जलवायु परिवर्तन से घट रहा कृषि उत्पादन

भारत की आबादी तकरीबन डेढ़ अरब है. अब यह दुनिया का सब से बड़ी आबादी वाला देश हो चुका है. वहीं प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का दबाव भी बढ़ रहा है. बढ़ी हुई आबादी ने देश में खाद्यान्न की मांग में भी बढ़ोतरी की है.

चूंकि भारत प्राकृतिक विविधताओं वाला देश है. ऐसे में हम अब भी ऐसी स्थिति में हैं कि देश के डेढ़ अरब लोगों के पेट भरने के लिए भरपूर मात्रा में खाद्यान्न कर पाने में सक्षम हैं, लेकिन बीते 2-3 दशकों में मौसम चक्र में तेजी से परिवर्तन आने से अब खेती पर खतरा मंडराने लगा है.

देश के जिन हिस्सों में जून महीने में मानसून सक्रिय हो जाता था, उन हिस्सों में अब मानसून के देरी से दस्तक देने के चलते वर्षा आधारित फसलों के उत्पादन में तेजी से कमी आई है. जलवायु परिवर्तन के चलते जहां वर्षा में कमी आई है, वहीं शरद ऋतु में कम ठंड ने रबी सीजन की फसलों के उत्पादन में कमी लाने का काम किया है. जलवायु परिवर्तन का खतरा सिर्फ देश के मैदानी इलाके ही नहीं झेल रहे हैं, बल्कि इस का सीधा प्रभाव पहाड़ी और ठंडे प्रदेशों पर भी दिखाई पड़ने लगा है.

जलवायु परिवर्तन का सीधा उदाहरण हम हिमाचल प्रदेश से ले सकते हैं. साल 2023 में हिमाचल प्रदेश में भीषण बारिश ने यहां के कई जिलों को पूरी तरह से तबाह कर के रख दिया.

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अगर हम अकेले हिमाचल प्रदेश की बात करें, तो यह ठंडे प्रदेशों में गिना जाता है. इसलिए यहां कम तापमान में पैदा होने वाली फसलें ही उगाई जाती हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में ठंडे प्रदेशों में भी गरमी बढ़ने से ठंड में पैदा होने वाली फसलें भी बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं.

हिमाचल प्रदेश में पैदा होने वाले सेब की अगर बात करें, तो जलवायु परिवर्तन के चलते यहां के तापमान में वृद्धि हुई है. इस वजह से वहां सेब के पौधे अब सूख रहे हैं. सेब के बागानों में बीमारियों और कीटों का प्रकोप बढ़ रहा है. अब केवल अधिक ऊंचाई पर सेब उत्पादन होने से उस के उत्पादन में कमी आई है.

यही हाल मैदानी इलाकों का भी है. जूनजुलाई में कम बारिश और सितंबरअक्तूबर में बेमौसम बारिश और ओले ने खरीफ सीजन की फसल और उत्पादन पर बुरा प्रभाव डाला है. मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में कपास, सोयाबीन और गन्ने का उत्पादन असमय बारिश, ओला, कीट और बीमारियों के चलते घट रहा है.

देश की तकरीबन 70 फीसदी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की चुनौती रोजमर्रा की आजीविका के संघर्ष एवं व्यस्त दिनचर्या के चलते लोगों के लिए यह गंभीरता का विषय नहीं बन पाई है. लेकिन हकीकत तो यह है कि हवा, पानी, खेती, भोजन, स्वास्थ्य, आजीविका एवं आवास आदि सभी पर प्रतिकूल असर डालने वाली इस समस्या से देरसवेर कमज्यादा हम सभी का जीवन प्रभावित होता है, चाहे वह समुद्री जलस्तर बढ़ने से प्रभावित होते तटीय या द्वीपीय क्षेत्रों के लोग हों या असामान्य मानसून अथवा जल संकट से त्रस्त किसान. विनाशकारी समुद्री तूफान का कहर झेलते तटवासी हों अथवा सूखे एवं बाढ़ की विकट स्थितियों से त्रस्त लोग. असामान्य मौसमजनित अजीबोगरीब बीमारियों से जूझते लोग हों या विनाशकारी बाढ़ में अपना आवास एवं सबकुछ गवां बैठे और दूसरे क्षेत्रों को पलायन करते लोग. दरअसल, ये तमाम लोग जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं.

खेतीबागबानी की घट रही पैदावार कूवत

जलवायु में परिवर्तन केवल भारत का ही मुद्दा नहीं है, बल्कि यह दुनियाभर के लिए एक चुनौती के रूप में उभरा है, इसलिए वैश्विक लेवल पर भी जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम चक्र में आ रहे बदलाव को रोकने के लिए दुनिया के सभी देश भी एकजुट हो कर प्रयास कर रहे हैं. सतत विकास लक्ष्य, जी-20 इत्यादि के जरीए जलवायु परिवर्तन पर ठोस प्रयास किए जा रहे हैं.

अगर हम जलवायु परिवर्तन की वजह से कृषि और बागबानी पर पड़ रहे प्रभाव के कुछ वर्षों के आंकड़ों का का अध्ययन करें, तो देश में बढ़ रहे तापमान के चलते गेहूं, धान, दलहन, तिलहन आदि फसलों के उत्पादन में कमी आई है. अगर तापमान में 1 डिगरी सैल्सियस की भी बढ़ोतरी हो रही है, तो तापमान बढ़ने पर गेहूं का उत्पादन 4-5 करोड़ टन कम होता जाएगा.

अगर किसान इस के बोने का समय सही कर लें, तो उत्पादन की गिरावट 1-2 टन कम हो सकती है. कुछ यही हाल धान्य फसलों का भी है. यह अनुमान है कि तापमान में 2 डिगरी सैल्सियस की तापमान वृद्धि से धान का उत्पादन 0.75 टन प्रति हेक्टेयर कम हो जाएगा.

मिट्टी की उत्पादकता पर संकट

तापमान में बढ़ोतरी के चलते मिट्टी में नमी और जल धारण की क्षमता कम हो रही है. इस वजह से मिट्टी में लवणता में बढ़ोतरी और जैव विविधता में कमी देखी जा सकती है. सूखा, बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने आदि के कारण मिट्टी क्षरण और बंजर क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की जा रही है.

कीट व बीमारियों में बढ़ोतरी

जलवायु परिवर्तन और तापमान में बढ़ोतरी ने फसलों में कीट और बीमारियों का प्रकोप बढ़ा दिया है. जलवायु के गरम होने से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटपतंगों की प्रजनन क्षमता तेजी से बढ़ रही है और बढ़ रहे कीटपतंगों की रोकथाम के लिए अत्यधिक कीटनाशकों के उपयोग से मनुष्य की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है.

सिंचाई के लिए जल संकट

जलवायु परिवर्तन और तापमान में बढ़ोतरी के चलते जल आपूति की समस्या के साथ ही बाढ़ और सूखे में बढ़ोतरी हुई है. शुष्क मौसम में लंबे समय तक वर्षा, वर्षा की अनिश्चितता ने भी फसल उत्पादन पर बुरा प्रभाव डालना शुरू कर दिया है. जलवायु परिवर्तन ने जल संसाधनों के दोहन से भूगर्भ जल में कमी लाने का काम किया है.

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पृथ्वी पर इस समय 140 करोड़ घनमीटर जल है. इस का 97 फीसदी भाग खारा पानी है, जो समुद्र में है. मनुष्य के हिस्से में कुल 136 हजार घनमीटर जल ही बचता है. पानी 3 रूपों में पाया जाता है- तरल, जो कि समुद्र, नदियों, तालाबों और भूमिगत जल में पाया जाता है, ठोस- जो कि बर्फ के रूप में पाया जाता है और गैस वाष्पीकरण द्वारा, जो पानी वातावरण में गैस के रूप में मौजूद होता है.

पूरे विश्व में पानी की खपत प्रत्येक 20 साल में दोगुनी हो जाती है, जबकि धरती पर उपलब्ध पानी की मात्रा सीमित है. शहरी क्षेत्रों में, कृषि क्षेत्रों में और उद्योगों में बहुत ज्यादा पानी बेकार जाता है.

यह अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि सही ढंग से इसे व्यवस्थित किया जाए, तो 40 से 50 फीसदी तक पानी की बचत की जा सकती है. वहीं दूसरी ओर पीने के पानी के साथसाथ कृषि व उद्योगों के लिए भी इसी जल का उपयोग किया जाता है.

आबादी बढ़ने के साथ ही पानी की मांग में बढ़ोतरी होने लगी है. यह स्वाभाविक है, परंतु बढ़ते जल प्रदूषण और उचित जल प्रबंधन न होने के कारण पानी आज एक समस्या बनने लगी है. सारी दुनिया में पीने योग्य पानी का अभाव होने लगा है.

गांवों में पानी के पारंपरिक स्रोत लगभग समाप्त होते जा रहे हैं. गांव के तालाब, पोखर, कुओं का जलस्तर बनाए रखने में मददगार होते थे. किसान अपने खेतों में अधिक से अधिक वर्षा जल का संचय करता था, ताकि जमीन की आर्द्रता व उपजाऊपन बना रहे. पर अब बिजली से ट्यूबवेल चला कर और कम दामों में बिजली की उपलब्धता से किसानों ने अपने खेतों में जल का संरक्षण करना छोड़ दिया.

घट रही उत्पादन गुणवत्ता

जलवायु परिवर्तन से न केवल उत्पादन पर प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि यह फसल की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर रहा है. इस से अनाज में पोषक तत्वों की कमी आ रही है. इस वजह से असंतुलित और कम पोषक तत्वों वाले भोजन के ग्रहण करने से मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है. इस के अलावा फसलों पर कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग ने कृषि उत्पादों को भी जहरीला बना दिया है.

