Crop rotation.
जब खेत में लगातार एक ही तरह की फसल बोई जाती है, तो उस फसल की पैदावार कम होने लगती है और फसल पर लगने वाले कीट व बीमारियां भी बढ़ जाती हैं. कभीकभी ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं कि उस फसल को बोना बंद करना पड़ता है.
इस की खास वजह होती है कि हर फसल जरूरी 16 तत्त्व तो मिट्टी से लेती है, लेकिन उन में से कुछ तत्त्व ज्यादा मात्रा में उसे चाहिए होते हैं, जैसे तिलहन यानी तेल वाली फसलों को सल्फर की अलग से जरूरत होती है. प्याजलहसुन व गाजर को पोटाश की अलग से जरूरत होती है.
फसल चक्र का खास मकसद यही है कि फसलों को इस तरह फेरबदल कर बोया जाए कि मिट्टी की उपजाऊ ताकत पर बुरा असर नहीं पड़े, फसलों पर लगने वाले कीटबीमारी भी खुद ही खत्म हो जाएं और लंबे समय तक टिकाऊ खेती की जा सके.
फसल चक्र में रखें ध्यान
अदलहनी यानी बिना दाल वाली फसलों के बाद दलहनी यानी दाल वाली फसलें उगानी चाहिए. अदलहनी फसलें मिट्टी से नाइट्रोजन की ज्यादा मात्रा हासिल करती हैं, जबकि दलहनी फसलों की जड़ों में पाए जाने वाला राइजोबियम जीवाणु मिट्टी में नाइट्रोजन को इकट्ठा करता है. बाजरे के बाद चना, गेहूं के बाद मूंग लगाएं.
गहरी जड़ों वाली फसलों के बाद कम गहरी जड़ों वाली फसल उगानी चाहिए, जिस से फसलों की जड़ें मिट्टी के अलगअलग स्तर से पोषक तत्त्व हासिल करेंगी और गहरी जड़ मिट्टी को भुरभुरा बनाने में भी मदद करेगी. जैसे बाजरे के बाद सरसों की खेती करें.
फसल चक्र में शामिल फसलें एक जैसी कीटबीमारी वाली नहीं होनी चाहिए, वरना कीटबीमारी का हमला भयंकर रूप से बढ़ जाएगा.
ज्यादा खाद चाहने वाली फसलों के बाद कम खाद चाहने वाली फसलें उगानी चाहिए.
फसल चक्र में फसलों के पानी की मांग का भी ध्यान रखना चाहिए. ज्यादा पानी चाहने वाली फसलें लगातार लेने से मिट्टी की सतह पर नमक की मात्रा बढ़ जाने से मिट्टी खराब हो जाती है.
फसल चक्र बनाते समय उस में ऐसी फसलों को शामिल करना चाहिए कि किसान के पास मौजूद सभी संसाधनों यानी मेहनत, सिंचाई, खाद, बीज, पैसा, साधन का पूरा व सही इस्तेमाल हो और किसान को जरूरत की सभी चीजें जैसे अनाज, सब्जी, दाल, पशुओं के लिए चारा व नकद रुपए भी जरूरत के मुताबिक हासिल होते रहें.
ऐसा कई बार देखा गया है कि मौसम के कहर के चलते पूरी फसल बरबाद हो जाती है. अगर किसान एक ही खेत में एकसाथ एक से ज्यादा फसलें बोएं तो किसी वजह से अगर एक फसल बरबाद हो जाए या पैदावार घट जाए तो दूसरी फसल से उस की भरपाई कर नुकसान को घटाया जा सकता है.
फसलों का चुनाव सही तरीके से किया जाए तो मिट्टी की उपजाऊ ताकत को भी बचाया जा सकता है.
मिलवां फसल के फायदे
मौसम की मार का खतरा कम किया जा सकता है, क्योंकि खराब मौसम के चलते अगर एक फसल बरबाद भी हो जाए तो दूसरी के बचने की कुछ उम्मीद रहती है.
मिश्रित फसल बोने से खेत की उपजाऊ ताकत बनी रहती है, क्योंकि अगर दलहनी व अदलहनी फसलों को मिश्रित रूप में बोया जाए तो नाइट्रोजन की पूर्ति होती रहती है. मिट्टी में पानी व धूप का ज्यादा इस्तेमाल होता है. इसलिए पैदावार में बढ़त होती है.
मिश्रित फसलों पर कीटबीमारी का हमला कम होता है.
खरपतवारों की रोकथाम में भी मदद मिलती है. खासतौर से जिन फसलों में लाइनों की दूरी आपस में ज्यादा रखते हैं, वहां पर हमें ज्यादा फायदा पहुंचता है.
मिश्रित फसल के लिए चुनी गई फसलें आबोहवा, मिट्टी, पानी की मांग के हिसाब से समान होनी चाहिए.
दलहनी फसलों के साथ अदलहनी फसलों का मिश्रण करना चाहिए, जिस से मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी नहीं आए.
दोनों तरह की फसलें एकदूसरे की सहयोगी होनी चाहिए. Crop rotation





