Borer Insect Attacks : उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को इस समय सतर्क रहने की जरूरत है. राज्य के कई क्षेत्रों में गन्ने की फसल पर अंकुर बेधक (अर्ली शूट बोरर) और चोटी बेधक (टॉप बोरर) कीटों का प्रकोप (Borer Insect Attacks) देखने को मिला है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती अवस्था में नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह कीट उत्पादन पर गंभीर असर डाल सकते हैं. इसी के तहत उत्तर प्रदेश गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग ने गन्ना किसानों की फसल बचाने के लिए एक अहम अलर्ट जारी किया है.
अप्रैल से जून तक रहती है अधिक सतर्कता की जरूरत
गन्ने की फसल में अप्रैल से जून का समय बेहद संवेदनशील माना जाता है. इसी अवधि में बेधक कीट सक्रिय होकर (Borer Insect Attacks) पौधों की कोमल वृद्धि को नुकसान पहुंचाते हैं. ये सूंडियां पौधों की भीतरी गोंफ में प्रवेश कर अंदर से उसे नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे बीच की पत्तियां सूखने लगती हैं. कई बार प्रभावित गोंफ आसानी से खींचने पर बाहर निकल आती है, जिसे किसान ‘डेड हार्ट’ की स्थिति के रूप में पहचानते हैं.
उत्तर प्रदेश गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग विभाग की अपर मुख्य सचिव वीना कुमारी मीना के मुताबिक, गन्ना किसानों को अप्रैल से जून तक इन कीटों से फसल को बचाना होगा. यह प्रकोप यदि फैल जाए, तो कल्ले कम बनते हैं और गन्ने की बढ़वार तथा उपज दोनों प्रभावित होती हैं. इसके लिए शोध वैज्ञानिकों ने जरूरी दवाओं के छ़िड़काव समेत अन्य अहम जानकारी दी है.
कैसे पहचानें कीट का प्रकोप
अंकुर बेधक और चोटी बेधक कीट के हमले के कुछ प्रमुख संकेत इस प्रकार हैं—
• बीच की गोंफ या चोटी का सूख जाना
• पत्तियों पर अंडों के समूह दिखाई देना
• कल्लों का कमजोर या असामान्य विकास
• पौधे के भीतर सूंड़ी की गतिविधि
• प्रभावित पौधों का आसानी से उखड़ना या सूखी चोटी निकल आना
यदि ऐसे लक्षण दिखें तो तुरंत प्रबंधन शुरू करना जरूरी है.
एकीकृत प्रबंधन से करें बचाव
विशेषज्ञों ने किसानों को केवल रासायनिक उपायों पर निर्भर न रहकर समेकित कीट प्रबंधन (IPM) अपनाने की सलाह दी है.
1. प्रभावित पौधों को नष्ट करें
जहां प्रकोप दिखे, वहां प्रभावित पौधों को सूंड़ी और प्यूपा सहित काटकर नष्ट कर देना चाहिए, ताकि संक्रमण आगे न फैले.
2. जैविक नियंत्रण अपनाएं
ट्राइकोकार्ड का 15 दिनों के अंतराल पर उपयोग लाभकारी माना गया है. यह परजीवी ततैया के माध्यम से कीट अंडों को नियंत्रित करता है.
3. फेरोमोन और लाइट ट्रैप लगाएं
वयस्क कीटों की निगरानी और नियंत्रण के लिए 25–30 मीटर की दूरी पर फेरोमोन ट्रैप या लाइट ट्रैप लगाए जा सकते हैं. इससे प्रकोप की स्थिति समझने और कीट संख्या घटाने में मदद मिलती है.
रासायनिक नियंत्रण भी जरूरी
जहां प्रकोप अधिक हो, वहां वैज्ञानिक सलाह अनुसार अनुशंसित कीटनाशकों का उपयोग किया जा सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक पत्तियों पर अंडों और सूंडियों के नियंत्रण के लिए उपयुक्त मिश्रण का ड्रेंचिंग के रूप में प्रयोग प्रभावी रहता है. वहीं, तनों के भीतर मौजूद सूंड़ी के लिए जड़ों के पास दवा घोल का प्रयोग उपयोगी माना गया है.
पत्ती की सतह पर स्थित अंडे के समूहों व सूंड़ी के रासायनिक नियंत्रण के लिए फिप्रोनिल 40 प्रतिशत के साथ इमिडाक्लोप्रिड 40 प्रतिशत डब्ल्यू.जी. मिक्सर 500 ग्राम या क्लोरेन्ट्रानिलिप्रोल 8 प्रतिशत के साथ थायोमेथॉक्सम 17.5 प्रतिशत मिक्सर 600 ग्राम को 1000 लीटर पानी में मिलाकर ड्रेंचिंग कर सकते हैं.
गन्ने के भीतर की सूंड़ी नियंत्रण के लिए क्लोरेन्ट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एस.सी. 150 मिली को 400 लीटर पानी में घोलकर जड़ों के पास ड्रेंचिंग करें. किसान किसी भी दवा के प्रयोग से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ या गन्ना विभाग से सलाह अवश्य लें.
साफ-सफाई और निगरानी भी जरूरी
खेत की नियमित निगरानी, संतुलित पोषण, समय पर सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण भी कीट प्रबंधन में अहम भूमिका निभाते हैं. कमजोर फसल पर कीटों का प्रकोप अधिक होने की संभावना रहती है.
उपज बचाने का यही सही समय
गन्ना एक प्रमुख नकदी फसल है और शुरुआती सावधानी से बड़े नुकसान से बचा जा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि किसान यदि समय रहते पहचान और नियंत्रण उपाय अपनाएं, तो अंकुर बेधक और चोटी बेधक कीटों से फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है. सतर्कता, निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन से गन्ने की मिठास बची रह सकती है.





