ट्रैक्टर में  ईंधन बचाने  के नियम

ट्रैक्टर के रखरखाव और उस के इस्तेमाल के बारे में जानने के लिए ट्रैक्टर का मैन्युअल यानी ट्रैक्टर के साथ जो निर्देशिका पुस्तिका (बुकलैट) होती है, उसे ध्यान से पढ़ें और उस के मुताबिक ही ट्रैक्टर का इस्तेमाल करें.

सही गियर में चलाएं :

टै्रक्टर को गलत गियर में चलाने से ईंधन की खपत 30 फीसदी तक बढ़ सकती है और खेत की जुताई जैसे काम में भी अच्छे नतीजे नहीं मिलते. इसलिए ट्रैक्टर की जरूरत (लोड) के हिसाब से गियर का इस्तेमाल करें.

पहिए फिसलते हैं तो :

खास हालात में काम करते समय अगर ट्रैक्टर के पहिए फिसलते हैं तो ढलुए लोहे के वजन से उन्हें फिसलने से बचाएं.

पहिए की फिसलन को कम से कम करने के लिए सही मात्रा में वजन का इस्तेमाल करें और खेत का काम खत्म होने के बाद ट्रैक्टर से वजन हटा दें.

डीजल का रिसाव रोकें :

ट्रैक्टर की जांच करें कि कहीं डीजल का रिसाव तो नहीं हो रहा है. एक बूंद प्रति सैकंड डीजल रिसने से सालाना 2,000 लिटर का नुकसान हो सकता है इसलिए ईंधन की टंकी, ईंधन का पंप, फ्यूल इंडक्टर और ईंधन लाइनों के जोड़ों को जांचें.

इंजन बंद कर दें :

अगर आप का टै्रक्टर चालू है और एक ही जगह खड़ा है तो भी प्रति घंटा 1 लिटर से ज्यादा डीजल की खपत करता है इसलिए लंबे समय तक ट्रैक्टर को चालू न रखें.

वहीं दूसरी ओर बैटरी, डायनमो, सैल्फ स्ट्राटर को हमेशा बेहतर हालत में रखें ताकि आप का ट्रैक्टर तुरंत चालू हो सके.

घिसे टायर न करें इस्तेमाल :

अगर ट्रैक्टर के टायर घिस गए हैं तो उन्हें बदल दें. घिसे हुए टायर से खींचने की ताकत घट जाती है. टायरों की सही देखभाल करें और टायरों को दोबारा लगाते समय तय करें कि सामने से देखने में ‘ङ्क’ ट्रेड प्वाइंट नीचे की ओर हो.

सड़क और खेत में काम करने के लिए ट्रायर में हवा के अलगअलग प्रैशर की जरूरत होती है इसलिए काम के हिसाब से ही टायरों की हवा ठीक रखें. इस के लिए आप अपने ट्रैक्टर की बुकलैट देख सकते हैं या ट्रैक्टर विक्रेता से पूछ सकते हैं.

धूल से बचाव :

ट्रैक्टर का इस्तेमाल ज्यादातर धूल वाली स्थिति में ही होता है इसलिए अच्छा एयर फिल्टर होना जरूरी है.

रिसर्च के मुताबिक, बिना फिल्टर की गई हवा से सिलिंडर बोर सामान्य की तुलना में जल्दी खराब हो जाते हैं और पिस्टन रिंग भी जल्दी घिस जाते हैं इसलिए अच्छी क्वालिटी के ईंधन फिल्टर का इस्तेमाल करें और उन्हें जरूरत के हिसाब से बदलते रहें.

याद रखें, दोनों ईंधन फिल्टरों को एकसाथ कभी न बदलें. एयर फिल्टरों को नियमित रूप से साफ करें.

योजनाबद्ध तरीके से चलाएं खेत में ट्रैक्टर :

ट्रैक्टर को खाली चलाना, बैकट्रैकिंग और ज्यादा घुमावों को कम करने के लिए खेत की जुताई तय तरीके के हिसाब से करें.

ट्रैक्टर को अनावश्यक तरीके से न घुमाएं. लंबी दूरी ही तय करें और खेत को बाहरी चारों कोनों से जोतते हुए अंदर की ओर जुताई करते आएं. पहली जुताई सीधी और समानांतर होनी चाहिए.

क्या ट्रैक्टर धुआं ज्यादा देता है  :

ट्रैक्टर से ज्यादा धुआं निकलने से डीजल की बरबादी होती है. गलत गियर का इस्तेमाल करने से भी धुआं अधिक निकल सकता है. नोजल और फ्यूल इंजैक्टर पंप की जांच करें.

खराब फ्यूल इंजैक्टर से भी ईंधन की खपत 25 फीसदी तक बढ़ सकती है. अगर आप के ट्रैक्टर से धुआं निकलना जारी रहता है तो इंजन की किसी अच्छे जानकार मेकैनिक से या मान्यताप्राप्त गैराज से उस की मरम्मत कराएं.

कूवत के अनुरूप करें इस्तेमाल :

ट्रैक्टर में इंजन की हौर्सपावर के मुताबिक ही कृषि यंत्रों को जोड़ कर चलाएं. अगर कम पावर का ट्रैक्टर है और आप ने अधिक वजन वाला कृषि यंत्र इस्तेमाल किया है तो ट्रैक्टर पर अधिक लोड पड़ेगा जो ट्रैक्टर के इंजन के लिए नुकसानदायक है.

आजकल कृषि यंत्रों के साथ भी यह जानकारी दी जाती है कि इसे कितने हौर्सपावर के ट्रैक्टर के साथ इस्तेमाल कर सकते हैं.

गाजर की खेती में  कृषि मशीनों  का इस्तेमाल

हरियाणा के अमन विश्वकर्मा इंजीनियरिंग वर्क्स के मालिक महावीर प्रसाद जांगड़ा ने खेती में इस्तेमाल की जाने वाली तमाम मशीनें बनाई हैं, जिन में गाजर बोने के लिए गाजर बिजाई की मशीन भी शामिल है.

बिजाई की मशीन

बैड प्लांटर व मल्टीक्रौप बिजाई मशीन बोआई के साथसाथ मेंड़ भी बनाती है. इस मशीन से गाजर के अलावा मूली, पालक, धनिया, हरा प्याज, मूंग, अरहर, जीरा, गेहूं, लोबिया, भिंडी, मटर, मक्का, चना, कपास, टिंडा, तुरई, फ्रांसबीन, सोयाबीन, टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी, सरसों, राई और शलगम जैसी तमाम फसलें बोई और काटी जा सकती हैं.

मशीन से धोएं गाजर

खेत से निकालने के बाद गाजरों की धुलाई का काम भी काफी मशक्कत वाला होता है, जिस के लिए मजदूरों के साथसाथ ज्यादा पानी की जरूरत भी होती है.

