Parali Management: पंजाब भारत का कृषि प्रधान राज्य है और इस राज्य का एक ऐसा गांव है जिसने कायम की एक ऐसी मिसाल, जिसकी तारीफ के कसीदे कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी पढ़े. क्या है उस गांव का नाम और ऐसी क्या है उस गांव की खासियत?

कुछ दिन पहले मेरा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा, नई दिल्ली जाना हुआ, जहां प्रगतिशील किसानों को लेकर एक आयोजन होना था. उस समय संस्थान के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने एक बात कही कि इस बार पंजाब के किसानों ने 95 फीसदी पराली कम जलाई, मात्र 5 फीसदी लोगों ने ही पराली जलाने (Parali Management) का काम किया. उनकी इस बात को पंजाब के ही एक गांव ने कहीं अधिक मजबूती देने का काम किया है. उस गांव का क्या नाम है, उसने ऐसा क्या कर दिया कि देश के कृषि मंत्री भी उस गांव के कारनामे के कायल हैं, आइए जानते हैं-

6 साल से एक भी किसान ने नहीं जलाई पराली

जी हां, बात समय की बचत करने की हो या पैसे की, अधिकतर किसान अगली फसल लेने के लिए धान की पराली का प्रबंधन (Parali Management) न करके उसे खेतों में ही जला देते हैं. लेकिन पंजाब के मोगा जिले के रणसिंह कलां गांव के किसानों ने पिछले 6 सालों से पराली नहीं जलाई है. उन्होंने फसल अवशेष प्रबंधन किया. ऐसे में इस गांव के किसानों ने एक मिसाल कायम की है, जिसके लिए कृषि मंत्री भी उस गांव जा पहुंचे.

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा

इस वर्ष पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में खासी कमी आई है और रणसिंह कलां जैसे गांव ने दिखा दिया है कि वैज्ञानिक तरीके से फसल प्रबंधन के जरिए बिना आग लगाए भी खेतों की सफाई और अगली फसल की तैयारी संभव है. पंजाब के इस गांव ने पराली प्रबंधन (Parali Management) का ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसे पूरे देश में ले जाया जाएगा, ताकि किसानों को विकल्पों की ठोस जानकारी मिले और पर्यावरण संवेदनशील खेती को बढ़ावा मिले.

आधुनिक तकनीक का कर रहे प्रयोग

इस गांव के किसान फसल अवशेष को खेत में मिलाकर डायरेक्ट सीडिंग और हैप्पी सीडर जैसी तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं. इससे मिट्टी में कार्बन और जैविक पदार्थ बढ़ रहे हैं, रासायनिक उर्वरकों की खपत घट रही है और उत्पादन में भी कोई कमी नहीं आ रही है. उन्होंने पूरे गांव को बधाई देते हुए कहा कि यह गांव देश-भर के उन क्षेत्रों के लिए संदेश दे रहा है, जहां अभी भी पराली जलाई जाती है.

तकनीक से बचत भी मुनाफ भी

इस तकनीक के बारे में किसानों का कहना है कि धान कटाई के बाद खेत को बिना तैयार किए हैप्पी सीडर जैसे यंत्र से सीधी गेहूं की बोआई की जाती है. इससे समय, खर्चा और पैसे की भी बचत होती है. फसल की शुरुआती अवस्था में क्राउन रूट विकसित होने तक अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती और एक माह तक बिना पलेवा के भी फसल स्वस्थ खड़ी है.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री को बताया कि पहले जितनी मात्रा में DAP और यूरिया डालते थे, अब उससे कम उर्वरक से काम चल रहा है और पैदावार भी पूरी मिल रही है, क्योंकि पराली की मल्चिंग (Parali Management) से खरपतवार दब रहे हैं, मिट्टी की नमी बनी हुई है और मित्र जीव सुरक्षित हैं.

कृषि मंत्री ने कहा

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसान गुरप्रीत सहित ग्रामीणों के सुझावों का उल्लेख करते हुए कहा कि तिलहन फसलों जैसे सरसों को अपनाने से किसान न केवल अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं, बल्कि देश को खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता से भी मुक्त करने में योगदान दे सकते हैं. उन्होंने रणसिंह कलां के खेत से ही किसानों को बड़ा आश्वासन देते हुए कहा कि जो किसान तुअर, उड़द, मसूर और चना जैसी दलहनी फसलों की बोआई करेंगे, उनकी पूरी उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदी जाएगी.

उन्होंने माना कि किसान के लिए यह पूरी तरह वाजिब अपेक्षा है कि यदि उचित दाम मिलें तो वह अधिक उत्पादन करने के लिए तैयार है, इसलिए सरकार इन फसलों की एमएसपी खरीद की पूर्ण गारंटी देगी, बशर्ते किसान रजिस्ट्रेशन करा लें. दलहन उत्पादन बढ़ने से देश की प्रोटीन सुरक्षा मजबूत होगी, दालों के दाम स्थिर रहेंगे और आयात पर निर्भरता घटेगी, जिससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को लाभ होगा.

रणसिंह कलां गांव से बही यह महकदार बयार दूर तक जानी चाहिए, लेकिन यह काम तभी संभव है जब किसान खुद से मन बना लेगा. आज फसल अवशेष प्रबंधन की अनेक तकनीकियां हैं, सरकारी सुविधाएं हैं और उनका फायदा लेकर किसान यह सब आसानी से कर सकता है और जहरमुक्त खेती कर सकता है.

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