन को ठंडा रखने के लिए बड़ा रेडिएटर दिया गया है. ट्रैक्टर से कम प्रदूषण फैले, इसलिए इस में ईजीआर सिस्टम दिया गया है.

इंजन की खासीयतें

फार्मट्रैक ट्रैक्टर के इस मौडल में 60 पावरमैक्स ट्रैक्टर में 3 सिलैंडर, 55 एचपी और 3510 सीसी का शक्तिशाली इंजन दिया गया है. इस ट्रैक्टर में 240 न्यूटन मीटर का टार्क और 35 फीसदी का बैकअप टार्क मिलता है, जिस की सहायता से बड़े इंप्लीमैंट्स को आसानी से चलाया जा सकता है.

इस ट्रैक्टर में ड्यूल एलीमैंट के साथ एयर क्लीनर दिया गया है. डीजल में से पानी को निकालने के लिए वाटर सैपरेटर भी इस ट्रैक्टर में आता है. इस ट्रैक्टर में माइको बाश कंपनी का फ्यूल इंजैक्शन पंप दिया गया है.

ट्रैक्टर में कुल 20 गियर दिए गए हैं.  16 गियर आगे के लिए और 4 गियर पीछे के लिए दिए गए हैं. ट्रैक्टर की अधिकतम स्पीड आगे की ओर 34.8 किलोमीटर प्रतिघंटा और पीछे की ओर 15.8 किलोमीटर प्रतिघंटा है.

इस ट्रैक्टर में 48 एंपीयर की बैटरी लगी हुई है. ट्रैक्टर में 40 एंपीयर का अल्टरनेटर दिया गया है. यह ट्रैक्टर ड्यूल क्लच के साथ आता है. साथ ही, इस में इनडिपैंडैंट क्लच का औप्शन मिलता है.

स्टीयरिंग और टायर

यह ट्रैक्टर ड्यूल एक्टिंग पावर स्टीयरिंग के साथ आता है. इस में तेल में डूबे हुए ब्रेक दिए गए हैं. स्टीयरिंग के नीचे हैंड रेस का लीवर दिया गया है. इस ट्रैक्टर में किसान के आराम के लिए सुपर डीलक्स एडजस्टेबल सीट दी गई है, जिसे किसान अपनी सुविधानुसार एडजस्ट कर सकता है. इस ट्रैक्टर में 60 लिटर का डीजल टैंक दिया गया है.

हाइड्रोलिक्स से लैस यह ट्रैक्टर 2500 किलोग्राम की लिफ्टिंग क्षमता के साथ आता है. इस ट्रैक्टर में 3 पौइंट सैंसिंग के साथ औटोमैटिक ड्राफ्ट और डैप्थ कंट्रोल (एडीडीसी) टाइप की हाइड्रोलिक दी गई है, जिस की सहायता से कृषि उपकरणों को गहराई के हिसाब से सैट किया जा सकता है.

इस ट्रैक्टर में डबल डिस्ट्रीब्यूटर वाल्व भी आते हैं, जिन की सहायता से लेजर लैवलर और एमबी प्लाऊ को आसानी से चलाया जा सकता है. ट्रैक्टर में एडजस्टेबल हिच दिया गया है.

इस ट्रैक्टर के टायर हैवी ड्यूटी ह्वील के साथ आते हैं. अगले टायर 7.5×16 और पिछले टायर 14.9×28/16.9 × 28 साइज में आते हैं.

फार्मट्रैक 60 पावरमैक्स ट्रैक्टर का कुल वजन 2280 किलोग्राम है. ट्रैक्टर की कुल लंबाई 3445 एमएम और चौड़ाई 1845 एमएम है. ग्राऊ फार्मट्रैक 60 पावरमैक्स ट्रैक्टर की कीमत 7.40-7.70 लाख रुपए है, कीमत में उतारचढ़ाव संभव है, जो आप के शहर व राज्य के अनुसार अलगअलग हो सकती है.

कंपनी इस ट्रैक्टर पर 5 साल या 5 हजार घंटे की वारंटी देती है. अधिक जानकारी के लिए आप इन की वैबसाइट पर या नजदीकी डीलर से संपर्क कर सकते हैं.

पौटेटो प्लांटर : आलू की बोआई करे आसान

हाथ से आलू बोआई करने पर काफी समय और मजदूर लगते हैं. कई बार समय पर मजदूर भी नहीं मिल पाते. इस के चलते आलू बोआई के काम में देरी हो जाती है. इसी काम को अगर आलू बोआई यंत्र द्वारा यानी पोटैटो प्लांटर द्वारा किया जाए तो यह काम बहुत जल्दी और अच्छे तरीके से होता है.

यंत्र से बोआई करने पर खेत में आलू बीज एक तय दूरी और सही गहराई पर बोया जाता है. इस से फसल की पैदावार भी अच्छी मिलती है.

आलू बोने के 2 तरह के यंत्र आजकल चलन में हैं, एक सैमीआटोमैटिक आलू प्लांटर और दूसरा आटोमैटिक प्लांटर. दोनों ही तरह के यंत्र ट्रैक्टर में जोड़ कर चलाए जाते हैं.

सैमीआटोमैटिक प्लांटर

सैमीआटोमैटिक प्लांटर में आलू बीज भरने के लिए बड़ा बौक्स लगा होता है, जिस में आलू बीज भर दिया जाता है और उसी के साथ नीचे की ओर घूमने वाली डिस्क लगी होती है. इन डिस्कों के पीछे आदमियों के बैठने की जगह भी होती है.