जिन किसानों के खेत किसी नहरपोखर वगैरह के किनारे होते हैं, उन्हें गाजर की धुलाई में आसानी हो जाती है. इस के लिए वे लोग नहर के किनारे मोटर पंप के जरीए पानी उठा कर गाजरों की धुलाई कर लेते हैं. लेकिन सभी को यह फायदा नहीं मिल पाता.

महावीर जांगड़ा ने जड़ वाली सब्जियों की धुलाई करने के लिए भी मशीन बनाई है. इस धुलाई मशीन से गाजर, अदरक व हलदी जैसी फसलों की धुलाई आसानी से की जाती है. इस मशीन से कम पानी में ज्यादा गाजरों की धुलाई की जा सकती है. इस मशीन को ट्रैक्टर से जोड़ कर आसानी से इधरउधर ले जाया जा सकता है.

इस मशीन के बारे में यदि आप ज्यादा जानकारी जानना चाहते हैं, तो आप अमन विश्वकर्मा इंजीनियरिंग वर्क्स के फोन नंबर 09896822103 और 09813048612 पर बात कर सकते हैं.

चारे व सब्जी के लिए ग्वार की खेती

ग्वार (एचएफजी 156) : ग्वार एक पौष्टिक चारा फसल होने के साथसाथ मिट्टी की पैदावार कूवत भी बढ़ाती है. इस को अकेले या ज्वारबाजरा के साथ भी बोया जा सकता है.

चारे के लिए किस्म (एचएफजी 156) : यह एक लंबी व अनेक शाखाओं वाली फसल है. पत्तियों के किनारे कटे हुए होते हैं. यह किस्म बिजाई के 70 दिन में तैयार हो जाती है. इस किस्म की बोआई अप्रैल से मध्य जुलाई माह तक करनी चाहिए.

अगेती बोई फसल में सिंचित हालात में अच्छी बढ़त होती है. वर्षाकालीन फसल जो जुलाई में बोई जाती है, बारिश पर निर्भर होती है. एचएफजी 156 की बोआई में बीज की मात्रा 16 किलोग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से लगती है.

सब्जी के रूप में ग्वार :

गंवई इलाकों में ग्वार की फलियों के साथसाथ फूलों की सब्जी बना कर खाने में इस्तेमाल किया जाता है. अब तो शहरों में भी तमाम लोग ग्वार की फलियों को सब्जी के रूप में पसंद करते हैं.

ग्वार की फली का बाजार भाव भी अच्छा मिलता है. इसलिए किसानों को चाहिए कि वह ग्वार की खेती करते समय जागरूक रहें और अपने इलाके के मुताबिक उन्नत किस्मों के बीजों का इस्तेमाल करें, जिस से बेहतर पैदावार मिल सके.

ग्वार की खेती : हरियाणा के लिए  उन्नत किस्में

पुराने समय में ग्वार को चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, हरी खाद के लिए भी उगाया जाता था, पर आज यह एक खास औद्योगिक फसल बन गई है. ग्वार के दानों से निकलने वाले गोंद के कारण इस की खेती ज्यादा फायदेमंद हो सकती है. हरियाणा के अनेक इलाकों में ग्वार की खेती ज्यादातर उस के दानों के लिए की जाती है.

ग्वार में गोंद होने की वजह से इस का बारानी फसल का औद्योगिक महत्त्व भी बढ़ता जा रहा है. भारत से करोड़ों रुपए का गोंद विदेशों में बेचा जाता है. ग्वार की अनेक उन्नत किस्मों में 30 से 35 फीसदी तक गोंद की मात्रा होती है.

ग्वार की अच्छी पैदावार के लिए रेतीली दोमट मिट्टी मुफीद रहती है. हालांकि हलकी जमीन में भी इसे पैदा किया जा सकता है. परंतु कल्लर (ऊसर) जमीन इस के लिए ठीक नहीं है.

जमीन की तैयारी : सब से पहले 2-3 जुताई कर के खेत की जमीन एकसार करें और खरपतवारों का भी खत्मा कर दें.

बोआई का समय: जल्दी तैयार होने वाली फसल के लिए जून के दूसरे हफ्ते में बोआई करें. इस के लिए एचजी 365, एचजी 563, एचजी 2-20, एचजी 870 और एचजी 884 किस्मों को बोएं.

देर से तैयार होने वाली फसल एचजी 75, एफएस 277 की मध्य जुलाई में बोआई करें. अगेती किस्मों के लिए बीज की मात्रा 5-6 किलोग्राम प्रति एकड़ और मध्य अवधि के लिए बीज 7-8 किलोग्राम प्रति एकड़ की जरूरत होती है. बीज की किस्म और समय के मुताबिक ही बीज बोएं.

खरपतवारों की रोकथाम : बीज बोने के 20-25 दिन बाद खेत की निराईगुड़ाई करें. अगर बाद में भी जरूरत महसूस हो तो 15-20 दिन बाद दोबारा एक बार फिर खरपतवार निकाल दें.

गुड़ाई करने के लिए हाथ से चलने वाले कृषि यंत्र हैंडह्वील (हो) से कर देनी चाहिए. ‘पूसा’ पहिए वाला हो वीडर कम कीमत वाला साधारण यंत्र है. इस यंत्र से खड़े हो कर निराईगुड़ाई की जाती है. इस का वजन तकरीबन 8 किलोग्राम है. इस यंत्र को आसानी से फोल्ड किया जा सकता है. यह यंत्र कहीं भी लाया व ले जाया जा सकता है.

इस यंत्र को खड़े हो कर, आगेपीछे धकेल कर चलाया जाता है. निराईगुड़ाई के लिए लगे ब्लेड को गहराई के अनुसार ऊपरनीचे किया जा सकता है. पकड़ने में हैंडल को भी अपने हिसाब से एडजस्ट कर सकते हैं. यह कम खर्चीला यंत्र है. आजकल यह यंत्र गांवदेहातों में आसानी से मिलता है. अनेक कृषि यंत्र निर्माता इसे बना रहे हैं.

खेत में पानी : आमतौर पर इस दौरान मानसून का समय होता है और पानी की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन अगर बारिश न हो और खेत सूख रहे हों तो फलियां बनते समय हलकी सिंचाई जरूर करें.

फसल की कटाई: जब फसल की पत्तियां पीली पड़ कर झड़ने लगें और फलियों का रंग भी भूरा होने लगे तो फसल की कटाई करें और कटी फसल को धूप में सूखने के लिए छोड़ दें. जब कटी फसल सूख जाए तो इस की गहाई करें और दानों को सुखा कर रखें.

अगर फसल में कीट व रोग का हमला दिखाई दे तो कीटनाशक छिड़कें और कुछ दिनों तक पशुओं को खिलाने से परहेज करें.

