तिलहन फसलों को बढ़ावा,मनाया गया सरसों प्रक्षेत्र दिवस (Mustard Field Day)

छिंदवाड़ा: जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, छिंदवाड़ा द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत तिलहन फसल (Oilseed Crops) का रकबा बढ़ाने के लिए मिशन के अंतर्गत संचालित समूह पंक्ति प्रदर्शन में ग्राम खैरवाड़ा में सरसों का प्रक्षेत्र दिवस (Mustard Field Day) मनाया गया.

इस कार्यक्रम में किसान राजेश बट्टी व सोमलाल बट्टी के प्रक्षेत्र पर सरसों की किस्म आरएच 749 प्रदर्शन का अवलोकन किया गया, जिस में गांव के प्रगतिशील किसानों ने बढ़चढ़ कर सहभागिता की.

कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डा. डीसी श्रीवास्तव ने कार्यक्रम में बताया कि किसानों को जिले में तिलहनी फसल द्वारा सरसों का रकबा बढ़ाने के लिए सल्फर व एनपीके उर्वरक के उचित प्रबंधन पर विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई.

केंद्र के उद्यानिकी विषय से संबंधित वैज्ञानिक डा. आरके झाडे ने लहसुन व प्याज का उत्पादन बढ़ाने और उन का रखरखाव करने के संबंध में किसानों के बीच जानकारी साझा की. केंद्र की महिला वैज्ञानिक डा.सरिता सिंह ने सरसों फसल में लगने वाले रोग, कीट आदि को नियंत्रित करने और अधिक उत्पादन के लिए सरसों की विभिन्न किस्मों से अवगत कराया.

केंद्र के तकनीकी अधिकारी सुंदरलाल अलावा ने किसानों को सरसों की फसल में प्राकृतिक खेती के घटक जैसे बीजामृत, जीवामृत, घन जीवामृत और आच्छादन आदि पर जानकारी दी.

मिर्ची की खेती (Chilli Cultivation) ने बदली गांव की तसवीर

राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के खंडार उपखंड के छान गांव का नजारा इन दिनों लालिमा लिए हुए है. यदि पहाड़ की ऊंचाई पर चढ़ कर देखें, तो दूरदूर तक सिर्फ मिर्ची ही मिर्ची सूखती हुई दिखाई देती हैं. यहां की मिर्ची न केवल देश में, बल्कि विदेशों में भी धूम मचा रही है. देशभर के व्यापारी गांव में आ कर मंडी लगाते हैं और यहां से विदेशों तक सप्लाई करते हैं.

किसान फारुख खान, गुलफाम एवं जुनैद खान ने बताया कि गांव में सभी किसान मिर्ची का उत्पादन करते हैं. हमारे गांव की जलवायु मिर्ची के लिए बहुत उपयोगी है. पहले हम भी सामान्य तरीके से गेहूं, सरसों, चना, ज्वार, बाजरा, तिल की फसल लेते थे, पहले गांव के किसानों की स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन जब से मिर्ची एवं अन्य सब्जियों का उत्पादन वैज्ञानिक विधियों से करने लगे हैं, किसानों के दिन बदलने लगे हैं.

गांव में मिल रहा है लोगो को रोजगारः-

आज हमारे गांव में राजस्थान व मध्य प्रदेश के लगभग 2,000 लोगों को 9-10 माह तक लगातार मिर्ची की फसल से रोजगार मिल रहा है. लोग अस्थाई तौर पर यहां आ कर रहने लगे हैं.

जब मजदूरों से बात की, तो बोले कि हमें रोज 500-600 रुपए मजदूरी के रूप में मिल जाते हैं. हम परिवार सहित यहां रहते हैं.

Mirch

किसानों से जब छान की मिर्ची के प्रसिद्ध होने का राज पूछा, तो उन्होंने बताया कि हम उन्नत किस्म के बीजों का चयन करते हैं, वैज्ञानिक सलाह के अनुसार संतुलित मात्रा में खाद, उर्वरक एवं दवाओं का उपयोग करते हैं, समयसमय पर निराईगुड़ाई एवं रोग से ग्रसित पौधों का उपचार करते हैं.

हमारा गांव चारों तरफ से पहाड़ से घिरा हुआ है, इसलिए यहां सर्दी के मौसम में पाले एवं सर्दी का प्रकोप कम होता है, जिस वजह से सर्दी के मौसम में यहां फसल में नुकसान कम होता है.

