Success Story: प्रगतिशील किसान सुरजीत सिंह चग्गर
“मुश्किलें तो दिल के इरादे आजमाती हैं,
आंखों से स्वप्न के पर्दे हटाती हैं.
हौंसला न हार गिरकर मुसाफिर,
कि ठोकरें इंसान को चलना सिखाती हैं…”
पंजाब के होशियारपुर जिले के एक किसान ने इस शेर को सिर्फ पढ़ा नहीं, बल्कि अपने जीवन में जीकर दिखाया है. जब खेती में मजदूरों की कमी बढ़ी, लागत बढ़ी और समय पर काम कराना मुश्किल होने लगा, तब उन्होंने शिकायत करने के बजाय समाधान खोजने का रास्ता चुना. यही रास्ता उन्हें एक साधारण किसान से कृषि नवाचारक की पहचान तक ले गया.
हम बात कर रहे हैं पंजाब के होशियारपुर जिले के गांव चक्कड़ां के प्रगतिशील किसान सुरजीत सिंह चग्गर की, जिन्हें कई किसान प्यार से “कृषि वैज्ञानिक” भी कहते हैं. कारण साफ है—उन्होंने खेती की समस्याओं को समझा, उनके समाधान खोजे और अपनी जरूरत के अनुसार कई कृषि मशीनें खुद तैयार कर डालीं.
आज उनकी बनाई मशीनें पंजाब ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों तक पहुंच चुकी हैं. लेकिन इस सफलता के पीछे वर्षों की मेहनत, सीखने की ललक और खेती के प्रति गहरा लगाव छिपा है. कैसी रही उनकी सफलता की कहानी, पढ़ें इस लेख में –
1983 से शुरू हुआ खेती का सफर
सुरजीत सिंह चग्गर बताते हैं कि उनका परिवार लंबे समय से खेती करता आ रहा है. हालांकि पहले खेती पूरी तरह पारंपरिक तरीके से होती थी. खेतों में मेहनत तो बहुत होती थी, लेकिन तकनीक और वैज्ञानिक जानकारी का अभाव था.
वर्ष 1983 के आसपास उन्होंने खेती की जिम्मेदारी संभाली. धीरे-धीरे कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों और वैज्ञानिकों से जुड़ाव बढ़ा. वे सेमिनारों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जाने लगे. यहीं से उनकी सोच बदलनी शुरू हुई.
उन्होंने महसूस किया कि खेती केवल अनुभव से नहीं, बल्कि ज्ञान और तकनीक से भी आगे बढ़ती है. आज वे लगभग 40 से 50 एकड़ क्षेत्र में खेती कर रहे हैं और आधुनिक तकनीकों के साथ खेती को लाभकारी बनाने में जुटे हैं.
फसलों से लेकर बागवानी तक, हर क्षेत्र में प्रयोग
सुरजीत सिंह केवल धान और गेहूं तक सीमित किसान नहीं हैं. उनके खेतों में गेहूं, धान, बरसीम, बाजरा, आलू, मटर और गाजर जैसी फसलें उगाई जाती हैं. इसके साथ ही उन्होंने बागवानी को भी अपनाया है. ड्रैगन फ्रूट, पपीता और अमरूद जैसे फलदार पौधों की खेती कर वे अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं.
उनका मानना है कि आज के दौर में किसान को केवल एक फसल पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. विविधीकरण ही जोखिम कम करने का सबसे अच्छा तरीका है.
जैविक खेती को देते हैं प्राथमिकता
बढ़ती लागत और मिट्टी की सेहत को देखते हुए सुरजीत सिंह जैविक खेती को प्राथमिकता देते हैं. वे अपने खेतों में वर्मी कम्पोस्ट, गोबर खाद और हरी खाद का उपयोग करते हैं. इसके अलावा वर्मी वॉश और विभिन्न जैविक घोल भी स्वयं तैयार करते हैं.