उन्नत किस्में हरियाणा के लिए

एफएस 277 : यह किस्म सीधी व लंबी बढ़ने वाली है. साथ ही, देर से पकने वाली किस्म है. यह मिश्रित खेती के लिए अच्छी मानी गई है. इस के बीज की पैदावार 5.5-6.0 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 75 : अनेक शाखाओं वाली यह किस्म रोग के प्रति सहनशील है और देर से पकने वाली है. इस के बीज की पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 365 : यह कम शाखाओं वाली जल्दी पकने वाली किस्म है. यह किस्म तकरीबन 85-100 दिनों में पक जाती है और औसतन पैदावार 6.5-7.5 क्विंटल प्रति एकड़ है. इस किस्म के बोने के बाद आगामी रबी फसल आसानी से ली जा सकती है.

एचजी 563 : यह किस्म भी पकने में 85-100 दिन लेती है. इस के पौधों पर फलियां पहली गांठ व दूसरी गांठ से ही शुरू हो जाती हैं. इस का दाना चमकदार और मोटा होता है. इस किस्म की पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 2-20 : ग्वार की यह किस्म पूरे भारत में साल 2010 में अनुमोदित की गई थी. 90 से 100 दिनों में पकने वाली इस किस्म की फलियां दूसरी गांठ से शुरू हो जाती हैं और इस की फली में दानों की तादाद आमतौर पर दूसरी किस्मों से ज्यादा होती व दाना मोटा होता है. इस किस्म की औसत पैदावार 8-9 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 870 : इस किस्म को भी साल 2010 में हरियाणा के लिए अनुमोदित किया गया था. पकने का समय 85-100 दिन. दाने की पैदावार 7.5-8 क्विंटल प्रति एकड़ है. गोंद की औसत मात्रा 31.34 फीसदी तक होती है.

एचजी 884 : ग्वार की इस किस्म को पूरे भारत के लिए साल 2010 में अनुमोदित किया गया था. यह किस्म 95-110 दिन में पकती है. मोटे दाने, दाने की पैदावार 8 क्विंटल प्रति एकड़ व गोंद की औसत मात्रा 29.91 फीसदी तक है.

पावर वीडर : खरपतवार हटाए, पैदावार बढ़ाए

हमारे देश के अनेक इलाकों के किसान गन्ना, कपास, सब्जी या फूलों वगैरह की खेती लगातार करते आ रहे हैं. इन सभी फसलों को ज्यादातर लाइन में बोया जाता है. दूसरी फसलों की तुलना में इन फसलों को बोने वाली लाइनों के बीच की दूरी भी अधिक होती है. इस वजह से लाइनों के बीच वाली जगहों में अनेक खरपतवार आ जाते हैं.

ये ऐसे खरपतवार होते हैं जो बिना बोए ही उपज आते हैं. उर्वरकों को हम अपनी फसल में इसलिए डालते हैं कि हमें अच्छी पैदावार मिल सके. इन उर्वरकों का फायदा ये खरपतवार भी उठाते हैं और तेजी के साथ बढ़ते हैं जिस का सीधा असर फसल की पैदावार पर पड़ता है यानी फसल पैदावार में गिरावट आ जाती है.

खरपतवारों की रोकथाम

सहफसली खेतीबारी : कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरपतवारों की रोकथाम के लिए फसल चक्र अपनाना एक तरीका है यानी खेत में फसल को बदलबदल कर बोना. इस से खरपतवारों को पनपने का मौका नहीं मिलता.

जैसे, हम अभी गन्ना की फसल ले रहे हैं तो अगली बार उस में गेहूं बोएं, गेहूं कटने के बाद खेत भी कुछ समय खाली रहते हैं. उस समय उस में हरी खाद के लिए ढैंचा वगैरह बोएं. उस के बाद धान लगाएं, फिर गन्ना की बोआई कर सकते हैं. इस तरह बदलबदल कर फसल बोने से खरपतवारों पर रोक लगती है.

करें सहफसली खेती

अगर आप गन्ने की खेती कर रहे हैं तो उस के साथ सहफसली खेती करें. जब गन्ना छोटा होता है उस समय उस की लाइनों के बीच में खाली जगह में आलू, लहसुन, गोभी, भिंडी टमाटर वगैरह की खेती भी करें. इन सब्जियों के अलावा समय के मुताबिक गन्ने के साथ दलहनी फसल उड़द, मूंग, लोबिया वगैरह भी उगा सकते हैं. ऐसा करने से अधिक फायदा होगा. खरपतवारों की रोकथाम तो होगी ही, साथ ही सहफसली खेती में मुनाफा भी होगा.

कहने का सीधा सा मतलब यह है कि दोनों लाइनों के बीच में जो जगह बची है, वहां की मिट्टी की पैदावार कूवत का फायदा खरपतवार उठाते हैं. उसी जगह का इस्तेमाल कर अगर आप ने दूसरी फसल भी ले ली तो खरपतवारों को पनपने का मौका ही नहीं मिला.

खास परिस्थितियों में आप खरपतवारों को खत्म करने के लिए सही खरपतवारनाशक का इस्तेमाल कर सकते हैं. आजकल रासायनिक खरपतवार के अलावा अनेक जैविक खरपतवारनाशक भी आ रहे हैं, उन का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

यंत्रों से करें रोकथाम

इस तरह की फसलों में खरपतवार के सफाए के लिए पावर वीडर एक कारगर यंत्र है. इस खरपतवारनाशक यंत्र से कम समय में अनेक फसलों से खरपतवार निकाले जा सकते हैं. यह यंत्र सभी छोटेबड़े किसानों के लिए अच्छा यंत्र है. साथ ही, पहाड़ी इलाकों के लिए भी उपयोगी है. खरपतवार निकालने के इस तरह के यंत्र खासकर लाइनों में बोई गई फसल के लिए अच्छे रहते हैं.

हौंडा रोटरी टिलर : मौडल एफजे 500 आरडी रोटरी पावर वीडर की कुछ खासीयतें दी गई हैं. इस यंत्र में 5.5 हौर्सपावर का 4 स्ट्रोक एयर कूल्ड इंजन लगा है और धूल से बचाव के लिए इंजन में एयर क्लिनर भी लगा है.

गियर बौक्स जमीन में ऊंचाई पर दिया गया है. इस वजह से यह मिट्टी में नहीं फंसता और बिना रुकावट के चलता है. 2 गियर फौर्वर्ड (सामने की ओर) व 1 गियर रिवर्स (वापसी) के लिए दिया गया है जिस से अपनी सुविधानुसार आगे या पीछे किया जा सकता है.

यह यंत्र खरपतवार को जड़ से खोद कर निकालता है. यह यंत्र पैट्रोल से चलाया जाता है और इस की टीलिंग (खुदाई) चौड़ाई को 18 इंच से 24 इंच, 36 इंच तक कटाव बढ़ाया जा सकता है और टीलिंग यानी खुदाई की गहराई को 3 से 5 इंच तक कम या ज्यादा किया जा सकता है.