जलवायु परिवर्तन ने न केवल फसल उत्पादन को प्रभावित किया है, बल्कि इस ने पशुओं पर विपरीत प्रभाव डालना शुरू कर दिया है. तापमान बढ़ने से जानवरों के दूध उत्पादन व प्रजनन क्षमता पर सीधा असर पड़ रहा है.

यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर तापमान में बढ़ोतरी इसी तरह जारी रही, तो दूध उत्पादन में वर्ष 2020 तक 1.6 करोड़ टन और वर्ष 2050 तक 15 करोड़ टन तक गिरावट आ सकती है.

इस के अलावा सब से अधिक गिरावट संकर नस्ल की गायों में (0.63 फीसदी), भैसों में (0.50 फीसदी) और देसी नस्लों में (0.40 फीसदी) होगी, क्योंकि संकर नस्ल की प्रजातियां गरमी के प्रति कम सहनशील होती हैं, इसलिए उन की प्रजनन क्षमता से ले कर दुग्ध क्षमता ज्यादा प्रभावित होगी. जबकि देसी नस्ल के पशुओं में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कुछ कम दिखेगा.

ऐसे कम कर सकते हैं जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव

जलवायु परिवर्तन में कमी लाने के पहले उस के कुप्रभाव में भी कटौती करने के उपायों की तरफ सोचना होगा. इस के लिए खेतो में जल प्रबंधन, जैविक, प्राकृतिक और समेकित खेती को बढ़ावा, फसल उत्पादन की टिकाऊ और नई तकनीकी का विकास, फसल संयोजन में परिवर्तन, खेती की पारंपरिक विधियों को बढ़ावा इत्यादि कर के जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव को कम किया जा सकता है.

जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम चक्र में आ रहे बदलाव को रोकने के लिए सतत कृषि और भूमि उपयोग के प्रबंधन की तरफ ध्यान देना होगा, कृषि प्रथाओं में परिवर्तन- जैसे कि मांस की खपत को कम करना, पुनर्योजी कृषि को अपनाना और आर्द्र भूमि और घास के मैदानों की रक्षा करने की तरफ ध्यान देना होगा.

हम तापमान में बढ़ोतरी को नवीकरणीय ऊर्जा, अक्षय ऊर्जा स्रोतों जैसे कि पवन, सौर और जल विद्युत से भी रोक सकते हैं. साथ ही, लोगों को कम से कम फ्लाइटों का उपयोग करने की आदत डालनी होगी. डीजल और पेट्रोल से चलने वाली कारों की जगह इलैक्ट्रिक कार के उपयोग की आदत डालनी होगी. कम ऊर्जा खपत वाले सामान के उपयोग पर फोकस करना होगा. साथ ही, अधिक से अधिक पौध रोपण को बढ़ावा दे कर पौधों को सुरक्षित रखने की आदत डालनी होगी.

इस के अलावा हमें वैश्विक स्तर पर संचालित अभियानों का हिस्सा बन कर जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए किए जा रहे प्रयासों में गंभीरता से जिम्मेदारी निभानी होगी, तभी हम जलवायु परिवर्तन और तापमान में बढ़ोतरी को रोक पाएंगे, अन्यथा आने वाले कुछ वर्षों में दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन और तापमान में बढ़ोतरी हमारे सामने खाद्यान्न संकट के रूप में खड़ा होगा.

एक कदम हरित शहर की ओर : शहरियों को लुभा रही छत पर बागबानी

एक ताजा सर्वे में नई दिल्ली को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा लगातार विश्व स्तर पर सब से प्रदूषित शहरों में शुमार किया गया है. भारतीय वन सर्वे की नई रिपोर्ट से पता चलता है कि दिल्ली का कुल हरित क्षेत्र केवल 23.06 फीसदी है, जो कि साल 1988 की राष्ट्रीय वन नीति के तहत एकतिहाई क्षेत्र की सिफारिश से काफी कम है.

रूफटौप बागबानी पौधों की खेती के लिए खाली छत का उपयोग कर के शहरी पर्यावरण को सुधारने का एक अनूठा अवसर है, जिस से जैव विविधता में वृद्धि, शहरी गरमी का प्रभाव को कम करना, हवा की क्वालिटी में सुधार और साथ ही साथ सतत शहरी जीवन को प्रोत्साहित किया जा सकता है.

कोरोना महामारी के बाद लोगों में सेहत और पर्यावरण को ले कर जागरूकता बढ़ी है. लोग भोजन में बिना कैमिकल, बिना कीटनाशक का प्रयोग किए फलसब्जियों का इस्तेमाल करना चाहते हैं.

छत पर बागबानी के लिए न बहुत ज्यादा मिट्टी और न ही बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है. छत पर बागबानी में धनिया, पालक, मेथी के साथ टमाटर, लौकी या कोई बेल वाली सब्जी या फिर कोई फल उगाया जा सकता है. सुंदरता बढ़ाने के लिए और परागण के लिए फूलों के पौधे लगाना भी लाभकारी होता है.

मानूसन से प्रभावित और आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय और अर्धशुष्क है, जो विभिन्न प्रकार के पौधों एवं वनस्पतियों के लिए उपयुक्त है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर, 2016 के अध्ययन से पता चला है कि दिल्ली क्षेत्र में छतों का उपयोग बागबानी के लिए उपयुक्त है, जो हरित शहरीकरण की दिशा में एक बेहतरीन कदम हो सकता है. दिल्ली के विकास को नई दिशा देने के लिए मास्टर प्लान 2041 में रूफटौप बागबानी को बढ़ावा देने के लिए नागरिकों को बढ़ावा देते हुए सलाह देने का प्रावधान भी शामिल हैं.

छत पर बागबानी छाया और वाष्पीकरण के जरीए तापमान में कमी के साथसाथ पर्याप्त पर्यावरणीय फायदा भी है. शारदा विश्वविद्यालय और आईआईआईटी, दिल्ली द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन के अनुसार, छत के बगीचे गरमियों में 5-7 डिगरी सैल्सियस तक छत के तापमान को कम कर सकते हैं, जिस से निवासियों के लिए बिजली के बजट में संभावित बचत हो सकती है.

रूफटौप बागबानी प्रदूषकों और कार्बनडाईऔक्साइड को अवशोषित कर के हवा की क्वालिटी में सुधार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. साथ ही, जलवायु परिवर्तन और भोजन के कार्बन पदार्थ को कम करने में भी मदद करते हैं.

हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि बागबानी से न केवल सामुदायिक जुड़ाव की भावना को बढ़ावा देती है, बल्कि तनाव निवारक यानी स्ट्रेस बस्टर, एकाग्रता में सुधार और सकारात्मक ऊर्जा पैदा कर के निवासियों की भलाई को भी बढ़ावा देती है. जापान जैसे देशों में प्रकृति की सैर एक थैरेपी की तरह प्रयोग की जाती है. छत पर बागबानी एक व्यावहारिक समाधान है, जो प्रदूषण को कम करने में मददगार है.

सामुदायिक जुड़ाव और भागीदारी

छत पर बागबानी ने स्थानीय और और्गैनिक खाद्य उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ खाद्य सुरक्षा को बढ़ाने का एक मूल्यवान अवसर दिया है. वर्तमान में दिल्ली अपने सब्जी और फलों की आपूर्ति के लिए पड़ोसी राज्यों पर अधिक निर्भर है.

छत पर बागबानी के जरीए एक शहरी आम आदमी को भी विभिन्न प्रकार की ताजा और स्वास्थ्यपूर्ण खाद्य जैसे सब्जियां, फल और जड़ीबूटियां उगाने का मौका मिलता है. साथ ही, बाहरी खाद्य स्रोतों की जरूरत को कम करने और आपूर्ति को सुनिश्चित करने में मदद करता है.

Terrace Garden
Terrace Garden

लोगों ने की शुरुआत

कोरोना महामारी के बीच विभिन्न औनलाइन मंचों पर बहुत सी सफलता की कहानियां सामने आई हैं, जिन में निवासियों की वे कहानियां भी शामिल थीं, जिन्होंने छत और बालकनी में बागबानी की शुरुआत की थी.

एक उदाहरण है कि नांगलोई के रहने वाले कृष्ण कुमार, जो कि सरकारी सेवा से रिटायर हैं, ने अपनी खाली छत पर बागबानी की और टमाटर, भिंडी और आलू जैसी सब्जियां उगाने लगे. उन्होंने कहा कि मैं ने यूट्यूब ट्यूटोरियल्स के माध्यम से बागबानी की तकनीक सीखी.

शहरी खेती स्वामित्व के रूप में ताजा और्गैनिक सब्जियों का एक स्रोत है और प्राकृतिकता और समुदाय से जुड़ने का एक स्थान हो सकता है.

नजफगढ़ की रहने वाली किरण, जो कि एक गृहिणी हैं, काफी सालों से छत पर बागबानी कर रही हैं. उन्होंने कहा कि अखबार और मीडिया के माध्यम से पता चला कि मार्केट में ज्यादातर फलसब्जियों में जहरीले पदार्थ होते हैं. मुझे यह महसूस हो गया कि मेरे छत पर बिना कीटनाशक के ताजगी वाली सब्जियां उगाने में बहुत सुरक्षित होगा, लेकिन जगह की कमी के कारण मैं केवल उन्हीं सब्जियों को उगा रही हूं, जो कम जगह में जिंदा रह सकती हैं.