हालांकि वे पूरी तरह रासायनिक खेती के विरोधी नहीं हैं. जहां जरूरत होती है वहां संतुलित मात्रा में यूरिया, डीएपी, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग भी करते हैं. उनका मानना है कि मिट्टी को स्वस्थ रखे बिना खेती का भविष्य सुरक्षित नहीं किया जा सकता.

मजदूरों की कमी ने बनाया नवाचारक
सुरजीत सिंह की सफलता की सबसे रोचक कहानी यहीं से शुरू होती है. वे बताते हैं कि खेती में सबसे ज्यादा खर्च मजदूरी पर आता है. दूसरी समस्या यह है कि जरूरत के समय मजदूर उपलब्ध नहीं होते. कई बार फसल तैयार खड़ी रहती है, लेकिन मजदूरों की कमी के कारण काम समय पर नहीं हो पाता.
इसी परेशानी ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया. उन्होंने तय किया कि यदि मजदूर नहीं मिलते तो मशीनों के माध्यम से समाधान खोजा जाए. यहीं से देसी जुगाड़ और कृषि नवाचार का उनका सफर शुरू हुआ.
400 रुपये में बनाई पहली मशीन
शुरुआत में उन्होंने मक्का के भुट्टे निकालने वाली मशीन तैयार की.यह मशीन बेहद कम लागत में तैयार हुई. उस समय इसकी लागत लगभग 400 रुपये आई थी. मशीन सफल रही और आसपास के किसानों ने भी इसमें रुचि दिखाई. धीरे-धीरे इसकी मांग बढ़ने लगी.
आज उनकी यह मशीन विभिन्न राज्यों के किसानों तक पहुंच रही है और हजारों किसानों का समय तथा श्रम बचा रही है. सबसे खास बात यह है कि उनकी मशीनें छोटे किसानों की जेब को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं.
राष्ट्रपति से मिल चुका है सम्मान
सुरजीत सिंह के नवाचारों को केवल किसानों ने ही नहीं, बल्कि देश ने भी सराहा है. उनके कृषि नवाचारों और मशीन निर्माण के कार्यों के लिए उन्हें राष्ट्रपति स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है.
लेकिन वे कहते हैं कि उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान तब होता है जब कोई किसान उनकी मशीन का उपयोग करके लाभ कमाता है.
खेती में मशीनों का असली महत्व
सुरजीत सिंह का मानना है कि खेती में मशीनों का सबसे बड़ा फायदा समय की बचत है. आज खेती का हर काम समय पर होना जरूरी है. यदि बुवाई देर से हुई तो उत्पादन प्रभावित होगा. यदि कटाई देर से हुई तो नुकसान बढ़ सकता है.
मटर की खेती का उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि यदि फसल समय पर बाजार में पहुंच जाए तो किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं. कई बार एक ही दिन में 20 से 30 रुपये प्रति किलो तक का अंतर आ जाता है. ऐसे में मशीनें केवल श्रम बचाने का माध्यम नहीं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने का साधन भी हैं.
इंटीग्रेटेड फार्मिंग: जोखिम कम करने का फार्मूला
सुरजीत सिंह केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं हैं. उन्होंने अपने फार्म पर डेयरी, बकरी पालन, बत्तख पालन, वर्मी कम्पोस्ट और बागवानी को भी जोड़ा है. उनका मानना है कि खेती में जोखिम हमेशा रहेगा. कभी मौसम खराब होगा, कभी बाजार भाव गिरेंगे और कभी बीमारी का प्रकोप बढ़ेगा. ऐसे में यदि किसान केवल एक फसल पर निर्भर रहेगा तो आर्थिक संकट में फंस सकता है.
इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल में आय के कई स्रोत बन जाते हैं. यदि एक गतिविधि में नुकसान हो जाए तो दूसरी गतिविधि उसकी भरपाई कर देती है. यही वजह है कि वे किसानों को बहुआयामी कृषि मॉडल अपनाने की सलाह देते हैं.