इस यंत्र के बारे में अधिक जानकारी के लिए फोन नंबर 0120-2341050-59 पर आप बात कर सकते हैं. यहां से आप को अपने नजदीकी डीलर की जानकारी या फोन नंबर भी मिल सकता है. आप अपनी सुविधानुसार यहां से इस यंत्र के बारे में जानकारी ले सकते हैं.

कृषि यंत्रों के इस्तेमाल में बरतें सावधानी

हर साल थ्रेशर पर काम करते समय कई दुर्घटनाएं हो जाती हैं. ये दुर्घटनाएं जानकारी की कमी के चलते या असुरक्षित तरीके से काम करना व बिना मानक के मशीनों के इस्तेमाल से होती हैं. गंभीर रूप से दुर्घटनाएं थ्रेशर के धुरे, पंखे या पट्टों की लपेट में आने से होती हैं.

थ्रेशर पर काम करते हुए दुर्घटनाओं को रोकने के लिए किसानों को जागरूक व मानकयुक्त मशीनें इस्तेमाल करने की जरूरत है. आइए जानें गहाई मशीनों पर काम करते समय किनकिन बातों का ध्यान रखें, ताकि इन से होने वाली दुर्घटनाओं से बचा जा सके:

ढीलेढाले कपड़े न पहनें : आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि किसान काम के समय ढीलेढाले कपड़े जैसे धोती, कुरता, साड़ी, लुंगी पहनते हैं, जो ऐसी दुर्घटनाओं में मददगार होती हैं. थ्रेशर में निकलने वाले अनाज व भूसा हटाने का काम खास रूप से महिलाएं व बच्चे करते हैं, जिस से महिलाओं की साड़ी व बाल पट्टों में उलझ जाते हैं और वे गंभीर दुर्घटनाओं की शिकार हो जाती हैं. औरतें साड़ी व बाल बांध कर रखें व बच्चों को इस से दूर रखें.

किसान थ्रेशर चलाते समय ध्यान रखें कि कलपुरजे, पट्टे व पुली ठीक तरह से लोहे के जालीनुमा तार से ढके हों और अगर संभव हो तो मशीन के कलपुरजे लकड़ी के फ्रेम से ढक कर रखें. अनेक कृषि यंत्र बनाने वाली कंपनियां भी इन बातों का ध्यान रखती हैं.

काम करते समय दस्तानों का इस्तेमाल करें

ऐसा देखा गया है कि किसान दस्तानों की जगह फटेपुराने कपड़े, गमछा या तौलिया को फसल की गहाई के समय हाथों में चुभने के लिए लपेटते हैं. ऐसा करने से गमछा या तौलिया का एक भी निकला हुआ धागा मशीन के पंखे की हवा में उड़ कर धुरे में चला गया तो उस से लिपटता हुआ हाथ को अंदर तक खींच लेता है. इस के लिए हाथों में दस्ताने पहन कर ही काम करें.

ज्यादा थकान व नींद आने की हालत में काम न करें. फसल की गहाई करते समय सोना व ज्यादा थकान के चलते ऊंघना बहुत ही गलत है. ऐसे हालात में किसान हर 2-4 घंटे में बदलबदल कर आपस में काम करें. ज्यादा काम व थकान करने के लिए किसान नशे का सहारा लेते हैं. मशीन पर काम करते समय नशे से दूर रहें.

देखने में यह भी आता है कि जब हमारे किसान फसल को मशीन के अंदर धकेलते हैं तो उन के हाथ धुरे के संपर्क में आने की संभावना ज्यादा होती है. यह घटना इतनी जल्दी घटित होती है कि जब तक हाथ खींचने के बारे में सोचा जाता है तब तक दुर्घटना घट चुकी होती है. इसलिए किसान को सलाह है कि लंबी पतराल (पतनाले) युक्त मशीन का इस्तेमाल करें, जिस में आधा भाग ऊपर से ढका भी हो.

किसानों को ध्यान रखना चाहिए कि फसल को मशीन के अंदर धकेलते समय ज्यादा ताकत से उसे अंदर न धकेलें क्योंकि थ्रेशर में अंदर लगे ब्लेड फसल को तेजी से अंदर की ओर खींचते हैं.

इस प्रकार किसान अगर ऊपर बताई गई छोटीछोटी लेकिन जरूरी बातों को ध्यान में रख कर थ्रेशर पर काम करेंगे तो इन मशीनों से होने वाली दुर्घटनाओं से जरूर बच सकते हैं. जागरूकता ही इस का बचाव है. इसी तरह से अन्य कृषि यंत्रों के इस्तेमाल में भी अपनी सुरक्षा का ध्यान रखें.

कृषि यंत्रों का उपयोग व रखरखाव

वर्तमान कृषि में उन्नत यंत्र एवं मशीनें जैसे टै्रक्टर एवं हैरो, कल्टीवेटर, रोटावेटर, पैडी पडलर, लेजर लैंड लैवलर, नो टिल ड्रिल मशीन, रेज्ड बैड प्लांटर, आलू बोआई यंत्र, गाजर बोआई यंत्र, लहसुन बोआईयंत्र, गन्ना बोआई यंत्र, स्वचालित धान रोपाई यंत्र, सब्जियों की पौध रोपाई यंत्र, विभिन्न प्रकार के वीडर, स्पेयर्स एवं डस्टर्स, सिंचाई पंप, चारा मशीन, रीपर, कंबाइन, पावर थ्रैशर और बिजली व डीजल से चलने वाले यंत्र किसानों द्वारा अपनाए जा रहे हैं, जो काफी महंगे आते हैं. इन यंत्रों का सही रखरखाव किसानों के हाथों में नहीं रह गया है. इन की मरम्मत कराने के लिए समयसमय पर स्थानीय बाजारों के कारीगरों के पास जाना पड़ता है. इसलिए आज यह आवश्यक हो गया है कि किसान उपलब्ध कृषि यंत्रों एवं मशीनों को ठीक ढंग से रखरखाव एवं प्रयोग करें.

हस्तचालित यंत्रों का रखरखाव

* हस्तचालित औजारों से चोटों और दुर्घटनाओं से बचना चाहिए.

* हस्तचालित औजारों का बच्चों की पहुंच से दूर होना अति आवश्यक है, ताकि उन्हें किसी प्रकार की चोट न लगे.

* अगर हम इन औजारों को किसी खुले स्थान पर छोड़ देते हैं, तो कुछ प्लाटिक के भाग खराब हो जाते हैं और दूसरे लोहे के भागों में जंग लग जाती है.

* अगर हमें इन औजारों को खुले में रखना हो, तो इन की धार कम हो जाएगी और जंग लगने की आशंका बनी रहती है. साथ ही, इन औजारों के काम करने की क्षमता घट जाती है.