मेरा मानना है कि छत पर बागबानी योजना को प्रोत्साहित करना चाहिए. एक आम व्यक्ति, छात्र, गृहिणी, बुजुर्ग सभी इस से जुड़ सकते हैं. स्वयं उपजाई हुई सब्जी या फल खाने से पोषण और स्वास्थ्य के साथ खुशी की भावना आती है और प्रकृति के समीप होने की सुखानुभूति भी होती है.

सरकारी पहल और नीतियां

सरकार अपनी नीतियों से शहरी क्षेत्र में छतों पर हरित जगहों के बनाने और समर्थन को प्रोत्साहित करने में अहम भूमिका निभाने का काम कर रही है. हाल ही में दिल्ली सरकार ने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के सहयोग से ‘स्मार्ट शहरी खेती’ की शुरुआत की है. लोगों को उन के बालकनी और छतों पर सब्जियां उगाने के लिए प्रोत्साहित करना ही मुख्य उद्देश्य है.

दिल्ली सरकार की योजना है कि 10,000 डीआईवाई (डू इट योरसैल्फ यानी खुद करो) किट्स बांटी जाएंगी, जिन में फसल के बीज, जैव उर्वरक, खाद और बागबानी कैसे की जाती है, के बारे में जानकारी दी जाएगी.

बिहार और उत्तराखंड सरकारों के उद्यानिकी विभाग ने भी छत पर बागबानी योजना की शुरुआत की है. इस योजना के तहत आवेदन करने वाले इच्छुक व्यक्ति को लागत का 50 फीसदी या कम से कम 25,000 रुपए तक सब्सिडी सरकार के माध्यम से दी जाती है.

इस योजना का लाभ लेने के लिए छत पर 300 वर्गफुट का खुला स्थान होना जरूरी है. इस योजना के तहत राज्य सरकारें ट्रेनिंग

और छत पर बागबानी के विकास के लिए तकनीकी जानकारी और उद्यान के लिए तकनीकी और विकास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है.

मुंबई में शुरुआत

‘बृहन्मुंबई नगरपालिका महामंडल’ यानी बीएमसी जिसे भारत की सब से धनी नगरपालिका के रूप में जाना जाता है, ने हाल ही में एक प्रस्ताव पेश किया है, जिस में मुंबई में सभी नई इमारतों को, जिन का प्लाट आकार 2,000 वर्गमीटर से अधिक है, उन्हें छत या टैरेस बगीचों को अनिवार्य सुविधा के रूप में शामिल करने की जरूरत होगी.

केंद्र सरकार द्वारा भी ‘छत पर बागबानी’ नामक कार्यक्रम दूरदर्शन ‘किसान टीवी चैनल’ पर प्रसारित किया जाता है, जिस में छत पर बागबानी की प्रदर्शनीय तकनीकों और विधियों की चर्चा की जाती है. सरकार को हरित बुनावट और लगातार बना रही प्रथाओं को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों को प्राथमिकता देने की जरूरत है, यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है.

– डा. दीप्ति राय,  डा. अरुण यादव (मोबियस फाउंडेशन )

गेंदा फूल की खेती

गेंदा फूल को पूजाअर्चना के अलावा शादीब्याह, जन्मदिन, सरकारी और निजी संस्थानों में आयोजित विभिन्न समारोहों के अवसर पर पंडाल, मंडपद्वार और गाड़ी, सेज आदि सजाने व अतिथियों के स्वागतार्थ माला, बुके, फूलदान सजाने में भी इस का इस्तेमाल किया जाता है.

गेंदा की खेती खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसम में की जाती है. पूर्वांचल में गेंदा की खेती की काफी संभावनाएं हैं. बस, यह ध्यान रखना है कि कब कौन सा त्योहार है, शादी के लग्न कब हैं, धार्मिक आयोजन कबकब होना है, इस को ध्यान में रख कर खेती की जाए, तो ज्यादा लाभदायक होगा.

मिट्टी एवं खेत की तैयारी

गेंदा की खेती के लिए दोमट, मटियार दोमट एवं बलुआर दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है. भूमि को समतल करने के बाद एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से और 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर के एवं पाटा चला कर मिट्टी को भुरभुरा बनाने एवं कंकड़पत्थर आदि को चुन कर बाहर निकाल दें और सुविधानुसार उचित आकार की क्यारियां बना दें.

बीज, नर्सरी, प्रसारण

गेंदा का प्रसारण बीज एवं कटिंग दोनों विधि से होता है. इस के लिए 100 ग्राम बीज प्रति बीघा (2500 वर्गमीटर / एक हेक्टेयर का चौथाई भाग) में जरूरत होती है, जो 100 वर्गमीटर के बीज शैया में तैयार किया जाता है. बीज शैया में बीज की गहराई एक सैंटीमीटर से अधिक नहीं होना चाहिए.

जब कटिंग द्वारा गेंदा का प्रसारण किया जाता है, उस में ध्यान रखना चाहिए कि हमेशा कटिंग नए स्वस्थ पौध से ही लें, जिस में मात्र 1-2 फूल खिला हो, कटिंग का आकार 4 इंच (10 सैंटीमीटर) लंबा होना चाहिए. इस कटिंग पर रूटेक्स लगा कर बालू से भरे ट्रे में लगाना चाहिए. 20-22 दिन बाद इसे खेत में रोपाई करनी चाहिए.

रोपाई का उचित समय एवं दूरी

गेंदा फूल खरीफ, रबी और जायद तीनों ही सीजन में बाजार की मांग के अनुसार उगाया जाता है. लेकिन इस के लगाने का उपयुक्त समय सितंबरअक्तूबर है. विभिन्न मौसम में अलगअलग दूरी पर गेंदा लगाया जाता है, जो निम्न है :

खरीफ (जून से जुलाई) : 60×45 सैंटीमीटर

रबी (सितंबर से अक्तूबर) : 45×45 सैंटीमीटर

जायद (फरवरी से मार्च) : 45×30 सैंटीमीटर

व्यावसायिक किस्में

पूसा नारंगी, पूसा वसंती एवं पूसा अर्पिता है.

खाद एवं उर्वरक

मिट्टी जांच के आधार पर उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए. खेत की तैयारी से पहले 50 क्विंटल कंपोस्ट प्रति बीघा की दर से मिट्टी में मिला दें. तत्पश्चात 33 किलोग्राम यूरिया, 125 किलोग्राम सिंंगल सुपर फास्फेट एवं 34 किलोग्राम  म्यूरेट औफ पोटाश का प्रयोग प्रति बीघा की दर से  खेत की अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें. 16.5 किलोग्राम यूरिया रोपाई के एक माह बाद और इतनी ही मात्रा रोपाई के 2 माह बाद प्रयोग करें.

सिंचाई

खेत की नमी को देखते हुए 5-10 दिनों के अंतराल पर गेंदा में सिंचाई करनी चाहिए. यदि वर्षा हो जाए, तो सिंचाई नहीं करनी चाहिए.

पिंचिंग

रोपाई के 30-40 दिन के भीतर पौधे की मुख्य शाकीय कली को तोड़ देना चाहिए. इस क्रिया से यद्यपि फूल थोड़ा देर से आएंगे, परंतु प्रति पौधा फूलों की संख्या एवं उपज  में वृद्धि होती है.

निकाईगुड़ाई एवं खरपतवार प्रबंधन

लगभग 15-20 दिन पर आवश्यकतानुसार निकाईगुड़ाई करनी चाहिए. इस से भूमि में हवा का संचार ठीक संग से होता है और वांछित खरपतवार नष्ट हो जाते हैं.

फूल की तुड़ाई

रोपाई के 60 से 70 दिन पर गेंदा में फूल आता है, जो 90 से 100 दिनों तक आता रहता है. अत: फूल की तुड़ाई/कटाई साधारणतया सुबह या सायंकाल में की जाती है. फूल को थोड़ा डंठल के साथ तोड़ना/काटना  श्रेयस्कर होता है. फूल को कार्टून, जिस में चारों तरफ एवं नीचे में अखबार फैला कर रखना चाहिए और ऊपर से फिर अखबार से ढक कर कार्टून बंद करना चाहिए.

पौध स्वास्थ्य प्रबंधन

लीफ हापर व रैड स्पाइडर इसे काफी नुकसान पहुंचाते हैं. इस की रोकथाम के लिए मैलाथियान 50 ईसी 2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

उपज

गेंदा फूल की उपज उस की देखभाल पर निर्भर करता है. आमतौर पर 30-35 क्विंटल फूल प्रति बीघा मिल जाते हैं.

नवीनतम प्रजातियों वाली फलसब्जी नर्सरी की उपलब्धता सुनिश्चित हो

बस्ती : मंडलायुक्त अखिलेश सिंह ने आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया, बस्ती का भ्रमण किया. भ्रमण के दौरान मंडलायुक्त अखिलेश सिंह ने कृषि विज्ञान केंद्र पर स्थापित विभिन्न प्रदर्शन इकाइयों, नेट हाउस एवं पौलीहाउस के अंदर उगाई जा रही सब्जियों (टमाटर, बैगन, मिर्च, फूलगोभी, पत्तागोभी, लौकी, तोरई, करेला) की नवीनतम प्रजातियों की नर्सरी एवं रंगीन आम की नवीनतम प्रजातियों जैसे पूसा श्रेष्ठ, पूसा पीतांबर, पूसा लालिमा, पूसा अरुणिका, पूसा अंबिका, टामी एट किंस, संसेशन, गुलाबखस आदि प्रजातियों की पौध नर्सरी का अवलोकन किया.

उन्होंने केंद्र पर लगे आम, अमरूद, लीची, सेब, अनार, कीवी, अंजीर, आडूबुखारा, मौसमी, आंवला आदि के मातृ वृक्षों का अवलोकन कर उस के विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त की.