उन्होंने बताया कि पहाड़ की वजह से जमीन की तुलना में पत्थर गरम रहता है और जब हम पहाड़ पर मिर्ची सुखाते हैं, तो नीचे एवं ऊपर का तापमान अच्छा होने की वजह से मिर्ची का रंग गहरा लाल हो जाता है. इसलिए उत्तर प्रदेश के किसानों से भी व्यापारी मिर्ची खरीद कर यहां सुखाने लाते हैं.

जब किसानों से फसल से मिलने वाले मुनाफे की बात की, तो किसान जुनैद एवं फारुख खान ने कुछ यों समझाया मुनाफे का गणित:

एक बीघा यानी 0.25 हेक्टेयर में यदि मौसम खराब हो या अन्य परिस्थिति अनुकूल न हो तो 150 मण उत्पादन हो जाता है. यदि सारी परिस्थिति अनुकूल हो, तो ये उत्पादन 500 मण तक हो जाता है, लेकिन हम 300 मण औषत उत्पादन मान लेते हैं.

औसत भाव 25 रुपए किलोग्राम मिल जाता है. इस प्रकार एक बीघा में औसत उत्पादन 3,00,000 रुपए तक हो जाता है, जिस में अधिकतम 1,00,000 रुपए तक खर्चा हो जाता है. इस प्रकार हमें लगभग 2,00,000 रुपए तक प्रति बीघा मुनाफा मिल जाता है.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) में किसानों के लिए 3 नई सौगातें

नई दिल्ली: 8 फरवरी 2024. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और जनजातीय कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के अंतर्गत केंद्रीयकृत ‘‘किसान रक्षक हेल्पलाइन 14447 और पोर्टल”, कृषि बीमा सैंडबौक्स फ्रेमवर्क प्लेटफार्म ‘सारथी’ एवं कृषि समुदाय के लिए लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम (एलएमएस) प्लेटफार्म का दिल्ली में समारोहपूर्वक शुभारंभ किया.

इस अवसर पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री कैलाश चैधरी, केंद्रीय कृषि सचिव मनोज अहूजा भी उपस्थित थे.

कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि यह देश गांवों का देश है, किसानों का देश है. किसानों को आगे बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में कृषि मंत्रालय लगातार काम कर रहा है.

किसानों को उन्नत करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि किसानों के सामथ्र्य, ताकत, मजबूती से ही देश का सामथ्र्य व मजबूती है.

इसे ध्यान में रखते हुए व किसान समुदाय की उन्नति को रेखांकित करते हुए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय काम कर रहा है. सरकार की ओर से संचालित योजनाओं के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है.

उन्होंने इस दिशा में सरकार द्वारा निरंतर किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान में वसर मिल रहा है कि तकनीकी रूप से भी किसानों को सशक्त बनाने में सहयोगी बनें.

किसानों से डिजिटली जुड़ते हुए उन्हें आगे बढ़ाने के लिए काम करें. इसी नवाचार के तहत प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत कृषि रक्षक पोर्टल व हेल्पलाइन, सैंडबौक्स फ्रेमवर्क एवं एलएमएस प्लेटफार्म का शुभारंभ हुआ है.

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार कृषि क्षेत्र को उच्च प्राथमिकता देती है व इसे अधिक कुशल, प्रतिस्पर्धी, आय उन्मुख व लचीला बनाने की लिए निरंतर प्रयासरत है. कृषि मंत्रालय की प्रमुख योजनाओं में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शामिल हैं.

साथ ही, 10,000 नए किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) का गठन किया जा रहा है, जिस के सकारात्मक नतीजे भी मिल रहे हैं. प्रधानमंत्री सिंचाई कार्यक्रम, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, बागबानी मिशन, सतत कृषि पर राष्ट्रीय मिशन, किसान क्रेडिट कार्ड आदि के जरीए भी किसानों की जरूरतों व लाभ के लिए मंत्रालय काम कर रहा है.

उन्होंने आगे कहा कि इन योजनाओं का मुख्य उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना व कृषि कार्यों में जोखिम कम करना है. वर्तमान में कृषि क्षेत्र को ज्यादा ग्रोथ के लिए जहां निवेश की जरूरत है, वहीं प्राकृतिक या मानव निर्मित कारणों से होने वाले नुकसान के जोखिम को कम करने की भी जरूरत है.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना इस के लिए काफी कारगर साबित हुई है. योजना के प्रारंभ से अभी तक इस में 15 करोड़ से ज्यादा किसान जुड़े हैं और अब तक किसानों के 29,237 करोड़ रुपए के प्रीमियम के मुकाबले 1.52 लाख करोड़ रुपए के दावों का पेमेंट किया गया है.

उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना छोटे व सीमांत किसानों के लिए वरदान साबित हुई है. महाराष्ट्र, ओडिशा, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सरकारें किसान प्रीमियम के रूप में केवल एक रुपए के साथ सार्वभौमिक कवरेज प्रदान कर के किसानों का समर्थन करने के लिए आगे आई हैं.

पिछले कुछ समय में योजना के क्रियान्वयन में सुधार के प्रयास भी लगातार जारी हैं. सरकार प्रतिबद्ध है कि कृषि क्षेत्र में ऐसी योजनाओं को आगे बढ़ाएं, जिस से किसानों के लिए जोखिम कम हों व आय बेहतर हो सके.

उन्होंने अधिकारियों से कहा कि कोशिश होनी चाहिए कि किसानों की समस्या का समाधान डाटा के साथ करने में समर्थ हों.

इस का विशेष ध्यान रखें कि हमारे अन्नदाता निराश न हों, बल्कि उन का सरकार के प्रति विश्वास और बढ़े, उन्हें महसूस होना चाहिए कि उन के पीछे पूरी ताकत से सरकार खड़ी है और वे आगे बढ़ रहे है.

कृषि मंत्रालय प्रधानमंत्री मोदी के वर्ष 2047 तक विकसित भारत निर्माण के संकल्प को पूरा करने के लिए लगन से काम कर रहा है.

किसान युवा, मातृशक्ति, गरीब सभी के लिए काम हो रहा है. कृषि मंत्रालय, संगठित रूप में किसानों के लिए काम कर रहा है, जिस का लाभ देश के अन्नदाताओं को मिल रहा है.

फसल विविधीकरण, मूल्य वृद्धि और विपणन पर कार्यक्रम

उदयपुर: महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संगठक, अनुसंधान निदेशालय के अधीनस्थ फसल विविधीकरण परियोजना के अंतर्गत 2 दिवसीय विस्तार अधिकारियों का प्रशिक्षण कार्यक्रम सहायक निदेशक, कृषि कार्यालय, बेगू, चित्तौड़गढ़ में संपन्न हुआ.

प्रशिक्षण कार्यक्रम में परियोजना अधिकारी डा. हरि सिंह ने परियोजना की जानकारी देते हुए फसल विविधीकारण एवं मूल्य संवर्धन के महत्व की जानकारी देते हुए बताया कि किसान किस प्रकार बाजार को देखते हुए अपनी फसलों का विविधीकरण व विपणन करेगा.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि शंकर लाल जाट, उपनिदेशक, उद्यान, चित्तौड़गढ़ ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए फसल विविधीकरण में मूल्य संवर्धन के महत्व को बताते हुए बताया कि मूल्य संवर्धन से किसानों की आय एवं रोजगार सृजन में वृद्धि होगी.

हरिकेश चैधरी, सहायक निदेशक कृषि, बेगू, चित्तौड़गढ़ ने प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित करते हुए बताया कि फसल विविधीकरण से फसल की उत्पादकता, भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ेगी एवं बाजार भाव भी ज्यादा मिलेगा.

मुकेश वर्मा, संयुक्त निदेशक, उद्यानिकी ने बताया कि बागबानी फसलों का फसल विविधीकरण में बड़ा महत्व है. बागबानी फसलों का मूल्य संवर्धन कर किसान दोगुनी आय एवं रोजगार प्राप्त कर सकता है.

जोगेंद्र सिंह, कृषि अधिकारी, उद्यान, चित्तौड़गढ़ ने बागबानी फसलों में जल प्रबंधन की तकनीकी जानकारी, उस में लगने वाले रोग एवं निदान पर विस्तार से बताया. डा. बुद्धि प्रकाश मीणा, पशु चिकित्साधिकारी, बेगू, चित्तौड़गढ़ ने पशुओं में नस्ल सुधार एवं पशुपालन प्रबंधन पर विस्तार से सरकारी योजनाओं का महत्व बताया.

कार्यक्रम में डा. हंसराज धाकड़, कृषि अधिकारी ने कृषि में सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में जानकारी दी. कार्यक्रम में परियोजना से हेमंत कुमार लांबा, रामजी लाल बडसरा एवं एकलिंग सिंह उपस्थित थे. प्रशिक्षण कार्यक्रम में 40 कृषि पर्यवेक्षक एवं विस्तार अधिकारियों ने भाग लिया.

महिलाओं को मिलेट्स (Millets) से पोषक उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग

उदयपुर: महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत कार्यस्त अखिल भारतीय समन्वित कृषिरत महिला अनुसंधान परियोजना द्वारा बडगांव पंचायत समिति के गांव धूर में ‘जैसा तन वेसा मन’ विषय पर 3 दिवसीय महिला प्रशिक्षण का आयोजन प्रशिक्षण प्रभारी डा. विशाखा सिंह के निर्देशन में 5 फरवरी से 7 फरवरी 2024 को किया गया.