बड़ी मशीनों का रखरखाव

कंबाइन हार्वेस्टर, ट्रैक्टर, सुगरकेन, हार्वेस्टर, पावर टिलर, सीड ड्रिल, पोटैटो प्लांटर, सोयाबीन, सिड ड्रिल, लेजर लैवलर, वेल स्नेडर, प्रैशर, कल्टीवेटर, एमबी प्लाऊ, रिजमेकर, डिस्क हैरो इत्यादि मशीनों को अकसर हम बाहर छोड़ देते हैं, जिस से नटबोल्ट पर जंग, मिट्टी और बारिश पड़ने पर मशीनों के हिस्से खराब होने लगते है एवं जंग लगने की आंशका बनी रहती है. कोशिश करें कि काम खत्म करने के बाद इन यंत्रों को अच्छी तरह एक बार साफ पानी से धो कर के धूप में थोड़ी देर रख कर छत के नीचे रखें. अगर हो सके, तो जंग से बचाव वाली जगह का प्रयोग करें. इस से ये यंत्र या मशीन लंबे समय तक काम करेंगे. जहां जगह न हो, जैसे प्लेड डिस्क, चेन पर पुराना तेल या ग्रीस लगा कर छोड़ सकते हैं और इस से इन में जंग से सुरक्षा मिलेगी. मशीनों को रखते समय देख लें कि अगर कोई हिस्सा टूटफूट या निकल गया हो, तो उसे बदल दें. नटबोल्ट, चेन इत्यादि और ढीले होने वाले कलपुरजों को कस दें. अगर वे निकल गए हों, तो लगा दें. इस से अगली बार इस्तेमाल करने में सुविधा होगी और ठीक करने पर समय व पैसा खर्च नहीं करना पड़ेगा.

जुताई यंत्र का रखरखाव

जुताई यंत्रों को रखते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना आवश्यक है. जैसे, खेत की जुताई करने के बाद यंत्रों का अच्छे से साफ एवं स्वच्छ कर के रखना चाहिए. कुछ भागों में मिट्टी लगी रहती है, उस को भी साफ कर दिया जाना चाहिए.

बोआई यंत्रों का रखरखाव

बोआई यंत्रों यानी सीड कम फर्टी ड्रिल को रखते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना है. बीज और खाद दोनों नमी सोख कर लोहे की सीट को गला सकते हैं. बोआई और खाद के बाद इन यंत्रों को अच्छी तरह से साफ पानी से धोएं. अगर हवा मारने का कुछ प्रावधान हो, तो हवा मार सकते हैं. उस के बाद धूप में रख दें. पूरी तरह से सुखाने के बाद कुछ जगह पर जहां आवश्यकता हो, वहां पर ग्रीस या तेल लगा कर, कलपुरजों को नुकसान होने से बचाया जा सकता है. मीटरिंग यूनिट/प्लोटिड रोलर को सुनिश्चित करें कि वे भी पूरी तरह से साफ हैं या नहीं. अगर इन्हें साफ नहीं किया है तो कर दें. ट्यूब को अलग निकाल कर रख सकते हैं, और ध्यान रखें कि उन में सीड न पड़े रहें, नहीं तो वे खराब हो जाएंगी. अगर कोई बैल्ट हो, तो उस को निकाल कर अलग लटका सकते हैं और चेन इत्यादि पर ग्रीस लगा दें.

हार्वेस्टिंग मशीन का रखरखाव

हार्वेस्टिंग मशीनों को रखते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना पड़ता है. जैसे थ्रैशर को अच्छी तरह साफ कर लें. एक बार थ्रैशर घुमा कर फसल के कुछ अवशेष को अच्छी तरह निकाल लें. इन मशीनों को पूरी तरह से इस के पूरजों को साफ करें और पानी से धोएं कुछ देर तक इन्हें धूप में रख कर सुखा दें. देख ले कि कोई हिस्सा या नटबोल्ट इत्यादि ढीला या पेच गिर तो नहीं गए हैं और इन की मरम्मत कर के रख दें और कुछ जगहों पर चिकना तेल लगा दें. कुछकुछ ग्रीस पोइटों में ग्रीस भर दें और बैल्ट उतार दें. कोशिश करें कि मशीन को उठा कर सपोर्ट लगा कर रखें. टायर ऊपर रहने से खराब नहीं होंगे और छत के नीचे रखें. अगर ये सुविधा नहीं हैं, तो तिरपाल या पौलीथिन की पन्नी से लपेट कर रखें. अगर बिजली का मीटर लगा है, तो ध्यान रहे कि उस में पानी बिलकुल न जाएं मशीन को धोते समय उस को ढक कर रखें और थ्रैशर के पतनाले को सीधा कर दें. उस के फसल डालने वाले हिस्से को कपड़ा बांध दें, जिस से कोई जीवजंतु ड्रम में न जा सके और बिजली के तारों को लपेट कर किसी थैले में बांध कर रख दें.

छिड़काव यंत्र का रखरखाव

फसल छिड़काव यंत्रों का भंडारण करते समय कुछ बातों का ध्यान रखें, जैसे मशीन को छिड़काव करने के बाद अच्छी तरह से धो लें और पानी भर कर मशीन को अच्छी तरह से चलाएं, ताकि जिस से नोजल से पूरा कैमिकल निकल जाए और लीवर इत्यादि भी अच्छी तरह साफ कर लें. कैमिकल छिड़काव करने पर प्लास्टिक या मेटल से प्रतिक्रिया कर के यंत्र को खराब कर सकता है. छिड़काव यंत्रों को बच्चों की पहुंच से दूर रखें. फिल्टर पेपर से लपेट कर या बांध कर रख सकते हैं. जहां भी ओपनिंग होती है, वहीं पर कीटपतंगे के घुसने की संभावना रहती है. इन यंत्रों को रखने से पहले सब जोड़े को, जो पाइप इत्यादि को टाइट कर के रख लें और देख लें कि वे ढीले तो नहीं हैं. उन को या तो कस दें या बदल दें. अगर बैटरी लगी है, तो उसे निकाल दें.

स्वशक्तिचालित उपकरण

स्वशक्तिचालित मशीनों का ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है. ट्रैक्टर महत्त्वपूर्ण ऊर्जा का शक्तिस्रोत है. स्रोत का ध्यान रखें, तो कम खर्च में ज्यादा समय तक चलता रहेगा. प्रतिदिन तेल को चेक करना आवश्यक है और 15 मिनट बंद करने के बाद रेडिएटर का पानी चैक करें और ऐयर क्लीनर को भी साफ करें. यदि तेल कम है, तो भरें. अगर गंदा तेल है, तो साफ तेल से बदल दें और हफ्ते में टायर के प्रैशर भी चेक कर सकते हैं. फेन बेल्ट में 12.16 मिलीमीटर का खिंचाव ज्यादा नहीं होना चाहिए. अगर एयर फिल्टर में पानी भर गया है, तो उसे निकाल दें. बैटरी का लेवल एवं ग्रीस, तेल इत्यादि का नियमित परीक्षण करें.