केंद्राध्यक्ष, प्रो. एसएन सिंह ने मंडलायुक्त को बताया कि केवीके, बस्ती को पं. दीन दयाल उपाध्याय राष्ट्रीय कृषि विज्ञान प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त हुआ है.

Nurseryउन्होंने बताया कि केंद्र पर आईएआरआई, पूसा, नई दिल्ली से शीघ्र ही रिलीज हुई आम की नई प्रजाति पूसा दीपशिखा एवं पूसा मनोहरी और किन्नू संतरा, मौसमी, कटहल व खजूर के टिशू कल्चर पौध का रोपण कर केंद्र पर मातृ वृक्ष तैयार किया जा रहा है और केंद्र के प्रक्षेत्र पर काला नमक धान की उन्नतशील प्रजातियां पूसा नरेंद्र काला नमक-1 एवं पूसा सीआरडी काला नमक- 2 का बीजोत्पादन किया जा रहा है. इस का क्षेत्रफल आगामी वर्ष में और बढाया जाएगा, जिस से पूर्वांचल के 11 जनपदों के किसानों को काला नमक धान की उन्नतशील प्रजातियों का बीज उपलब्ध हो सके.

मंडलायुक्त अखिलेश सिंह ने केंद्र के वैज्ञानिकों को निर्देशित किया कि वे नई तकनीकों का जनपद की एग्रो क्लाईमेट में परीक्षण कर जनपद में संस्तुति देने का कार्य करें और जनपद के किसानों को वर्षभर नवीनतम प्रजातियों की सब्जी नर्सरी की उपलब्धता सुनिश्चित करें.

उन्होंने यह भी कहा कि इस केंद्र को सिर्फ जनपद के लिए मौडल न बन कर देश व प्रदेश के लिए मौडल केंद्र बन कर तकनीकी विस्तार के लिए काम करना चाहिए.

उन्होंने केंद्र के वैज्ञानिकों के साथ मीटिंग कर सभी वैज्ञानिकों से विषयवार किए जा रहे कार्यों की जानकारी हासिल की. उन्होंने निर्देशित किया कि सभी वैज्ञानिक जनपद के बेरोजगार युवाओं को रोजगार से जोडने के लिए उन्नत तकनीक की व्यवहारिक जानकारी प्रदान करें. कृषि का जीडीपी में 16.38 फीसदी योगदान है और खेती पर निर्भरता लगभग 65 फीसदी है. आप सभी का दायित्व बनता है कि उत्पादकता के साथ ही साथ पोषक तत्वों से भरपूर फसलों की प्रजातियों एवं फलों के उत्पादन हेतु प्रोत्साहित करें और त्वरित गति से नई तकनीक का जनपद में फैलाव करें.

Nurseryमंडलायुक्त अखिलेश सिंह ने गुड़ प्रसंसकरण इकाई का निरीक्षण किया और वैज्ञानिकों को निर्देशित किया कि आप लोग जनपद के किसानों को प्रेरित करें कि वे ज्यादा से ज्यादा अपना गन्ना ला कर विभिन्न प्रकार की रेसिपी का गुड़ उत्पादन का कार्य करें, जिस से जहां रोजगार का सृजन होगा, वहीं किसानों एवं बच्चों के मालन्यूट्रीशन की कमी की भी पूर्ति हो सकेगी.

केंद्र पर फलों की इतनी प्रजातियों का कलेक्शन बहुत अच्छा है, जिस का लाभ जनपद, प्रदेश एवं देश के किसानों को मिल रहा है. यह एक सराहनीय कार्य है.

मंडलायुक्त अखिलेश सिंह ने कहा कि जिला स्तर से केवीके को सहयोग प्रदान किया जाएगा, जिस में अन्य प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन इकाई जैसे मशरूम उत्पादन एवं किसान महिलाओं के लिए कम्यूनिटी सेंटर की स्थापना हेतु प्रस्ताव बनाने का निर्देश दिया. भ्रमण के दौरान डा. डीके श्रीवास्तव, डा. वीबी सिंह, डा. प्रेम शंकर, निखिल सिंह आदि उपस्थित रहे.

वैज्ञानिक विधि से कैसे करें स्ट्राबैरी की खेती

स्ट्राबैरी (फ्रेगेरिया अनानासा) यूरोपियन देश का फल है. इस का पौधा छोटी बूटी के समान होता है. इस के छोटे तने से कई पत्तियां निकलती हैं. पत्तियों के निचले हिस्से से कोमल शाखाएं निकलती हैं, जिन्हें रनर्ज कहते हैं. इन रनर्ज द्वारा स्ट्राबैरी का प्रवर्धन किया जाता है.

स्ट्राबैरी फलों का आकार व आकृति प्रजाति पर निर्भर करता है. सामान्य प्रजातियों का फल गोल से कोणाकार आकृति का होता है.

स्ट्राबैरी का फल स्वादिष्ठ और पौष्टिकहोता है. इस में विटामिन ए, बी, बी-2, विटामिन सी और खनिज पदार्थों में पोटेशियम, कैल्शियम और फास्फोरस प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं.

जलवायु

भारत में स्ट्राबैरी की खेती पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में की जा रही है. मैदानी क्षेत्रों में इस की फसल सिर्फ  सर्दियों में की जाती है, जिस के लिए अक्तूबरनवंबर माह में पौधे लगाए जाते हैं.

जमीन का चुनाव

इस की खेती हलकी रेतीली से ले कर दोमट चिकनी मिट्टी में की जा सकती है, परंतु दोमट मिट्टी और उचित जल निकास वाली जमीन इस के लिए उपयुक्त है.

खेत की जुताई कर के मिट्टी भुरभुरी बना ली जाती है. 60’×30’ की उच्चीकृत क्यारी खेत की लंबाई के अनुरूप बना ली जाती है. गोबर की सड़ी खाद 5-10 किलोग्राम और 50 ग्राम उर्वरक मिश्रण यूरिया, सुपर फास्फेट और म्यूरेट औफ पोटाश 2:2:1 के अनुपात में दिया जाता है. यह मिश्रण साल में 2 बार मार्च व अगस्त माह में दिया जाता है.

पौधे लगाने की विधि

स्ट्राबैरी की खेती के लिए अक्तूबर से नवंबर माह में रनर्ज लगाए जाते हैं. मृदा रोगों से बचाने के लिए पौधों की जड़ों को एक फीसदी कौपरऔक्सीक्लोराइड (0.2 फीसदी) या डाईथेन एम 45 (0.2 फीसदी) घोल से उपचारित किया जाता है. इस के बाद पौधों को उच्चीकृत क्यारियों में लाइन से लाइन की दूरी 30-45 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे का अंतर 15-30 सैंटीमीटर रखा जाता है.

पौधा लगाते समय क्यारियों में लगभग

15 सैंटीमीटर का छोटा गड्ढा बना कर उपचारित जड़ों के इर्दगिर्द की मिट्टी को दबा दिया जाता है, ताकि जड़ों और मिट्टी के बीच वायु न रहे. पौधे लगाने के बाद हलकी सिंचाई की जाती है.

प्रजातियां

स्ट्राबैरी की भारत में लगाई जाने वाली प्रमुख प्रजातियां हैं : टयोगा, टोरे, एनआर राउंड हैड, रैड कोट, पूसा ड्वार्फ,  कटराई स्वीट, चांडलर, सेल्वा, बेल रूबी, फर्न, पजारो, प्रीमियर, रैड कास्ट, लोकल जयोलीकोट, दिलपसंद, बैंगलौर, फ्लोरीडा 90 आदि हैं.

सिंचाई व देखभाल

स्ट्राबैरी की फसल को हलकी सिंचाई दी जाती है. सामान्य हालात में शरद ऋतु में 10-15 दिन और ग्रीष्म ऋतु में 5-7 दिन के अंतराल में सिंचाई करना जरूरी है. ड्रिप (टपकाव) विधि द्वारा सिंचाई विशेषकर लाभप्रद है. सिंचाई की मात्रा मिट्टी की गहराई और खेत के ढलानों पर निर्भर करती है.

मल्चिंग

स्ट्राबैरी की क्यारियों को काले रंग की प्लास्टिक शीट से ढकने व मल्चिंग करने से विशेष लाभ है. इस विधि द्वारा मिट्टी में नमी अच्छी रहती है और खरपतवार भी नियंत्रित रहते हैं.

मल्चिंग सर्दी के मौसम में कुहरे के कुप्रभाव और फलों का सड़ना कम करती है. पकने वाले फलों को सूखी घास या पुआल द्वारा भी ढका जा सकता है, जिस से पक्षियों द्वारा नुकसान कम किया जा सकता है.

खरपतवार नियंत्रण

क्यारियों में घास और खरपतवार नियंत्रण बहुत आवश्यक है, जो कि गहन शारीरिक श्रम कार्य है. यह स्ट्राबैरी की कृषि लागत बढ़ाने का एक प्रमुख कारण है. खरपतवारनाशक जैसे सीमाजीन (0.5 फीसदी) व पैराक्वैट (0.5 फीसदी) के प्रयोग से इन का नियंत्रण किया जा सकता है.

पौधे विकसित करने की विधि

किसान अपनी कुछ क्यारियां सिर्फ पौधे विकसित करने के लिए रख सकते हैं, जिस से अपने लिए पौधों की जरूरत पूरी की जा सकती है और सितंबरअक्तूबर माह में मैदानी क्षेत्रों के किसानों को पौधे बेच कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं.

स्ट्राबैरी के पौधे जुलाईअगस्त माह में बढ़ने के साथसाथ तने के निचले हिस्से से एक विशेष तना उगाते हैं, जिन्हें स्टोलन कहा जाता है. इन में कुछ अंतराल पर कलियां फूटती हैं, जहां पत्ते और जड़ें निकलती हैं व नए पौधे बन जाते हैं. इन नए पौधों को रनर्ज कहते हैं, जिन के द्वारा स्ट्राबैरी की खेती की जाती है.