यह प्रशिक्षण धूर गांव में न्यूट्री स्मार्ट विलेज स्कीम के अंतर्गत आयोजित किया गया, जिस का उद्देश्य महिलाओं में पोषण व स्वास्थ्य और खुशहाल जीवनशैली के प्रति जागरूकता लाना एवं मिलेट्स (पोषक अनाजों) से मूल्य संवर्धित उत्पाद बनाने का कौशल विकसित करना था.

आहार एवं पोषण वैज्ञानिक डा. सुमित्रा मीना ने महिलाओं को स्वस्थ रहने के लिए उचित आहार एवं पोषण का महत्व एवं पोषक अनाजों की स्वास्थ्य उपयोगिता और इन के मूल्य संवर्धित उत्पादों की जानकारी दी.

उन्होंने आगे बताया कि महिलाओं को मिलेट्स के उत्पाद ज्वार मामरा नमकीन, मिलेट्स के शक्करपारे, मिलेट मठरी, लड्डू इत्यादि बनाना सिखाया गया. वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. गायत्री तिवारी ने महिलाओं को खुशहाल जीवन जीने के तौरतरीके सिखाए, प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में जागरूक किया, मनोरंजक खेल खिलाए एवं स्वस्थ रहने के लिए महिलाओं से आग्रह किया कि आप जीवन में व्यस्त रहें, मस्त रहें.

प्रशिक्षण के दौरान प्रश्नोत्तरी एवं खेल प्रतियोगिता भी आयोजित की गई. समापन समारोह में विजेता प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाणपत्र एवं उपहार भेट कर सम्मानित किया गया.

मुख्य अतिथि सरपंच जगदीश बंद्र गांछा ने महिलाओं से प्रशिक्षण के दौरान मिली जानकारी का उपयोग अपने पोषण स्तर को सुधारने एवं सुखद जीवन जीने में करने को कहा.

अंत में वंग प्रोफैशनल डा. खेहा ने धन्यवाद व्यक्त किया. इस प्रशिक्षण के आयोजन में डा. प्रियंका जोशी एवं दीपाली का भी विशेष योगदान रहा.

फसल बीमा योजना के लिए हेल्पलाइन और पोर्टल ‘सारथी’ (Sarthi) की शुरुआत

नई दिल्ली: 7 फरवरी 2024. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय 8 फरवरी, 2024 को देश के कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए 3 महत्वपूर्ण पहल शुरू करने जा रहा है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और जनजातीय कार्य मंत्री अर्जुन मुंडा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के अंतर्गत केंद्रीयकृत ‘किसान रक्षक हेल्पलाइन 14447 और पोर्टल‘, कृषि बीमा सैंडबौक्स फ्रेमवर्क प्लेटफार्म ‘सारथी‘ व कृषि समुदाय के लिए लर्निंग मैनेजमैंट सिस्टम (एलएमएस) प्लेटफार्म एक समारोह में लौंच करेंगे.

कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री कैलाश चैधरी भी उपस्थित रहेंगे. ये पहलें डिजिटल नवाचार व व्यापक जोखिम सुरक्षा समाधानों के माध्यम से किसान समुदाय के कल्याण और स्थायित्व को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सिद्ध होगी. राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस डिवीजन के सहयोग से लर्निंग मैनेजमैंट सिस्टम कृषि क्षेत्र में प्रशिक्षण व जानकारी साझा करेगा. यह प्रमुख कृषि योजनाओं को लागू करने की चुनौतियों का समाधान भी करेगा और हितधारकों के बीच निरंतर सीखने और समन्वय को सुविधाजनक बनाएगा.

इसी तरह सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत एक केंद्रीयकृत ‘‘किसान रक्षक हेल्पलाइन और पोर्टल‘‘ विकसित किया है. अब इस योजना के अंतर्गत नामांकित सभी किसान या जो भी किसान अपनी फसल का बीमा कराना चाहते हैं, वे अपनी चिंताओं और शिकायतों को दर्ज करने के लिए हेल्पलाइन नंबर 14447 पर फोन कर सकते हैं, जिस से समय पर समर्थन और पारदर्शी संचार सुनिश्चित होगा.

पारंपरिक फसल बीमा से परे जा कर सरकार ने ‘सारथी’ एक व्यापक बीमा प्लेटफार्म विकसित किया है.