प्रशिक्षण एवं मशीन चालक

मशीनों को खरीदते समय एक बात का ध्यान रखना आवश्यक होना चाहिए और मशीन के कलपुरजें का निरीक्षण कर लेना आवश्यक है. इस के बाद मशीन की कार्य पुस्तिका को विक्रेता से लेना न भूलें. उस से मशीन का चलाना एवं समझना आसान हो जाता है. मशीन को सही ढंग से बनाए रखने की जानकारी इस पुस्तिका से मिल जाती है. असुविधा होने पर कार्य पुस्तिका का प्रयोग कर सकते हैं.

मशीन का करें परीक्षण

किसी भी प्रकार की मशीन के भाग को सही तरीके से परीक्षण किया जाना चाहिए और समयसमय पर कलपुरजों की जांच कर लेना आवश्यक है. जिस से मशीन चलाते समय घर्षण को कम करें और उस से मशीन का रखरखाव और लंबे समय तक अच्छी रहती है. जांच के पहले देख लें कि पिस्टन पर अतिरिक्त तेल है या नहीें. तेल सील के आसपास लीकेज की जांच करें और सही बिंदु का उपयोग करना सुनिश्चित करें. हर बिंदु के लिए कई प्रकार के तेल और ग्रीस है. चिकनाहट की जांच करना बड़ी मशीनरी के साथ समस्याओं के निदान का एक अच्छा तरीका है और तेल को मशीन में इस्तेमाल करते समय एक बार देख लिया जाना जरूरी है. किसी भी दूषित पदार्थ का इस्तेमाल तो नहीं किया गया है. अगर ऐसा किया गया है, तो उसे तुरंत बाहर निकाल दें.

सभी स्वचालित मशीनों के लिए सफाई महत्त्वपूर्ण

सभी स्वचालित मशीनों पर सफाई का ध्यान रखना आवश्यक है. जैसे कुछ इंजन कंपार्टमेंट हीट एमसी चेजर्स/रेडिएटर एवं नियंत्रण केंद्रों के कुछ क्षेत्र हैं. एक बार उपकरण साफ होने के बाद किसानों को अच्छी तरह से सेवा करनी चाहिए और मशीन को चिकना करना चाहिए. आपरेशन, परफौर्मैंस चैक के अलावा गियर या बैल्ट, लूज नटबोल्ट, औयल लीक और सभी पार्ट्स की जांच करें. खरोंच वाले या खुदरे क्षेत्रों में टचअप पेंट लगाने का भी यह एक अच्छा समय है. उचित रूप से बनाए रखने वाले उपकरण, जो अच्छे लगते हैं, वे एक उच्च व्यापार मूल्य का आदेश देंगे. जब किसान इन मशीनों को बदलने का फैसला करता है, तब कई चालक जंग और आक्लीकरण जैसे तत्त्वों से उपकरणों की रक्षा में मदद करने के लिए एक कर्मचारी एक अच्छे सफाई का पालन करते हैं. सब से महत्त्वपूर्ण बात है, जब यंत्रों की सावधानीपूर्ण जांच की जाती है, तो छोटी समस्याओं की पहचान की जा सकती है और उन्हें अगले सीजन में चलाने से पहले ठीक किया जाता है.

कृषि यंत्रों का उचित चुनाव

कृषि यंत्रों का चुनाव करते समय निम्न बिंदुओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए :

* मशीन खेती के काम को करने में पूरी तरह से सक्षम हो.

* मशीन में लगने वाली ऊर्जा या शांति का भरपूर उपयोग कार्य करने के लिए होना चाहिए, जिस से उस की कार्यकुशलता अधिक से अधिक मिल सके.

* मशीन चलाने के प्रशिक्षत व्यक्ति को ही होना चाहिए.

* मशीन के कलपुरजों की बनावट अच्छी तरह से बनी होनी चाहिए, ताकि लंबे समय तक प्रयोग में लाया जा सके.

* यंत्रों की मरम्मत का खर्च कम से कम हो और उसे स्थानीय कारीगर से ठीक कराया जा सके और उस का रखरखाव भी आसान हो.

* मशीन चलाते समय सुरक्षा का ध्यान रखें, ताकि कम से कम दुर्घटना हो.

* मशीन खरीदते समय उस की गुणवत्ता का ध्यान रखें आवश्यक है और निर्माता से पूछ लिया जाना आवश्यक है, उस के बाद ही खरीदी की जानी चहिए.

कृषि यंत्रों का उपयोग व रखरखाव : कुछ खास बातें मशीन के जिन भागों को नुकसान पहुंचने की संभावना हो, उन को निकाल कर अलग सुरक्षित स्थान पर रखें और कृषि यंत्रों एवं मशीनों के नटबोल्ट, वाशर आदि को देखना जरूरी है. यदि कोई नटबोल्ट ढीला मिले तो उन को कस देना चाहिए. मशीन में तेलपानी बदलने का उचित प्रबंध होना चाहिए. ट्रैक्टर, पावर टिलर, कंबाइन आदि में यह अति आवश्यक है. गियर बौक्स, इंजन और एयर क्लीनर में तेल का माप देखते रहना चाहिए. यदि कम हो या बदलना हो, तो उचित प्रकार से तेल से पूर्ति करनी चाहिए. मशीन के रेडिएटर में पानी का उचित प्रबंध रखना चाहिए. इस से मशीन के काम के बीच में रुकावट नहीं आएगी. टायर में हवा का दबाव ठीक रखना चाहिए.? यंत्र का प्रयोग करने के बाद प्रतिदिन ठीक प्रकार से साफ कर लेना चाहिए, ताकि धूलमिट्टी आदि निकल जाए. खासतौर से मोटर, प्रैशर, सीड ड्रिल आदि के लिए यह जरूरी है. सीड ड्रिल आदि के उपयोग के बाद टंकी व अंदरूनी भागों को भी अच्छी तरह साफ करना चाहिए, ऐसा करने से यंत्र की उम्र बढ़ जाती है. बरसात के मौसम में नुकसान से बचने के लिए मशीन में धातु वाले हिस्सों को जंग प्रतिरोधी पेंट से रंग दें. जहां मशीनों में टायर के पहिए हैं, उन्हें जमीन से ऊंचा इस प्रकार रखें, पहिए जमीन के ऊपर रहें और मशीन के नीचे लकड़ी या पत्थर लगा कर रख दें, जिस से उस में गिरने का अंदेशा न रहे और बच्चों व जानवरों के साथ दुर्घटना न हो सके. यदि किसान अपने उपलब्ध कृषि के उन्नत यंत्र एवं मशीनों को कृषि कार्यों के उपरांत या बरसात का मौसम शुरू होने से पूर्व उपरोक्त बातों को अपना कर अमल करें, तो अपने कृषि यंत्रों की उम्र बढ़ा सकते हैं. शीघ्र खराब होने से बचा कर काफी वर्षों तक ये यंत्र प्रयोग कर सकते हैं, जिस से प्रति वर्ष कृषि यंत्रों के ऊपर खर्चों को कम किया जा सके.