परिवार बना सबसे बड़ी ताकत
इतना बड़ा कृषि मॉडल अकेले संभालना आसान नहीं है. सुरजीत सिंह बताते हैं कि उनकी सफलता के पीछे परिवार का बड़ा योगदान है. उनका बेटा बीएससी एग्रीकल्चर कर चुका है और खेती के कामों में सक्रिय भूमिका निभाता है.
वहीं उनकी पत्नी डेयरी और वर्मी कम्पोस्ट यूनिट का संचालन संभालती हैं. परिवार और तकनीक के इस संयोजन ने उनके कृषि मॉडल को मजबूत बनाया है.
आवारा पशु भी बने चुनौती
खेती की चुनौतियां केवल मौसम और बाजार तक सीमित नहीं हैं. सुरजीत सिंह बताते हैं कि आवारा पशु, बंदर और जंगली सूअर भी किसानों के लिए बड़ी समस्या बन चुके हैं. फसलों को बचाने के लिए खेतों में कांटेदार तार लगाने पड़ते हैं. उन्होंने सौर ऊर्जा आधारित सुरक्षा प्रणाली भी अपनाई है ताकि जानवर खेतों में प्रवेश न कर सकें.
खेती के साथ फूड प्रोसेसिंग
सुरजीत सिंह केवल कच्चा उत्पाद बेचने तक सीमित नहीं रहते. वे दालों, मसालों और गुड़ जैसे उत्पादों की प्रोसेसिंग और पैकेजिंग भी करते हैं.
उनका मानना है कि मूल्य संवर्धन (Value Addition) किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी तरीका है. यदि किसान केवल उत्पादन पर नहीं, बल्कि प्रसंस्करण और ब्रांडिंग पर भी ध्यान दें तो उनकी आय कई गुना बढ़ सकती है.
युवाओं को खेती से जोड़ने की जरूरत
आज बड़ी संख्या में ग्रामीण युवा खेती छोड़कर शहरों और विदेशों की ओर जा रहे हैं. सुरजीत सिंह इसे चिंता का विषय मानते हैं. वे युवाओं से कहते हैं कि कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों और आधुनिक कृषि प्लेटफॉर्म से जुड़ें. नई तकनीकों को सीखें और खेती को व्यवसाय के रूप में देखें. उनका मानना है कि पढ़े-लिखे युवा खेती में नई क्रांति ला सकते हैं.
किसानों के नाम संदेश
सुरजीत सिंह चग्गर का संदेश बेहद स्पष्ट है—किसान चाहे तो सब कुछ कर सकता है. वे किसानों को लगातार सीखते रहने, प्रशिक्षण लेने और नई तकनीकों को अपनाने की सलाह देते हैं. साथ ही वे यह भी कहते हैं कि केवल एक फसल पर निर्भर रहना जोखिम भरा है. फसल विविधीकरण, इंटीग्रेटेड फार्मिंग और कृषि यंत्रीकरण ही भविष्य की खेती की पहचान बनने वाले हैं.
देसी जुगाड़ से बनी प्रेरणा की कहानी
सुरजीत सिंह चग्गर की कहानी हमें बताती है कि खेती केवल हल चलाने का काम नहीं है. यह नवाचार, विज्ञान, तकनीक और उद्यमिता का भी क्षेत्र है. उन्होंने समस्याओं को अवसर में बदला, मजदूरों की कमी को मशीन निर्माण की प्रेरणा बनाया और खेती को एक नए नजरिए से देखने की राह दिखाई.
आज उनकी कहानी हजारों किसानों और युवाओं के लिए प्रेरणा है. वह यह साबित करती है कि यदि किसान सीखने को तैयार हो, नई सोच रखता हो और चुनौतियों से घबराने के बजाय समाधान खोजने का साहस रखता हो, तो खेती में सफलता की कोई सीमा नहीं है.
वास्तव में सुरजीत सिंह चग्गर उन किसानों में से हैं जिन्होंने यह साबित कर दिया कि खेती में बदलाव लाने के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा जरूरी बड़ी सोच होती है.