यह एप किसान समुदाय की विविध जरूरतों को पूरा करने के लिए कई बीमा उत्पाद प्रदान करता है, जिस में स्वास्थ्य और जीवन बीमा से ले कर कृषि उपकरणों और अन्य के लिए कवरेज शामिल है. यह पहल सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप है.

सरकार ने सालभर में येस टैक, डिजिक्लेम, विंड्स, क्रोपिक, ऐड एप जैसी नई तकनीकें पेश कर के देश के किसानों के लिए व्यापक जोखिम सुरक्षा और समर्थन सुनिश्चित करने के लिए मजबूत कृषि बीमा पारिस्थितिकी स्थापित करने का लक्ष्य रखा है. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का मानना है कि ये पहलें देश के कृषि क्षेत्र में एक नया अध्याय लिखेंगी और किसानों के जीवन व आजीविका में सकारात्मक बदलाव लाएंगी.

पशुपालन (Animal Husbandry) को प्रोत्साहन

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नई दिल्लीः केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अवसंरचना विकास कोष (आईडीएफ) के तहत लागू किए जाने वाले पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (एएचआईडीएफ) को 29,610.25 करोड़ रुपए के परिव्यय के साथ वर्ष 2025-26 तक अगले 3 सालों के लिए जारी रखने की मंजूरी दे दी.

यह योजना डेयरी प्रसंस्करण और उत्पाद विविधीकरण, मांस प्रसंस्करण यानी मीट प्रोसैसिंग और उत्पाद विविधीकरण, पशु चारा संयंत्र, नस्ल गुणन फार्म, पशु अपशिष्ट से धन प्रबंधन (कृषि-अपशिष्ट प्रबंधन) और पशु चिकित्सा वैक्सीन और दवा उत्पादन सुविधाओं के लिए निवेश को प्रोत्साहित करेगी.

भारत सरकार अनुसूचित बैंक और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी), नाबार्ड और एनडीडीबी से 90 फीसदी तक ऋण के लिए 2 साल की मुहलत सहित 8 सालों के लिए 3 फीसदी ब्याज अनुदान प्रदान करेगी. पात्र संस्थान अलगअलग होंगे, निजी कंपनियां, एफपीओ, एमएसएमई, धारा 8 कंपनियां हैं. अब डेयरी सहकारी समितियां डेयरी संयंत्रों के आधुनिकीकरण, सुदृढ़ीकरण का भी लाभ उठाएंगी.

भारत सरकार एमएसएमई और डेयरी सहकारी समितियों को 750 करोड़ रुपए के ऋण गारंटी कोष से उधार लिए गए ऋण की 25 फीसदी तक ऋण गारंटी भी प्रदान करेगी.

एएचआईडीएफ ने योजना के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक 141.04 एलएलपीडी (लाख लिटर प्रतिदिन) दूध प्रसंस्करण क्षमता, 79.24 लाख मीट्रिक टन फीड प्रसंस्करण क्षमता और 9.06 लाख मीट्रिक टन मांस प्रसंस्करण क्षमता को आपूर्ति श्रंखला में जोड़ कर गहरा असर डाला है. यह योजना डेयरी, मांस और पशु चारा क्षेत्र में प्रसंस्करण क्षमता को 2-4 फीसदी तक बढ़ाने में सक्षम है.

पशुपालन क्षेत्र के निवेशकों के लिए पशुधन क्षेत्र में निवेश करने का अवसर प्रस्तुत करता है, जिस से यह क्षेत्र मूल्यवर्धन, कोल्ड चेन और डेयरी, मांस, पशु चारा इकाइयों की एकीकृत इकाइयों से ले कर तकनीकी रूप से सहायता प्राप्त पशुधन और पोल्ट्री फार्म, पशु अपशिष्ट से ले कर धन प्रबंधन और पशु चिकित्सा औषधि व वैक्सीन इकाइयों की स्थापना तक एक आकर्षक क्षेत्र बन जाता है.

तकनीकी रूप से सहायता प्राप्त नस्ल गुणन फार्म, पशु चिकित्सा दवाओं और वैक्सीन इकाइयों को मजबूत करना, पशु अपशिष्ट से धन प्रबंधन जैसे नए कामों को शामिल करने के बाद, यह योजना पशुधन क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के उन्नयन के लिए एक बड़ी क्षमता प्रदर्शित करेगी.

यह योजना उद्यमिता विकास के माध्यम से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 35 लाख लोगों के लिए रोजगार सृजन का एक माध्यम होगी. इस का उद्देश्य पशुधन क्षेत्र में धन सृजन करना है. अब तक एएचआईडीएफ ने तकरीबन 15 लाख किसानों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित किया है.