पीएम किसान ट्रैक्टर योजना 2023

ट्रैक्टर खेती में काम आने वाला खास यंत्र है. अनेक कृषि यंत्र ऐसे हैं, जिन्हें इस्तेमाल करने के लिए ट्रैक्टर की जरूरत पड़ती है, बिना ट्रैक्टर के वे यंत्र बेकार हैं.

पर साथ ही ट्रैक्टर खासा महंगा आता है, जिसे खरीदना सब किसानों के बस में नहीं है. भारत सरकार का सोचना है कि खेती में ज्यादा से ज्यादा कृषि यंत्रों का इस्तेमाल हो, जिस से खेतीकिसानी के काम करने में आसानी हो और काम भी समय से हो जाएं.

ऐसे ही मकसद को ले कर सरकार देश के किसानों के कल्याण और विकास के लिए अनेक योजनाओं को समयसमय पर लाती है. पीएम किसान ट्रैक्टर योजना एक ऐसी योजना है, जो देश के किसानों की मदद करती है. जो किसानों के लिए ट्रैक्टर खरीदने की राह आसान करती है. यह योजना केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई है.

प्रधानमंत्री किसान ट्रैक्टर योजना उन जरूरतमंद किसानों के लिए है जो ट्रैक्टर नहीं खरीद सकते. किसान ट्रैक्टर योजना 2023 की शुरुआत के पीछे सरकार का मुख्य उद्देश्य किसानों की आर्थिक स्थिति में तेजी लाना और भारत की कृषि को गति देना है. इस योजना के तहत पात्र किसानों को ट्रैक्टर खरीदने के लिए 20 से 50 फीसदी सब्सिडी प्रदान की जाती है. यह योजना देश के कई राज्यों में अपने स्तर पर चल रही है.

किसान कैसे करें आवेदन

देश का कोई भी किसान जो खेती के काम के लिए ट्रैक्टर खरीदना चाहता है, वह इस स्कीम के जरीए अपना आवेदन जमा कर सकता है. आवेदन के बाद यदि वह पात्रता मानदंड को पूरा करने में सफल होता है, तो उसे ट्रैक्टर खरीदने के लिए 20 से 50 फीसदी सब्सिडी राशि मुहैया कराई जाएगी.

औनलाइन व औफलाइन आवेदन
प्रधानमंत्री किसान ट्रैक्टर योजना के आवेदन कुछ राज्यों में औनलाइन और कुछ राज्यों में औफलाइन माध्यम से लिए जाते हैं. प्रधानमंत्री ट्रैक्टर योजना के लिए मिलने वाली सब्सिडी को किसान के बैंक खाते में सीधा भेजा जाता है, इसलिए आवेदन करते समय आप के पास एक बैंक खाता होना चाहिए. किसानों के पास बैंक खाता होने के साथसाथ इस बैंक खाते में आधारकार्ड लिंक होना भी आवश्यक है.

खास बातें

इस योजना का लाभ लेने के लिए किसान पहले से किसी भी कृषि अनुदान योजना के अंतर्गत नहीं जुड़ा होना चाहिए यानी किसान ने इस समय किसी अन्य कृषि यंत्र पर सब्सिडी नहीं ली हो.

महिलाओं को पीएम किसान ट्रैक्टर योजना 2023 के तहत अधिक लाभ दिया जाएगा.

किसान योजना ट्रैक्टर 2023 का लाभ उन्हीं किसानों को मिलेगा जिन के नाम पर जमीन है.

पीएम किसान ट्रैक्टर योजना के तहत किसानों को केंद्र और राज्य सरकार द्वारा 50 फीसदी तक की सब्सिडी प्रदान की जाती है.

जरूरी पात्रता

ट्रैक्टर पर सब्सीडी लेने के लिए आवेदक को कुछ आवश्यक शर्तें पूरी करनी होंगी :

जैसे आवेदक किसान भारत का स्थायी निवासी होना चाहिए.

आवेदक की उम्र 18 वर्ष से अधिक और 60 वर्ष से कम होनी चाहिए.

आवेदक की सालाना आमदनी 1 लाख, 50 हजार रुपए प्रतिवर्ष से कम होनी चाहिए.

ट्रैक्टर लेने वाले किसान की खेती उस के नाम होनी चाहिए.

आवेदक किसान को किसी और सब्सिडी स्कीम का लाभार्थी नहीं होना चाहिए. इस के लिए आवेदन करने के पहले 7 वर्षों तक आवेदक ऐसी किसी भी सरकारी योजना (केंद्र या राज्य सरकार की योजना) का लाभार्थी नहीं होना चाहिए.

जरूरी कागजात

इस स्कीम के अंतर्गत आवेदन करने वाले व्यक्ति का आधारकार्ड, वैलिड आईडी कार्ड (जैसे वोटर आईडी, पैनकार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसैंस) के अलावा आवेदक के पास जमीन के लीगल दस्तावेज होने चाहिए.

बैंक खाता विवरण/बैंक पासबुक/श्रेणी प्रमाणपत्र.

आवेदक का पासपोर्ट साइज फोटो.
फसल सहायता योजना.

आवेदन कैसे करें

योजना में आवेदन करने के लिए सभी जरूरी कागजात ले कर आप अपने नजदीकी जनसेवा केंद्र में आवेदन कर सकते हैं.

जनसेवा केंद्र वाला आप के दस्तावेजों और आप की जानकारी को अपने पोर्टल पर औनलाइन रिकौर्ड करेगा. आवेदन जनसेवा केंद्र के माध्यम से जमा होने के बाद आप को आवेदन की एक रसीद दी जाएगी, जिस से भविष्य में आप अपने आवेदन की स्थिति की जांच कर सकेंगे.
ध्यान रहे कुछ राज्यों में औफलाइन और कुछ राज्यों में औनलाइन आवेदन भी किया जा रहा है.

आवेदन किसी भी राज्य में

किसान ट्रैक्टर योजना केंद्र सरकार की योजना है, इसलिए आप भारत के किसी भी राज्य के निवासी हों, आप अपने राज्य में इस के लिए आवेदन कर सकते हैं.

कृषि यंत्र अनुदान योजनाओं को सरकार द्वारा समयसमय पर चलाया और बंद किया जाता है, इसलिए जरूरी है कि आप अपने राज्य में चैक कर लें कि इस समय योजना के लिए आवेदन स्वीकार किए जा रहे हैं या नहीं. इस से संबंधित जानकारी आप को राज्य के कृषि विभाग की वैबसाइट पर मिल जाएगी.

