पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता के बीच भारत सरकार ने उर्वरक क्षेत्र के लिए राहत भरा कदम उठाया है. प्राकृतिक गैस आपूर्ति बढ़ाकर उर्वरक उद्योग को स्थिर समर्थन देने का फैसला किया गया है, जिससे खरीफ सीजन से पहले खाद उत्पादन और उपलब्धता पर दबाव कम होने की उम्मीद है क्योंकि प्राकृतिक गैस यूरिया उत्पादन की प्रमुख कच्ची सामग्री है, इसलिए गैस आपूर्ति में सुधार को सीधे खाद सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है. खरीफ सीजन से पहले यह फैसला किसानों के लिए राहत भरा माना जा रहा है, साथ ही एलपीजी और पीएनजी सप्लाई भी सामान्य बनी हुई है.

गैस सप्लाई बढ़ने से उर्वरक उत्पादन को सहारा

सरकार ने उर्वरक संयंत्रों को मिलने वाली गैस आपूर्ति में वृद्धि कर उत्पादन निरंतर बनाए रखने की दिशा में कदम बढ़ाया है. सरकार ने उर्वरक उद्योग को मिलने वाली प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बढ़ाकर पिछले छह महीनों की औसत खपत के करीब 95 प्रतिशत तक पहुंचा दी है, ताकि आने वाले खरीफ सीजन से पहले खाद उत्पादन पर किसी तरह का दबाव न बने.

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने उपलब्ध गैस स्टॉक और एलएनजी कार्गो की तय शेड्यूलिंग को देखते हुए अप्रैल 2026 से उर्वरक संयंत्रों के लिए गैस आवंटन में अतिरिक्त 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है. इससे पहले गैस सप्लाई कम होने की आशंका जताई जा रही थी, लेकिन इस फैसले से उद्योग को स्थिरता मिलने की उम्‍मीद है.

अप्रैल-मई अवधि खरीफ की तैयारी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होती है, ऐसे में यह निर्णय समयानुकूल माना जा रहा है. इससे यूरिया और अन्य प्रमुख उर्वरकों के उत्पादन में रुकावट की आशंका कम हुई है.

खरीफ सीजन से पहले क्यों अहम है यह फैसला

धान, मक्का, कपास, सोयाबीन और दलहनी फसलों की बुवाई से पहले उर्वरकों की मांग तेजी से बढ़ती है. ऐसे समय उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में बाधा किसानों के लिए बड़ी समस्या बन सकती है. गैस सप्लाई में वृद्धि का मकसद इसी जोखिम को कम करना है.

उर्वरकों की उपलब्धता पर सरकार का दावा

आधिकारिक स्तर पर कहा गया है कि यूरिया और डीएपी सहित प्रमुख उर्वरकों की उपलब्धता मांग की तुलना में संतोषजनक है. खरीफ की संभावित मांग को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त आयात और घरेलू उत्पादन, दोनों पर जोर दिया गया है. उच्च वैश्विक कीमतों के बावजूद यूरिया आयात की तैयारी भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है.

सरकार की ओर से बताया गया कि, भले ही मिडिल ईस्ट तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा दबाव डाला है लेकिन देश में उर्वरकों और ईंधन की कोई कमी नहीं है.

उर्वरक विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा शर्मा ने मंत्रिस्तरीय ब्रीफिंग में कहा कि – ‘उर्वरकों की उपलब्धता मजबूत बनी हुई है, आपूर्ति आवश्यकता से कहीं अधिक है और अब तक किसी भी प्रकार की कमी की कोई सूचना नहीं मिली है.’ उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि, 1 अप्रैल 2026 से 26 अप्रैल 2026 तक यूरिया की उपलब्धता 71.58 लाख मीट्रिक टन है, जबकि आवश्यकता केवल 18.17 लाख मीट्रिक टन थी. इसी तरह DAP की उपलब्धता 22.35 लाख मीट्रिक टन है जबकि देशभर में इसकी जरूरत 5.90 लाख मीट्रिक टन ही है. अप्रैल में आपूर्ति की स्थिति पूरी तरह संतोषजनक रही है.