एएचआईडीएफ किसानों की आय को दोगुना करने, निजी क्षेत्र के निवेश के माध्यम से पशुधन क्षेत्र का दोहन करने, प्रोसैसिंग और मूल्य संवर्धन के लिए नवीनतम तकनीकों को लाने और पशुधन उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा दे कर देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने के प्रधानमंत्री के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक मार्ग के रूप में उभर रहा है. पात्र लाभार्थियों द्वारा प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन बुनियादी ढांचे में इस तरह के निवेश से इन संसाधित और मूल्यवर्धित वस्तुओं के निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा.

इस प्रकार एएचआईडीएफ में प्रोत्साहन द्वारा निवेश न केवल निजी निवेश को 7 गुना बढ़ा देगा, बल्कि किसानों को जानकारी पर अधिक निवेश करने के लिए भी प्रेरित करेगा, जिस से उत्पादकता और किसानों की आय में वृद्धि होगी.

संसाधनों का समुचित उपयोग प्राकृतिक खेती (Natural Farming) में संभव

उदयपुर: 6 फरवरी, 2024. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के तत्वावधान में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित जैविक खेती पर अग्रिम संकाय प्रशिक्षण केंद्र के तहत 21 दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘‘प्राकृतिक कृषि – संसाधन संरक्षण एवं पारिस्थितिक संतुलन के लिए दिशा एवं दशा’’ का आयोजन अनुसंधान निदेशालय, उदयपुर द्वारा 6 फरवरी से 26 फरवरी, 2024 तक किया जा रहा है.

इस अवसर पर डा. अजीत कुमार कर्नाटक, कुलपति, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी  विश्वविद्यालय, उदयपुर ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने उद्बोधन में बताया कि पूरेे विश्व में ‘‘संसाधन खतरे’’ (resource threats) खासतौर पर मिट्टी की गुणवत्ता में कमी, पानी का घटता स्तर, जैव विविधता का घटता स्तर, हवा की बिगड़ती गुणवत्ता और पर्यावरण के पंच तत्वों में बिगड़ता गुणवत्ता संतुलन के कारण हरित कृषि तकनीकों के प्रभाव टिकाऊ नहीं रहे हैं.

उन्होंने आगे बताया कि बदलते जलवायु परिवर्तन के परिवेश एवं पारिस्थितिकी संतुलन के बिगड़ने से इनसानी सेहत, पशुओं की सेहत और बढ़ती लागत को प्रभावित कर रहे हैं और अब वैज्ञानिक तथ्यों से यह स्पष्ट है कि भूमि की जैव क्षमता से अधिक शोषण करने से एवं आधुनिक तकनीकों से खाद्य सुरक्षा एवं पोषण सुरक्षा नहीं प्राप्त की जा सकती है.

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि किसानों का मार्केट आधारित आदानों पर निर्भरता कम करने के साथसाथ स्थानीय संसाधनों का सामूहिक संसाधनों के प्रबंधन के साथ प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना चाहिए.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि 21वीं सदीं में सभी को सुरक्षित एवं पोषण मुक्त खाद्य की आवश्यकता है. इसलिए प्रकृति व पारिस्थितिक कारकों के कृषि में समावेश कर के ही पूरे कृषि तंत्र को ‘‘शुद्ध कृषि’’ की तरफ बढ़ाया जा सकता है.

भारतीय परंपरागत कृषि पद्धति योजना के तहत देश के 10 राज्यों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है. इस से कम लागत के साथसाथ खाद्य पोषण सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा. जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों के तहत खेती को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्राकृतिक खेती के घटकों को आधुनिक खेती में समावेश करना जरूरी है.

 

Natural Farming

डा. एसके शर्मा, सहायक महानिदेशक, मानव संसाधन प्रबंधन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने कार्यक्रम की आवश्यकता एवं उद्देश्य के बारे में बताया कि उर्वरकों के प्रयोग को 25 फीसदी और पानी के उपयोग को 20 फीसदी तक कम करना, नवीनीकरण ऊर्जा के उपयोग में 50 फीसदी की वृद्धि और ग्रीनहाऊस उत्सर्जन को 45 फीसदी कम करना एवं तकरीबन 26 मिलियन हेक्टेयर भूमि सुधार करना हमारे देश की आवश्यकता है.

इस के लिए प्राकृतिक खेती को देश को कृषि के पाठ्यक्रम में चलाने के साथसाथ नई तकनीकों को आम लोगों तक पहुंचाना समय की जरूरत है, जो कि वर्तमान समय में देश के कृषि वैज्ञानिकों के सामने एक मुख्य चुनौती है. प्राकृतिक खेती में देशज तकनीकी जानकारी और किसानों के अनुभवों को भी साझा किया जाएगा. इस प्रशिक्षण में देश के 13 राज्यों के 17 संस्थानों से 23 वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं.