बोआई के समय जब डिस्क घूमती है तो छेदों में से आलू बीज नीचे गिरते जाते हैं और उस के साथ ही यंत्र द्वारा मिट्टी से आलू दबते चले जाते हैं. इस यंत्र से आलू बोआई के साथसाथ मेंड़/कूंड़ भी बनते जाते हैं. जितनी आलू के लिए डिस्क लगी होंगी, उतनी लाइन में ही आलू की बोआई होगी.

आलू बोआई करने के लिए हर डिस्क के पीछे बैठने के लिए सीट लगी होती है. इस पर आलू डालने वाला व्यक्ति बैठा होता है. जितनी डिस्क होंगी उतने ही आदमियों की जरूरत होगी क्योंकि जब ऊपर हौपर में से आलू नीचे आता है तो डिस्क में डालने का काम वहां बैठे आदमी द्वारा किया जाता है.

आटोमैटिक प्लांटर

आटोमैटिक प्लांटर में अलग से किसी शख्स की जरूरत नहीं होती, केवल ट्रैक्टर पर बैठा व्यक्ति इसे नियंत्रित करता है. इस की खूबी यही है कि इस में आलू खुदबखुद बोआई के लिए नीचे गिरते चले जाते हैं और खेत में बोआई होती जाती है. साथ ही, मेंड़ भी बनती जाती है लेकिन इस के लिए ट्रैक्टर चलाने वाले को यंत्र के इस्तेमाल करने की सही जानकारी होनी चाहिए. यह यंत्र सैमीआटोमैटिक की तुलना में महंगा होता है.

कीमत : 2 लाइनों में बोआई करने वाले मैन्यूअल पोटैटो प्लांटर की कीमत 40,000 है, 3 लाइनों में बोआई करने वाले प्लांटर की कीमत 50,000 है, वहीं 4 लाइनों में बोआई करने वाले प्लांटर की कीमत 60,000 रुपए है. आटोमैटिक पोटैटो प्लांटर की कीमत तकरीबन 1 लाख, 20 हजार रुपए तक हो सकती है. यह अनुमानित कीमत है.

बेड पर आलू बोआई वाला आटोमैटिक प्लांटर

मोगा इंजीनियरिंग वर्क्स से अमनदीप सिंह ने बताया कि पूरी तरह आधुनिक तकनीक से बना हमारा एक नया आटोमैटिक पोटैटो प्लांटर है जिसे जर्मन तकनीक पर बनाया गया है. यह प्लांटर बोआई के साथ बेड बनाता है और खाद भी डालता है. इस खास प्लांटर से बनाई गई बेड अधिक चौड़ी होती है, जो 24 इंच की होती है. इस की खासीयत यह है कि इस तकनीक में आलू की 15-20 फीसदी अधिक पैदावार मिलती है और आलू हरा भी नहीं होता. फसल पर पाले का असर भी नहीं होता है.

इस यंत्र के जरीए एक दिन में 30 से 35 बीघा तक खेत में आलू की बोआई की जा सकती है. इस यंत्र को चलाने के लिए कम से कम 45 हार्सपावर के ट्रैक्टर की जरूरत होती है.

अधिक जानकारी के लिए आप अमनदीप सिंह से उन के मोबाइल नंबर 8285325047 पर बात कर सकते हैं.

महिंद्रा पोटैटो प्लांटर

छोटे और बड़े सभी फार्मों के लिए यह खास आलू बोआई यंत्र है. इस यंत्र को इस्तेमाल करने के लिए 45 हौर्सपावर के ट्रैक्टर की जरूरत होती है. इस मशीन निर्माता का कहना है कि इस यंत्र के इस्तेमाल से हर पौधे की दूरी इस में लगे खास इम्प्लीमैंट से तय की जा सकती है. इस में बीज बोने की गहराई 4 से 5 सैंटीमीटर रखी जाती है.

इस पोटैटो प्लांटर के 3 मौडल हैं जिन से 2 लाइनों, 3 लाइनों और 4 लाइनों में आलू की बोआई की जा सकती है. 2 लाइनों वाले प्लांटर में आलू बीज टैंक में रखने की कूवत 300 किलोग्राम व 3 कतारों वाले प्लांटर में 450 किलोग्राम और 4 कतार वाले प्लांटर में 600 किलोग्राम आलू बीज एकसाथ भरा जा सकता है. इस से अलग दूसरे टैंक में 100 किलोग्राम फर्टिलाइजर (खाद) भरा जा सकता है.

कंपनी का कहना है कि इस यंत्र के इस्तेमाल के लिए महिंद्रा का अर्जुन नोवो ट्रैक्टर खास है. इसलिए हमारा सुझाव है कि आप महिंद्रा पोटैटो प्लांटर का इस्तेमाल अर्जुन नोवो के साथ करें.

अर्जुन नोवो 650 डिआई एमएस

आलू बोआई व आलू खुदाई यंत्र को इस्तेमाल करने के लिए महिंद्रा का यह ट्रैक्टर मौडल 49.9 हौर्सपावर का है जिस में 4 सिलैंडर हैं. पावर स्टीयरिंग है और इस में 60 लिटर तेल की क्षमता वाला टैंक है.

यह ट्रैक्टर खेत में 40 एप्लीकेशन पर काम कर सकता है. आलू बोआई व आलू खुदाई यंत्र के साथ इस के इस्तमाल के अच्छे नतीजे मिलते हैं. इस ट्रैक्टर में 1,800 किलोग्राम वजन उठाने की कूवत है. इस में बेहतर कूवत वाली हाइड्रोलिक तकनीक है जो खेती के कामों को आसान बनाती है. रखरखाव पर कम खर्च और अपनी श्रेणी के ट्रैक्टरों में कम से कम ईंधन पर चलने वाला अच्छे नतीजे देने वाला ट्रैक्टर है.

अधिक जानकारी के लिए किसान टोल फ्री नंबर 18004256675 पर बात कर सकते हैं.