क्या जमीनी स्तर पर किसानों को खाद मिल रही है?

यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है. जमीनी स्थिति मिश्रित है. कई प्रमुख कृषि राज्यों में फिलहाल सामान्य आपूर्ति की स्थिति बताई जा रही है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में किसानों की चिंताएं बनी हुई हैं. सहकारी समितियों पर यूरिया उपलब्धता सामान्य बताई जा रही है, डीएपी का स्टॉक कई जिलों में संतोषजनक है, खरीफ पूर्व भंडारण बढ़ाने के प्रयास जारी हैं

जहां चुनौतियां बनी रहती हैं-
• कई बार गांव स्तर पर समय पर उपलब्धता नहीं होती,
• मांग बढ़ते ही कतारें और स्थानीय कमी की शिकायतें आती हैं,
• कुछ क्षेत्रों में अधिक कीमत या अनौपचारिक टैगिंग की शिकायतें भी किसानों द्वारा उठाई जाती रही हैं.
राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धता और गांव स्तर पर पहुंच—दो अलग बातें हैं, और असली सफलता अंतिम छोर तक आपूर्ति सुनिश्चित करने में है.

आयात पर निर्भरता और बढ़ती लागत
भारत उर्वरकों और कच्चे माल के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है. ऐसे में वैश्विक संकट, समुद्री मार्गों पर जोखिम और गैस कीमतों में वृद्धि लागत बढ़ा सकती है. इसी कारण सरकार वैकल्पिक आयात स्रोतों और आपूर्ति मार्गों पर भी काम कर रही है.

ऊर्जा और उर्वरक दोनों मोर्चों पर तैयारी

सरकार ने सिर्फ उर्वरक क्षेत्र ही नहीं, बल्कि ईंधन आपूर्ति को लेकर भी आश्वस्त किया है.

एलपीजी और गैस आपूर्ति
• घरेलू एलपीजी आपूर्ति सामान्य बताई गई है,
• वाणिज्यिक एलपीजी आवंटन में भी बढ़ोतरी की गई है,
• पीएनजी/सीएनजी आपूर्ति को प्राथमिकता दी जा रही है.
यह कदम ऊर्जा लागत और कृषि संचालन दोनों के लिए राहतकारी माना जा रहा है.

सब्सिडी बोझ और भविष्य की चुनौती

हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची रहने पर उर्वरक सब्सिडी बोझ बढ़ सकता है. इससे सरकार पर वित्तीय दबाव भी संभव है. फिर भी फिलहाल प्राथमिकता किसानों के लिए निर्बाध उपलब्धता बनाए रखना है.

किसानों के लिए क्या है सलाह और संदेश

विशेषज्ञ संतुलित उर्वरक उपयोग पर भी जोर दे रहे हैं. उनके सुझाव है कि, किसान केवल यूरिया पर निर्भरता कम करें, मृदा परीक्षण आधारित पोषण अपनाएं, डीएपी, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग करें, सहकारी समितियों से समय रहते आवश्यकता अनुसार उठान करें.

संकट के बीच स्थिरता की कोशिश

मिडिल ईस्ट तनाव और वैश्विक ऊर्जा दबाव के बीच भारत की कोशिश दो मोर्चों पर दिख रही है— उत्पादन सुरक्षित रखना और किसानों तक आपूर्ति पहुंचाना. फिलहाल संकेत यही हैं कि खरीफ के लिए उर्वरक उपलब्धता पर गंभीर संकट नहीं है, लेकिन जमीनी निगरानी और समयबद्ध वितरण उतना ही जरूरी रहेगा.

गैस आपूर्ति बढ़ाने का फैसला सिर्फ उद्योग के लिए राहत नहीं, बल्कि खरीफ सीजन की खाद सुरक्षा को मजबूत करने की रणनीति भी है.

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