कीट व रोग

स्ट्राबैरी की खेती को विभिन्न कीट व रोग क्षति पहुंचाते हैं. प्रमुख कीटों में तेला, माइट, कटवर्म और सूत्रकृमि प्रमुख हैं. डाईमिथोएट (0.2 फीसदी) या फोरेट जैसे कीटनाशकों के प्रयोग से इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है.

रोगों में फलों पर आने वाला भूरा फफूंद और पत्तों पर धब्बों वाले रोगों का नियंत्रण कैपटान (0.2 प्रतिशत) फफूंदनाशक रसायनों के छिड़काव से किया जा सकता है.

3 साल स्ट्राबैरी की खेती करने के बाद खेतों को कम से कम एक साल तक खाली रखना या गेहूं, जई, सरसों, मक्की और दालों की फसल उगाने से कीट, सूत्रकृमि और मृदोड़ रोगों का असर कम किया जा सकता है.

तुड़ाव और पैकिंग

स्ट्राबैरी फल अप्रैल से मई माह में पकने शुरू हो जाते हैं. पकने के समय फलों का रंग हरे से लाल रंग में बदल जाता है. फल का आधे से अधिक भाग लाल रंग का होना इस के तुड़ाव की उचित अवस्था है. फलों को तोड़ने में सावधानी रखें और रोग व क्षतिग्रस्त फलों की छंटनी जरूर करें.

फल तोड़ने के तुरंत बाद 2 घंटे शीत भंडारण करने से फलों की भंडारण अवधि बढ़ जाती है. तोड़ा हुआ फल लंबी दूरी तक आसानी से ले जाया जा सकता है. फलों की पैकिंग 200-250 ग्राम क्षमता वाले कार्डबोर्ड या सख्त प्लास्टिक के डब्बों में करना ज्यादा सही होता है.

आर्थिक मजबूती का आधार जिमीकंद की खेती

कंद वाली सब्जियों में जिमीकंद का प्रमुख स्थान है. यह देश के अलगअलग हिस्सों में कई नामों से जानी जाती है. इस के प्रमुख प्रचलित नाम ओल या सूरन भी है.

जिमीकंद सब्जी के अलावा कई तरह के स्वादिष्ठ पकवान व व्यंजन बनाने के काम में भी आता है. इस का अचार गांवों में बहुत ही स्वादिष्ठ तरीके से बनाते हैं.

जिमीकंद को पहले गृहवाटिका में ही उगाया जाता था, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों ने जिमीकंद पर निरंतर शोध कर इस की कई उन्नतशील प्रजातियां भी विकसित की, जिस से किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर इस को व्यावसायिक रूप से भी उगाया जाने लगा है.

जिमीकंद की देशी प्रजातियों में कड़वापन व चरपरापन अधिक पाया जाता है, जबकि उन्नत प्रजातियों में चरपरापन या कड़वापन न के बराबर होता है. बाजार में जिमीकंद की भारी मांग को देखते हुए इस की व्यावसायिक खेती किया जाना लाभदायक साबित हो रहा है.

जिमीकंद की खेती के लिए आर्द्र गरम व ठंडा शुष्क दोनों ही प्रकार के मौसम की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि इस से जिमीकंद के पौधों व कंदों का अच्छे तरीके से विकास होता है. बोआई के बाद जिमीकंद के बीजों के अंकुरण के लिए उच्च तापमान की आवश्यकता होती है, जबकि पौधों की बढ़वार के लिए समान रूप से अच्छी वर्षा व कंदों के विकास के लिए ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है.

खेती के लिए कैसी हो जमीन

जिमीकंद की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है, क्योंकि इस तरह की मिट्टी में कंदों की बढोतरी तेजी से होती है. जिस भूमि का चयन किया जा रहा हो, उस की जलधारण क्षमता अच्छी होनी चाहिए, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि चिकनी व रेतीली भूमि में जिमीकंद की फसल न ली जाए, क्योंकि इस तरह की मिट्टी में कंदों का विकास अवरूद्ध हो जाता है.

रोपाई से पहले खेत में कल्टीवेटर या रोटावेटर से जुताई कर के उस में पाटा लगा देना चाहिए. अच्छी पैदावार के लिए बोआई के समय ही 20 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी खाद को खेत में बिखेर देना चाहिए.

प्रजातियों का चयन

जिमीकंद की देशी प्रजाति तो पारंपरिक रूप से उगाई जाती रही है, लेकिन व्यावसायिक रूप से इस की 3 प्रजातियां अभी तक ज्यादा उपयुक्त पाई गई हैं.

गजेंद्र- 1

जिमीकंद की सर्वाधिक उत्पादन वाली प्रजाति मानी जाती है. इस प्रजाति में चरपरापन नहीं होता है, क्योंकि इस में कैल्शियम व आक्सैट की मात्रा कम पाई जाती है, जिस के चलते जीभ व गले में जलन नहीं होती है. यह प्रजाति खाने में सब से उपयुक्त होती है, इसलिए इस का बाजार भाव अन्य प्रजातियों की अपेक्षा अच्छा होता है.

इस प्रजाति के गूदे का रंग हलका गुलाबी होता है. इस प्रजाति की औसत उपज 300-400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई गई है.

संतरा गाछी

इस प्रजाति के पौधों की बढ़वार तेजी से होती है. इस के कंदों में चरचरापन अधिक पाया जाता है. कंद खुरदरे व मख्खनी होते हैं. इस के कंदों के साथसाथ छोटेछोटे धन कंद भी निकल आते हैं. इस की औसत उपज 50-75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

कोववयूर

यह अधिक उपज देने वाली प्रजाति है. इस के पौधों की बढ़वार संतरा गाछी की तरह ही होती है. अगर इस में संतरा गाछी की तरह अलग से धन कंद नही उत्पन्न होते हैं. इस की औसत उपज 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

उपरोक्त तीनों प्रजातियों की बोआई का उचित समय उत्तर भारत में फरवरी से मार्च माह व दक्षिण भारत में मई माह तक का होता है.

बोआई विधि

जिमीकंद की बोआई के लिए पहले से तैयार किए गए खेत में 3-3 फुट की दूरी पर 30 सैंटीमीटर गहरा, लंबा व चौड़ा गड्ढा खोद लिया जाता है.

इस प्रकार प्रति हेक्टेयर लगभग 10,000 गड्ढे तैयार हो जाते हैं. खेत में तैयार इन्हीं धन कंदों से अलग किए गए छोटे धन कंद, जिन का औसत भार 250 ग्राम तक का होता है, या बड़े कंदों के 500 ग्राम तक के टुकड़ों में काट कर खोदे गए गड्ढों में रोप देते हैं. इस के बाद रोपे गए स्थान पर पिरामिड आकार में मिट्टी चढ़ा देते हैं. उस के उपरांत उसे घासफूस से ढक देते हैं, जिस से खेत में से नमी न खत्म होने पाए, इस से कंदों में अंकुरण जल्दी होता है.

बीज की मात्रा

बोआई के लिए 500 ग्राम तक के बीज उपयुक्त पाए गए हैं. इस प्रकार एक हेक्टेयर के लिए 50 क्विंटल बीज की जरूरत पड़ती है.

गरमियों में मानसून से पूर्व एक सिंचाई आवश्यक होती है, जबकि कम वर्षा की दशा में नमी बनाए रखने के लिए समयसमय पर सिंचाई करते रहना चाहिए. इस के अलावा खेत में नमी बनाए रखने के लिए बोआई के उपरांत भूसी की परत, पुआल या सूखी पत्तियां बिछा देनी चाहिए, इस से खेत से नमी नहीं उड़ने पाती है.

खरपतवार व कीट नियंत्रण

जिमीकंद की फसल के साथ खरपतवार का उग आना स्वाभाविक है. ऐसे में पूरी फसल के दौरान 2-3 बार निराईगुड़ाई अवश्य करनी चाहिए.

पहली निराईगुड़ाई 40-60 दिन बाद व दूसरी 80-90 दिन बाद करनी चाहिए. साथ ही, हर गुड़ाई के बाद पौधों पर मिट्टी अवश्य चढ़ाएं.

कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया, जनपद बस्ती में फसल सुरक्षा के विशेषज्ञ डा. प्रेमशंकर के अनुसार, जिमीकंद की फसल में तंबाकू की सुंडी जो 35-40 मिमी की लंबाई में होती है. ये इस का जुलाई से सितंबर माह तक प्रकोप देखा गया है. ये पत्तियों को खा कर हानि पहुंचाती हैं. इस की रोकथाम के लिए मेथेमिल लिक्विड 1 मिलीमीटर प्रति हेक्टयर की दर से 200 मिली प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए.

रोग

जिमीकंद की फसल को मुख्यतः 2 तरह के रोग नुकसान पहुंचाते हैं.

पहला, झुलसा रोग, जो फाइटोफ्थोरा कोलोकेमी नामक फंफूद के कारण लगता है. इस से जिमीकंद की फसल की पत्तियां झुलस जाती हैं और तना गलने लगता है. साथ ही, कंदों की वृद्धि भी रुक जाती है.

दूसरा, रोग पत्ती एंव धन कंद विगलन का होता है, जिस से पत्तियां व धन कंद सड़ने लगते हैं.

दोनों रोगों के लिए सिक्सर नामक रसायन की 300 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ को 200-300 लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करना चाहिए.

खुदाई

जिमीकंद की फसल अक्तूबर माह से खुदाई के लिए हो जाती है. इसे हर हाल में नवंबर से दिसंबर माह तक खोद लेना चाहिए.

