First-Aid at Home. हमारे यहां शायद ऐसे बहुत कम किसान होंगे जो किसी न किसी तरह पशुओं से जुड़े न हों. तकरीबन 95 फीसदी किसान परिवार पशुओं से जुड़े होते हैं और इस काम में आए दिन पशुओं में छोटीबड़ी बीमारियों का सामना करना पड़ता है. शहरों में तो डाक्टरों की कमी नहीं पर दूरदराज के गांवों में पशु डाक्टर या तो आसानी से मिल नहीं पाते या होते ही नहीं हैं. वैसे भी छोटी सी बीमारी के लिए पशु को अस्पताल ले जाना या डाक्टर को गांव तक बुलाना किसान के बूते की बात भी नहीं होती है. ऐसे में कामयाब पशु पालक बनने के लिए किसान को खुद भी बीमारी और दवा की थोड़ीबहुत जानकारी होना जरूरी है.
तो कौन सी वे छोटीछोटी चीजें हैं, जिन से छोटीमोटी बीमारियों को दूर किया जा सकता है, जानें यहां:
लाल दवा : पानी में डालने के बाद गुलाबी रंग का घोल बनाने वाली यह दवा गहरे बैगनी रंग की खास चमक लिए हुए होती है. इस का इस्तेमाल कीट और बैक्टीरिया को खत्म करने में किया जाता है. जख्म हो जाने पर घाव को साफ करने या किसी जहरीले कीट के काट लेने की जगह पर इस के दानों को घाव भरने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
लायसोल : पानी को सफेद भूरे रंग में बदल देने वाले इस तेल में एक खास महक होती है. इस का इस्तेमाल भी पशुओं के घाव धोने और पशुशाला की सफाई करने में किया जाता है. बाड़े की सफाई के लिए एक फीसदी घोल और किसी घाव या पशुओं की बच्चेदानी धोने के लिए 2 फीसदी घोल का इस्तेमाल किया जा सकता है.
तारपीन का तेल : तीखे कड़वे स्वाद वाला रंगहीन पतला तारपीन का तेल सूजन और दर्द में मालिश के काम आता है. निमोनिया होने पर छाती पर इस की मालिश अच्छी रहती है. पैर के परजीवियों को भी यह खत्म कर देता है. पशु को अफरा होने के दौरान 30 से 60 मिलीलीटर तारपीन को किसी दूसरे तेल के साथ मिला कर देना अच्छा रहता है.
फिटकरी : वही फिटकरी जो कट जाने या छिल जाने पर खून के बहाव को रोकने के काम आती है, पशुओं के लिए भी फायदेमंद है. यह गुलाबी या रंगहीन ठोस, मीठापन लिए कसैला स्वाद और पानी में घुलनशील होती है. घाव के अलावा पशुओं की आंख, मुंह के छालों को भी इस से ठीक कर सकते हैं.
गंधक : पीले रंग का दिखने वाला यह ठोस पदार्थ बाहरी परजीवीनाशक होता है. यह पशुओं को मक्खी, मच्छर, खटमल, जूं, पिस्सू वगैरह से बचाने में मदद करता है. इस के अलावा खुजली, दाद, छाजन में गंधक लिनिमेंट का इस्तेमाल करना चाहिए. आंतों में आई कमी को भी इस की चटनी दूर करती है और उन्हें मजबूती भी देती है.
फिनायल : पानी में घुलने के बाद सफेद रंग का होने वाला यह पदार्थ बीमारी फैलाने वाली मक्खी, मच्छर और कीटाणुओं को मारने के काम आता है. इस से पशुशाला को साफ रखा जा सकता है. इस के अलावा पशुओं के पैरों में खुरपका बीमारी होने पर खुर को धोने के लिए भी इस का इस्तेमाल किया जाता है.
एल्कोहल : इस को खुला छोड़ने पर यह हवा में उड़ जाता है. रंगहीन, पतला तरल, विशेष गंध, क्लोरोफार्म व टिंचर बनाने में 95 फीसदी एल्कोहल में 5 फीसदी पानी मिला कर इस्तेमाल करें. पशु के सुस्त होने, थकान होने या सर्दी की शिकायत होने पर इस का इस्तेमाल किया जा सकता है.
कपूर : तकरीबन हर घर में पाया जाने वाला यह रंगहीन, खुशबूदार, जलने वाला हलका ठोस पदार्थ हवा में उड़ जाता है. स्वाद में कड़वा व लगाने पर ठंडा, पानी में नहीं घुलता पर एल्कोल में घुल जाता है.
अरंडी का तेल : इस में हलकी महक होती है. यह हलका पीला या रंगहीन गाढ़ा तरल पदार्थ दस्तावर होता है. इस घरेलू दवा का इस्तेमाल पशु का कब्ज खत्म करने में किया जाता है. बड़े पशु के लिए 6 सौ से 12 सौ मिलीलीटर व छोटे के लिए 60 मिलीलीटर मात्रा इस्तेमाल करें. खीस न मिलने पर नवजात बच्चे का पेट साफ करने के लिए 10 मिलीलीटर तेल दिन में 2-3 बार देना चाहिए. पशु की आंख से पानी बहने पर तेल की कुछ बूंदें आंख में डाली जा सकती हैं.





