Vegetable Farming-

बुंदेलखंड की पथरीली कंकरीली व काली मिट्टी में बड़ी आसानी से उगाई जाने वाली फसलों में भिंडी का स्थान सब से ऊपर है. भिंडी की फसल अधिक आमदनी देने के साथ अच्छी मात्रा में पोषक तत्त्व भी मुहैया कराती है. गांव के बड़ेबूढ़े इसे औषधीय फसल के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं. इस की अहमियत को बताने के लिए जरूरी है कि इस के औषधीय गुणों का जिक्र किया जाए.

औषधीय गुण: भिंडी में आयोडीन की काफी मात्रा होती है, जो घेंघा बीमारी को ठीक करने में मदद करता है.

इस की पत्तियों का इस्तेमाल सूजन और अतिसार में बहुत ही फायदेमंद होता है.

भिंडी को ल्यूकोरिया और सामान्य कमजोरी को दूर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

इस के सूखे बीजों का इस्तेमाल खाद्य तेल तैयार करने में भी होता है. जिस में प्रोटीन का औसत अनुपात 25 फीसदी तक होता है. इस के अलावा इस के तेल से साबुन और प्रसाधन सामान भी बनाए जाते हैं.

और फायदे

भिंडी की जड़ों का इस्तेमाल गन्ने के रस को साफ करने में और हरे कोमल फलों को कढ़ी व सूप बनाने में इस्तेमाल किया जाता है.

इस के सूखे बीजों को तोड़ कर दुधारू जानवरों को दूध बढ़ाने के लिए खिलाया जाता है.

इस के रेशों से जूट, कपड़ा व कागज वगैरह बनाया जाता है.

अच्छी किस्में:

भिंडी की अच्छी खेती व अच्छे उत्पादन के लिए जरूरी है कि हम अच्छी वैरायटी के बीज का चयन करें. इस में अलगअलग इलाकों के लिए अलगअलग वैरायटी का इस्तेमाल करते हैं.

कुछ वैरायटी अर्का कोमल, अर्का अनामिका, आजाद, क्रांति वगैरह पर मौजेक बीमारी का असर नहीं होता है.

अधिक उपज वाली प्रजातियां आजाद क्रांति, को0-1, गुजरात, टिसार उन्नत, परभनी, क्रांति, पूसा-ए-4 वगैरह हैं.

बोआई का समय :

अलगअलग इलाकों में भिंडी की फसल का समय मौसम के अनुसार अलगअलग है:

मैदानी इलाकों में बसंत व गरमी कालीन फसल 15 फरवरी से 15 मार्च के बीच बोई जाती है.

खरीफ सीजन में 05 जून से 05 जुलाई तक फसल बोई जाती है.

पहाड़ी इलाकों में अप्रैलमई महीने में फसल लगाई जाती है.

बसंत व गरमी की फसल में 18-20 किलोग्राम बीज और खरीफ फसल में  08-10 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.

भिंडी की फसल को फफूंद से काफी नुकसान होता है. इसलिए जरूरी है कि बीज बोने से पहले किसी फफूंदनाशक से बीज का उपचार किया जाए. इस के लिए ट्राइकोडर्मा का इस्तेमाल करना चाहिए.

बोआई :

भिंडी की खेती के लिए बीज की बोआई हाथ से छिड़क कर या सीडड्रिल से की जाती है.

वैज्ञानिक रूप से बोआई समतल क्यारियों में, मेंड़ों पर कर सकते हैं. इस से अंकुरण समान रूप से होता है. कम पानी की जरूरत होती है और बरसात में पानी निकासी आसानी से हो जाती है.

सिंचाई :

फसल में अलगअलग मौसम में जरूरत के मुताबिक सिंचाई की जरूरत होती है. गरमियों में पानी की जरूरत 4-5 दिन पर होती है, जबकि खरीफ की फसल में सिंचाई मौसम व फसल की मांग के अनुसार की जाती है.

खरपतवार :

भिंडी की फसल के साथ ही तमाम तरह के खरपतवार निकल आते हैं. फसल में निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकाल देने चाहिए. जरूरत पड़ने पर खरपतवारनाशी का इस्तेमाल भी किया जा सकता है.

कीट व बीमारी :

भिंडी की पसल में समयसमय पर अनेक कीट बीमारियों का हमला होता है.

चैंपा :

यह एक छोटा कीट है, जो समूहों में रहता है और भिंडी की कोमल पत्तियों व फलों पर हमला करता है. यह पत्तियों व फलों का रस चूस कर फसल को नुकसान पहुंचाता है.

बीमारी लगे हिस्से को तोड़ कर खत्म कर दें. 0.05 फीसदी मिथाइल डेमोरान का छिड़काव 15 दिनों के अंतर पर 2 बार करना चाहिए.

सफेद मक्खी :

यह मक्खी पत्तियों से रस चूसती है और मौजेक बीमारी फैलाती है. इस का हमला सब से ज्यादा गरमियों में होता है.

इस की रोकथाम के लिए भिंडी की फसल के साथ गेंदा के फूलों को लगाएं और फल मक्खी को काबू करने के लिए फेरोमैन ट्रैप का इस्तेमाल करें. ट्राइएजोफास का छिड़काव करना भी ठीक रहता है.

फल छेदक :

यह तैयार फसल पर हमला कर फसल को नुकसान पहुंचाता है.

इस की रोकथाम के लिए बीमार फलों व तनों को तोड़ कर जला देना चाहिए.

10 दिन के अंतराल पर कार्बोरिल का छिड़काव करना चाहिए.  Vegetable Farming

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