Women Farmers : किसान का नाम आते ही हमारे जेहन में हमेशा एक मर्द की ही तसवीर उभर कर सामने आती है. हालांकि फसलों की पैदावार बढ़ाने व गरीबी मिटाने में महिला किसानों की अहम भूमिका रही है, लेकिन आमतौर पर ज्यादातर लोग महिलाओं को किसान मानने को तैयार ही नहीं होते. वे उन्हें आज भी सिर्फ मजदूर ही समझते व मानते हैं.
अधूरा सफर
औरत और मर्द की बराबरी के खूब ढोल पीटे जाते हैं. अकसर यह कहा जाता है कि औरतें आजकल मर्दों से कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं.
बेशक बात सही है, पर शहरों के मुकाबले गांवकसबों में रहने वाली खासकर कम पढ़ीलिखी महिला किसानों की हालत बेहद खराब है, क्योंकि उन की जानकारी, कूवत व हुनर का दायरा आज भी सिमटा हुआ यानी छोटा है.
गौरतलब है कि हमारी कुल आबादी का 70 फीसदी हिस्सा आज भी गांवों में बसता है. उद्योगधंधों में हुई बेहिसाब तरक्की के बावजूद आज भी 60 फीसदी आबादी की कमाई का जरीया खेती है.
औरतें किसानी करने के बावजूद मर्दों के बराबर में नहीं बल्कि उन से पीछे मानी जाती हैं. ज्यादातर महिला किसान आज भी हाशिए पर हैं. उन के काम को मर्दों जैसी मान्यता नहीं मिलती इसलिए वे आज भी अपने हकों के इंतजार में हैं.
योगदान पूरा
डेरी, पशुपालन, पोल्ट्री, रेशम कीटपालन, मछलीपालन वगैरह खेती से जुड़े कामधंधों में आधे से भी ज्यादा हिस्सेदारी औरतों की रहती है. वे अपने घरपरिवार की जिम्मेदारियों के साथसाथ पानी, ईंधन व जानवरों के चारे वगैरह का भी इंतजाम बखूबी करती हैं. इस सब के बावजूद जमीन के मालिकाना हक के मामले में औरतें बहुत ही पीछे व नीचे हैं.
यह बात सुनने में भले ही छोटी लगे, लेकिन इस का खमियाजा महिला किसानों को उठाना पड़ता है. मसलन, जो मर्द बाहर नौकरी करते हैं, उन के परिवारों में खेतीकिसानी के सारे कामधंधे औरतें ही निबटाती हैं. ऐसे में उन के साथ कोई हादसा होने पर उन्हें बीमा वगैरह का मुआवजा नहीं मिलता, क्योंकि जमीन उन के नाम नहीं होती है.
खेतीकिसानी का काम कर रहीं महिला किसानों को मान्यता दिया जाना लाजिमी है ताकि उन्हें भी जमींदार मर्द किसानों जैसी सहूलियतें मिल सकें. गांवखेत से जुड़ी औरतों की भूमिका परिवार की आमदनी बढ़ाने में अहम रहती है, लेकिन फिर भी इन की सारी मेहनत घरेलू काम के तहत ही आती हैं.
खेतीकिसानी के कामधंधों में औरतों की मेहनत व हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है. इस के मद्देनजर अब यह बेहद जरूरी हो गया है कि किसानों को दी जा रही छूट व सहूलियतों में महिला किसानों को ज्यादा हिस्सा दिया जाए ताकि उन्हें बढ़ावा मिले और मर्दों की तरह से ही उन का भी नाम खसराखतौनी वगैरह में दर्ज हो.
अनजान हैं महिला किसान
खेतीकिसानी के कामधंधों पर खोजबीन करने का जिम्मा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद पर है. इस परिषद के तहत हमारे देश में 1१३ अनुसंधान संस्थान चल रहे हैं. इन में से एक संस्थान ओडिशा के भुवनेश्वर में है, जो बीते 21 सालों से महिला किसानों की भलाई के लिए काम कर रहा है. इस का नाम केंद्रीय कृषिरत महिला संस्थान है.
यह संस्थान खेती में महिलाओं की हिस्सेदारी के आंकड़े रखता है. साथ ही, बैठक, नुमाइश व ट्रेनिंग वगैरह की सहूलियतें मुहैया कराता है.
महिलाओं के लिए खेती में काम करने के ऐसे नए, सुधरे व किफायती तरीके निकालने की जरूरत है, जिन से कम समय में बेहतर नतीजे हासिल हो सकें. इस संस्थान की वैबसाइट पर ऐसा कुछ मुहैया नहीं कराया गया है जो महिला किसानों के लिए फायदेमंद हो. होना यह चाहिए कि महिला किसानों को खेती व उन की रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने, उन की मुश्किलों को आसान बनाने और उन की आमदनी को बढ़ाने वाली उपयोगी बातें आसान भाषा में छपवा कर देश के हर कृषि विज्ञान केंद्र के जरीए बांटी जाएं. खासतौर पर महिला किसानों के लिए बैठकें आयोजित हों, किसान मेले व नुमाइशें लगाई जाएं और उन में महिला कृषि वैज्ञानिक हिस्सा लें, ताकि महिला किसानों की दिक्कतें सुलझाई जा सकें.
हमारी कुल आबादी का तकरीबन आधा हिस्सा औरतों का है. रेडियो पर फार्म ऐंड होम का महकमा एक है, लेकिन गंवई औरतों के आगे बढ़ने के रास्ते आज भी ज्यादा खुले व साफ नहीं हैं जितने कि होने चाहिए. उन में बहुत सी रुकावटें हैं. इसे सुलझाने के लिए खेती में काम आने वाली मशीनें, खाद, दवा बनाने और बीज बेचने वाली कंपनियों और सहकारी संस्थाओं को आगे बढ़ कर महिला किसानों को बढ़ावा देना चाहिए. साथ ही, उन महिला किसानों की हौसलाअफजाई करना बेहद जरूरी है जिन्होंने खुद अपनी मेहनत से बेहतर काम कर के दिखाया हो. अगर महिला किसानों को खेत से खाने तक के बेहतर तरीके सिखा कर हुनरमंद बना दिया जाए तो इस से किसानों व देश दोनों की माली हालत सुधर सकती है, लेकिन इन की सुध कौन ले?