अलगअलग राज्य की यह योजना अलगअलग नाम से होती है. आप अपने राज्य में यह योजना किस नाम से चल रही है, यह जानने के लिए कृषि की औफिशियल वैबसाइट पर जा सकते हैं या फिर नजदीकी एग्रीकल्चर औफिस में जा कर आप वहां से भी इस का फौर्म प्राप्त कर सकते हैं. किसान सब्सिडी दिलाने वाले तथाकथित दलालों से सावधान रहें.

इस योजना के बारे में अधिक जानकारी के लिए आप अपने राज्य की कृषि विभाग की वैबसाइट पर जा कर अपने राज्य की विस्तार से जानकारी ले सकते हैं.

खेती के लिए ड्रोन खरीदने पर सब्सिडी

खेती में काम आने वाले अनेक कृषि यंत्रों पर सरकार की ओर से किसानों को इन यंत्रों की खरीद पर सब्सिडी का लाभ दिया जाता है. इन यंत्रों की सूची में अब ड्रोन भी शामिल हो गया है.

पूसा इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली में आयोजित  एक समारोह में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों के लाभ और विभिन्न हितधारकों के लिए ड्रोन के उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया और बताया कि सरकार ने ड्रोन प्रशिक्षण देने के लिए सौ फीसदी सहायता यानी अनुदान देने का निर्णय लिया है. कृषि के विद्यार्थी

इस में बेहतर भूमिका निभा सकते हैं. कृषि के छात्रछात्राओं के लिए सब्सिडी का प्रावधान भी है.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने कृषि क्षेत्र के हितधारकों के लिए ड्रोन तकनीक को किफायती बनाने के दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं. इस में अलगअलग कृषि संस्थानों, उद्यमियों, कृषक उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और किसानों के लिए सब्सिडी का प्रावधान किया गया है.

इन के अनुसार, कृषि मशीनरी प्रशिक्षण और परीक्षण संस्थानों, आईसीएआर संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा ड्रोन की खरीद पर कृषि ड्रोन की लागत का सौ फीसदी तक या 10 लाख रुपए, जो भी कम हो, का अनुदान दिया जाएगा.

कृषक उत्पादक संगठन (एफपीओ) किसानों के खेतों पर इस के प्रदर्शन के लिए कृषि ड्रोन की लागत का 75 फीसदी तक अनुदान पाने के लिए पात्र होंगे.

मौजूदा कस्टम हायरिंग सैंटरों द्वारा ड्रोन और उस से जुड़े सामानों की खरीद पर 40 फीसदी मूल लागत का या 4 लाख रुपए, जो भी कम हो, वित्तीय सहायता के रूप में उपलब्ध कराए जाएंगे.

कस्टम हायरिंग सैंटर की स्थापना कर रहे कृषि स्नातक ड्रोन और उस से जुड़े सामानों की मूल लागत का 50 फीसदी हासिल करने या ड्रोन खरीद के लिए 5 लाख रुपए तक अनुदान समर्थन लेने के पात्र होंगे.

ग्रामीण उद्यमियों को किसी मान्यताप्राप्त बोर्ड से 10वीं या उस के समकक्ष परीक्षा उत्तीर्ण होनी चाहिए और उन के पास नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) द्वारा निर्दिष्ट संस्थान या किसी अधिकृत पायलट प्रशिक्षण संस्थान से दूरस्थ पायलट लाइसैंस होना चाहिए.

कृषि में ड्रोन के उपयोग के लिए कुछ नियमों का भी पालन करना होगा.

फसल अवशेष प्रबंधन: खाद बनाएं, इन्हें जलाएं नहीं

फसल अवशेष जलाने से निकलने वाले धुएं में मौजूद जहरीली गैसों से इनसान की सेहत पर विपरीत प्रभाव के साथसाथ वायु प्रदूषण का स्तर भी बढ़ता है.

* फसल अवशेष को जलाने से केंचुए, मकड़ी जैसे मित्र कीटों की संख्या कम हो जाती है. वहीं, इस से हानिकारक कीटों का प्राकृतिक नियंत्रण नहीं हो पाता है. नतीजतन, महंगे कीटनाशकों का इस्तेमाल करना बहुत ही आवश्यक हो जाता है.

* फसल अवशेष जलाने से मिट्टी में मौजूद लाभदायक सूक्ष्मजीवों की संख्या व उन के काम करने की क्षमता कम हो जाती है.

* जीवांश पदार्थ की मात्रा कम हो जाने से मिट्टी की उत्पादन क्षमता कम हो जाती है.

फसल अवशेषों को खेत की मिट्टी में मिलाने के लाभ

* जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है. फसल अवशेष से बने खाद में पोषक तत्त्वों का भंडार होता है. इस से भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ने से फसलों की पैदावार बढ़ती है और फसल को पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में मिलते हैं.

* भूमि में नमी बनी रहती है.

* भूमि में खरपतवारों के अंकुरण व बढ़वार में कमी होती है.

* फसल अवशेष भूमि के तापमान को बनाए रखते हैं. गरमियों में छायांकन प्रभाव के कारण तापमान कम होता है और सर्दियों में गरमी का प्रवाह ऊपर की तरफ कम होता है, जिस से तापमान बढ़ता है.

* मिट्टी की ऊपरी सतह पर छेड़छाड़ न होने के कारण केंचुए आदि सूक्ष्मजीवों की क्रियाशीलता बढ़ जाती है.

* मिट्टी भुरभुरी बनने से उस की जल धारण क्षमता बढ़ती है.

* भूमि से पानी के भाप बन कर उड़ने में कमी आती है.

ऐसे करें फसल अवशेष का प्रबंधन

* गेहूं, जौ, सरसों, धान आदि फसलों की कटाई के बाद खेत में शेष रहे फसल अवशेष के साथ ही जुताई कर हलकी सिंचाई करें. इस के बाद ट्राइकोडर्मा का भुरकाव करना चाहिए. ऐसा करने से फसल अवशेष 15 से 20 दिन बाद कंपोस्ट में बदल जाएंगे, जिस से अगली फसल के लिए मुख्य एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में प्राप्त होंगे.

* ट्रैक्टरचालित कल्टीवेटर में जाली फंसा कर फसल अवशेष को आसानी से इकट्ठा कर गड्ढे में गोबर का छिड़काव कर दबाने के बाद ट्राइकोडर्मा आदि डाल कर बढि़या कंपोस्ट तैयार किया जा सकता है.

* फसल अवशेषों के रहते बोआई में कठिनाई आती है, परंतु आधुनिक मशीनों जैसे जीरो ड्रिल, बीज व खाद ड्रिल, हैप्पी सीडर, टर्बो सीडर और रोटरी डिस्क द्वारा सीधी बोआई आसानी से की जा सकती है. इस से भूमि में नमी बनी रहने के कारण 2 फसलें आसानी से ली जा सकती हैं.