खुदाई करते समय कंद को कटने से बचाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए. खोदे गए कंद को साफ कर लेना चाहिए. कंद की खुदाई के 20 दिन पूर्व ही खेत की सिंचाई बंद कर देना चाहिए.

उपज व लाभ

जिमीकंद फसल की देखरेख व अच्छी प्रजाति के चयन पर निर्भर करती है. अगर 500 ग्राम भार के बीजों की बोआई की गई है, तो प्रति हेक्टेयर 400 क्विंटल की उपज मिलती है, जो बाजार भाव 20-40 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से आसानी से बेची जा सकती है.

रणथंभौर का अमरूद

विश्व मानचित्र पर भले ही राजस्थान के सवाई माधोपुर की पहचान रणथंभौर राष्ट्रीय वन्य जीव अभयारण्य व गढ़ रणथंभौर की वजह से होती रही हो, लेकिन अब यहां की पहचान स्वादिष्ठ और मीठे रसीले अमरूदों के लिए भी होने लगी है. सवाई माधोपुर जिला अमरूदों के बागों की धरती के रूप में विश्व मानचित्र पर अपनी धाक जमा चुका है.

सवाई माधेपुर जिले में पैदा होने वाले अमरूदों का फुटकर बाजार तकरीबन 10,000 किसानों की आमदनी का बेहतरीन जरीया सिर्फ अमरूद है.

गौरतलब है कि देश का 60 फीसदी अमरूद केवल राजस्थान में पैदा होता है. इस 60 फीसदी का भी 75-80 फीसदी हिस्सा केवल सवाई माधोपुर जिले का है.

कुल मिला कर देश का 80 फीसदी अमरूद अकेला सवाई माधोपुर जिला पैदा कर रहा है. मालूम हो कि विश्व में सब से ज्यादा अमरूद भारत में पैदा होता है.

पहले यहां के किसान रबी और खरीफ की कमरतोड़ मेहनत के बाद मुश्किल से पेट भरने व आजीविका चलाने का जुगाड़ कर पाते थे, पर अब अमरूदों के दम पर वे मोटी कमाई कर पा रहे हैं.

अब तमाम किसान बगीचों की अहमियत समझ चुके हैं. अब हर वंचित किसान भी इस की ओर आकर्षित हो रहा है. बहुत से किसानों की आज शहरी अमीरों जितनी आमदनी है. कुलमिला कर अमरूद का भविष्य सुनहरा है.

गौरतलब है कि तकरीबन 3 दशक पहले महज 5 बीघा बगीचे से शुरू हुई अमरूदों की पैदावार अब 8,000 से भी ज्यादा क्षेत्रफल में हो रही है. साल 1985 में सब से पहले करमोदा के बाशिंदे याकूब अली ने 5 बीघा जमीन पर अमरूद का बगीचा लगाया था. सवाई माधोपुर में उन्हें अमरूदों के बागों का जनक माना जाता है. यहां के अमरूद इसलिए करमोदा के नाम से भी मशहूर हैं.

यहां अमरूद का बगीचा ज्यादा आसान और ज्यादा फसल देने वाला साबित हो रहा है. ज्यादातर किसान सालभर पौधों की देखभाल करते हैं और फूल आने के साथ ही बगीचा ठेके पर दे देते हैं. पेड़ से फल तोड़ कर मंडी में पहुंचाना या आगे बेचने का काम खुद ठेकेदार ही करता है. औसतन किसान एक बीघा के बगीचे से तकरीबन डेढ़ लाख से 2 लाख रुपए सालाना कमा पा रहा है.

अमरूद के थोक कारोबारियों के मुताबिक, सवाई माधोपुर के अमरूदों की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है. यहां जैसा स्वादिष्ठ व मीठा अमरूद दूसरी जगह पैदा नहीं हो रहा है.

यहां के अमरूदों का आकार और स्वाद दूसरी मिट्टी में पैदा होने वाले अमरूदों से अलग है. यही वजह है कि यहां के अमरूदों की खाड़ी देशों तक में खासी मांग बनी रहती है.

यहां पैदा होने वाले अमरूदों में सब से ज्यादा बरफ खान गोला, एल 49, सफेदा व इलाहाबादी किस्म के अमरूद पैदा होते हैं, जो पेड़ से टूटने के 8-10 दिन तक बिना किसी नुकसान के रह जाते हैं.

यहां का अमरूद जयपुर, कोटा, दिल्ली व मुंबई की बड़ी मंडियों में जा रहा है. थोक कारोबारी इन को यहां से खरीदने के बाद मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र समेत खाड़ी देशों तक पहुंचा रहे हैं.

घर के आंगन में  आदर्श गृह वाटिका

आजकल बाजार में बिकने वाली चमकदार फलसब्जियों को रासायनिक उर्वरक का प्रयोग कर के उगाया जाता है. रसायनों का इस्तेमाल खरपतवार, कीड़े व बीमारियों रोकने के लिए किया जाता है.

इन रासायनिक दवाओं का कुछ अंश फलसब्जी में बाद तक भी बना रहता है. इस के कारण इन्हें इस्तेमाल करने वालों में बीमारियों से लड़ने की ताकत कम होती जा रही है.

इस के अलावा फलों व सब्जियों के स्वाद में अंतर आ जाता है, इसलिए हमें अपने घर के आंगन या आसपास की खाली जगह में छोटीछोटी क्यारियां बना कर जैविक खादों का इस्तेमाल कर के रसायनरहित फलसब्जियों को उगाना चाहिए.

स्थान का चयन

इस के लिए स्थान चुनने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती, क्योंकि अधिकतर ये स्थान घर के पीछे या आसपास ही होते हैं. घर से मिले होने के कारण थोड़ा कम समय मिलने पर भी काम करने में सुविधा रहती है.

गृह वाटिका के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिए, जहां पानी पर्याप्त मात्रा में मिल सके, जैसे नलकूप या कुएं का पानी, स्नान का पानी, रसोईघर में इस्तेमाल किया गया पानी पोषण वाटिका तक पहुंच सके.

स्थान खुला हो, ताकि उस में सूरज की भरपूर रोशनी आसानी से पहुंच सके. ऐसा स्थान हो, जो जानवरों से सुरक्षित हो और उस स्थान की मिट्टी उपजाऊ हो.

पोषण वाटिका का आकार

जहां तक पोषण वाटिका के आकार का संबंध है, तो वह जमीन की उपलब्धता, परिवार के सदस्यों की संख्या और समय की उपलब्धता पर निर्भर होता है.

लगातार फसल चक्र, सघन बागबानी और अंत:फसल खेती को अपनाते हुए एक औसत परिवार, जिस में 1 औरत, 1 मर्द व 3 बच्चे यानी कुल 5 सदस्य हों, ऐसे परिवार के लिए औसतन 250 वर्गमीटर की जमीन काफी है. इसी से अधिकतम पैदावार ले कर पूरे साल अपने परिवार के लिए फलसब्जियां हासिल की जा सकती है.

बनावट

आदर्श पोषण वाटिका के लिए उत्तरी भारत विशेषकर उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में उपलब्ध 250 वर्गमीटर क्षेत्र में बहुवर्षीय पौधों को वाटिका के उस तरफ लगाना चाहिए, जिस से उन पौधों की अन्य दूसरे पौधों पर छाया न पड़ सके. साथ ही, इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि ये पौधे एकवर्षीय सब्जियों के फसल चक्र और उन के पोषक तत्त्वों की मात्रा में बाधा न डाल सकें.

पूरे क्षेत्र को 8-10 वर्गमीटर की 15 क्यारियों में विभाजित कर लें और इन बातों का ध्यान रखें :

* वाटिका के चारों तरफ बाड़ का प्रयोग करना चाहिए, जिस में 3 तरफ गरमी व वर्षा के समय कद्दूवर्गीय पौधों को चढ़ाना चाहिए और बची हुई चौथी तरफ सेम लगानी चाहिए.

* फसल चक्र व सघन फसल पद्धति को अपनाना चाहिए.

* 2 क्यारियों के बीच की मेंड़ों पर जड़ों वाली सब्जियों को उगाना चाहिए.

* रास्ते के एक तरफ टमाटर और दूसरी तरफ चौलाई या दूसरी पत्ती वाली सब्जी उगानी चाहिए.

* वाटिका के 2 कोनों पर खाद के गड्ढे होने चाहिए, जिन में से एक तरफ वर्मी कंपोस्ट यूनिट और दूसरी तरफ कंपोस्ट खाद का गड्ढा हो, जिस में घर का कूड़ाकरकट व फसल अवशेष डाल कर खाद तैयार की जा सके.

इन गड्ढों के ऊपर छाया के लिए सेम जैसी बेल चढ़ा कर छाया बनाए रखें. इस से पोषक तत्त्वों की कमी भी नहीं होगी और गड्ढे भी छिपे रहेंगे.

फसल की व्यवस्था

पोषण वाटिका में बोआई करने से पहले योजना बना लेनी चाहिए, ताकि पूरे साल फलसब्जियां मिलती रहें. योजना में निम्नलिखित बातों का उल्लेख होना चाहिए :

फलसब्जियों के नाम

इन के अलावा अन्य सब्जियों को भी जरूरत के मुताबिक उगा सकते हैं :

* आलू, लोबिया, अगेती फूलगोभी.

* मेंड़ों पर मूली, गाजर, शलजम, चुकंदर, बाकला, धनिया, पोदीना, प्याज व हरे साग वगैरह लगाने चाहिए.

* बेल वाली सब्जियां जैसे लौकी, तुरई, चप्पनकद्दू, परवल, करेला, सीताफल वगैरह को बाड़ के रूप में किनारों पर ही लगाना चाहिए.

