Future Technology. क्या सूरज की रोशनी को बोतल या किसी अन्य बर्तन में स्टोर किया जा सकता है? सुनने में यह किसी विज्ञान कथा जैसा लगता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसे हकीकत के करीब पहुंचा दिया है. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सांता बारबरा (UCSB) के शोधकर्ताओं ने ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो सूरज की ऊर्जा को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सक्षम हो सकती है.
क्या है यह नई तकनीक?
इस तकनीक का नाम मॉलिक्यूलर सोलर थर्मल (Molecular Solar Thermal) है. इसमें वैज्ञानिकों ने एक विशेष ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल तैयार किया है, जो सूरज की रोशनी मिलने पर अपना आकार बदल लेता है और ऊर्जा को अपने रासायनिक तरीके से (केमिकल बॉन्ड) में जमा कर लेता है.
खास बात यह है कि यह ऊर्जा लंबे समय तक सुरक्षित रह सकती है. जब जरूरत पड़ती है, तो हल्की गर्मी या विशेष रासायनिक प्रक्रिया के तहत यही मॉलिक्यूल अपने पुराने रूप में लौट आता है और इकट्ठी की गई ऊर्जा को गर्मी के रूप में छोड़ देता है.
कैसे करता है काम?
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस मॉलिक्यूल का डिजाइन इंसानी डीएनए की संरचना से प्रेरित है. धूप पड़ते ही मॉलिक्यूल ऊर्जा को अपने अंदर कैद कर लेता है.
इसके बाद यह लंबे समय तक उसी अवस्था में बना रह सकता है. जरूरत पड़ने पर हल्का गर्म करने से यह ऊर्जा बाहर निकल जाती है. इस प्रक्रिया को कई बार दोहराया जा सकता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे लिथियम बैटरी से अधिक ऊर्जा मिल सकती है.
1 किलोग्राम लिथियम बैटरी लगभग 0.9 मेगाजूल ऊर्जा स्टोर कर सकती है.
वहीं 1 किलोग्राम यह नया मॉलिक्यूल करीब 1.6 मेगाजूल ऊर्जा संग्रहित कर सकता है यानी समान वजन में यह तकनीक पारंपरिक लिथियम बैटरी की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा संग्रह कर सकती है.
इसका कहां कर सकते हैं इस्तेमाल?
अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो इसके कई उपयोग हो सकते हैं :
-घरों में सौर ऊर्जा को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में किया जा सकता है.
-पानी गर्म करने और घरों में हीटर यानी घरों को गर्म रखने में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.
-सोलर कलेक्टरों में तरल (लिक्विड) के रूप में भी इसे स्टोर किया जा सकता है.
-दूरदराज या जहां बिजली नहीं है वहां भी इस स्टोर की गई ऊर्जा को इस्तेमाल किया जा सकता है.
पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद
इस तकनीक की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें इस्तेमाल होने वाले मटेरियल को बार-बार रिचार्ज और रीसायकल किया जा सकता है. इससे बैटरियों पर निर्भरता कम हो सकती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है.
यह तकनीक अभी शोध के चरण में है और इसे व्यावसायिक स्तर पर आने में समय लग सकता है. हालांकि शुरुआती नतीजे बताते हैं कि यदि इसे बड़े पैमाने पर विकसित किया गया, तो भविष्य में सौर ऊर्जा को स्टोर करने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है. इससे घरों, उद्योगों और दूरदराज के इलाकों में स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग पहले से कहीं अधिक आसान हो सकता है.





