Goat farming business-
बकरी को गरीब की गाय कहा जाता है. बकरी से दूध के अलावा मांस, खाल, खाद और बाल हासिल होते हैं. भारत के कुल दूध उत्पादन में बकरी का 3 फीसदी योगदान है, परंतु मांस उत्पादन में बकरी का अहम रोल है. जो लोग साधनों की कमी के कारण गाय या भैंस नहीं पाल सकते, वे बकरी को आसानी से पाल सकते हैं.
भारत के विभिन्न भौगोलिक इलाकों में बकरियां जिन के पास साधन नहीं हैं, जमीन नहीं है, बेरोजगार, कृषि मजदूर व छोटे सीमांत किसानों की आमदनी का एक जरीया भी हैं. गांवों में घटती हुई खेती की जमीन व पानी की कमी के कारण कृषि उत्पादन में कमी व बढ़ती हुई जनसंख्या के दौर में बकरी पालन से अच्छा कोई दूसरा साधन नहीं है.
भारत में बकरियों की 22 प्रजातियां पाई जाती हैं. राजस्थान में मारवाड़ी, जखराना व सिरोही नस्लों की बकरियां ज्यादा पाली जाती हैं.
बकरी की सिरोही नस्ल, मध्यम से बड़ी आकर की दुकाजी नस्ल है, जो मांस और दूध के लिए पाली जाती है. सिरोही नस्ल की बकरियां राजस्थान के सिरोही, अजमेर, नागौर, भीलवाड़ा और टोंक जिलों में पाली जाती हैं. इन का रंग हलका, गहरा बादामी या धब्बेदार बादामी होता है. सिरोही बकरियों में जो कोनिकल आकार की होती हैं, वे दूध उत्पादन के लिए और जो बेलनाकार होती हैं, वे मांस उत्पादन के लिए बेहतर मानी जाती हैं. इन की पीठ में हलका सा झोल होता है. इन की टांगें लंबी होती हैं और पिछली टांगों पर मध्यम लंबे बाल होते हैं. जवान नर का वजन 45-50 किलोग्राम व मादा का 35-45 किलोग्राम होता है.
इस नस्ल की खास पहचान यह भी है कि कुछ बकरियों के गले के नीचे कलंगी (मांस भाग बैटल) होती है. इस बकरी का वजन सालभर में औसतन 21-30 किलोग्राम हो जाता है और 180 दिनों के ब्यांत काल में यह औसतन 120 लीटर दूध दे देती है.
सिरोही बकरों का औसत शारीरिक तापमान अन्य प्रजातियों के बकरों के मुकाबले कम होता है. सूखी व आधी सूखी जलवायु के लिए सिरोही नस्ल एक अच्छी नस्ल है. आने वाले समय में ग्रीन हाउस गैस के असर से धरती का तापमान बढ़ेगा, तो कहीं सूखा व बाढ़ का असर होगा. ऐसे में किसानों को ऐसी फसलों व ऐसे पशुओं का चयन करना होगा, जो ज्यादा गरमी को सहन कर सकें. पालतू पशुओं में बकरी और ऊंट इस बदलाव को आसानी से सहन करने में सक्षम साबित होंगे.
खानपान: आमतौर पर बकरियों को जंगल में चरा कर ही पाला जाता है, पर रोजाना 6-8 घंटे चराई के साथ हरा व सूखा चारा, दाना, नमक और खनिज लवण का मिश्रण भी जरूरत के मुताबिक देते रहना चाहिए. गाभिन व दूध देने वाली बकरियों को अलग से आहार की जरूरत होती है. बकरी के लिए पानी की मात्रा मौसम, भोजन और चराई के समय पर निर्भर करती है. वैसे बकरी को 3-4 बार पानी पिलाना चाहिए. इसे रोज 2 से 5 लीटर पानी की जरूरत होती है.
बकरी पालन व्यवसाय को ज्यादा फायदेमंद बनाने के उपाय:
बच्चों की मौतदर 7 से 10 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.
खरीदते समय बकरी 2 या 3 महीने की गाभिन होनी चाहिए.
बकरी पालन बकरी पालक की देखरेख में होने चाहिए.
खरीदते समय बकरी की उम्र 15 महीने व बकरे की उम्र 18 महीने होनी चाहिए.
5 साल से ज्यादा उम्र की या कम उत्पादकता वाली बकरियों को बेच देना चाहिए.
नर व मादा का अनुपात 1:20 रखना चाहिए.
बीजू बकरों का चयन करते समय ध्यान रखें कि बकरे स्वस्थ, मजबूत व अच्छी जनन क्षमता वाले हों. बकरों को रेवड़ में लगातार 2-3 साल इस्तेमाल करने के बाद बदल देना चाहिए.