* वाटिका में पपीता, अनार, नीबू, करौंदा, केला, अंगूर, अमरूद वगैरह के पौधों को सघन विधि से इस प्रकार किनारे की तरफ लगाएं, जिस से सब्जियों पर छाया न पड़े और पोषक तत्त्वों के लिए मुकाबला न हो.

इस फसल चक्र में कुछ यूरोपियन सब्जियां भी रखी गई हैं, जो कुछ अधिक पोषण युक्त होती हैं व कैंसर जैसी बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक कूवत रखती हैं.

पोषण वाटिका को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए उस में कुछ सजावटी पौधे भी लगाए जा सकते हैं :

*      पछेती फूलगोभी, लोबिया, लोबिया (वर्षा)

*      पत्तागोभी, ग्वार, फ्रैंच, बीन

*      मटर, भिंडी, टिंडा

*      फूलगोभी, गांठगोभी (मध्यवर्ती), मूली, प्याज

*      बैगन के साथ पालक, अंत:फसल के रूप में खीरा

*      गाजर, भिंडी, खीरा

*      ब्रोकली, चौलाई, मूंगफली

*      स्प्राउट ब्रसेल्स, बैगन (लंबे वाले)

*      खीरा, प्याज

*      लहसुन, मिर्च, शिमला मिर्च

*      चाइनीज कैबेज, प्याज (खरीफ)

*      अश्वगंध (सालभर), अंत:फसल लहसुन

*      मटर, टमाटर, अरवी

पोषण वाटिका के लाभ

* जैविक उत्पाद (रसायनरहित) होने के कारण फलसब्जियों में काफी मात्रा में पोषक तत्त्व मौजूद रहते हैं.

* बाजार में फलसब्जियों की कीमत अधिक होती है, जिसे न खरीदने से अच्छीखासी बचत होती है.

* परिवार के लिए हमेशा ताजा फलसब्जियां मिलती रहती हैं.

* वाटिका की सब्जियां बाजार के मुकाबले अच्छी क्वालिटी वाली होती हैं.

* गृह वाटिका लगा कर महिलाएं अपनी व अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना सकती हैं.

* पोषण वाटिका से प्राप्त मौसमी फल व सब्जियों को परिरक्षित कर के सालभर इस्तेमाल किया जा सकता है.

* यह बच्चों के प्रशिक्षण का भी अच्छा साधन है.

* यह मनोरंजन और व्यायाम का भी एक अच्छा साधन है.

* मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी खुद उगाई गई फलसब्जियां बाजार की फलसब्जियों से अधिक स्वादिष्ठ लगती हैं.

कलम विधि से तैयार करें आम की नर्सरी

भारत में फलदार वृक्षों की बागबानी में सर्वाधिक आम की ही बागबानी की जाती रही है. लेकिन आम की बागबानी शुरू करने के लिए जरूरत होती है अधिक पैदावार देने वाली अच्छी प्रजाति के आम के पौधों की. ये पौधे उद्यान विभाग की नर्सरी या प्राइवेट नर्सरियों से खरीद कर लाते हैं, जि सके लिए आम की किस्मों के अनुसार 30 रुपए से ले कर 500 रुपए प्रति पौधों की दर से भुगतान कर के खरीदना पड़ता है.

अगर हमारे किसान स्वयं आम की प्रजाजियों की नर्सरी तैयार कर बागबानी के लिए उपयोग में लाएं, तो उन्हें विश्वसनीय प्रजाति के साथ अच्छे उत्पादन देने वाले पौधे कम लागत में प्राप्त हो सकते हैं. इसी के साथ आम की नर्सरी को कारोबारी स्तर पर तैयार कर अन्य किसानों में बेच कर अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सकती है.

आम की नर्सरी तैयार करने की सब से उपयुक्त कलम विधि होती है, क्योंकि इस विधि से हम जिस प्रजाति के पौधों को तैयार करना चाहते हैं, वह कम समय और कम लागत में तैयार हो जाती है. साथ ही, पौधे में फल भी जल्दी आना शुरू हो जाता है. इस के लिए जरूरत होती है कि जिस प्रजाति के पौधे तैयार करने हों, उस प्रजाति के 5-6 साल पुराने पौधे आप के पास लगे हों. इन्हीं पुराने पौधों के कल्ले को कलम कर बीज से तैयार पौधों में संवर्धित किया जाता है. कलम से आम की नर्सरी तैयार करने के लिए निम्न तरीके अपनाने पड़ते हैं :

आम की गुठलियों से पौध तैयार करना

आम से कलम विधि से नर्सरी तैयार करने के लिए बीजू पौधों की जरूरत पड़ती है, जिस के लिए आम की गुठलियों को जमीन में रोप कर तैयार किया जाता है.

बीज से पौध तैयार करने के लिए भूमि के चयन पर ध्यान देना जरूरी होता है. इस के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है, जिस में गोबर की सड़ी खाद या उपलब्धता के अनुसार वर्मी कंपोस्ट मिला कर मिट्टी को भुरभुरी बना लेते हैं. इस में यह भी ध्यान देना होता है कि जिस स्थान पर हम आम की गुठलियों को नर्सरी में डाल रहे हैं, वहां की जमीन समतल व ऊंची हो, जहां बरसात का पानी न लगे.

नर्सरी में आम की गुठलियों से पौध तैयार करने के लिए हमें देशी प्रजाति के बीजों की आवश्यकता पड़ती है, जो हमें जिला उद्यान विभाग या लखनऊ के मलीहाबाद के बीज उपलब्ध कराने वाली फर्मों से मिल सकते हैं.

देशी आम की गुठलियां, जिन्हें हम पपैया कहते हैं, को जुलाई के प्रथम सप्ताह से ले कर अगस्त के प्रथम सप्ताह तक 8X8 फुट की क्यारियां बना कर डालनी चाहिए. ध्यान रखें कि क्यांरियों में डाली जाने वाली गुठलियां मिट्टी में दबने न पाए, क्योंकि इस से पौध के स्थान बदलने पर जड़ के टूटने का डर रहता है. इसलिए गुठलियों को क्यारी में डालने के बाद उन को गोबर की खाद व आम की पत्तियों से ढकाई कर देनी चाहिए.

नर्सरी में डाली गई गुठलियों का जमाव 15-20 दिनों में हो जाता है. वर्तमान में गुठलियों को पौली बैग में पहले से ही डाल कर उगाया जाने लगा है. इस से अब पौधों को ट्रांसप्लांट करने के दौरान होने वाली क्षति में कमी आ गई है.

पौधो की ट्रांस प्लांटिंग

जब क्यारी के आम के पौधे 25-35 दिन के हो जाएं, तो इस की ट्रांस प्लांटिंग (पौधे का स्थान परिवर्तन) का काम किया जाता है, अन्यथा पोपैया से गुठली की जड़ टूट जाती है, जिस से पौधे के स्थान बदलने के बाद सूखने का डर बना रहता है.

पहले और आज भी सामान्य तौर पर पौधों की ट्रांस प्लांटिंग जमीन से जमीन में की जाती थी, पर नई तकनीक में पौधों की ट्रांस प्लांटिंग पौली बैग में की जाती है. ये पौली बैग पहले से तैयार कर के रखने चाहिए, जिस में गोबर की खाद, मिट्टी, बालू व भूसी को बराबर मात्रा में मिला कर भरा जाता है. इस तैयार पौली बैग में क्यारी से पौधों को निकाल कर लगाने के बाद स्प्रिंकलर या प्लास्टिक के पाइप द्वारा आवश्यकतानुसार 2-3 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए. पौली बैग में तैयार पौधे सूखते नहीं हैं.

कलम बांधने से पूर्व की तैयारी

कलम बांधने से पूर्व कुछ तैयारियां अति आवश्यक होती हैं, क्योंकि हमें जिस भी प्रजाति के आम का पौध तैयार करना है, उस के 4-6 वर्ष पुराने पौध हमारे पास उपलब्ध होने चाहिए. उस के लिए अधिक उत्पादन और अच्छी गुणवत्ता वाली प्रजातियां बांबे ग्रीन, दशहरी, लंगडा, चौसा, गौरजीत, पंत सिंदूरी, लखनऊ सफेदा, मल्लिका, खजली, आम्रपाली, रामकेला, अरुणिमा, नीलम इत्यादि हैं. अगर कलम तैयार करने के लिए आप के पास आम की अच्छी प्रजाति के पेड़ नहीं हैं, तो आप बागबानी करने वालों से भी संपर्क कर सकते हैं.

ऊपर बताई गई प्रजातियों में से जिस प्रजाति के पौधों की नर्सरी कलम विधि से तैयार करनी हो, उन पौधों की पुरानी टहनियों की काटछांट कर आम की गुठलियों को नर्सरी में डालने के पहले ही कर लें. जब इन में नए कल्ले (साइन) निकल आएं और यह 60-70 दिन पुराने हो जाएं, तो इन कल्लों को डिफलिएट यानी कल्लों के पत्तों की जड़ को डेढ़ इंच से ऊपर काट दिया जाता है. डिफलिएट किए गए कल्लों से एक से दो सप्ताह के भीतर पत्तों की जड़ झड़ जाने के बाद ये बीजू पौधों में कलम लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं.

कलम बांधना

आम की गुठलियों से तैयार पौधे की 8-9 माह में कलम बांधने योग्य हो जाते हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रायः 15 जून से 15 सितंबर तक का समय आम की नर्सरी के कलम बांधने के लिए उपयुक्त होता है. वैसे तो आम की कलम की बंधाई गरमी के महीने को छोड़ कर हर माह में की जाने लगी है.