डा. एसके शर्मा ने आगे बताया कि प्राकृतिक खेती आज की अंतर्राष्ट्रीय व विश्वस्तरीय  जरूरत है. प्राकृतिक खेती पर अनुसंधान पिछले 3 सालों से किया जा रहा है. जापान में प्राकृतिक खेती पुराने समय से चल रही है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली पूरे भारत में स्नातक स्तर पर पाठ्यक्रम शुरू कर चुकी है.
डा. अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान ने सभी अतिथियों के स्वागत के बाद कहा कि प्राकृतिक खेती से मिट्टी की सेहत को सुधारा जा सकता है. प्राकृतिक खेती के द्वारा लाभदायक कीटों को बढ़ावा मिलता है.

जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राकृतिक खेती द्वारा प्राकृतिक संसाधन का संरक्षण एवं पारिस्थितिक संतुलन को बढ़ावा मिलता है.

उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि आज देश का खाद्यान्न उत्पान तकरीबन 314 मिलियन टन हो गया है और बागबानी उत्पादन करीब 341 मिलियन टन हो गया है. क्या देश में 2 से 5 फीसदी कृषि क्षेत्र पर प्राकृतिक कृषि को चिन्हित किया जा सकता है?

यह संभव है, लेकिन इस के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित मानव संसाधन की आवश्यकता है, जो किसानों तक सही पैकेज औफ प्रैक्टिसेज व तकनीकी जानकारी पहुंचा सके, किसानों को मार्केट से जोड़ सके.

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के निदेशक, अधिष्ठाता, विभागाध्यक्ष एवं संकाय सदस्य उपस्थित रहे. कार्यक्रम का संचालन प्रशिक्षण डा. लतिका शर्मा ने किया गया एवं डा. रविकांत शर्मा, सहनिदेशक अनुसंधान ने धन्यवाद प्रेषित किया.

मसाले और पाककला से संबंधित जड़ीबूटियों (Herbs) पर 31 देशों की बैठक

नई दिल्ली: मसाले और पाककला से संबंधित जड़ीबूटियों (Herbs) पर कोडैक्स समिति (CCSCH) का 7वां सत्र 29 जनवरी, 2024 से 2 फरवरी, 2024 तक कोच्चि में आयोजित किया गया. कोविड महामारी के बाद पहली बार यह सम्मेलन प्रतिभागियों की मौजूदगी में संपन्न हुआ. कोविड महामारी के दौरान सम्मेलन का आयोजन वर्चुअल रूप से किया गया था. सत्र में 31 देशों के 109 प्रतिनिधियों ने भाग लिया.

सम्मेलन का आयोजन सफल रहा. इस सत्र में 5 मसालों, छोटी इलायची, हलदी, जुनिपर बेरी, जमैका काली मिर्च (आलस्पाइस) और चक्रफूल (स्टार एनीस) के लिए गुणवत्ता मानकों को अंतिम रूप दिया गया.
कोडैक्स समिति ने 5 मानकों को अंतिम चरण 8 में पूर्ण कोडैक्स मानकों के रूप में अपनाने की सिफारिश करते हुए कोडैक्स एलिमैंटेरियस कमीशन (CAC) को भेज दिया है.

इस समिति में पहली बार मसालों के समूहीकरण की रणनीति को सफलतापूर्वक लागू किया गया. समिति ने वर्तमान सत्र में ‘फलों और जामुनों से प्राप्त मसालों‘ (3 मसालों जैसे जुनिपर बेरी, जमैका काली मिर्च (आलस्पाइस) और चक्रफूल (स्टार एनीस) को शामिल करते हुए) पहले समूह मानक को अंतिम रूप दिया.

वेनिला के लिए मसौदा मानक चरण 5 में रखा गया है. इस पर समिति के अगले सत्र में चर्चा होगी. चर्चा से पहले सदस्य देश इस पर एक और दौर की जांच करेंगे.

सूखे धनिए के बीज, बड़ी इलायची, मरुआ और दालचीनी के लिए कोडैक्स मानकों के विकास के प्रस्ताव समिति के समक्ष रखे गए और स्वीकार कर लिए गए. समिति अपने आगामी संस्करणों में इन 4 मसालों के लिए मसौदा मानकों पर काम करेगी. 7वें सत्र में पहली बार बड़ी संख्या में लैटिन अमेरिकी देशों की भागीदारी देखी गई. समिति की अगली बैठक 18 महीने बाद आयोजित की जाएगी.