कलम बांधने के लिए हमें पहले से तैयार किए गए उपयुक्त प्रजाति के पौधे के कल्ले, जो डिफलिएट किए गए हैं, उन्हें 6 इंच लंबाई में पेड़ से काट कर अलग कर लिया जाता है. फिर बीज से तैयार पौधे के ऊपरी हिस्से को काट दिया जाता है और काटे गए स्थान में चाकू से चीरा लगा दिया जाता है. इस के उपरांत डिफलिएट किए गए कल्ले के निचले सिरे को दोनों तरफ से छील लेते हैं, फिर बीज वाले पौधे के सिरे में इस को फिट कर दिया जाता है.

कलम के लगाने के बाद इसे प्लास्टिक की पन्नी से कस कर बांध देते हैं. बांधे गए कलम में पौलीथीन कैप, जिसे क्लेप्ट विधि कहा जाता है, ऊपर से लगा दिया जाता है. यह कैप बांधे गए कलम को सूखने से बचाता है और कलम पर मौसम का प्रभाव भी कम पडता है. इस के साथ ही यह प्लास्टिक कैप कलम की नमी को बनाए रखने के साथ उत्प्रेरक का भी काम करता है.

कलम लगाने के बाद यह ध्यान रखना जरूरी है कि पौधे की जड़ों में पर्याप्त नमी बनी रहे. कलम बांधे गए हिस्से में जड़ की तरफ निकलने वाले हिस्से को तोड़ दिया जाता है, क्योंकि उस से पौधा बीजू हो जाता है.

इस के अलावा साइज विधि से भी कलम लगाई जाती है, जिस के लिए फिफलिएट किए गए कल्ले व बीजू पौधे को छील कर आपस में बांध दिया जाता है, लेकिन इस प्रकार के कलम में 20 फीसदी पौधों के मरने की आशंका बनी रहती है.

कलम बांधने के 5-6 माह में पौधे बिक्री योग्य हो जाते हैं, पर प्लास्टिक बैग में लगाए गए कलम के पौधे 30-40 दिन के भीतर ही बिक्री के लिए तैयार हो जाता है.

कृषि वैज्ञानिक राघवेंद्र विक्रम सिंह का कहना है कि आम के पौधों की नर्सरी 50 रुपए से ले कर 500 रुपए तक में बिकती है. उन्होंने बताया कि विश्वविख्यात आम्रपाली प्रजाति बस्ती जिला उद्यान में विकसित की गई है, जिस की मांग की अपेक्षा आपूर्ति नही की जा पा रही है, क्योंकि आम्रपाली की प्रजाति कम समय में फल देना शुरू करती है. साथ ही, अन्य प्रजातियों की अपेक्षा यह जगह भी कम घेरती है.

किचन गार्डन में उगाएं स्वास्थ्यवर्धक पोई के पौधे

आजकल लोग खानपान व स्वास्थ्य को ले कर काफी सजग रहने लगे हैं, इसलिए बाजार में मिलने वाली रसायनयुक्त सागसब्जियों से बचने के लिए लोग घरों के किचन गार्डन में सब्जियां और फलफूल उगाते रहते हैं. इस के दो फायदे हैं. एक तो पैसे की बचत होती है, वहीं दूसरा फायदा यह है कि ताजी व रसायनमुक्त सागसब्जियों की उपलब्धता हनेशा रहती है.

बाजार में स्वास्थ्य के नजरिए से मुफीद अनाजों, फलों और सागसब्जियों की डिमांड काफी बढ़ी है. लोगों में बढ़ रही बीमारियों की रोकथाम में ऐसी तमाम सागसब्जियां हैं, जिस का अगर नियमित रूप से सेवन किया जाए, तो होने वाली जानलेवा व गंभीर बीमारियों की चपेट में आने की संभावना काफी कम हो जाती है.

ऐसी ही बेल वाली बहुवर्षीय साग का नाम है पोई. इसे अलगअलग प्रदेशों में अलगअलग नामों से भी जाना जाता है. इस का अंगरेजी नाम मालाबार स्पीनेच है, जबकि इसे बंगाली में पुई, हिंदी भाषी राज्यों में पोई और कन्नड़ में बेसल सोप्पू के नाम से जाना जाता है.

डायटिशियन डा. राम भजन गुप्ता के अनुसार, पोई साग में अन्य साग की अपेक्षा कई गुना ज्यादा पोषक तत्व होते हैं. इस में विटामिन ए, बी और सी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है. साथ ही, पोई में दूसरे सागों की तुलना में कई गुना ज्यादा आयरन पाया जाता है.

पोई साग की 100 ग्राम मात्रा में 10 मिलीग्राम आयरन, 87 मिलीग्राम कैल्शियम और 35 मिलीग्राम फास्फोरस पाया जाता है.

डा. राम भजन गुप्ता के अनुसार, पोई साग का अगर नियमित रूप से सेवन किया जाए, तो हार्ट की बीमारी की संभावना बहुत कम होती है. साग के रूप में इस का उपयोग करने से आंत के कैंसर से बचाव होता है. वहीं पोई स्किन को सुरक्षित रखता है.

पोई में पाया जाने वाला डायटरी फाइबर कब्ज से बचाता है, वहीं इस का उपयोग कोलेस्ट्राल लेवल को कम करने के साथ ही रक्त में थक्का बनने से रोकता है.

पोई का साग उपयोग करने वालों को नींद अच्छी आती है. विदेशों में पोई के साग की काफी मांग है. पोई का उपयोग पकौड़े बनाने में भी किया जाता है, जो खाने में बेहद लजीज होता है.

पोई का उपयोग : डा. राम भजन गुप्ता के मुताबिक, पोई की पत्तियों से साग, पकौड़े, सलाद, और सूप जैसे पकवान तैयार किए जाते हैं. पोई से घरों को सजाने के लिए इंडोर पौध के रूप में सजावट के लिए भी उपयोग किया जाता.

वैसे तो पोई का पौधा बारिश के मौसम में अपनेआप उग आता है. इस के तने का रंग लाल और पत्तियां हरे रंग की होती हैं. इस के पत्ते दिल के आकार के मोटे होते हैं. इस की 2 किस्में अधिक पाई जाती हैं, पहली लाल और दूसरी हरी.

खेती करने योग्य मिट्टी

कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के वैज्ञानिक (कृषि प्रसार) राघवेंद्र विक्रम सिंह का कहना है कि पोई की रोपाई के लिए जीवांशयुक्त दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी होती है. पोई की रोपाई अगर खेतों में करनी है, तो खेत की अच्छी तरह से जुताई कर मिट्टी में सड़े गोबर की खाद, नाडेप या वर्मी कंपोस्ट को मिला देना उपयुक्त होता है. किचन गार्डन में रोपाई के लिए गमलों में गोबर की खाद मिली मिट्टी भर दें और उस में पानी डाल कर उपयुक्त नमी बना लें. जब मिट्टी भुरभुरी हो जाए, तो उचित नमी रहते हुए इस में पोई की रोपाई कर दें.

रोपाई का उचित समय : यह बहुवर्षीय फसल के रूप में उगाया जाता है. इसे एक बार रोपने के बाद कई वर्षों तक इस से साग योग्य पत्तियां प्राप्त की जा सकती हैं. जहां तक इस की रोपाई के उचित समय का सवाल है, तो फरवरी से ले कर जुलाई माह तक का समय सब से मुफीद होता है. वैसे, इसे पूरे साल कभी भी रोपा जा सकता है. सर्दी के मौसम में बीज से पौध उगने में समय लगता है.

रोपाई की विधि : इस की रोपाई 2 विधियों से की जाती है. पहली कटिंग विधि से और दूसरी बीजों द्वारा. बीज को गमलों या जमीन में बोने के लिए 2 से 3 बीज एकसाथ मिट्टी में डालने चाहिए. बीज को 1 से 2 इंच की गहराई में डालें. अगर इसे कटिंग विधि से रोपा जाना है, तो बेल को 14 इंच की लंबाई में टुकड़ेटुकड़े काट कर मिट्टी में 5 इंच की गहराई में गाड़ दें. अगर पोई को सीधे ही जमीन पर रोपा जाना है, तो न्यूनतम पौध से पौध की दूरी 30 सैंटीमीटर और लाइन से लाइन की 75 सैंटीमीटर न्यूनतम दूरी रखें. बीज से रोपे गए पौधे एक से दो सप्ताह में और कटिंग विधि से रोपे गए पौधे 10 से 20 दिन में उग आते हैं.

चूंकि यह बेल वाली पौध है, इसलिए इस के लिए मचान या बाड़ लगा कर बेलों को उस के ऊपर फैलने दें. इस के पौधे 10-20 फुट तक लंबे होते हैं.

सिंचाई और उर्वरक : 15 दिनों के अंतराल पर पोई की फसल को पानी देते रहना चाहिए. गरमियों में 5 से 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहें. पोई के पौधों में कैमिकल खाद का उपयोग करने से बचना चाहिए. इस के प्रत्येक पौधों में प्रत्येक 3 माह पर 500 ग्राम गोबर, नाडेप या वर्मी खाद का उपयोग करें.

कीट और रोग नियंत्रण : इस के पौधों में आमतौर पर किसी तरह की बीमारियों और कीटों का प्रकोप नहीं होता है. लेकिन कभीकभी एक परजीवी के कारण पत्तियों पर लाल धब्बे से बन जाते हैं. इस रोग का प्रकोप दिखने पर रोगग्रस्त पत्तियों को तोड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

उपज : पोई के पौधों से प्रत्येक सप्ताह पत्तियों की तुड़ाई करते रहना चाहिए. पोई की फसल से एक वर्ष में 10 वर्गमीटर में लगभग 40-60 किलोग्राम पत्तियां प्राप्त होती हैं, जिस का आम बाजार रेट 50 से 100 रुपया किलोग्राम है.