विभिन्न देशों की अध्यक्षता वाले इलैक्ट्रौनिक कार्य समूह (EWG) बहुराष्ट्रीय परामर्श की प्रक्रिया जारी रखेंगे. इस का उद्देश्य विज्ञान आधारित साक्ष्यों के आधार पर मानकों को विकसित करना है.

खाद्य एवं कृषि संगठन (FPO) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा संयुक्त रूप से रोम में स्थापित कोडैक्स एलिमैंटेरियस कमीशन (CAC) 194 से अधिक देशों की सदस्यता वाला एक अंतर्राष्ट्रीय, अंतर्सरकारी निकाय है. इसे मानव भोजन से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानकों को तैयार करने का काम सौंपा गया है.

सीएसी (CAC) विभिन्न सदस्य देशों द्वारा आयोजित सीसीएससीएच (CCASH) सहित विभिन्न कोडैक्स समितियों के माध्यम से अपना काम करती है.

मसालों और पाककला से संबद्ध जड़ीबूटियों पर कोडैक्स समिति (CCSCH)  की स्थापना साल 2013 में कोडैक्स एलिमैंटेरियस कमीशन (CAC) के तहत कमोडिटी समितियों में से एक के रूप में की गई थी. भारत इस सत्र का मेजबान है और स्पाइसेस बोर्ड इंडिया इस समिति के सचिवालय के रूप में काम कर रहा है.

सीएसी के मानकों को WTO द्वारा खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता संरक्षण से संबंधित व्यापार विवादों के समाधान के लिए अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ बिंदु के रूप में मान्यताप्राप्त है.

सीसीएससीएच (CCACH) सहित सीएसी (CAC) के तहत समितियों द्वारा विकसित मानक स्वैच्छिक प्रकृति के हैं, जिन्हें सीएसी के सदस्य देश अपने राष्ट्रीय मानकों को संरेखित करने के लिए संदर्भ मानकों के रूप में अपनाते हैं और उपयोग करते हैं.

सीएसी (CAC) दुनियाभर में खाद्य मानकों के सामंजस्य में योगदान करते हैं, भोजन में निष्पक्ष वैश्विक व्यापार की सुविधा प्रदान करते हैं और वैश्विक उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए खाद्य सुरक्षा को बढ़ाते हैं.

बस्ती के किसानों को नवाचार (Innovations) के लिए मिला सम्मान

बस्ती: खेती में नवाचार ( Innovations) अपना कर आय में इजाफा करने वाले जिले के किसानों को 5 फरवरी, 2024 को भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, शाहंशाहपुर, वाराणसी में तीनदिवसीय क्षेत्रीय किसान मेले के अंतिम दिन नवाचारी किसान सम्मान से नवाजा गया.

सम्मानित होने वाले किसानों में बस्ती सदर ब्लौक के नैशनल अवार्डी किसान राममूर्ति मिश्र, पंकज मिश्र और सुरेश पांडेय और दुबौलिया के अहमद अली को खेती में नवाचार के लिए सम्मानित किया गया. यह सम्मान सिद्धार्थ एफपीसी द्वारा प्रदान किया गया.

पुरस्कार पाने वालों में 2 नैशनल अवार्डी किसान

किसान मेला, वाराणसी में जिन किसानों को सम्मानित किया गया, उस में से राममूर्ति मिश्र और अहमद अली को नैशनल लैवल पर आईएआरआई, भारत सरकार द्वारा इनोवेटिव फार्मर अवार्ड प्रदान किया जा चुका है.

राममूर्ति मिश्र को जहां जैविक खेती, सुगंधित धान की खेती, मोटे अनाज की खेती सहित परिशुद्ध खेती, गेहूं, फल, सब्जी, फूल, विभिन्न कृषि प्रौद्योगिकियों के मौडल एवं कृषि परामर्श में विशिष्ट योगदान के लिए जाना जाता है, वहीं अहमद अली सब्जी, बागबानी, मधुमक्खीपालन, मछलीपालन सहित एकीकृत खेती में विशेष पहचान है.

राम मूर्ति मिश्र ने स्मार्ट कृषि एवं किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ के जरीए आमदनी बढ़ाने में कामयाबी पाई है.

इस के अलावा जिन अन्य 2 किसानों को सम्मान प्रदान किया गया है, उस में मोटे अनाज की खेती में आधुनिक तरीके से अपनाने के लिए पंकज मिश्र को और तकनीकों का लाभ उठा कर खेती में सफलता पाने वाले किसान सुरेश पांडेय का नाम शामिल है.